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NHAI ने NH-44 पर घरौंडा टोल प्लाजा पर मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग का पूर्ण पैमाने पर रोलआउट शुरू किया

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

भारत सरकार के निर्बाध, बाधा-रहित और प्रौद्योगिकी-संचालित राजमार्ग यात्रा के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के पानीपत-जालंधर खंड पर घरौंडा टोल प्लाजा पर मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोलिंग प्रणाली का पूर्ण पैमाने पर रोलआउट (शुरुआत) कर दिया है।

एमएलएफएफ (MLFF) टोलिंग प्रणाली का औपचारिक उद्घाटन एनएचएआई और इंडियन हाईवेज मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (IHMCL), NHAI का तकनीकी अंग, द्वारा श्री राकेश कुमार, क्षेत्रीय अधिकारी, एनएचएआई चंडीगढ़, और श्री ए. आर. चित्रांशी, मुख्य परिचालन अधिकारी, आईएचएमसीएल की उपस्थिति में किया गया। यह रोलआउट भारत के अगली पीढ़ी के टोलिंग बुनियादी ढांचे और बुद्धिमान परिवहन प्रणालियों (इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम) की ओर संक्रमण में एक बड़ा मील का पत्थर है।

एमएलएफएफ प्रणाली पारंपरिक टोल प्लाजा से एक परिवर्तनकारी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है, जो वाहनों को रुकने या धीमा होने की आवश्यकता के बिना टोल संग्रह को सक्षम बनाती है। उन्नत इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह (ETC) तकनीक का लाभ उठाते हुए, ओवरहेड गैंट्री पर लगे उच्च-प्रदर्शन वाले सेंसर और कैमरे स्वचालित रूप से वाहनों की पहचान करते हैं और फास्टैग (FASTag) के माध्यम से उपयोगकर्ता शुल्क काट लेते हैं, जिससे राजमार्ग की गति पर निर्बाध यात्रा की अनुमति मिलती है।

राजमार्ग उपयोगकर्ता अनुभव को बदलना

एमएलएफएफ टोलिंग की शुरुआत से यात्रा दक्षता और यात्रियों की सुविधा में उल्लेखनीय सुधार होने की उम्मीद है:

शून्य प्रतीक्षा समय (Zero Waiting Time)

भौतिक टोल बाधाओं (बैरियर्स) के हटने से वाहनों की सुचारू और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित होती है, जिससे यात्रा में देरी और टोल बिंदुओं पर भीड़भाड़ कम होती है।

ईंधन और यात्रा समय की बचत

टोल प्लाजा पर बार-बार ब्रेक लगाने, इंजन चालू रखकर खड़े रहने (आइडलिंग) और गति बढ़ाने की आवश्यकता को समाप्त करके, यह प्रणाली ईंधन की खपत को कम करने में मदद करती है और यात्रा के समय को तेज करती है।

उन्नत सड़क सुरक्षा

समर्पित एमएलएफएफ जोन को व्यापक सुरक्षा बुनियादी ढांचे से सुसज्जित किया गया है, जिसमें सुरक्षित आवाजाही की सुविधा के लिए उन्नत चेतावनी संकेत, रेट्रो-रिफ्लेक्टिव बैरिकेडिंग, क्रैश बैरियर और हाई-मास्ट लाइटिंग शामिल हैं, विशेष रूप से रात की यात्रा के दौरान।

एमएलएफएफ टोलिंग प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं

गैंट्री-आधारित टोल संग्रह

राजमार्ग कॉरिडोर में स्थापित ओवरहेड गैंट्री के माध्यम से उपयोगकर्ता शुल्क स्वचालित रूप से एकत्र किया जाता है। ये संरचनाएं लगभग 5.5 से 6.0 मीटर की न्यूनतम ऊर्ध्वाधर निकासी (वर्टिकल क्लीयरेंस) प्रदान करती हैं, जिससे सभी स्वीकृत वाहनों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित होती है।

भीड़भाड़ मुक्त टोलिंग जोन

सुचारू यातायात प्रवाह और परिचालन दक्षता बनाए रखने के लिए, एमएलएफएफ टोलिंग जोन के दोनों ओर 200 मीटर के भीतर पार्किंग, अतिक्रमण और अनधिकृत ठहराव को रोकने के लिए सख्त प्रवर्तन उपाय लागू किए गए हैं।

मजबूत प्रवर्तन तंत्र (Enforcement Mechanism)

रूट पेट्रोल वाहन (RPVs) और स्थानीय प्रवर्तन एजेंसियां गलत दिशा में ड्राइविंग, नंबर प्लेट के साथ छेड़छाड़ और टोल चोरी जैसे उल्लंघनों को रोकने के लिए एमएलएफएफ क्षेत्रों की सक्रिय रूप से निगरानी करेंगी।

असफल टोल भुगतान के लिए ई-नोटिस तंत्र

सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए पारदर्शिता और सुविधा सुनिश्चित करते हुए राजस्व को सुरक्षित रखने के लिए, एनएचएआई ने उन मामलों के लिए एक संरचित ई-नोटिस तंत्र पेश किया है जहां फास्टैग के माध्यम से टोल भुगतान सफलतापूर्वक संसाधित नहीं होता है, जिसमें अपर्याप्त शेष राशि (इनसफिशिएंट बैलेंस), निष्क्रिय टैग या टैग से संबंधित समस्याएं शामिल हैं।

उपयोगकर्ता ई-नोटिस की जांच कैसे कर सकते हैं

सड़क उपयोगकर्ता निर्दिष्ट एनआईसी (NIC) पोर्टल के माध्यम से ई-नोटिस को सत्यापित और प्रबंधित कर सकते हैं: ⁠nhfeenotice.parivahan.gov.in

उपयोगकर्ता अपने वाहन पंजीकरण संख्या को दर्ज करके और वाहन (VAHAN) डेटाबेस में पंजीकृत मोबाइल नंबर पर भेजे गए वन-टाइम पासवर्ड (OTP) के माध्यम से प्रमाणित करके पोर्टल तक पहुंच सकते हैं।

भुगतान की समयसीमा

– 72 घंटे के भीतर भुगतान: सामान्य लागू टोल दर (1x) पर देय उपयोगकर्ता शुल्क।
– 72 घंटे के बाद भुगतान: निर्धारित प्रावधानों के अनुसार, लागू टोल दर से दोगुनी दर (2x) पर देय उपयोगकर्ता शुल्क।

शिकायत निवारण

ऐसे मामलों में जहां वाहन मालिक को लगता है कि ई-नोटिस गलत तरीके से जारी किया गया है, समीक्षा और समाधान के लिए जारी होने के 72 घंटों के भीतर एनआईसी पोर्टल के माध्यम से शिकायत दर्ज की जा सकती है।

सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए सलाह

एनएचएआई सभी राजमार्ग उपयोगकर्ताओं को सलाह देता है कि वे:

