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छोटे शहरों से ग्लोबल कैंपस तक: स्कॉलरशिप कैसे सपनों को उड़ान भरने में मदद करती है : सुधांश पंत

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत के गांवों और छोटे शहरों से लेकर ऑक्सफ़ोर्ड और जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के गलियारों और हरे-भरे बगीचों तक, नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप (NOS) स्कीम अलग-अलग महाद्वीपों में उम्मीदों की यात्रा को ताकत दे रही है।


त्रिपुरा के एक दूर-दराज़ और पिछड़े गांव में, दीपायन भौमिक ने कभी आर्किटेक्ट बनने का सपना देखा था, जबकि वे इंटरनेशनल एजुकेशन से जुड़े मौकों से बहुत दूर पले-बढ़े थे। फिर भी, पढ़ाई में लगन और नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप के सपोर्ट से, दीपायन ने जर्मनी की स्टटगार्ट यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर और अर्बन डिज़ाइन में मास्टर ऑफ़ साइंस की डिग्री हासिल की।


जर्मनी में रहने, पढ़ाई करने और काम करने से उन्हें एक अलग-अलग तरह के इंटरनेशनल माहौल का सामना करना पड़ा, जिसने न सिर्फ़ उनकी पढ़ाई की समझ को बदला, बल्कि समाज, सस्टेनेबिलिटी और अर्बन डेवलपमेंट के प्रति उनके नज़रिए को भी बदल दिया। आर्किटेक्चर और अर्बन डिज़ाइन के लिए भारतीय और जर्मन दोनों तरीकों से प्रेरणा लेकर, वे अपनी सीख का इस्तेमाल करने के इरादे से भारत लौट आए। आज, दीपायन अपनी खुद की आर्किटेक्चरल प्रैक्टिस चलाते हैं, अपने प्रोफेशनल काम से समाज में योगदान देते हैं और दूसरों के लिए मौके भी बनाते हैं। वह उन सैकड़ों अनुसूचित जाति के स्टूडेंट्स में से एक हैं जिनकी ज़िंदगी की दिशा नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप (NOS) की वजह से पूरी तरह बदल गई है। यह भारत सरकार की एक पहल है जो टॉप विदेशी यूनिवर्सिटीज़ में पोस्टग्रेजुएट और डॉक्टरेट की पढ़ाई के लिए फंड देती है। इस स्कीम में ट्यूशन, ट्रैवल, रहने का खर्च और दूसरी एकेडमिक ज़रूरतें शामिल हैं, जिससे यह पक्का होता है कि किसी वर्ल्ड-क्लास यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलना स्टूडेंट के परिवार की आर्थिक हालत पर निर्भर नहीं करता।


ऐसी सैकड़ों कहानियाँ हैं जहाँ परिवारों ने पहली बार पासपोर्ट देखा है और ऐसे कई माता-पिता हैं जो अपने बच्चों को दूर देशों में भेज देते हैं, जबकि उन्होंने खुद देश के कॉलेजों में कदम भी नहीं रखा है।


2014 से, NOS स्कीम ने UK से जर्मनी, US से ऑस्ट्रेलिया तक, 21 देशों की यूनिवर्सिटीज़ में सालाना 8 लाख रुपये से कम कमाने वाले परिवारों के स्टूडेंट्स की मदद की है। ऐसे कई परिवारों के लिए, विदेशी यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए अप्लाई करने के लिए भी उन्हें पास के किसी साइबरकैफ़े में जाना पड़ता था। डॉ. वैथिलिंगम राजेंद्रन, एक सीनियर साइंटिस्ट, जिन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स में ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में PhD की, दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले माता-पिता के बेटे के तौर पर बड़े हुए। उन्होंने अपनी स्कूलिंग और अंडरग्रेजुएट एजुकेशन पास के सरकारी इंस्टीट्यूशन से पूरी की और हायर स्टडीज़ के दौरान पैसे की तंगी से जूझते रहे। फिर भी, पक्के इरादे और लगातार कोशिशों से, उन्होंने अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई कामयाबी से पूरी की और एक शानदार साइंटिफिक करियर बनाया।


ये स्टूडेंट्स सिर्फ़ एक डिग्री या ज़्यादा सैलरी वाली नौकरी नहीं लाते, बल्कि अपने समुदाय के लोगों के लिए उम्मीदें, कई मौके और उम्मीदें भी लाते हैं। नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप जैसी स्कॉलरशिप को अक्सर सिर्फ़ फाइनेंशियल मदद प्रोग्राम के तौर पर देखा जाता है। असल में, ये ह्यूमन कैपिटल और नॉलेज क्रिएशन में लंबे समय के इन्वेस्टमेंट हैं। डेवलप्ड देश सिर्फ़ सड़कों, पुलों या एयरपोर्ट से नहीं बनते। वे क्लासरूम में भी बनते हैं। हर स्टूडेंट जो ऐसी स्कॉलरशिप लेकर बॉर्डर पार करता है, वह भारत के विज़न ‘विकसित भारत@2047’ में योगदान देने का कॉन्फिडेंस और काबिलियत लेकर वापस आता है। यह एक स्कॉलरशिप का बढ़ता हुआ रिटर्न है। स्कॉलरशिप का महत्व सिर्फ़ पढ़ाई के लिए पैसे देने में ही नहीं है, बल्कि उन स्टूडेंट्स के लिए एक स्थिरता का इकोसिस्टम बनाने में भी है जो अक्सर पहली बार एकेडमिक और सोशल दुनिया में कदम रख रहे होते हैं। कई पहली पीढ़ी के स्टूडेंट्स के लिए, चुनौती सिर्फ़ एडमिशन पाने तक ही सीमित नहीं होती। यह उसके बाद के सफ़र को बनाए रखना, महंगे शहरों में रहने का खर्च मैनेज करना, किताबें या डिजिटल डिवाइस खरीदना, रहने का खर्च उठाना और ऐसे मौकों के साथ आने वाले दूसरे खर्चों को भी मैनेज करना होता है। स्कॉलरशिप एक ज़रूरी सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करती है जो स्टूडेंट्स को रोज़मर्रा की ऐसी चुनौतियों की चिंता करने के बजाय सीखने पर ध्यान देने में मदद करती है।


स्कॉलरशिप बिना किसी दिखावे के चलती है। कोई दिखावटी कैंपेन नहीं होते और कोई सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट नहीं होता। 12 सालों में, 764 स्टूडेंट्स को उनकी एकेडमिक मेरिट के आधार पर सबसे जाने-माने इंटरनेशनल कॉलेजों में एडमिशन लेने के लिए चुना गया है। कई मायनों में, नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप स्कीम हर स्टूडेंट को दी जाने वाली मदद के कारण अलग है। किसी बड़ी ग्लोबल यूनिवर्सिटी में हायर एजुकेशन कर रहे एक अकेले स्कॉलर के लिए, कोर्स के दौरान ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, हवाई जहाज का किराया, इंश्योरेंस और दूसरे एकेडमिक खर्चों को कवर करने वाली कुल फाइनेंशियल मदद अक्सर 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा होती है और 1.5 करोड़ रुपये तक भी जा सकती है। 2 करोड़।
दुनिया में कुछ ही पब्लिक स्कॉलरशिप प्रोग्राम हैं जो समाज में आगे बढ़ने की चाह रखने वाले बैकग्राउंड के किसी एक स्टूडेंट पर इतना बड़ा इन्वेस्टमेंट करते हैं। इस सपोर्ट की अहमियत सिर्फ़ दी जाने वाली फाइनेंशियल मदद में ही नहीं है, बल्कि इससे क्या हासिल होने वाला है, इसमें भी है। यह फाइनेंशियल मदद पक्का करने के लिए एक नेशनल कमिटमेंट की सोच रखता है।

भारत-नेपाल के बीच सीमा पार धन प्रेषण सेवा शुरू, UPI और नेपाल के भुगतान नेटवर्क का सीधा एकीकरण

दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और नेपाल ने डिजिटल वित्तीय सहयोग को नई ऊंचाई देते हुए सीमा पार व्यक्ति-से-व्यक्ति धन प्रेषण तंत्र की शुरुआत कर दी है। 6 जून को लॉन्च की गई इस नई व्यवस्था के तहत भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस और नेपाल के नेशनल पेमेंट इंटरफेस को सीधे जोड़ा गया है।

इस एकीकरण के माध्यम से दोनों देशों के नागरिक अब मोबाइल बैंकिंग ऐप और डिजिटल वॉलेट की मदद से वास्तविक समय में सुरक्षित, तेज और निर्बाध तरीके से धन हस्तांतरित कर सकेंगे। यह कदम भारत और नेपाल के बीच वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के साथ-साथ डिजिटल और आर्थिक एकीकरण को भी मजबूत करेगा।

यह तकनीकी साझेदारी नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड और नेपाल क्लियरिंग हाउस लिमिटेड के सहयोग से लागू की गई है। इसका उद्देश्य सीमा पार भुगतान को अधिक सुलभ, सुरक्षित और किफायती बनाना है।

नई व्यवस्था से दोनों देशों के यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब उन्हें मुद्रा विनिमय की जटिलताओं, अधिक नकदी साथ रखने और अतिरिक्त विदेशी मुद्रा शुल्क जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। वहीं नेपाल के स्थानीय व्यापारियों और व्यवसायों को भारतीय पर्यटकों और ग्राहकों तक सीधी पहुंच मिलने से व्यापारिक गतिविधियों में वृद्धि होने की संभावना है।

इसके अलावा डिजिटल भुगतान प्रणाली से नकदी प्रबंधन की लागत कम होगी, भुगतान का निपटान वास्तविक समय में होगा और सीमा पार नकदी ले जाने की आवश्यकता भी घटेगी। इससे व्यापारिक लेनदेन अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनेंगे।

गौरतलब है कि वर्तमान में यूपीआई दुनिया के नौ देशों—सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका और कंबोडिया—में स्वीकार किया जाता है। इन देशों में भारतीय यात्री अपने परिचित यूपीआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-नेपाल के बीच शुरू हुई यह नई भुगतान व्यवस्था दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय डिजिटल भुगतान सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगी।

ब्रिक्स 2026: भारत की अध्यक्षता में कृषि व्यापार को अधिक भरोसेमंद और किसान-केंद्रित बनाने का अवसर

भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय कर रहा है जब कृषि व्यापार की चर्चा केवल शुल्क और बाजार पहुंच तक सीमित नहीं रह गई है। जलवायु संकट, खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव, उर्वरकों की आपूर्ति में रुकावट, सतत उत्पादन से जुड़े मानक, उत्पाद के स्रोत और गुणवत्ता की डिजिटल जानकारी तथा संकट के समय बाजारों को खुला रखने की जरूरत अब कृषि व्यापार के अहम मुद्दे बन चुके हैं।

कृषि क्यों महत्वपूर्ण है

ब्रिक्स के विस्तार के बाद यह समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी, वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। संयुक्त राष्ट्र की व्यापार एवं विकास संस्था, अंकटाड, के हालिया आकलन के अनुसार, ब्रिक्स देशों के बीच वस्तुओं का व्यापार 2003 के बाद तेरह गुना से अधिक बढ़ा है और 2024 में 1.17 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। कृषि इस बड़े व्यापारिक परिदृश्य का केवल एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से यह सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में है। जब खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, उर्वरकों की आपूर्ति रुकती है या समुद्री मार्गों में अनिश्चितता आती है, तो इसका सीधा असर किसानों, उपभोक्ताओं और सरकारों पर पड़ता है। इसलिए कृषि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।

ब्रिक्स देशों के बीच कृषि के क्षेत्र में कई तरह की पूरकताएं हैं। ब्राजील सोयाबीन, मांस और चीनी का बड़ा निर्यातक है। रूस अनाज और उर्वरकों में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। भारत चावल, समुद्री उत्पाद, मसाले, भैंस के मांस और छोटे किसानों से जुड़ी कई कृषि वस्तुओं में मजबूत स्थिति रखता है। चीन खाद्य पदार्थों का बड़ा आयातक और प्रसंस्करण करने वाला देश है। दक्षिण अफ्रीका इस समूह को अफ्रीका के महत्वपूर्ण कृषि-खाद्य बाजारों से जोड़ता है। नए सदस्य भी इसमें नए आयाम जोड़ते हैं। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब लॉजिस्टिक्स, वित्त और खाद्य सुरक्षा निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। मिस्र और इथियोपिया अफ्रीका की खाद्य प्रणाली से जुड़ी चिंताओं को सामने लाते हैं, जबकि इंडोनेशिया पाम ऑयल, मत्स्य क्षेत्र और उष्णकटिबंधीय कृषि की ताकत जोड़ता है।

