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DPIIT ने 12 वर्षों की उपलब्धियां गिनाईं, भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम बना विकास का बड़ा इंजन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

सरकार के देशव्यापी अभियान के तहत 12 वर्ष के शासन की वर्षगांठ मनाने के हिस्से के रूप में, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने चंडीगढ़ में एक क्षेत्रीय प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की, जिसमें विभाग की प्रमुख पहलें, संरचनात्मक सुधार और पिछले दशक में हुई उपलब्धियों को उजागर किया गया।

पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए DPIIT के संयुक्त सचिव श्री सुमीत कुमार जारंगल ने भारत के औद्योगिक और स्टार्टअप इकोसिस्टम की परिवर्तनकारी यात्रा का खाका पेश करते हुए कहा कि नीति सुधार, नवाचार और उद्यमिता ने देश की आर्थिक मजबूती और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर कर सामने आए हैं।

12 वर्षों के परिवर्तनकारी शासन

उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए श्री जारंगल ने कहा कि भारत ने कई वैश्विक व्यवधानों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए गहरे संरचनात्मक सुधार लागू किए, जिनसे निवेशकों का भरोसा बढ़ा और औद्योगिक वृद्धि को गति मिली।

पिछले दशक में, भारत ने वित्त वर्ष 2014‑15 से वित्त वर्ष 2025‑26 के बीच कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) प्रवाह USD 843 बिलियन आकर्षित किए, जो पिछले बारह वर्ष की अवधि की तुलना में 169 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद, देश ने वित्त वर्ष 2025‑26 में ऐतिहासिक USD 94.53 बिलियन दर्ज किए, जिनमें से 90 प्रतिशत से अधिक इक्विटी प्रवाह स्वत: मार्ग के माध्यम से आए।

संयुक्त सचिव ने यह भी कहा कि मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी प्रमुख पहलों ने निवेशों को विनिर्माण शक्ति में बदला है। 14 रणनीतिक क्षेत्रों में PLI योजनाओं ने रु 2.40 लाख करोड़ के निवेश आकर्षित किए, रु 22.66 लाख करोड़ के उत्पादन का सृजन किया, रु 15.20 लाख करोड़ से अधिक के निर्यात को बढ़ावा दिया और 14 लाख से अधिक नौकरियां पैदा कीं।

उन्होंने कहा कि भारत आज घरेलू स्तर पर उपयोग होने वाले मोबाइल फोन का 99.2 प्रतिशत निर्माण करता है, जबकि फार्मा सेक्टर ने 191 बल्क ड्रग्स के घरेलू उत्पादन के माध्यम से आयात निर्भरता में उल्लेखनीय कमी की है, और PLI द्वारा समर्थित उत्पादन का निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान है।

भरोसा-आधारित शासन और व्यापार करने की सुगमता

ब्रीफिंग में सरकार के नियमों को सरल बनाने और व्यापार करने में आसानी लाने के सतत प्रयासों को भी रेखांकित किया गया। जन‑विश्वास अधिनियम, 2026 के माध्यम से 47,000 से अधिक अनुपालनों को समाप्त किया गया है और कई कानूनी प्रावधानों का तर्कसंगतकरण किया गया, जो प्रवर्तन‑आधारित विनियमन से भरोसा‑आधारित शासन की दिशा में बदलाव को दर्शाता है।

नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, जो 32 केंद्रीय मंत्रालयों और 34 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों से जुड़ा है, ने 13.7 लाख से अधिक आवेदन संसाधित किए और 8.5 लाख से अधिक अनुमोदन सुगम किए, जिससे निवेश के लिए एक सहज पारिस्थितिकी तंत्र बना है। सुधारों को और मजबूत करने के लिए बिजनेस रिफॉर्म्स एक्शन प्लान (BRAP), उद्योग समागम और जिला‑स्तरीय BRAP जैसी पहलों को भी आगे बढ़ाया जा रहा है।

स्टार्टअप इंडिया समावेशी वृद्धि चला रहा है

स्टार्टअप क्रांति पर ध्यान केंद्रित करते हुए श्री जारंगल ने कहा कि 16 जनवरी 2016 को शुरू की गई स्टार्टअप इंडिया पहल उद्यमिता का समर्थन करने वाला एक व्यापक मंच बन चुकी है, जो स्टार्टअप मान्यता, सीड फंडिंग, वेंचर कैपिटल समर्थन, क्रेडिट गारंटी, कर‑प्रोत्साहन, खरीद नीतियों में सुधार और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंच जैसी सुविधाएँ प्रदान करती है।

