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केंद्रीय मंत्री ने दिल्ली में उच्च स्तरीय बैठक लेकर की कृषि क्षेत्र की समीक्षा

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली स्थित कृषि भवन, में उच्चस्तरीय साप्ताहिक कृषि समीक्षा बैठक में खरीफ 2026 के लिए देशभर की तैयारियों की गहन समीक्षा की।

बैठक में अल नीनो की संभावित स्थिति पर चर्चा करते हुए कृषि मंत्री ने साफ निर्देश दिया कि जिन जिलों में कम बारिश की आशंका है, वहां पहले से पूरी तैयारी की जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे जिलों की पहचान कर राज्य सरकारों के साथ मिलकर फसलवार कंटिंजेंसी प्लान तैयार किए जाएं, ताकि किसी भी मौसमीय चुनौती की स्थिति में किसानों को तुरंत सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

शिवराज सिंह चौहान ने यह भी निर्देश दिए कि जिन 9–10 राज्यों में अल नीनो का प्रभाव अधिक पड़ सकता है, वहां के चिन्हित जिलों के जिला अधिकारियों, कृषि विभाग, केवीके और अन्य विस्तार तंत्र के साथ समन्वित बैठकें आयोजित की जाएं। उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाया जाए, ताकि हर किसान को यह पता रहे कि उसके क्षेत्र के लिए कौन-सी सावधानियां और कौन-से फसल विकल्प अधिक सुरक्षित हैं।

बैठक में खरीफ 2026 के लिए फसलवार लक्ष्य, बुवाई की प्रगति और राज्यवार तैयारियों की समीक्षा करते हुए कपास उत्पादन बढ़ाने पर विशेष चर्चा हुई। कृषि मंत्री ने वैज्ञानिक तरीकों, सही किस्मों के चयन, अंतरफसली खेती, मल्चिंग और नमी संरक्षण जैसे उपायों को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने पर जोर दिया, ताकि कपास की उत्पादकता और आय दोनों में सुधार हो।

समीक्षा के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता, बाजार में मंडी भाव, जलाशयों व जल भंडारण की स्थिति और राज्यवार स्टॉक की जानकारी भी प्रस्तुत की गई। कृषि मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर उर्वरक उपलब्धता है और जैसे-जैसे मानसून की रफ्तार बढ़ेगी, राज्यों और जिलों तक आपूर्ति को और चुस्त-दुरुस्त रखा जाएगा। इसके लिए उन्होंने अधिकारियों को निर्देश देने के साथ ही इस पर भी जोर दिया कि जहां कहीं भी सूक्ष्म स्तर पर कमी की आशंका दिखे, वहां अग्रिम रूप से आपूर्ति सुनिश्चित की जाए, ताकि किसान को किसी तरह की दिक्कत न हो।

केंद्रीय कृषि मंत्री चौहान ने कृषि विश्वविद्यालयों, आईसीएआर संस्थानों, केवीके और राज्यों के कृषि विभागों के बीच बेहतर समन्वय पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह समय पर खेत तक पहुंचे और किसान उसे आसानी से अपनाकर लाभ उठा सके। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि सतत संवाद, नियमित समीक्षा और जमीन से जुड़े फीडबैक के आधार पर ही खरीफ 2026 को सफल और सुरक्षित बनाया जा सकता है।

फ्रांस में G-7 सम्मेलन की शुरुआत, इस बार इन खास मुद्दों पर होगी विशेष चर्चा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

फ्रांस में सोमवार (15 जून) से शुरू हो रही ग्रुप ऑफ सेवेन (जी-7) की बैठक इस बार काफी दिलचस्प होने वाली है। दरअसल, यह सम्मेलन उस समय हो रहा है, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने पर हाल ही में समझौता करने पर सहमति बनी है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस पूरे सम्मेलन में छाए रहने की उम्मीद है। दूसरी तरफ जी-7 देश अब रूस-यूक्रेन संघर्ष और इस समूह के ही एक सदस्य अमेरिका की टैरिफ और कूटनीति को लेकर भी चर्चाएं कर सकते हैं। 

इस बार जी-7 की अध्यक्षता फ्रांस के पास है। बीते साल जब यह सम्मेलन हुआ था, तब इसकी अध्यक्षता कनाडा के पास थी। इसी तरह फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका भी रोटेशन प्रणाली के तहत जी-7 की अध्यक्षता और इसकी मेजबानी कर चुके हैं। दूसरी तरफ भारत बीते कुछ वर्षों में जी-7 का सदस्य न होने के बावजूद इसके लिए मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया जाता रहा है। 


क्या है जी-7 सम्मेलन, इसका क्या इतिहास?

जी7 के गठन की कहानी भी काफी दिलचस्प है। दरअसल, 1970 का दौर, वह समय था, जब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था तेल के बढ़ते दामों की वजह से मुश्किल में थी। खासकर तेल पैदा करने वाले देशों के संगठन- ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) यानी पेट्रोल निर्यातक देशों के संगठन की मनमानी की वजह से। 

1975
ओपेक की तरफ से तेल के निर्यात पर लगी पाबंदियों का असर ऐसा हुआ कि तब अमेरिका के वित्त मंत्री जॉर्ज शुल्ज ने एक बैठक बुला ली। पहली बैठक में छह देश इकट्ठा हुए और आर्थिक संकटों से निपटने पर चर्चा की। फैसला हुआ कि एक साल बाद यह देश फिर मिलेंगे और उठाए गए कदमों की समीक्षा करेंगे। 

1976
एक साल बाद जब यह बैठक फिर हुई तो कनाडा को भी इसका हिस्सा बना लिया गया। इस तरह जी7 अस्तित्व में आया।  

1977
यूरोपीय आयोग (ईसी) के अध्यक्ष को भी जी7 की बैठकों के लिए आमंत्रित कर दिया गया। सामूहिक तौर पर यूरोप जी7 का हिस्सा नहीं बना।

1997
रूस को इस समूह में शामिल किया गया था। इसके बाद यह जी-8 बन गया। हालांकि, 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद रूस को समूह से निलंबित कर दिया गया और यह वापस जी-7 बन गया

इस बार क्या है जी-7 का एजेंडा?