आपसी ताकतों को ठोस व्यवस्था में बदलना

लेकिन केवल बड़े पैमाने और आपसी ताकतों के मेल से अपने-आप मजबूत व्यापार व्यवस्था नहीं बनती। आगामी ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक भारत को यह अवसर देती है कि वह सहयोग को कुछ ठोस दिशाओं में आगे बढ़ाए। इनमें भरोसेमंद व्यापार व्यवस्था, बीज, उर्वरक और अन्य उत्पादन सामग्री की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, बेहतर बाजार जानकारी और ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं शामिल हैं जिनमें छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी हो।

भरोसेमंद व्यापार व्यवस्था को शुरुआती प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कृषि व्यापार में केवल माल भेजना पर्याप्त नहीं है; यह भी उतना ही जरूरी है कि उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा और स्रोत पर भरोसा हो। कृषि व्यापार सुविधा पर 2024 के ब्रिक्स सिद्धांत पहले ही खाद्य सुरक्षा, पशु-पौध स्वास्थ्य और तकनीकी मानकों से जुड़े सहयोग, एक-दूसरे के मानकों को स्वीकार करने की व्यवस्था, कम व्यापार लागत और डिजिटल व्यापार सुविधा जैसे बुनियादी मुद्दों को मान्यता देते हैं। भारत इस एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए डिजिटल प्रमाणपत्रों, उत्पाद के स्रोत और गुणवत्ता की भरोसेमंद डिजिटल जानकारी, नियामकों के बीच तेज संवाद और उत्पादकों व निर्यातकों की क्षमता निर्माण पर जोर दे सकता है।

दूसरी प्राथमिकता मजबूत आपूर्ति श्रृंखला होनी चाहिए। खाद्य व्यापार को उर्वरक, ऊर्जा, पशु आहार, बीज, ढुलाई-भंडारण और वित्त से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत के लिए यह कोई दूर की चिंता नहीं है। उसके उर्वरक और ऊर्जा आयात का आधे से अधिक हिस्सा ब्रिक्स देशों से आता है। इसलिए उत्पादन सामग्री की सुरक्षा सीधे कृषि की मजबूती से जुड़ी हुई है। पश्चिम एशिया के हालिया संकटों ने दिखाया है कि खाद्य पदार्थों के बाजार तक पहुंचने से बहुत पहले ही उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए ब्रिक्स सहयोग में उर्वरकों और अन्य उत्पादन सामग्री के बाजारों के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली, भंडार और कीमतों पर पारदर्शी जानकारी, और जरूरी कृषि सामग्री की आपूर्ति में अचानक आने वाली रुकावटों को कम करने की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए।

तीसरी प्राथमिकता बेहतर बाजार जानकारी है। ब्रिक्स अनाज विनिमय का विचार इस बात की जरूरत को दिखाता है कि खाद्य बाजारों में अधिक पारदर्शिता, बेहतर मूल्य संकेत और खाद्य सुरक्षा की तैयारी होनी चाहिए। भारत इस दिशा में ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच के भीतर कृषि बाजार जानकारी से जुड़ी एक व्यवस्था का प्रस्ताव रख सकता है। यह मंच पहले से ही “ज्ञान से कार्य” की दिशा में विकसित किया जा रहा है। ऐसी व्यवस्था खाद्य भंडार, फसल की स्थिति, उर्वरक कीमतों, जहाजरानी जोखिमों, खाद्य सुरक्षा और पशु-पौध स्वास्थ्य से जुड़े अलर्ट तथा प्रमुख कृषि जिंसों के रुझानों पर नियमित जानकारी दे सकती है। इससे देश संकट गहराने से पहले ही तैयारी कर सकेंगे।

व्यापार को किसान-केन्द्रित बनाना

चौथी प्राथमिकता ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं होनी चाहिए जिनमें छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो। यदि कृषि व्यापार केवल बड़ी मात्रा में अनाज, तेल, चीनी या अन्य जिंसों की खरीद-बिक्री तक सीमित रह गया, तो उससे छोटे किसानों और ग्रामीण परिवारों को सीमित लाभ ही मिलेगा। कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका पर वैश्विक सम्मेलन 2026 से निकली दिल्ली घोषणा ने कृषि-खाद्य व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका, नेतृत्व और भागीदारी को केंद्र में रखा है। भारत इस भावना को ब्रिक्स के कृषि व्यापार एजेंडे में आगे बढ़ा सकता है, ताकि छोटे किसानों, विशेषकर महिला किसानों और ग्रामीण युवाओं को केवल बाजार के लिए उत्पादन करने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावी भागीदारी का अवसर मिले।

इन प्राथमिकताओं का उद्देश्य खाद्य पदार्थों से जुड़े किसी बंद गुट का निर्माण करना नहीं है। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि व्यापार एक अनिश्चित दुनिया में खाद्य सुरक्षा, किसानों और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर ढंग से काम करे। भारत इस एजेंडा को आकार देने की दृष्टि से सही स्थिति में है क्योंकि उसे खाद्य सुरक्षा के प्रबंधन, छोटे किसानों पर आधारित कृषि, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और कृषि अनुसंधान का खासा अनुभव है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता इस एजेंडे को व्यावहारिक रूप देने का समय पर मिला अवसर है। छोटे लेकिन सुविचारित कदम भी संकट के समय कृषि व्यापार को अधिक भरोसेमंद, नियमों की दृष्टि से अधिक पारदर्शी और किसानों के लिए अधिक सुलभ बना सकते हैं। यह अधिक मजबूत, भरोसेमंद और किसान-केंद्रित कृषि व्यापार व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

(आईसीएआर के महानिदेशक तथा डीएआरई के सचिव हैं)

(आईसीएआर के एम.एस. स्वामीनाथन चेयर की राष्ट्रीय प्रोफेसर और डीएएफ एंड डब्ल्यू की पूर्व संयुक्त सचिव (जी20/ब्रिक्स) हैं)

फाइबर अर्थव्यवस्था: भारत का अगला बड़ा वैश्विक अवसर ‘स्थानीय प्रचुरता से सतत सामग्रियों और भविष्य के लिए तैयार वस्त्रों में वैश्विक नेतृत्व तक’

दिल्ली / सत्ता संदेश

फाइबर के साथ भारत का 5,000 बरस पुराना सभ्यतागत संबंध है, जो हमारे गाँवों, परंपराओं तथा सामूहिक पहचान में गहराई से गुँथा है। “बुनी हुई हवा” कहलाने वाली मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध मलमल से लेकर समस्‍त महाद्वीपों तक फैली भारतीय कारीगरी तक — फाइबर हमेशा से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा रहा है। आज, जब दुनिया वैश्विक स्थिरता की क्रांति की कगार पर खड़ी है, तब यही प्राचीन ज्ञान हमारी सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति है।

दशकों तक केले के पेड़ के तने को बेकार अपशिष्ट मानकर फेंक दिया जाता था। आज वही बायोमास प्रीमियम फाइबर बनकर निर्यात बाज़ारों की मांग पूरी कर रहा है, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बना रहा है और इस कृषि अवशेष को राष्ट्रीय आय में बदल रहा है। अपशिष्ट से समृद्धि तक, स्थानीय प्रचुरता से वैश्विक अवसर तक — यही भारत की न्यू एज फाइबर मुहिम का सार है, जो हरित सामग्रियों और भविष्य के लिए तैयार वस्त्रों में भारत को वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर कर रहा है।

न्यू एज फाइबर ऐसे टिकाऊ एवं पौधों-आधारित पदार्थ हैं, जो भारत के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक नवाचार के साथ जोड़ते हैं। बांस, भाँग, केला, पीएएलएफ, फ्लैक्स, रेमी, सिसल, मिल्कवीड और कपोक जैसे फाइबर सदियों से मौजूद रहे हैं, लेकिन अब इन्हें वस्त्र उद्योग, रक्षा, बायोडिग्रेडेबल कंपोज़िट्स और प्रीमियम उत्पादों में उच्च-मूल्य उपयोगों के लिए नए सिरे से खोजा जा रहा है। ये हरित भविष्य के लिए भारत के प्राकृतिक फाइबर भंडार का विस्तार कर रहे हैं।

बढ़ती आय, वैश्विक स्थिरता संबंधी अनिवार्यताएँ और ट्रेसेबल सोर्सिंग की आवश्यकताएँ वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को पूरी तरह बदल रही हैं और एक नई फाइबर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही हैं। उपभोक्ता अब अपने पहनने के कपड़ों में आराम, पसीना सोखने की क्षमता या ब्रीदेबिलिटी और टिकाऊपन चाहते हैं। यही महत्‍वपूर्ण बदलाव भारत में फाइबर की खपत को आज के 15 एमएमटी से बढ़ाकर 2030 तक 23 एमएमटी तक ले जाने वाला है। दुनिया अब तेजी से वही तलाश रही है, जिसे भारत प्रदान कर सकता है :  नैतिक, टिकाऊ और उच्च-प्रदर्शन वाले प्राकृतिक फाइबर, जो सदियों के अनुभव पर आधारित हैं।

इस विजन को एक स्पष्ट संस्थागत एवं नीतिगत ढाँचे का समर्थन प्राप्त है। वर्ष 2026–2031 के लिए 5,664 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय वाले “मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी” के अंतर्गत न्यू एज फाइबर्स के लिए 300 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान रखा गया है। इस प्रयास को और सशक्त बनाते हुए, केंद्रीय बजट 2026–27 में घोषित राष्ट्रीय फाइबर मिशन एक व्यापक रणनीतिक ढाँचा प्रदान करता है, जो चार प्रमुख स्तंभों : कृषि-सूत्र- खेती और कच्चे माल के विकास के लिए, इन्फिनिटी-अनुसंधान एवं नवाचार के लिए, ग्राम-सेतु – अवसंरचना और उद्यम सृजन के लिए, तथा जीएमपीएस: ब्रांडिंग और बाज़ार विकास के लिए – पर आधारित है ।

इस नीतिगत ढाँचे की शक्ति दशकों से जारी वैज्ञानिक अनुसंधान में निहित है, जिसे ठोस परिणाम पहले से ही सामने आ चुके हैं। मिल्कवीड (आक/मदार) जिसे पारंपरिक रूप से भगवान शिव को अर्पित किया जाता है, नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (एनआईटीआरए) में 18 वर्षों के अनुसंधान के बाद एक बड़ी कामयाबी के तौर पर सामने आया है। अब इसका उपयोग रक्षा क्षेत्र में, विशेषकर –20°C तापमान में कार्यरत सैनिकों के लिए स्लीपिंग बैग बनाने में किया जा रहा है। ये स्लीपिंग बैग अपने पॉलिएस्टर विकल्पों की तुलना में 10% हल्के, ऊन से अधिक गर्म तथा सीएलओ/सेल प्रमाणित हैं। 55 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि पर बिना उर्वरक के उगाए जाने पर यह पौधा किसानों को प्रति एकड़ प्रतिवर्ष 1.5–2 लाख रुपये तक की आय प्रदान करने की क्षमता रखता है। 

केले का फाइबर प्रतिवर्ष लगभग 1.8 मिलियन टन उत्पादन की क्षमता रखता है और कृषि अवशेषों से किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान कर सकता है, जबकि बांस प्रति हेक्टेयर 60 टन तक बायोमास उत्पादन करने की क्षमता रखता है, जिससे पूर्वोत्तर भारत के लिए बड़े अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। भाँग भी एक उभरता हुआ वैश्विक बाज़ार बन रहा है, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जिसकी खेती की पहले से ही अनुमति है। फ्लैक्स, सिसल, रेमी, पीएएलएफ, बिछुआ या नेटल और कपोक जैसे फाइबरों के साथ मिलकर ये सभी भारत के टिकाऊ एवं प्राकृतिक फाइबर आधार का निरंतर विस्तार कर रहे हैं। 