आज भारत में 2.35 लाख से अधिक DPIIT‑मानी गई स्टार्टअप हैं, जो लगभग 24 लाख प्रत्यक्ष नौकरियाँ दे रही हैं, जिनमें से आधे से अधिक नौकरियाँ टियर‑II और टियर‑III शहरों से उत्पन्न हुईं। इन स्टार्टअप में से लगभग आधे में कम से कम एक महिला निदेशक या भागीदार है, जो इस पारिस्थितिकी तंत्र की समावेशी प्रकृति को दर्शाता है।

उन्होंने यह भी बताया कि स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम (SISFS), स्टार्टअप्स के लिए क्रेडिट गारंटी स्कीम (CGSS), स्टार्टअप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स (FFS 1.0) और हाल ही में लॉन्च किया गया स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 जैसी प्रमुख पहलों से स्टार्टअप जीवन‑चक्र के विभिन्न चरणों में पूँजी तक पहुंच मजबूत हो रही है।

FFS 1.0 के तहत लगभग रु 27,600 करोड़ के निवेश 1,450+ स्टार्टअप्स में सुगम किए गए, जबकि SISFS के तहत 215+ इनक्यूबेटरों के माध्यम से रु 945 करोड़ से अधिक मंजूर किए गए। CGSS ने स्टार्टअप उधारकर्ताओं को रु 1,350 करोड़ से अधिक की गारंटी प्रदान करके समर्थन दिया है।

हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ नवाचार हब के रूप में उभर रहे हैं

संयुक्त सचिव ने कहा कि हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ मिलकर लगभग 15,500 DPIIT‑मानी गई स्टार्टअप का हिस्सा हैं, जो 1.7 लाख से अधिक प्रत्यक्ष नौकरियाँ पैदा कर रहे हैं।

क्षेत्र में वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) के माध्यम से FFS के अंतर्गत 115+ स्टार्टअप्स में रु 2,270 करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है, जबकि लगभग 260 स्टार्टअप्स ने स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम का लाभ उठाया है। CGSS के जरिए क्रेडिट सहायता ने लगभग रु 180 करोड़ के गारंटीकृत ऋण सक्षम किए हैं, और तीनों क्षेत्रों में 320+ स्टार्टअप्स को आयकर छूट के लिए सर्टिफिकेट ऑफ एलिजिबिलिटी प्रदान किए गए हैं।

इन सफलताओं ने दिखाई कि क्षेत्र का नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो रहा है और यह रोजगार सृजन तथा आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है।

लॉजिस्टिक्स और नवाचार ने प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूती दी

जारंगल ने लॉजिस्टिक्स और नवाचार में हुई प्रगति पर भी प्रकाश डाला। पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान और नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी जैसी पहलों के समर्थन से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत GDP के लगभग 7.9 प्रतिशत तक घट गई है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता और लचीलापन बढ़ा है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 2014 से वैश्विक नवाचार सूचकांक (Global Innovation Index) में भारत का 38 पायदान उन्नयन और पेटेंट फाइलिंग में 236 प्रतिशत की वृद्धि देश को एक वैश्विक नवाचार और प्रौद्योगिकी हब के रूप में उभरने का संकेत देती है।

आगे का रास्ता

भविष्य के रोडमैप का उल्लेख करते हुए संयुक्त सचिव ने कहा कि स्टार्टअप इंडिया मान्यता का विस्तार, वित्तपोषण मैकेनिज्म को मजबूत करना, डीप‑टेक नवाचार को बढ़ावा देना और उभरते उद्यमी क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाने पर आगे भी ध्यान केंद्रित करेगा। स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0, FFS 1.0, SISFS, CGSS और TEJAS जैसी पहलों से जिले‑स्तर पर पूँजी और नवाचार समर्थन और गहरा होगा।

उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य इन परिवर्तनकारी नीतियों और उद्यमशीलता के अवसरों को जमीनी स्तर तक ले जाना है, ताकि नवाचार‑प्रेरित वृद्धि देश के हर कोने तक पहुंचे।

