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देशव्यापी PM-VBRY उत्सव में शामिल होगा चंडीगढ़; पीएम करेंगे 2,400 करोड़ की प्रोत्साहन राशि के वितरण का नेतृत्व

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY) के सफल कार्यान्वयन के उपलक्ष्य में,  श्रम और रोजगार मंत्रालय 19 जून, 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत के माननीय प्रधानमंत्री की गरिमामयी उपस्थिति में एक राष्ट्रीय PM-VBRY कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। इस कार्यक्रम के दौरान, भारत के माननीय प्रधानमंत्री प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से लाभार्थियों को लगभग ₹2,400 करोड़ की प्रोत्साहन राशि वितरित करेंगे।

PM-VBRY के तहत प्रोत्साहन राशि के इस वितरण से 15 लाख से अधिक लोगों के लिए अतिरिक्त रोजगार को समर्थन मिलने की उम्मीद है। नई दिल्ली में मुख्य कार्यक्रम में लगभग 1,200 आमंत्रित लोगों के शामिल होने की आशा है, जिनमें नियोक्ता और कर्मचारी, लाभार्थी तथा अन्य विशिष्ट अतिथि शामिल होंगे। माननीय प्रधानमंत्री देश के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले लाभार्थियों के साथ बातचीत भी करेंगे। इस कार्यक्रम का प्रसारण दूरदर्शन पर किया जाएगा।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा मामले और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया तथा श्रम और रोजगार राज्य मंत्री सुश्री शोभा करंदलाजे के साथ-साथ श्रम और रोजगार मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल होंगे।

देशव्यापी पहुंच अभियान के हिस्से के रूप में, देश भर में 200 स्थानों पर एक साथ क्षेत्रीय कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। क्षेत्रीय कार्यक्रमों में जन प्रतिनिधियों और गणमान्य व्यक्तियों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल होगी, जिनमें 2 राज्यपाल, 5 मुख्यमंत्री, 12 केंद्रीय मंत्री, 1 उपमुख्यमंत्री, 13 राज्य श्रम मंत्री, 39 राज्य मंत्री, 59 सांसद, 56 विधायक और 2 महापौर शामिल हैं। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, नियोक्ताओं और कर्मचारियों के साथ उनकी भागीदारी PM-VBRY की देशव्यापी पहुंच को और मजबूत करेगी और रोजगार सृजन तथा कार्यबल के औपचारिककरण के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करेगी। देशव्यापी भागीदारी को सुविधाजनक बनाने के लिए विज्ञान भवन में मुख्य कार्यक्रम की कार्यवाही का प्रसारण सभी क्षेत्रीय स्थानों पर किया जाएगा।

देश भर में आयोजित कार्यक्रमों में लगभग 65,000 से 70,000 प्रतिभागियों के शामिल होने की आशा है, जिनमें लगभग 9,000 नियोक्ता प्रतिनिधि और लगभग 45,000 कर्मचारी शामिल हैं।

इसी क्रम में, क्षेत्रीय कार्यालय, चण्डीगढ़ द्वारा दिनांक 19.06.2026 को जी.जी.डी.एस.डी. कॉलेज, सैक्टर 32-सी, चण्डीगढ़ – 160030 में PM-VBRY कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा जिसमें मुख्य अतिथि श्री सौरभ जोशी, मेयर, चण्डीगढ़ होंगे। अन्य गणमान्य व्यक्तियों में श्री राजीव कुमार गुप्ता, आई.ए.एस., श्रम आयुक्त, पंजाब सरकार, श्री हेमांग डिमजेल, उप मुख्य श्रम आयुक्त, चण्डीगढ़, श्री आकाश मित्तल, सहायक श्रम आयुक्त, चण्डीगढ़, श्री पंकज वोहरा, संयुक्त निदेशक, कर्मचारी राज्य बीमा निगम, श्री एस एस नेगी, डी.जी., श्रम ब्यूरो, श्री हुक्म सिंह, सदस्य, क्षेत्रीय समिति शामिल हैं। इनके अतिरिक्त, विभिन्न स्थापनाओं के कर्मचारी, नियोक्ता, कर्मचारी एसोसिएशन तथा नियोक्ता एसोसिएशन के सदस्य भाग लेंगे।

PM-VBRY  के बारे में प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY) भारत सरकार की एक प्रमुख रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन (ELI) योजना है। इसका उद्देश्य औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देना, संगठित कार्यबल में पहली बार शामिल होने वालों की मदद करना और नियोक्ताओं को अतिरिक्त नौकरियां पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस योजना के तहत, पहली बार नौकरी पाने वाले पात्र कर्मचारियों को एक महीने का वेतन (अधिकतम ₹15,000 तक) मिलता है, जबकि नियोक्ताओं को अतिरिक्त रोजगार पैदा करने के लिए दो साल तक प्रोत्साहन दिया जाता है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को अतिरिक्त दो साल के लिए बढ़ा हुआ सहयोग मिलता है, जिससे श्रम-प्रधान उद्योगों में लगातार नौकरियां पैदा करने को बढ़ावा मिलता है।

कुल ₹99,446 करोड़ के बजट के साथ, PM-VBRY का लक्ष्य दो साल की अवधि में देश भर में 3.5 करोड़ से अधिक नौकरियां पैदा करना है। इनमें से लगभग 1.92 करोड़ लाभार्थियों के औपचारिक कार्यबल में पहली बार शामिल होने की आशा है। इस योजना के तहत लाभ 1 अगस्त, 2025 और 31 जुलाई 2027 के बीच पैदा हुई नौकरियों पर लागू होते हैं। इस योजना का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार करना, गुणवत्तापूर्ण रोजगार को बढ़ावा देना और समावेशी व टिकाऊ आर्थिक विकास के माध्यम से ‘विकसित भारत’ के विजन में योगदान देना है।

इस योजना के दो हिस्से हैं:

भाग A – पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन:

इस हिस्से के तहत, EPFO  में पंजीकृत और ₹ 1 लाख प्रति माह तक वेतन पाने वाले पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारी, एक महीने के वेतन के बराबर प्रोत्साहन (अधिकतम ₹15,000 तक) दो किस्तों में प्राप्त करने के पात्र हैं। पहली किस्त लगातार छह महीने की सेवा पूरी होने के बाद दी जाती है, जबकि दूसरी किस्त बारह महीने की सेवा और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम पूरा होने के बाद दी जाती है। जो कर्मचारी छह महीने से अधिक समय तक लगातार नौकरी में रहते हैं, वे इस योजना के तहत लाभ पाने के पात्र हो जाते हैं, जिससे कार्यबल को बनाए रखने और लगातार औपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिलता है। प्रोत्साहन की दूसरी किस्त को एक निश्चित अवधि के लिए बचत साधन/जमा खाते में रखा जाएगा ताकि युवा श्रमिकों में लंबी अवधि की बचत की आदत को बढ़ावा दिया जा सके।

