ब्रेकिंग न्यूज़
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सेवानिवृत्त हो रहे न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति मित्तल की सराहना की

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Surya Kant ने उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त हो रहे न्यायाधीशों J. K. Maheshwari और Pankaj Mithal की शुक्रवार को खुलकर सराहना की। प्रधान न्यायाधीश ने दोनों न्यायाधीशों की विनम्रता, न्यायिक विवेक और न्यायपालिका के प्रति समर्पण को उल्लेखनीय बताया।

उच्चतम न्यायालय में आयोजित विदाई संबोधन के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि दोनों न्यायाधीशों ने अपने कार्यकाल में संतुलित दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और न्यायिक मर्यादा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।

उन्होंने विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया कि न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल ने जटिल मामलों की सुनवाई के दौरान गहरी कानूनी समझ और शांत स्वभाव का परिचय दिया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उनकी कार्यशैली आने वाली पीढ़ियों के न्यायाधीशों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगी।

दोनों न्यायाधीश एक जून से 12 जुलाई तक की आंशिक अदालती कार्य अवधि के दौरान सेवानिवृत्त होंगे। इस अवधि में उच्चतम न्यायालय में सीमित पीठों के माध्यम से नियमित और जरूरी मामलों की सुनवाई की जाती है।

Supreme Court of India में अपने कार्यकाल के दौरान दोनों न्यायाधीश कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई का हिस्सा रहे हैं। कानूनी समुदाय में उन्हें शांत, संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाले न्यायाधीशों के रूप में देखा जाता है।

न्यायपालिका से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की विदाई केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह उनके योगदान और न्यायिक विरासत को सम्मान देने का अवसर भी होती है।

कानूनी जगत में यह भी माना जाता है कि न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति मित्तल ने विभिन्न संवैधानिक, प्रशासनिक और नागरिक मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय देकर न्यायिक प्रणाली को मजबूत बनाने में योगदान दिया है।

फिलहाल न्यायिक समुदाय और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी दोनों न्यायाधीशों के कार्यकाल की सराहना करते हुए उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

त्विषा शर्मा मौत मामला: सीबीआई ने पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को किया गिरफ्तार

नयी दिल्ली: / सत्ता संदेश

Central Bureau of Investigation ने त्विषा शर्मा की मौत से जुड़े मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए आरोपी उनकी सास और पूर्व न्यायाधीश Giribala Singh को गुरुवार को गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के एक दिन बाद की गई।

यह मामला Madhya Pradesh High Court के आदेश के बाद और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है, जिसमें अदालत ने गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द कर दी थी। इसके बाद जांच एजेंसी ने उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है।

सीबीआई के अनुसार, यह मामला त्विषा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत से जुड़ा है, जिसकी जांच कई पहलुओं से की जा रही थी। जांच एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई की गई है।

सूत्रों के अनुसार, मामले में घरेलू विवाद और पारिवारिक तनाव की भी भूमिका सामने आई है। हालांकि आधिकारिक रूप से सीबीआई ने विस्तृत आरोपों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन जांच में कई अहम सुरागों पर काम किया जा रहा है।

गिरिबाला सिंह, जो पूर्व में न्यायिक सेवा से जुड़ी रही हैं, की गिरफ्तारी ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई एक गंभीर और असाधारण स्थिति होती है, जो न्यायिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर ध्यान आकर्षित करती है।

मृतका के परिवार ने सीबीआई की कार्रवाई का स्वागत करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग दोहराई है। वहीं आरोपी पक्ष की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

अधिकारियों ने बताया कि गिरफ्तार आरोपी से पूछताछ की जा रही है और मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की भी जांच जारी है। एजेंसी जल्द ही अदालत में आगे की रिपोर्ट पेश कर सकती है।

फिलहाल इस हाई-प्रोफाइल मामले में सभी की नजर सीबीआई की आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हुई है।

भोजशाला परिसर विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली नई याचिका दाखिल

नयी दिल्ली: / सत्ता संदेश

Supreme Court of India में मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे विवाद में एक नई याचिका दायर की गई है। इस याचिका में Madhya Pradesh High Court के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर बताया गया था।

यह मामला लंबे समय से विवादित रहा है, जिसमें धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों पहलू जुड़े हुए हैं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े निर्णय केंद्र सरकार तथा Archaeological Survey of India (एएसआई) ले सकते हैं।

नई याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष तथ्यात्मक और कानूनी दृष्टि से विवादास्पद है, इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने आग्रह किया है कि मामले की विस्तृत सुनवाई की जाए और सभी ऐतिहासिक साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