इस वैज्ञानिक गति को आगे बढ़ाते हुए,न्यू एज फाइबर्स पर राष्ट्रीय सेमिनार एक ऐसे मंच के रूप में उभरा, जहाँ विज्ञान, नीति और उद्यम एक साथ आ सके। इसने शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, उद्यमियों, किसान संगठनों, उद्योग जगत के दिग्‍गजों और नीति-निर्माताओं को एक ही मंच पर एकत्रित किया। सभी दस प्राथमिकता प्राप्त फाइबर्स को कवर करने वाले तीन कार्य बलों की रिपोर्टें जारी की गईं, जिन्होंने क्षेत्रीय विज्ञान को सीधे योजनाओं के डिज़ाइन और निवेश की प्राथमिकताओं में बदल दिया। 

इस सेमिनार ने मानकों, प्रसंस्करण अवसंरचना और संस्थागत वित्तपोषण में मौजूद खामियों की भी स्पष्ट रूप से पहचान की , जो एक ऐसे मिशन को दर्शाता है जो केवल नीति नहीं, बल्कि वास्तविक क्रियान्वयन पर केंद्रित है। इसमें प्रमुख प्राथमिकताएँ: उत्पादन को पाँच वर्षों में  10,000 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 10 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचाना, गुणवत्ता मानकों का विकास करना, मशीनरी के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना, आयातित प्रसंस्करण तकनीक पर निर्भरता कम करना और खेती से लेकर मूल्य संवर्धन तक क्लस्टर आधारित फाइबर इकोसिस्टम का निर्माण करना सामने आईं। ये सभी कदम मिलकर न्यू एज फाइबर्स को ग्रामीण समृद्धि और टिकाऊ विकास के लिए एक संपूर्ण सरकारी मिशन बनाते हैं। 

शायद सबसे परिवर्तनकारी कार्य फाइबर ब्लेंडिंग है। भारत की वास्तविक शक्ति किसी एक फाइबर में नहीं, बल्कि उन्हें समझदारी से संयोजित करने में निहित है—जैसे थर्मल हल्केपन के लिए मिल्कवीड, गर्माहट के लिए ऊन, ब्रीदेबिलिटी के लिए बांस, और कोमलता के लिए कपास। मिश्रित कपड़ा या ब्लेंडेड फैब्रिक कोई समझौता नहीं है; यह प्रदर्शन को उन्नत बनाना है – ऐसे कपड़े तैयार करना जो अधिक मजबूत, अधिक स्मार्ट और अधिक टिकाऊ हों, साथ ही बेहतर आराम, नमी सोखने की क्षमता, टिकाऊपन तथा फैशन, जीवनशैली और तकनीकी वस्त्रों में बहुपयोगिता प्रदान करें। 

इसके लाभ पूरी मूल्य शृंखला में फैलते हैं। उपभोक्ताओं को बेहतर आराम और कार्यक्षमता मिलती है, निर्माताओं को प्रीमियम और विशिष्ट उत्पाद विकसित करने का अवसर मिलता है, और किसानों को विविध प्रकार की मांग तथा अधिक मजबूत आय प्राप्त होती है। भारत के लिए, ब्लेंडिंग या मिश्रण केवल एक तकनीकी नवाचार भर नहीं है; यह कच्चे फाइबर आपूर्ति से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, मूल्य-संवर्धित और भारतीय पहचान से जुड़े ब्रांड्स तक पहुँचने का एक सेतु है।

असल में, न्यू एज फाइबर मुहिम  जीवन को रूपांतरित करने, किसानों के लिए अवसर सृजित करने, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बनाने, महिलाओं को सशक्त करने और उद्यमियों को स्थानीय संसाधनों से वैश्विक व्यवसाय खड़ा करने में सक्षम बनाने के बारे में है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के 5एफ विज़न— खेत से फाइबर, कपड़े से फैशन और विदेश तक—से प्रेरित, भारत की ग्रीन फाइबर क्रांति कोई दूर का सपना नहीं है। रणनीति तय है, संस्थान सक्रिय हैं, विज्ञान प्रमाणित हो चुका है, और उद्यमी तैयार हैं। आज भारत जो कर रहा है—फाइबर दर फाइबर, मिश्रण दर मिश्रण, क्षेत्र दर क्षेत्र, और खेत दर खेत—अपनी वस्त्र गाथा का अगला महान अध्याय लिख रहा है।

12 वर्षों में विज्ञान की उड़ान: लैवेंडर खेतों से चंद्रमा तक भारत की नई पहचान

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब जम्मू के डोडा जिले की एक लैवेंडर किसान मौसम के पहले फूल तोड़ती है, तब वह विज्ञान नीति के
बारे में नहीं सोचती। लेकिन सच यह है कि केंद्र शासित प्रदेश की बंजर पहाड़ियों को बैंगनी फूलों की
सुगंधित खेती में बदलने के पीछे पिछले एक दशक में किया गया उद्देश्यपूर्ण और दूरदर्शी वैज्ञानिक
निवेश ही है। यह ग्रामीण आजीविका में आई ऐसी क्रांति है, जिसकी शुरुआत एक प्रयोगशाला से हुई थी।
असल में, भारत में पिछले बारह वर्षों की विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का यही
अर्थ है। विज्ञान केवल ज्ञान बढ़ाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह हमारे नागरिकों के दैनिक जीवन को
बेहतर बनाने वाली एक जीवंत और प्रभावशाली शक्ति बन गया है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभाला, तब उन्होंने एक ऐसी सोच प्रस्तुत की जिसमें
विज्ञान को केवल किसी विभाग का काम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मिशन माना गया। इसके बाद के
वर्षों में इस दृष्टि ने ऐसे परिणाम दिए, जो एक पीढ़ी पहले असाधारण माने जाते। आज भारत चंद्रमा के
दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतार चुका है, पहली बार अपनी स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित कर चुका
है, पुणे से पटना तक सुपरकंप्यूटर स्थापित कर चुका है और एक ऐसे अंतरिक्ष अर्थतंत्र का निर्माण कर
चुका है जिसमें देशी स्टार्टअप्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

लेकिन इन उपलब्धियों की असली कहानी यह नहीं है कि हमने क्या हासिल किया, बल्कि यह है कि इन
उपलब्धियों ने आम नागरिकों के जीवन को किस तरह प्रभावित किया। विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं

तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विकास और नागरिक सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम
बन चुका है।

किसानों का उदाहरण लें। भारतीय कृषि में मौसम हमेशा से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
पिछले एक दशक में पृथ्वी अवलोकन (अर्थ ऑब्जर्वेशन) और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में व्यापक सुधार
किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप आज किसानों को सटीक और स्थानीय स्तर पर मौसम की जानकारी
मिल रही है। यह केवल संभावनाओं पर आधारित अनुमान नहीं, बल्कि इतनी सटीक जानकारी है कि कोई
किसान परिवार यह तय कर सकता है कि फसल आज काटनी है या कल तक इंतजार करना है।

आज यदि बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवात बनता है, तो हमारी आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां तटीय
समुदायों को कई घंटे, और कई बार कई दिन पहले ही सचेत कर देती हैं। इसका महत्व केवल आंकड़ों में
नहीं मापा जा सकता; इसका वास्तविक मूल्य उन अनगिनत जानों और आजीविकाओं में दिखाई देता है
जो समय रहते बचाई जा रही हैं।

जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों और नदी घाटियों में विज्ञान ने “अरोमा मिशन” के रूप में दस्तक दी। इस
कार्यक्रम के तहत किसानों को लैवेंडर की खेती से जोड़ा गया तथा उन्हें तकनीक, बेहतर बीज और बाज़ार
तक पहुँच उपलब्ध कराई गई। जो पहल एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई थी, वह आज
भारत की “पर्पल रिवोल्यूशन” (बैंगनी क्रांति) के रूप में जानी जाती है। इसके माध्यम से हजारों किसान
परिवार सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती से सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं। इस समृद्धि के
पीछे विज्ञान ने एक शांत लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई है।

इसी प्रकार के प्रयासों के तहत केसर की खेती का विस्तार, औषधीय जड़ी-बूटियों का उत्पादन और भारत
में पहली बार हींग की खेती की शुरुआत की गई। इन पहलों ने साबित किया है कि यदि नवाचार जमीन
से जुड़ा हो, तो वह किसी भी औद्योगिक तकनीक जितना परिवर्तनकारी हो सकता है।

विज्ञान के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा है। किफायती ग्रामीण
आवास के लिए विकसित 3डी-प्रिंटेड घरों के मॉडल से लेकर खाद्य पदार्थों में मिलावट की पहचान करने
वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों तक, तकनीक को उन समस्याओं के समाधान के लिए
इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सामना समाज के सबसे कमजोर वर्ग करते हैं।

कंप्यूटिंग, सेंसर तकनीक और इंजीनियरिंग को एक साथ जोड़ने वाले “राष्ट्रीय अंतःविषय साइबर-
फिजिकल सिस्टम मिशन” के तहत देशभर में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं। इन
केंद्रों ने एक हजार से अधिक स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया है, जो सटीक कृषि, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता
और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान पर काम कर रहे हैं।

भारत को स्वस्थ बनाना: जैव प्रौद्योगिकी की नई क्रांति

यदि कोई क्षेत्र भारतीय विज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति को सबसे प्रभावशाली ढंग से दिखाता है, तो वह
जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र है। दशकों तक भारत की फार्मास्युटिकल ताकत मुख्य रूप
से विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) तक सीमित रही। हम उन दवाओं के जेनेरिक संस्करण बनाते थे, जिनकी
खोज दूसरे देशों में होती थी। अब यह कहानी बदल रही है।

दशकों में पहली बार भारत में खोजी गई स्वदेशी एंटीबायोटिक “नैफिथ्रोमाइसिन” का विकास केवल एक
वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की घोषणा भी है। सरकार के
सहयोग से शोधकर्ताओं और उद्योग जगत की साझेदारी से विकसित यह दवा इस बात का प्रमाण है कि
भारत की प्रयोगशालाएँ अब केवल दवाएँ बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई दवाओं की खोज और
विकास के वैश्विक अग्रिम मोर्चे पर भी काम कर सकती हैं। यह वह क्षमता है जो दुनिया के केवल कुछ
देशों के पास ही है।

इसी तरह एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि देश में हीमोफीलिया के लिए पहली सफल स्वदेशी जीन थेरेपी
क्लीनिकल ट्रायल रही, जिसे वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में सम्पन्न किया गया।

हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है जिसके उपचार के लिए मरीजों को जीवनभर महंगे इलाज की
आवश्यकता होती है।

जीन थेरेपी की विशेषता यह है कि यह बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय उसके मूल
आनुवंशिक दोष को ठीक करने का प्रयास करती है। आनुवंशिक रोगों के बड़े बोझ वाले भारत जैसे देश के
लिए यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण है और भविष्य की चिकित्सा प्रणाली को बदलने की क्षमता रखती है।

इसके साथ-साथ “जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट” के तहत भारत की विविध आबादी से जुड़े 10,000 से अधिक
मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। इससे देश में ऐसी वैज्ञानिक नींव तैयार हो रही है,
जिसके आधार पर भविष्य में प्रत्येक व्यक्ति की जैविक संरचना के अनुसार व्यक्तिगत और अधिक
प्रभावी उपचार उपलब्ध कराए जा सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत केवल बीमारियों का इलाज करने
की दिशा में ही नहीं, बल्कि “व्यक्तिगत चिकित्सा” के उस युग की ओर बढ़ रहा है, जहां उपचार हर
मरीज की आनुवंशिक विशेषताओं के अनुरूप होगा।

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घरेलू जैव-
चिकित्सा (बायोमेडिकल) क्षमता कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत की प्रतिक्रिया, अपने स्वयं के टीकों का
विकास करना, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और 1.4 अरब लोगों तक उन्हें पहुंचाना, हमारे जैव
प्रौद्योगिकी तंत्र में वर्षों से किए गए निवेश का परिणाम थी।

इस सफलता के पीछे बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल(बीआईआरएसी) की महत्वपूर्ण
भूमिका रही है। इस संस्था ने बायोटेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, शैक्षणिक शोध और व्यावसायिक
उत्पादन के बीच की दूरी कम करने तथा वैज्ञानिक नवाचारों को आम लोगों तक पहुँचाने में अहम
योगदान दिया है।