भाग B – नियोक्ताओं के लिए सहयोग:

यह हिस्सा सभी क्षेत्रों में अतिरिक्त रोजगार पैदा करने के लिए नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करता है। नियोक्ताओं को हर अतिरिक्त कर्मचारी के लिए दो साल तक ₹3,000 प्रति माह तक का प्रोत्साहन मिलेगा, बशर्ते कर्मचारी कम से कम छह महीने तक लगातार नौकरी पर बना रहे। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए, ये प्रोत्साहन दो और साल के लिए बढ़ा दिए गए हैं, जिसमें तीसरा और चौथा साल भी शामिल है। इस हेतु पात्र होने के लिए, EPFO के अंतर्गत रजिस्टर्ड स्थापनाओं को कम से कम दो अतिरिक्त कर्मचारी (50 से कम कर्मचारियों वाले संस्थानों के लिए) या पांच अतिरिक्त कर्मचारी (50 या उससे ज़्यादा कर्मचारियों वाले संस्थानों के लिए) भर्ती करने होंगे।

पार्ट A के तहत पहली बार नौकरी करने वाले कर्मचारियों को सभी भुगतान “आधार ब्रिज पेमेंट सिस्टम” (ABPS) का प्रयोग करके प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के ज़रिए किए जाते हैं, जबकि पार्ट B के तहत नियोक्ताओं को प्रोत्साहन सीधे उनके PAN-लिंक्ड बैंक अकाउंट में क्रेडिट किए जाते हैं।

आशा है कि PMVBRY योजना से नौकरियां बढ़ेंगी, विशेषकर मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर में, और साथ ही औपचारिक कार्यबल में युवाओं की भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा। यह योजना देश भर में लाखों कामगारों के बीच रोज़गार को औपचारिक बनाने और सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बढ़ाने में भी काफी मदद करेगी।

PMVBRY योजना ने औपचारिक रोज़गार को बढ़ावा देने और कामगारों और नियोक्ताओं, दोनों को मदद करने में पहले ही काफी शुरुआती सफलता प्रदर्शित की है। मार्च 2026 में, योजना के पार्ट A के तहत 4.41 लाख पहली बार नौकरी करने वाले कर्मचारियों को ₹ 247 करोड़ के फायदे दिए गए, जिससे औपचारिक कार्यबल में आने वाले युवा कामगारों को सीधी वित्तीय मदद मिली। पार्ट B के तहत, 17,551 स्थापनाओं को ₹ 214 करोड़ के प्रोत्साहन दिए गए, जिससे लगभग 6.46 लाख कामगारों को अतिरिक्त रोज़गार मिला।

क्षेत्रीय कार्यालय, चण्डीगढ़ के हिस्से सहित पंजाब और हिमाचल प्रदेश अंचल की समेकित कुल स्थिति का विवरण नीचे दिया गया है:

1.  दूसरे वितरण चक्र के लिए संभावित भाग-B लाभार्थी (नियोक्ता)

विवरण                                                      स्थापनाओं की संख्या            राशि (₹)
पंजाब और हिमाचल प्रदेश अंचल                          2,428                    56,85,77,793
क्षेत्रीय कार्यालय, चण्डीगढ़                                      794                    26,63,94,224

2. दूसरे वितरण चक्र के लिए संभावित भाग-A लाभार्थी (कर्मचारी)

विवरण                                          लाभार्थियों की संख्या       राशि (₹)
पंजाब और हिमाचल प्रदेश अंचल                15,287           8,38,03,235
क्षेत्रीय कार्यालय, चण्डीगढ़                           5,435           3,26,38,831

“नोट: पार्ट-A के पहले चरण के दौरान बांटी गई राशि से संबंधित विवरण अभी उपलब्ध नहीं हैं।”

आने वाले समय में मिलने वाला लाभ PM-VBRY को लागू करने की दिशा में एक और अहम पड़ाव है। यह देशव्यापी कार्यक्रम रोज़गार पैदा करने, कार्यबल को औपचारिक बनाने और सामाजिक सुरक्षा कवरेज का दायरा बढ़ाने के प्रति सरकार की लगातार प्रतिबद्धता को दिखाता है। कर्मचारियों और नियोक्ताओं, दोनों को लगातार मदद देकर PM-VBRY भारत की रोज़गार रणनीति के एक अहम स्तंभ और ‘विकसित भारत’ के विज़न में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के तौर पर उभर रहा है।

भारत से शिकागो और फिर हुगली तक: स्वामी विवेकानंद के योग संदेश की वैश्विक यात्रा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

समूचे इतिहास में, कुछ विचार सरहदों के पार जाकर समाजों को बदलते रहे हैं। योग भारत की प्राचीनतम परंपराओं में से एक है, जिसकी यात्रा प्राचीन शास्त्रों से शुरू होकर वैश्विक मान्‍यता तक जा पहुँची है।

योग शब्द — जो संस्कृत के मूल शब्द युज से लिया गया है, जिसका अर्थ है “जोड़ना” या “एकत्व स्थापित करना”-  अपने भीतर दार्शनिक चिंतन और व्यावहारिक अनुशासन की एक समग्र प्रणाली समाहित किए हुए है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति (जीवात्मा) का सार्वभौमिक चेतना (परमात्मा) के साथ मिलन कराना है।

योग के प्रारंभिक बीज ऋग्वेद (लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व) में मिलते हैं, जहाँ तप और ध्यान जैसी अवधारणाओं का उल्लेख किया गया है। आगे चलकर इन विचारों का विकास उपनिषदों में हुआ, जिन्होंने योग के अनेक दार्शनिक सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया। हालाँकि योग को उसका सर्वाधिक व्यवस्थित स्वरूप महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र (लगभग 200 ईसा पूर्व–400 ईस्वी) ने प्रदान किया- इसमें अष्टांग योग अथवा आठ अंगों वाले मार्ग का वर्णन किया गया है, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि शामिल हैं। 

पतंजलि के अलावा, भगवद गीता योग को जीवन जीने के गतिशील दर्शन के रूप में प्रस्तुत करती है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद मानव कर्तव्य, उद्देश्य और आध्यात्मिक उन्नति के विषय में गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। भगवद्गीता में वर्णित विभिन्न मार्गों में कर्म योग (निःस्वार्थ कर्म का मार्ग), ज्ञान योग (ज्ञान का मार्ग) और भक्ति योग (भक्ति का मार्ग) मुक्ति प्राप्ति के तीन प्रमुख पथ माने गए हैं। अतः भारत केवल योग की जन्मभूमि ही नहीं है—यह एक जीवंत सभ्यता है, जहाँ योग सहस्राब्दियों से स्वाभाविक रूप से विकसित हुआ है, और जो इसकी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक संरचना का अभिन्न अंग रहा है।