– अपने फास्टैग खातों में हर समय पर्याप्त शेष राशि बनाए रखें।
– सुनिश्चित करें कि फास्टैग सक्रिय रहें और वाहन की विंडशील्ड पर ठीक से लगे हों।
– स्पष्ट और अनुपालन वाली उच्च सुरक्षा पंजीकरण प्लेट (HSRP) का उपयोग करें।
– यातायात अनुशासन का पालन करें और एमएलएफएफ जोन के भीतर संकेतों का पालन करें।

घरौंडा टोल प्लाजा पर एमएलएफएफ टोलिंग का कार्यान्वयन भारत की एक आधुनिक, कुशल और बुद्धिमान राजमार्ग नेटवर्क की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। बाधा-रहित टोल संग्रह के लिए उन्नत तकनीक का लाभ उठाकर, एनएचएआई का उद्देश्य यात्रियों की सुविधा बढ़ाना, यात्रा के समय को कम करना, ईंधन दक्षता में सुधार करना और एक सुरक्षित व अधिक टिकाऊ सड़क परिवहन पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है।

प्रीमियम बंगनपल्ली आमों की पहली वाणिज्यिक खेप सिंगापुर रवाना, कृषि निर्यात को बढ़ावा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ने ICAR-CISH लखनऊ के सहयोग से प्रीमियम बंगनपल्ली आमों की पहली वाणिज्यिक खेप सिंगापुर भेजी है। इससे देश के ताजे फलों और सब्जियों के निर्यात को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलेगा।

मेसर्स ओसुम फूड सॉल्यूशंस एलएलपी द्वारा 11 जून को बंगनपल्ली आमों की 5 मीट्रिक टन की खेप का निर्यात किया गया जो 24 जून को सिंगापुर पहुंची। यह खेप भारत के बागवानी उत्पादों के लिए लागत प्रभावी और स्थायी निर्यात को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रीमियम भारतीय आमों के लिए बाजार पहुंच का विस्तार करने की दिशा में एक उपलब्धि है।

ये आम आंध्र प्रदेश के जीएपी प्रमाणित बागानों से प्राप्त किए गए थे और कर्नाटक के APEDA मान्यता प्राप्त पैकिंग कारखाने में संसाधित और पैक किए गए थे। इस दैरान सिंगापुर द्वारा निर्धारित गुणवत्ता और पौध स्वच्छता मानकों का पूरा ख्याल रखा गया।

इस खेप का आयात करने वाली सिंगापुर स्थित ईसी-लिंक्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने इन फलों की उत्कृष्ट गुणवत्ता की पुष्टि की और आमों की मिठास, एकसमान पकने, लंबे समय तक सुरक्षित रहने और समग्र रूप से स्वस्थ स्थिति की सराहना की। खेप ने आयात संबंधी सभी मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे समुद्री परिवहन के दौरान वैज्ञानिक प्रबंधन प्रक्रियाओं और कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स की प्रभावशीलता प्रदर्शित होती है।

इस निर्यात से किसान भी आर्थिक रूप से लाभान्वित हुए। घरेलू बाजार में इनकी कीमत 25 से 26 रुपए प्रति किलोग्राम थी जबकि इन्हें लगभग 50 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से निर्यात किया गया। इससे किसानों की आमदनी लगभग दोगुनी हो गई और उन्हें अतिरिक्त लाभ मिला।
इस निर्यात से ताजे फलों के परिवहन के लिए समुद्री माल ढुलाई की बढ़ती व्यवहार्यता उजागर होती है, जो लागत प्रभावी, पर्यावरण के अनुकूल और व्यावसायिक रूप से विस्तार योग्य साधन है। मजबूत कोल्ड-चेन बुनियादी ढांचे, वैज्ञानिक हैंडलिंग प्रक्रियाओं और कुशल लॉजिस्टिक्स प्रबंधन से, समुद्री परिवहन भारतीय बागवानी निर्यात की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने की अपार क्षमता प्रदान करता है।

बंगनपल्ली, भारत की सबसे प्रसिद्ध आमों की किस्म है, जो अपने सुनहरे पीले रंग, मनमोहक सुगंध, रेशे रहित गूदे और भरपूर मिठास के लिए जानी जाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इस किस्म की काफी मांग है और भारत के आम निर्यात को और बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं।

एपीईडीए बाजार विकास पहलों, बुनियादी ढांचागत सहायता और निर्यातकों के लिए क्षमता निर्माण उपायों के माध्यम से ताजे फल और सब्जियों के निर्यात के लिए समुद्री माल ढुलाई को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है जिससे वे अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा कर सकें। सिंगापुर को की गई इस सफल शिपमेंट से बागवानी उत्पादों के निर्यात में समुद्री परिवहन के व्यापक उपयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही, यह वैश्विक बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को और सुदृढ़ करेगा।

यह पहल कृषि निर्यात को बढ़ावा देने, किसानों की आय बढ़ाने तथा कुशल और टिकाऊ निर्यात मार्गों के माध्यम से भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक पहुंच का विस्तार करने के सरकार के व्यापक उद्देश्य के अनुरूप है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने NH-44 पर घरौंडा टोल प्लाजा में मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग शुरू की

भारत सरकार के निर्बाध, बाधा रहित और प्रौद्योगिकी-संचालित राजमार्ग यात्रा के विजन को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के पानीपत-जालंधर खंड पर घरौंडा टोल प्लाजा पर मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग सिस्टम को शुरू कर दिया है।


मल्टी-लेन फ्री फ्लो प्रणाली, वाहनों को रुकने या धीमा करने की आवश्यकता के बिना टोल संग्रह को सक्षम बनाकर, पारंपरिक टोल प्लाजा से एक क्रांतिकारी बदलाव लाती है। बेहतर इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह तकनीक का उपयोग करते हुए, ओवरहेड गैंट्री पर लगे उच्च-प्रदर्शन सेंसर और कैमरे स्वचालित रूप से वाहनों की पहचान करते हैं और फास्टैग के माध्यम से उपयोगकर्ता शुल्क काटते हैं जिससे राजमार्ग की गति पर निर्बाध यात्रा संभव हो पाती है।


टोल बैरियरों को हटाने से वाहनों की सुचारू और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित होती है जिससे यात्रा में देरी और टोलिंग बिंदुओं पर भीड़भाड़ कम होती है। टोल प्लाजा पर बार-बार ब्रेक लगाने, निष्क्रिय अवस्था में रहने और गति बढ़ाने की आवश्यकता को समाप्त करके यह प्रणाली ईंधन की खपत को कम करने और यात्रा के समय को कम करने में मदद करती है।


राजमार्ग के आर-पार स्थापित ओवरहेड गैन्ट्री के माध्यम से उपयोगकर्ता शुल्क स्वचालित रूप से एकत्र किया जाता है। ये संरचनाएं लगभग 5.5 से 6.0 मीटर की न्यूनतम ऊर्ध्वाधर ऊंचाई प्रदान करती हैं जिससे सभी अनुमत वाहनों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित होती है।
सुचारू यात्रा और परिचालन दक्षता बनाए रखने के लिए मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग ज़ोन के दोनों ओर 200 मीटर के दायरे में पार्किंग, अतिक्रमण और अनधिकृत ठहराव को रोकने के लिए सख्त प्रवर्तन उपाय लागू किए गए हैं।


