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BRICS में मोदी-पुतिन की मुलाकात, Su-57 पर रूस का बड़ा ऑफर; भारत में बनेगा फिफ्थ जेनरेशन फाइटर?

BRICS सम्मेलन में PM मोदी और पुतिन की मुलाकात के दौरान Su-57 फिफ्थ जेनरेशन फाइटर पर चर्चा की संभावना है। जानिए रूस का भारत में Su-57 उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रस्ताव कितना अहम है।

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली मुलाकात पर भारत-रूस रक्षा सहयोग को लेकर खास नजर रहेगी। दोनों नेताओं की बातचीत में रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट Su-57 को लेकर चर्चा अहम मुद्दा बन सकती है। सूत्रों के मुताबिक, रूस भारत के साथ Su-57 की तकनीक, स्थानीय उत्पादन और मेंटेनेंस क्षमता विकसित करने के विकल्प पर आगे बढ़ना चाहता है।

रूस की ओर से पहले भी भारत में Su-57 के निर्माण का प्रस्ताव दिए जाने की बात सामने आती रही है। संभावित प्रस्ताव में भारत में स्थानीय उत्पादन के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और विमान के रखरखाव से जुड़ा स्वदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर जोर हो सकता है। अगर यह बातचीत किसी ठोस समझौते की दिशा में बढ़ती है, तो इसे भारत-रूस रक्षा साझेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

Su-57 क्यों है खास?

Su-57 रूस का प्रमुख पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ मल्टीरोल फाइटर है। इसे कम रडार दृश्यता, सुपरमैन्युवरेबिलिटी, एडवांस सेंसर और आंतरिक हथियार ले जाने जैसी क्षमताओं के लिए जाना जाता है।

रूस इसके एक्सपोर्ट वेरिएंट Su-57E को भी आगे बढ़ा रहा है। इसके लिए अलग-अलग एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड हथियारों के विकल्प पेश किए जा रहे हैं। इनमें RVV-MD2, RVV-SDM और RVV-BD जैसे एयर-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के अलावा Kh-69 स्टील्थ क्रूज मिसाइल और Kh-38MLE जैसे हथियार शामिल बताए जाते हैं।

यानी भारत के लिए Su-57 केवल एक फाइटर जेट की खरीद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके साथ ट्रेनिंग, हथियार, मेंटेनेंस और उत्पादन क्षमता वाला एक व्यापक फिफ्थ जेनरेशन कॉम्बैट इकोसिस्टम विकसित करने का विकल्प भी हो सकता है।

भारत में बन सकता है Su-57

रूस के प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा भारत में Su-57 का उत्पादन हो सकता है। इसके लिए भारत में मौजूद Su-30MKI से जुड़ी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल की संभावना पर भी चर्चा होती रही है।

हालांकि, किसी भी संभावित डील में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा Technology Transfer होगा। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में अगर रूस महत्वपूर्ण तकनीकों के साथ भारत में उत्पादन की पर्याप्त क्षमता विकसित करने में मदद करता है, तो इससे भारतीय एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिल सकता है।

Su-75 भी रूस का दूसरा विकल्प

रूस के पास Su-57 के अलावा Su-75 Checkmate का विकल्प भी है। Su-75 को Su-57 की तुलना में छोटा, सिंगल-इंजन और अपेक्षाकृत कम लागत वाला पांचवीं पीढ़ी का फाइटर बनाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है।

रूस के मुताबिक, Su-75 को करीब Mach 1.8 की अधिकतम गति और लगभग 7,400 किलोग्राम तक के कॉम्बैट लोड के लिए डिजाइन किया जा रहा है। हालांकि, Su-75 अभी विकास के चरण में है। इसके मुकाबले Su-57 एक operational platform है और इसका export version Su-57E भी रूस की पेशकश का हिस्सा है।

भारत के लिए क्यों अहम है Su-57?

भारत के सामने एक तरफ फाइटर स्क्वाड्रनों की संख्या को लेकर चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ चीन की तेजी से बढ़ती वायु शक्ति भी रणनीतिक चिंता का विषय है। दूसरी ओर भारत का स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft यानी AMCA अभी विकास और आगे चलकर उत्पादन की लंबी प्रक्रिया से गुजरेगा।

ऐसे में Su-57 भारत को AMCA के पूरी तरह operational होने से पहले पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमता हासिल करने का एक विकल्प दे सकता है।

हालांकि, भारत के लिए यह फैसला केवल किसी विदेशी फाइटर की खरीद का नहीं होगा। नई तकनीक, लागत, स्वदेशी उत्पादन, मेंटेनेंस, हथियार प्रणाली और भविष्य में अपग्रेड की क्षमता जैसे कई पहलुओं पर विचार करना होगा।

सबसे बड़ा सवाल: क्या होगा डील का मॉडल?

