ब्रेकिंग न्यूज़
महंत खनौरा ने नालों की सफाई न होने पर AAP सरकार पर साधा निशाना

नाभा / सत्ता संदेश

रिपोर्ट : चेतन मेहता

बारिश का मौसम आते ही भादसों इलाके के लोगों की चिंताएं और मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। इस चिंता का मुख्य कारण इलाके से गुजरने वाले बारिश के पानी के नालों की समय पर सफाई न होना है। इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए समाजसेवी और इलाके की जानी-मानी हस्ती महंत खनौरा ने इलाके के लोगों के साथ हालात का जायजा लिया और मौजूदा आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार पर जमकर निशाना साधा।


गंदगी से भरी नहर बाढ़ को दे रही न्योता

लोगों की शिकायतों का समाधान करने पहुंचे महंत खनौरा ने तस्वीर में दिख रहे इलाके के लोगों की एक बड़ी भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि इस समय मानसून नहर के अंदर बड़ी मात्रा में जंगली घास, खरपतवार और गंदगी जमा हो गई है। अगर आने वाले दिनों में भारी बारिश हुई तो पानी की निकासी बंद होने से यह पानी भादसों के आसपास के गांवों, खेतों और रिहायशी इलाकों में घुस जाएगा, जिससे बाढ़ जैसे हालात बन सकते हैं और किसानों की फसलों समेत आम लोगों के जान-माल का भारी नुकसान होने का डर है।

विज्ञापन तक सीमित है ‘आप’ की सरकार: महंत खनोरा

महंत खनोरा ने भगवंत मान सरकार और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की कारगुजारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी सिर्फ बड़े-बड़े दावे करने और विज्ञापन तक ही सीमित रह गई है। जमीनी स्तर पर लोगों की बुनियादी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बारिश शुरू होने से पहले नालों की सफाई हो जानी चाहिए थी, लेकिन सरकार की लापरवाही के कारण अभी तक काम भी शुरू नहीं हो सका, जिससे लोग डर के साये में जी रहे हैं।

स्थानीय निवासियों ने संघर्ष की चेतावनी दी

इस मौके पर मौजूद भादसों के गणमान्य लोगों और आम लोगों ने कहा कि वे कई बार प्रशासन का दरवाजा खटखटा चुके हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले हैं। महंत खानोरा और इकट्ठा हुए लोगों ने सरकार और संबंधित विभाग को चेतावनी दी कि अगर अगले कुछ दिनों में इस बरसाती नाले की युद्ध स्तर पर सफाई नहीं की गई, तो वे प्रशासन के खिलाफ कड़ा संघर्ष और विरोध करने के लिए मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी मौजूदा सरकार और प्रशासन की होगी।


1 जुलाई से महिलाओं को मिलेगी ‘मुख्तार मंत्री मावन-ध्यान सत्कार योजना’ के तहत आर्थिक सहायता

अमृतसर / सत्ता संदेश

मुख्तार मंत्री मावन-ध्यान सत्कार योजना के तहत महिला सत्कार सखियों को मिली खास ट्रेनिंग

योग्य महिलाओं को 1 जुलाई से हर महीने आर्थिक मदद मिलेगी: हरभजन सिंह ETO

पंजाब सरकार द्वारा महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और सामाजिक सम्मान दिलाने के मकसद से शुरू की गई मुख्तार मंत्री मावन-ध्यान सत्कार योजना को ज़मीनी स्तर पर असरदार तरीके से लागू करने के लिए आज जंडियाला गुरु के इंदर फार्म में महिला सत्कार सखियों के लिए एक खास ट्रेनिंग सेशन रखा गया। ट्रेनिंग के दौरान, सखियों को स्कीम के निर्देशों, योग्यता की शर्तों, एप्लीकेशन प्रोसेस और बेनिफिशियरी के रजिस्ट्रेशन के बारे में डिटेल में जानकारी दी गई।

इस मौके पर पंजाब के पब्लिक वर्क्स मिनिस्टर हरभजन सिंह ETO खास तौर पर शामिल हुए और सखियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में पंजाब सरकार महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है और इसी उद्देश्य से यह ऐतिहासिक योजना शुरू की गई है।

उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत, योग्य सामान्य श्रेणी की महिलाओं को हर महीने 1000 रुपये और अनुसूचित जाति (SC) की योग्य महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत वित्तीय सहायता 1 जुलाई से शुरू की जाएगी।