रूट पेट्रोल वाहन और स्थानीय प्रवर्तन एजेंसियां गलत दिशा में गाड़ी चलाना, नंबर प्लेट से छेड़छाड़ और टोल चोरी जैसे उल्लंघनों को रोकने के लिए मल्टी-लेन फ्री फ्लो के हिस्सों की सक्रिय रूप से निगरानी करेंगी।


राजस्व की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए पारदर्शिता और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने उन मामलों के लिए एक संरचित ई-नोटिस तंत्र शुरू किया है जहां टोल भुगतान फास्टैग के माध्यम से सफलतापूर्वक संसाधित नहीं होता है जिसमें अपर्याप्त शेष राशि, निष्क्रिय टैग या टैग से संबंधित समस्याएं शामिल हैं।

वायरल वीडियो को लेकर CM मान का खुलासा : कहा- मेरा मास्क लगाकर वीडियो बनाया गया, मुझे फसाया जा रहा है

मोहाली / सत्ता संदेश

पंजाब के सीएम भगवंत मान ने एक बार फिर वायरल वीडियो विवाद में सफाई दी है। मोहाली में पत्रकारों सेेे बातचीत में सीएम मान ने कहा कि विरोधी मुझे धार्मिक ताैर पर बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं। उन्होंने वीडियो प्रूफ दिखाकर कहा कि वीडियो में दिख रहा आदमी मैं नहीं हूं। मेरा मास्क लगाकर ये वीडियो बनाया गया है। 

मान ने कहा कि सभी पार्टियां मुझे निशाना बनाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि गुरुद्वारों के बाहर मेरे बहिष्कार करने के पोस्टर लगाए गए, सुखबीर बादल के क्यों नहीं लगाए गए थे। मेरे खिलाफ धार्मिक फतवे जारी किए जा रहे हैं। 

फर्जी वीडियो से मुझे बदनाम कर रहे  

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने बुधवार को वायरल हुए विवादित वीडियो को फर्जी और मनगढ़ंत बताते हुए इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार के जनहित कार्यों का मुकाबला करने में असफल विपक्षी दल अब उन्हें बदनाम करने के लिए झूठे वीडियो का सहारा ले रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विरोधियों के पास सरकार के खिलाफ कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है। इसलिए वे उनकी छवि खराब करने के लिए दुष्प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वायरल वीडियो में दिख रहे व्यक्ति की कद-काठी, शारीरिक बनावट, चलने और व्यवहार का तरीका उनसे मेल नहीं खाता। इसके बावजूद राजनीतिक विरोधी उन्हें निशाना बना रहे हैं।

मान ने कहा कि उन्हें पंजाब के लोगों और नानक नाम लेवा संगत पर पूरा भरोसा है। सच्चाई और झूठ का फैसला जनता करेगी। उन्होंने कहा कि उनका ध्यान बिजली, पानी, सड़क, अस्पताल, आम आदमी क्लीनिक और रोजगार जैसी सुविधाएं लोगों तक पहुंचाने पर केंद्रित रहेगा।

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि अब उन्हें धार्मिक आधार पर घेरने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि शिरोमणि कमेटी ने गुरुद्वारों के बाहर उनके बहिष्कार संबंधी पोस्टर लगाने के आदेश दिए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि बेअदबी मामलों की जिम्मेदारी स्वीकार करने के बावजूद अकाली दल और सुखबीर बादल के खिलाफ ऐसे पोस्टर क्यों नहीं लगाए गए।

लैब संचालकों को डराने का आरोप

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने वीडियो की जांच फॉरेंसिक लैब से करवाई थी लेकिन अब उन्हीं लैब संचालकों को एफआईआर और दबाव की धमकियां देकर परेशान किया जा रहा है। उनका आरोप है कि भाजपा, अकाली दल और कांग्रेस मिलकर लैब मालिकों व कर्मचारियों को निशाना बना रहे हैं।

2027 को लेकर चिंतित है विपक्ष

मान ने कहा कि विपक्षी दल अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फर्जी प्रचार पर निर्भर हो गए हैं क्योंकि उनका जनाधार खत्म हो चुका है। उन्होंने दावा किया कि 2027 में सत्ता में वापसी की संभावना नहीं दिखने के कारण विपक्ष बौखलाया हुआ है। अंत में फैसला संगत और पंजाब की जनता ही करेगी।

आधार जरुरी नहीं, पासपोर्ट पहचान नहीं…तो फिर क्या है एक भारतीय होने की पहचान ?

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

‘भारत में नागरिकता का प्रमाण कैसे दिया जा सकता है?’ बुधवार को जब विदेश मंत्रालय ने एक स्पष्टीकरण जारी कर यह कहा कि पासपोर्ट सिर्फ यात्रा का दस्तावेज है और यह देश की नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस मच गई। आम लोगों से लेकर संगीतकार जावेद अख्तर और विपक्ष के कई नेताओं ने भी नागरिकता के सबूत को लेकर सवाल पूछे। हालांकि, कहीं भी यह साफ नहीं हो सका कि आखिर देश का कानून नागरिकता पर क्या कहता है और किन दस्तावेजों को इसका प्रमाण माना जा सकता है। 


पहले जानें- क्या है विदेश मंत्रालय का पूरा बयान?

विदेश मंत्रालय ने कहा कि कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत होता है, जबकि पासपोर्ट शुरुआत से ही पासपोर्ट अधिनियम के तहत आते हैं।

विदेश मंत्रालय ने 24 जून को 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर एक ब्रीफिंग के दौरान स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। 

विदेश मंत्रालय ने कहा कि ये मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है। इसका प्राथमिक मकसद नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने की अनुमति देना और विदेशों में उनकी पहचान व राष्ट्रीयता को स्थापित करना है। हालांकि यह विदेश में आपकी पहचान बताता है, लेकिन यह अपने आप में नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

मंत्रालय ने अपने बयान में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 का हवाला दिया। इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार अगर जरूरी समझे तो सार्वजनिक हित में किसी गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है। इसी कानूनी स्थिति के कारण एक पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का पूर्ण या अचूक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अगर विदेश में पासपोर्ट ही पहचान बताता है तो भारत में यह नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं?