अगर BRICS सम्मेलन के दौरान Su-57 को लेकर बातचीत आगे बढ़ती है, तो सबसे बड़ा सवाल केवल विमान की कीमत नहीं बल्कि Technology Transfer, Make in India, Local Production, Engine Technology, Radar, Electronic Warfare और Maintenance Ecosystem को लेकर होगा।

भारत के लिए किसी भी संभावित समझौते में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रूस कितनी महत्वपूर्ण तकनीक साझा करने के लिए तैयार है और भारत में उत्पादन की वास्तविक क्षमता किस स्तर तक विकसित की जा सकती है।

यही वजह है कि BRICS के दौरान मोदी-पुतिन मुलाकात पर नजर सिर्फ इस बात पर नहीं होगी कि दोनों नेताओं के बीच Su-57 को लेकर चर्चा होती है या नहीं, बल्कि इस पर भी होगी कि क्या रूस भारत को फिफ्थ जेनरेशन फाइटर के उत्पादन और तकनीकी क्षमता में बड़ी भूमिका देने के लिए तैयार है।

अगर भारत में Su-57 का उत्पादन और महत्वपूर्ण तकनीकों का हस्तांतरण किसी ठोस मॉडल के तहत संभव होता है, तो यह भारत-रूस रक्षा साझेदारी में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव साबित हो सकता है।

Su-30MKI बनेगा और घातक! 300 KM तक मार करने वाली रूसी मिसाइल पर भारत की नजर

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच लंबे समय से चली आ रही रक्षा साझेदारी के बीच एक बड़ा प्रस्ताव सामने आया है। भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों को रूस की लंबी दूरी की RVV-BD एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस करने के प्रस्ताव पर रक्षा मंत्रालय स्तर पर विचार किया जा रहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात पर दुनिया की नजर है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, RVV-BD को Su-30MKI के साथ इंटीग्रेट करने के लिए विमान में जरूरी तकनीकी बदलाव किए जाने का प्रस्ताव है। मिसाइल की बताई गई मारक क्षमता करीब 300 किलोमीटर तक है। अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और आगे चलकर इसका तकनीकी एकीकरण सफल रहता है, तो भारतीय वायुसेना की Beyond Visual Range यानी BVR एयर कॉम्बैट क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

मोदी-पुतिन मुलाकात पर टिकी नजर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने की पुष्टि क्रेमलिन की ओर से की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच 11 सितंबर को द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। दोनों नेताओं के बीच रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग सहित कई मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

भारत सरकार के अनुसार, मोदी और पुतिन ने 31 अगस्त को बिश्केक में हुई मुलाकात के दौरान राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की समीक्षा की थी। दोनों देशों ने अपनी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को आगे मजबूत करने पर भी सहमति जताई थी।

क्या है RVV-BD की खासियत?

RVV-BD रूस की लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके विभिन्न संस्करण लंबी दूरी के हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए विकसित किए गए हैं। करीब 300 किलोमीटर तक की बताई गई रेंज और बेहद तेज गति के कारण ऐसी मिसाइलें सामान्य लड़ाकू विमानों के साथ-साथ दुश्मन के हाई-वैल्यू एयरबोर्न प्लेटफॉर्म के खिलाफ भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

इनमें Airborne Early Warning and Control यानी AEW&C/AWACS विमान, निगरानी विमान और अन्य महत्वपूर्ण हवाई प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं। हालांकि वास्तविक प्रभाव मिसाइल के अंतिम संस्करण, सेंसर नेटवर्क, फायर-कंट्रोल सिस्टम और विमान के साथ उसके तकनीकी एकीकरण पर निर्भर करेगा।

Su-30MKI की ताकत में होगा इजाफा

Su-30MKI भारतीय वायुसेना के प्रमुख लड़ाकू विमानों में शामिल है और 260 से अधिक विमान भारतीय बेड़े में बताए जाते हैं। भारत इस फ्लीट के आधुनिकीकरण पर भी काम कर रहा है, जिसमें एवियोनिक्स, सेंसर और अन्य प्रणालियों को अपग्रेड किया जा रहा है।

ऐसे में अगर RVV-BD का Su-30MKI के साथ सफल एकीकरण होता है, तो विमान की लंबी दूरी से हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। खास तौर पर आधुनिक BVR युद्ध में लंबी दूरी की मिसाइलें किसी भी वायुसेना के लिए रणनीतिक बढ़त का अहम हिस्सा होती हैं।