कैबिनेट मंत्री ने कहा कि योजना को सफल बनाने के लिए सरकार द्वारा सभी आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में महिलाओं ने सार्वजनिक सेवा के लिए महिला सत्कार सखी के रूप में अपनी सेवाएं देने की इच्छा व्यक्त की थी, जिसे देखते हुए उन्हें योजना के हर पहलू पर तकनीकी और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

प्रशिक्षण के दौरान, सखियों को मास्टर ट्रेनरों और पर्यवेक्षकों द्वारा फॉर्म भरने की प्रक्रिया, पात्रता की शर्तों, आवश्यक दस्तावेजों, लाभार्थियों की पहचान और पंजीकरण प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया। सखियों को यह भी कहा गया कि वे अपने-अपने इलाकों में घर-घर जाकर योग्य महिलाओं तक स्कीम की जानकारी पहुंचाएं और उन्हें स्कीम से जोड़ने में अहम भूमिका निभाएं।

हरभजन सिंह ETO ने कहा कि पंजाब सरकार ने लोगों से किए गए वादों और गारंटियों को एक-एक करके पूरा किया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री मां-बेटी सत्कार योजना सरकार की अहम गारंटियों में से एक थी, जिसे अब लागू किया जा रहा है। इस स्कीम से महिलाओं को बड़ी फाइनेंशियल मदद मिलेगी और वे अपने परिवारों की आर्थिक मजबूती में और बेहतर तरीके से योगदान दे पाएंगी।

उन्होंने महिला सत्कार सखियों से अपील की कि वे पूरी लगन, जिम्मेदारी और समर्पण के साथ काम करें और यह पक्का करें कि स्कीम का फायदा हर योग्य महिला तक पहुंचे।

इस अवसर पर विभाग के अधिकारी, मास्टर ट्रेनर, सुपरवाइजर, महिला सत्कार सखी और बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद थीं।

पंजाब में जनगणना 2027 के मकान सूचीकरण और मकानों की गणना का चरण सफलतापूर्वक संपन्न

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

भारत की जनगणना 2027 के मकान सूचीकरण और मकानों की गणना (चरण-I) को पंजाब राज्य भर में 15 मई से 13 जून तक की अधिसूचित अवधि के दौरान सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। यह अभियान मुख्य सचिव, पंजाब के मार्गदर्शन में और स्थानीय सरकार विभाग, पंजाब के सहयोग से चलाया गया था।

इस चरण के दौरान, प्रगणकों ने राज्य भर के सभी गाँवों और शहरी वार्डों में आवंटित मकान सूचीकरण ब्लॉकों का दौरा किया और भारत सरकार के गृह मंत्रालय के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के कार्यालय, नई दिल्ली द्वारा अधिसूचित एक विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से भवन, जनगणना मकान और घरेलू आवास से संबंधित जानकारी एकत्र की, जिसमें आवास की स्थिति, घरेलू सुविधाओं की उपलब्धता और संपत्तियों के स्वामित्व जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया।

मकानों की स्थिति और घरेलू सुविधाओं पर व्यापक डेटा तैयार करने के अलावा, मकान सूचीकरण अभियान जनगणना 2027 के आगामी जनसंख्या गणना चरण-II के लिए आवश्यक रूपरेखा प्रदान करता है, जिससे सभी परिवारों और व्यक्तियों की पूर्ण कवरेज सुनिश्चित होती है।

चरण-1 का अभियान पंजाब के सभी 23 जिलों और 14 नगर निगमों में आयोजित किया गया था, जिसके लिए उपायुक्तों और निगम आयुक्तों को प्रधान जनगणना अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था। व्यवस्थित और कुशल गणना की सुविधा के लिए कुल 52,564 मकान सूचीकरण ब्लॉक बनाए गए थे और प्रगणकों को सौंपे गए थे। इसके अलावा, प्रभावी निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संख्या में पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की गई थी।

पंजाब में इस देशव्यापी अभ्यास के सफल निष्पादन के लिए व्यापक प्रशासनिक और क्षेत्र-स्तरीय व्यवस्थाएं की गई थीं।

भारत की जनगणना, जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियम, 1990 के प्रावधानों के तहत आयोजित की जाती है, जिसमें समय-समय पर संशोधन किया जाता है। पिछली जनगणना 2011 में आयोजित की गई थी। जनगणना 2027 भारत की 16वीं जनगणना होगी और स्वतंत्रता के बाद से 8वीं जनगणना होगी।