अपने दौरे के हिस्से के रूप में, श्री जारंगल क्षेत्रीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के हितधारकों से भी बातचीत करेंगे, और DPIIT द्वारा भारत भर में नवाचार और उद्यमिता को मजबूत करने के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराएंगे।

वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षा: आर्थिक गतिविधियों में नरमी की आशंका, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण मजबूत

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Ministry of Finance ने अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा है कि आने वाले महीनों में सामान्य से कम मानसून और कुछ क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों की संभावित सुस्ती के कारण उपभोग मांग पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का निकट भविष्य का परिदृश्य सतर्क आशावाद के साथ मजबूत बना हुआ है।

वित्त मंत्रालय की समीक्षा के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आय और उपभोग का स्तर काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो कृषि उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और उपभोक्ता मांग प्रभावित हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्यों और ग्रामीण बाजारों पर देखने को मिल सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर भी आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव, ऊर्जा कीमतों में बदलाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की धीमी वृद्धि जैसी परिस्थितियां वैश्विक आर्थिक वातावरण को प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई दे रहा है।

समीक्षा में यह भी उल्लेख किया गया कि देश में बुनियादी ढांचा निवेश, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार, सेवा क्षेत्र की मजबूती और सरकारी पूंजीगत व्यय आर्थिक वृद्धि को समर्थन प्रदान कर रहे हैं। सार्वजनिक निवेश के साथ-साथ निजी निवेश में भी धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार और बढ़ती उपभोक्ता मांग है। हालांकि यदि मानसून कमजोर रहता है, तो ग्रामीण खपत पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में विकास की गति प्रभावित हो सकती है।

वित्त मंत्रालय ने संकेत दिया कि मुद्रास्फीति पर भी लगातार नजर रखी जा रही है। खाद्य पदार्थों की कीमतें, मौसम की स्थिति और वैश्विक कमोडिटी बाजार आने वाले महीनों में महंगाई के रुख को प्रभावित कर सकते हैं। सरकार और नीति निर्माता मूल्य स्थिरता बनाए रखने तथा विकास को गति देने के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था, वित्तीय समावेशन, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं और तकनीकी क्षेत्र में निवेश जैसे कारक भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता को मजबूत बना रहे हैं। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, हरित ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में बढ़ते निवेश से भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को और गति मिलने की उम्मीद है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कुछ अल्पकालिक चुनौतियां अवश्य हैं, लेकिन व्यापक आर्थिक संकेतक अभी भी सकारात्मक बने हुए हैं। मजबूत बैंकिंग प्रणाली, बढ़ता निवेश और सरकारी सुधार कार्यक्रम विकास को सहारा दे सकते हैं।

कुल मिलाकर वित्त मंत्रालय का आकलन यह दर्शाता है कि मानसून और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े जोखिमों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत है और निकट भविष्य में वृद्धि की संभावनाएं बरकरार हैं, हालांकि नीति निर्माताओं को सतर्कता बनाए रखने की आवश्यकता होगी।

मांग में अचानक और तेज़ी से वृद्धि के बीच सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) हरियाणा में निर्बाध ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित कर रही

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) – इंडियनऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल – देश भर में परिचालन और लॉजिस्टिक्स समन्वय जारी रखे हुए हैं ताकि कई क्षेत्रों में ईंधन की मांग में अचानक और तीव्र वृद्धि के बावजूद पेट्रोल (एमएस), डीजल (एचएसडी) और एलपीजी की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

हाल के दिनों में, ओएमसी ने कई राज्यों में मौसमी कृषि गतिविधियों और कटाई कार्यों के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की उल्लेखनीय रूप से अधिक खपत देखी है। अन्य आपूर्तिकर्ताओं की तुलना में कम कीमत के कारण खुदरा ग्राहकों के सार्वजनिक क्षेत्र के खुदरा आउटलेट्स की ओर रुख करने और संस्थागत और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के खुदरा ईंधन आउटलेट्स की ओर स्पष्ट रुझान के कारण भी अतिरिक्त मांग का दबाव उत्पन्न हुआ है।

