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कैबिनेट ने NIIF में ₹30,000 करोड़ के अतिरिक्त निवेश को मंजूरी, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को मिलेगी रफ्तार

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रों में भारत की निवेश प्रतिबद्धता को और मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले सप्ताह राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष (एनआईआईएफ) के नए और आगामी कोषों के लिए भारत सरकार की ओर से ₹30,000 करोड़ की अतिरिक्त निवेश प्रतिबद्धता को मंजूरी दी। इससे एनआईआईएफ के लिए भारत सरकार की कुल प्रतिबद्धता ₹60,000 करोड़ हो गई।

राष्ट्रीय निवेश एवं अवसंरचना कोष (एनआईआईएफ) भारत का संप्रभु-आधारित कोष है, जिसका संचालन और प्रबंधन नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड लिमिटेड (एनआईआईएफएल) की ओर से पेशेवर तरीके से किया जाता है। भारत सरकार एनआईआईएफ में 49% शेयरधारक है और वर्तमान में यह अपने कोषों और निवेश रणनीतियों में लगभग ₹40,000 करोड़ की पूंजी प्रतिबद्धता का प्रबंधन करती है। एनआईआईएफ ने पूंजी के इस्तेमाल और प्राप्ति में एक मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड दिखाया है, और बड़े पोर्टफोलियो से बाहर निकलने के माध्यम से निवेशकों को लगभग ₹12,000 करोड़ लौटाए हैं।

एनआईआईएफ ने प्रमुख संस्थागत निवेशकों से पूंजी जुटाई है, जिनमें सॉवरेन वेल्थ फंड, पेंशन फंड, बहुपक्षीय विकास और अग्रणी घरेलू वित्तीय संस्थान शामिल हैं। इनमें अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी, ऑस्ट्रेलियनसुपर, सीपीपी इन्वेस्टमेंट्स, ओंटारियो टीचर्स पेंशन प्लान, पीएसपी इन्वेस्टमेंट्स, टेमासेक, एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, न्यू डेवलपमेंट बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक, जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन, यूएस इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी ग्रुप, आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा लाइफ इंश्योरेंस और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया शामिल हैं।

ये निवेशक ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई भौगोलिक क्षेत्रों से आते हैं, जो भारत की विकास यात्रा और एनआईआईएफ के शासन और वाणिज्यिक ट्रैक रिकॉर्ड में मजबूत अंतरराष्ट्रीय विश्वास को प्रतिबिंबित करता है।

भारत-जापान व्यापार गलियारे में एनआईआईएफ की चार परिचालन निवेश रणनीतियों – इंफ्रास्ट्रक्चर, निजी बाजार, विकास इक्विटी और जलवायु निवेश – ने निवेश में विशेष गति हासिल की है।

एनआईआईएफ का पहला इंफ्रास्ट्रक्चर कोष, ₹16000 करोड़ के कोष के साथ, भारत का सबसे बड़ा घरेलू इंफ्रास्ट्रक्चर कोष है और इसने परिवहन (सड़कें, बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स, और हवाई अड्डे), ऊर्जा (नवीकरणीय ऊर्जा, स्मार्ट मीटर और विद्युत पारेषण) और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में प्लेटफॉर्म स्थापित किए हैं। इसके निजी बाजार कोष ने स्वदेशी प्रबंधकों की ओर से प्रबंधित कई सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर कोषों में निवेश किया है, जिन्होंने जलवायु, किफायती आवास, किफायती स्वास्थ्य सेवा और वेंचर कैपिटल (वीसी)/ प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में निवेश किया है। एनआईआईएफ के रणनीतिक अवसर कोष ने वित्तीय सेवाओं, स्वास्थ्य सेवा और विनिर्माण जैसे विकास क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है। एनआईआईएफ का भारत-जापान कोष इसका पहला द्विपक्षीय कोष है और यह जलवायु और चक्रीय अर्थव्यवस्था तथा ऊर्जा परिवर्तन पर, साथ ही भारत-जापान व्यापार गलियारे को बढ़ावा देने वाले निवेशों पर भी, ध्यान केंद्रित करता है।