मकान सूचीकरण और मकानों की गणना के चरण के सफल समापन पर, डॉ. नवजोत खोसा, आईएएस, मुख्य प्रधान जनगणना अधिकारी एवं जनगणना संचालन निदेशक, पंजाब ने इस राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण अभ्यास में पूरे दिल से सहयोग और सक्रिय भागीदारी के लिए राज्य के सभी निवासियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया है। उन सभी चार्ज अधिकारियों, प्रशिक्षकों, पर्यवेक्षकों, प्रगणकों और अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भी सराहना की गई और उन्हें बधाई दी गई है, जिनके समर्पण और कड़ी मेहनत ने पंजाब में जनगणना 2027 के चरण-I के सफल समापन को सुनिश्चित किया।

जनगणना संगठन को जनगणना 2027 के आगामी जनसंख्या गणना चरण के दौरान भी जनता से इसी तरह के उत्साही समर्थन और सहयोग मिलने की उम्मीद है।

आंकड़ों से आपूर्ति तक: आईसीएमआर बेहतर भविष्य के लिए भारत के स्वास्थ्य अनुसंधान को नए सिरे से आकार दे रहा है

“प्रभाव अकेले किसी व्यक्ति से नहीं – बल्कि प्रणालियों के तालमेल से संभव होता है। साथ मिलकर, हम आंकड़ों से… निर्णय … और फिर प्रभाव छोड़ने तक की यात्रा पूरी करेंगे।”


अब जबकि देश ‘विकसित भारत 2047’ के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमारे सामने सवाल सिर्फ बीमारियों का इलाज करने के तरीकों का नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों का अनुमान लगा लेने वाली एक ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण का भी है जो सबके लिए न्यायसंगत और नई सोच पर आधारित हो। इस बदलाव के केन्द्र में स्वास्थ्य अनुसंधान का एक ऐसा नया दृष्टिकोण है, जो आंकड़ों (डेटा) को निर्णयों से और फिर निर्णयों को प्रभाव से जोड़ता है।


कोविड-19 महामारी से मिले कठोर अनुभवों से सीख लेते हुए, जैव-चिकित्सा अनुसंधान (बायोमेडिकल रिसर्च) की देश की शीर्ष संस्था, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए हैं। इन सुधारों में संस्थागत ढांचे को नए सिरे से तैयार करने से लेकर अनुसंधान के लिए फंड देने और उसे असरदार नतीजों में बदलने के तरीकों को ठोस बनाना शामिल है। जो प्रणाली कभी बिखरी हुई और जांचकर्ताओं की पूछताछ पर टिकी थी, वह अब तकनीक द्वारा संचालित और लक्ष्यों पर केन्द्रित एक इकोसिस्टम में बदल रही है। यह बदलाव महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है। यह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप, संस्थान-आधारित समन्वित अनुसंधान की दिशा में एक ऐसी सोची-समझी पहल को दर्शाता है, जहां विज्ञान का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान का सृजन करना नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों का समाधान करना भी है।


इस बदलाव का एक मुख्य आधार आईसीएमआर के संस्थागत ढांचे का पुनर्गठन है। हालिया सुधारों ने कई संस्थानों के दायित्वों को बढ़ाया है और उन्हें सीमित दायरे वाली इकाइयों के बजाय अंतर-विषयक केन्द्रों के रूप में नई पहचान दी है। डिजिटल हेल्थ एवं डेटा साइंस, बच्चों की सेहत, महिलाओं की सेहत, और खून व प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी बीमारियों जैसे क्षेत्रों की ओर संस्थानों का झुकाव, भारत में बीमारियों के बदलते स्वरूप और तकनीकी क्षमताओं को दर्शाता है। देश भर में – पूर्वोत्तर के डिब्रूगढ़ से लेकर पश्चिम के जोधपुर तक – क्षेत्रीय ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च’ के नेटवर्क का निर्माण एक और अहम कदम है। ये संस्थान राज्य और जिला स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ मिलकर संक्रियात्मक अनुसंधान (ऑपरेशनल रिसर्च) करेंगे, ताकि जरूरी अनुसंधान और उसके नतीजों का जमीनी स्तर पर सदुपयोग सुनिश्चित किया जा सके। ये कोई मामूली बदलाव नहीं हैं, बल्कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार विज्ञान की दिशा में एक ऐसे रणनीतिक बदलाव का संकेत हैं जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोमिक्स और रियल-टाइम डेटा सिस्टम सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े निर्णयों में अहम भूमिका निभाते हैं।


