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भारत की भूली-बिसरी लौकी-वर्गीय सब्जियों पर वैज्ञानिकों की जेनेटिक नजर, बेहतर पैदावार की उम्मीद

मोहाली / सत्ता संदेश

लौकी, तोरई, करेला, नेनुआ और चिचिंडा जैसी सब्जियां भले ही भारतीय रसोई में बेहद आम हों, लेकिन कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में लंबे समय तक इन फसलों को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला। अब वैज्ञानिक इन ‘भूली-बिसरी’ या ‘अनाथ फसलों’ की पैदावार और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए इनके जेनेटिक रहस्यों को समझने में जुटे हैं।

लौकी-वर्गीय सब्जियां उत्तर भारत के गांवों में आम तौर पर घरों और खेतों में मचान पर उगती दिखाई देती हैं। ये सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने वाली सब्जियां हैं, लेकिन पोषण की दृष्टि से इनका महत्व काफी अधिक है। ऐसे समय में जब भारतीय भोजन में चावल और गेहूं जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी अधिक है, ये सब्जियां शरीर को कई जरूरी विटामिन और खनिज उपलब्ध कराती हैं।

कृषि वैज्ञानिक ऐसी फसलों को ‘अनाथ फसलें’ कहते हैं। इनका महत्व स्थानीय स्तर पर बहुत अधिक होता है, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक ब्रीडिंग में इन्हें चावल, गेहूं, कपास और टमाटर जैसी प्रमुख फसलों की तुलना में लंबे समय तक कम प्राथमिकता मिली।

ज्यादा नर फूल, कम फल बनना बड़ी चुनौती

लौकी-वर्गीय फसलों की एक प्रमुख समस्या इनके फूलों की प्रकृति है। इन पौधों में नर फूलों की संख्या मादा फूलों के मुकाबले बहुत अधिक होती है। जबकि फल केवल मादा फूलों से बनता है। इसके अलावा मादा फूल परागण के लिए बहुत कम समय के लिए तैयार रहता है और इसके लिए मधुमक्खियों जैसे परागण करने वाले कीटों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। पौधा लंबे समय तक तेजी से बढ़ता है, लेकिन उसकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ऐसे नर फूलों के निर्माण में खर्च हो जाता है जो फल नहीं देते।

इसे आसान भाषा में समझें तो किसान के लिए यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें संसाधन ज्यादा खर्च हो रहे हैं, लेकिन उसके मुकाबले फल कम मिल रहे हैं।

IISER मोहाली की टीम तलाश रही जेनेटिक समाधान

इसी समस्या का समाधान तलाशने के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER) मोहाली में डॉ. रवि देवानी की टीम, फ्रांस के पेरिस-सैक्ले स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट साइंसेज में डॉ. बेंदहमाने के रिसर्च ग्रुप के साथ मिलकर काम कर रही है।

वैज्ञानिकों का लक्ष्य अधिक खाद या कीटनाशक के इस्तेमाल के बजाय उन जेनेटिक निर्देशों को समझना है, जो पौधे में यह तय करते हैं कि फूल नर बनेगा या मादा।

इस शोध के लिए फिलहाल लौकी को शुरुआती मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है। लौकी का जीनोम मैप किया जा चुका है और इसमें नए जेनेटिक निर्देशों को शामिल करने की तकनीक भी उपलब्ध है। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए यह दूसरी कम-अनुसंधान वाली लौकी-वर्गीय फसलों की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

हाइब्रिड बीज उत्पादन में भी हो सकता है फायदा

आज बेहतर हाइब्रिड बीज तैयार करने के लिए बीज कंपनियों को दो अलग-अलग पौधों के बीच नियंत्रित क्रॉस कराना पड़ता है। इसके लिए एक पौधे के नर फूल से पराग लेकर उसे दूसरे पौधे के मादा फूल तक पहुंचाना पड़ता है। यह प्रक्रिया समय लेने वाली और श्रमसाध्य होती है, जिसका असर बीज उत्पादन की लागत पर भी पड़ता है।

खरबूजे और खीरे जैसी कुछ फसलों में वैज्ञानिक ऐसी प्लांट लाइनों को विकसित करने में सफल रहे हैं जिनमें अधिकांश फूल मादा होते हैं। इससे पौधे की ऊर्जा फल उत्पादन की दिशा में अधिक इस्तेमाल हो सकती है और हाइब्रिड बीज उत्पादन की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है।