रूस के साथ डील के साथ स्वदेशी विकल्प पर भी जोर

भारत रूस से लंबी दूरी की मिसाइल हासिल करने के विकल्प पर विचार कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही स्वदेशी एयर-टू-एयर हथियारों के विकास पर भी जोर जारी है। DRDO की Astra मिसाइल श्रृंखला को लगातार विकसित किया जा रहा है और भविष्य में लंबी दूरी के स्वदेशी एयर-टू-एयर हथियार भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

इसके अलावा भारत ने फ्रांस से Meteor एयर-टू-एयर मिसाइलों की खरीद भी की है। ऐसे में भारतीय वायुसेना की रणनीति में स्वदेशी और विदेशी दोनों तरह के लंबी दूरी के एयर-टू-एयर हथियारों का मिश्रण देखने को मिल रहा है।

क्या BRICS के दौरान आगे बढ़ेगा प्रस्ताव?

फिलहाल RVV-BD को लेकर किसी अंतिम डील या करार की घोषणा नहीं हुई है। इसे एक प्रस्ताव के तौर पर देखा जा रहा है, जिस पर तकनीकी, वित्तीय और रणनीतिक पहलुओं के आधार पर आगे फैसला होना है।

ऐसे में 11 सितंबर को होने वाली मोदी-पुतिन द्विपक्षीय बैठक और उसके बाद BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-रूस रक्षा सहयोग पर होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, मौजूदा रिपोर्टों में पुतिन-मोदी बातचीत के प्रमुख रक्षा मुद्दों में रूस के Su-57 लड़ाकू विमान से जुड़े तकनीकी सहयोग का भी उल्लेख किया गया है।

अगर RVV-BD प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और इसके इंटीग्रेशन तथा सप्लाई से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनती है, तो Su-30MKI की लंबी दूरी की BVR क्षमता को मजबूत करने की दिशा में यह एक अहम कदम साबित हो सकता है।

ब्रिक्स देशों ने TCIM को मज़बूत करने के लिए मिलाया हाथ, एक्सपर्ट वर्किंग ग्रुप का गठन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

प्रतिनिधिमंडल ने आयुष ज़ोन के जरिए आयुष में खुद को शामिल किया, आयुष आहार, हेल्थ और वेलनेस कंसल्टेशन और भारत की हर्बल विरासत का अनुभव किया

भारत ने अपनी ब्रिक्स 2026 अध्यक्षता के तहत 21 जुलाई को चंडीगढ़ में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (टीसीआईएम) पर ब्रिक्स बैठक का सफलतापूर्वक आयोजन किया। यह बैठक चंडीगढ़ में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण केंद्रीय मंत्रालय और आयुष मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित ब्रिक्स हेल्थ ट्रैक कार्यक्रमों के व्यापक चार-दिवसीय समारोह का एक हिस्सा थी। इस टीसीआईएम बैठक ने बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने, ज्ञान और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और पारंपरिक, पूरक व एकीकृत चिकित्सा के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए ब्रिक्स सदस्य देशों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों को एक साथ लाया।

लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण की व्यापक ब्रिक्स अध्यक्षता थीम के तहत आयोजित, इस बैठक ने साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को बढ़ावा देने, संस्थागत साझेदारियों को मजबूत करने और टिकाऊ व लचीली स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में योगदान देने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाया।

इस बैठक में ब्रिक्स के सदस्य देशों ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात की भागीदारी देखी गई, जिसने ‘पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा’ के क्षेत्र में सर्वोत्तम प्रथाओं, नीतिगत अनुभवों और वैज्ञानिक प्रगति के आदान-प्रदान के लिए एक मंच प्रदान किया।

टीसीआईएम पर औपचारिक कार्रवाई आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा के स्वागत संबोधन से शुरू हुई, जिसके बाद प्रस्तावित मेंबर डेलीगेशन ने ओपनिंग रिमार्क्स दिए। टीसीआईएम पर ब्रिक्स एक्सपर्ट वर्किंग ग्रुप के लिए टर्म्स ऑफ़ रेफरेंस (ToR) सभी उपलब्ध मेंबर देशों की आम सहमति से फाइनल किए गए। मीटिंग में ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने, पॉलिसी अप्रोच में तालमेल बिठाने और सहयोग के भविष्य के एरिया की पहचान करने पर इंटरैक्टिव चर्चा भी हुई।