अलग-थलग रहकर काम करने के तरीके से हटकर एक आपस में जुड़े हुए राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम की दिशा में बढ़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब संस्थानों को ऐसे रिसोर्स सेंटरों के तौर पर देखा जा रहा है जो एक साझा राष्ट्रीय मिशन में योगदान दें और किसी एक स्थान पर मिले साक्ष्यों का उपयोग पूरे देश में कार्रवाई के लिए किया जाना सुनिश्चित करें। प्रणालीगत-स्तर की यह सोच एक ऐसे दौर में बेहद जरूरी है जब स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां – चाहे वे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) या महामारी या फिर गैर-संचारी रोगों से जुड़ी हों – जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। संस्थागत सुधारों के साथ-साथ, अनुसंधान से संबंधित फंडिंग इकोसिस्टम को बुनियादी तौर पर फिर से तैयार करना भी जरूरी है। फंडिंग के तरीके की दृष्टि से, आंतरिक (इंट्रा-म्यूरल) और बाह्य (एक्स्ट्रा-म्यूरल) अनुसंधान के बीच का विभाजन बिल्कुल साफ है। लेकिन साथ ही, उन्हें एक अपेक्षाकृत अधिक एकजुट और नतीजे पर केन्द्रित ढांचे के जरिए जोड़ा जाता है। आंतरिक अनुसंधान (इंट्राम्यूरल रिसर्च) अब मुख्य रूप से संस्थान की पहल पर की जाती है। यह स्पष्ट रूप से तय लक्ष्यों के अनुरूप होती है और अनुसंधान के नतीजों को असल इस्तेमाल में लाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे एक तय समय-सीमा के भीतर व्यवस्थित किया जाता है। दूसरी ओर, बाह्य अनुसंधान (एक्स्ट्रा- म्यूरल रिसर्च) को चार चरणों वाले नवाचार चक्र – विवरण, खोज, विकास और आपूर्ति – में फिर से व्यवस्थित किया गया है। इससे अच्छे विचारों को व्यवस्थित तरीके से ऐसे समाधानों में बदला जाना सुनिश्चित होता है, जिन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।


प्रयोगशाला में की गई खोज से लेकर आम लोगों तक सेवा पहुंचाने तक की यह समन्वित प्रक्रिया, परियोजनाओं को फंड देने के बजाय समाधान तैयार करने की दिशा में एक अहम बदलाव है। इसे ‘नेशनल हेल्थ रिसर्च प्रोग्राम’ (एनएचआरपी) से और मजबूती मिलती है। इस कार्यक्रम ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) एवं क्षय रोग से लेकर मानसिक स्वास्थ्य, पोषण और आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) जैसे तेरह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की है। मिशन-मोड वाले ये कार्यक्रम वैसे विविध संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए हैं, जिन्हें बड़े निवेश और असल नतीजों पर साफ फोकस का समर्थन हासिल है।


तकनीक भी परिवर्तनकारी भूमिका निभा रही है। डायग्नोस्टिक्स, निगरानी और कार्यक्रम को लागू करने की प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करने से शहरी और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के बीच लंबे समय से चली आ रही खाई को पाटने में मदद मिल रही है। जहां क्षय रोग (टीबी) और डायबिटिक रेटिनोपैथी की जांच में एआई-आधारित उपकरण पहले से ही अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मदद कर रहे हैं, वहीं एआई-संचालित पोषण संबंधी निगरानी (न्यूट्रिशनल मॉनिटरिंग) जैसे रचनात्मक कदम बड़े पैमाने पर कार्यक्रम के कार्यान्वयन को बेहतर बना रहे हैं। टीके (वैक्सीन) पहुंचाने से शुरू हुई और अब कॉर्निया जैसी जरूरी चिकित्सीय आपूर्ति सुनिश्चित करने की विस्तारित भूमिका निभाने वाली ‘आई-ड्रोन’ पहल, इस बात को दर्शाती है कि कैसे आधुनिक तकनीक भौगोलिक बाधाओं को पार करके समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा सकती है। विज्ञान के मोर्चे पर, चिकित्सा तकनीक (मेडटेक) के दायरे में हो रही प्रगति – जिसमें चिकित्सीय उपकरणों एवं डायग्नोस्टिक्स से लेकर अगली पीढ़ी के टीके और इलाज के तरीके शामिल हैं – मरीजों पर केन्द्रित और अधिक सटीक इलाज को संभव बना रही है। इसके साथ ही, नए एवं साक्ष्यों पर आधारित मॉडलों के जरिए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने की प्रक्रिया को दुनिया भर में पहचान मिल रही है। स्थानीय स्तर पर रचनात्मकता को बढ़ावा देने के कदमों से इन प्रयासों को और मजबूती मिल रही है। फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज जैसी योजनाओं के साथ-साथ मेडटेक-मित्र; और;मेडिकल इनोवेशन-पेटेंट मित्र; जैसे प्लेटफॉर्म, अनुसंधान से लेकर व्यावसायीकरण तक की यात्रा को गति दे रहे हैं। इससे सरकारी फंडिंग से होने वाली वैज्ञानिक प्रगति का लोगों के लिए सस्ती एवं आसानी से उपलब्ध होने वाली तकनीक में बदल जाना सुनिश्चित हो रहा है।