आज भारत में जैव-उद्यमियों की एक नई पीढ़ी उभर रही है, जो प्रिसिजन मेडिसिन, टिकाऊ जैव-
आधारित सामग्री और अगली पीढ़ी की डायग्नोस्टिक तकनीकों पर काम कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण

बात यह है कि यह नवाचार केवल अमेरिका की सिलिकॉन वैली तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के
शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से भी उभर रहा है।

इसी दिशा में जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। इस परियोजना के तहत
10,000 से अधिक भारतीयों के मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। भारत जैसी अत्यंत
विविध आबादी वाले देश के लिए यह उपलब्धि भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था की मजबूत वैज्ञानिक नींव
तैयार कर रही है।

इससे आने वाले समय में ऐसी स्वास्थ्य सेवाओं का मार्ग प्रशस्त होगा, जहाँ उपचार केवल बीमारी के
आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की विशिष्ट आनुवंशिक संरचना के अनुसार तय किया जाएगा।
अर्थात भारत व्यक्तिगत चिकित्सा के नए युग की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ हर मरीज को उसकी
जैविक आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सटीक और प्रभावी इलाज मिल सकेगा।

सितारों तक पहुंच, नागरिकों से जुड़ाव

23 अगस्त 2023 को जब चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर अपने अंतिम
चरण में उतर रहा था, एक ऐसा क्षेत्र जहां इससे पहले कोई देश नहीं पहुँच पाया था, तब करोड़ों भारतीयों
की निगाहें उस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं। लैंडिंग का वह पल केवल तकनीकी सफलता नहीं था,
बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामर्थ्य का प्रतीक भी था। भारत ने वह कर दिखाया था जो दुनिया का
कोई अन्य देश नहीं कर सका था।

इसके बाद चंद्रमा की सतह से प्राप्त जानकारियाँ और लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर से पृथ्वी पर
भेजा गया वैज्ञानिक डेटा निस्संदेह अंतरिक्ष विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। लेकिन उतना ही
महत्वपूर्ण वह प्रभाव भी था, जो इस उपलब्धि ने देश की नई पीढ़ी की कल्पनाओं, आकांक्षाओं और
आत्मविश्वास पर डाला।

पिछले बारह वर्षों में भारत की अंतरिक्ष यात्रा महत्वाकांक्षा और जनहित के अनूठे संगम की कहानी रही
है। जहाँ चंद्रयान-3 ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया, वहीं आदित्य-एल1 ने चुपचाप सूर्य का
अध्ययन करने का अपना मिशन शुरू किया। यह मिशन अंतरिक्ष मौसम को समझने में मदद कर रहा
है, जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी पर मौजूद उपग्रहों, बिजली ग्रिडों और संचार प्रणालियों पर पड़ता है।

इसी क्रम में स्पेडेक्स मिशन ने भारत को उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल कर दिया, जिन्होंने
अंतरिक्ष में दो यानों को सफलतापूर्वक जोड़ने की क्षमता प्रदर्शित की है। यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष
स्टेशनों और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

वहीं शुभांशु शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिनों का ऐतिहासिक प्रवास भारत के मानव
अंतरिक्ष मिशन के सपनों को वास्तविकता के और करीब ले आया। यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि
नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी थी कि भारत अब मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों
की ओर बढ़ रहा है।

इन उपलब्धियों का महत्व केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। इन्होंने देश के युवाओं में विज्ञान,
प्रौद्योगिकी और नवाचार के प्रति नई रुचि पैदा की है तथा यह विश्वास मजबूत किया है कि भारत न
केवल वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति का हिस्सा है, बल्कि उसका नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आया परिवर्तन केवल अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं है, चाहे वे कितने भी
महत्वपूर्ण क्यों न हों। वर्ष 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण और
ग्राउंड सिस्टम सहित पूरे अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया।

इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे,
वहीं आज उनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप्स रॉकेट बना रहे हैं, उपग्रह डिजाइन
कर रहे हैं और कृषि निगरानी से लेकर आपदा प्रबंधन तक अनेक क्षेत्रों के लिए तकनीकी समाधान
विकसित कर रहे हैं।

भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के बाद से
भारतीय प्रक्षेपण यानों ने 399 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसके चलते भारत
दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों और देशों के लिए एक विश्वसनीय एवं पसंदीदा साझेदार बनकर उभरा
है।

आज भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रही। यह हजारों युवा
इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के प्रयासों से निर्मित एक राष्ट्रीय संपत्ति बन चुकी है। निजी क्षेत्र
की बढ़ती भागीदारी ने नवाचार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।

आने वाले वर्षों के लिए भारत की योजनाएँ और भी महत्वाकांक्षी हैं। वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष
स्टेशन स्थापित करने की परिकल्पना की गई है, जबकि वर्ष 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन भेजने
का लक्ष्य रखा गया है। यह दर्शाता है कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल वर्तमान उपलब्धियों तक सीमित
नहीं है। इसकी महत्वाकांक्षा दीर्घकालिक है, दृष्टि स्पष्ट है और दिशा लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़
रही है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत का भविष्य केवल आशाजनक नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की संभावनाओं
से भी परिपूर्ण दिखाई देता है।

नवाचार के माध्यम से आत्मनिर्भरता

“आत्मनिर्भर भारत” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह
एक मार्गदर्शक दर्शन बन चुका है। 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ शुरू किया गया

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन केवल एक नई तकनीक में निवेश नहीं है, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण
तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास है।

क्वांटम कंप्यूटिंग ऐसी जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखती है जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटर हल
नहीं कर सकते। क्वांटम संचार लगभग अभेद्य साइबर सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जबकि क्वांटम
सेंसिंग नेविगेशन, चिकित्सा इमेजिंग और भू-वैज्ञानिक खोजों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। भारत
अब इन सभी क्षमताओं का विकास अपने देश में ही कर रहा है। इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध
संस्थानों और उद्योगों को जोड़ने वाले विशेष थीमैटिक हब स्थापित किए गए हैं।

इसी तरह राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत पुणे, चेन्नई, खड़गपुर और अन्य शहरों में उच्च-प्रदर्शन
कंप्यूटिंगकी सुविधाएं विकसित की गई हैं। इससे भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और
स्टार्टअप्स को वह कंप्यूटिंग शक्ति उपलब्ध हो रही है, जो पहले केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित
थी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। “भारतजेन”, देश का पहला सरकारी
वित्तपोषित बहुभाषी जनरेटिव एआई कार्यक्रम, ऐसे बड़े भाषा मॉडल विकसित कर रहा है जो भारतीय
भाषाओं में सोच और संवाद कर सकें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के
लाभ केवल अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के हर नागरिक तक पहुँचें।

इस आत्मनिर्भरता की दृष्टि को साकार करने में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल
रिसर्च(सीएसआईआर) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारतीय इंजीनियरों द्वारा पूरी तरह
स्वदेशी रूप से विकसित हंसा-एन.जी. प्रशिक्षण विमान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार
किया गया है। यह भारत की विमानन तकनीक में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

इसी प्रकार भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संचालित पोत स्वच्छ समुद्री परिवहन की दिशा में एक
महत्वपूर्ण कदम है। वहीं टिकाऊ विमानन ईंधन पर चल रहा शोध विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम
करते हुए पर्यावरण-अनुकूल हवाई यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

सीएसआईआर इनोवेशन कॉम्प्लेक्स, देश की अपनी तरह की पहली सुविधा, ऐसी प्रयोगशाला के रूप में
विकसित की गई है जहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान और उद्यमशीलता का संगम होता है। इसका उद्देश्य
वैज्ञानिक खोजों को तेजी से बाजार में उपयोगी उत्पादों में बदलना है। इन प्रयासों के परिणाम स्पष्ट
दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2014 में भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे, जबकि आज उनकी संख्या
400 से अधिक हो चुकी है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि जब दूरदर्शी नीतियाँ, सार्वजनिक
निवेश और उद्यमशीलता की ऊर्जा एक साथ काम करती हैं, तो असाधारण परिवर्तन संभव हो जाते हैं।
आत्मनिर्भर भारत की यह यात्रा केवल तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की
कहानी है जो अपने ज्ञान, नवाचार और प्रतिभा के बल पर वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ आगे
बढ़ रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की तकनीकें

भारत के वैज्ञानिक परिवर्तन की कहानी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में हुए रणनीतिक विकास का उल्लेख किए
बिना अधूरी है। अप्रैल 2026 में कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर
रिएक्टर की पहली क्रिटिकलिटी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह रिएक्टर पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों
और इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया है। इसका विकास इंदिरा गांधी सेंटर फॉर अटॉमिक रिसर्च ने
किया है, जबकि इसका निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने है।

यह रिएक्टर भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की ओर बढ़ने में एक महत्वपूर्ण कड़ी
है। इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम भंडार का ऊर्जा उत्पादन के
लिए उपयोग करना है। ऐसे समय में जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, घरेलू ईंधन संसाधनों
से स्वच्छ और निरंतर ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि
राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का भी प्रश्न है।

परमाणु विज्ञान का प्रभाव अब केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में भी
इसका बड़ा योगदान दिखाई दे रहा है।

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल को इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी से “रेज ऑफ होप एंकर सेंटर ” के रूप
में मान्यता मिलना भारत की कैंसर चिकित्सा क्षमता का वैश्विक सम्मान है। इसके साथ ही होमी भाभा
कैंसर अस्पताल नेटवर्क के विस्तार और उन्नत रेडियोफार्मास्यूटिकल दवाओं के उपयोग से देशभर में
कैंसर रोगियों को बेहतर और आधुनिक उपचार उपलब्ध हो रहा है। रेडियोफार्मास्यूटिकल्स ऐसी विशेष
दवाएँ होती हैं जिनमें रेडियोधर्मी कणों का उपयोग कैंसर की पहचान और उपचार के लिए किया जाता है।
इससे मरीजों को अधिक सटीक और प्रभावी चिकित्सा मिल पाती है।

वर्ष 2025 का शांति अधिनियम भी परमाणु क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। इस कानून
ने भारत के परमाणु क्षेत्र के नियामक और कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया है तथा इस क्षेत्र में अधिक
निवेश और भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया है। आने वाले वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में परमाणु
ऊर्जा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

दूसरी ओर, भारत का “डीप ओशन मिशन”पृथ्वी के अंतिम बड़े अनछुए क्षेत्र-गहरे समुद्र तक देश की
वैज्ञानिक पहुँच का विस्तार कर रहा है। समुद्र की गहराइयों में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स और कोबाल्ट-
समृद्ध परतों जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, बैटरियों और उन्नत
औद्योगिक उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। इन संसाधनों का दोहन भारत की आयातित महत्वपूर्ण खनिजों
पर निर्भरता को कम कर सकता है।

इसके साथ ही यह मिशन उन्नत पनडुब्बी वाहनों, सेंसर प्रणालियों और समुद्री अनुसंधान तकनीकों का भी
विकास कर रहा है। इससे भारत को अपने समुद्री क्षेत्र में वैज्ञानिक, आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति
को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु तकनीक और समुद्री विज्ञान में हो रहे ये निवेश केवल वर्तमान की आवश्यकताओं
को पूरा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि आने वाले दशकों में भारत को तकनीकी रूप से सक्षम, ऊर्जा के
क्षेत्र में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

विकसित भारत की ओर: विज्ञान ही भविष्य की दिशा

जब भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और एक पूर्ण विकसित राष्ट्र
बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी केवल इस यात्रा का सहायक साधन
नहीं होंगे, बल्कि वे इसकी गति और स्वरूप दोनों निर्धारित करेंगे। पिछले बारह वर्षों में किए गए निवेशों
ने केवल संस्थान और आधारभूत संरचनाएँ ही नहीं बनाई हैं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक ऐसी
संस्कृति विकसित की है जो वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास से परिपूर्ण
है।

अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन भारत के शोध एवं नवाचार तंत्र को नई दिशा देने के लिए
किया गया है। इसका उद्देश्य मिशन-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना, शिक्षा जगत और उद्योग के
बीच सहयोग को मजबूत करना तथा युवा शोधकर्ताओं को सशक्त बनाना है। इसके साथ ही एक लाख
करोड़ रुपये की पूंजी वाले नए “रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड” की स्थापना भारत द्वारा अपनी
बौद्धिक क्षमता पर लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि देश
की सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान भारत की अपनी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और समुदायों के
भीतर मौजूद है।