इस बार फ्रांस के इवियन-लेस-बैंस में हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा कई गंभीर वैश्विक राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक चुनौतियों पर केंद्रित है। इनमें सबसे प्रमुख यूक्रेन युद्ध और दुनियाभर में अमेरिका की वजह से फैला व्यापारिक असंतुलन है। 

1. यूक्रेन का युद्ध
जी-7 देश यूक्रेन के प्रति अपनी एकजुटता और समर्थन दिखाना चाहते हैं, क्योंकि रूस और यूक्रेन का युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की इस चर्चा के लिए सम्मेलन में मौजूद रहेंगे, जिन्होंने युद्ध खत्म करने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ आमने-सामने की बातचीत का प्रस्ताव रखा है। यूरोपीय नेता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह समझाने का प्रयास करेंगे कि वे पुतिन के साथ सार्थक बातचीत के लिए एक साझा और मजबूत दृष्टिकोण अपनाएं।

2. ईरान के साथ शांति समझौता
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के लिए जिस समझौते की रूपरेखा तैयार हुई है, उस पर इस सम्मेलन में प्रमुखता से चर्चा होगी। जी-7 नेता इस समझौते का विस्तृत विवरण जानना चाहते हैं, खासकर यह कि वैश्विक व्यापार के लिए अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को शिपिंग ट्रैफिक के लिए कितनी जल्दी खोला जा सकता है। 

3. वैश्विक आर्थिक असंतुलन और व्यापार
चर्चा का एक और बड़ा विषय चीन के साथ-साथ अमेरिका की व्यापार नीतियां और वैश्विक आर्थिक असंतुलन है। फ्रांस ने इस असंतुलन को स्पष्ट करते हुए कहा है कि चीन बहुत अधिक उत्पादन करता है, अमेरिका बहुत अधिक उपभोग करता है और यूरोप बहुत कम निवेश करता है। इसके अलावा, सम्मेलन में चीन के रिकॉर्ड व्यापार मुनाफे और रोजमर्रा के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) के बाजार पर चीन के दबदबे को लेकर चिंताएं उठाई जाएंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ से जुड़े व्यापारिक तनावों पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। 

4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
तेजी से बढ़ती एआई तकनीक से जुड़े अवसरों और संभावित खतरों पर चर्चा करने के लिए फ्रांस ने ओपनएआई, गूगल, एंथ्रोपिक और मिस्ट्रल एआई जैसी प्रमुख कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी आमंत्रित किया है। इसके अंतर्गत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे अहम विषयों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

5. विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ
जी-7 नेता कई उभरते बाजारों और विकासशील देशों पर बढ़ रहे भारी कर्ज के बोझ से निपटने के लिए अपना संकल्प जाहिर करेंगे, हालांकि इसके ठोस कदम क्या होंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

फ्रांस में होने वाले जी-7 सम्मेलन में कौन-कौन ले रहा हिस्सा?

फ्रांस के इवियन-लेस-बैंस में आयोजित हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन में मुख्य सदस्य देशों के अलावा कई अतिथि देशों के नेताओं और तकनीकी दिग्गजों को भी आमंत्रित किया गया है।

जी-7 का हिस्सा देश
सम्मेलन में जी-7 के सातों मुख्य सदस्य देश और इनके प्रमुख शामिल होंगे। इनमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मेजबान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी और जापान की प्रधानमंत्री सनाई तकाइची हिस्सा लेंगी। इनके साथ ही, यूरोपीय संघ (ईयू) भी हमेशा की तरह इस सम्मेलन में अपना प्रतिनिधित्व करेगा।

आमंत्रित देश
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कई गैर-जी7 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अतिथि के रूप में विशेष निमंत्रण दिया है। जिन प्रमुख नेताओं ने सम्मेलन में हिस्सा लेने की पुष्टि की है, उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल-सीसी, कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी।

इनके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, केन्या और दक्षिण कोरिया के नेता भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को भी निमंत्रण दिया गया है, लेकिन उनके शामिल होने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

एआई और टेक कंपनियों के अधिकारी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीकों, उसके खतरों और अवसरों पर चर्चा करने के लिए दुनिया की प्रमुख टेक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। इनमें ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो एमोडाई के साथ-साथ गूगल और मिस्ट्रल एआई के प्रतिनिधि शामिल हैं।

जी-7 के किस नेता से डोनाल्ड ट्रंप का कब और क्या विवाद हुआ है? 

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर: ईरान पर अमेरिकी सैन्य हमलों में ब्रिटिश बेस के इस्तेमाल की अनुमति न देने और युद्ध में मदद न करने पर ट्रंप ने स्टार्मर की कड़ी आलोचना की। उन्होंने स्टार्मर की तुलना विंस्टन चर्चिल से करते हुए कहा, “हम विंस्टन चर्चिल से नहीं निपट रहे हैं।” ट्रंप ने सोशल मीडिया पर यह भी ताना मारा कि “हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हमारे युद्ध जीतने के बाद उसमें शामिल होते हैं।”

