मजदूर दिवस 2026: 16 घंटे की गुलामी से 8 घंटे के अधिकार तक, जानें क्यों खून से लिखी गई है ‘मई दिवस’ की कहानी
नई दिल्ली: हर साल 1 मई की तारीख दुनिया भर में ‘मजदूर दिवस’ या ‘मई दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। यह दिन केवल एक छुट्टी नहीं, बल्कि उन लाखों श्रमिकों के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है, जिन्होंने औद्योगिक क्रांति के दौरान अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी।
संघर्ष की शुरुआत: 16 घंटे का काम और अमानवीय स्थितियाँ इस दिवस की जड़ें 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति में छिपी हैं। उस दौर में नई फैक्ट्रियां खुल रही थीं और मशीनीकरण बढ़ रहा था, लेकिन मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। मजदूरों को दिन में 14 से 16 घंटे तक काम करना पड़ता था। न केवल पुरुष, बल्कि बच्चों से भी काम कराया जाता था और महिलाओं को बहुत कम मजदूरी दी जाती थी। कार्यस्थलों पर सुरक्षा का अभाव था और धूल-धुएं के बीच मजदूरों की सेहत बिगड़ रही थी।
‘8 घंटे’ की मांग और शिकागो का आंदोलन: शोषण के खिलाफ मजदूरों ने एकजुट होकर यूनियन बनाना शुरू किया। उनकी सबसे प्रमुख मांग थी कि काम के घंटे तय किए जाएं। उनका नारा था— “आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपने लिए”। इसी मांग को लेकर 1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो शहर में एक विशाल आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें करीब तीन लाख मजदूर सड़कों पर उतर आए।
हेमार्केट अफेयर: जब सड़कों पर बहा खून 3 मई 1886 को एक फैक्ट्री के बाहर प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई मजदूर मारे गए। इसके विरोध में 4 मई को शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर में एक शांतिपूर्ण सभा बुलाई गई। वहां अचानक हुए एक बम धमाके के बाद पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला दीं, जिसमें कई मजदूर और पुलिसकर्मी मारे गए। इस घटना को इतिहास में ‘हेमार्केट अफेयर’ के नाम से जाना जाता है। इस मामले में बाद में चार मजदूर नेताओं को फांसी दे दी गई।
वैश्विक मान्यता और भारत में शुरुआत : हेमार्केट की घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। साल 1889 में पेरिस में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह फैसला लिया गया कि हर साल 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा।भारत की बात करें तो यहाँ पहली बार 1 मई 1923 को चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में मजदूर दिवस मनाया गया था। इसका आयोजन ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ ने किया था और इसी दिन पहली बार भारत में लाल झंडा फहराया गया था।
आज की चुनौतियां: भले ही आज कई श्रम कानून बन चुके हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मजदूरों की स्थिति अब भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। असंगठित क्षेत्र में आज भी कई जगह मजदूरों को 12 घंटे तक काम करना पड़ता है। न्यूनतम मजदूरी और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज की असली ताकत यही मेहनतकश लोग हैं और उनके अधिकारों का सम्मान करना अनिवार्य है।