भोजशाला परिसर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जिसे लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से मतभेद चले आ रहे हैं। एक पक्ष इसे देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे एक ऐतिहासिक मस्जिद स्थल के रूप में देखता है।

इस मामले में पहले भी कई बार अदालतों में सुनवाई हो चुकी है और विभिन्न आदेश दिए गए हैं। हाल के हाईकोर्ट आदेश के बाद यह विवाद फिर से कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक रिपोर्टों और कानूनी पहलुओं का संतुलित मूल्यांकन बेहद जरूरी होता है। एएसआई की भूमिका भी इस प्रकार के विवादों में महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह देश की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन से जुड़ी प्रमुख संस्था है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका पर अगली सुनवाई की तारीख तय होनी बाकी है, और सभी पक्षों की नजर अब शीर्ष अदालत के रुख पर टिकी है।

घर खरीदारों के पैसों की कथित हेराफेरी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, ईडी और आरबीआई से मांगा जवाब

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Supreme Court of India ने घर खरीदारों के पैसों की कथित हेराफेरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और कई रियल एस्टेट कंपनियों से जवाब तलब किया है। यह मामला नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र की आवासीय परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये के कथित दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है।

प्रधान न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति Vipul M. Pancholi शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और 15 जुलाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह याचिका वंदना सभरवाल द्वारा दायर की गई है, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें पेश कीं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे परियोजनाओं से जुड़े घर खरीदारों से एकत्र किए गए हजारों करोड़ रुपये का कथित रूप से गलत तरीके से उपयोग किया गया और नियामक निगरानी में गंभीर खामियां रही हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है और यदि बड़े पैमाने पर धन के दुरुपयोग के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह हजारों परिवारों को प्रभावित कर सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता की कमी और नियामक संस्थाओं की सीमित निगरानी के कारण इस तरह की समस्याएं बार-बार सामने आती रही हैं। इसी कारण केंद्र सरकार, ईडी और आरबीआई से विस्तृत जवाब मांगा गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहल घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा और रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। इस मामले पर अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी, जिसमें सभी पक्षों के जवाबों पर विचार किया जाएगा।

ट्रांसजेंडर कानून को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की केंद्र की मांग

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की है। केंद्र का कहना है कि एक ही कानून से जुड़े मामलों पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों में सुनवाई होने से विरोधाभासी फैसले आने की संभावना बन सकती है, इसलिए मामले की एकरूपता बनाए रखने के लिए सर्वोच्च अदालत में संयुक्त सुनवाई जरूरी है।

बुधवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र द्वारा दायर स्थानांतरण याचिकाओं पर शुक्रवार को तत्काल सुनवाई की जाए।

केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2026 के खिलाफ देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में कई याचिकाएं लंबित हैं। इन सभी मामलों में समान कानूनी और संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और स्पष्टता बनाए रखने के लिए सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करना उचित होगा।

सूत्रों के अनुसार, कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में संशोधित अधिनियम के कुछ प्रावधानों को लेकर आपत्तियां जताई गई हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कुछ प्रावधान ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों, पहचान और समानता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। वहीं, केंद्र सरकार का पक्ष है कि यह कानून ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अलग-अलग उच्च न्यायालयों में समान मुद्दों पर अलग-अलग फैसले आते हैं, तो इससे कानूनी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे मामलों में आमतौर पर सर्वोच्च अदालत सभी याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर एक साथ सुनवाई करती है, ताकि पूरे देश में एक समान कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सके।

ट्रांसजेंडर अधिकारों का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में देश में व्यापक चर्चा का विषय रहा है। उच्चतम न्यायालय पहले भी ट्रांसजेंडर समुदाय को समान अधिकार और सम्मानजनक जीवन देने को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले दे चुका है। ऐसे में इस संशोधन अधिनियम को लेकर चल रही कानूनी चुनौती को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं को सर्वोच्च अदालत में स्थानांतरित किया जाएगा या नहीं।

कॉकरोच जनता पार्टी मामले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, तत्काल सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

Supreme Court of India ने सोमवार को फर्जी वकीलों और कथित तौर पर व्यंग्यात्मक डिजिटल मंच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़ी गतिविधियों की जांच की मांग करने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बनी सीजेपी को लेकर दायर इस याचिका पर अदालत ने फिलहाल कोई तात्कालिक राहत देने से मना कर दिया।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख अधिवक्ता एन.के. गोस्वामी ने किया। उन्होंने अदालत से इस मामले में जल्द सुनवाई की मांग करते हुए आरोप लगाया कि फर्जी वकीलों और डिजिटल मंच की गतिविधियों से न्याय व्यवस्था और समाज में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

हालांकि, पीठ ने तत्काल सुनवाई की मांग को स्वीकार नहीं किया। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वह इस मुद्दे को “इतने भावुक तरीके” से न लें। अदालत की इस टिप्पणी को मामले में फिलहाल संयम बरतने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