एनआईआईएफ की ओर से प्रबंधित निधियों ने सामूहिक आधार पर परिवहन, ऊर्जा परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रिक गाड़ियों से आवागमन, किफायती आवास, विनिर्माण और प्रौद्योगिकी सहित प्रमुख क्षेत्रों में कई भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पूंजी का निवेश किया है। ये निवेश गति शक्ति, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, सीओपी प्रतिबद्धताओं और एफएएमई और पीएम ई-ड्राइव जैसी प्रमुख योजनाओं जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हैं।

एनआईआईएफ एक रणनीतिक सलाहकार की भूमिका भी निभाता है, जो केंद्र सरकार के विभागों और राज्य संस्थाओं को नई पीपीपी पहलों और निवेश विचारों पर सहायता प्रदान करता है जो निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा दे सकते हैं। इसमें समुद्री विकास कोष और अनुसंधान विकास एवं नवाचार कोष की संरचना जैसी पहलों पर सलाहकार और नीतिगत सहायता, मुद्रीकरण और पीपीपी संरचनाओं पर सरकारी अधिकारियों के साथ सहयोग, और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप अन्य क्षेत्र-विशिष्ट निवेश ढांचों पर सलाह शामिल है।

भारत में अतिरिक्त निजी पूंजी लाने और भारत की विकास यात्रा में योगदान देने में एनआईआईएफ की ओर से वर्षों से निभाई गई भूमिका को मान्यता देते हुए, भारत सरकार की इस अतिरिक्त प्रतिबद्धता से परिवहन, ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना, शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, ई-मोबिलिटी और अन्य राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहन की उम्मीद है।

भारत सरकार की ओर से एनआईआईएफ में किए गए ₹30,000 करोड़ के इस अतिरिक्त निवेश का इस्तेमाल एनआईआईएफ के दूसरे अवसंरचना केंद्रित कोष की स्थापना के लिए किया जाएगा, जो इस उद्देश्य के साथ स्थापित इसके पहले प्रमुख कोष का उत्तराधिकारी होगा। एनआईआईएफ अवसंरचना कोष द्वितीय का लक्ष्य कोष लगभग ₹30,000 करोड़ प्रस्तावित है और इससे परिवहन, ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और शहरी अवसंरचना तथा ई-गतिशीलता जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश किए जाने की उम्मीद है। यह आवंटन एनआईआईएफ की नई कोष रणनीतियों और इसके उत्तराधिकारी द्विपक्षीय एवं अन्य रणनीतिक कोषों को भी सहयोग देगा।

वर्तमान सरकारी आवंटन से अंतर्निहित परिसंपत्तियों और पोर्टफोलियो कंपनियों में निवेश के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर उत्प्रेरक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, रोजगार निर्माण (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों) और राष्ट्रीय महत्व के प्रमुख क्षेत्रों के विकास को बढ़ावा मिलेगा, इस प्रकार आत्मनिर्भरता और 2047 तक विकसित भारत बनने की दिशा में देश की यात्रा को सहयोग मिलेगा।

आकांक्षाओं का गणित: भारत में रोजगार का सवाल अब स्थिरता पर क्यों निर्भर है

जब 1954 में सर आर्थर लुईस ने गरीब अर्थव्यवस्थाओं के अमीर बनने की परिघटना को समझाने का काम शुरू किया, तो उन्होंने विकास की मुख्य प्रक्रिया को पूंजी के संचय के रूप में नहीं बल्कि कामगारों के जीवन-निर्वाह वाली खेती से हटकर अधिक कमाई वाले उद्योगों एवं
सेवा क्षेत्रों की ओर मुड़ने के तौर पर पहचाना। उनका यह अनुमान बिल्कुल ही सही था कि यही बदलाव देर से औद्योगीकरण करने वाले हर देश का भविष्य तय करेगा। आज भारत ठीक इसी मोड़ पर खड़ा है और नीति-निर्माताओं के सामने सवाल पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध कराने भर का नहीं है। बल्कि, उनके सामने इससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसी नौकरियां पैदा करने की स्थिति में है या नहीं जो पर्याप्त तादाद में हों, औपचारिक हों और एक युवा कामगार को जीवन भर बढ़ती उत्पादकता एवं सुरक्षा दे सकने लायक टिकाऊ हों।