हालाँकि, औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय समाज के शिक्षित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी बौद्धिक विचारधाराओं से प्रभावित होने और योग सहित भारत की अनेक पारंपरिक ज्ञान-परंपराओं को बदलती आधुनिक दुनिया में अपेक्षाकृत कम प्रासंगिक माना जाने लगा। ऐसे महत्वपूर्ण समय में, स्‍वामी विवेकानंद एक सशक्त स्‍वर बनकर उभरे, जिन्होंने लोगों को योग के वास्तविक महत्व को फिर से जानने में मदद की। 

स्वामी विवेकानंद ने अपने उपदेशों और विश्व धर्म संसद में दिए ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से दुनिया का ध्‍यान भारत की आध्यात्मिक विरासत की ओर आकृष्‍ट किया और योग की शाश्वत ज्ञान-परंपरा के प्रति लोगों में नया विश्वास जगाया। उन्होंने विश्व के विभिन्न भागों के  लोगों के साथ वेदांत और योग के सिद्धांत साझा किए  तथा यह स्पष्ट किया कि योग केवल एक धार्मिक साधना नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत विकास, आंतरिक शांति और आत्म-विकास का मार्ग भी है। विदेशों में स्वामी विवेकानंद को मिले व्यापक सम्मान और प्रशंसा ने भारतीयों के मन में अपनी प्राचीन परंपराओं और संस्कृति के प्रति नया विश्वास और गौरव उत्पन्न किया। 

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो – और उसके बाद अमेरिका भर में तथा यूरोप  के विभिन्न देशों में अपने व्‍याख्‍यानों  के माध्यम से पश्चिमी जगत को राजयोग (मन के नियंत्रण का योग), ज्ञानयोग (विवेक और ज्ञान का मार्ग), कर्मयोग (निःस्वार्थ सेवा का मार्ग) तथा भक्तियोग (ईश्वर-प्रेम और समर्पण का मार्ग) से परिचित कराया। पतंजलि के योग सूत्रों पर आधारित उनकी पुस्तक राजयोग (1896), पश्चिमी समाज के लिए योग-दर्शन का परिचय कराने वाली प्रारंभिक और सर्वाधिक प्रभावशाली कृतियों में से एक बन गई। 

 राजयोग  पर दिए अपने व्याख्यानों में स्वामी विवेकानंद ने योग को मानव चेतना के आंतरिक आयामों की खोज करने वाली एक व्यवस्थित और अनुभव-आधारित साधना के रूप में प्रस्तुत किया। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि मानवता के लिए भारत का सबसे बड़ा योगदान उसकी आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा है, और योग उस परंपरा की सबसे गहन तथा स्थायी अभिव्यक्तियों में से एक है। उनके विचारों ने उस समय के जाने-माने बुद्धिजीवियों और विचारकों का ध्यान खींचा, जिससे भारतीय दर्शन के साथ पश्चिमी देशों का जुड़ाव और बढ़ा। 

जो बात शायद कम चर्चित है— किंतु उतनी ही महत्वपूर्ण है, — वह यह है कि पश्चिमी देशों में स्वामी विवेकानंद के कार्यों ने भारत के भीतर ही योग के पुनर्जागरण को प्रेरित किया।  जब स्वामी विवेकानंद 1897 में भारत लौटे, तो वे खाली हाथ नहीं लौटे थे। वह अपने साथ एक नया आत्मविश्वास – भारत की आध्यात्मिक विरासत पर गर्व की एक नई भावना लाए थे – जो पश्चिम में उनके स्वागत से और बढ़ गई थी।  

1897 में भारत लौटने के बाद, स्वामी विवेकानंद ने देशभर में व्याख्यान दिए और लोगों को भारत की आध्यात्मिक परंपराओं को पुनः खोजने के लिए प्रेरित किया। 1 मई 1897 को, स्वामी विवेकानंद ने हावड़ा के बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की — जो हुगली नदी के पश्चिमी किनारे पर है, उस जगह से थोड़ी ही दूरी पर जहाँ रामकृष्ण ने दक्षिणेश्वर में अपने आखिरी साल बिताए थे। बंगाल में हुगली नदी के तट पर स्थापित यह संस्थान एक आंदोलन का वैश्विक मुख्‍यालय बन गया, जिसने वेदांत के आदर्शों, सेवा को पूजा मानना (शिव ज्ञाने जीव सेवा) तथा योग-दर्शन के व्यावहारिक अनुप्रयोग का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।  

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक गुरुओं की धरती होने के बावजूद, बदलते समय के साथ बंगाल में योग की सार्वजनिक दृश्यता धीरे-धीरे कम होती गई। जीवनशैली में परिवर्तन, आधुनिक प्राथमिकताओं के उभरने और सामाजिक संरचना में बदलाव के कारण योग धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन के केंद्र से दूर होता गया। फिर भी, इसकी जड़ें आध्यात्मिक संस्थाओं और समर्पित साधकों के माध्यम से जीवित रहीं। 

11 सितंबर 1893 को, “अमेरिका के बहनों और भाइयों” के अमर अभिवादन के साथ शुरुआत करते हुए, स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से दुनिया को भारत के आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित कराया। अब यह पंक्तियाँ “पश्चिम बंगाल के बहनों और भाइयों, अपने ही घर में योग की घर वापसी के साक्षी बनिए- शिकागो के वैश्विक मंच से लेकर हुगली के तट तक” – गहरे भावनात्मक संबंध को व्यक्त करती हैं, जो हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती हैं, जब स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को भारत के आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित कराया था। उनका संदेश भारत से विश्व तक पहुँचा और योग, सामंजस्य तथा आंतरिक शांति के मूल्यों का प्रसार करता गया। 

आज हुगली के तटों पर जो लौटा है, वह स्वयं योग नहीं है—क्योंकि भारत में योग कभी समाप्त ही नहीं हुआ—बल्कि योग के प्रति वह नवीनीकृत वैश्विक मान्यता और सराहना है, जिसकी शुरुआत भारत के प्राचीन ऋषियों से हुई और जिसे स्वामी विवेकानंद के संदेश ने विश्व मंच पर नए रूप में अभिव्यक्त किया।

यह आज लौट आया है — पुनर्जीवित, पुनःमान्य और पुनःस्थापित होकर — बंगाल में हुगली नदी के तट पर, जहाँ बेलूर मठ आज भी उस यात्रा की जीती-जागती यादगार के तौर पर खड़ा है। आज जब विश्वभर में योग का अभ्यास किया जा रहा है और जब दुनिया इसे एक अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता देती है, — ऐसे में यह याद रखना आवश्यक है कि योग की यह वैश्विक यात्रा अपने केंद्र में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक मिशन को समाहित किए हुए है। 