आयुष मंत्रालय ने “कैपेसिटी बिल्डिंग, एजुकेशन और ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट” पर एक डेडिकेटेड साइड इवेंट भी ऑर्गनाइज़ किया। सेशन में एकेडमिक सहयोग, आयुष स्कॉलरशिप इनिशिएटिव, फैकल्टी और स्टूडेंट एक्सचेंज, रिसर्च पार्टनरशिप और एविडेंस-जेनरेशन मैकेनिज्म के ज़रिए ट्रेडिशनल मेडिसिन में ग्लोबल एजुकेशन और ट्रेनिंग को मजबूत करने पर फोकस किया गया, जिसका मकसद ग्लोबली कनेक्टेड TCIM इकोसिस्टम बनाना है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 के हिस्से के रूप में, आयुष मंत्रालय के सचिव, वैद्य राजेश कोटेचा ने ‘आयुष ज़ोन’ का भी उद्घाटन किया, जो भारत की समग्र स्वास्थ्य देखभाल पहलों को प्रदर्शित करता है। आयुष ज़ोन ने आयुष आहार, स्वास्थ्य और कल्याण परामर्श, भारत की हर्बल विरासत, मंत्रालय के दृष्टिकोण व वैश्विक पहलों और अनुसंधान, नवाचार व ज्ञान पर केंद्रित एक समर्पित केंद्र के माध्यम से ब्रिक्स प्रतिनिधियों को आयुष का एक गहन अनुभव प्रदान किया। वेलनेस गतिविधियों और योग को शामिल करते हुए, आयुष ज़ोन ने पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाया।

टीसीआईएम चर्चाओं ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नेतृत्व वाले व्यापक ब्रिक्स हेल्थ ट्रैक में योगदान दिया और ब्रिक्स देशों के बीच स्वास्थ्य सहयोग को मजबूत करने पर चल रही चर्चाओं का समर्थन किया।

चार दिवसीय कार्यक्रम में भारत की समग्र स्वास्थ्य देखभाल परंपराओं को प्रदर्शित करने वाली कई वेलनेस और सांस्कृतिक गतिविधियां भी शामिल हैं। प्रतिनिधियों ने चेयर योग सत्रों में भाग लिया, और मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (MDNIY) द्वारा आयोजित सामान्य योग प्रोटोकॉल (CYP) प्रदर्शनों, बैठकों के दौरान ‘योग ब्रेक’ (Y-Break) सत्रों और ‘फिट इंडिया रन’ में भाग लेंगे।

आयुष ज़ोन, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) के तकनीकी सहयोग से आयोजित ‘आयुष आहार मेला’ के साथ, स्वास्थ्य परामर्श, अनुसंधान व नवाचार प्रदर्शनियों, लाइव योग प्रदर्शनों और अन्य वेलनेस गतिविधियों के माध्यम से भारत के पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदर्शित करता है, जो प्रतिनिधियों को देश की समग्र स्वास्थ्य परंपराओं का एक व्यापक अनुभव प्रदान करता है।

इस बैठक से कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए, जिसमें पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पर ब्रिक्स विशेषज्ञ कार्य समूह की स्थापना की दिशा में प्रगति, अनुसंधान, शिक्षा और नियामक ढांचों में बढ़ा हुआ सहयोग, सदस्य देशों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान में सुधार और ब्रिक्स स्वास्थ्य एजेंडे के भीतर इन चिकित्सा प्रणालियों की मजबूत पहचान शामिल है।

ब्रिक्स TCIM बैठक ने साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने, अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ावा देने और सभी के लिए समग्र, सुलभ व टिकाऊ स्वास्थ्य सेवा को आगे बढ़ाने के प्रति भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

नारी शक्ति: वादों से लेकर कर दिखाने तक: ब्रिक्स में भारत का योगदान

भारत ने 1 जनवरी 2026 को “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” की थीम के तहत ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली। महिलाओं से जुड़े मामलों में हमारा योगदान बेहद खास रहा है। हम सिर्फ़ कोई नारा या तारीफ़ के लिए सफल कहानियों का संग्रह पेश नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसा कामकाजी ढांचा लेकर आए हैं, जो करोड़ों महिलाओं तक पहुँचा है। यह ढांचा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां से शुरू होकर जहाँ भी जाता है, वहाँ आगे और विकसित होने के लिए तैयार रहता है।

यही भारत की खास बात है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से  भारत ने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एक राष्ट्रीय मिशन के तौर पर अपनाया है और इस काम को इतने बड़े पैमाने पर किया है, जिसकी बराबरी बेहद कम देश कर सकते हैं। 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान, भारत ने वैश्विक सोच को “महिलाओं के विकास” से बदलकर “महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास” की ओर मोड़ने में मदद की। यह महज़ शब्दों का बदलाव नहीं था, बल्कि सोच का भी बदलाव था। महिलाओं को सिर्फ़ लाभार्थी के तौर पर देखने के बजाय, उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका में देखना। कोच्चि में हम इसी बदलाव से जुड़ा सवाल उठा रहे हैं: एक बार वादा करने के बाद, उसे बड़े पैमाने पर, आख़िरी गाँव की आख़िरी महिला तक कैसे पहुँचाया जाए? भारत ने पिछले दस सालों में सिर्फ़ सैद्धांतिक तौर पर नहीं, बल्कि असल में इस सवाल का जवाब दिया है।