इस जिम्मेदारी के भार को काफी सटीकता से बताया जा सकता है। ‘आर्थिक समीक्षा 2023-24’ ने ‘आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे)’ और आबादी से जुड़े अनुमानों के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि इस दशक की बाकी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को हर वर्ष लगभग 78.5 लाख गैर-कृषि नौकरियां सृजित करनी होंगी। यह आंकड़ा दो बढ़ते दबावों का नतीजा है: पहला, कामकाज के क्षेत्र में लोगों की भागीदारी बढ़ने के साथ श्रमशक्ति में हो रही लगातार बढ़ोतरी; और दूसरा, संरचनात्मक बदलाव के कारण खेती से बाहर आने वाले
कामगार। रोजगार में खेती की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 46 प्रतिशत है। वर्ष 2047 तक इस हिस्सेदारी के घटकर एक-चौथाई तक आ जाने की संभावना है।

जुलाई 2025 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई और उसके अगले महीने से शुरू हुई ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना’ उस अंतर को पाटने की अब तक की सबसे सोची- समझी कोशिश है। इस योजना के तहत, जुलाई 2027 तक की दो वर्षों की अवधि में 3.5 करोड़ से अधिक औपचारिक नौकरियां सृजित करने हेतु ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ)’ के जरिए 99,446 करोड़ रुपये लगाए जा रहे हैं। ईपीएफओ में पंजीकृत किसी कंपनी में पहली बार शामिल होने वाला और महीने में एक लाख रुपये से कम कमाने वाला कामगार, दो किस्तों
में कुल 15,000 रुपये तक पाने का हकदार बन जाता है। दूसरी किस्त वित्तीय साक्षरता पाठ्यक्रम (फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स) करने पर और बचत (सेविंग्स) के तौर पर मिलती है। वहीं, निर्धारित आधार-रेखा (बेसलाइन) से अधिक लोगों को नौकरी पर रखने वाले नियोक्ताओं को हर नए कामगार के लिए महीने में 3,000 रुपये तक मिलते हैं। ये शर्तें कुछ इस तरह तय की गई हैं कि छोटी कंपनियां भी इसके दायरे से बाहर हो जाने के बजाय इसमें शामिल हो सकें।

यह योजना भर्ती संबंधी सब्सिडी वाले आम व निराशाजनक तरीकों से इसलिए अलग और बेहतर है क्योंकि इसमें पहला लाभ मिलने से पहले छह महीने तक लगातार नौकरी करना आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहली बार काम करने वाले को नौकरी पर रखने का लाभ तभी मिलता है जब वह कर्मचारी काम में कुशल बन जाए और टिका रहे। यह शर्त शुरुआती भर्ती को एक पक्की प्रतिबद्धता में बदल देती है, जिससे नियोक्ता को प्रशिक्षण की लागत वसूलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और कर्मचारी को भी उतने महीने मिल जाते हैं जिनमें वह असली हुनर सीख सके ​​और भरोसेमंद रिकॉर्ड बना सके। इस तरह, यह योजना केवल नौकरी देने के लिए नहीं बल्कि कर्मचारी को बनाए रखने की अपेक्षाकृत अधिक कठिन प्रक्रिया के लिए पुरस्कृत करती है और इसके बाद कर्मचारी के पास रोजगार क्षमता एक ऐसा ट्रैक रिकॉर्ड होता है जिसका वह कहीं भी सदुपयोग कर सकता है।