विदेश में भारतीय पासपोर्ट किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता और पहचान स्थापित करता है, लेकिन भारत के अंदर इसे कानूनी रूप से नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। इसकी तीन बड़ी वजहें हैं…

1. गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने का प्रावधान

पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के तहत, केंद्र सरकार के पास यह विशेष अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित में किसी ऐसे व्यक्ति को भी भारतीय पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है, जो भारत का नागरिक नहीं है इसलिए पासपोर्ट का होना नागरिकता का अचूक और अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। सीधे शब्दों में समझें तो आम परिस्थितियों में पासपोर्ट विदेश और देश दोनों में ही नागरिकता साबित कर सकता है, लेकिन अगर भारत में किसी व्यक्ति की नागरिकता पर विवाद पैदा हो जाए तो सिर्फ पासपोर्ट ही अंतिम प्रमाण नहीं होगा। इसके लिए अन्य साक्ष्यों की जरूरत भी पड़ेगी।

2. नागरिकता नहीं, विदेश यात्रा के लिए जारी होता है पासपोर्ट

विदेश मंत्रालय स्पष्ट करता है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है। इसका प्राथमिक काम किसी व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने की अनुमति देना और विदेश में उसकी पहचान स्थापित करना है, न कि भारत के अंदर उसकी नागरिकता साबित करना।

इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं- मान लीजिए अगर कोई व्यक्ति गलत जानकारी देकर या धोखे से भारत का पासपोर्ट हासिल कर लेता है, जैसे- पाकिस्तान का कोई खुफिया जासूस भारत का पासपोर्ट ले लेता है, लेकिन बाद में भारत में ही रहते हुए उसकी नागरिकता पर विवाद पैदा हो जाता है तो वह व्यक्ति पासपोर्ट दिखाकर अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकेगा। उसे अलग-अलग दस्तावेजों और मूल परिवार की जानकारी देकर ही नागरिकता साबित करनी होगी। चूंकि, किसी पाकिस्तानी व्यक्ति के परिवार का भारत में ब्योरा मिलना या उसकी शिक्षा की जानकारी भारत में मिलना मुश्किल है, ऐसी स्थिति में विदेश मंत्रालय पासपोर्ट को रद्द कर सकता है। इसलिए सिर्फ पासपोर्ट का होना नागरिकता की गारंटी नहीं है। 

3. पासपोर्ट के लिए अलग, नागरिकता के लिए अलग कानून

  • पासपोर्ट, भारत में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत आते हैं, जबकि भारतीय नागरिकता का निर्धारण पूरी तरह से नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के आधार पर होता है।इस कानून के तहत नागरिकता सिर्फ जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण यानी एक लंबी अवधि तक भारत में रहने के बाद या किसी क्षेत्र के भारत में शामिल होने के आधार पर ही मिलती है। अदालतें स्पष्ट कर चुकी हैं कि नागरिकता केवल किसी एक दस्तावेज के होने से नहीं, बल्कि इन कानूनी योग्यताओं के आधार पर तय होती है।
  • पासपोर्ट अधिनियम की धारा पांच के तहत, पासपोर्ट आमतौर पर उचित जांच के बाद भारतीय नागरिकों को ही जारी किए जाते हैं। इस वजह से पासपोर्ट को नागरिकता का एक बहुत मजबूत सबूत माना जाता है, लेकिन यह हर परिस्थिति में अपने आप में निर्णायक प्रमाण नहीं है और इस प्रमाण को चुनौती दी सकती है।

अगर पासपोर्ट प्रमाण नहीं, तो फिर भारतीयता का सबूत क्या हो सकता है? 

सच्चाई यह है कि भारत में ऐसा कोई भी एक यूनिवर्सल या एकल दस्तावेज नहीं है, जो हर नागरिक के लिए नागरिकता का अंतिम प्रमाण हो। नागरिकता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि आपने इसे कैसे हासिल किया है और आपका जन्म कब-कहां हुआ है।


1. क्या है नागरिकता का सबसे पुख्ता प्रमाण?

कानूनी रूप से नागरिकता का सबसे निर्णायक प्रमाण गृह मंत्रालय की तरफ से जारी किया गया पंजीकरण प्रमाणपत्र या प्राकृतिककरण प्रमाणपत्र होता है। हालांकि, ये प्रमाणपत्र आमतौर पर सिर्फ उन लोगों को जारी किए जाते हैं, जिन्होंने विदेशी मूल का होने के बाद कानूनी प्रक्रिया से भारत की नागरिकता ली हो। अधिकतर भारतीय, जो जन्म से नागरिक हैं के पास यह प्रमाणपत्र नहीं होता है।

2. जन्म से नागरिकों के लिए क्या है प्रमाण? 

ज्यादातर भारतीयों को नागरिकता जन्म या वंश के आधार पर मिलती है। ऐसे मामलों में नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र और माता-पिता के दस्तावेजों के संयोजन की जरूरत होती है, जो अलग-अलग समय के कानूनों पर निर्भर करता है।

26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच जन्मे लोग
इनके लिए केवल जन्म प्रमाण पत्र ही पूर्ण प्रमाण है, क्योंकि इस दौरान भारत की धरती पर जन्म लेने वाला हर व्यक्ति स्वतः ही भारतीय नागरिक माना जाता था।

1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे लोग
इनके लिए जन्म प्रमाण पत्र के साथ यह साबित करना जरूरी है कि जन्म के समय माता या पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक था।

3 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे लोग 
इन्हें जन्म प्रमाण पत्र के साथ यह साबित करना होता है कि माता-पिता दोनों भारतीय नागरिक हैं या कोई एक भारतीय नागरिक है और दूसरा अवैध प्रवासी नहीं है।


3. अन्य सहायक या विरासती दस्तावेज

जब नागरिकता पर विवाद होता है तो अदालतों और ट्रिब्यूनलों की तरफ से नागरिकता साबित करने के लिए पुराने या विरासती दस्तावेजों को सबूत माना जाता है।  जैसा कि असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) बनाने के दौरान हुआ। इनमें पुराने भूमि रिकॉर्ड, पैतृक संपत्ति के कागजात, पुरानी मतदाता सूचियां, और पुराने स्कूल प्रमाण पत्र शामिल हैं, जो समय के साथ भारत में निवास और पारिवारिक संबंधों को स्थापित करते हैं।

तो फिर आधार, पैन, वोटर आईडी कार्ड का क्या; अदालतों का क्या रुख?

भारत सरकार और अदालतों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड भारतीय नागरिकता के निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। इन दस्तावेजों को कुछ खास मकसदों और सेवाओं के लिए जारी किया जाता है, न कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने के लिए। 

1. आधार कार्ड की क्या स्थिति?