भारतीय लौकी-वर्गीय सब्जियों में इस तरह की रणनीति पर अभी काफी काम किया जाना बाकी है।

जलवायु परिवर्तन और मधुमक्खियों की घटती संख्या भी चुनौती

लौकी-वर्गीय फसलों के लिए केवल फूलों का लिंग ही चुनौती नहीं है। परागण के लिए कीटों पर निर्भरता भी भविष्य में बड़ी समस्या बन सकती है।

बढ़ती गर्मी, हीट वेव और परागण करने वाले कीटों की घटती संख्या ऐसी फसलों के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। अगर मादा फूल के थोड़े समय के परागण योग्य रहने के दौरान पर्याप्त परागण नहीं हुआ, तो फल बनने की संभावना कम हो जाती है।

इसीलिए वैज्ञानिक ऐसे पौधों की संभावनाएं तलाश रहे हैं जिन्हें परागण की इस निर्भरता से कम प्रभावित किया जा सके।

हर्माफ्रोडाइट फूल और पार्थेनोकार्पी पर भी नजर

शोध की एक दिशा ऐसे फूलों की ओर है जिनमें नर और मादा दोनों प्रजनन अंग एक ही फूल में मौजूद हों। ऐसे हर्माफ्रोडाइट फूल कुछ परिस्थितियों में बाहरी परागण पर निर्भरता कम कर सकते हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण संभावना ‘पार्थेनोकार्पी’ है। इसका अर्थ है बिना निषेचन के फल का विकसित होना। अगर लौकी-वर्गीय फसलों में ऐसी क्षमता विकसित की जा सके, तो फल बनने के लिए समय पर मधुमक्खियों या अन्य परागण करने वाले कीटों की मौजूदगी पर निर्भरता कम हो सकती है।

इससे गर्मी की लहरों और कमजोर परागण वाले मौसम में भी उत्पादन को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।

खीरे और खरबूजे से मिले जेनेटिक संकेत

डॉ. बेंदहमाने और डॉ. रवि देवानी की टीम ने खरबूजे और खीरे में फूलों के लिंग को नियंत्रित करने वाले जेनेटिक स्विच की पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण शोध किए हैं। इन शोधों को ‘साइंस’, ‘नेचर’ और ‘नेचर प्लांट्स’ जैसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल्स में प्रकाशित किया जा चुका है।

हालांकि, सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या लौकी और उससे जुड़ी दूसरी फसलों में भी फूलों के लिंग को नियंत्रित करने वाले वही जेनेटिक स्विच मौजूद हैं।

लौकी और खीरे के बीच विकासवादी दूरी काफी पुरानी है। दोनों का अंतिम साझा पूर्वज करोड़ों वर्ष पहले मौजूद था। इतने लंबे समय में दोनों पौधों के जेनेटिक निर्देशों में काफी बदलाव हो चुके हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि खीरे में काम करने वाला जेनेटिक स्विच लौकी में भी उसी तरह काम करे।

यही सवाल अब वैज्ञानिकों के लिए अगले चरण के शोध का केंद्र है। अगर इन फसलों में फूलों के लिंग, परागण और फल बनने की प्रक्रिया को जेनेटिक स्तर पर बेहतर ढंग से नियंत्रित करने में सफलता मिलती है, तो भारत की पारंपरिक और लंबे समय से उपेक्षित लौकी-वर्गीय सब्जियों की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

आइसलैंड में भारतीय दूतावास और एपीडा ने पहली बार भारतीय आमों का प्रसार कार्यक्रम आयोजित किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

आइसलैंड की राजधानी रेक्याविक स्थित भारतीय दूतावास ने कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के सहयोग से 24 जून 2026 को रेक्याविक तथा 25 जून 2026 को उत्तरी आइसलैंड के अक्यूरेरी में भारतीय आमों का प्रसार कार्यक्रम आयोजित किया। इन कार्यक्रमों में भारतीय आमों की समृद्ध विविधता और उनके निर्यात की अपार संभावनाओं को प्रदर्शित किया गया। आइसलैंड में यह पहला भारतीय आम प्रोत्साहन कार्यक्रम था।

भारत के राजदूत श्री आर. रवीन्‍द्र ने भारत की विश्व-प्रसिद्ध आम की विभिन्न किस्मों की विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला और आइसलैंड में भारतीय आमों के निर्यात के विस्तार की व्यापक संभावनाओं पर जोर दिया।