आज, कोलकाता में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उत्सव के साथ, ऐसा लग रहा है मानो योग की खूबसूरत घर वापसी उसी सरजमीं पर हो रही है, जहाँ से इसके संदेश ने विश्व मंच तक की अपनी यात्रा प्रारंभ की थी। हुगली नदी के तट एक बार फिर इस बात के साक्षी बन रहे हैं कि लोग एक ऐसी परंपरा का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हो रहे हैं, जिसने महासागरों  पार किया था और अब ज़्यादा पहचान और सम्मान के साथ लौटी है।

“शिकागो से हुगली” तक की यात्रा केवल एक अभ्यास की यात्रा नहीं है; यह एक विचार — और वास्तव में एक भावना — की यात्रा है, जो संतुलन, करुणा और आत्म-चेतना के माध्यम से तथा आंतरिक सामंजस्य की खोज के द्वारा मानवता को निरंतर जोड़ती रहती है।

( लेखक  केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री हैं)

नारी शक्ति का दशक, विकसित भारत का उत्कर्ष

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

देश के किसी भी गाँव, बस्ती या सुदूर इलाके में जाइए- हर घर की रसोई में एक जैसी बदली हुई हवा महसूस होगी l चूल्हे के जिस काले धुएँ ने कभी नई दुल्हन की आँखों में आँसू भरे थे, उज्ज्वला की नीली लौ ने उसे विदा कह दिया है। जो माँ कभी कोसों दूर से पानी ढोती थी, आज उसकी बेटी के पास ‘हर घर जल’ का अपना नल है। खेत के पीछे की वह शर्मनाक मजबूरी अब इतिहास है- आँगन में स्वच्छ भारत का शौचालय गरिमा के साथ खड़ा है। सिर पर पक्की छत है, और उसके मालिकाना हक पर पहली बार- घर की महिला का नाम लिखा है। पर्स में जन-धन की पासबुक है और फोन में यूपीआई का ऐप है।


यह किसी पोस्टर पर छपी कोई काल्पनिक तस्वीर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के बारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण का एक ऐसा सच है, जिसे देश की करोड़ों महिलाएँ हर रोज़ जी रही हैं। यह उस दौर की दास्तान है जिसमें Women Led Development के विजन के साथ भारतीय नारी विकसित भारत की शिल्पकार बन रही है। इस बदलाव की विशालता को समझने के लिए एक दशक पीछे लौटिए। एक समय मातृ मृत्यु दर 212 थी। निर्भया जैसी घटना पर देश का आक्रोश सड़कों पर था, लेकिन व्यवस्था में नीतिगत इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती थी। महिला आरक्षण विधेयक 1996 से चार बार अधर में लटका रहा और ट्रिपल तलाक पर दशकों तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। चूल्हा साँसों में कालिख घोलता था। दूरस्थ हैंडपंप रोज़मर्रा की बेबसी का प्रतीक था l भारतीय नारी एक नई सुबह की प्रतीक्षा में अपने हिस्से की उम्मीद बचाए हुए थी l


शुरुआत करते हैं सबसे पवित्र आँकड़े—जीवन का अधिकार से। देश में मातृ मृत्यु दर तेजी से घटकर 212 से 88 पर आ गई है। UN-MMEIG के अनुसार जहाँ वैश्विक स्तर पर मातृ मृत्यु दर में महज़ 48% की कमी आई, वहीं भारत ने 86% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की है। संस्थागत प्रसव 38.7% से बढ़कर 90.6% हो चुका है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ने चार करोड़ से अधिक माताओं के बैंक खातों में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक सीधे हस्तांतरित कर सुरक्षित मातृत्व और स्वस्थ बचपन की नींव मजबूत की है।


देश में बने 12 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालयों ने महिलाओं को गरिमा दी l10.5 करोड़ से अधिक उज्ज्वला कनेक्शनों ने धुएँ से मुक्ति दी। आज 16 करोड़ से अधिक घरों तक नल का पानी पहुँच चुका है—जबकि 2014 में महज 17% परिवारों के पास यह सुविधा थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के लगभग 4 करोड़ घरों में से 73% घर महिलाओं के नाम पर हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार सरकारी रिकॉर्ड्स पर माँ-बहनों का नाम गर्व से दर्ज है।


गरिमा से स्वामित्व आया, और स्वामित्व ने निर्णय लेने का आत्मविश्वास दिया। आर्थिक भागीदारी का यह विस्तार बैंक खाते से शुरू होकर उद्यमिता तक पहुँचा है l लगभग 56 करोड़ जन-धन खातों में 56% खाते महिलाओं के नाम पर हैं।


विश्व बैंक मानता है- भारत ने एक दशक में खाता-स्वामित्व के जेंडर गैप को शून्य पर ला दिया है, जो वैश्विक वित्तीय समावेशन के इतिहास में अभूतपूर्व है। मुद्रा योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक जमानत-मुक्त ऋणों में से 68% ऋण महिलाओं को मिले हैं। स्टैंड-अप इंडिया ने महिला उद्यमियों को 43,000 करोड़ रुपये से अधिक दिए हैं और दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत 91 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है।” निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें ‘लखपति दीदियाँ’ बन चुकी हैं।


यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट है l देश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुँच चुकी है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है । उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1 के पार है और STEM शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है। यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, SRS, NFHS, PLFS, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र—हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुँच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है।


इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थी l इसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ। आजजमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएँ राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं।


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही है l Women Helpline-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है । मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आँगनवाड़ी—ये नारी-नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं। बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है।


हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय ‘सह-निर्माता’ है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।
(SHGs) ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है।” निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें ‘लखपति दीदियाँ’ बन चुकी हैं।


यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट है l देश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुँच चुकी है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है । उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1 के पार है और STEM शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है। यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, SRS, NFHS, PLFS, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र—हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुँच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है।


इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थी l इसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ। आजजमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएँ राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं।


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही है l Women Helpline-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है । मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आँगनवाड़ी—ये नारी-नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं।


बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है। हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय ‘सह-निर्माता’ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।


(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।)

ICAR-IIOR की स्मार्ट सीड कोटिंग तकनीक से जलवायु-लचीली कृषि को मिलेगा बढ़ावा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीली कृषि को मजबूत करने और कृषि उत्पादकता में सुधार लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, आईसीएआर-भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान हैदराबाद ने एक अभिनव बायोपोलीमर-आधारित स्मार्ट सीड कोटिंग तकनीक विकसित और प्रदर्शित की है, जिसे कृषि फसलों की एक विस्तृत श्रृंखला में बीज की गुणवत्ता, फसल के निर्धारण और जैविक और अजैविक तनाव के विरूद्ध लचीलेपन को बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।


जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, सूखा, तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव, मृदा क्षरण, नए कीटों और रोगों के उदय, और संसाधनों के उपयोग की घटती दक्षता जैसी चुनौतियों के कारण कृषि क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए, बीजों की श्रेष्ठ गुणवत्ता सुनिश्चित करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बीज कृषि प्रौद्योगिकी का प्राथमिक वाहक है और फसल उत्पादकता का आधार है। अनुकूलतम प्रबंधन स्थितियों में भी, बीजों का खराब अंकुरण उपज को काफी हद तक सीमित कर सकता है। इसलिए, फसल वृद्धि के प्रारंभिक चरणों में बीजों की गुणवत्ता को मजबूत करना कृषि उत्पादकता में सुधार के सबसे किफायती और व्यापक तरीकों में से एक है।


ICAR-IIOR द्वारा विकसित स्मार्ट सीड कोटिंग तकनीक जैव अपघटनीय जैव-पॉलिमरिक पदार्थों का उपयोग करके बीजों के चारों ओर एक बहुक्रियाशील सुरक्षात्मक परत बनाती है। यह परत लाभकारी सूक्ष्मजीवों, पोषक तत्वों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, फसल सुरक्षा एजेंटों और पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने वाले यौगिकों के लिए एक वाहक प्रणाली के रूप में कार्य करती है, और इन्हें सीधे बीज-मिट्टी के संपर्क केन्‍द्र में पहुंचाती है। यह सुरक्षात्मक सूक्ष्म वातावरण फसल के निर्धारण के महत्वपूर्ण चरण के दौरान तेजी से अंकुरण, पौधों की जोरदार वृद्धि, जड़ों के बेहतर विकास और पर्यावरणीय खिचाव के प्रति सहनशीलता में सुधार को बढ़ावा देता है।


किसानों के खेतों में किए गए क्षेत्रीय प्रदर्शनों से फसल की स्थापना, पौधों की मजबूती और उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। तेलंगाना में मूंगफली और सोयाबीन पर किए गए प्रदर्शनों में पारंपरिक कृषि पद्धतियों की तुलना में उपज में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने के लिए इस तकनीक की क्षमता को उजागर करती है। इसी तरह के बीज संवर्धन दृष्टिकोणों ने विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में कई फसलों पर सकारात्मक प्रभाव दिखाया है। सोयाबीन, मक्का, मूंगफली, चना, कपास, सरसों और अरहर पर किए गए बहु-स्थानिक एआईसीआरपी-बीज परीक्षणों में अंकुरण की मजबूती, फसल की स्थापना और उपज में लगातार सुधार देखा गया, जिसमें अनुपचारित नियंत्रणों की तुलना में उत्पादकता में 12-37 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो विभिन्न फसल प्रणालियों के लिए एक स्केलेबल स्मार्ट सीड तकनीक के रूप में बायोपोलीमर-आधारित बहुस्तरीय बीज उपचारों की क्षमता को दर्शाता है।


यह तकनीक विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि के लिए प्रासंगिक है, जो भारत के कृषि योग्य क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा है और जलवायु संबंधी अनिश्चितताओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। मानसून में देरी, बार-बार पड़ने वाला सूखा, नमी की कमी, मिट्टी की खराब स्थिति और कीटों और रोगों का प्रकोप अक्सर पौधों के अंकुरण और फसल की स्थापना को प्रभावित करता है, जिससे अंततः पैदावार कम हो जाती है। बीजों के प्रदर्शन में सुधार करके और विकास के सबसे संवेदनशील चरणों के दौरान अंकुरण करने वाले पौधों की रक्षा करके, स्मार्ट बीज तकनीकें फसलों की सहनशीलता को काफी हद तक बढ़ा सकती हैं और उत्पादन जोखिमों को कम कर सकती हैं।


परंपरागत बीज उपचारों के विपरीत, जो केवल एक ही उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, आईसीएआर-आईआईओआर प्लेटफॉर्म एक व्यापक बीज संवर्धन प्रणाली के रूप में कार्य करता है जो एक ही अनुप्रयोग में कई लाभकारी कारकों को एकीकृत करने में सक्षम है। इस तकनीक को अनाज, बाजरा, दालें, तिलहन, रेशे वाली फसलें, चारा फसलें, सब्जियां, मसाले और बागवानी फसलों के लिए अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे यह देश भर में विविध कृषि प्रणालियों के लिए एक बहुमुखी समाधान बन जाता है।


यह नवाचार सतत कृषि, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, उन्नत बीज प्रणालियों और संसाधनों के बेहतर उपयोग जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है। उन्नत बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियों को व्यापक रूप से अपनाने से कृषि उत्पादकता बढ़ाने, इनपुट हानि को कम करने, पोषक तत्वों और जैविक उपयोग दक्षता में सुधार करने और देश के खाद्य, पोषण और आर्थिक सुरक्षा के प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।


आईसीएआर-आईआईओआर के वैज्ञानिकों ने इस बात पर बल दिया कि भविष्य में कृषि विकास तेजी से उन तकनीकों पर निर्भर करेगा जो किसानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रत्येक इनपुट की दक्षता और प्रभावशीलता में सुधार करती हैं। स्मार्ट सीड्स इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, जो फसल की वृद्धि के शुरुआती चरण में ही, जहां इनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, सुरक्षा, पोषण और जैविक सहायता प्रदान करते हैं। ऐसी तकनीकें किसानों को बेहतर फसल स्थापना, तनाव सहनशीलता में सुधार, उच्च पैदावार और अधिक लाभप्रदता प्राप्त करने में मदद कर सकती हैं, साथ ही पर्यावरणीय प्रभावों को भी कम कर सकती हैं।


इस नवाचार के अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए, आईसीएआर-आईआईओआर व्यापक प्रसार और उपयोग हेतु सार्वजनिक और निजी बीज प्रणालियों के साथ साझेदारी को बढ़ावा दे रहा है। राज्य बीज विकास निगम, राष्ट्रीय बीज निगम, सहकारी बीज संघ, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), बीज प्रसंस्करण इकाइयाँ, बीज केंद्र, अनुकूलित बीज उपचार केंद्र, बीज उद्यमी और निजी बीज कंपनियाँ स्मार्ट बीज प्रौद्योगिकियों को बीज उत्पादन और वितरण नेटवर्क में एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस प्रकार के सहयोग से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि गुणवत्ता-संवर्धित बीज बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुँचें और सतत कृषि विकास में योगदान दें।