इस योजना का सबसे अधिक झुकाव मैन्यूफैक्चरिंग की ओर है, जहां नियोक्ता को मिलने वाला प्रोत्साहन दो वर्ष के बजाय चार वर्ष तक मिलता है। समय-सीमा को दोगुनी करने का यह निर्णय औद्योगिक क्षमता तैयार होने में लगने वाले अधिक समय को ध्यान में रखकर लिया गया है। साथ ही, इससे निर्माता (मैन्यूफैक्चरर) समय से पहले स्वचालित व्यवस्था (ऑटोमेशन) लाकर कामगारों को हटाने के बजाय श्रमशक्ति बढ़ाने की ओर प्रेरित होते हैं। अहम बात यह है कि सरकार ने इसे देश को वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग केन्द्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करने की दृष्टि से जरूरी माना है। ईपीएफओ ​​के जरिए, हर नए कामगार को एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर मिलता है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा का पहली बार अहसास होता है। अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले बहुत कम कामगारों को यह सुरक्षा मिल पाती है। इस योजना के शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं। इसके शुरू होने के बाद से लगभग 60 लाख नए कर्मचारी नामांकित हुए हैं। इनमें से अधिकतर 30 वर्ष से कम आयु के हैं और 18 लाख से अधिक महिलाएं हैं। वहीं, लगभग 1.77 लाख प्रतिष्ठानों ने 66 लाख से अधिक रोजगार के अवसर सृजित किए हैं। इन प्रतिष्ठानों में कई ऐसी छोटी कंपनियां शामिल हैं, जहां लंबे समय से अनौपचारिक काम का बोलबाला रहा है।

हालांकि, एक अच्छी शुरुआत को पूरी तरह से सफल बदलाव मान लेना नासमझी होगी। इस योजना में धोखाधड़ी में शामिल कंपनियों को बाहर रखने, हर छह महीने में इलेक्ट्रॉनिक रिटर्न के जरिए यह सुनिश्चित करना कि नौकरी सिर्फ कागजों के बजाय असल में बनी हुई है और भुगतान की स्वचालित प्रणाली जैसी कई अच्छी बातें हैं। ये सभी खूबियां इस बात को दर्शाती हैं कि योजनाकारों को इस बात का अहसास है कि ऐसी योजना में उन भर्तियों को लाभ नहीं मिलना चाहिए जो अन्यथा भी हो जातीं। इसकी असली सफलता पहले वर्ष में नामांकित लोगों के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से पता चलेगी कि वे नौकरियां उस प्रोत्साहन के समाप्त होने के बाद भी बनी रहती हैं या नहीं और इससे पैदा होने वाली मांग को पूरा करने के लिए काम के लायक युवा मौजूद हैं या नहीं। इसीलिए, इस योजना की सफलता कौशल को सिखाने में किए जा रहे निवेश से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।

यह याद रखना ज़रूरी है कि बेरोजगारी सिर्फ आमदनी से ही वंचित नहीं करती, बल्कि यह लोगों के हुनर, आत्म-सम्मान और समाज में उनकी हैसियत को भी कमजोर करती है। वोल्टेयर ने भी यही बात कही थी जब उन्होंने कैंडिड के जरिए यह निष्कर्ष दिया था कि काम करने से तीन बड़ी समस्याएं – बोरियत, बुराई और अभाव – दूर रहती हैं। इस तरह की योजना की अहमियत इसलिए है क्योंकि यह रोजगार के सही और संपूर्ण मतलब को समझती है। यह औपचारिक नौकरी को सिर्फ गिनती के आंकड़े के तौर पर नहीं, बल्कि कामकाजी जीवन की पहली सुरक्षित
सीढ़ी के तौर पर देखती है। अब जबकि भारत 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है, तो चुनौती इस बात की है कि इस योजना में दिखाई गई धैर्य की भावना को बनाए रखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि युवाओं को सार्थक रोजगार, जिसे प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय परियोजना के केन्द्र में रखा है, कुछ समय के प्रोत्साहन तक सीमित रहने के बजाय एक पूरी पीढ़ी के लिए टिकाऊ, उत्पादक और सम्मानजनक काम के रूप में मिले।

(लेखक भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)

दक्षिण एशिया में रोजगार और विकास की नई राह बनेगा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र: विश्व बैंक

कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रणालियों में निवेश से खुलेंगे आर्थिक विकास के नए अवसर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

विश्व बैंक समूह ने कहा है कि दक्षिण एशिया अपने विकास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां हर वर्ष लाखों युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में स्थायी और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन गया है। विश्व बैंक के अनुसार कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और मूल्यवर्धन आधारित खाद्य प्रणालियों का विस्तार रोजगार, निवेश, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के व्यापक अवसर प्रदान कर सकता है।