हालांकि, इन सुधारों की असली परख जन-स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव से होती है। ‘इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव’ जैसी पहलों ने यह दिखाया है कि साक्ष्यों पर आधारित रणनीतियां कैसे बड़े पैमाने पर पुरानी बीमारियों के प्रबंधन में बदलाव ला सकती हैं। आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) के क्षेत्र में मिशन-मोड प्रोग्राम, जिनमें मोबाइल स्ट्रोक यूनिट और तेजी से काम करने वाले कार्डियक रिस्पॉन्स सिस्टम शामिल हैं, जानलेवा स्थितियों में इलाज के नतीजों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। डायग्नोस्टिक नेटवर्क का विस्तार और स्वदेशी तकनीकें, कैंसर से लेकर संक्रामक बीमारियों के प्रकोप तक की विभिन्न बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और उनके इलाज की प्रक्रिया को बेहतर बना रही हैं। ये कोशिशें ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ के अनुरूप हैं, जो बीमारी से बचाव और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने और अच्छी गुणवत्ता वाली देखभाल पर जोर देती हैं। ये समानता के प्रति एक व्यापक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती हैं ताकि वैज्ञानिक प्रगति का लाभ इलाके या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बंधनों से परे हर नागरिक तक पहुंचे। भविष्य की ओर देखते हुए, हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। आईसीएमआर एक उत्प्रेरक के तौर पर काम करना जारी रखेगा और एक मजबूत व तेजी से सक्रिय होना वाला स्वास्थ्य इकोसिस्टम बनाने हेतु अनुसंधानकर्ताओं, डॉक्टरों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत को एक मंच पर लाएगा। वर्ष 2047 का रोडमैप डिजिटल हेल्थ, बायो-मैन्यूफैक्चरिंग और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के क्षेत्र में हुई प्रगति से तय होगा, जिसमें क्षमता विकास और वैश्विक सहयोग पर खास जोर दिया जाएगा।


यह समझना जरूरी है कि स्वास्थ्य अनुसंधान कोई अलग-थलग रहकर किया जाने वाला काम नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास है। आईसीएमआर में हो रहा बदलाव सभी हितधारकों को इस यात्रा में शामिल होने, मिलकर समाधान तैयार करने और यह सुनिश्चित करने का एक न्योता है कि विज्ञान सबसे सार्थक तरीके से समाज की सेवा करे। स्वास्थ्य अनुसंधान प्रणाली में सुधार अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह वह नींव है जिस पर एक स्वस्थ, अधिक न्यायसंगत और अधिक सुदृढ़ भारत का निर्माण होगा – एक ऐसा भारत जहां हर खोज का लाभ लोगों तक पहुंचेगा और हर नए कदम का प्रभाव वास्तव में दिखाई देगा।


(लेखक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक हैं)