आइसलैंड के विदेश मंत्रालय में व्यापार समझौता निदेशक स्वेन के. एइनार्सन ने भारत–ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (टीईपीए) से मिलने वाले अवसरों और उसके माध्यम से आइसलैंड में भारतीय आमों के आयात को बढ़ावा मिलने की संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए।

आइसलैंड ट्रेड फेडरेशन के महासचिव ओलाफुर स्टीफेंसन ने कहा कि आइसलैंड के कारोबारी समुदाय में भारत के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय कृषि उत्पादों, खासकर आमों के आयात में वृद्धि की संभावनाओं को बेहद उत्साहजनक बताया।

भारतीय दूतावास की सचिव अनिशा तोमर ने भारत में आम उत्पादन पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। साथ ही, उन्होंने गुणवत्ता आश्वासन, बाजार तक पहुंच और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसार कर, आम के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की पहलों की भी जानकारी दी।

इन कार्यक्रमों में आयातकों, राजनयिक समुदाय के सदस्यों, आइसलैंड के विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के प्रतिनिधियों तथा आइसलैंड के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही, जिससे कार्यक्रम को व्यापक सफलता मिली।

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों को भारतीय आमों की चार प्रमुख किस्‍मों—दशहरी, चौसा, लंगड़ा और केसर—का स्वाद चखाया। इन आमों के बेहतरीन स्वाद, मनमोहक सुगंध और उत्कृष्ट गुणवत्ता की सभी ने भरपूर सराहना की। यह आयोजन व्यावसायिक संबंधों को मजबूत करने, भारतीय कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने तथा भारत और आइसलैंड के बीच बढ़ती आर्थिक साझेदारी को और सुदृढ़ बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ।

वर्तमान में आइसलैंड मुख्य रूप से थाईलैंड, ब्राज़ील, कंबोडिया, घाना और पेरू से आमों का आयात करता है। वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की सीमित उपलब्धता के कारण इन देशों के आमों ने आइसलैंड के बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाई है। वर्ष 2025 में आइसलैंड ने लगभग 33 लाख अमेरिकी डॉलर (3.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर) मूल्य के आमों का आयात किया, जिसमें से लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर (1 मिलियन अमेरिकी डॉलर) मूल्य के आम केवल थाईलैंड से आयात किए गए थे। भारतीय मिशन द्वारा स्थानीय उपभोक्ताओं के साथ बातचीत के दौरान यह जानकारी सामने आई कि आइसलैंड के लोग आम काफी पसंद करते हैं और विशेष रूप से स्मूदी, डेज़र्ट (मिष्ठान) तथा फ्रूट सलाद में उनका सेवन करना पसंद करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आइसलैंड के बाजार में भारतीय आमों के लिए पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।

फसल से आगे : किसान की नई आर्थिक आज़ादीभारत की नई कृषि यात्रा : फसल से आगे, समृद्धि की ओर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। पहले हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि देश में अनाज की कमी न हो, किसी तरह भूख से बचाव हो जाए। आज मोदी जी की दूरदर्शिता और किसान‑हितैषी नीतियों ने कृषि को सिर्फ “उत्पादन का क्षेत्र” नहीं रहने दिया, बल्कि किसान की समृद्धि, जोखिम‑सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का समन्वित आधार बना दिया है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियों का फोकस केवल “कितना उत्पादन” पर नहीं, बल्कि “किसान की वास्तविक आय कितनी, खेती कितनी टिकाऊ, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत” पर आ गया है। इसी सोच से दलहन–तिलहन मिशन, कॉटन मिशन, प्राकृतिक खेती मिशन, प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना, खेत बचाओ अभियान, डिजिटल कृषि और शोध–नवाचार; सबको एक ही व्यापक दृष्टि से जोड़ा जा रहा है।