विश्व बैंक समूह ने बताया कि दक्षिण एशिया का कृषि क्षेत्र सालाना 700 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का है और क्षेत्र के लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है। इसके बावजूद कृषि का क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 16 प्रतिशत है। चिंता की बात यह है कि क्षेत्र में उत्पादित कुल खाद्य पदार्थों का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हर वर्ष बर्बाद हो जाता है, जो लगभग 30 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है।

विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि परिवर्तन का अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग, सप्लाई चेन, विपणन और मूल्यवर्धन गतिविधियों के विस्तार से लाखों नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। इससे खाद्य हानि कम होगी और किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 1950-51 के 51 मिलियन टन से बढ़कर आज 330 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। वहीं पिछले दशक में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात लगभग 4.9 बिलियन डॉलर से बढ़कर 10 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। वर्तमान में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के विनिर्माण मूल्यवर्धन में लगभग 9 प्रतिशत और कुल निर्यात में करीब 13 प्रतिशत योगदान दे रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि प्रभावी नीतियां और लक्षित निवेश कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को बदल सकते हैं। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकरण योजना और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना जैसी पहलों ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विश्व बैंक समूह ने कहा कि तीव्र शहरीकरण, बढ़ता मध्यम वर्ग, समृद्ध कृषि जैव-विविधता और सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग दक्षिण एशिया को खाद्य प्रणालियों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए विश्व बैंक समूह एग्रीकनेक्ट और सैपलिंग जैसी पहलों पर काम कर रहा है। एग्रीकनेक्ट का उद्देश्य वर्ष 2030 तक 3 करोड़ किसानों को बाजारों से जोड़ना है, जबकि सैपलिंग सरकारों, निवेशकों, उद्योग जगत और विकास साझेदारों को एक मंच पर लाकर नीति सुधारों और निवेश को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।

नीति संवाद में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स हब, प्रोसेसिंग क्लस्टर और कृषि-औद्योगिक पार्कों में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही डिजिटल तकनीकों के उपयोग, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करने और कौशल विकास कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता भी बताई गई।

यह विचार दो दिवसीय क्षेत्रीय उच्च स्तरीय नीति संवाद मूल्य को उजागर करना: दक्षिण एशिया में रोजगार सृजन और सतत विकास के लिए खाद्य प्रसंस्करण को आगे बढ़ाना” के उद्घाटन अवसर पर सामने आए। इस कार्यक्रम का आयोजन 9 जून 2026 को अहमदाबाद, गुजरात में भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और विश्व बैंक समूह की सैपलिंग पहल के सहयोग से किया गया।

कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, उद्योगपतियों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स, निवेशकों और दक्षिण एशियाई देशों के प्रतिनिधियों सहित लगभग 200 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं, जो क्षेत्र में मजबूत, समावेशी और दीर्घकालिक खाद्य प्रणालियों के निर्माण पर चर्चा कर रहे हैं।

आरबीआई का बही-खाता 20.6 प्रतिशत बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, सोना और निवेश बने प्रमुख कारण

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India का बही-खाता (बैलेंस शीट) वित्त वर्ष 2025-26 में 20.6 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि के साथ 91.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। केंद्रीय बैंक की शुक्रवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।

रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई के बही-खाते का आकार 31 मार्च 2025 को 76,25,421.93 करोड़ रुपये था, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 91,97,121.08 करोड़ रुपये हो गया। इस प्रकार एक वर्ष में इसमें 15,71,699.15 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

केंद्रीय बैंक ने बताया कि इस वृद्धि के पीछे घरेलू निवेश, सोने के भंडार और विदेशी निवेश में हुई बढ़ोतरी प्रमुख कारण रहे। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच सोने में निवेश और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्य में बढ़ोतरी ने आरबीआई की कुल संपत्ति को मजबूत किया।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट उसकी वित्तीय क्षमता, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक स्थिरता का महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है। आरबीआई की बैलेंस शीट में यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि भारत की वित्तीय प्रणाली और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्थिति में हैं।

आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि केंद्रीय बैंक ने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए विभिन्न नीतिगत कदम जारी रखे। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सोने के भंडार में वृद्धि केंद्रीय बैंकों की वैश्विक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है, क्योंकि इसे आर्थिक अनिश्चितता के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है। भारत सहित कई देशों के केंद्रीय बैंक हाल के वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार को लगातार बढ़ा रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि विदेशी निवेश और घरेलू परिसंपत्तियों के मूल्य में सुधार से आरबीआई की आय और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार, आरबीआई की मजबूत बैलेंस शीट देश की बैंकिंग और मौद्रिक प्रणाली के लिए भरोसे का संकेत है। इससे वित्तीय बाजारों में स्थिरता और निवेशकों का विश्वास बनाए रखने में मदद मिलती है।

फिलहाल आर्थिक जगत की नजर इस बात पर भी है कि आने वाले समय में वैश्विक बाजारों की स्थिति, तेल कीमतें और ब्याज दरों का आरबीआई की नीतियों और बैलेंस शीट पर क्या प्रभाव पड़ता है।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में: आरबीआई

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। केंद्रीय बैंक के अनुसार, घरेलू मांग, स्थिर वित्तीय प्रणाली और सरकारी सुधारों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अन्य कई देशों की तुलना में बेहतर बनी हुई है।

आरबीआई ने अपने ताजा आकलन में कहा कि दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई, ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक व्यापार में सुस्ती जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर, बैंकिंग प्रणाली और निवेश गतिविधियां सकारात्मक संकेत दे रही हैं।

केंद्रीय बैंक के अनुसार, देश में उपभोग और निवेश दोनों क्षेत्रों में गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। साथ ही, बुनियादी ढांचा विकास, विनिर्माण क्षेत्र में सुधार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने आर्थिक वृद्धि को सहारा दिया है।

आरबीआई ने यह भी कहा कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पहले की तुलना में अधिक मजबूत और पूंजीगत रूप से बेहतर स्थिति में है। बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में कमी और ऋण वितरण में वृद्धि आर्थिक स्थिरता के संकेत माने जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक दबावों के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत संतुलित बनी हुई है। सरकार की पूंजीगत व्यय योजनाएं, डिजिटल भुगतान प्रणाली का विस्तार और सेवा क्षेत्र की मजबूती भी विकास को गति दे रही हैं।

हालांकि आरबीआई ने यह भी संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक वित्तीय जोखिमों पर लगातार नजर बनाए रखने की जरूरत है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना उसकी प्राथमिकता रहेगी।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत की बड़ी घरेलू बाजार क्षमता और सुधार आधारित नीतियां उसे वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में मानसून, वैश्विक मांग और निवेश प्रवाह जैसे कारक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

नए भारत की एमएसएमई क्रांति के केंद्र में है नारी शक्ति
  • शोभा करंदलाजे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम का सितंबर 2023 में संसद में समर्थन करते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि भारत तभी आगे बढ़ सकता जब देश की नारियां भी इसके साथ ही उन्नति करें। उनका यह विश्वास एमएसएमई क्षेत्र (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) में सरकार के काम में हर रोज दिखाई देता है।

एमएसएमई  क्षेत्र को अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। लेकिन अगर गहराई से देखें तो इसके दिल में महिला उद्यमियों का मूक बल बसता है। आखिरकार आज इस मूक बल को वह राष्ट्रीय मान्यता, संस्थागत समर्थन और नीतिगत गति मिल रही है जिसका वह हमेशा से हकदार है।

आँकड़े बयां करते हैं कहानी

भारत के एमएसएमई  इकोसिस्टम में महिलाओं की भागीदारी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। 2026 की शुरुआत तक, ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ और ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ पर 3.11 करोड़ से अधिक महिला-नेतृत्व वाले उद्यम पंजीकृत हुए हैं। वास्तव में, ‘उद्यम’ और ‘उद्यम असिस्ट’ पंजीकरण के अनुसार, देश के कुल पंजीकृत एमएसएमई में महिला-स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है और ये रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। महिला उद्यमियों के लिए सबसे प्रभावशाली सुधारों में से एक ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ के माध्यम से पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाना है। पूरी तरह से ऑनलाइन, कागज रहित और स्व-घोषणा पर आधारित इस व्यवस्था ने उस नौकरशाही बाधा को समाप्त कर दिया, जो महिलाओं के लिए एक बड़ी रुकावट बनी हुई थी। जनवरी 2023 में शुरू किए गए ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ ने अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत उन महिलाओं तक पहुँच बनाकर इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया, जिनके पास ‘पैन’ नंबर या ‘जीएसटीएन’  नहीं था। इसने उन्हें प्राथमिकता क्षेत्र में दिए जाने वाले ऋण और सरकारी योजनाओं के लाभों के दायरे में लाने का काम किया।