आईसीएआर-आईआईओआर जैव पॉलिमर, लाभकारी सूक्ष्मजीवों, पोषक तत्व वितरण प्रणालियों और पर्यावरण के अनुकूल फॉर्मूलेशन से युक्त अगली पीढ़ी की बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियों पर अनुसंधान को आगे बढ़ा रहा है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक बीजों को जलवायु-प्रतिरोधी स्मार्ट बीजों में परिवर्तित करना है। ऐसी प्रौद्योगिकियों को व्यापक रूप से अपनाने से भारत की बीज प्रणाली सुदृढ़ हो सकती है, कृषि उत्पादकता में सुधार हो सकता है, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन बढ़ सकता है और अंततः देश भर के लाखों किसानों की आजीविका में सुधार हो सकता है।

जी7 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने एआई के वैश्विक उपयोग पर भारत का दृष्टिकोण रखा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज फ्रांस के एवियन में जी7 शिखर सम्मेलन में “इंश्योरिंग ए सेफ, रैपिड एंड एफिशिएंट रोल आउट ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” विषय पर आयोजित आउटरीच सत्र को संबोधित किया।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक परिवर्तनकारी शक्ति है जिसमें मानव सभ्यता की दिशा को फिर से परिभाषित करने की क्षमता है, लेकिन इसे लोगों को सशक्त बनाने वाला भी होना चाहिए। उन्होंने विस्तार से बताया कि इसी व्यापक सोच के साथ भारत ने हाल ही में एआई इम्पैक्ट समिट की मेजबानी की थी। प्रधानमंत्री ने एआई के लिए भारत के ‘मानव’ विजन को रेखांकित किया, जो इस बात पर जोर देता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास समावेशिता, सुरक्षा और जनहित के मूल सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारत ने हमेशा साइबरस्पेस को एक वैश्विक सार्वजनिक संपत्ति के रूप में देखा है, प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक देशों के पास ऐसी एआई मॉडल तक पहुँच होनी चाहिए जो उनके महत्वपूर्ण सूचना बुनियादी ढांचे को सुरक्षित कर सकें और उन्हें साइबर खतरों से निपटने में मदद कर सकें। उन्होंने एआई विकास के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण का आह्वान किया, जिसमें सुरक्षा, गति और दक्षता पर एक साथ ध्यान दिया जाए। इस संबंध में, उन्होंने चार सुझाव दिए: एआई सिस्टम को ‘सेफ-बाय-डिजाइन’  होना चाहिए; एआई के इस्तेमाल के साथ-साथ सामान्य मानक, परीक्षण फ्रेमवर्क और नियामक दिशानिर्देश होने चाहिए; डीपफेक, गलत सूचना और साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए प्रभावी वैश्विक सहयोग होना चाहिए और एक समावेशी दुनिया सुनिश्चित करने के लिए एआई का लाभ ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों तक पहुँचना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उद्देश्य मानव क्षमता का विस्तार करना, मानवीय विकल्पों को सशक्त बनाना और मानव गरिमा की रक्षा करना होना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत इन उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए अपने सहयोगियों के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगा।

भारतीय औषध संहिता आयोग ने ब्राजील में विश्व औषध संहिताओं की 16वीं अंतर्राष्ट्रीय बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्यरत भारतीय औषध संहिता आयोग के एक प्रतिनिधिमंडल ने सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक, डॉ. वी. कलाइसेल्वन के नेतृत्व में, डॉ. पवन सैनी और डॉ. श्रुति रस्तोगी के साथ 15 से 17 जून के दौरान ब्राजील के ब्रासीलिया में आयोजित विश्व औषध संहिता की 16वीं अंतर्राष्ट्रीय बैठक और इससे संबंधित हितधारकों की बैठकों में हिस्सा लिया।


WHO के सहयोग से आयोजित इस बैठक में ब्राजीलियन फार्माकोपिया (ब्राजील), यूरोपीय फार्माकोपिया (यूरोप), भारतीय फार्माकोपिया (भारत), जापानी फार्माकोपिया (जापान), कोरियाई फार्माकोपिया (दक्षिण कोरिया), मैक्सिकन फार्माकोपिया (मेक्सिको), रूसी फार्माकोपिया (रूस), ब्रिटिश फार्माकोपिया (यूनाइटेड किंगडम), यूनाइटेड स्टेट्स फार्माकोपिया (संयुक्त राज्य अमेरिका), उज्बेकिस्तान गणराज्य की फार्माकोपिया (उज्बेकिस्तान), वियतनामी फार्माकोपिया (वियतनाम) और WHO की अंतर्राष्ट्रीय फार्माकोपिया सहित दुनिया भर की प्रमुख औषध संहिता आयोग के प्रतिनिधि एक मंच पर जुटे।


बैठक के दौरान, डॉ. कलाइसेल्वन ने भारतीय औषध संहिता पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने औषध संहिता मानकों में हालिया प्रगति, आधुनिकीकरण की पहल और औषधि गुणवत्ता मानकों के वैश्विक सामंजस्य में भारत के योगदान का उल्लेख किया। बैठक के दौरान हुई चर्चाओं से साबित हुआ कि भारतीय औषध संहिता के मानक अग्रणी अंतरराष्ट्रीय औषध संहिताओं के समकक्ष हैं। तपेदिक रोधी दवाओं, कैंसर रोधी दवाओं, रक्त और रक्त उत्पादों, एनीमिया में प्रयुक्त दवाओं और अन्य जटिल औषधीय अणुओं के लिए गुणवत्ता मानकों के विकास और स्थापना में भारत के नेतृत्व को भी सराहा गया। यह देश की बढ़ती वैज्ञानिक, नियामक और औषध संहिता संबंधी क्षमताओं को दर्शाता है।


भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने आधुनिक सूक्ष्मजीव विज्ञान तकनीकों, औषध संहिता के अभिसरण और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण चर्चा में सक्रिय भागीदारी निभाई। हितधारकों की बैठक के दौरान, डॉ. कलाइसेल्वन ने विज्ञान-आधारित मानकों और नियामक सहयोग के माध्यम से जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भारत की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता को सुनिश्चित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर भी चर्चा की। सम्मेलन में भारत की भागीदारी ने वैश्विक औषध संहिताओं के साथ सहयोग को और मजबूत किया। यह भी दर्शाया कि भारत अब दवाओं की वैश्विक गुणवत्ता मानकों को तय करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है, जिससे विश्वभर के रोगियों को लाभ मिल रहा है।