उत्पादन से आगे : आय, सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में 3765.63 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर है, जो देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है। धान, गेहूँ, मक्का, दालें और तिलहन- सभी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। यह केवल ज्यादा पैदावार नहीं, बल्कि कुल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए विस्तार और मजबूती का प्रमाण है। साथ‑साथ, मोदी सरकार ने किसान की जोखिम‑सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM‑KISAN) के तहत अब तक 22 किस्तों के माध्यम से किसानों के खातों में सीधे 4.27 लाख करोड़ रुपए से अधिक की सहायता पहुँच चुकी है, जिससे 9 करोड़ से ज़्यादा किसान परिवारों को हर साल नियमित आय‑समर्थन मिलता है। वहीं, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) ने देशभर में करोड़ों किसान‑आवेदनों को कवर करते हुए फसल के नुकसान की स्थिति में एक मज़बूत बीमा कवच दिया है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि‑अवसंरचना, वेयरहाउस और कोल्ड‑चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाज़ार तक पहुँच- तीनों को मजबूत किया है। कृषि अब सिर्फ खेत की मेड़ तक सीमित नहीं है। डेयरी, मत्स्य, कुक्कुट, बागवानी, मधुमक्खी‑पालन, खाद्य‑प्रसंस्करण, भंडारण, ग्रामीण उद्योग, सौर ऊर्जा और सेवा‑क्षेत्र; सब मिलकर नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं।

दलहन, तिलहन और कॉटन मिशन : आत्मनिर्भरता और मूल्य–सुरक्षा

लंबे समय तक दालें, खाद्य तेल और कपास– तीनों क्षेत्र हमारी पूरी क्षमता से पीछे रहे। हम दालों और तेलों के लिए आयात पर निर्भर रहे और कपास में भी किसानों को वैश्विक उतार‑चढ़ाव का सामना करना पड़ा। मोदी सरकार ने इन तीनों को रणनीतिक प्राथमिकता देते हुए अलग‑अलग मिशन के रूप में आगे बढ़ाया है। राष्ट्रीय दलहन मिशन के माध्यम से तुअर, उड़द, मसूर, चना और अन्य दालों का क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज से लेकर बाज़ार तक पूरी वैल्यू चेन पर काम हो रहा है– उच्च‑उपज किस्में, क्लस्टर आधारित खेती, प्रसंस्करण इकाइयाँ, MSP का सुदृढ़ ढाँचा, सरकारी खरीद, भंडारण और निर्यात तक। लक्ष्य यह है कि भारत दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने, आयात बिल घटे और किसानों को उच्च मूल्य वाली इन फसलों से स्थायी आय मिले। इसी तरह तिलहन मिशन के ज़रिए सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और पाम ऑयल जैसी फसलों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह केवल पैदावार बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता, किसानों को बेहतर दाम और देश की तेल सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में व्यापक रणनीति है। इसके साथ‑साथ कॉटन मिशन के तहत कपास की उच्च‑उपज और कीट‑रोधी किस्में, उन्नत कृषि‑प्रणालियाँ, कीट‑प्रबंधन, फसल विविधीकरण, टेक्सटाइल वैल्यू–चेन से बेहतर जुड़ाव और गुणवत्ता सुधार पर काम हो रहा है। कपास भारत के लाखों किसानों के लिए नकदी फसल है; मिशन का उद्देश्य है कि किसान को उत्पादन के साथ‑साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता, बेहतर मूल्य और स्थिर आय भी मिल सके।

प्राकृतिक खेती मिशन : 1 करोड़ किसान, 75 लाख हेक्टेयर की नई राह

तेज़ी से बढ़ती रासायनिक निर्भरता, मिट्टी की थकान और भूजल पर दबाव– ये सब हमें आगाह कर रहे हैं कि खेती के तरीके बदलने होंगे। इसी समझ के साथ हमारे विजनरी प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में प्राकृतिक खेती को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारा संकल्प है कि 1 करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए सेंसिटाइज़ किया जाए, उनमें से लगभग 18 लाख किसानों को सक्रिय रूप से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए तैयार किया जाए और चरणबद्ध रूप से करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जाए।

यह परिवर्तन धीरे‑धीरे, वैज्ञानिक प्रमाणों और किसानों के अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ रहा है। छोटे किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपनी कुछ भूमि पर प्राकृतिक खेती का मॉडल बनाकर देखें; उन्हें प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों पर आधारित पैकेज, प्रमाणन, ब्रांडिंग और बाज़ार‑जुड़ाव में मदद दी जा रही है। उद्देश्य यह है कि मिट्टी की उर्वरता बढ़े, रासायनिक लागत घटे, जलवायु झटकों के सामने फसलें अधिक टिकाऊ हों और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यप्रद, पोषक भोजन मिल सके।

प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना और फोकस में 100 कम उत्पादन वाले ज़िले