सरकार ने महिलाओं को विकास वाहक के रूप में अपने आर्थिक एजेंडे के केंद्र में रखने का निर्णय लिया है।

आर्थिक शक्ति के रूप में नारी शक्ति

प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया है कि महिलाओं को सशक्त बनाना केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय रणनीति है। उन्होंने ही कहा था कि  जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो परिवार सशक्त होते हैं और जब परिवार सशक्त होते हैं, तो राष्ट्र निरंतर मज़बूत होता जाता है।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ राजनीतिक क्षेत्र में इस दर्शन की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति है। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में, विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र में महिलाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता एक व्यापक और बहुआयामी नीतिगत ढांचे के रूप में सामने आई है, जो ऋण, कौशल, बाज़ार तक पहुंच, पहचान और गरिमा जैसे पहलुओं को समाहित करती है।

महिलाओं के लिए तैयार की गई एक नीतिगत संरचना

एमएसएमई मंत्रालय ने अपने हर बड़े कार्यक्रम और योजना में महिलाओं के सशक्तिकरण को व्यवस्थित रूप से शामिल किया है।

ये सभी मिलकर, आपूर्ति पक्ष पर आठ मुख्य श्रेणियों के माध्यम से उद्यमियों को सहायता प्रदान करते हैं: तकनीक तक पहुँच, ऋण और वित्त तक पहुँच, डिजिटलीकरण को बढ़ावा, अवसरंचना सहायता, औपचारिकीकरण और समावेशन, बाज़ार तक पहुँच, और उद्योग-स्तरीय कौशल विकास।

पिछले पाँच वर्षों में, प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत 3.2 लाख से ज़्यादा महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों को सहायता दी गई है। हाल के आँकड़ों के अनुसार, पीएमईजीपी के कुल लाभार्थियों में से 39% महिलाएँ हैं जो इस योजना की रूपरेखा और महिलाओं की कुछ कर दिखाने की ललक, दोनों को दर्शाता है।

सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट महिला ऋणदाताओं को 90 प्रतिशत तक का बढ़ा हुआ गारंटी कवर प्रदान करता है। इससे बैंक बिना कुछ गिरवी रखे महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हैं।

इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक खरीद नीति  में संशोधन कर यह अनिवार्य किया गया कि केंद्रीय मंत्रालय, विभाग और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम अपनी वार्षिक खरीद का कम से कम 3 प्रतिशत हिस्सा महिला-स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों से ही खरीदें। इससे महिला उद्यमियों के लिए एक सुनिश्चित और अनुमानित बाज़ार तैयार होता है, जिससे सरकारी खर्च को महिलाओं के व्यवसाय की वृद्धि में बदला जा रहा है। यह देखकर खुशी होती है कि वित्त वर्ष 2025-26 में, केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों/केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा की गई कुल खरीद का 3.5 प्रतिशत हिस्सा महिला एमएसएमई  से ही खरीदा गया था।

‘जेडइडी’ (जीरो डिफेक्ट जीरो इफेक्ट) प्रमाणन योजना के तहत, महिला-स्वामित्व वाले एमएसएमई को प्रमाणन शुल्क पर सौ प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। ये विस्तृत विवरण काफी महत्वपूर्ण हैं और ये मंत्रालय के प्रयासों को दर्शाते हैं। मंत्रालय ने इस बारे में गहराई से विचार किया है कि महिलाओं को कहाँ कहाँ बाधाओं का सामना करना पड़ता है और ठीक उन्हीं बाधाओं को दूर करने के लक्ष्य के साथ सहायता दी गई।