सार्वजनिक क्षेत्र की ओएमसी अपने टर्मिनलों, डिपो, पाइपलाइनों, एलपीजी बॉटलिंग संयंत्रों और खुदरा आउटलेट्स के व्यापक राष्ट्रव्यापी नेटवर्क के माध्यम से निर्बाध आपूर्ति बनाए हुए हैं। आपूर्ति दल, परिवहन नेटवर्क, टर्मिनल संचालन और चुनिंदा खुदरा आउटलेट्स बाजारों में निर्बाध उत्पाद आवागमन और समय पर पुनःपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 24×7 कार्यरत हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां निर्बाध ईंधन आपूर्ति के लिए राज्य प्रशासन के साथ घनिष्ठ समन्वय बनाए हुए हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां स्टॉक की स्थिति की लगातार समीक्षा कर रही हैं और बढ़ी हुई मांग को कुशलतापूर्वक पूरा करने के लिए रसद और वितरण योजना पर घनिष्ठ समन्वय स्थापित कर रही हैं।

अनिल कुमार सिंह, राज्य स्तरीय समन्वयक, हरियाणा, नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे सामान्य खरीदारी जारी रखें और अनावश्यक रूप से घबराकर खरीदारी करने से बचें। उपभोक्ताओं से यह भी अनुरोध है कि वे ईंधन की उपलब्धता से संबंधित सटीक जानकारी के लिए केवल अधिकृत एजेंसियों और तेल विपणन कंपनियों द्वारा जारी आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें।

आरबीआई का बही-खाता 20.6 प्रतिशत बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, सोना और निवेश बने प्रमुख कारण

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India का बही-खाता (बैलेंस शीट) वित्त वर्ष 2025-26 में 20.6 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि के साथ 91.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। केंद्रीय बैंक की शुक्रवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।

रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई के बही-खाते का आकार 31 मार्च 2025 को 76,25,421.93 करोड़ रुपये था, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 91,97,121.08 करोड़ रुपये हो गया। इस प्रकार एक वर्ष में इसमें 15,71,699.15 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

केंद्रीय बैंक ने बताया कि इस वृद्धि के पीछे घरेलू निवेश, सोने के भंडार और विदेशी निवेश में हुई बढ़ोतरी प्रमुख कारण रहे। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच सोने में निवेश और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्य में बढ़ोतरी ने आरबीआई की कुल संपत्ति को मजबूत किया।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट उसकी वित्तीय क्षमता, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक स्थिरता का महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है। आरबीआई की बैलेंस शीट में यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि भारत की वित्तीय प्रणाली और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्थिति में हैं।

आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि केंद्रीय बैंक ने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए विभिन्न नीतिगत कदम जारी रखे। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सोने के भंडार में वृद्धि केंद्रीय बैंकों की वैश्विक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है, क्योंकि इसे आर्थिक अनिश्चितता के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है। भारत सहित कई देशों के केंद्रीय बैंक हाल के वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार को लगातार बढ़ा रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि विदेशी निवेश और घरेलू परिसंपत्तियों के मूल्य में सुधार से आरबीआई की आय और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार, आरबीआई की मजबूत बैलेंस शीट देश की बैंकिंग और मौद्रिक प्रणाली के लिए भरोसे का संकेत है। इससे वित्तीय बाजारों में स्थिरता और निवेशकों का विश्वास बनाए रखने में मदद मिलती है।

फिलहाल आर्थिक जगत की नजर इस बात पर भी है कि आने वाले समय में वैश्विक बाजारों की स्थिति, तेल कीमतें और ब्याज दरों का आरबीआई की नीतियों और बैलेंस शीट पर क्या प्रभाव पड़ता है।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में: आरबीआई

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। केंद्रीय बैंक के अनुसार, घरेलू मांग, स्थिर वित्तीय प्रणाली और सरकारी सुधारों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अन्य कई देशों की तुलना में बेहतर बनी हुई है।

आरबीआई ने अपने ताजा आकलन में कहा कि दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई, ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक व्यापार में सुस्ती जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर, बैंकिंग प्रणाली और निवेश गतिविधियां सकारात्मक संकेत दे रही हैं।

केंद्रीय बैंक के अनुसार, देश में उपभोग और निवेश दोनों क्षेत्रों में गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। साथ ही, बुनियादी ढांचा विकास, विनिर्माण क्षेत्र में सुधार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने आर्थिक वृद्धि को सहारा दिया है।