20 जून को प. बंगाल में पीएम-किसान की 23वीं किस्त जारी करेंगे प्रधानमंत्री मोदी

नई दिल्ली/ सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 जून को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले से देशभर के करोड़ों किसानों को बड़ा तोहफा देंगे। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना के तहत 23वीं किस्त जारी करते हुए वे 9.44 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में लगभग 18,880 करोड़ रुपये की राशि सीधे ट्रांसफर करेंगे।

इस संबंध में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जानकारी देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री का यह दौरा ‘विकसित भारत, विकसित पश्चिम बंगाल’ के संकल्प को नई गति देने वाला साबित होगा। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के दौरान कृषि, ग्रामीण विकास, मत्स्य पालन, पशुपालन और रेलवे से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का लोकार्पण, शिलान्यास और राष्ट्र को समर्पण किया जाएगा।

9.44 करोड़ किसानों के खातों में पहुंचेगी 18,880 करोड़ रुपये की राशि

श्री चौहान ने बताया कि पीएम-किसान की 23वीं किस्त के तहत देशभर के 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ मिलेगा। पश्चिम बंगाल में 45.35 लाख से अधिक किसानों के खातों में लगभग 907 करोड़ रुपये की राशि पहुंचेगी। इसके साथ ही राज्य में योजना के तहत वितरित कुल राशि 15,055 करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में योजना शुरू होने के बाद से अब तक देशभर में किसानों को 4.46 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि प्रदान की जा चुकी है।

फसल बीमा और डिजिटल एग्रीकल्चर को मिलेगा बढ़ावा

प्रधानमंत्री इस अवसर पर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (RWBCIS) का भी शुभारंभ करेंगे। लगभग 12,200 करोड़ रुपये लागत वाली इन योजनाओं के तहत वित्त वर्ष 2026-27 में 1.10 करोड़ किसानों को 30 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर बीमा सुरक्षा प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है।

इसके साथ ही डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के अंतर्गत एग्रीटेक प्लेटफॉर्म की शुरुआत भी की जाएगी। यह प्लेटफॉर्म उर्वरक वितरण, किसान क्रेडिट कार्ड, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) आधारित खरीद जैसी सेवाओं को एकीकृत डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराएगा।

प्राकृतिक खेती और धन-धान्य कृषि योजना का शुभारंभ

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन का भी शुभारंभ करेंगे। इसके तहत पश्चिम बंगाल में 17,300 हेक्टेयर क्षेत्र में 346 प्राकृतिक कृषि क्लस्टर स्थापित किए जाएंगे, जिनसे 43,250 किसानों को लाभ मिलेगा।

इसके अलावा प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की शुरुआत भी करेंगे। यह योजना पुरुलिया, दार्जिलिंग, अलीपुरद्वार और झाड़ग्राम जिलों में लागू होगी। योजना का उद्देश्य कृषि उत्पादकता बढ़ाना, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना तथा भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं को मजबूत बनाना है।

ग्रामीण विकास और सड़क संपर्क को मिलेगा बल

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY-III) के तहत 213 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली 49 सड़क परियोजनाओं का उद्घाटन किया जाएगा। 315 किलोमीटर से अधिक लंबी ये सड़कें ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेंगी और किसानों को अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाने में सुविधा मिलेगी।

मत्स्य और पशुपालन क्षेत्र को नई मजबूती

कार्यक्रम के दौरान दक्षिण 24 परगना जिले के फ्रेजरगंज में आधुनिकीकृत मत्स्य बंदरगाह और बीरभूम में आधुनिक मत्स्य बाजार का उद्घाटन किया जाएगा। वहीं नादिया जिले के हरिणघाटा में 6 करोड़ रुपये से अधिक लागत से स्थापित रीजनल सीमन प्रोडक्शन लैबोरेटरी और बकरी सीमन बैंक का भी उद्घाटन होगा।

यह पूर्वी भारत की अपनी तरह की पहली सुविधा होगी, जो वैज्ञानिक पशु प्रजनन और पशुधन उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

591 करोड़ रुपये की रेल परियोजनाओं की सौगात

प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल में लगभग 591 करोड़ रुपये लागत की विभिन्न रेल परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी करेंगे। इनमें हावड़ा में 300 बिस्तरों वाले नए मंडलीय रेलवे अस्पताल की आधारशिला, पूर्व मेदिनीपुर में रोड ओवर ब्रिज का निर्माण तथा सांकराइल-सांतरागाछी थर्ड लाइन परियोजना का राष्ट्र को समर्पण शामिल है।

इन परियोजनाओं से रेल यातायात अधिक सुरक्षित और सुगम होगा, जबकि औद्योगिक विकास, पर्यटन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को भी नई गति मिलेगी।

विकसित पश्चिम बंगाल की दिशा में बड़ा कदम

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की जाने वाली ये परियोजनाएं कृषि, ग्रामीण विकास, मत्स्य पालन, पशुपालन, स्वास्थ्य और परिवहन क्षेत्रों में व्यापक बदलाव लाने का आधार बनेंगी। उन्होंने विश्वास जताया कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी, युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और विकसित पश्चिम बंगाल तथा विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।

आगरा में 19 जून को पहला BRICS MSME फोरम और कार्य समूह की बैठक आयोजित होगी

भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय द्वारा 19 जून को आगरा में “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” की व्यापक थीम के अंतर्गत प्रथम ब्रिक्स MSME फोरम और तीसरी SME कार्य समूह की बैठक आयोजित की जाएगी।


पहले ब्रिक्स MSME फोरम की बैठक में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, यूएई, बेलारूस, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और भारत सहित ब्रिक्स सदस्य और ब्रिक्स सहयोगी देशों के नीति निर्माता, उद्योगपति, उद्यमी और अन्य प्रमुख हितधारक एक साथ आएंगे और वैश्विक MSME इकोसिस्‍टम को मजबूत करने, स्थिरता को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाने पर विचार-विमर्श करेंगे।


भारत का MSME क्षेत्र, जिसमें 86 लाख से अधिक उद्यम शामिल हैं, देश की आर्थिक वृद्धि और विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। यह क्षेत्र GDP में 31.1 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है, विनिर्माण उत्पादन में 35.4 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है और भारत के निर्यात में 48.58 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है, साथ ही पूरे देश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा करता है।


इस कार्यक्रम का शुभारंभ MSME की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करने वाली एक प्रदर्शनी के उद्घाटन के साथ होगा, जिसके बाद ब्रिक्स सदस्यों के तीसरे एसएमई कार्य समूह की बैठक “एमएसएमई इाकेसिस्‍टम का निर्माण – सतत जड़ों से वैश्विक मार्गों तक” विषय पर होगी।