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी: ट्रंप कनाडा के साथ व्यापार असंतुलन से नाराज रहते हैं और अक्सर कार्नी को गवर्नर कहकर बुलाते हैं। दावोस विश्व आर्थिक मंच में कार्नी की एक परोक्ष टिप्पणी के जवाब में ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “कनाडा अमेरिका की वजह से ही जिंदा है। अगली बार बयान देते समय इसे याद रखना, मार्क।” इतना ही नहीं, पिछले साल जब कनाडा ने जी-7 का आयोजन किया था, तब भी ट्रंप कुछ कारणों से जी-7 की बैठक को बीच में ही छोड़कर अमेरिका लौट गए थे।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों: अप्रैल में व्हाइट हाउस में ईस्टर लंच के दौरान, ट्रंप ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की मदद न करने पर फ्रांस की आलोचना की और मैक्रों के वैवाहिक जीवन का मजाक उड़ाया। उन्होंने वियतनाम के एक वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि मैक्रों की पत्नी ब्रिजिट उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव करती हैं। इसे लेकर बाद में मैक्रों ने पलटवार किया था और ट्रंप के बयान को अनुचित करार दिया। इसके अलावा, ट्रंप अक्सर व्यापार वार्ता को लेकर मैक्रों के लहजे की मजाकिया नकल भी उतारते हैं।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी: बीते साल अक्तूबर में ट्रंप ने मेलोनी की खूब तारीफ की थी, लेकिन ईरान के खिलाफ युद्ध में इटली के मदद करने से इनकार करने और पोप लियो XIV के साथ ट्रंप के विवाद पर मेलोनी ने ट्रंप को फटकार लगाई थी। इसके बाद से ही दोनों नेताओं के बीच विवाद पैदा हो गया। ट्रंप ने इटली के एक अखबार से कहा था, “क्या लोग उसे (मेलोनी को) पसंद करते हैं? मुझे विश्वास नहीं होता… मुझे लगा था कि उसमें साहस है, लेकिन मैं गलत था।”

जापान की प्रधानमंत्री सनाई ताकाइची: ताकाइची की पहली व्हाइट हाउस यात्रा के दौरान (अक्तूबर के बाद), जब एक जापानी पत्रकार ने ईरान पर अचानक हमले को लेकर सवाल पूछा, तो ट्रंप ने जापान को असहज करते हुए पर्ल हार्बर का अप्रत्याशित हवाला दिया। ट्रंप ने कहा, “जापान से बेहतर सरप्राइज के बारे में कौन जानता है? आपने मुझे पर्ल हार्बर के बारे में क्यों नहीं बताया?।” बता दें कि पर्ल हार्बर द्वितीय विश्व युद्ध के समय की घटना थी, जिसमें जापान ने अमेरिका पर हमला किया था। इसके बाद अमेरिका ने पलटवार करते हुए जापान पर दो परमाणु बम गिरा दिए थे। 

जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज: अप्रैल में मर्ज ने ईरान युद्ध में अमेरिका की रणनीति की आलोचना करते हुए कहा था कि अमेरिका अपमानित हो रहा है। इस पर ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पलटवार करते हुए कहा कि मर्ज को अपने देश की आव्रजन  और ऊर्जा समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। इस विवाद के कुछ दिनों बाद ही अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5,000 सैनिकों को वापस बुलाने का ऐलान कर दिया। डी-डे (द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना की विजयी का दिन) की सालगिरह से पहले भी दोनों के बीच एक असहज स्थिति तब बन गई थी, जब ट्रंप ने मर्ज से कहा था कि वह ऐतिहासिक दिन जर्मनी के लिए सुखद नहीं था।

एफटीए विकसित भारत के लिए नई व्यापार संरचना का निर्माण कर रहे हैं

दिल्ली / सत्ता संदेश

‘विकसित भारत’ का विज़न हासिल करने के लिए अगले दो दशकों तक आर्थिक विकास की उच्च दर बनाए रखना ज़रूरी है। भारत का विशाल घरेलू बाजार इस विकास के लिए एक महत्वपूर्ण इंजन है, लेकिन केवल इसी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वैश्विक प्रतिस्पर्धी पैमाने और वास्तविक तकनीकी परिवर्तन हासिल करने के लिए, भारत मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के नेटवर्क के माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ मजबूती से एकीकृत हो रहा है। जहां डब्ल्यूटीओ समझौते नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली के लिए आधारशिला प्रदान करते हैं, वहीं एफटीए इच्छुक साझेदारों को डब्ल्यूटीओ आधारशिला पर आगे बढ़ाते हुए रुचि के अन्य क्षेत्रों में अधिक गहराई से एकीकरण करने में सक्षम बनाते हैं। आर्थिक एकीकरण और साझेदार देशों के अनुसार नियम बनाने के महत्वपूर्ण चालक के रूप में वर्तमान में लागू 384 अधिसूचित एफटीए अपनी उपयोगिता रेखांकित करते हैं। ये एफटीए महत्वपूर्ण बाजार तक पहुंच बनाने और भारतीय व्यवसायों को वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के अनिश्चित हालात से बचाने के लिए संस्थागत रूपरेखा (ब्लूप्रिंट) हैं।

वैश्विक आर्थिक अवसरों तक पहुंच भी उन भारतीय व्यवसायों के लिए जरूरी है, जो बड़े पैमाने पर काम करके वैश्विक चैम्पियन के तौर पर उभरना चाहते हैं। लेकिन फायदा केवल बड़े व्यवसायों तक सीमित नहीं है; एफटीए स्टार्ट-अप, एमएसएमई, किसानों, मछुआरों और भारतीय प्रतिभा के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर के द्वार खोलते हैं, जो अपनी क्षमताओं का विश्व स्तर पर लाभ उठाना चाहते हैं। ये बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ टैरिफ, सेवा बाजार तक पहुंच और पारदर्शी व्यापार नियमों को शामिल करती हैं, जिससे भारतीय व्यवसायों को लंबी अवधि के निवेश के लिए भरोसेमंद वातावरण मिलता है।