आरबीआई ने यह भी कहा कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पहले की तुलना में अधिक मजबूत और पूंजीगत रूप से बेहतर स्थिति में है। बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में कमी और ऋण वितरण में वृद्धि आर्थिक स्थिरता के संकेत माने जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक दबावों के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत संतुलित बनी हुई है। सरकार की पूंजीगत व्यय योजनाएं, डिजिटल भुगतान प्रणाली का विस्तार और सेवा क्षेत्र की मजबूती भी विकास को गति दे रही हैं।

हालांकि आरबीआई ने यह भी संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक वित्तीय जोखिमों पर लगातार नजर बनाए रखने की जरूरत है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना उसकी प्राथमिकता रहेगी।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत की बड़ी घरेलू बाजार क्षमता और सुधार आधारित नीतियां उसे वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में मानसून, वैश्विक मांग और निवेश प्रवाह जैसे कारक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

बकरीद क्या है और क्यों मनाई जाती है? जाने त्याग और विश्वास का पर्व, भारतीय अर्थव्यवस्था में ₹50,000 करोड़ का योगदान

नई दिल्ली: दुनियाभर के साथ-साथ भारत में भी मुसलमान बकरीद (ईद-उल-अज़हा) का त्योहार बड़े उत्साह के साथ मना रहे हैं। इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने ‘ज़िल-हिज्जा’ की 10 तारीख को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी एक बड़ी भूमिका निभाता है।

इतिहास और महत्व बकरीद की कहानी: करीब 2000 ईसा पूर्व पैगंबर इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल के त्याग से जुड़ी है। यह त्योहार ईश्वर पर अटूट भरोसे और बलिदान का संदेश देता है। इस दिन कुर्बानी के गोश्त को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने की परंपरा है, जो इस्लाम में ‘ज़कात’ की तरह दान का संदेश देती है।

अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव : जानकारों के अनुसार, केवल बकरीद के मौके पर भारत में जानवरों से जुड़ा कारोबार करीब 50,000 करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है। एक अनुमान के मुताबिक, इस अवसर पर करीब 1.5 करोड़ जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। इस कारोबार से न केवल पशुपालक, बल्कि चारा बेचने वाले, वेटनरी डॉक्टर, ट्रांसपोर्टर, कसाई और चमड़ा कारोबारी भी जुड़े होते हैं।

पशुपालन और गोट फॉर्मिंग : भारत के कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में पशुपालन ग्रामीण रोजगार का अहम जरिया है। यूपी में यादव और गुर्जर, राजस्थान में रबारी और मालधारी, तथा गुजरात के कच्छ-सौराष्ट्र में मालधारी समुदाय पारंपरिक रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं। वर्तमान में ‘गोट फॉर्मिंग’ का कारोबार भी तेजी से फल-फूल रहा है, जिससे पिछड़े वर्ग, दलित और आदिवासी समाज के लोग आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।

महंगे बकरों की मांग : इस साल मंडियों में बकरों की भारी मांग देखी गई, जहाँ कुछ खास नस्ल के बकरों की कीमत 50 लाख रुपये तक रही। यहाँ तक कि एक विशेष निशान वाले बकरे की कीमत 4 करोड़ रुपये तक बताई गई है।

बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत में बड़ा उछाल, 5.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश


देश में बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार 150 करोड़ रुपये या उससे अधिक लागत वाली केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाओं की कुल लागत में सामूहिक रूप से 5.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।

यह जानकारी अप्रैल महीने की एक आधिकारिक रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें देशभर में चल रही प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की स्थिति का आकलन किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, लागत में यह वृद्धि विभिन्न कारणों से हुई है, जिनमें परियोजनाओं में देरी, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भूमि अधिग्रहण में बाधाएं और तकनीकी कारण प्रमुख हैं। इससे इन परियोजनाओं की समयसीमा और बजट दोनों पर दबाव बढ़ा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत वृद्धि से सरकारी वित्तीय योजना पर असर पड़ सकता है और परियोजनाओं के समय पर पूरा होने की चुनौती और बढ़ सकती है।

यह रिपोर्ट भारत सरकार (Government of India) द्वारा बुनियादी ढांचा विकास की निगरानी के तहत तैयार की गई है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों की परियोजनाओं का विस्तृत विश्लेषण शामिल है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में लागत नियंत्रण और परियोजना प्रबंधन में सुधार करना बेहद जरूरी होगा, ताकि देश की विकास गति प्रभावित न हो।