जम्मू-कश्मीर के डोडा का लैवेंडर किसान, वेल्लोर का जीनोमिक्स शोधकर्ता, बेंगलुरु का स्पेस स्टार्टअप
उद्यमी और कलपक्कम का परमाणु इंजीनियर- ये सभी एक ही कहानी के पात्र हैं। यह उस भारत की
कहानी है जिसने सोच-समझकर और दृढ़ निश्चय के साथ विज्ञान को अपने विकास के केंद्र में रखा। यह
कहानी केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि उस मजबूत नींव की कहानी है जो पिछले बारह वर्षों में
तैयार हुई है। यह नींव व्यापक, गहरी और स्थायी है- ऐसी नींव जिस पर एक विकसित, आत्मनिर्भर और

वैज्ञानिक दृष्टि से आत्मविश्वासी भारत का निर्माण होगा। विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक
प्रगति का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जो ज्ञान, नवाचार, अनुसंधान और
वैज्ञानिक सोच के आधार पर विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाए। पिछले वर्षों की उपलब्धियाँ इसी
भविष्य की आधारशिला हैं, और आने वाले दशकों में यही विज्ञान भारत की नियति को आकार देगा।

(लेखक भारत सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री तथा
प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष विभाग में राज्य मंत्री हैं)

नीतिगत गतिरोध से विकसित भारत तक: मोदी युग ने भारत को नए सिरे से परिभाषित किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

वर्ष 2014 के बाद से, भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसकी अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत हुई है। बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से बेहतर हुआ है। महिलाएं बेहद सशक्त हुईं हैं। किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं और गरीब अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हुए हैं। इन तमाम बदलावों में एक ही बात साझा है: प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि और उनका नेतृत्व।

भारत के लोगों ने उनके दूरदर्शी एवं संवेदनशील नेतृत्व का भरपूर समर्थन किया है और उन्हें देश का सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाला निर्वाचित प्रधानमंत्री बनाया है। बीते 10 जून को उन्होंने राष्ट्र की सेवा में 4,399 दिन पूरे किए और अपनी पहली चुनावी जीत के बाद जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए।

यह ऐतिहासिक उपलब्धि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। देश के लोगों ने ऐसे समय में 2014 में मोदी सरकार को भारी बहुमत से सत्ता सौंपी, जब अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी और यूपीए सरकार के बदनाम कार्यकाल के दौरान नीतिगत गतिरोध, भ्रष्टाचार, घोटालों एवं विवादों को लेकर जनता में निराशा लगातार बढ़ रही थी।

संवेदनशील नेतृत्व – 2014 से देश निरंतर बदलाव की यात्रा पर है। मोदी सरकार ने 81 करोड़ से अधिक लोगों के लिए मुफ्त अनाज की व्यवस्था की, 58 करोड़ जन धन बैंक खातों के जरिए वित्तीय समावेशन को संभव बनाया और 16 करोड़ घरों तक नल के पानी का कनेक्शन पहुंचाया। दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना, ‘आयुष्मान भारत’ के जरिए 12 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की गारंटी मिल रही है। 

कई युवा भारतीयों के लिए यह कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि मोदीजी द्वारा – पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री के रूप में – लाए गए बड़े बदलावों से पहले जीवन कितना चुनौतीपूर्ण था। उनके निर्णायक नेतृत्व और नेक एवं संवेदनशील दृष्टिकोण ने देश को ‘विकसित भारत 2047’ मिशन की दिशा में आगे बढ़ाया है। इस मिशन में भारत की विरासत पर गर्व और विकास का एक महत्वाकांक्षी एजेंडा शामिल है।

नारी शक्ति

प्रधानमंत्री के लिए महिलाएं केवल सहायता की लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता हैं। सबसे पहले उनकी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान दिया गया: स्वच्छ भारत मिशन के तहत 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए। इससे उनकी सुरक्षा और सम्मान में वृद्धि हुई। वहीं, उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए। इससे महिलाओं को धुएं से भरी रसोई के खतरों से मुक्ति मिली।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की पहल ने बेटियों की शिक्षा एवं उनके कल्याण के महत्व को और ठोस बनाया है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए, प्रधानमंत्री ने महिलाओं के नेतृत्व में विकास को आगे बढ़ाने के लिए देश की विधायिकाओं में महिलाओं की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की है।

किसानों का कल्याण

किसानों का कल्याण प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों का एक मुख्य आधार रहा है। किसानों के योगदान को मान्यता देते हुए, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के जरिए उन्हें सीधे आय संबंधी सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत बांटे गए कुल 4.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि से लगभग 10 करोड़ किसान परिवारों को लाभ हुआ है।

सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भी काफी बढ़ोतरी की है, जो अब उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना है। साथ ही, किफायती दरों पर फसलों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराकर किसानों को वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी से बचाया गया है।

युवाओं के लिए अवसर

युवा भारतीयों के लिए अवसर सृजित करने के उद्देश्य से, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी प्रमुख पहलें शुरू की गई हैं। ‘कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय’ के रूप में एक समर्पित मंत्रालय के गठन से जहां युवाओं को आधुनिक अर्थव्यवस्था के अनुकूल कौशल से लैस करने में मदद मिली है, वहीं भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्षेत्र में उभरती हुई क्रांति का लाभ उठाने के लिए तैयार भी किया गया है।

‘स्टार्टअप इंडिया’ और नवाचार को दिए गए व्यापक समर्थन ने कई युवाओं को नौकरी खोजने वाला से हटकर नौकरी देने वाला बनने में मदद की है। इन पहलों ने उद्यमिता (एंटरप्रेन्योरशिप) की एक ऐसी नई लहर की नींव रखी है, जिसमें आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के मामले  में अहम योगदान देने की क्षमता है।

अर्थव्यवस्था और जीवनयापन में सुगमता

वर्ष 2014 से पहले, भारत की गिनती दुनिया की “फ्रैजाइल फाइव” (कमजोर पांच) अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में होती थी। निवेशकों का भरोसा भी लगातार कम हो रहा था। साहसिक सुधारों, निवेशकों के लिए अनुकूल नीतियों, वित्तीय अनुशासन और अपेक्षाकृत कम महंगाई के सहारे, भारत अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है और यह कारोबार व निवेश का एक आकर्षक स्थल बनता जा रहा है।

भारत ने विभिन्न विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। इससे हमारे युवाओं, किसानों, छोटे व्यवसायों, कारीगरों और श्रमिकों के लिए वैश्विक स्तर पर नए अवसर खुले हैं। और ऐसा भारत के हितों से समझौता किए बिना किया गया है। यह यूपीए सरकार द्वारा किए गए कुछ लापरवाही भरे समझौतों से बिल्कुल अलग है।

सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और करों की कम दरों जैसे बड़े सुधारों के जरिए  कारोबार जगत और मध्यम वर्ग का भरोसा भी बढ़ाया है। इंटरनेट की पैठ और डिजिटल भुगतान प्रणाली के तेज विस्तार के साथ मिलकर, ‘डिजिटल इंडिया’ पहल ने अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डालने के साथ-साथ नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को भी आसान बनाया है।

कई पुराने एवं मामूली अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाने तथा अनुपालन के अनावश्यक बोझ को कम करने से कारोबार जगत को और भी अधिक लाभ हुआ है। मध्यम वर्ग को भी काफ़ी राहत मिली है और 12.75 लाख रुपये तक की सालाना आय को आयकर से छूट दे दी गई है।

आधुनिक बुनियादी ढांचा

मोदी सरकार देश के बुनियादी ढांचे में तेजी से बदलाव ला रही है। सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वर्ष 2014 में सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या 74 थी और अब यह 160 से अधिक हो गई है।

बड़े पैमाने पर रेलवे के विद्युतीकरण, महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना और राष्ट्रीय राजमार्गों  व एक्सप्रेसवे के तेज विस्तार ने देश के कई हिस्सों के बुनियादी ढांचे को दुनिया के बेहतरीन बुनियादी ढांचों की बराबरी में ला खड़ा किया है।

प्रधानमंत्री की इस ऐतिहासिक उपलब्धि का वास्तविक महत्व कार्यकाल के दिनों की गिनती में नहीं, बल्कि किए गए व्यापक बदलावों में निहित है। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने गरीबों एवं  किसानों के कल्याण, मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं और उभरते भारत की महत्वाकांक्षाओं को शासन के केन्द्र में रखा है।

अब जबकि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है, 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण के नए संकल्प के साथ बदलाव की यह यात्रा निरंतर जारी रहेगी।

नए भारत के दिल की धड़कनों में बसते हैं बिरसा : रंजना चोपड़ा

भारत जब अपने स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों को याद करता है तब छोटानागपुर के जंगलों से एक नाम अपनी दृढ़ नैतिक ताकत के साथ उभरता है। यह नाम भगवान बिरसा मुंडा का है जिन्हें ‘धरती आबा’ यानी भूमि के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। वह एक ऐतिहासिक हस्ती से आगे बढ़ कर गरिमा, प्रतिरोध और जनजातीय आत्मसम्मान के जीवंत प्रतीक भी हैं। उनकी सोच थी कि जनजातीय पहचान की रक्षा की जाए, समानता सार्थक हो और विकास आम जन तक न्याय के साथ पहुंचे। उनका यह सिद्धांत अब भी विकसित भारत की ओर देश की यात्रा को निर्देशित करता है। राष्ट्र ने पिछले 12 वर्षों में समावेशी विकास पर नए सिरे से बल दिया है। बिरसा मुंडा के सिद्धांत आज भी नए भारत की नीतियों, शासन और आकांक्षाओं को आकार दे रहे हैं। 

विरासत को मिला उसका सही स्थान

भगवान बिरसा मुंडा की विरासत देश भर में जनजातीय समुदायों के गीतों, आख्यानों, सामूहिक यादों में लंबे समय से जिंदा है। माननीय प्रधानमंत्री ने 2021 में बिरसा मुंडा के जन्म दिवस 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित कर उनकी विरासत को राष्ट्रीय मान्यता दी। इस मान्यता को और गहराई देते हुए बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर 15 नवंबर 2024 से 15 नवंबर 2025 तक जनजातीय गौरव वर्ष मनाया गया। इस दौरान जनजातीय गौरव और विरासत के जश्न में समूचे राष्ट्र में 2 लाख से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनकी पहुंच 3 करोड़ से अधिक नागरिकों तक रही।

देश भर में, इन आयोजनों ने जनजातीय जीवन की समृद्धि और विविधता को प्रदर्शित किया। नागालैंड के हॉर्नबिल महोत्सव और केरल के जनजातीय साहित्यिक महोत्सव से लेकर, झारखंड के राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म महोत्सव और तेलंगाना की ‘कैनो स्प्रिंट चैम्पियनशिप’ (डोंगी चालन प्रतियोगिता) तक, इन कार्यक्रमों ने जनजातीय संस्कृति, रचनात्मकता, खेल और लोककथाओं को राष्ट्रीय पटल पर खड़ा किया। कुल मिलाकर, इनमें अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 लाख से अधिक जनजातीय नागरिकों की भागीदारी देखी गई। ये आयोजन इस बात की घोषणा थे कि आधुनिक भारत को आकार देने में जनजातीय विरासत एक जीवंत और सक्रिय शक्ति है।

जनजातीय सशक्तिकरण और समावेशन की दिशा में पिछले बारह वर्षों के निरंतर और केंद्रित राष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, ‘जनजातीय गरिमा उत्सव 2026’ इस गति को चार विषयगत सप्ताहों के माध्यम से आगे ले जा रहा है, जो मिलकर जनजातीय विकास के संपूर्ण आयाम को दर्शाते हैं। विशेष रूप से इसका तीसरा सप्ताह भारत के भविष्य से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न पर केंद्रित है: हम उन व्यक्तियों और समुदायों को कैसे पहचानें जिन्होंने इस राष्ट्र को आकार दिया और हम आने वाली पीढ़ी को उस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कैसे सशक्त बनाएं?