भारत जैसे विशाल देश में कुछ क्षेत्र बहुत तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ ज़िले अलग‑अलग वजहों से पीछे रह जाते हैं। इस असमानता को कम करने के लिए प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना की संकल्पना की गई है। इस योजना के तहत लगभग 100 कम उत्पादन वाले ज़िलों की पहचान की गई है, जहाँ प्रति हेक्टेयर पैदावार राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और किसान अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन ज़िलों में 11 विभागों की 36 योजनाओं का कन्वर्जेन्स कर एक समग्र पैकेज दिया जा रहा है– सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि–उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाज़ार‑जुड़ाव; सबको एक साथ जोड़कर। सोच यह है कि योजनाएँ अलग‑अलग “साइलो” में न चलें, बल्कि किसान के खेत और गाँव को केंद्र में रखकर सब मिलकर काम करें। इससे नीति का फोकस केवल “कितना उत्पादन” से आगे बढ़कर इस पर आया है कि कहाँ उत्पादन कम है, वहाँ लक्षित निवेश और प्रयास से कैसे बढ़ाया जाए, और उससे किसान की आय कैसे ऊपर उठे।

“खेत बचाओ अभियान” : मिट्टी, पानी और किसान का संतुलन

उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में कई जगहों पर मिट्टी और पानी पर दबाव बढ़ा है। असंतुलित उर्वरक उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और सीमित फसल चक्र ने खेत की सेहत को प्रभावित किया है। यदि समय रहते दिशा न बदली जाए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कमजोर खेत और थकी हुई मिट्टी छोड़ेंगे। इस चुनौती को देखते हुए “खेत बचाओ अभियान” शुरू किया गया है। यह अभियान केवल मिट्टी बचाने का नहीं, बल्कि किसान की आय, भोजन की गुणवत्ता और भविष्य की खाद्य सुरक्षा की रक्षा का अभियान है। इसके पाँच मुख्य संदेश हैं- हर किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करे, डीएपी और यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करे और संतुलित NPK, सूक्ष्म पोषक तत्व, जैव एवं नैनो उर्वरकों को अपनाए, हरी खाद, जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दे, नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के विरुद्ध सतर्क रहे और प्रशासन को तुरंत सूचना दे तथा प्राकृतिक खेती और जलवायु–अनुकूल पद्धतियों की ओर संगठित रूप से बढ़े। लक्ष्य यह नहीं कि उर्वरक अचानक कम कर दिए जाएँ, बल्कि यह है कि हर किसान सही मात्रा, सही समय और सही मिश्रण का उपयोग करे, ताकि मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहे, लागत घटे और उत्पादन भी सुरक्षित रहे।

विज्ञान, डिजिटल कृषि और ICAR की भूमिका

इन सभी प्रयासों की रीढ़ विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ने 2014–25 के बीच लगभग 3,000 जलवायु‑सहनशील फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें सूखा, बाढ़, लू, लवणीयता और अन्य तनावों को झेलने की क्षमता है। कुल मिलाकर 3,800 से ज़्यादा उच्च‑उपज किस्में और 200 से अधिक बायोफोर्टिफाइड किस्में जारी की गई हैं, जो उत्पादकता के साथ‑साथ पोषण सुरक्षा भी मजबूत करती हैं। डिजिटल कृषि मिशन और “एग्रीस्टैक” के तहत किसान पहचान (Farmer IDs), फसल प्लॉटों का डिजिटलीकरण, ड्रोन‑आधारित सेवाएँ, कीट‑रोग निगरानी, मौसम–आधारित और लोकेशन–स्पेसिफिक सलाह जैसी व्यवस्थाएँ बन रही हैं। इससे लैब से लैंड और डेटा से निर्णय तक की दूरी तेजी से कम हो रही है। ई‑नाम, किसान सारथी, KVK नेटवर्क, मोबाइल संदेश, व्हाट्सऐप समूह, सामुदायिक रेडियो और सोशल मीडिया– इन सबके माध्यम से वैज्ञानिक, विस्तारकर्मी और किसान–नेता सीधे किसान से संवाद कर पा रहे हैं। कृषि और ग्रामीण विकास को भी एक साथ, समग्र दृष्टि से देखा जा रहा है। सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्व‑सहायता समूह, FPO, ग्रामीण उद्योग और कौशल विकास– ये सभी कार्यक्रम जब कृषि के साथ कदम–ताल करके चलते हैं, तभी गाँवों में रोज़गार, उद्यमिता और सामाजिक परिवर्तन की गति बढ़ती है।