भारत के लिए यह सोच नई नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है। विकास की भाषा के आने से काफी पहले ही, हमारी संस्कृति ने नारी को शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्रोत माना था। ये तीनों ही वे आधार हैं, जिन पर कोई भी समाज तरक्की करता है और उन्हें देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता रहा है। दैवीय शक्ति को ही ‘शक्ति’ कहा जाता है और संस्कृत के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार, जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता भी प्रसन्न होते हैं। यह सम्मान सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं था: लोपामुद्रा और घोषा जैसी महिला ऋषियों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की और गार्गी और मैत्रेयी जैसी दार्शनिकों ने उपनिषदों के प्रसिद्ध वाद विवादों में अपनी बात मज़बूती से रखी। इसलिए, भारत के लिए महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास, किसी और से लिया हुआ विचार नहीं है, बल्कि एक प्राचीन विचार का ही आधुनिक रूप है।

शुरुआत फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से करते हैं। भारत की पंचायती राज संस्थाओं में चुने गए प्रतिनिधियों में से लगभग आधी महिलाएँ हैं, जो दुनिया में चुनी हुई महिला नेताओं के सबसे बड़े समूहों में से एक है। इसके अलावा नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का अंत सिर्फ़ प्रतिनिधित्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां से इसकी शुरुआत होती है। ऐसा मॉडल, जो महिलाओं को सेवाएँ तो देता है, लेकिन उन सेवाओं को तय करने वाले फ़ैसलों में उन्हें शामिल नहीं करता, वह असल में महिलाओं के नेतृत्व वाला मॉडल नहीं है।

भारत में सेवा पहुँचाने का ढाँचा तीन हिस्सों पर टिका है, जो एक साथ मिलकर ही काम करते हैं। पहला हिस्सा है पहुँच: डिजिटल जन अवसंरचना, फ़ायदों को सीधे महिलाओं के हाथों तक पहुँचाती है। आधार से जुड़े ट्रांसफ़र उन बिचौलियों की भूमिका को खत्म कर रहे हैं, जो पहले मदद पहुँचने से पहले ही उसे दूसरी तरफ़ मोड़ देते थे। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना इस पहुँच का व्यावहारिक उदाहरण है।  4.26 करोड़ से ज़्यादा माताओं को मातृत्व लाभ के तौर पर 20,060 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि सीधे उनके आधार से जुड़े खातों के ज़रिए मिली है। दूसरा हिस्सा है संस्थाएँ: डीएवाई-एनआरएलएम के तहत, 10.05 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण महिलाओं को 90.90 लाख से ज़्यादा स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जो दुनिया में महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक संस्थाओं का सबसे बड़ा नेटवर्क है। तीसरा हिस्सा है गतिशीलता—यानी मूल्य श्रृंखला में हमेशा सबसे नीचे बने रहने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ने का एक सोच-समझकर चुना गया रास्ता। भारत अब 65,949 एसएचजी महिलाओं को बिज़नेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट यानी बीसी सखी के तौर पर तैनात कर रहा है, जो दूर-दराज़ के इलाकों में जमा, क्रेडिट, धनराशि भेजने और पेंशन सेवाएँ पहुँचाती हैं। जो महिला कभी किसी लाभ के लिए कतार में लगती थी, अब वही महिला उस लाभ को दूसरों तक पहुँचाती है।

कुल मिलाकर ये सब मिलकर भागीदारी को आमदनी और मालिकाना हक में बदलते हैं। लखपति दीदी पहल के तहत, जून 2025 तक 1.48 करोड़ स्वयं सहायता समूह महिलाओं की सालाना कमाई कम से कम 1 लाख रुपए तक पहुँच गई थी और जनवरी 2026 में शुरू किए गए उद्यमिता पर केंद्रित एक राष्ट्रीय अभियान का मकसद 50,000 सामुदायिक संसाधन व्यक्ति के ज़रिए 50 लाख अतिरिक्त महिलाओं को प्रशिक्षण देना है। तरक्की का यही रास्ता औपचारिक कारोबार में भी दिखता है: पीएमएमवाई के तहत दिए गए ऋण में से 69 प्रतिशत और ‘स्टैंड-अप इंडिया’ के लाभार्थियों में से 84 प्रतिशत महिलाएँ हैं। डीपीआईआईटी द्वारा मान्यता प्राप्त 2.12 लाख स्टार्टअप्स में से 1.02 लाख से ज़्यादा स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या हिस्सेदार है और इनमें से कई स्टार्टअप बड़े शहरों के बजाय छोटे शहरों में हैं। हम ब्रिक्स को ये ब्रांड नाम नहीं, बल्कि उनके पीछे की कहानी पेश करते हैं: पहले पहुँच, फिर संस्थाएँ और फिर लाभार्थी से उद्यमी बनने का एक व्यवस्थित मार्ग।