आरबीआई देगा सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश, बढ़ेगी वित्तीय मजबूती

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश देने की घोषणा की है। माना जा रहा है कि यह राशि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार को बड़ी वित्तीय राहत प्रदान करेगी।

यह अब तक का सबसे बड़ा लाभांश हस्तांतरण है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में आरबीआई ने सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का लाभांश दिया था, जो 2023-24 की तुलना में 27.4 प्रतिशत अधिक था। वहीं, 2023-24 में यह राशि 2.1 लाख करोड़ रुपये और 2022-23 में 87,416 करोड़ रुपये रही थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई से मिलने वाला यह बड़ा लाभांश सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखने, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, निवेश आय और केंद्रीय बैंक की बेहतर वित्तीय स्थिति के कारण इस बार रिकॉर्ड लाभांश संभव हो पाया है।

भारत का लक्ष्य इस वर्ष एक ट्रिलियन डॉलर और अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर का निर्यात करना : केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल


दिल्ली /सत्ता संदेश

निर्यात लक्ष्य एक राष्ट्रीय मिशन; लगभग 38 विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते बाजार पहुंच को बढ़ावा देंगे: श्री पीयूष गोयल

श्री पीयूष गोयल ने व्यवसायों से आयात रुझानों पर दृष्टि रखने, अवसरों की पहचान करने, आयात प्रतिस्थापन में देश की मदद करने की अपील की

स्वदेशी को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए श्री पीयूष गोयल ने घरेलू उत्पादों की सहायता करने का आग्रह किया

बढ़ती खपत अवसर प्रदान करती है, लेकिन आयात में वृद्धि को रोकने के लिए घरेलू उद्योग को आगे आना होगा; युवाओं और स्टार्टअप की अधिक भागीदारी की आवश्‍यकता : श्री पीयूष गोयल

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने आज कहा कि भारत ने इस वर्ष एक ट्रिलियन डॉलर और अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है। यही आत्मनिर्भर भारत की सच्ची पहचान होगी। नई दिल्ली में भारतीय व्यापार महोत्सव की वेबसाइट लॉन्च समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, इस वर्ष निर्यात 863 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत अधिक है। उन्होंने कहा कि वस्तुओं और सेवाओं दोनों के निर्यात में वृद्धि हुई है, जो वर्तमान वैश्विक परिवेश में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

श्री गोयल ने कहा कि यह केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि राष्ट्र का लक्ष्य है और केंद्र सरकार इसे अर्जित करने के लिए हर संभव सहायता देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में लगभग 38 विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की दिशा में प्रयास किए गए हैं। इससे भारतीय वस्तुओं को उन बड़े बाजारों में तरजीही पहुंच मिलेगी जहां प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम आयात शुल्क पर भारतीय सामान बेचा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ये समझौते धीरे-धीरे लागू होंगे और ओमान के साथ एफटीए पहली जून से लागू हो सकता है। कागजी कार्रवाई के लिए लंबित अन्य अंतिम रूप दिए गए एफटीए भी बाद में लागू हो जाएंगे।

श्री पीयूष गोयल ने हितधारकों से वाणिज्य मंत्रालय के व्यापार पोर्टल के माध्यम से आयात रुझानों का अध्ययन करने और घरेलू विनिर्माण तथा आयात प्रतिस्थापन के अवसरों की पहचान करने का आग्रह किया। उन्होंने देश में आयात की जा रही वस्तुओं पर निरंतर दृष्टि रखने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि ऐसे रुझान भारतीय व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करते हैं। श्री गोयल ने कहा कि वाणिज्य मंत्रालय को विदेशों से भारत में आने वाले उत्पादों को उजागर करते हुए इन अवसरों को अधिक व्यवस्थित तरीके से प्रदर्शित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आयात प्रतिस्थापन और निर्यात विकास के दो प्रमुख पहलू हैं और मंत्रालय उन क्षेत्रों को भी प्रदर्शित करेगा जहां भारत की शक्ति और क्षमता है ताकि व्यवसाय इन अवसरों का लाभ उठा सकें।