फसल की मात्रा से आगे, किसान के विश्वास की ओर बढ़ते ठोस कदम

आने वाले वर्षों में भारत को दुनिया की खाद्य, पोषण और जलवायु चुनौतियों के बीच अपने कृषि‑तंत्र को और मजबूत बनाना है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का विज़न स्पष्ट है-किसान की आय बढ़े, उसकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्य मिले, दालों, तिलहनों और कपास में आत्मनिर्भरता से पोषण, तेल और वस्त्र सुरक्षा मजबूत हो। PM‑KISAN, PMFBY, प्राकृतिक खेती, खेत बचाओ अभियान और जलवायु‑अनुकूल तकनीकों से खेत की मिट्टी, पानी और किसान की सुरक्षा सुनिश्चित हो।प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना के माध्यम से कम उत्पादन वाले ज़िलों में लक्षित निवेश से क्षेत्रीय असमानता घटे और हर किसान आगे बढ़े। विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक से खेती कुशल, लचीली, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बने।

जब खेत बचेगा, तब किसान बचेगा। जब किसान बचेगा, तब कृषि बचेगी और जब कृषि बचेगी, तब भारत का भविष्य सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में यही हमारी नई कृषि यात्रा का सार है– फसल से आगे, किसान के विश्वास और ग्रामीण भारत की समृद्धि की ओर।

(लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री हैं।)

केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर 19 मई को भुवनेश्वर में होगा पूर्वी क्षेत्र का कृषि सम्मेलन


ओडिशा के मुख्य़मंत्री श्री मोहन चरण मांझी भी पूर्वी क्षेत्र का कृषि सम्मेलन में शामिल होंगे।

पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन, कृषि विकास एवं किसान कल्याण के विभिन्न मुद्दों पर होगा व्यापक मंथन

ओडिशा / सत्ता संदेश

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 19 मई, 2026 को भुवनेश्वर, ओडिशा में पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण सम्मेलन की अध्यक्षता केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान करेंगे। सम्मेलन में ओडिशा के मुख्य़मंत्री श्री मोहन चरण मांझी सहित विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, किसान प्रतिनिधि, कृषि विशेषज्ञ, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), स्टार्टअप, बैंकों एवं अन्य हितधारकों की भागीदारी होगी।

इस सम्मेलन का उद्देश्य कृषि क्षेत्र के समग्र विकास, किसानों की आय वृद्धि तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय को और अधिक सुदृढ़ करना है। सम्मेलन के दौरान कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा की जाएगी तथा कृषि क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विषयों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाएगा।

सम्मेलन के दौरान किसान रजिस्ट्री की प्रगति, बागवानी क्षेत्र की संभावनाएं, दलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता मिशन, राष्ट्रीय खाद्य तेल–तिलहन मिशन (NMEO-OS), पीएम-आशा, राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन, फार्म क्रेडिट एवं किसान क्रेडिट कार्ड से संबंधित मुद्दों पर विशेष चर्चा की जाएगी।

इसके अतिरिक्त नकली कीटनाशकों एवं उर्वरकों पर नियंत्रण, उर्वरकों की कालाबाजारी रोकने, उर्वरकों के संतुलित उपयोग और वैकल्पिक उर्वरकों को बढ़ावा देने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श होगा।

सम्मेलन में विभिन्न राज्यों द्वारा कृषि क्षेत्र में अपनाई गई सफल पहलों एवं नवाचारों की प्रस्तुति भी दी जाएगी। ओडिशा राज्य कृषि विस्तार कार्यों, पश्चिम बंगाल बीज उत्पादन की श्रेष्ठ पद्धतियों, झारखंड एफपीओ आधारित मूल्य श्रृंखला एवं कृषि स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र तथा बिहार मक्का उत्पादन एवं विपणन संबंधी सफल अनुभवों को साझा करेगा।

यह सम्मेलन किसानों के हित में कृषि क्षेत्र की चुनौतियों के समाधान, नवाचारों के आदान-प्रदान तथा कृषि क्षेत्र के सतत विकास के लिए भविष्य की रणनीति तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध होगा। सम्मेलन के पश्चात केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री मीडिया को संबोधित करेंगे।