  • आधार कार्ड सिर्फ व्यक्ति की पहचान स्पष्ट करने और भारत में निवास का प्रमाण है। इससे नागरिकता या राष्ट्रीयता साबित नहीं होती और अगर किसी की नागरिकता को चुनौती दी जाती है तो सिर्फ आधार के जरिए इसे साबित नहीं किया जा सकता। 
  • कोई भी व्यक्ति, यहां तक कि विदेशी नागरिक भी, जो आवेदन की तारीख से ठीक पहले 12 महीनों में 182 दिन या उससे अधिक समय तक भारत में रहा हो, वह आधार कार्ड प्राप्त करने का पात्र हो जाता है।

कोर्ट ने क्या कहा: साल 2025 में बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह निर्देश देने से इनकार कर दिया था कि आधार को नागरिकता के एकमात्र प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए। अदालत का कहना था कि आधार का इस्तेमाल सिर्फ पहचान साबित करने के लिए किया जा सकता है, नागरिकता साबित करने के लिए नहीं।

2. पैन कार्ड

पैन कार्ड (परमानेंट अकाउंट नंबर) एक वित्तीय और टैक्स पहचान दस्तावेज है। आयकर विभाग इसे भारत में टैक्स देने वाली किसी भी इकाई को जारी करता है। यानी सीधे तौर पर जो भी व्यक्ति या संस्थान भारत में टैक्स संबंधित मामलों से जुड़ा होगा, वह पैन का हकदार होगा। इसमें विदेशी नागरिक, अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) और विदेशी कंपनियां भी शामिल हैं। 

पैन कार्ड केवल यह दर्शाता है कि कोई व्यक्ति भारत में आय अर्जित कर रहा है या टैक्स चुका रहा है; यह न तो नागरिकता का प्रमाण है और न ही भारत में निवास का। 2020 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी अपने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि पैन कार्ड और बैंक के दस्तावेज भारतीय नागरिकता सिद्ध नहीं करते।

3. वोटर आईडी कार्ड

वोटर आईडी कार्ड मुख्य रूप से मतदाता सूची में नाम दर्ज होने और पहचान का प्रमाण है। इसमें एक पेच यह हैं कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार है, लेकिन मतदाता सूची में धोखाधड़ी या गलती से भी नाम दर्ज हो सकता है। ऐसे में अगर कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो वोटर आईडी कार्ड को चुनौती दी जा सकती है और रद्द भी किया जा सकता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: 2025 में एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल वोटर आईडी या आधार कार्ड रखने से किसी को खुद-ब-खुद नागरिकता नहीं मिल जाती है। ये दस्तावेज नागरिकता अधिनियम के बुनियादी नियमों को नहीं बदल सकते। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है, इसलिए इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

साल 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद (राज्यसभा) में एक सवाल के जवाब में साफ कर दिया था कि सरकार आधार, पासपोर्ट, वोटर आईडी और पैन कार्ड में से किसी को भी नागरिकता सिद्ध करने का अंतिम या पूर्ण दस्तावेज नहीं मानती है। ये दस्तावेज सिर्फ सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने या अलग-अलग कार्यों- (जैसे वोट देने या टैक्स भरने) के लिए हैं। किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का कानूनी निर्धारण केवल नागरिकता अधिनियम, 1955 और जन्म या वंश से जुड़ी योग्यताओं के आधार पर ही होता है।

नरेन्‍द्र मोदी: सबसे लंबे समय तक ‘प्रत्‍यक्ष रूप से निर्वाचित’ प्रधानमंत्री

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता को लेकर चल रही बहस के बीच, मुझे मेरे पिता, स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी की 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अभूतपूर्व जीत के बारे में बताई गई एक दिलचस्प बात याद आती है। उस समय बाबा भारत के 13वें राष्ट्रपति थे। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े होने के बावजूद, उनके बीच बहुत अच्छे संबंध थे, जो शायद एक सच्चे लोकतंत्र की वास्‍तविक पहचान है।

चुनाव परिणाम आने के बाद, मोदी जी राष्ट्रपति भवन में बाबा से मिलने आए। बातचीत के दौरान, बाबा ने मोदी जी से चुनाव के बारे में उनका विश्लेषण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि तीन दशकों के बाद किसी राजनीतिक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है। तब बाबा ने अपने विशिष्‍ट प्रोफ़ेसर वाले अंदाज़ में पूछा, ‘और क्या?’ जब मोदी जी चुप रहे, तो बाबा ने बताया कि 2014 का लोकसभा चुनाव इतिहास में अनोखा था, क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर एक नया चेहरा पहले ही घोषित कर दिया गया था। भारतीय जनता पार्टी को मिला लोगों का अपार समर्थन केवल उनकी पार्टी के लिए नहीं था, बल्कि यह लोगों का श्री नरेन्‍द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए सीधा जनादेश था। दूसरे चुनावों के विपरीत, जहाँ प्रधानमंत्री का चेहरा या तो मान लिया जाता है पर आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया जाता; या परंपरा के अनुसार नवनिर्वाचित सांसद उनका चुनाव करते हैं; या यह गठबंधन के गणित से तय होता है और यह प्रक्रिया चुनाव के बाद होती है। मोदी जी से पहले डॉ. मनमोहन सिंह, जो कभी जन-नेता नहीं रहे, उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने चुना था। भारत के दो प्रधानमंत्री, श्री पी.वी. नरसिम्हा राव और श्री एच.डी. देवेगौड़ा – तो प्रधानमंत्री बनने के समय संसद के सदस्य भी नहीं थे। सरल शब्दों में कहें तो, प्रधानमंत्री का चुनाव वरिष्ठ राजनेता करते थे। 2014 भारतीय राजनीति के चुनावी समीकरणों में एक बहुत बड़ा बदलाव था, जहां देश की जनता ने श्री नरेन्‍द्र मोदी को लगभग ‘राष्ट्रपति चुनाव’ की ही तरह, स्पष्ट रूप से और बिना किसी संदेह के अपना प्रधानमंत्री चुना।

उल्‍लेखनीय है कि 2014 से पहले श्री नरेन्‍द्र मोदी जी ‘राष्ट्रीय’ राजनीति में नए थे। उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने लंबे कार्यकाल के दौरान अपनी एक विशिष्‍ट पहचान बनाई थी, लेकिन 2014 उनका पहला लोकसभा चुनाव था। यह एक अनोखी बात है कि पहली बार सांसद बनने वाले व्यक्ति ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार संसद भवन में प्रवेश किया। (पुरानी) संसद की सीढ़ियों पर ‘प्रणाम’ करने का उनका भावुक कदम हृदय को छू लेने वाला ऐसा क्षण था, जिसने करोड़ों भारतीयों के हृदय में अपनी जगह बना ली।

चुनाव में विजय का कभी भी कोई एक कारण नहीं होता; यह कई कारकों से जुड़ी एक जटिल प्रक्रिया है। भाजपा का ज़मीनी स्तर पर मज़बूत संगठन, अलग-अलग जातियों और समुदायों तक लगातार पहुँचने की रणनीति, अपनी गलतियों को शीघ्र पहचानना और तुरंत सुधार करने की इच्छाशक्ति — ये कुछ ऐसी मुख्य बातें हैं जिन्होंने विद्यमान भाजपा को चुनाव जीतने वाली एक ऐसी शक्ति बना दिया है, जिसे वर्तमान में रोक पाना दुष्‍कर लगता है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि श्री नरेन्‍द्र मोदी जी का चेहरा शायद भाजपा का सबसे मज़बूत ट्रंप कार्ड है। लोग उनमें एक ऐसा मज़बूत नेता देखते हैं, जो अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत के दम पर आगे बढ़ा है, न कि कांग्रेस की तरह वंशवादी विरासत या परिवार-शासित क्षेत्रीय पार्टियों की मज़बूत पकड़ के कारण।