‘महिला कॉयर योजना’, के तहत कॉयर क्षेत्र में काम करने वाली महिला कारीगरों को विशेष कौशल विकास और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। ‘एमएसएमई- व्यापार सशक्तिकरण और विपणन’ के तहत महिलाओं को मार्केटिंग के लिए मदद करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 5 लाख लाभार्थियों में से 50 प्रतिशत महिलाओं को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। ‘यशस्विनी अभियान’ में, एमएसएमई  योजनाओं और पंजीकरण से मिलने वाले लाभों के बारे में महिलाओं को जानकारी देने के लिए पूरे देश में विशेष जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। विशेष रूप से महिला उद्यमियों के लिए आयोजित ‘एमएसएमई आइडिया हैकाथॉन’ 3.0 के तहत 18,888 से अधिक आइडिया प्राप्त हुए, जो स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि महिलाओं में रचनात्मक और उद्यमशीलता की ऊर्जा का भंडार मौजूद है, जो बस बाहर आने का इंतज़ार कर रहा है।

इसके अलावा, मंत्रालय के पास एक समर्पित महिला उद्यमिता प्रकोष्ठ है, जो विभिन्न योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित करके, महिलाओं के लिए प्राप्त परिणामों की निगरानी और मूल्यांकन करके, तथा इकोसिस्टम के हितधारकों के साथ जुड़कर महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए एक नोडल केंद्र के रूप में कार्य करता है।

इन सभी पहलों ने जेंडर टारगेटिंग (लैंगिक लक्ष्यीकरण) और अभिसरण पर ध्यान केंद्रित किया है। ये कदम योजनाओं के भीतर केवल एक सब्सिडी प्रावधान के रूप में ‘महिलाओं के समावेश’ से आगे बढ़कर, महिला-अनुकूल उद्यमिता सहायता के लिए एक अधिक सुविचारित और व्यापक ढांचे की ओर बढ़ने के सफर को दर्शाते हैं।

कौशल, आत्मविश्वास, समुदाय

क्रेडिट और बाज़ारों से परे, सरकार ने यह माना है कि उद्यमिता कौशल और आत्मविश्वास का भी विषय है। विशेष रूप से पूर्वोत्तर में, जहाँ महिलाएँ पारंपरिक रूप से अपने समाज की आर्थिक रीढ़ रही हैं, लक्षित उद्यमिता विकास कार्यक्रमों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रशिक्षित प्रतिभागियों में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक हो।

स्वयं सहायता समूहों को एमएसएमई सहायता तंत्रों के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे महिला उद्यमियों के ऐसे समुदाय बने हैं जो एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। वे न केवल अपना व्यवसाय खड़ा करते हैं, बल्कि आपस में जुड़कर एक मजबूत नेटवर्क भी तैयार करते हैं।

यह एक ऐसी सरकार है जो निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है। प्रत्येक बजट, प्रत्येक योजना और प्रत्येक पोर्टल का सरलीकरण उस विशाल इमारत की एक ईंट के समान है, जिसकी नींव प्रधानमंत्री मोदी ने एक सरल, किंतु क्रांतिकारी विचार के साथ रखी थी—कि भारत की महिलाएं एक ऐसी शक्ति हैं जिन्हें अब स्वतंत्र और सशक्त होने का अवसर मिलना चाहिए।

हर उद्यम में नारी शक्तिकी भावना

नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने दुनिया को बताया कि भारत की महिलाएँ यहाँ की संसद का हिस्सा हैं। इस सरकार की एमएसएमई नीतियां दुनिया को यह बता रही हैं कि भारत की महिलाएँ देश के बाजारों, कारखानों, उसकी निर्यात श्रृंखलाओं, उसके नवाचार केंद्रों और उसके बोर्डरूम्स की भी हकदार हैं।

ये उसी एक सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ के अपने विज़न का आधार बनाया है। एक विकसित भारत वह भारत है, जहाँ 3 करोड़ से भी ज़्यादा महिला उद्यमी (और यह संख्या लगातार बढ़ रही है) विकास की असली ताकत हैं।

अभी हम उस लक्ष्य तक पूरी तरह नहीं पहुँचे हैं, लेकिन इस सरकार की देखरेख में और प्रधानमंत्री के पक्के इरादों के साथ, हम यकीनन उस राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

(लेखिका केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।)