भारत का सांस्कृतिक पुनरोद्धार काल : गजेन्द्र सिंह शेखावत

भारत आज विकास के विभिन्न आयामों में तेज गति से प्रगति कर रहा है। अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, ऊर्जा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्रीय सुरक्षा, विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है। भौतिक प्रगति के इन आयामों में आगे बढ़ते हुए यह भी आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति, इतिहास, धरोहर और विरासत को विस्मृत ना करें। भारत विश्व की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में से एक है, शताब्दियों तक विदेशी आक्रांताओं के साथ चले संघर्ष में देश में राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन आता रहा, लेकिन भारत अपनी संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सफलतापूर्वक स्थानांतरित करता रहा। इन वर्षों में हुई राजनीतिक उथल पुथल में हमारे अनेक उपासना स्थल, ग्रंथ, पुस्तकालय, विश्वविद्यालयों का विध्वंस किया गया, लेकिन हमारी संस्कृति और परंपराएं फिर भी जीवित रहीं। सांस्कृतिक भारत पर दूसरी चोट हमारी शिक्षा पद्धति को बदलने से हुई, जिसके द्वारा हमारे अंतर्मन में अपनी संस्कृति के प्रति हीन भावना उत्पन्न करने के प्रयास हुए।
वर्ष 2014 से भारत ने आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के साथ साथ सांस्कृतिक रूप से भी एक बड़ी करवट ली, जिसे हम संस्कृति के पुनरोद्धार के आरंभ का वर्ष भी कह सकते हैं। सांस्कृतिक भारत आज अपने गौरवशाली अतीत को पुनः स्मरण करते हुए उसके वैभव, उसकी भव्यता को ना सिर्फ पुनर्स्थापित कर रहा है, बल्कि सामाजिक जीवन में भी वह संस्कृति पुनः स्थापित हो रही है। आज हमारे उत्सव, प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक, खान-पान, वस्त्र, कला, नृत्य, संगीत, शास्त्र, शिल्प वैश्विक आकर्षण के केंद्र बन रहे हैं।

भारतीय संस्कृति की बढ़ती स्वीकार्यता

पिछले 12 वर्षों में विश्व में भारतीय संस्कृति की स्वीकार्यता बढ़ी है। आज पूरा विश्व 21 जून को योग दिवस मना रहा है। ये सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम नहीं, अपितु यह प्राचीन भारतीय दर्शन हैस जिसे विश्व ने मान्यता दी। मानव जीवन में उसकी उपयोगिता को देखते हुए उसे अपनाया। आज विश्व के अनेक देशों से हमारी धरोहरें वापस देश में लौटीं हैं, जिनकी संख्या भी एक रोचक तथ्य है। वर्ष 2013 से पूर्व मात्र 13 धरोहरों को विदेशों से भारत लाया गया था, जबकि पिछले 12 वर्षों में 640 से अधिक धरोहरें विदेशों से भारत लौटी हैं। ये दर्शाता है कि संस्कृति में सिर्फ परंपराएं ही नहीं, अपितु संस्कृति के प्रतीक चिह्नों को वापस लाने के प्रति भी हमने गंभीरता दिखाई है। ये प्रतीक चिह्न हमारे लिए गौरव का विषय हैं, जो हमारे पूर्वजों की कला, शिल्प और विभिन्न विषयों के ज्ञान की निशानियां हैं, जिनसे हमें प्रेरणा मिलती है। दुर्गा पूजा और दीपावली जैसे हमारे सामाजिक उत्सवों को यूनेस्को ने विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है। यह मान्यता मात्र उत्सवों को ही नहीं, अपितु इनके पीछे छुपे उन संदेशों को भी मिली है, जो बताती है कि असत्य पर सदैव सत्य की विजय होती है, बुराई हमेशा अच्छाई से पराजित होती है। हमारे प्राचीन इतिहास को भी आज यूनेस्को ने स्वीकारा है। उसका प्रमाण है कि भारत 44 विश्व धरोहर स्थलों के साथ ही विश्व में छटे और एशिया में दूसरे स्थान पर है। यह धरोहरें हमारी विरासत की प्रतीक हैं, जिन्हें देखकर भारतीयों को अपनी संस्कृति और इतिहास का परिचय मिलता है और उस पर गर्व होता है।

भूले और बिखरे ज्ञान का पुनर्संकलन

भारत एक लंबे समय तक विदेशी आक्रांताओं के साथ संघर्षरत रहा है। ज्ञान और संस्कृति का सम्मान ना करने वाले इन विदेशी आक्रमणकारियों ने देश के ज्ञान की अमूल्य विरासत रहे हमारे विश्वविद्यालय, गुरुकुल और पांडुलिपियों में लिखित ज्ञान को नष्ट करने के प्रयास किए। एक लंबे कालखंड में हमारी ज्ञान परंपरा की अमूल्य निधि पांडुलिपियां विभिन्न मठों, मंदिरों, संस्थानों और घरों में संरक्षित की गईं, जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया। ये दुःख का विषय है कि स्वतंत्रता के बाद भी इन्हें संकलित कर प्राचीन ज्ञान को पुनः प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