इतिहास में विस्मृत नामों की पुनर्स्थापना

इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की शुरुआत उन अनेक जनजातीय नायकों को पहचान देने से होती है, जिनका योगदान बहुत लंबे समय तक मुख्यधारा के ऐतिहासिक आख्यानों से गायब रहा। देश के जनजातीय क्षेत्रों में, शिक्षकों, कलाकारों, पारंपरिक चिकित्सकों और समाज सुधारकों की पीढ़ियों ने इन समुदायों को संजो कर रखा है और उनकी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा है। उनकी कहानियाँ भारत की राष्ट्रीय स्मृति में एक सही और न्यायसंगत स्थान की हकदार हैं और उनके  इन योगदानों को दस्तावेजों में दर्ज करने तथा उन्हें याद रखने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

देश भर के जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) मौखिक इतिहास का  दस्तावेजीकरण करने, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को रिकॉर्ड करने और जनजातीय भाषाओं व सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने के प्रयास में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। वर्तमान में, 26 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के 29 जनजातीय अनुसंधान संस्थान इस कार्य में जुटे हुए हैं, जिसके तहत 222 जनजातीय भाषाओं में 355 का प्रारंभिक दस्तावेजीकरण किया जा चुका है। ये प्रयास भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य सांस्कृतिक ज्ञान को संजोकर रखने में मदद कर रहे हैं।

राष्ट्रीय विमर्श में जनजातीय आवाज़ों को फिर से स्थापित करने का प्रयास ‘जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों’ के माध्यम से भी आकार ले रहा है, जिनकी परिकल्पना स्मृति और पहचान के स्थलों के रूप में की गई है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जनजातीय समुदायों की भूमिका को सम्मानित करने के लिए 10 राज्यों में ऐसे 11 संग्रहालयों को मंज़ूरी दी है। इनमें से चार संग्रहालयों का उद्घाटन पहले ही किया जा चुका है, जिनमें रांची में भगवान बिरसा मुंडा और नवा रायपुर में शहीद वीर नारायण सिंह को समर्पित संग्रहालय शामिल हैं। इन संस्थानों के जरिए जनजातीय वीरों की गाथाओं के दस्तावेजीकरण और उन पर आधारित कार्यक्रमों के आयोजन से इन्हें भारत की सामूहिक ऐतिहासिक याद में स्थाई रूप से पिरोया जा रहा है।

मशाल थामने वालों को सशक्तिकरण 

अतीत को सम्मानित करने के साथ ही, यह यात्रा स्वाभाविक रूप से वर्तमान पीढ़ी को सशक्त बनाने की ओर बढ़ती है। यह बदलाव उन जनजातीय छात्रों की बढ़ती संख्या में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिन्हें मंत्रालय के छात्रवृत्ति कार्यक्रमों का लाभ मिल रहा है। अकेले चालू वर्ष में ही, पांच छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत 26,01,979 जनजातीय छात्रों को सहायता प्रदान की गई है, जिसके लिए कुल 3825.54 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। इनमें से कई छात्र अपने परिवारों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति हैं, जो न केवल अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को, बल्कि पूरे समुदाय की आशाओं को आगे बढ़ा रहे हैं। विशेष बात यह है कि वर्तमान छात्रवृत्ति लाभार्थियों में से 56% से अधिक महिलाएं हैं।

एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) का विस्तार भी शिक्षा तक पहुँच और अवसरों के प्रति इसी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। स्वीकृत ईएमआरएस संस्थानों की संख्या वर्ष 2013-14 के 167 से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 723 हो गई है, जो 330% से अधिक की वृद्धि है – जबकि इसी अवधि के दौरान पहले से चल रहे स्कूलों की संख्या 123 से बढ़कर 499 हो गई है। छात्रों के नामांकन में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जो 0.34 लाख से बढ़कर 1.56 लाख छात्र हो गई है। जनजातीय क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा प्रदान करके, ईएमआरएस संस्थान मजबूत शैक्षिक नींव तैयार करने और देश भर के जनजातीय बच्चों के लिए अवसरों का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं।

ये आंकड़े केवल योजनाओं के विस्तार को ही नहीं दर्शाते; बल्कि ये एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। छात्रवृत्तियाँ और फेलोशिप वास्तव में आत्मविश्वास, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में किया जाने वाला निवेश हैं। हमारी प्रतिबद्धता अडिग है: किसी भी आदिवासी छात्र को भौगोलिक स्थिति, पृष्ठभूमि या शिक्षण संस्थानों तक सीमित पहुँच के कारण अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

महिला सशक्तिकरण की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति

शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे इस बदलाव के साथ-साथ, जनजातीय महिलाओं के नेतृत्व में भी जमीनी स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। पीढ़ियों से, जनजातीय महिलाएं अपनी संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और सामुदायिक जीवन की मूक संरक्षक रही हैं – वे परिवारों और परंपराओं को सहेजती आई हैं। भारत में लगभग 5.20 करोड़ जनजातीय महिलाएं हैं, जो कुल जनजातीय आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। समावेशी विकास में उनका नेतृत्व अब मुख्य भूमिका निभा रहा है।

वर्तमान में, 4,712 वन धन विकास केंद्र स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनमें से 3,365 कार्यरत हैं। इनसे 12.9 लाख से अधिक लोग लाभान्वित हो रहे हैं और इन लाभार्थियों में आधे से अधिक संख्या महिलाओं की है। ये प्रयास एक ओर जहाँ जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनजातीय महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

आगे बढ़ती हुई विरासत 

समारोह, स्मरण, शिक्षा और महिला नेतृत्व मिलकर एक बड़ी और निरंतर आगे बढ़ने वाली कहानी का हिस्सा बनते हैं—एक ऐसी कहानी, जिसमें जनजातीय समुदाय आत्मविश्वास और सम्मान के साथ भारत के भविष्य को नया आकार दे रहे हैं। ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ और ‘प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महा अभियान’  जैसी पहलों के माध्यम से, समन्वय और सहयोग के नए प्रतिमान के ज़रिए जमीनी स्तर पर क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। जनजातीय विद्वानों का उभरना, गुमनाम नायकों की पहचान और जनजातीय महिलाओं का बढ़ता नेतृत्व, यह सब मिलकर इस बात को दर्शाता है कि भगवान बिरसा मुंडा की विरासत आज के आधुनिक भारत में भी जीवंत है।

आज, भारत के 10.5 करोड़ से भी ज़्यादा आदिवासी नागरिक, देश की कहानी का एक सबसे प्रभावशाली और प्रगतिशील अध्याय हैं। वे राष्ट्रीय प्रगति के हाशिए पर नहीं हैं, बल्कि ‘विकसित भारत’ के संकल्प में सबसे मजबूत योगदान देने वालों में से हैं — जहाँ विद्वान नए कीर्तिमान रच रहे हैं, महिलाएँ नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ रही हैं और गुमनाम नायकों को आखिरकार राष्ट्रीय पहचान मिल रही है। इस यात्रा में, ‘धरती आबा’ की विरासत आगे बढ़ रही है।

खाद्य हानि से खाद्य नेतृत्व की ओर:  दक्षिण एशिया के लिए अगला बड़ा अवसर है खाद्य प्रसंस्करण 

केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान

दक्षिण एशिया खाद्य प्रणालियों की अपनी यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। समृद्ध कृषि-जैव विविधता वाला एक प्रमुख क्षेत्र होने के बावजूद, खेत से उपभोक्ता तक पहुँचने की प्रक्रिया में अभी तक बहुत अधिक मूल्य नष्ट हो जाता है—जो किसानों, रोजगार और पोषण के लिए एक चूका हुआ अवसर है।

भारत इस विरोधाभास का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, भारत दूध और दालों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक तथा फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके बावजूद, कटाई के बाद की प्रक्रियाओं,  भंडारण, लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण में मौजूद कमियों के कारण खाद्य पदार्थों की बड़ी मात्रा में हानि होती रहती है। इससे सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) सहित वैश्विक विकास प्राथमिकताओं की दिशा में होने वाली प्रगति प्रभावित होती है। यह केवल अक्षमता भर नहीं है, बल्कि चूका हुआ अवसर भी है। बर्बाद होने वाले खाद्य पदार्थों का प्रत्‍येक टन, किसानों की खोई हुई आमदनी, युवाओं के लिए खोए हुए रोजगार के अवसर और परिवारों के लिए खोए हुए पोषण का प्रतीक है। इसलिए, इस हानि को मूल्य में बदलना अब एक क्षेत्रीय प्राथमिकता बन जाना चाहिए।

 खाद्य प्रसंस्करण मूल्यवर्धित कृषि की संभावनाओं का पता लगाने की कुंजी है। यह खेतों को बाजारों से, किसानों को उद्योगों से तथा स्थानीय उत्पादन को क्षेत्रीय और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ता है। इस प्रकार, यह कृषि और व्यापक आर्थिक परिवर्तन के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है।

मात्रा से मूल्य की ओर 

दशकों से कृषि नीतियों का मुख्य उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना रहा है। इस प्रयास ने खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में लाभ दिलाएं हैं। लेकिन अब अगले चरण में मूल्य सृजन, रोजगार के अवसरों के सृजन, किसानों की आय में वृद्धि और पोषण संबंधी परिणाम बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत में, वर्तमान में कृषि उपज का केवल लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्कृत किया जाता है। क्षेत्र की पूर्ण आर्थिक क्षमता का लाभ उठाने के लिए इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 2030 तक लगभग 25 प्रतिशत करना आवश्यक है। साथ ही, कटाई के बाद होने वाली खाद्य हानियों को कम करना और प्रसंस्करण से जुड़े तंत्रों को मजबूत बनाना भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा, ताकि अर्थव्यवस्था में अधिक से अधिक मूल्य बना रहे।  खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों की भंडारण अवधि बढ़ाता है, खाद्य सुरक्षा में सुधार करता है तथा नए और घरेलू निर्यात बाजारों तक पहुँच के अवसर प्रदान करता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आर्थिक मूल्य के बड़े हिस्से को उत्पादक देशों के भीतर ही बनाए रखने में मदद करता है, जिससे किसानों, उद्यमों और ग्रामीण समुदायों को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। 

बाज़ार आधारित मूल्य श्रृंखलाओं को आकार देना 

इस परिवर्तन को सफलतापूर्वक साकार करने के लिए मूल्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण —उत्पादन और संग्रहण से लेकर प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स और बाज़ार तक पहुँच सुनिश्चित करने में समन्वित निवेश की आवश्यकता होगी। गुणवत्ता, सुरक्षा, ट्रेसबिलिटी तथा लागत-प्रभावशीलता के प्रति उपभोक्ताओं की बदलती अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए अधिक एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य होगा।  

दक्षिण एशिया की समृद्ध कृषि-जैव विविधता उच्च मूल्य वाले उत्पादों के विकास की अपार संभावनाएँ प्रदान करती है, विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक मांग अधिक विविधतापूर्ण, पौष्टिक और विशिष्ट खाद्य उत्पादों की ओर बढ़ रही है। साथ ही, डिजिटल समाधान ट्रेसबिलिटी को मजबूत करने, गुणवत्ता मानकों में सुधार लाने और लगातार जटिल होते वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 

इसमें सार्वजनिक निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन इसे निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। निवेश को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने के लिए व्यावसायिक वातावरण को मजबूत बनाना, जोखिमों को कम करना तथा प्रभावी सार्वजनिक-निजी साझेदारी को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक होगा। 

भारत ने इस दिशा में पहले ही प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना तथा उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना जैसी प्रमुख योजनाओं के माध्यम से खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के लिए ज़रूरी कदम उठाए हैं। ये कदम बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने, कोल्ड चेन नेटवर्क का विस्तार करने और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जिससे अधिक गतिशील, प्रतिस्पर्धी क्षेत्र के लिए नींव रखी जा रही है।

रोजगार के अवसर वहीं, जहाँ उनकी सर्वाधिक आवश्यकता है  

खाद्य प्रसंस्करण केवल आर्थिक दक्षता के बारे में ही नहीं है—यह आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। 

पूरे दक्षिण एशिया में लाखों युवा हर वर्ष श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं, जबकि कृषि क्षेत्र अकेले अब इस बढ़ती हुई श्रम शक्ति को समाहित करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में खाद्य प्रसंस्करण एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है।

उत्पादन केंद्रों के निकट उद्योगों की स्थापना करके यह लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, खाद्य प्रौद्योगिकी और संबंधित सेवाओं के क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत रोजगार सृजित करता है। साथ ही, यह उद्यमिता के नए अवसर भी प्रदान करता है, जिससे सूक्ष्म और लघु उद्यमों को बढ़ने, औपचारिक बनने और आधुनिक मूल्य श्रृंखलाओं से जुड़ने का अवसर मिलता है।

यही इस क्षेत्र की वास्तविक संभावनाएँ निहित हैं— केवल खाद्य में मूल्य जोड़ने में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर सार्थक रोजगार सृजित करने में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में तथा महिलाओं और युवाओं के लिए । 

बदलते वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा 

भारत के प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात में लगातार वृद्धि हुई है, जो वैश्विक बाजारों में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। जिस प्रकार नए व्यापार समझौते बाज़ार के अवसर उत्‍पन्‍न कर रहे हैं, ऐसे में अब ध्यान कच्चे कृषि उत्पादों के निर्यात से हटकर उच्च मूल्य वाले प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात की ओर केंद्रित होना चाहिए।

वैश्विक उपभोक्ता अब ऐसे खाद्य पदार्थों की अधिक मांग कर रहे हैं जो सुरक्षित, पौष्टिक, ट्रेस करने योग्य और सतत रूप से उत्पादित हों। इससे गुणवत्ता, मानकों और नवाचार का महत्व और बढ़ जाता है—ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें भारत अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है।

इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने के लिए तकनीक, गुणवत्ता अवसंरचना, ट्रेसबिलिटी प्रणालियों और ब्रांडिंग में और अधिक निवेश करना आवश्यक होगा। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण उत्पादकों और उद्यमों को मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी उपस्थिति मजबूत करने में सक्षम बनाएगा।

स्थिरता को केंद्र में रखते हुए 

खाद्य प्रणालियों का रूपांतरण भी स्थिर और लचीला होना चाहिए।

खाद्य हानि को कम करना भूमि, जल और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव घटाने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है। साथ ही, अपशिष्ट मूल्यवर्धन- अर्थात कृषि उप-उत्पादों को नए उत्पादों में बदलने की दिशा में रहे नवाचार भी नए आर्थिक अवसरों को जन्‍म दे रहे हैं और पर्यावरणीय प्रभाव को भी कम कर रहे हैं।

सतत खाद्य प्रसंस्करण इकोसिस्‍टम सभी आयामों में मूल्य प्रदान करता है: बेहतर पोषण परिणामों में सहायता करता है, पर्यावरणीय पदचिह्नों को घटाता है और मूल्य श्रृंखला में आय तथा रोजगार के अवसर बढ़ाता है।

दक्षिण एशिया के नेतृत्व के लिए एक अवसर

इस क्षण की विशेषता यह है कि यह केवल किसी एक देश के बारे में नहीं है—बल्कि पूरे क्षेत्र के साथ मिलकर आगे बढ़ने का अवसर है।

दक्षिण एशियाई देश साझा चुनौतियों: खंडित आपूर्ति श्रृंखलाओं, सीमित प्रसंस्करण क्षमता और कटाई के बाद होने वाली उच्च स्तर की खाद्य हानि- का सामना कर रहे हैं, लेकिन ये साझा बाधाएँ साझा समाधानों के अवसर भी उत्‍पन्‍न करती हैं।

साउथ एशियन पॉलिसी लीडरशिप फॉर इम्प्रूव्ड न्यूट्रिशन एंड ग्रोथ (एसएपीएलआईएनजी) जैसे क्षेत्रीय मंच इस परिवर्तन को गति देने में मदद कर रहे हैं—सहयोग, ज्ञान के आदान-प्रदान और निवेश का ऐसा स्थान तैयार कर रहे हैं, जिसे कोई भी देश अकेले हासिल नहीं कर सकता। अनलॉकिंग वैल्यू डायलॉग इसी प्रतिबद्धता का प्रत्यक्ष उदाहरण है: यह पूरे क्षेत्र के नीति-निर्माताओं, नवाचारकर्ताओं, उद्योग जगत के दिग्‍गजों और विकास साझेदारों को एक साथ लाकर ऐसे संबंध स्थापित करता है, ज्ञान साझा करता है और साझेदारियाँ बनाता है, जो बेहतर रोजगार और अधिक मजबूत खाद्य प्रणालियों में परिवर्तित हो सकें।

उत्पादन और नीतिगत नवाचार दोनों में अग्रणी होने के नाते भारत को इस क्षेत्रीय परिवर्तन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।

नीतियों से क्रियान्वयन की ओर 

हमारे सामने विकल्प स्पष्ट है।

हम या तो आपूर्ति श्रृंखला के हर चरण में मूल्य की हानि जारी रख सकते हैं, या फिर ऐसी आधुनिक और एकीकृत मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण कर सकते हैं, जो हर स्तर पर मूल्य का सृजन करें और उसे बनाए रखें।

हम कच्चे कृषि उत्पादों के निर्यातक बने रह सकते हैं, या फिर उच्च मूल्य वाले, टिकाऊ खाद्य उत्पादों में अग्रणी बन सकते हैं।

इस परिवर्तन का मार्ग खाद्य प्रसंस्करण से होकर गुजरता है।

खेतों से लेकर उद्यमों तक, और स्थानीय बाज़ारों से वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं तक—खाद्य प्रणालियों का यह रूपांतरण इस क्षेत्र के आर्थिक भविष्य को परिभाषित करेगा। नीति, निवेश और साझेदारी के सही संयोजन के साथ, दक्षिण एशिया खाद्य हानि से खाद्य नेतृत्व की ओर बढ़ सकता है।इसी भावना के साथ, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय अगले एसएपीएलआईएनजी उच्च-स्तरीय नीतिगत संवाद की मेज़बानी करने के लिए उत्सुक है, जो विश्व बैंक समूह सहित सरकारों, व्यवसायों और विकास साझेदारों को एक साथ लाया जाएगा,  ताकि ऐसे समाधानों को आगे बढ़ाया जा सके, जो रोजगार सृजित करें, निवेश को बढ़ावा दें और पूरे दक्षिण एशिया में अधिक मजबूत खाद्य प्रणालियाँ विकसित करें।

ग्रेट निकोबार: भारत की समुद्री रणनीति का प्रमुख केंद्र : एडमिरल डी. के. जोशी

“जो राज्य अपनी सीमाओं, साझेदारियों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।”

– कौटिल्य

कौटिल्य की यह सीख सदियों पहले ही शासन और रणनीति की मूल सोच का हिस्सा बन चुकी थी, और आज के समय में यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक होकर सामने आई है। आज देशों की परीक्षा केवल उनकी अर्थव्यवस्था के आकार या सैन्य ताकत से नहीं हो रही, बल्कि इस बात से हो रही है कि वे भूगोल को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, भविष्य का कितना सही अनुमान लगाते हैं और अवसर के खतरे में बदलने से पहले कितनी तेजी से निर्णय लेते हैं। ग्रेट निकोबार भारत के लिए ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा है।

यह भारतीय मानचित्र के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित एक दूरस्थ द्वीप जैसा प्रतीत होता है। ऐसी जगह जिसे दशकों से लगभग अछूता छोड़ दिया गया है और जिसे वैसे ही रहने देना चाहिए। परंतु ग्रेट निकोबार भारत की अग्रिम समुद्री चौकी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के समीप स्थित यह द्वीप दुनिया की ओर भारत की सबसे अहम सामरिक अवसर में से एक है। 

अत: ग्रेट निकोबार के प्रस्तावित विकास को केवल एक अवसंरचना परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह केवल एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप या बिजली संयंत्र बनाने का प्रश्‍न नहीं है। यह वास्तव में इस बात की सामरिक परीक्षा है कि क्या भारत अपनी इस दुर्लभ भौगोलिक बढ़त को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने के लिए तैयार है।

सदियों से हिंद महासागर ने भारत की नियति को आकार दिया है। इसी समुद्री क्षेत्र ने हमारे व्यापार, हमारे विचारों और हमारे  सभ्यतागत प्रभाव को विश्‍व भर में पहुंचाया, परन्‍तु कई बार यही हमारी कमजोरियों का कारण भी बना। तथापि, स्वतंत्रता के पश्‍चात् लंबे समय तक भारत की सामरिक सोच मुख्य रूप से स्‍थल-आधारित रही।

यह निर्विवाद है कि ग्रेट निकोबार अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थान है। यह अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किलोमीटर है, जो सम्‍पूर्ण द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग 2 प्रतिशत है। इसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को परियोजना के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है, जो द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 प्रतिशत है।

यह दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित है तथा मलक्का स्‍ट्रेट, 60 चैनल, सुंडा स्‍ट्रेट और लोम्बोक स्‍ट्रेट जैसे प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों के समीप आता है। वास्तविक सामरिक दृष्टि से देखें तो यह भारत की पूर्वी समुद्री चौकी है।

इसका महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे केवल भूभाग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि महासागरीय रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए। कल्पना कीजिए उन जहाजों की, जो अदन की खाड़ी से मलक्का स्‍ट्रेट की ओर बढ़ रहे हैं, ऊर्जा से भरे मालवाहक जहाज, जो पश्चिम एशिया और अफ्रीका से पूर्वी एशिया की ओर जा रहे हैं, एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला कंटेनर यातायात तथा नौसैनिक संसाधन, निगरानी मंच और लॉजिस्टिक श्रृंखलाएँ, जो इन जलमार्गों से होकर गुजर रही हैं।

हिंद महासागर अब शांत समुद्र नहीं रहा। यह तेजी से एक भीड़भाड़ वाले सामरिक क्षेत्र में बदल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, कंटेनर यातायात, नौसैनिक तैनाती, द्वीपीय सुविधाएं, समुद्र के नीचे बिछी केबलें और समुद्री निगरानी अब एक बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुकी हैं। यह शायद मुख्य भूमि पर बैठे कई लोगों को दिखाई न दे, परन्‍तु देशों के भविष्य के लिए यह बेहद निर्णायक है।

हाल की एक महत्वपूर्ण प्रगति यह है कि अंडमान सागर को थाईलैंड की खाड़ी से जोड़ने वाली दशकों पुरानी कैनल परियोजना को स्थगित कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब लगभग 90 किलोमीटर लंबे मल्टी-मोडल लैंड ब्रिज की योजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। यह परियोजना टेंथ पैरेलल के साथ दो नव-डिज़ाइन किए गए गहरे समुद्री बंदरगाहों को जोड़ेगी — एक अंडमान सागर के किनारे रणोंग में और दूसरा थाईलैंड की खाड़ी के किनारे चुम्फोन में। इसके साथ दोहरी ट्रैक्‍स वाली उच्च गति रेल, बहु-लेन सड़क, तेल एवं गैस के लिए ऊर्जा पाइपलाइनें तथा वायु एवं डिजिटल ग्रिड भी प्रस्तावित हैं। ये सभी कारक मिलकर इंडो-पैसिफिक व्यापार मार्गों को पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और आर्थिक शक्ति का केंद्र सीधे अंडमान बेसिन की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।

मलक्का स्‍ट्रेट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक चोकपॉइंट्स में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और अत्यंत मूल्यवान ऊर्जा संसाधनों (तेल और एलएनजी) तथा वैश्विक व्यापार का प्रमुख मार्ग है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी 60 चैनल से लगभग 45 किलोमीटर दूर है, जो मलक्का स्‍ट्रेट को अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों से जोड़ती है। अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख जहाज मलक्का स्‍ट्रेट 60 चैनल मार्ग से गुजरते हैं।

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे सामरिक चोकपॉइंट्स के निकट स्थित होने के कारण यह द्वीप भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है। कोई भी गंभीर सामुद्रिक शक्ति ऐसे भौगोलिक तथ्यों की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती। 

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अनेक शक्तिशाली देश बंदरगाहों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं, समुद्री पहुँच सुविधाओं, नौसैनिक संसाधनों, निगरानी प्रणालियों और आर्थिक गलियारों के माध्यम से निरंतर अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहे हैं।