एक तरह से श्री नरेन्‍द्र मोदी भाजपा के पर्याय बन गए हैं। मैं हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बारे में बंगाल के मित्रों के साथ हुई कुछ बातचीत का उल्‍लेख करना चाहूंगी। जहां मेरे अपने रिश्तेदार अभी भी कांग्रेस के कट्टर समर्थक हैं और बंगाल में कांग्रेस को मिले मामूली 2.9 प्रतिशत वोट शेयर में उनका भी योगदान था, वहीं मेरे अधिकतर दोस्तों और परिचितों ने भाजपा को वोट दिया था। चुनाव से पहले, मैं उनसे पूछती थी कि वे किस पार्टी को वोट देंगे। अधिकतर लोगों का उत्तर यही होता था कि वे ‘मोदी’ को वोट देंगे। मैं उन्हें याद दिलाती थी कि यह विधानसभा चुनाव है और मोदी जी चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उनका उत्तर हमेशा यही होता था—’ओई एक-ई व्यापार’—यानी ‘बात एक ही है’।

श्री नरेन्‍द्र मोदी जी न केवल देश के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले चुने हुए प्रधानमंत्री हैं, बल्कि शायद स्‍वतंत्रता के बाद देश ने जितने भी प्रधानमंत्री देखे हैं, उनमें से वे सबसे मज़बूत नेताओं में से एक हैं। वे गठबंधन सरकारों, जो अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए दूसरों पर निर्भर रहती हैं, के उन व्‍यावधानों (अक्सर ब्लैकमेल करने वाले तरीकों) का शिकार हुए बिना एक मज़बूत और स्थिर सरकार देने में सफल रहे हैं। कोई उनकी कई नीतियों या काम करने के तरीके से असहमत हो सकता है और लोकतंत्र में ऐसा होना बिल्कुल सामान्य बात है; लेकिन कोई भी उनके करिश्मे और ‘आकांक्षी भारत’ के लिए प्रेरणा के तौर पर भारतीय मतदाताओं के साथ उनके जुड़ाव को नकार नहीं सकता। यह बात 2019 और फिर 2024 में भी स्‍पष्‍ट रूप से दिखी। आप श्री नरेन्‍द्र मोदी को पसंद करें या नापसंद, लेकिन आप ‘ब्रांड मोदी’ की अनदेखी नहीं कर सकते। बड़ी ताक़त के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है। एक आम नागरिक के रूप में, मैं प्रार्थना करती हूँ कि वे लोगों से प्राप्‍त भारी जनादेश के साथ पूरा न्याय करें और हमारे देश को और भी ऊंचाइयों तक ले जाएँ।

(लेखिका एक स्‍तम्‍भकार हैं और ‘प्रणब माय फादर: अ डॉटर रिमेंबर्स’ पुस्‍तक की लेखिका हैं। वह वर्तमान में ‘प्रणब मुखर्जी लिगेसी फाउंडेशन’ की संचालक हैं।)

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की गुणवत्ता व रखरखाव की समीक्षा की

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने नई दिल्ली में आयोजित अलग-अलग समीक्षा बैठकों में तेलंगाना में 4,931 किमी, जम्मू एवं कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में 2,035 किमी और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में 804 किमी के राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की गुणवत्ता, रखरखाव और प्रगति की समीक्षा की।

मीडिया रिपोर्टों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के माध्यम से प्राप्त फीडबैक और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड के अधिकारियों और परियोजना ठेकेदारों से प्राप्त इनपुट के आधार पर ये समीक्षाएं की गईं।

मंत्री ने बैठक के दौरान चल रही परियोजनाओं, रखरखाव गतिविधियों और सुरक्षित, कुशल और टिकाऊ राजमार्ग अवसंरचना के निर्माण को सुनिश्चित करने के लिए अपनाए जा रहे उपायों की स्थिति का आकलन किया। उन्होंने गुणवत्ता और जवाबदेही के उच्चतम मानकों को बनाए रखते हुए परियोजना कार्यान्वयन में तेजी लाने की आवश्यकता पर बल दिया।

नितिन गडकरी ने अधिकारियों और कार्यकारी एजेंसियों को निगरानी तंत्र को मजबूत करने, कार्यों को समय पर पूरा करने और राजमार्ग गलियारों की स्थायित्व, आरामदायक यात्रा और दीर्घकालिक प्रदर्शन में सुधार के लिए उन्नत निर्माण प्रौद्योगिकियों और सर्वक्षेष्ठ प्रणालियों को अपनाने का निर्देश दिया। उन्होंने क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने, आर्थिक विकास को गति देने, पर्यटन को बढ़ावा देने और यात्रियों की सुविधा में सुधार के लिए सुव्यवस्थित सड़क अवसंरचना के महत्व पर जोर दिया।

उन्होंने परियोजना के सभी हिस्सों में मानसून की व्यापक तैयारियों की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने अधिकारियों को प्रभावी जल निकासी प्रबंधन, ढलान स्थिरीकरण और संरक्षण कार्य तथा मौसम-संबंधी व्यवधानों से निपटने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया प्रणालियों की तैनाती सहित निवारक और शमन उपाय करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि ये उपाय निर्बाध संपर्क, सड़क सुरक्षा और राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।

इबोला प्रभावित देशों के यात्रियों की निगरानी के लिए एयर सुविधा 2.0 पोर्टल लॉन्च

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

नागरिक उड्डयन मंत्रालय और दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड ने गुरुवार को एयर सुविधा 2.0 का शुभारंभ किया, जो एक संपर्क रहित यात्री स्वास्थ्य स्व-घोषणा पोर्टल है, जिसका उद्देश्य चल रहे इबोला रोग के प्रकोप के जवाब में प्रवेश बिंदुओं पर सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी को मजबूत करना है।

यह घोषणा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 17 मई को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम 2005 के तहत कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में इबोला/बुंडीबुग्यो वायरस रोग के प्रकोप को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने के बाद की गई है। वर्तमान प्रकोप की पुष्टि बुंडीबुग्यो वायरस रोग के रूप में की गई है, और डीआरसी और युगांडा की सीमा से लगे देशों, जिनमें दक्षिण सूडान भी शामिल है।

यह पोर्टल हवाई अड्डे के स्वास्थ्य अधिकारी, आव्रजन ब्यूरो, आईडीएसपी और राज्य निगरानी अधिकारियों के साथ वास्तविक समय में डेटा साझा करने में सक्षम बनाता है, जिससे जोखिम वाले यात्रियों की त्वरित पहचान और रेफरल संभव हो पाता है, साथ ही आगमन प्रक्रिया को सहज और संपर्क रहित बनाए रखता है, और लैंडिंग पर कोई भौतिक फॉर्म भरने की आवश्यकता नहीं होती है।

एयरसुविधा स्व-घोषणा पत्र भारत पहुंचने से 24 घंटे पहले भरा जा सकता है। यात्रियों से अनुरोध है कि वे उड़ान में चढ़ने से पहले या वेब चेक-इन के दौरान फॉर्म भरें ताकि आगमन पर शीघ्र निकासी हो सके। अंतर्राष्ट्रीय यात्रा स्वास्थ्य डेस्क या आव्रजन काउंटर पर केवल डाउनलोड किया गया एसडीएफ दिखाना आवश्यक है।

युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन माय भारत, चंडीगढ़ द्वारा आयोजित “SAKSHAM ELP – 2026” का सफल समापन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन माय भारत, चंडीगढ़  द्वारा समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास विभाग, चंडीगढ़ प्रशासन के सहयोग से आशा किरण, सेक्टर-46, चंडीगढ़ में आयोजित पाँच दिवसीय अनुभवात्मक शिक्षण कार्यक्रम (ELP) “SAKSHAM ELP – 2026” का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

कार्यक्रम के दौरान माय भारत के स्वयंसेवकों ने विशेष रूप से सक्षम बच्चों एवं वरिष्ठ नागरिकों के साथ योग, चित्रकला, पेंटिंग तथा अन्य रचनात्मक एवं मनोरंजक गतिविधियों का आयोजन किया। इन गतिविधियों ने प्रतिभागियों में आत्मविश्वास, सकारात्मकता एवं सामाजिक सहभागिता को बढ़ावा दिया, वहीं स्वयंसेवकों को सेवा, संवेदनशीलता एवं समावेशन के मूल्यों को व्यवहारिक रूप से सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। स्वयंसेवकों ने विशेष क्षमताओं वाले बच्चों एवं वरिष्ठ नागरिकों के साथ समय व्यतीत कर उनके जीवन संघर्ष, धैर्य एवं सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरणा प्राप्त की।

इस अवसर पर श्री विनय कुमार, जिला युवा अधिकारी, माय भारत, चंडीगढ़ ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं में सामाजिक उत्तरदायित्व, नेतृत्व क्षमता एवं सेवा भावना का विकास करते हैं तथा उन्हें राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान हेतु प्रेरित करते हैं।

उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास विभाग, चंडीगढ़ प्रशासन, आशा किरण के निवासी प्रबंधक , संस्थान के समस्त स्टाफ तथा माय भारत के स्वयंसेवकों सारिका, आकांक्षा, पुष्पा, प्रगति एवं ऋतिक का आभार व्यक्त किया।

एक बार की इमरजेंसी: हमेशा के लिए चेतावनी: अर्जुन राम मेघवाल

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

‘इमरजेंसी’ शब्द से बेचैनी और चिंता होती है। इसका मतलब आमतौर पर यह होता है कि किसी बड़े मकसद के नाम पर नॉर्मल नियम और डेमोक्रेटिक प्रोसेस को कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है। हालांकि, सभी इमरजेंसी एक जैसी नहीं होतीं। उदाहरण के लिए, हॉस्पिटल में इमरजेंसी सर्विस जान बचाती हैं और मुश्किल समय में तुरंत मदद देती हैं। साथ ही, युद्ध, क्लाइमेट चेंज और नेचुरल रिसोर्स की कमी जैसी ग्लोबल चुनौतियां भी इमरजेंसी हैं। इनसे निपटने के लिए दुनिया के सभी देशों को मिलकर काम करना होगा और छोटी सोच से ऊपर उठना होगा। आज का समाज भी हमेशा जल्दी में जी रहा है। सब कुछ तुरंत करने, तुरंत नतीजे पाने और बिना देर किए फैसले लेने की होड़ में लोग एक तरह की अनदेखी और अघोषित इमरजेंसी का सामना कर रहे हैं। इसके उलट, हाल ही में मनाए गए इंटरनेशनल योगा डे ने हमें शांति, बैलेंस, सब्र और मेडिटेशन की अहमियत याद दिलाई। इतिहास गवाह है कि इंसानी समाज ने समय-समय पर कई मुश्किलों का सामना किया है।

लेकिन एक पुरानी सभ्यता और डेमोक्रेटिक देश होने के नाते भारत के लिए, 1975 में पॉलिटिकल वजहों से लगाई गई ‘नेशनल इमरजेंसी’ सबसे दर्दनाक और चिंताजनक चैप्टर रही है। यह घटना आज भी हमें अपनी डेमोक्रेसी, संविधान और नागरिकों की आज़ादी की रक्षा के लिए सतर्क रहने की सीख देती है।

आज पूरा देश ‘संविधान हत्या दिवस’ मना रहा है। 1975 में लगाई गई इमरजेंसी भारत के डेमोक्रेटिक इतिहास पर एक ऐसा दाग है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। आधी सदी बाद भी उस काले और दर्दनाक दौर की यादें ‘डेमोक्रेसी की माँ’ भारत को हिला देती हैं।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि डेमोक्रेसी की रक्षा करना हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। साथ ही, यह हमें उन मुश्किल संघर्षों और कुर्बानियों की भी याद दिलाता है जिनसे हमें आज़ादी और डेमोक्रेटिक अधिकार मिले। इतिहास के इस सबसे मुश्किल दौर से सीखते हुए, हमें अपनी डेमोक्रेसी की रक्षा के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए। भारत एक ऐसा देश है जिसकी सभ्यता और संस्कृति सदियों से डेमोक्रेटिक परंपराओं में डूबी हुई है। यहाँ बहस, बातचीत और चर्चा की एक समृद्ध परंपरा है, जिसने जनता की भागीदारी पर आधारित शासन व्यवस्था को आकार दिया है।

मज़बूत किया गया। पुराने ज़माने की सभा और समिति जैसी संस्थाएँ और 12वीं सदी का ‘अनुभव मंडप’ डेमोक्रेटिक संस्थाओं के विकास के अहम उदाहरण हैं।
हमारा संविधान इन हमेशा रहने वाले डेमोक्रेटिक मूल्यों का जीता-जागता दस्तावेज़ है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान को “जीवन का एक ज़रिया बताया था जिसमें सदियों की भावना समाई हुई है”। लेकिन इमरजेंसी लगाकर इन बुनियादी डेमोक्रेटिक सिद्धांतों को किनारे कर दिया गया, जिससे संविधान की पवित्र भावना और डेमोक्रेटिक सिस्टम को गहरी चोट पहुँची।

1975 की नेशनल इमरजेंसी सिर्फ़ एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि इसने भारत में डेमोक्रेटिक सोच-विचार और पब्लिक लाइफ़ के कामकाज पर गहरा असर डाला। इंदिरा गांधी के सत्ता पर केंद्रित और अपने फ़ायदे के लिए राज ने संविधान की बुनियादी भावना को किनारे कर दिया और नैतिक शासन के सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुँचाया।

1971 के लोकसभा चुनावों में गड़बड़ियाँ, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फ़ैसला और उनके इस्तीफ़े के लिए बढ़ती जनता की आवाज़ भारत में अंदरूनी अशांति नहीं थी। असल में, यह संकट खुद इंदिरा गांधी के लिए था, जो लंबे समय से वंशवाद पर आधारित राजनीतिक विरासत का फायदा उठा रही थीं। लेकिन अपने इस राजनीतिक संकट से निपटने के लिए ‘अंदरूनी अशांति’ के नाम पर पूरे देश पर इमरजेंसी लगाना एक गंभीर और गलत फैसला था। घटनाओं का सिलसिला इंदिरा गांधी की लोकतंत्र विरोधी सोच को साफ तौर पर सामने लाता है। 19 मार्च 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान, वह कोर्ट में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद, 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट नंबर 24 ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें 6 साल के लिए किसी भी चुने हुए पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद, इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी। कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर संसद की कार्यवाही में शामिल होने की इजाजत दी, लेकिन आखिरी फैसले तक उन्हें संसद में वोट देने और सैलरी लेने की इजाजत नहीं दी। इस बीच, 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की लीडरशिप में हुई एक बड़ी पब्लिक रैली ने इंदिरा गांधी पर इस्तीफ़ा देने का दबाव और बढ़ा दिया। देश भर में अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों और जनता की तरफ़ से उनके इस्तीफ़े की मांग तेज़ हो गई। इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं के फ़ैसलों से नाखुश इंदिरा गांधी ने संविधान के आर्टिकल 352 के तहत नेशनल इमरजेंसी लगाने का फ़ैसला किया। 25 जून 1975 की आधी रात को उन्होंने प्रेसिडेंट फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को यूनियन कैबिनेट की पहले से मंज़ूरी लिए बिना इमरजेंसी लगाने की सलाह दी। यह सलाह ऑफ़िशियल लेटरहेड पर नहीं, बल्कि सादे कागज़ पर भेजी गई थी।

इसके बाद 26 जून को सुबह 6 बजे कैबिनेट मीटिंग बुलाई गई, जो सिर्फ़ एक फॉर्मेलिटी थी। इस तरह, ज्यूडिशियरी को नज़रअंदाज़ करके और कैबिनेट की कलेक्टिव ज़िम्मेदारी को कमज़ोर करके संविधान की मूल भावना को गहरी चोट पहुंचाई गई। यह घटना सत्ता के टॉप लेवल पर मौजूद इंस्टीट्यूशन्स की साख में गिरावट और पॉलिटिकल पावर बचाने के लिए अपनाए गए तानाशाही तरीकों का एक उदाहरण बन गई। इ

मरजेंसी के दौरान प्रेस की आज़ादी पर कड़ी पाबंदियां लगा दी गईं। इससे न सिर्फ़ पत्रकारों और ओपिनियन लीडर्स की आवाज़ दब गई, बल्कि करोड़ों नागरिकों को सच, ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी तक पहुंचने के उनके अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। यह वह दौर था जब देश की आत्मा हिल गई थी। आज़ादी के दीवानों की कुर्बानियों, कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली की ऐतिहासिक बहसों और डेमोक्रेटिक आदर्शों को किनारे कर दिया गया और पावर-सेंट्रिक और गैर-डेमोक्रेटिक सोच को प्राथमिकता दी गई। शासन के हर क्षेत्र में ऐसा लगा कि “नेशन फर्स्ट” के सिद्धांत की जगह “चेयर फर्स्ट” के सिद्धांत ने ले ली है। नागरिकों के फंडामेंटल राइट्स पर पाबंदियां लगा दी गईं। आर्टिकल 19 के तहत मिली बोलने की आज़ादी, संगठन बनाने का अधिकार और देश में कहीं भी आने-जाने की आज़ादी को एक ऑर्डर से सस्पेंड कर दिया गया। आर्टिकल 21 के तहत मिली जान और पर्सनल लिबर्टी की सुरक्षा भी लगभग खत्म कर दी गई। सबसे गंभीर बात यह थी कि नागरिकों को आर्टिकल 32 के तहत कोर्ट जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया, जिसे संविधान का “दिल और आत्मा” कहा जाता है। इसके साथ ही, मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) और डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल्स (DIR) का ज़ोरदार इस्तेमाल किया गया, जिसके तहत हज़ारों लोगों को जेल भेज दिया गया। इस तरह, भारत के डेमोक्रेटिक इतिहास के इस काले और दमनकारी दौर के निशान हर नागरिक ने किसी न किसी रूप में महसूस किए। मज़े की बात यह है कि आज उसी गांधी परिवार के वारिस राजनीतिक फ़ायदे के लिए संविधान की एक छोटी लाल कॉपी दिखाकर संविधान की रक्षा का दावा करते हैं। बीते ज़ख्मों को याद करते हुए, मोदी सरकार ने 11 जुलाई, 2024 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी करके 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया। यह दिन उन सभी लोगों की हिम्मत और योगदान को याद करने और सम्मान देने का मौका है, जिन्होंने नेशनल इमरजेंसी का विरोध किया और डेमोक्रेसी की रक्षा के लिए मज़बूती से खड़े रहे। वे दिन गए जब असहमति की आवाज़ों को दबा दिया जाता था और सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल करके समझदार लोगों की आवाज़ों को कुचल दिया जाता था। 21वीं सदी का भारत यह संदेश देता है कि हर समस्या का हल बातचीत, वाद-विवाद, बातचीत और डेमोक्रेटिक तरीकों से किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कभी ऐसी स्थिति न आए जिसमें इमरजेंसी की ज़रूरत पड़े। डेमोक्रेटिक संस्थाओं को मज़बूत करने और डेमोक्रेसी की भावना को आगे बढ़ाने का यही सही तरीका है। हर इमरजेंसी से बाहर निकलने के बाद राहत मिलती है। ऐसे मुश्किल और दर्दनाक अनुभवों पर सोचने से भविष्य के लिए ज़रूरी सबक मिलते हैं। समझदार वे हैं जो बीते हुए समय की घटनाओं पर सोचते हैं, खुद का इंट्रोस्पेक्शन करते हैं और उनसे सीखते हैं ताकि यह पक्का हो सके कि वही गलतियाँ दोबारा न हों।

आज, जब हम भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले चैप्टर को ‘संविधान हत्या दिवस’ के तौर पर याद करते हैं, तो आइए हम सभी लेवल पर संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को और मज़बूत करने का संकल्प लें। यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सही मूल्यों को अपनाना और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। तभी हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हैं और इस भारत के निर्माण में योगदान दे सकते हैं, जिसकी कल्पना सदियों पहले स्वामी विवेकानंद ने की थी। उनके शब्दों में – “हर देश का एक मकसद होता है, हर देश के पास दुनिया को देने के लिए एक संदेश होता है और हर देश के पास पूरा करने के लिए एक खास मिशन होता है।” आइए भारत का मानवीय सम्मान, विविधता में एकता, संवैधानिक मूल्यों और निस्वार्थ सेवा का संदेश 21वीं सदी की दुनिया में और ज़्यादा साफ़ और असरदार तरीके से गूंजे। अगर हम इन आदर्शों पर मज़बूती से खड़े रहते हैं, तो हम यह पक्का कर सकते हैं कि लोकतंत्र न सिर्फ़ ज़िंदा रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए और मज़बूत और समृद्ध भी हो।

(लेखक भारत सरकार में कानून और न्याय के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय मामलों के राज्य मंत्री हैं)