भारत की व्यापार बातचीत की रणनीति काफी विकसित हो चुकी है, और इसका ध्यान उन पूरक अर्थव्यवस्थाओं पर है, जो वस्तु और सेवाओं के लिए मुख्य निर्यात बाजार के रूप में काम करती हैं। हाल के मुक्त व्यापार समझौतों का एक मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे महत्वपूर्ण बाजारों में समान अवसर प्राप्त हों। यह समानता विशेष रूप से वस्त्र, परिधान और जूते जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों के लिए जरूरी है, जहां ऐतिहासिक रूप से भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगता रहा है, जबकि प्रतिस्पर्धियों को शुल्क मुक्त पहुँच मिलती है। कनाडा, इज़राइल और ईएईयू और एमईआरसीओएसयूआर जैसे समूहों के साथ भी भारत व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है।

सेवाएँ भारत की निर्यात रणनीति और इसके एफटीए वार्ताओं के केंद्र में हैं। सीमापार डिजिटल डिलीवरी पर पक्के वादे करके, हाल के एफटीए, तेजी से बढ़ते वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) इकोसिस्टम, तकनीकी स्टार्टअप्स और डिजिटल नवोन्मेषियों के बीच निवेशकों के भरोसे को बढ़ाने में मदद करते हैं।

डिजिटल डिलीवरी सेवाओं के अलावा, एफटीए ने भारत को वार्ताओं में नए तरीके अपनाने का मौका दिया है, जिससे ऐसी बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ हासिल हुई हैं, जो भारतीय प्रतिभा, खासकर युवाओं के आवागमन को बढ़ाती हैं। मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं – छात्र और पेशेवरों के लिए आवागमन प्रावधान और साइड-लेटर, भारत-यूके दोहरा योगदान समझौता (डीसीसी) जैसे फ्रेमवर्क, जो अस्थायी कार्य के लिए दोहरी सामाजिक सुरक्षा कराधान को रोकते हैं, और योग जैसे खास क्षेत्रों में आवागमन अधिकार।

भारत के नई पीढ़ी के एफटीए की एक विशेषता व्यापार और निवेश के बीच गहरे संबंध को मान्यता देना है। प्रमुख वैश्विक बाजारों तक पहुंच प्रदान करके और प्रमुख निर्माण सामग्री के आयात को आसान बनाकर, यह नेटवर्क बढ़ती मांग के साथ मिलकर भारत को निर्माण और निवेश के लिए बेहद आकर्षक गंतव्य बनाता है। 

हाल के समझौते और आगे बढ़ते हुए बाजार तक पहुंच को निवेश परिणामों से सीधे जोड़ते हैं। इसका प्रमुख उदाहरण है, भारत-ईएफटीए समझौता, जिसमें यह शर्त रखी गयी है कि ईएफटीए देशों को भारतीय बाजार तक पहुंच तभी मिलेगी, जब वे 100 बिलियन डॉलर के एफडीआई का वादा करेंगे और भारत में दस लाख नौकरियां पैदा करेंगे। भारत-न्यूजीलैंड एफटीए में भी ऐसे ही प्रावधान हैं, जिनके तहत लंबे समय के निवेश के वादे के बदले भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार तक पहुंच की सुविधा दी गयी है।

आधुनिक व्यापार अब केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है; इसके लिए 21वीं सदी के आयामों को समझना और नियमों पर ध्यान देना जरूरी है, जैसे व्यापार में तकनीकी बाधाएं (टीबीटी), स्वच्छता और पादप-स्वच्छता से जुड़े उपाय (एसपीएस), और व्यापार सुगमता (टीएफ)। भारत के अगली पीढ़ी के एफटीए इन रूपरेखाओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।

अक्सर, टैरिफ़ की तुलना में उत्पाद मानक और अन्य नियामक आवश्यकताएँ बाजार तक पहुँचने में ज़्यादा बड़ी रुकावटें पैदा करती हैं। भारत के एफटीए में नियामक समन्वय और सहयोग के प्रावधान भारतीय निर्यातकों के संदर्भ में इन बाधाओं को कम करने के लिए व्यवस्थित व संस्थागत तरीके प्रदान करते हैं। 

पर्यावरण और श्रम मानक व्यापार में संभावित बाधाओं के रूप में उभर रहे हैं और इनके लिए उपाय न करना अब कोई विकल्प नहीं है। भारत के नए एफटीए इन चिंताओं को दूर करने के लिए ऐसी सहयोगात्मक व्यवस्था पेश करते हैं, जिससे भारतीय हितों को नुकसान न पहुंचे। ये वैश्विक साझेदारों को भरोसा दिलाते हैं कि भारत मानकों के मामले में “सबसे निचले स्तर पर पहुँचने की होड़” से बचते हुए, वास्तविक नवाचार और बड़े पैमाने पर काम करके प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल करना चाहता है।

भारत की एफटीए नीति टुकड़ों में नहीं है, या देश-दर-देश नहीं है। यह जानबूझकर ऐसी पूरक अर्थव्यवस्थाओं को लक्षित करती है, जिनकी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में दो-तिहाई और वैश्विक आयात मांग में 75%  की हिस्सेदारी है।

सबसे जरूरी बात यह है कि इन एफटीए पर बातचीत हितधारकों की निरंतर भागीदारी और संपूर्ण सरकार दृष्टि  पर निर्भर करती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि व्यापार नीति भारत के औद्योगिक विकास, नवाचार और सामाजिक-आर्थिक प्रगति जैसी व्यापक प्राथमिकताओं के अनुरूप है और समझौते इस तरह से बनाए जाएँ कि संवेदनशील क्षेत्र और आबादी सुरक्षित रहें।

खास तौर पर, एफटीए में ऐसे मज़बूत प्रावधान शामिल किये जाते हैं, जिनसे यह सुनिश्चित होता है कि भारतीय बाजार को खोलने से घरेलू हितधारकों को नुकसान नहीं होगा। संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में उदारीकरण लंबे समय में धीरे-धीरे किया जाता है, ताकि स्थानीय उद्योगों को तालमेल बिठाने का समय मिल सके। कृषि जैसे कई प्रमुख क्षेत्रों को एमएसएमई और किसानों की सुरक्षा के लिए बाहर रखा गया है, साथ ही अचानक आयात बढ़ने की स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय भी मौजूद हैं।