आज संपूर्ण देश में ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के तहत इन पांडुलिपियों को सूचीबद्ध किया जा रहा है। यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि समस्त भारत से अब तक 88 लाख से अधिक पांडुलिपियां प्राप्त हो चुकी हैं। इस ज्ञान को संकलित करने के साथ ही इन्हें आधुनिकतम तकनीक के साथ डिजिटाइज किया जा रहा है। इनमें लिखित ज्ञान को संरक्षित और सुरक्षित करने के लिए ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) सहित विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। आने वाले समय में यह संकलन हमारी भावी पीढ़ियों को अध्यात्म, विज्ञान, कला, शिल्प जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय प्राचीन ज्ञान और उसकी उत्कृष्टता से परिचित कराएगा और उस पर गर्व करने को प्रेरित करेगा।

संस्कृति के प्रतीक चिह्नों का पुनरोत्थान

भारत के मंदिर, किले, मेले, ऐतिहासिक धरोहर स्थल हमारी गौरवशाली संस्कृति और इतिहास के प्रतीक चिह्न हैं। यह दुःख का विषय है कि स्वतंत्रता के बाद से भारत के इन सांस्कृतिक स्थलों की उपेक्षा की गई। कुछ ही स्मारकों का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार किया गया। यह मंदिर भारत की विविधता भरी संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ कर रखते हैं। देश के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल वर्षों से उपेक्षा और अव्यवस्था का शिकार रहे। पिछले 12 वर्षों में इन स्थलों का कायाकल्प किया गया है। आज भारत में देश की प्राचीन संस्कृति के वाहक रहे काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक कॉरिडोर, केदारनाथ, सोमनाथ सहित विभिन्न मंदिरों और तीर्थनगरियों का व्यापक विकास किया गया है, श्रद्धालुओं के लिए वहां सुविधाएं विकसित की गई हैं, जिससे आध्यात्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति जागरुकता भी आई। आज इन स्थानों पर आने वाले युवाओं की बढ़ती संख्या भारतीय संस्कृति के पुनरोत्थान का प्रतीक है। इन स्थानों के विकास और यहां की यात्राओं से युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का एहसास बढ़ा है।


विरासत भी, विकास भी

आज हमारी संस्कृति के प्रतीक चिह्न हमारे धार्मिक स्थल, मंदिर, धार्मिक मेले स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं। आध्यात्मिक पर्यटन बढ़ने से स्थानीय इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के साथ ही इन नगरों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे लोगों की जीवनशैली में व्यापक सुधार हुआ है। आज ऋषिकेश, अयोध्या, प्रयागराज, काशी सहित भारत के विभिन्न आध्यात्मिक नगरों में विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में भारतीय संस्कृति को जानने और समझने के लिए आ रहे हैं। भारतीय संस्कृति की व्यापकता से अभिभूत हो रहे हैं। इससे ना सिर्फ भारत की संस्कृति को प्रचार प्रसार मिल रहा है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंच रहा है।


जड़ों से जुड़ता भारत

आज भारत अपनी प्राचीन विरासत पर गर्व करते हुए आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। आज भारत भूली बिसरा दी गई अपनी संस्कृति के पुनर्जागरण का एक नया अध्याय लिख रहा है। अनेक शताब्दियों तक संघर्ष में उलझा रहा भारत एक नई करवट के साथ आज अपनी पुरानी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित कर रहा है। भारत आज विश्व को बता रहा है कि कैसे प्राचीन परंपरा और संस्कृति के साथ आधुनिकता को अपनाया जा सकता है, आने वाला समय नए भारत का है। भविष्य में भारत का विचार, भारत का दर्शन, भारत की संस्कृति विश्व को नई दिशा देने जा रही है।

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार है)