आँकड़े भी इस बदलाव को दिखाते हैं। भारत में महिलाओं की कामकाजी आबादी में भागीदारी 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है और इसी दौरान महिलाओं में बेरोज़गारी दर 5.6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हो गई है। अब पहले से कहीं ज़्यादा महिलाएँ कार्यबल का हिस्सा हैं, इसलिए हमारा फोकस अब अगले चरण पर है, उनके काम की गुणवत्ता और आमदनी को और बेहतर बनाना।

इस साल महिलाओं से जुड़े कामों के लिए चार प्राथमिकता वाले क्षेत्र तय किए गए हैं और इनमें से एक सीधे हमारे अनुभव से जुड़ा है: जलवायु कार्यवाही, खाद्य सुरक्षा और पोषण में महिलाओं की भूमिका। इस बारे में साक्ष्य भी साफ नतीजे बयां करते हैं: जब फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाएं शामिल होती हैं, तो पोषण बेहतर मिलता है और समुदाय चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाते हैं। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। झारखंड में महिला किसानों को ऐसी बीजों की किस्मों की जानकारी है, जो सूखे के दौरान भी बची रहती हैं। राजस्थान में महिला पशुपालकों को उन रास्तों की भी जानकारी है, जिनसे सूखे के समय मवेशियों को सुरक्षित ले जाया जा सकता है। भारत का काम ऐसे संस्थान बनाना रहा है, जो इस जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल करें, न कि इसे नज़रअंदाज़ करें। मिशन पोषण 2.0 आंगनवाड़ी नेटवर्क के ज़रिए चलाया जाता है, जिसमें महिलाएं काम करती हैं और वे ही लोगों तक सेवा पहुंचाने की भरोसेमंद कड़ी होती हैं। जलवायु के अनुसार ढलने का काम भी इसी तरह होता है, चाहे वह लद्दाख में महिलाओं द्वारा बनाए गए ऊंचे इलाकों में पानी जमा करने के ढांचे हों या ओडिशा के तट पर वनस्पति के घने इलाकों को बचाने वाली समितियां। महिलाएं अब सिर्फ़ अनुकूलन की तकनीक का इस्तेमाल करने वाली नहीं रह गई हैं, बल्कि वे खुद इसे आगे बढ़ा भी रही हैं: नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत, स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को खेती में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह ज़्यादा कौशल और ज़्यादा आमदनी वाले काम की ओर एक सोच-समझकर उठाया गया कदम है।

एक खास बात जो पूरी तरह से भारत की वास्तविक विशेषता बन गई है।  एक ज़िला एक उत्पाद पहल के तहत अब 761 ज़िलों में 1,102 उत्पाद शामिल हैं। महिला समूह हथकरघा, जीआई टैग वाले शिल्प और क्षेत्रीय खाद्य पदार्थों जैसे स्थानीय विशेष उत्पादों को ब्रांडेड और तेज़ी से निर्यात होने वाले उत्पादों में बदल रहे हैं। सरकार भी इन उत्पादों के लिए बाज़ार तक पहुँचने का रास्ता बना रही है: अवसर योजना के तहत हवाई अड्डों पर महिलाओं के लिए आरक्षित रिटेल जगह और ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के तहत महिला-संचालित उद्यमों के लिए जेम पर एक खास स्थान। असल मायनों में यह टिकाऊ व्यवस्था है, जिसके तहत स्थानीय सामग्री, स्थानीय कौशल और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला, जो समुदाय के भीतर ही अपना मूल्य बनाए रखती हैं और ये विकास का ऐसा रूप भी है, जिसके लिए किसी महिला को बाज़ार तक पहुँचने के लिए अपना ज़िला छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास सरकार द्वारा की गई महज़ कोई घोषणा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे एक-एक हिस्से को जोड़कर तब तक बनाया और संचालित किया जाता है, जब तक कि यह उस आखिरी महिला तक न पहुँच जाए, जिसके लिए इसे बनाया गया था। जुलाई में कोच्चि में होने वाली मंत्रियों की बैठक में, भारत इस मॉडल को एक योगदान के तौर पर पेश करेगा, न कि किसी ऐसे उपाय के तौर पर, जिसे दूसरों को भी अपनाना ही हो। इसका मकसद यह है कि दूसरे इससे सीख सकें और इसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढाल सकें। यही व्यवस्था और इसके सफल होने के सबूत, भारत ब्रिक्स के सामने रख रहा है। यह आदान-प्रदान दोनों तरफ से होता है: भारत कोच्चि में अपने ब्रिक्स सहयोगियों के बेहतरीन तौर-तरीकों से सीखने और अपने अनुभव साझा करने के लिए तैयार है।