अंतिम लक्ष्य एक सुदृढ़ और तालमेल व नियम-आधारित व्यापार इकोसिस्टम है, जिसमें भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा शामिल हो। जमीनी स्तर पर निवेश करने और मूल्य-श्रंखला लिंक बनाने के जरिए, रणनीतिक एफटीए भारतीय व्यवसायों को उस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने की स्वतंत्रता देंगे, जो वास्तव में मायने रखती है: नीतिगत अनिश्चितता और नियामक बाधाओं की परेशानी से मुक्त होकर विस्तार करना, नवाचार करना और विपणन करना।

(लेखक वाणिज्य मंत्रालय के सचिव हैं।)    

स्वस्थ भारत, सशक्त भारत- स्वास्थ्य देखभाल विकास के 12 वर्ष

दिल्ली / सत्ता संदेश

बेहतर स्वास्थ्य प्रणाली से आर्थिक उत्पादकता बढ़ती है, कार्यबल की संख्या में बढ़ोतरी होती है और विकास दीर्घावधि तक होता है। इसलिए, अच्छी सेहत न केवल समाज के लिए अच्छा संकेत है, बल्कि यह देश की एक संपत्ति भी है। यह वह आधार है, जिस पर मानवीय क्षमता का निर्माण होता है और देश की ताकत मापी जाती है। इसलिए, बेहतर सेहत न केवल समाज के लिए अच्छा है, बल्कि यह देश की एक संपत्ति है और इसमें लगाया गया हर रुपया देश के लोगों में किया गया निवेश है।

इस तरह, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) , यानी यह सुनिश्चित करना कि सभी लोग, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, बिना किसी आर्थिक परेशानी के, जब और जहाँ ज़रूरत हो, अच्छी गुणवत्ता की सभी ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएं हासिल कर सकें। यह न केवल 2030 तक हासिल किया जाने वाला सतत् विकास का लक्ष्य है, बल्कि सेहत से जुड़ी एक प्राथमिकता भी है।

भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (एनएचपी 2017), सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) और एसडीजी 3 को हासिल करने के लक्ष्य के अनुरूप है और यह एक सरल लेकिन मज़बूत सोच पर आधारित है – स्वास्थ्य सेवाओं तक हर व्यक्ति की पहुँच होनी चाहिए। इसके चार स्तंभ, किफायती होना, पहुँच, गुणवत्ता और उपलब्धता , उस सोच को वास्तिवकता में बदलते हैं और जीवन के सभी चरणों में देखभाल की एक व्यापक व्यवस्था को मज़बूत करते हैं। लक्ष्यों के अनुरूप, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन राज्यों को स्वास्थ्य प्रणाली का एक एकीकृत तीन-स्तरीय मॉडल प्रदान करने में मदद करता है, जिसमें ग्रामीण और शहरी इलाकों (कमज़ोर वर्गों सहित) के बीच दोतरफा रेफरल लिंक शामिल हैं।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) प्राथमिक स्तर पर बीमारी से बचाव, सेहत को बढ़ावा देने, इलाज, पुर्नवास और प्रशामक देखभाल जैसी व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ देते हैं। ईसंजीवनी टेलीमेडिसिन प्लेटफ़ॉर्म इन एएएम के ज़रिए समुदाय को विशेषज्ञों से जोड़कर विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है। साथ ही, एक खास टेली-मानस प्लेटफ़ॉर्म भी है, जिसने अब तक कुल 38.93 लाख लोगों तक पहुँच बनाई है।

एएएम से जुड़े द्वितीय स्तर के केंद्र जैसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी)/प्रथम रेफरल इकाई (एफआरयू) और ज़िला अस्पताल (डीएच) होते हैं, जो विशेषज्ञ के समक्ष इलाज और अस्पताल में भर्ती होने की सुविधा के लिए रेफरल का पहला ज़रिया होते हैं। वहीं, मेडिकल कॉलेज जैसे तृतीयक संस्थान सबसे ऊपर होते हैं और ज़्यादा जटिल व सुपर-स्पेशलिस्ट सेवाओं की ज़रूरतें पूरी करते हैं।

इस तीन-स्तरीय प्रणाली को सरकारी स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी का समर्थन प्राप्त है। पिछले दशक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर होने वाला खर्च 168% बढ़ गया है, जो स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानने के सरकार के संकल्प को दर्शाता है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर का सफ़र व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के विस्तार और प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही से समस्या होने से पहले ही ध्यान रखने वाली देखभाल की ओर ज़रूरी बदलाव को दिखाता है। व्यापक स्वास्थ्य पैकेजों की संख्या 6 से बढ़ाकर 12 करना, भारत की बदलती आबादी और बीमारियों के बदलते पैटर्न के हिसाब से उठाया गया एक ज़रूरी कदम है। बढ़ती उम्र की आबादी और गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते मामलों की दोहरी चुनौतियों का सामना करते हुए, इसके दायरे में गैर-संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य, बुजुर्गों की देखभाल, आपातकालीन सेवाएँ, आँख, कान-नाक-गला (ईएनटी) और मुँह की सेहत के साथ-साथ योग और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली गतिविधियाँ शामिल हैं। यह सब उस आबादी की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जो भारत अब बन रहा है।

मई 2026 तक, देश भर में 1.8 लाख से ज़्यादा एएएम काम कर रहे हैं, ताकि लोगों को उनके घर के पास स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें। इस विस्तार का असर एएएम में 120 करोड़ से ज़्यादा ओपीडी परामर्श, 70 करोड़ से ज़्यादा ईसंजीवनी टेली-परामर्श और अच्छी सेहत व कल्याण को बढ़ावा देने वाले 46.1 करोड़ से ज़्यादा वेलनेस सत्रों में साफ़ दिखता है।