श्री पीयूष गोयल ने घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने और स्वदेशी भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विदेशी वस्तुओं के प्रति थोड़ी सी भी प्राथमिकता घरेलू उद्योग को कमजोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मध्यम वर्ग का विस्तार हो रहा है और उपभोग बढ़ रहा है, भारत के लिए अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करना आवश्यक है, अन्यथा आयात इस कमी को पूरा करेगा। श्री गोयल ने व्यवसायों और उपभोक्ताओं से देश के भीतर आपूर्तिकर्ता और ग्राहक बनकर एक-दूसरे की सहायता करने का आग्रह किया। उन्‍होंने कहा कि यदि भारतीय स्वदेशी मेला जैसी पहलों के माध्यम से इस भावना को मजबूत किया जाता है, तो यह भारत में निर्मित उत्पादों को बढ़ावा देने वाले एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में परिवर्तित हो सकता है।

श्री गोयल ने कहा कि पूंजीगत वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में भारत अभी भी विदेशी देशों पर बहुत हद तक निर्भर है। उन्होंने राजकोट, जालंधर, लुधियाना, बटाला और पुणे सहित औद्योगिक समूहों से आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू उत्पादन बढ़ाने का आह्वान किया।

केंद्रीय मंत्री ने चिकित्सा उपकरणों के बढ़ते घरेलू उत्पादन को भी रेखांकित किया और विशाखापत्तनम में निर्मित सीटी स्कैन मशीन को उदृत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पादों को अधिक अपनाने से मांग बढ़ेगी और परिचालन का परिमाण भी बढ़ेगा।

श्री गोयल ने कहा कि भारत को केवल विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने मात्र से आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को निरंतर बड़ी उपलब्धियों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, नए विचार उत्पन्न करने चाहिए और प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा परिकल्पित अमृत काल के दौरान विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर निरंतर कार्य करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उद्योगों, व्यवसायों और नागरिकों के उत्साह के साथ-साथ 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक भावना से यह विश्वास मिलता है कि विश्‍व की कोई भी शक्ति भारत की प्रगति को रोक नहीं सकती। भारत मंडपम में आयोजित हो रहे भारतीय स्वदेशी मेले का उल्‍लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थल स्वयं भारत की विविधता को दर्शाता है, क्योंकि यहाँ उपयोग की जाने वाली सामग्री और उत्पाद देश के विभिन्न कोनों से आए हैं।

श्री गोयल ने गुणवत्ता और उत्पादकता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी देश में गुणवत्ता मानकों में सुधार और उत्पादकता में वृद्धि चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर गुणवत्ता और पैकेजिंग के बिना भारत वैश्विक बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत तेजी से प्रगति कर रहा है और इसके निर्यात में भी लगातार वृद्धि हो रही है।

कृषि और मत्स्य पालन सेक्‍टरों की क्षमता को रेखांकित करते हुए श्री गोयल ने कहा कि किसानों और मछुआरों के उत्पादों सहित भारत का कृषि निर्यात लगभग 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि इन सेक्‍टरों में मूल्यवर्धन का स्तर अभी भी कम है। उन्होंने कहा कि यदि युवा उद्यमी मूल्यवर्धित सेक्‍टरों में प्रवेश करें और लघु, मध्यम एवं वृहत्तर स्तर पर प्रसंस्करण और विनिर्माण इकाइयां स्थापित करें तो अपार संभावनाएं हैं।

श्री गोयल ने कहा कि जब भारत निर्यात-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाता है, तो गुणवत्ता मानक स्वाभाविक रूप से बेहतर होते हैं। उन्होंने कहा कि यदि स्वदेशी उत्पाद निर्यात-योग्य हो जाएं, तो लोग विदेशी वस्तुओं की ओर रुख नहीं करेंगे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और परिचालन के दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री गोयल ने कहा कि सूक्ष्‍म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की परिभाषा का विस्तार किया गया है और अब 500 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाले उद्यम एमएसएमई के दायरे में आते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार उद्यमों को और अधिक विकसित होते देखना चाहती है और उनके साथ खड़ी है।

उन्होंने आयोजकों से आग्रह किया कि वे भारतीय व्यापार महोत्सव में देश भर से विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों को आमंत्रित करें। कार्यक्रम में 1,000 व्यवसायों की भागीदारी का हवाला देते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य से 25 महिला उद्यमियों को आमंत्रित किया जाए, जिससे अकेले ही लगभग 700-750 प्रतिभागी शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग और बढ़ती खपत व्यापारियों, उद्योगों और लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असीम अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने सावधान किया कि यदि घरेलू उद्योग देश की आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहते हैं, तो आयात इस कमी को पूरा करेगा।

उन्होंने इस पहल में युवा उद्यमियों, स्टार्टअप्स और देश भर के युवाओं सहित अगली पीढ़ी को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आयात प्रतिस्थापन और वर्तमान में आयात किए जा रहे उत्पादों से संबंधित अवसरों को प्रदर्शित किया जाना चाहिए ताकि लोग घरेलू विनिर्माण की संभावनाओं को समझ सकें।

श्री गोयल ने भारतीय स्वदेशी मेले में रुपे कार्ड और यूपीआई संचालित करने वाली एनपीसीआई को शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि यूपीआई का व्यापक उपयोग हो रहा है, जबकि रुपे कार्ड का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। उन्होंने मेले के पूरे परिसर में 50 से 100 कियोस्क स्थापित करने का सुझाव दिया, जहां आगंतुक आधार और अन्य पहचान दस्तावेजों का उपयोग करके रुपे डेबिट कार्ड प्राप्त कर सकें और यूपीआई या रुपे कार्ड के माध्यम से सभी लेनदेन डिजिटल रूप से कर सकें।

श्री गोयल ने कहा कि इस पहल के लिए बैंकों को एक साथ लाने से भारत की भुगतान प्रणालियों के व्यापक अंगीकरण को प्रोत्साहन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि भारत मंडपम नियमित रूप से प्रदर्शनियों और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन करता है। ऐसी पहल से अधिक लोगों को पूरे देश में रुपे और यूपीआई को अपनाने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस तरह की छोटी-छोटी पहल भारत की अमृतकाल यात्रा को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करेंगी और जनभागीदारी के माध्यम से समृद्ध और विकसित भारत की राह को सुदृढ़ करेंगी। उन्होंने कहा कि जब प्रत्येक व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ाता है, तो देश 140 करोड़ कदम आगे बढ़ता है।

श्री गोयल ने सभी हितधारकों से भारतीय व्यापार महोत्सव को सफल बनाने के लिए मिलकर काम करने का आग्रह किया और कार्यक्रम के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं।

भारतीय व्यापार महोत्सव 12 अगस्त – 15 अगस्त 2026 तक चलेगा।

सोने के बाद अब चांदी की बारी: सरकार ने चांदी के आयात पर कसी नकेल, इंपोर्ट के लिए लेनी होगी मंजूरी

नेशनल डेस्क : केंद्र सरकार ने देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को नियंत्रित करने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए चांदी के आयात पर नई पाबंदियां लागू कर दी हैं। सरकार ने चांदी की कई श्रेणियों को ‘फ्री’ लिस्ट से हटाकर ‘रिस्ट्रिक्टेड’ (प्रतिबंधित) कैटेगरी में डाल दिया है, जिसका अर्थ है कि अब इनके आयात के लिए अतिरिक्त सरकारी मंजूरी की आवश्यकता होगी।

क्यों लिया गया यह फैसला? सरकार का मुख्य उद्देश्य बढ़ते आयात को कम करना और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) पर पड़ने वाले दबाव को नियंत्रित करना है। अधिकारियों को यह चिंता सता रही है कि सोने पर आयात शुल्क बढ़ने के बाद निवेशक और ज्वेलरी खरीदार चांदी की ओर रुख कर सकते हैं। इसी संभावना को देखते हुए चांदी के आयात पर सख्ती बढ़ाई गई है ताकि चालू खाते के घाटे (CAD) को बढ़ने से रोका जा सके।

आयात शुल्क में पहले ही हुई है बढ़ोतरी: हाल ही में सरकार ने सोना और चांदी दोनों पर इम्पोर्ट ड्यूटी को 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए विदेशी मुद्रा बचाना सरकार की प्राथमिकता है।

30 साल के निचले स्तर पर पहुंचा आयात : सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, ऊंची ड्यूटी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों की वजह से अप्रैल महीने में सोने और चांदी का आयात पहले ही 30 साल के निचले स्तर पर पहुंच चुका है। अब नई पाबंदियों के लागू होने के बाद आने वाले महीनों में चांदी के आयात में और अधिक गिरावट देखने को मिल सकती है।