(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

ब्रिक्स 2026: भारत की अध्यक्षता में कृषि व्यापार को अधिक भरोसेमंद और किसान-केंद्रित बनाने का अवसर

भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय कर रहा है जब कृषि व्यापार की चर्चा केवल शुल्क और बाजार पहुंच तक सीमित नहीं रह गई है। जलवायु संकट, खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव, उर्वरकों की आपूर्ति में रुकावट, सतत उत्पादन से जुड़े मानक, उत्पाद के स्रोत और गुणवत्ता की डिजिटल जानकारी तथा संकट के समय बाजारों को खुला रखने की जरूरत अब कृषि व्यापार के अहम मुद्दे बन चुके हैं।

कृषि क्यों महत्वपूर्ण है

ब्रिक्स के विस्तार के बाद यह समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी, वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। संयुक्त राष्ट्र की व्यापार एवं विकास संस्था, अंकटाड, के हालिया आकलन के अनुसार, ब्रिक्स देशों के बीच वस्तुओं का व्यापार 2003 के बाद तेरह गुना से अधिक बढ़ा है और 2024 में 1.17 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। कृषि इस बड़े व्यापारिक परिदृश्य का केवल एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से यह सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में है। जब खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, उर्वरकों की आपूर्ति रुकती है या समुद्री मार्गों में अनिश्चितता आती है, तो इसका सीधा असर किसानों, उपभोक्ताओं और सरकारों पर पड़ता है। इसलिए कृषि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।

ब्रिक्स देशों के बीच कृषि के क्षेत्र में कई तरह की पूरकताएं हैं। ब्राजील सोयाबीन, मांस और चीनी का बड़ा निर्यातक है। रूस अनाज और उर्वरकों में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। भारत चावल, समुद्री उत्पाद, मसाले, भैंस के मांस और छोटे किसानों से जुड़ी कई कृषि वस्तुओं में मजबूत स्थिति रखता है। चीन खाद्य पदार्थों का बड़ा आयातक और प्रसंस्करण करने वाला देश है। दक्षिण अफ्रीका इस समूह को अफ्रीका के महत्वपूर्ण कृषि-खाद्य बाजारों से जोड़ता है। नए सदस्य भी इसमें नए आयाम जोड़ते हैं। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब लॉजिस्टिक्स, वित्त और खाद्य सुरक्षा निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। मिस्र और इथियोपिया अफ्रीका की खाद्य प्रणाली से जुड़ी चिंताओं को सामने लाते हैं, जबकि इंडोनेशिया पाम ऑयल, मत्स्य क्षेत्र और उष्णकटिबंधीय कृषि की ताकत जोड़ता है।

आपसी ताकतों को ठोस व्यवस्था में बदलना

लेकिन केवल बड़े पैमाने और आपसी ताकतों के मेल से अपने-आप मजबूत व्यापार व्यवस्था नहीं बनती। आगामी ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक भारत को यह अवसर देती है कि वह सहयोग को कुछ ठोस दिशाओं में आगे बढ़ाए। इनमें भरोसेमंद व्यापार व्यवस्था, बीज, उर्वरक और अन्य उत्पादन सामग्री की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, बेहतर बाजार जानकारी और ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं शामिल हैं जिनमें छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी हो।

भरोसेमंद व्यापार व्यवस्था को शुरुआती प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कृषि व्यापार में केवल माल भेजना पर्याप्त नहीं है; यह भी उतना ही जरूरी है कि उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा और स्रोत पर भरोसा हो। कृषि व्यापार सुविधा पर 2024 के ब्रिक्स सिद्धांत पहले ही खाद्य सुरक्षा, पशु-पौध स्वास्थ्य और तकनीकी मानकों से जुड़े सहयोग, एक-दूसरे के मानकों को स्वीकार करने की व्यवस्था, कम व्यापार लागत और डिजिटल व्यापार सुविधा जैसे बुनियादी मुद्दों को मान्यता देते हैं। भारत इस एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए डिजिटल प्रमाणपत्रों, उत्पाद के स्रोत और गुणवत्ता की भरोसेमंद डिजिटल जानकारी, नियामकों के बीच तेज संवाद और उत्पादकों व निर्यातकों की क्षमता निर्माण पर जोर दे सकता है।