प्राथमिक देखभाल स्तर पर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और आम कैंसर (जैसे ओरल, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर) के लिए आबादी-आधारित स्क्रीनिंग 30 साल से ज़्यादा उम्र के सभी वयस्कों के लिए की जाती है, जिससे बीमारी का जल्दी पता लगाना एक सामान्य प्रक्रिया बन जाती है। यह जांच ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ के तहत सेवा वितरण का एक अहम हिस्सा है, जो एनसीडी की रोकथाम को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में शामिल करती है। एनसीडी सेवाओं का विस्तार बीमारी का जल्दी पता लगाने, रोकथाम, प्रबंधन और इलाज के लिए एक बहु स्तरीय प्रयास है। समर्पित एनसीडी क्लीनिक, डे-केयर कैंसर केंद्र , तृतीयक देखभाल कैंसर केंद्र और राज्य कैंसर संस्थान, उन्नत ऑन्कोलॉजी सेवाओं को विकेंद्रीकृत करते हैं और विशेषज्ञ देखभाल को मरीज़ के करीब लाते हैं।

साथ ही, बचाव से जुड़ी गतिविधियों के लिए ‘होल-ऑफ-गवर्नमेंट’ दृष्टिकोण अपनाया जाता है। एफएसएसएआई स्वस्थ खान-पान की आदतों को बढ़ावा देता है, ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है और आयुष मंत्रालय योग और कल्याण को आगे बढ़ाता है। लगातार चलने वाले जन-जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य दिवस मनाने जैसे कार्यक्रम इन प्रयासों को और मज़बूत करते हैं। खाने के तेल की खपत को 10% कम करने की प्रधानमंत्री मोदी की निजी अपील एक सरल लेकिन दमदार सोच को ज़ाहिर करती है कि एनसीडी के ख़िलाफ़ लड़ाई अस्पतालों के साथ-साथ घरों में भी जीती जाती है।

प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के विस्तार के लिए, एएएम स्तर पर ‘सामुदायिक स्वास्थ्य ऑफिसर्स’ का एक नया कैडर शुरू किया गया, जिससे क्लिनिकल और जन स्वास्थ्य से जुड़ी विशेषज्ञता समुदायों के और करीब आ गई। यह विस्तार लोगों के घर-द्वार तक भी पहुँचा, जहाँ फ्रंटलाइन नेटवर्क बढ़कर 10 लाख से ज़्यादा आशा (आशा) कार्यकर्ताओं तक पहुँच गया, जिन्होंने समुदाय को स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ा।

विस्तार के साथ-साथ, भारत ने देखभाल के मापदंडों को बदलने की ज़्यादा मुश्किल चुनौती भी स्वीकार की। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक, जो देश में ही विकसित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणीकृत हैं, ने गुणवत्ता को सिर्फ़ एक इच्छा से बदलकर एक जवाबदेही बना दिया। 65,000 से ज़्यादा जन स्वास्थ्य केंद्र, जिनमें 54,926 आयुष्मान आरोग्य मंदिर शामिल हैं, अब एनक्यूएएस द्वारा प्रमाणीकृत हैं। इसके अलावा, आईपीएचएल के लिए लैब मानकों ने व्यवस्था में और मज़बूती और सटीकता लाई है।

एनक्यूएएस की सफलता का राज़ सिर्फ़ मानदंड नहीं, बल्कि उसके आस-पास बनी व्यवस्था था, जैसे माँ और नवजात शिशु की देखभाल के लिए ‘लक्ष्य’, साफ़-सफ़ाई और संक्रमण नियंत्रण के लिए ‘कायाकल्प’ और बच्चों की सेहत के लिए ‘मुस्कान’। इन सभी ने मिलकर गुणवत्ता को सिर्फ़ एक मानक के बजाय एक आधारभूत स्तर बना दिया है। नतीजा यह है कि अब ऐसी व्यवस्था तैयार हुई है, जिसमें न सिर्फ़ ज़्यादा लोगों का इलाज होता है, बल्कि बेहतर इलाज भी किया जाता है।

अगर प्राथमिक देखभाल व्यवस्था का पहला वादा है, तो राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन और ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम जैसे खास कार्यक्रम देश भर में ओओपीई को कम करने के सरकार के संकल्प को और दिखाते हैं। इससे उन परिवारों की कुल मिलाकर 10,102 करोड़ रुपये से ज़्यादा की बचत हुई है, जिन्हें वरना यह बोझ अकेले उठाना पड़ता।

लोगों की सेहत की ज़िम्मेदारी लोगों को ही सौंपते हुए, भारत ने अपने सामुदायिक मंचों को मज़बूत किया है। यह एक सोच-समझकर बनाया गया, विकेंद्रीकृत ढांचा है, जो योजनाकृत, निगरानी और जवाबदेही को स्थानीय लोगों के हाथों में सौंपता है। विलेज हेल्थ, सैनिटेशन एंड न्यूट्रिशन कमिटीज़ (वीएचएसएनसी), जन आरोग्य समितियां (जेएएस) और रोगी कल्याण समितियां (आरकेएस) ने पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय भागीदार बनाया है। शहरी इलाकों में, महिला आरोग्य समितियां (एमएएस) पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसेमंद प्रतिक्रिया के लिए समुदाय की आवाज़ को अहमियत देते हुए, महिलाओं को सामुदायिक आउटरीच के केंद्र में रखकर इस फ़ोकस को और गहरा करती हैं।