इसके साथ ही, ब्रिक्स सदस्य देशों के निजी क्षेत्र के हितधारक ‘एमएसएमई के लिए प्रौद्योगिकी तक पहुंच’ और ‘स्थिरता उन्मुख एमएसएमई का विकास’ पर विचार-विमर्श करेंगे। इस फोरम में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे, जो सरल भविष्य के लिए तैयार MSME इाकोसिस्‍टम को बढ़ावा देने के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं, नीतिगत अनुभवों और सफल केस स्टडीज को साझा करेंगे।


ब्रिक्स एसएमई फोरम से ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने और एमएसएमई के विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने के लिए एक सहयोगात्मक वातावरण विकसित करने की उम्मीद है। यह फोरम सहभागी देशों को ज्ञान का आदान-प्रदान करने, उभरते अवसरों की पहचान करने और समावेशी एवं सतत आर्थिक विकास में योगदान देने वाली साझेदारियां बनाने का अवसर भी प्रदान करेगा।

उन्नत जलसंभर प्रबंधन पर राष्ट्रीय तकनीकी दिशा निर्देशों के लिए दूसरी राष्ट्रीय परामर्श बैठक आयोजित

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग के ज्ञान भागीदार, राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण ने विश्व बैंक समर्थित नवोन्मेषी विकास के माध्यम से कृषि लचीलेपन के लिए जलसंभरों का पुनरुद्धार कार्यक्रम के अंतर्गत उन्‍नत जलसंभर प्रबंधन के लिए मसौदा राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देश पर दूसरी राष्ट्रीय स्तर की परामर्श बैठक का आयोजन 17-18 जून को NASC कॉम्प्लेक्स नई दिल्ली में किया।
भूमि संसाधन विभाग के सचिव नरेंद्र भूषण और NRAA के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार के साथ-साथ DOLR और NRAA के अधिकारी मौजूद रहे।


मरुस्थलीकरण और सूखा निवारण के विश्व दिवस के अवसर पर नरेंद्र भूषण ने हमारी मिट्टी की रक्षा करने, खराब हो चुके भूदृश्यों को पुनर्स्थापित करने, हमारे वर्षा आधारित क्षेत्रों में सुधार करने और जलसंभर विकास के माध्यम से एक स्थायी भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से “मेरी मिट्टी, मेरा फर्ज” नामक एक लघु फिल्म का शुभारंभ किया ।


कृषि विभाग के सचिव ने जलसंभर प्रबंधन विज्ञान, सामुदायिक भागीदारी और प्रशासनिक सरलता पर आधारित होना चाहिए, जिसमें किसानों और स्थानीय जलसंभर संस्थानों पर विशेष ध्यान दिया जाए। उन्होंने दिशा-निर्देश तैयार करते समय वर्षा आधारित क्षेत्रों के विकास, कृषि उत्पादकता में सुधार, फसल सघनता बढ़ाने, जल सुरक्षा और भूजल पुनर्भरण को मजबूत करने, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करने और जलसंभर संपत्तियों की मरम्मत और रखरखाव सुनिश्चित करने के राष्ट्रीय लक्ष्यों को ध्यान में रखने की सलाह दी। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय विकास योजना में सुझाए गए उपाय लागू करने योग्य होने चाहिए।


कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने योजना बनाने के लिए उच्च रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजरी प्राप्त करने हेतु ड्रोन प्रौद्योगिकी के उपयोग, LRI और हाइड्रोलॉजी-लाइट दृष्टिकोणों को अपनाने, प्रभावी जलसंभर कार्यान्वयन के लिए राज्यों में संस्थागत तकनीकी सेवा प्रदाताओं, NGO की भागीदारी के माध्यम से जलसंभर संपत्तियों के परियोजना-पश्चात रखरखाव और स्थिरता के लिए तंत्रों का पता लगाने पर विचार-विमर्श करने का सुझाव दिया।


इस परामर्श का उद्देश्य राष्ट्रीय तकनीकी दिशा-निर्देशों के मसौदे पर विचार-विमर्श करना और देश भर में जलसंभर नियोजन, कार्यान्वयन, निगरानी और स्थिरता को मजबूत करने के लिए विशेषज्ञों के सुझावों को शामिल करना है। उम्मीद है कि ये विचार-विमर्श वर्षा आधारित क्षेत्रों में जलसंभर शासन में सुधार और जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

ग्रामीण विकास सचिव ने ग्रामीण सड़क संपर्क योजनाओं पर उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

सरकार ने PMGSY और संबंधित ग्रामीण संपर्क पहलों के अंतर्गत 26,474 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान 18,907 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा PMGSY और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क परियोजना के तहत राज्यवार भौतिक और वित्तीय प्रगति का आकलन करने के लिए आयोजित एक व्यापक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान इस इसकी जानकारी दी गई।


सचिव ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राज्यवार लक्ष्यों और कार्यान्वयन की स्थिति की समीक्षा की, जिसमें छूटे हुए क्षेत्रों में ग्रामीण संपर्क का पूर्ण लक्ष्‍य प्राप्त करने पर विशेष जोर दिया गया।


राज्यों को PMGSY-I और पीएम-जनमन के अंतर्गत शेष सभी असंबद्ध बस्तियों के निर्माण को शीघ्र पूरा करने का निर्देश दिया गया, जिसमें विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह बस्तियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। सचिव ने हर मौसम के अनुकूल सुगम सड़क संपर्क की आवश्यकता पर जोर देते हुए राज्यों से डीपीआर तैयार करने में तेजी लाने का आग्रह किया।


बैठक में RCPLWEA के तहत हुई प्रगति की भी विस्तृत समीक्षा की गई। सचिव ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में सड़क अवसंरचना के रणनीतिक महत्व को समझते हुए संबंधित राज्यों को कार्यान्वयन एजेंसियों के साथ घनिष्ठ समन्वय बनाए रखने और सभी स्वीकृत कार्यों को समय पर पूरा करने का निर्देश दिया।


राज्यों ने लक्षित कार्य योजनाएं प्रस्तुत कीं और मंत्रालय को आश्वासन दिया कि सभी लंबित कार्य और वार्षिक लक्ष्य निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरे कर लिए जाएंगे।
राज्यों से आग्रह किया गया कि वे जमीनी स्तर पर निरीक्षण को मजबूत करें, गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों को बढ़ाएं और परियोजना निष्पादन के दौरान मजबूत निगरानी सुनिश्चित करें।


बैठक में ई-मार्ग प्लेटफॉर्म के व्यापक उपयोग पर भी जोर दिया गया, जिससे रखरखाव गतिविधियों की निगरानी, प्रदर्शन मूल्यांकन और भुगतान ट्रैकिंग संभव हो सकेगी। प्लेटफॉर्म को व्यापक रूप से अपनाने से ग्रामीण सड़क रखरखाव में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता में सुधार होने की उम्मीद है।