बताया जा रहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी नामक यह डिजिटल मंच व्यंग्यात्मक और राजनीतिक कटाक्ष से जुड़े कंटेंट के कारण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है। इसके कई पोस्ट और वीडियो को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा बताया, जबकि कुछ ने इसकी सामग्री पर आपत्ति जताई है।

याचिका में कथित तौर पर मंच से जुड़े लोगों की गतिविधियों और फर्जी वकीलों के नेटवर्क की जांच कराने की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए यह स्पष्ट संकेत दिया कि हर वायरल या चर्चित विषय पर आपात सुनवाई जरूरी नहीं होती।

अब माना जा रहा है कि याचिकाकर्ता नियमित प्रक्रिया के तहत मामले को सूचीबद्ध कराने की कोशिश करेगा, जिसके बाद भविष्य में इस पर सुनवाई हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट से पूर्व आबकारी आयुक्त को राहत, छत्तीसगढ़ शराब नीति घोटाले के दो मामलों में मिली जमानत

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को कई करोड़ रुपये के शराब नीति घोटाले से जुड़े दो मामलों में जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि अन्य सह-आरोपी पहले ही जमानत पर बाहर हैं और मुकदमों के निष्कर्ष तक पहुंचने में अभी काफी समय लगेगा।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मुख्य मामले से जुड़े दो अलग-अलग मामलों और संबंधित धनशोधन मामले में सुनवाई करते हुए पूर्व अधिकारी को यह राहत प्रदान की।

पीठ ने कहा कि दास को कथित तौर पर इस मामले का “मुख्य सूत्रधार” बताया गया है, और उन पर आरोप है कि उन्होंने राज्य की आबकारी नीति तैयार करने में भूमिका निभाई ताकि अन्य सह-आरोपियों को लाभ पहुंचाया जा सके।

जमानत देते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि दास को दो अलग-अलग मामलों में क्रमशः 18 सितंबर 2025 और 19 दिसंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था।

अदालत ने उन पर वही जमानत शर्तें लागू कीं जो अन्य सह-आरोपियों पर लागू हैं। इसके तहत उन्हें राज्य से बाहर रहना होगा और वह केवल मुकदमे की सुनवाई तथा जांच में शामिल होने के लिए ही छत्तीसगढ़ आ सकेंगे।

हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि वह भविष्य में जमानत की शर्तों में ढील देने की मांग कर सकते हैं।

इससे पहले एक मार्च को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) में उप सचिव रहीं सौम्या चौरसिया को भी शराब घोटाले से जुड़े दो मामलों में जमानत दी थी।

चेक बाउंस मामला: कोर्ट की फटकार के बाद अभिनेता राजपाल यादव ने तिहाड़ जेल में किया सरेंडर

नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव ने चेक बाउंस से जुड़े एक पुराने मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल में सरेंडर कर दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें 4 फरवरी तक आत्मसमर्पण करने का कड़ा आदेश दिया था, जिसके बाद 5 फरवरी को उन्होंने जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर किया।9 करोड़ रुपये का बकाया और कोर्ट की नाराजगी हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजपाल यादव ने बार-बार अदालती नियमों का उल्लंघन किया है और समझौते के वादों को पूरा नहीं किया। हालांकि एक्टर ने आखिरी बार राहत की गुहार लगाते हुए कहा था कि वे 25 लाख रुपये लेकर आए हैं और बाकी रकम भी चुका देंगे, लेकिन कोर्ट ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहा कि पहले सरेंडर जरूरी है, राहत पर विचार बाद में किया जाएगा। कोर्ट के अनुसार, अभी भी 9 करोड़ रुपये की राशि बकाया है।क्या है पूरा मामला? यह विवाद साल 2010 का है, जब राजपाल यादव ने अपनी फिल्म ‘अता पता लापता’ बनाने के लिए मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। फिल्म फ्लॉप होने के कारण वे पैसे नहीं लौटा सके और उनके द्वारा दिए गए चेक बाउंस हो गए। साल 2018 में इस मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया था और 6 महीने की सजा सुनाई गई थी, जिसके बाद वे बार-बार अपील के जरिए राहत पाते रहे।कानून का सम्मान जरूरी: जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने राजपाल यादव के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि न्यायिक आदेशों का पालन न करना कानून के प्रति अनादर दर्शाता है। कोर्ट ने उनके वकील की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें देरी का कारण पैसों का इंतजाम करना बताया गया था। कोर्ट ने साफ कहा कि जो लोग कानून का सम्मान नहीं करते, उन्हें कानून से किसी अनुकूलता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।