वास्तविक स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ है आज के खतरों के साथ-साथ कल के खतरों के लिए भी तैयार रहना। 2021 में 64,180 करोड़ रुपये के बजट के साथ शुरू की गई पीएम-एबीएचआईएम योजना सीधे तौर पर कोविड-19 से मिले सबक पर आधारित है, जैसे कि अचानक बढ़ने वाली ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता बनाना, लेबोरेटरी नेटवर्क को मज़बूत करना, बीमारियों की वास्तविक समय में निगरानी का दायरा बढ़ाना और ‘वन हेल्थ’ शोध ढ़ांचा विकसित करना। असल में, यह मुश्किल समय से मिले सबक को एक मज़बूत जन स्वास्थ्य प्रणाली में बदलने का काम है।

जब बीमारी के लिए अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत पड़ती है, तो आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई आर्थिक मदद प्रदान करता है, जिससे इलाज का खर्च परिवार के लिए भारी बोझ नहीं बनता। दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना होने के नाते, यह हर परिवार को हर साल द्वितीय और तृतीयक देखभाल के लिए 5 लाख रुपये तक की सुविधा देती है। यह सुरक्षा 2024 में 70 साल से ज़्यादा उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को भी दी गई, चाहे उनकी आय कुछ भी हो।

इन सभी पहलों के पीछे एक डिजिटल आधार है, जिसके बिना इतने बड़े पैमाने पर व्यवस्था काम नहीं कर सकती। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत आभा आईडी, अंतर सचालित स्वास्थ्य जानकारी और यूनिफाइड हेल्थ इंटरफेस ने रिकॉर्ड को पोर्टेबल, पहुंच को आसान और सेवाओं के वितरण को और बेहतर बना दिया है। भारत की डिजिटल स्वास्थ्य प्रणाली की ओर बढ़ने के साथ ही अब तक लगभग 91 करोड़ आभा आईडी बनाई जा चुकी हैं।

कुल मिलाकर, मुफ्त सेवाएं, सामुदायिक स्तर पर निदान, अग्रिम पंक्ति के विशेषज्ञ, रेफरल परिवहन, डायलिसिस, अस्पताल में भर्ती होने का खर्च और एक डिजिटल आधार, केवल योजनाओं का संग्रह नहीं हैं, बल्कि ये एक प्रणाली का निर्माण करते हैं। लिहाज़ा ये स्वास्थ्य संबंधी लाभ आकस्मिक नहीं हैं। ये सतत्, कई स्तरों पर किए गए सार्वजनिक निवेश का कारगर परिणाम हैं।

ये नतीजे अब अमूर्त नहीं हैं, वे भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। मातृ मृत्यु दर 2004-06 में प्रति लाख जीवित जन्मों पर 254 से घटकर 2022-24 में 87 हो गई है, जो एनएचपी 2017 के लक्ष्यों को पूरा करती है। 1990 से 2024 तक, भारत ने एमएमआर में 84% की कमी की है, जो वैश्विक स्तर पर 48% की गिरावट से लगभग दोगुनी है और इसी वजह से मातृ स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में नेतृत्व के लिए यूएनएफपीए की मान्यता प्राप्त की है। व्यापक तस्वीर भी यही कहानी बयां करती है: नवीनतम एनएफएचएस के अनुसार, प्रजनन दर 2.0 तक पहुंच गई है, संस्थागत प्रसव 90.6% तक बढ़ गए हैं और पूर्ण टीकाकरण अब 98.6% है। ये एक ऐसी प्रणाली के संकेत हैं, जो रोकथाम, पहचान और प्रतिक्रिया करना सीख रही है। यही कारण है कि भारत की उन्मूलन उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं: 2015 में मातृ एवं नवजात टेटनस और 2024 तक ट्रेकोमा का सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में उन्मूलन। ऐसा करने वाला भारत दक्षिण-पूर्व एशिया का तीसरा देश बन गया है।

यह व्यापक सबक है। एनएचपी 2017 ने दिशा निर्धारित की, एनएचएम ने उप-स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर तृतीयक अस्पतालों तक वितरण अवसंरचना का निर्माण किया और आयुष्मान भारत ने उस प्रणाली को उसके चार कार्यशील स्तंभ दिए: प्राथमिक देखभाल के लिए एएएम, वित्तीय सुरक्षा के लिए पीएम-जेएवाई, सशक्तिकरण और अवसंरचना के लिए पीएम-एबीएचआईएम, और डिजिटल आधार के लिए एबीडीएम। मुफ्त दवाओं, निदान, परिवहन और डायलिसिस के साथ मिलकर, ये योजनाएँ मात्र योजनाओं का संग्रह नहीं हैं। ये हमारे लोगों के लिए एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य कवच का निर्माण करती हैं और यह याद दिलाती हैं कि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण के रूप में देखा जाता है, तो यह जीवन और देश के भविष्य दोनों को बदल सकता है।

(लेखक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री हैं)

डॉ. मनमोहन सिंह ट्रस्ट द्वारा आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली में शैक्षणिक उत्कृष्टता पुरस्कार एवं फेलोशिप की स्थापना

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

डॉ. मनमोहन सिंह ट्रस्ट ने भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आई.आई.एस.ई.आर.) मोहाली में डॉ. मनमोहन सिंह शैक्षणिक उत्कृष्टता पुरस्कार तथा डॉ. मनमोहन सिंह फेलोशिप स्थापित करने की घोषणा की है। इन पहलों का उद्देश्य विज्ञान शिक्षा में उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों को सम्मानित करना तथा मेधावी विद्यार्थियों को प्रोत्साहन एवं सहयोग प्रदान करना है।

डॉ. मनमोहन सिंह शैक्षणिक उत्कृष्टता पुरस्कार पहली बार 16 जून को आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली के 15वें दीक्षांत समारोह में प्रदान किए जाएंगे। इस अवसर पर एकीकृत बीएस-एमएस कार्यक्रम से स्नातक हो रहे विद्यार्थियों में से अपने-अपने विज्ञान विषय में सर्वोच्च शैक्षणिक प्रदर्शन करने वाले चार विद्यार्थियों को सम्मानित किया जाएगा।