दूसरी प्राथमिकता मजबूत आपूर्ति श्रृंखला होनी चाहिए। खाद्य व्यापार को उर्वरक, ऊर्जा, पशु आहार, बीज, ढुलाई-भंडारण और वित्त से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत के लिए यह कोई दूर की चिंता नहीं है। उसके उर्वरक और ऊर्जा आयात का आधे से अधिक हिस्सा ब्रिक्स देशों से आता है। इसलिए उत्पादन सामग्री की सुरक्षा सीधे कृषि की मजबूती से जुड़ी हुई है। पश्चिम एशिया के हालिया संकटों ने दिखाया है कि खाद्य पदार्थों के बाजार तक पहुंचने से बहुत पहले ही उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए ब्रिक्स सहयोग में उर्वरकों और अन्य उत्पादन सामग्री के बाजारों के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली, भंडार और कीमतों पर पारदर्शी जानकारी, और जरूरी कृषि सामग्री की आपूर्ति में अचानक आने वाली रुकावटों को कम करने की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए।

तीसरी प्राथमिकता बेहतर बाजार जानकारी है। ब्रिक्स अनाज विनिमय का विचार इस बात की जरूरत को दिखाता है कि खाद्य बाजारों में अधिक पारदर्शिता, बेहतर मूल्य संकेत और खाद्य सुरक्षा की तैयारी होनी चाहिए। भारत इस दिशा में ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच के भीतर कृषि बाजार जानकारी से जुड़ी एक व्यवस्था का प्रस्ताव रख सकता है। यह मंच पहले से ही “ज्ञान से कार्य” की दिशा में विकसित किया जा रहा है। ऐसी व्यवस्था खाद्य भंडार, फसल की स्थिति, उर्वरक कीमतों, जहाजरानी जोखिमों, खाद्य सुरक्षा और पशु-पौध स्वास्थ्य से जुड़े अलर्ट तथा प्रमुख कृषि जिंसों के रुझानों पर नियमित जानकारी दे सकती है। इससे देश संकट गहराने से पहले ही तैयारी कर सकेंगे।

व्यापार को किसान-केन्द्रित बनाना

चौथी प्राथमिकता ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं होनी चाहिए जिनमें छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो। यदि कृषि व्यापार केवल बड़ी मात्रा में अनाज, तेल, चीनी या अन्य जिंसों की खरीद-बिक्री तक सीमित रह गया, तो उससे छोटे किसानों और ग्रामीण परिवारों को सीमित लाभ ही मिलेगा। कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका पर वैश्विक सम्मेलन 2026 से निकली दिल्ली घोषणा ने कृषि-खाद्य व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका, नेतृत्व और भागीदारी को केंद्र में रखा है। भारत इस भावना को ब्रिक्स के कृषि व्यापार एजेंडे में आगे बढ़ा सकता है, ताकि छोटे किसानों, विशेषकर महिला किसानों और ग्रामीण युवाओं को केवल बाजार के लिए उत्पादन करने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावी भागीदारी का अवसर मिले।

इन प्राथमिकताओं का उद्देश्य खाद्य पदार्थों से जुड़े किसी बंद गुट का निर्माण करना नहीं है। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि व्यापार एक अनिश्चित दुनिया में खाद्य सुरक्षा, किसानों और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर ढंग से काम करे। भारत इस एजेंडा को आकार देने की दृष्टि से सही स्थिति में है क्योंकि उसे खाद्य सुरक्षा के प्रबंधन, छोटे किसानों पर आधारित कृषि, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और कृषि अनुसंधान का खासा अनुभव है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता इस एजेंडे को व्यावहारिक रूप देने का समय पर मिला अवसर है। छोटे लेकिन सुविचारित कदम भी संकट के समय कृषि व्यापार को अधिक भरोसेमंद, नियमों की दृष्टि से अधिक पारदर्शी और किसानों के लिए अधिक सुलभ बना सकते हैं। यह अधिक मजबूत, भरोसेमंद और किसान-केंद्रित कृषि व्यापार व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

(आईसीएआर के महानिदेशक तथा डीएआरई के सचिव हैं)

(आईसीएआर के एम.एस. स्वामीनाथन चेयर की राष्ट्रीय प्रोफेसर और डीएएफ एंड डब्ल्यू की पूर्व संयुक्त सचिव (जी20/ब्रिक्स) हैं)