लुधियाना में “जरनैल सिंह आर्टिस्ट सिमरती ग्रंथ” का पब्लिक डेडिकेशन

लुधियाना / सत्ता संदेश

दुनिया भर में मशहूर पंजाबी लोक कला पेंटर “जरनैल सिंह आर्टिस्ट” की याद में, जिन्होंने सिख इतिहास को अलग-अलग पेंटिंग और दीवारों पर बनी पेंटिंग में सहेजा है, वैंकूवर विचार मंच द्वारा तैयार किया गया और चेतना प्रकाशन लुधियाना द्वारा बहुत ही खूबसूरत रूप में पेश किया गया पब्लिकेशन, उनके जन्मदिन पर गुजरांवाला गुरु नानक खालसा कॉलेज सिविल लाइंस लुधियाना में गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर डॉ. एस. पी. सिंह, शहीद-ए-आजम स. भगत सिंह के भतीजे प्रो. जगमोहन सिंह, पंजाबी लोक विरासत अकादमी के चेयरमैन प्रो. गुरभजन सिंह गिल, गुजरांवाला खालसा एजुकेशन काउंसिल के ऑनरेरी सेक्रेटरी स. हरशरण सिंह नरूला, डॉ. लखविंदर जोहल, मंदीप कौर भामरा, कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. राजिंदर कौर मल्होत्रा, पब्लिशर सतीश गुलाटी और इस मेमोरियल के एडिटोरियल बोर्ड द्वारा भेंट किया गया। किताब को चीफ सरदार जरनैल सिंह सेखा के बेटे नवनीत सिंह सेखा ने लोगों को समर्पित किया।
इस यादगार किताब को जरनैल सिंह सेखा, मोहन गिल, हरदम सिंह मान, अंग्रेज सिंह बराड़ और जकनैल सिंह की बेटी नीति सिंह ने एडिट किया है।
पंजाबी लोक विरासत अकादमी लुधियाना के चेयरमैन प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने जरनैल सिंह आर्टिस्ट के बारे में जानकारी देते हुए मीडिया को बताया कि जरनैल सिंह आर्टिस्ट से मेरा जुड़ाव 1983 में डॉ. आतम हमराही जी से हुआ था, जब वे पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में अपनी पहली आर्ट एग्जीबिशन लगाने आए थे। उन्होंने सिख विरासत और पंजाबी कल्चर की अपनी पेंटिंग्स से पूरी दुनिया में नाम कमाया। उन्होंने पंजाब की रिच विरासत को बचाने में 40 साल से ज़्यादा बिताए। उनकी पत्नी बलजीत कौर और बेटी नीति कौर ने भी आर्ट के फील्ड में अनोखा नाम कमाया है। इंटरनेशनल लेवल पर मशहूर पेंटर एस. किरपाल सिंह का घर 12 जून 1956 को जन्मे इस आर्टिस्ट ने 10 साल की उम्र में पेंटिंग शुरू कर दी थी। वे साल 2000 में इंडिया से कनाडा चले गए थे और अपनी कला दिखाने के लिए सरे में रह रहे थे।
पेंटिंग के साथ-साथ उन्होंने एक राइटर के तौर पर “पंजाबी चित्रकार” नाम की वर्कबुक भी लिखी।
चंडीगढ़ के अलावा, इंडिया में रहने के दौरान जरनैल सिंह आर्टिस्ट की एक्टिविटीज़ का सेंटर लुधियाना रहा है। एस. जरनैल सिंह आर्टिस्ट के इस कॉलेज और इसके एडमिनिस्ट्रेटर्स से बहुत करीबी रिश्ते थे। इस कार्यक्रम में डॉ. लखविंदर सिंह जोहल, सुरिंदर रामपुरी, गुरदयाल दलाल, तेलू राम कोहरा, दीप दिलबर, राजदीप सिंह तूर, पंजाबी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष सहजप्रीत सिंह मांगट, जिला भाषा अधिकारी लुधियाना डॉ. संदीप शर्मा, लेखक संघ रामपुर के पूर्व अध्यक्ष अनिल फतेहगढ़ जट्टां, पंजाबी साहित्य सभा भैणी साहिब के अध्यक्ष स. गुरसेवक सिंह ढिल्लों तरन सिंह बल, अजैब चित्कर के बेटे सुखपाल सिंह, सेवानिवृत्त प्रिंसिपल परमजीत सिंह ग्रेवाल, मंदीप कौर भामरा, प्रो. अमनजीत कौर, दीप जगदीप सिंह, प्रो. मनीषा शर्मा, स. अवतार सिंह मोगा और राजिंदर सिंह संधू मौजूद थे। डॉ. मंदीप कौर रंधावा ने मंच का संचालन किया जबकि कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. राजिंदर कौर मल्होत्रा ​​​​ने मेहमानों और लेखकों का धन्यवाद किया।