इन पुरस्कारों की प्रस्तुति हेतु डॉ. मनमोहन सिंह ट्रस्ट के ट्रस्टी, प्रख्यात अर्थशास्त्री तथा योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया तथा प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री एवं डॉ. मनमोहन सिंह के परिवारी डॉ. विजय तनखा द्वारा की जाएगा। दोनों विशिष्ट अतिथि के रूप में दीक्षांत समारोह में उपस्थित रहेंगे। श्री अहलूवालिया ने भारत के आर्थिक इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह के साथ निकटता से कार्य किया, जबकि डॉ. विजय तनखा ने उन्हें पारिवारिक निकटता से जाना।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की स्मृति में स्थापित ये पुरस्कार प्रतिवर्ष बीएस-एमएस कार्यक्रम के उन विद्यार्थियों को प्रदान किए जाएंगे जिन्होंने भौतिक विज्ञान, रासायनिक विज्ञान, जैविक विज्ञान, गणितीय विज्ञान तथा पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभागों में सर्वोच्च शैक्षणिक प्रदर्शन किया हो। प्रत्येक पुरस्कार के साथ 50,000 रुपए की नकद राशि प्रदान की जाएगी।

डॉ. मनमोहन सिंह फेलोशिप भी शैक्षणिक सत्र 2026–27 से प्रारंभ की जाएगी। प्रतिवर्ष बीएस-एमएस कार्यक्रम के चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाले दो उत्कृष्ट विद्यार्थियों को यह फेलोशिप प्रदान की जाएगी। प्रत्येक फेलोशिप के अंतर्गत दो वर्षों तक ₹2 लाख प्रतिवर्ष की वित्तीय सहायता दी जाएगी, जिससे चयनित विद्यार्थी अपनी विज्ञान शिक्षा और शोध गतिविधियों को आगे बढ़ा सकें। चयन शैक्षणिक उपलब्धियों, आर्थिक आवश्यकता, विविधता तथा साक्षात्कार में प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा।

डॉ. मनमोहन सिंह फेलोशिप के प्रथम प्राप्तकर्ताओं की घोषणा सितंबर 2026 में आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली के स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर की जाएगी। यह अवसर विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा क्योंकि ठीक बीस वर्ष पूर्व, सितंबर 2006 में, डॉ. मनमोहन सिंह ने संस्थान की आधारशिला रखी थी।

ये सम्मान आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली के लिए विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि संस्थान का इतिहास डॉ. मनमोहन सिंह की विज्ञान शिक्षा संबंधी दूरदर्शी सोच से गहराई से जुड़ा हुआ है। डॉ. मनमोहन सिंह ने 26 सितंबर 2006 को आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली की आधारशिला रखी थी और संस्थान को मोहाली में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। बाद में पंजाब सरकार ने नॉलेज सिटी परियोजना के अंतर्गत मोहाली में 381 एकड़ भूमि अधिग्रहित की, जहां आज आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली स्थित है।

डॉ. मनमोहन सिंह का योगदान केवल आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली तक सीमित नहीं था, बल्कि समूचे आई.आई.एस.ई.आर. संस्थानों की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उच्च गुणवत्ता वाली स्नातक शिक्षा को अग्रणी वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने वाले विशेष संस्थानों की स्थापना की अवधारणा को प्रारंभिक चरण से ही उनका पूर्ण समर्थन प्राप्त था। आज आई.आई.एस.ई.आर. संस्थान भारत में विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान की सबसे सफल पहलों में से एक माने जाते हैं और देशभर में वैज्ञानिकों एवं विद्वानों की नई पीढ़ियों को तैयार कर रहे हैं।

इन पुरस्कारों और फेलोशिप की स्थापना का निर्णय इस वर्ष अप्रैल में डॉ. मनमोहन सिंह की पुत्रियों, प्रख्यात इतिहासकार प्रो. उपिंदर सिंह तथा प्रसिद्ध लेखिका सुश्री दमन सिंह, जो दोनों डॉ. मनमोहन सिंह ट्रस्ट की ट्रस्टी हैं, के आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली दौरे के बाद लिया गया। इस यात्रा के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह के संस्थान से गहरे संबंधों को स्थायी रूप से स्मरणीय बनाने तथा शिक्षा, वैज्ञानिक चिंतन और शैक्षणिक उत्कृष्टता के प्रति उनकी आजीवन प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाने के उपायों पर विस्तृत चर्चा हुई।

इस पहल का स्वागत करते हुए आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली के निदेशक प्रो. अनिल कुमार त्रिपाठी ने कहा: “डॉ. मनमोहन सिंह एक दूरदर्शी थे। विज्ञान शिक्षा को उत्कृष्टता के सर्वोच्च मानकों के साथ आगे बढ़ाने में उनका गहरा विश्वास था, और यही आदर्श आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली प्रतिदिन आत्मसात करने का प्रयास करता है। डॉ. मनमोहन सिंह ट्रस्ट द्वारा स्थापित ये पुरस्कार और फेलोशिप आने वाली पीढ़ियों के विद्यार्थियों को इसी आदर्श की ओर प्रेरित करेंगे। हमें गर्व है कि डॉ. सिंह की स्मृति को समर्पित इस महत्वपूर्ण पहल का केंद्र आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली बना है।”

आई.आई.एस.ई.आर. मोहाली के 15वें दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. ए. एस. किरण कुमार, प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष होंगे। डॉ. किरण कुमार ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के एक महत्वपूर्ण दौर का नेतृत्व किया और मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर मिशन) सहित अनेक ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियानों के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाई।