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बकरीद क्या है और क्यों मनाई जाती है? जाने त्याग और विश्वास का पर्व, भारतीय अर्थव्यवस्था में ₹50,000 करोड़ का योगदान

नई दिल्ली: दुनियाभर के साथ-साथ भारत में भी मुसलमान बकरीद (ईद-उल-अज़हा) का त्योहार बड़े उत्साह के साथ मना रहे हैं। इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने ‘ज़िल-हिज्जा’ की 10 तारीख को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी एक बड़ी भूमिका निभाता है।

इतिहास और महत्व बकरीद की कहानी: करीब 2000 ईसा पूर्व पैगंबर इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल के त्याग से जुड़ी है। यह त्योहार ईश्वर पर अटूट भरोसे और बलिदान का संदेश देता है। इस दिन कुर्बानी के गोश्त को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने की परंपरा है, जो इस्लाम में ‘ज़कात’ की तरह दान का संदेश देती है।

अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव : जानकारों के अनुसार, केवल बकरीद के मौके पर भारत में जानवरों से जुड़ा कारोबार करीब 50,000 करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है। एक अनुमान के मुताबिक, इस अवसर पर करीब 1.5 करोड़ जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। इस कारोबार से न केवल पशुपालक, बल्कि चारा बेचने वाले, वेटनरी डॉक्टर, ट्रांसपोर्टर, कसाई और चमड़ा कारोबारी भी जुड़े होते हैं।

पशुपालन और गोट फॉर्मिंग : भारत के कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में पशुपालन ग्रामीण रोजगार का अहम जरिया है। यूपी में यादव और गुर्जर, राजस्थान में रबारी और मालधारी, तथा गुजरात के कच्छ-सौराष्ट्र में मालधारी समुदाय पारंपरिक रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं। वर्तमान में ‘गोट फॉर्मिंग’ का कारोबार भी तेजी से फल-फूल रहा है, जिससे पिछड़े वर्ग, दलित और आदिवासी समाज के लोग आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।

महंगे बकरों की मांग : इस साल मंडियों में बकरों की भारी मांग देखी गई, जहाँ कुछ खास नस्ल के बकरों की कीमत 50 लाख रुपये तक रही। यहाँ तक कि एक विशेष निशान वाले बकरे की कीमत 4 करोड़ रुपये तक बताई गई है।

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