भारत का उत्तर संकोचपूर्ण नहीं हो सकता। उसका उत्तर सामरिक सुदृढ़ीकरण होना चाहिए। संप्रभुता केवल मानचित्र पर सीमाएँ खींच देने से सुदृढ़ नहीं होती। वह तब सशक्त होती है जब कोई भूभाग जुड़ा हुआ, आबाद, सुविधायुक्त, उत्पादक और सामरिक रूप से उपयोगी बनता है। अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, टाउनशिप और विद्युत संयंत्र अलग-अलग परियोजनाएँ नहीं हैं। ये सभी मिलकर उस पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का निर्माण करते हैं, जिसकी सहायता से भारत एक निर्णायक सामुद्रिक स्थान पर विश्वसनीय, सतत और बहुआयामी उपस्थिति बनाए रख सकता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समुचित जांच-पड़ताल और आपत्तियों के निस्तारण के बाद यह स्वीकार किया कि यह परियोजना केवल द्वीप और उसके आसपास के सामरिक क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सिंगापुर केवल इसलिए एक महान सामुद्रिक केंद्र नहीं बना क्योंकि उसका भौगोलिक स्थान अनुकूल था। उसने उस स्थान के आस-पास आवश्यक क्षमताओं का निर्माण किया। भौगोलिक स्थिति ने उसे अवसर दिया, और उसके अवसंरचनात्मक विकास ने उस अवसर को प्रभाव में परिवर्तित किया। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कोई दूरस्थ द्वीप भी, यदि उसे लॉजिस्टिक और परिचालन अवसंरचना से सुसज्जित किया जाए, तो असाधारण सामरिक महत्व प्राप्त कर सकता है। सामुद्रिक शक्ति केवल भूगोल से नहीं बनती; वह भूगोल का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता विकसित करने से निर्मित होती है।

ग्रेट निकोबार भारत को यह सब एक संतुलित और विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण के साथ करने का अवसर प्रदान करता है। यह व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है, विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम कर सकता है, साथ ही भारत की सामुद्रिक पहुँच को विस्तारित कर सकता है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार और व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक सामरिक मंच के रूप में कार्य कर सकता है। ग्रेट निकोबार में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के उस सामग्री पर निर्भरता को कम कर सकता है जिसे वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिप किया जाता है। इससे सप्लाई चेन सुदृढ होगी, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और भारत को अपने सामग्री की आवाजाही पर अधिक नियंत्रण और निश्चितता प्राप्त होगी।

निस्संदेह, ग्रेट निकोबार पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस स्तर की किसी भी परियोजना को पारिस्थितिक सावधानी, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक निगरानी और वास्तविक शमन उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए। विकास लापरवाह नहीं हो सकता। लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सामरिक चिंतन पर स्थायी वीटो का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। वास्तविक चुनौती पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच चयन करने की नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ाया जाए।

वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सामरिक द्वीप का उत्तरदायित्‍व पूर्वक विकास करना चाहता है, अथवा फिर ऐसे समय में जब पूरा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पुनर्गठित हो रहा है, वह इस द्वीप को अविकसित और अपर्याप्त रूप से जुड़ा हुआ छोड़ देगा।

भारत एक कॉन्टिनेंटल और सामुद्रिक — दोनों प्रकार की शक्ति है। लंबे समय तक स्थलीय सोच ने सामुद्रिक दृष्टिकोण पर हावी रहा है। अत: ग्रेट निकोबार परियोजना कोई विलासिता नहीं, बल्कि सामरिक दूरदृष्टि का प्रतीक है। किसी राष्ट्र की नियति केवल उन खतरों से निर्धारित नहीं होती जिनका वह सामना करता है, बल्कि उन अवसरों से भी तय होती है जिन्हें वह समय रहते पहचान लेता है। ग्रेट निकोबार ऐसा ही एक अवसर है। इसकी उपेक्षा करना भूगोल की उस सामरिक शक्ति को अनुपयोगी छोड़ देना होगा, जिसे बाद में अन्य शक्तियाँ अपने अनुसार आकार दे सकती हैं। वहीं, इसका विवेकपूर्ण विकास भूगोल को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

भारत को सामरिक दृष्टि से सोचने के लिए किसी से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल  उत्तरदायित्‍व पूर्वक, निर्णायक रूप से और स्पष्ट राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है। इंडो-पैसिफिक की इस शताब्दी में, ग्रेट निकोबार भारत का अंतिम छोर नहीं है, यह भविष्य के प्रवेश द्वार पर स्थित भारत का वॉचटावर है।

(लेखक वर्तमान में अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल तथा द्वीप विकास एजेंसी के उपाध्यक्ष हैं। वे भारतीय नौसेना के पूर्व नौसेना प्रमुख (Chief of the Naval Staff) रह चुके हैं और वर्ष 2009-10 के दौरान अंडमान तथा निकोबार कमान (A&N Command) के कमांडर-इन-चीफ भी रहे हैं।)

पीएम स्वनिधि योजना: स्ट्रीट वेंडर्स के एम्पावरमेंट और फाइनेंशियल इनक्लूजन के लिए एक ट्रांसफॉर्मेटिव टूलम

मनोहर लाल / विद्युत मंत्री

भारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2050 तक देश की लगभग 50% आबादी शहरी इलाकों में रहेगी। अभी, लगभग 66% शहरी वर्कफ़ोर्स इनफ़ॉर्मल सेक्टर में शामिल है, जो शहरी अर्थव्यवस्था का एक अहम पिलर है। इस इनफ़ॉर्मल सेक्टर में स्ट्रीट वेंडर्स की भूमिका खास तौर पर खास है। ये लाखों वेंडर्स जो फल, सब्ज़ी, चाय, नाश्ता, कपड़े और रोज़ाना की दूसरी ज़रूरतें देते हैं, न सिर्फ़ करोड़ों नागरिकों की ज़िंदगी आसान बनाते हैं, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत करते हैं। इसके बावजूद, फ़ॉर्मल बैंकिंग और क्रेडिट तक उनकी पहुँच लंबे समय तक सीमित रही। क्रेडिट हिस्ट्री न होने की वजह से, उन्हें अक्सर ज़्यादा ब्याज़ दरों पर इनफ़ॉर्मल लोन लेना पड़ता था, जिससे उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लोन चुकाने में खर्च हो जाता था।

भारतीय स्ट्रीट वेंडर्स बदलते ग्लोबल हालात और अलग-अलग आर्थिक रुकावटों के बीच भी अपनी हिम्मत और मज़बूती के लिए जाने जाते हैं। PM SWANIDHI ने इस एंटरप्रेन्योरशिप की भावना को नई एनर्जी दी है। यह सिर्फ़ क्रेडिट देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सम्मान, पहचान और नए मौकों का एक मज़बूत ज़रिया बन गया है।

इस स्कीम की सफलता का मुख्य आधार “होल ऑफ़ गवर्नमेंट अप्रोच” रहा है, जिसमें केंद्र, राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों और बैंकिंग संस्थानों के मिलकर किए गए प्रयासों ने इसे पूरे देश में अभूतपूर्व तरीके से आगे बढ़ाया है और शानदार नतीजे हासिल किए हैं।

इस स्कीम के तहत, लाखों वेंडर्स के बैंक अकाउंट एक्टिवेट किए गए, उनके फाइनेंशियल व्यवहार को रिकॉर्ड किया जाने लगा और पहली बार, उनके लिए एक फॉर्मल क्रेडिट हिस्ट्री बनाई गई। इससे उन्हें भविष्य में ज़्यादा लोन और फाइनेंशियल सर्विस मिलना आसान हो गया है और वे आज बैंक के सम्मानित ग्राहक और उद्यमी बनकर उभरे हैं।

इस स्कीम का एक और ज़रूरी पहलू डिजिटल एम्पावरमेंट है। UPI और QR-कोड आधारित पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कैशबैक इंसेंटिव दिए गए हैं। इस पहल ने अब तक 55 लाख वेंडर्स को डिजिटल इकॉनमी से जोड़ा है, उनके लेन-देन को ट्रांसपेरेंट बनाया है और उनकी फाइनेंशियल क्रेडिबिलिटी को मज़बूत किया है। स्कीम का विज़न सिर्फ़ बिज़नेस तक ही सीमित नहीं रहा है। ‘स्वनिधि से समृद्धि’ पहल के ज़रिए, बेनिफिशियरीज़ और उनके परिवारों को भारत सरकार की आठ बड़ी वेलफेयर स्कीम्स से जोड़ा गया है। अब तक इन स्कीम के तहत 50 लाख से ज़्यादा स्ट्रीट वेंडर्स की प्रोफाइलिंग की जा चुकी है और 1.52 करोड़ से ज़्यादा लोगों को फ़ायदे दिए जा चुके हैं। पेंशन, इंश्योरेंस, हेल्थ सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी जैसी सुविधाओं तक पहुँच देकर, यह पहल स्ट्रीट वेंडर्स और उनके परिवारों के लिए एक बड़े सोशल सिक्योरिटी सिस्टम का ज़रिया बन गई है। इसके अलावा, FSSAI के साथ मिलकर फ़ूड सेफ्टी और हाइजीन पर ट्रेनिंग भी दी गई है, जिससे खास तौर पर स्ट्रीट फ़ूड वेंडर्स की क्वालिटी, हाइजीन और कस्टमर का भरोसा बढ़ा है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी इस स्कीम का योगदान काफ़ी सराहनीय रहा है। कुल बेनिफिशियरीज़ में से लगभग 46% महिलाएँ हैं। इससे उनकी इनकम, सामाजिक इज़्ज़त और परिवार के फ़ैसलों में हिस्सेदारी बढ़ी है। साल 2023 और 2025 में किए गए इंडिपेंडेंट इम्पैक्ट असेसमेंट ने भी इस स्कीम के दूरगामी असर की पुष्टि की है। लगभग 95% बेनिफिशियरीज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार फ़ॉर्मल फ़ाइनेंशियल सिस्टम से लोन लिया है, जो फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इतना ही नहीं, लगभग 30% बेनिफिशियरी PM SWANIDHI से आगे बढ़कर दूसरे फॉर्मल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से लोन भी ले पाए हैं, जो उनके बढ़ते फाइनेंशियल कॉन्फिडेंस और मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल का सबूत है। इस स्कीम के बेनिफिशियरी की इनकम में सालाना लगभग 20% की एवरेज ग्रोथ दर्ज की गई है। इसके साथ ही, हाउसिंग, न्यूट्रिशन, हेल्थकेयर और बच्चों की एजुकेशन जैसे एरिया में भी सुधार देखा गया है। 2023 और 2025 के बीच UPI बेस्ड ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल लगभग 45% से बढ़कर 83% हो गया है। स्कीम के बड़े पैमाने पर और पॉजिटिव असर को देखते हुए, अगस्त 2025 में, केंद्रीय मंत्रालय ने इसके रीस्ट्रक्चर्ड फॉर्म को मार्च 2030 तक बढ़ाने की मंजूरी दी। रीस्ट्रक्चर्ड स्कीम के तहत, स्ट्रीट वेंडर्स की क्रेडिट लिमिट बढ़ा दी गई है और स्कीम का दायरा अर्बन लोकल बॉडीज से आगे बढ़ाकर सेंसस टाउन्स/पेरी अर्बन तक कर दिया गया है। इसके साथ ही, कैपेसिटी बिल्डिंग पर खास जोर दिया जा रहा है ताकि स्ट्रीट वेंडर्स बदलती इकोनॉमिक जरूरतों के हिसाब से अपने बिजनेस को और मजबूत कर सकें। SWANIDHI क्रेडिट कार्ड की शुरुआत भी इसी कड़ी में एक अहम कदम है। यह सुविधा स्ट्रीट वेंडर्स को उनकी तुरंत की फाइनेंशियल और पर्सनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शॉर्ट-टर्म बिना ब्याज का क्रेडिट देती है। हालांकि PM SWANIDHI योजना ने स्ट्रीट वेंडर्स को फाइनेंशियल ताकत दी है, लेकिन आज कई जगहों पर उन्हें शहर की प्लानिंग के स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं माना जाता है। उन्हें प्लान्ड वेंडिंग जगहों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कोई तय जगह न होने की वजह से उनकी रोजी-रोटी और ग्राहकों तक पहुंच पर असर पड़ता है। इस चुनौती से निपटने के लिए, आने वाले सालों में राज्य सरकारों और शहरी लोकल बॉडीज़ को स्ट्रीट वेंडर्स को शहरी प्लानिंग के फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस दिशा में एक छोटी सी पहल – स्ट्रीट फूड हब के ज़रिए, उन्हें सुविधाजनक और ऑर्गनाइज़्ड कमर्शियल जगहें उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे