ब्रेकिंग न्यूज़
गंतव्य स्थल से आगे का पर्यटन: भारत की अगली बड़ी छलांग साझेदारी पर क्यों आधारित होनी चाहिए

गजेंद्र सिंह शेखावत          

भारत में गंतव्य स्थलों की कभी कोई कमी नहीं रही है। कमी अगर रही है, तो बस उस संस्थागत परिकल्पना की, जिसके जरिये दुनिया इन स्थलों को जानने में सक्षम हो सके, वहाँ पहुँच सके, उन्हें अनुभव कर सके और सबसे ज़रूरी बात—वहाँ बार-बार जा सके।

हमारी सांस्कृतिक विरासत बेमिसाल है: यहाँ सब कुछ है – प्राचीन शहर और जीवंत परंपराएँ, पवित्र परिदृश्य और वन्यजीव, वास्तुकला और शिल्प, खान-पान और त्योहार, पहाड़ और समुद्र तट, आदि। लेकिन सिर्फ़ विरासत से ही पर्यटन नहीं बनता। कोई स्मारक अपने-आप में गंतव्य स्थल नहीं होता; एक गंतव्य स्थल असल में एक पूरा इकोसिस्टम होता है। इसमें शामिल हैं—वहाँ तक ले जाने वाली सड़क, यात्रा से जुड़ी कहानी, यात्रियों का स्वागत करने वाला आतिथ्य, उसे असली पहचान देने वाले कारीगर, उसे खोजने में मदद करने वाली तकनीक और वह समुदाय जिसकी भागीदारी यह तय करती है कि पर्यटन एक आर्थिक अवसर बनेगा या बस एक अनुचित प्रवेश रह जाएगा।

इसीलिए भारतीय पर्यटन के अगले अध्याय को सिर्फ़ पर्यटन स्थलों के नज़रिए से नहीं, बल्कि साझेदारी के नज़रिए से भी तय किया जाना चाहिए।

पर्यटन का पुरानी संरचना काफ़ी हद तक ऊपर से नीचे की ओर श्रेणीबद्ध थी। सरकारें अवसंरचना बनाती थीं, गंतव्य स्थलों को बढ़ावा दिया जाता था, उद्योग जगत पर्यटकों के आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था करता था और समुदाय काफ़ी हद तक हाशिए पर रहते थे। नयी संरचना सबकी बराबर भागीदारी वाली होनी चाहिए। सरकार, उद्योग जगत, प्रौद्योगिकी कंपनियां, रचनाकार, निवेशक, राज्य, स्थानीय निकाय और समुदायों को मिलकर पर्यटन के अनुभव का निर्माण करना चाहिए।

यह फ़र्क सिर्फ़ शब्दों का नहीं है। यह विकास को समझने के हमारे नज़रिए में एक बुनियादी बदलाव को दिखाता है।

आज पर्यटन का मतलब सिर्फ़ लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं है। यह विचारों, कहानियों, उम्मीदों, पूंजी और सांस्कृतिक प्रभाव का आवागमन है। यात्री अब सिर्फ़ भारत को देखना नहीं चाहते, बल्कि उसे अनुभव करना चाहते हैं — लोग खान-पान का स्वाद लेना, परंपराओं को समझना, घरों में जाना, कारीगरों से मिलना और यहाँ की जीवंत संस्कृति में, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही, भाग लेना चाहते हैं।

यह बदलाव भारत के लिए एक शानदार अवसर लेकर आया है।

लेकिन बिना तालमेल के अवसर का लाभ शायद ही मिल पाता है।

इसलिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, भले ही यह बदलती रहती हो। इसकी ज़िम्मेदारी सब कुछ खुद करने की नहीं है; बल्कि ज़्यादा चीज़ों को संभव बनाने की है। सड़कों, हवाईअड्डों, रेलवे, स्वच्छता, डिजिटल अवसंरचना, विरासत संरक्षण और नागरिक सुविधाओं में सरकारी निवेश वह आधार तैयार करता है, जिस पर निजी क्षेत्र नवाचार और निवेश कर सकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति निरंतरता और दिशा देती है। उद्योग जगत पूंजी, प्रबंधन विशेषज्ञता, तकनीक और बाज़ार तक पहुंच में योगदान देता है। समुदाय वह चीज़ देते हैं, जिसे कोई सरकार या निगम नहीं बना सकता: प्रामाणिकता।

असली चुनौती इन क्षमताओं को एक साथ लाने की है।

उद्योग जगत के साथ पर्यटन मंत्रालय का बढ़ता जुड़ाव इसी दिशा में एक प्रयास है। ग्यारह रणनीतिक समझौता ज्ञापनों को अंतिम रूप दिया गया है, जिनमें से पांच का विश्व पर्यटन दिवस 2026 को आदान-प्रदान हुआ है। उनका महत्व केवल दस्तावेजों को लेकर नहीं है, बल्कि उन क्षमताओं में है, जिन्हें वे जोड़ना चाहते हैं – प्रौद्योगिकी, आवागमन, आतिथ्य, कंटेंट, डिजिटल आउटरीच और स्थानीय उद्यम।

गंतव्य स्थल की खोज करने के बदलते अर्थशास्त्र पर विचार करें।

एक पीढ़ी पहले, किसी यात्री को यात्रा गाइड या विज्ञापन के माध्यम से भारत की जानकारी मिलती होगी। आज, एक गंतव्य स्थल एक फिल्म, एक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, एक रचनाकार की कहानी या मोबाइल फोन में सामने आई एक छवि के माध्यम से वैश्विक परिकल्पना में प्रवेश कर सकता है।

नेटफ्लिक्स के साथ सहयोग गंतव्य प्रचार की इस नई व्यवस्था को प्रदर्शित करता है, जो भारत की संस्कृति, वन्य जीवन और पहाड़ी परिदृश्यों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने दिखाती है। आईटीबी बर्लिन 2026 में प्रदर्शित भारत के स्वाद और लंदन व न्यूयॉर्क में प्रचार अभियान यह दर्शाते हैं कि कैसे पर्यटन का भूगोल; कहानी कहने के भूगोल से पहले ही महत्वपूर्ण हो जाता है।

लेकिन कहानी सुनाने से अंततः यात्रा करने का कारण अवश्य मिलना चाहिए।

यहीं पर अगली पीढ़ी की साझेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है। मास्टरकार्ड के साथ विकसित परियोजना वाराणसी बहुमूल्य, विज्ञापन से परे एक ऐसे अनुभव की ओर बढ़ता है, जिसे वास्तव में खोजा और आरक्षित किया जा सकता है: सूर्योदय के समय गंगा, शास्त्रीय संगीत, साहित्य पर बातचीत, बनारसी बुनकर समुदाय और विरासत स्थल। इस तरह की पहल का महत्व यह है कि वाराणसी को फोटो खिंचवाने वाले स्मारक के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव की जाने वाली सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इस अंतर की जानकारी हमारी संपूर्ण पर्यटन रणनीति को दी जानी चाहिए।

भारत को आकर्षण बेचने के बदले अनुभव संग्रहित करने की ओर बढ़ना चाहिए।

हवाई संपर्क भी इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एलायंस एयर, एयर इंडिया और इंडिगो के साथ साझेदारी अतुल्य भारत को यात्री इकोसिस्टम में विस्तार देती है, जिससे उड़ानों, डिजिटल प्लेटफार्मों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गंतव्य को बढ़ावा मिलता है।

प्रौद्योगिकी एक और आयाम जोड़ती है: बुद्धिमत्ता।

भविष्य की पर्यटन प्रणाली को तेजी से समझना होगा कि कौन यात्रा कर रहा है, यात्री क्या चाहते हैं, मांग कहां उभर रही है और प्राथमिकताएं कैसे बदल रही हैं। गूगल इंडिया के साथ सहयोग, जिसमें क्षमता निर्माण और वैश्विक यात्रा मांग व यात्री व्यवहार को समझने से जुड़े कार्य शामिल है, एक पर्यटन नीति की ओर इशारा करता है, जो उत्तरोत्तर अधिक साक्ष्य-आधारित बन सकती है।

फिर भी सबसे परिणामी परिवर्तन पारंपरिक पर्यटन केंद्रों से बहुत दूर हो सकता है।

यदि पर्यटन को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो गाँव को पर्यटन नीति के लिए उतना ही महत्वपूर्ण बनाना होगा जितना कि महानगरीय प्रवेश द्वार। होमस्टे, होटल जैसा ही महत्वपूर्ण हो सकता है। कारीगर उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना आकर्षण। स्थानीय उद्यमी बड़े संचालकों के समान ही महत्वपूर्ण बन सकते हैं।

एयरबीएनबी, सोल ऑफ इंडिया और मेकमाईट्रिप की साझेदारियां अवसर के इसी लोकतंत्रीकरण की दिशा में प्रयास कर रही हैं – होमस्टे मेजबानों को डिजिटल क्षमताओं से लैस करना, कम-ज्ञात गंतव्यों को अधिक दृश्यता देना, अनजान गांवों को रचनाकारों और आरक्षण योग्य रहने की जगहों से जोड़ना। इसके पीछे एक गहरी सोच है: जब कोई स्थल किसी यात्री की कल्पना में बसता है, तो उससे पैदा होने वाले आर्थिक मौके उन लोगों की ज़िंदगी में भी आने चाहिए, जो उस स्थल को पहचान देते हैं।

यही पर्यटन से होने वाले विकास की असली कसौटी है।

सिर्फ़ आने वाले पर्यटकों की संख्या ही सफलता का पैमाना नहीं हो सकती। हमें एक और ज़रूरी सवाल पूछना चाहिए: जब कोई स्थल सफल होता है, तो फ़ायदा किसे होता है?

क्या कारीगर ज़्यादा कमाता है? क्या युवा को स्थानीय स्तर पर कोई अवसर मिलता है? क्या महिला उद्यमी को बाज़ार मिलता है? क्या समुदाय को अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को बचाने का प्रोत्साहन मिलता है? क्या यात्री सिर्फ़ एक फ़ोटो लेकर नहीं, बल्कि गहरी समझ लेकर वापस जाता है?

अगर इन सवालों का जवाब ‘हाँ’ में है, तो पर्यटन सिर्फ़ एक उद्योग नहीं रह जाता। यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सबके लिए आर्थिक विकास का ज़रिया बन जाता है।

इस मामले में भारत की कम जानी-पहचानी जगहें एक बहुत बड़ा मौका देती हैं। तकनीक उन्हें युवा दर्शकों तक पहुँचा सकती है; आवाजाही की सुविधा से वहाँ पहुंचना आसान हो सकता है; निजी निवेश उचित अवसंरचना बना सकता है; और समुदाय की भागीदारी यह सुनिश्चित कर सकती है कि विकास पहचान की कीमत पर न होता हो। हिमालय में समुदाय के नेतृत्व वाले विरासत पर्यटन को बढ़ावा देने वाली पहल – जिसमें मौखिक परंपराओं, शिल्प और स्थानीय ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण शामिल है – यह दिखाती हैं कि पर्यटन कैसे संरक्षण का दुश्मन नहीं, बल्कि साथी बन सकता है।

लेकिन साझेदारी का मतलब सिर्फ़ समझौते पर दस्तख़त करने वाली सरकारी शब्दावली नहीं होनी चाहिए।

समझौता ज्ञापन तो बस एक शुरुआत है। असली साझेदारी तब शुरू होती है जब समझौते से कोई उत्पाद बनता है, जब किसी अभियान से यात्री आते हैं, जब यात्री से स्थानीय आय होती है और जब उस आय से उस जगह पर समुदाय का मालिकाना हक़ और मज़बूत होता है।

इसलिए उद्योग संघ और पर्यटन व्यापार बहुत ज़रूरी हैं। बाज़ार, यात्रियों, यात्रा-कार्यक्रमों और वितरण के बारे में उनकी जानकारी आकांक्षाओं को वास्तविक यात्राओं में बदल सकती है। वहीं, राज्य और स्थानीय संस्थाएँ ज़मीनी स्तर पर अनुभव की गुणवत्ता तय करती हैं।

भारतीय पर्यटन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम सरकार और उद्योग जगत, केंद्र और राज्यों, तकनीक और परंपरा, वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म और स्थानीय समुदायों के बीच की पुरानी संस्थागत सीमाओं को कितना खत्म कर पाते हैं।

वाराणसी इस संभावना की एक झलक दिखाती है: कहानी सुनाना, संगीत, विरासत, बुनाई, आतिथ्य और तकनीक – ये सब एक ही जगह पर संयोजित हो रहे हैं।

इससे मिलने वाला बड़ा सबक स्पष्ट है। 

भारत को सिर्फ़ और पर्यटकों की ज़रूरत नहीं है। इसे एक मज़बूत पर्यटन समाज की ज़रूरत है।

एक ऐसा समाज, जहाँ नागरिक पर्यटन को किसी अन्य का उद्योग नहीं, बल्कि एक ऐसा मौका मानते हैं जिसमें उनकी भी हिस्सेदारी है। एक ऐसा समाज, जहाँ सरकारी निवेश से आधार बनता है, निजी निवेश संभावनाओं को कई गुना बढ़ाता है और समुदाय की भागीदारी से विकास को मान्यता मिलती है।

इसलिए, भविष्य का पर्यटन स्थल केवल नक्शे पर चिह्नित कोई जगह नहीं होगी। यह रिश्तों का एक नेटवर्क होगा।

और भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त शायद सिर्फ़ इस बात में नहीं है कि हमारे पास क्या भव्य स्थल हैं, बल्कि इस क्षमता में है कि हम उन अनेक लोगों और संस्थाओं को एक साथ ला सकें, जो हमारी विरासत को दुनिया के लिए एक मूल्यवान अनुभव में बदल सकें।

अब हमारे सामने यह सवाल नहीं है कि क्या भारत के पास यात्रियों को देने के लिए पर्याप्त चीज़ें हैं।

निश्चित रूप से हैं।

सवाल यह है कि क्या हम ऐसी साझेदारियाँ बना सकते हैं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत की हर यात्रा उसकी सभ्यता की यात्रा बन जाए — और उस यात्रा से होने वाली समृद्धि उन लोगों तक पहुँचे जो उस सभ्यता को जीवित रखे हुए हैं।    

………………………….. 

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री हैं)

सफ़ेद सोना, नई सुबह: कॉटन की विरासत से लेकर धागे के मॉडर्न दौर में आगे रहने तक का भारत का सफ़र

गिरिराज सिंह

हर साल 7 अक्टूबर को मनाया जाने वाला ‘वर्ल्ड कॉटन डे’ हमें याद दिलाता है कि किसी देश के भविष्य के सबसे मज़बूत धागे उसके अतीत की मज़बूती से बुने जाते हैं। हज़ारों सालों से, भारत में कॉटन काता और बुना जाता रहा है, जिससे इतने शानदार कपड़े बनते हैं कि भारतीय मलमल को “हवा से बुना कपड़ा” कहा जाने लगा है। इसलिए, भारत के लिए कॉटन कभी भी सिर्फ़ एक कमोडिटी नहीं रहा। यह हमारी सभ्यता, हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे देश के विकास के सफ़र का एक अहम हिस्सा रहा है।

आज, यह विरासत और भी मज़बूत है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कॉटन प्रोड्यूसर है और एरिया के हिसाब से सबसे बड़ा कॉटन उगाने वाला देश है। भारत में लगभग 115.25 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर कॉटन की खेती होती है, जो दुनिया के कुल कॉटन एरिया का एक-तिहाई से भी ज़्यादा है। भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहाँ चार तरह के कॉटन की कमर्शियल खेती होती है। लगभग 6 मिलियन किसान सीधे तौर पर इस फ़सल पर डिपेंडेंट हैं, जबकि लाखों और लोग पिकिंग, स्पिनिंग, वीविंग और टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग के ज़रिए इससे जुड़े हुए हैं।

कॉटन भारत का सफ़ेद सोना है, रोज़ी-रोटी, इंडस्ट्रियल ताकत और गांव की खुशहाली का ज़रिया है। भारत में टेक्सटाइल इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले कुल फाइबर में कॉटन का हिस्सा लगभग 60 परसेंट है, जबकि दुनिया भर में इसका हिस्सा लगभग 30 परसेंट है। यह हमारी कॉटन-बेस्ड टेक्सटाइल इंडस्ट्री के बड़े और मज़बूत स्ट्रक्चर को दिखाता है, लेकिन यह हमें एक ज़िम्मेदारी भी देता है: हर हेक्टेयर की प्रोडक्टिविटी बढ़ाना, कॉटन की हर गांठ की क्वालिटी सुधारना और हर किसान के लिए ज़्यादा मुनाफ़ा पक्का करना।

कई सालों से, भारत के कॉटन सेक्टर को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है – कम प्रोडक्टिविटी, बारिश पर निर्भर खेती पर बहुत ज़्यादा निर्भरता, मौसम और कीड़ों का खतरा, मॉडर्न टेक्नोलॉजी तक अलग-अलग पहुँच और फाइबर की क्वालिटी को लेकर चिंताएँ। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो बदलाव आया है, वह इन चुनौतियों से निपटने की कोशिशों के पैमाने, महत्वाकांक्षा और पूरे नज़रिए में दिखता है। हम इसे बीज और किसान से लेकर कॉटन चुनने, स्पिनिंग, मैन्युफैक्चरिंग और ग्लोबल मार्केट तक, एक पूरी वैल्यू चेन के तौर पर देख रहे हैं। 5,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा के खर्च वाला ‘कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन – कॉटन रेवोल्यूशन’ इसी विज़न को दिखाता है। इसका लक्ष्य साफ़ है: 2030-31 तक कॉटन फाइबर की प्रोडक्टिविटी को 440 kg प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 755 kg प्रति हेक्टेयर करना और कुल प्रोडक्शन को 498 लाख बेल तक ले जाना। यह मिशन क्लाइमेट-फ्रेंडली और ज़्यादा पैदावार वाली किस्में, मॉडर्न खेती की तकनीकें, किसानों के लिए फील्ड डेमोंस्ट्रेशन, साइंटिफिक रिसर्च, क्वालिटी में सुधार, टेस्टिंग, पूरा प्रोडक्ट ट्रेसेबिलिटी सिस्टम और सस्टेनेबल फाइबर डेवलपमेंट को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाता है।

हमने मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) पर खरीद के लिए सेंटर्स की संख्या बढ़ाकर 571 कर दी है और खरीद को ज़्यादा ट्रांसपेरेंट और एफिशिएंट बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम को मज़बूत किया है। ‘CotBiz’ (कॉटन सीड एंड बेल बिलिंग सिस्टम) और ‘BITS’ (बैले आइडेंटिफिकेशन एंड ट्रेसिंग सिस्टम) के ज़रिए, हम पूरी कॉटन वैल्यू चेन में ज़्यादा एफिशिएंसी, ट्रांसपेरेंसी और ट्रेसेबिलिटी ला रहे हैं। इसके साथ ही, ‘कस्तूरी कॉटन भारत’ क्वालिटी, सर्टिफिकेशन और ट्रेसेबिलिटी के आधार पर इंडियन कॉटन को एक खास पहचान दे रहा है। इससे इंडियन कॉटन एक कमोडिटी तक सीमित रहने के बजाय क्वालिटी-बेस्ड, ट्रेसेबल और ग्लोबली पहचाना जाने वाला इंडियन ब्रांड बन रहा है।

लेकिन हमारे बदलाव का मुख्य पॉइंट प्रोडक्टिविटी है। भारत का लगभग 60 परसेंट कॉटन बारिश पर निर्भर इलाकों में उगाया जाता है, इसलिए खेती की क्षमता और मज़बूती बढ़ाते हुए पैदावार में सुधार करना ज़रूरी है। इसीलिए हम मॉडर्न टेक्नोलॉजी, बेहतर किस्में, HDPS (हाई डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम), खेती के बेहतर तरीके और मज़बूत एक्सटेंशन सर्विस सीधे खेतों तक ला रहे हैं। आम खेती में, किसान आमतौर पर प्रति एकड़ सिर्फ़ 5 से 7 क्विंटल कॉटन ही उगा पाते थे। HDPS के तहत, लगभग 5.5 पैकेट बीज और प्रति एकड़ 29,000 पौधों का इस्तेमाल करके पैदावार बढ़कर लगभग 12 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई है। हमारा अगला लक्ष्य अपने किसानों की सक्रिय भागीदारी से इसे 18 क्विंटल प्रति एकड़ तक ले जाना है।

लेकिन, ज़्यादा कॉटन का मतलब बेहतर क्वालिटी का कॉटन भी होना चाहिए। अभी, फाइबर रिकवरी लगभग 32 से 33 परसेंट है, इसलिए जिनिंग प्रोसेस का मॉडर्नाइज़ेशन ज़रूरी है। जिनिंग इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के साथ अपनी बातचीत में, मैंने क्वालिटी और एफिशिएंसी पर ज़ोर दिया है। मॉडर्न मशीनरी का इस्तेमाल फाइबर रिकवरी को 35 परसेंट तक ले जाने और ग्लोबल मार्केट में साफ़ और हाई क्वालिटी इंडियन कॉटन पहुंचाने में मदद कर रहा है।

भारत की फाइबर की ज़रूरत 2030 तक लगभग 15 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) के मौजूदा लेवल से बढ़कर लगभग 23 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान है। सिर्फ़ कॉटन इस बढ़ती मांग को पूरा नहीं कर सकता। 21वीं सदी अब एक नया चैप्टर शुरू कर रही है, जो रिन्यूएबल, बायोडिग्रेडेबल और कम कार्बन वाले मटीरियल की खोज से आगे बढ़ रही है। भारत इस नए दौर में एक खास फ़ायदे के साथ आ रहा है: हमारे पास भविष्य के मटीरियल बनाने के लिए बहुत सारे नेचुरल रिसोर्स और अलग-अलग तरह के फाइबर हैं।

मॉडर्न ज़माने के धागे: अगली फाइबर इकॉनमी बनाना

यहीं पर मॉडर्न ज़माने के धागे स्ट्रेटेजिक रूप से ज़रूरी हो जाते हैं। भारत सदियों से इनमें से कई धागों के बारे में जानता है और उनका इस्तेमाल करता रहा है, फिर भी उनकी असली क्षमता का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है। अब हम अपने फाइबर डेवलपमेंट एजेंडा को कॉटन से आगे ले जा रहे हैं, जिसमें मॉडर्न ज़माने के फाइबर के रिसर्च, डेवलपमेंट और कमर्शियलाइज़ेशन पर खास ध्यान दिया जा रहा है। कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन के तहत 300 करोड़ रुपये की खास मदद से, हम किसानों, ग्रामीण एंटरप्राइज़ और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग के लिए नए मौके खोल रहे हैं। यह भारत को सस्टेनेबल धागों में ग्लोबल लीडर के तौर पर उभरने के लिए तैयार कर रहा है। हम अलग-अलग तरह के फाइबर पर काम कर रहे हैं, जिसमें बबूल, अलसी, रेमी, सिसल, भांग और भांग से लेकर बांस, केले, स्कंक और अनानास के पत्तों से मिलने वाले फाइबर शामिल हैं।

मिल्कवीड, जिसे पारंपरिक रूप से ‘आक’ या ‘मदार’ कहा जाता है और भगवान शिव की पूजा में चढ़ाया जाता है, एक नए ज़माने के अच्छे फाइबर के तौर पर उभर रहा है। इसकी खेती उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में 15-16 एकड़ तक फैल गई है और इससे लगभग 10,000 kg फ्लॉस और फाइबर मिला है। इसमें गर्मी से बचाने वाले मटीरियल, इको-फ्रेंडली फिलिंग मटीरियल, कपड़े और बहुत ठंडे इलाकों के लिए बचाव वाले कपड़े बनाने की बहुत ज़्यादा क्षमता है। सिसल का इस्तेमाल गाड़ियों के इंटीरियर, जियोटेक्निकल फैब्रिक, कम्पोजिट मटीरियल, कंस्ट्रक्शन के कामों में मजबूती और सस्टेनेबल पैकेजिंग के लिए किया जा रहा है, जबकि रेमी में कपड़ों, डेनिम ब्लेंड और टेक्निकल फैब्रिक के लिए काफी क्षमता है। अनानास के पत्ते का फाइबर (PALF) खेती के कचरे को फैशन के कपड़ों, लेदर के विकल्प और बायो-बेस्ड कम्पोजिट मटीरियल में बदल सकता है। इसी तरह, केले के फाइबर का इस्तेमाल धागा, कागज़, हैंडीक्राफ्ट, सजावटी सामान और टेक्निकल टेक्सटाइल बनाने के लिए किया जाता है। बांस, अलसी, भांग, ज्वार और ज्वार के रेशे, कपड़ा, घरेलू सामान, इन्सुलेशन और तकनीकी उत्पादों में इस्तेमाल के जरिए भारत के टिकाऊ रेशों के विविध स्रोतों को और समृद्ध करते हैं।

यह मौका सिर्फ़ अलग-अलग तरह के धागों तक ही सीमित नहीं है। जैसे-जैसे रिन्यूएबल, लो-कार्बन, बायोडिग्रेडेबल और ट्रेसेबल मटीरियल की ग्लोबल डिमांड बढ़ रही है, यह डायवर्सिटी भारत के लिए एक स्ट्रेटेजिक इकोनॉमिक एसेट बन रही है।

कॉटन की जन्मभूमि भारत ने हज़ारों सालों से इस विरासत को संभालकर रखा है। आज, हम इस विरासत को भविष्य में ले जाने के लिए तैयार हैं—न सिर्फ़ कॉटन के कस्टोडियन के तौर पर, बल्कि नए ज़माने के फाइबर, सस्टेनेबल मटीरियल, इनोवेशन और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से चलने वाली ‘सेकंड फाइबर रेवोल्यूशन’ के पायनियर के तौर पर भी। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के 5F विज़न के गाइडेंस में—खेत से फाइबर, फाइबर से फैक्ट्री, फैक्ट्री से फैशन और फैशन से विदेशी बाज़ारों तक—हम अपनी रिच विरासत को नई दुनिया की ज़रूरतों से जोड़ रहे हैं। आज, जब दुनिया ऐसे धागों की तलाश में है जो साफ़, इको-फ्रेंडली और फ्यूचर-प्रूफ़ हों, तो भारत इस बदलाव को लीड करने और ग्लोबल टेक्सटाइल इंडस्ट्री के अगले चैप्टर को आकार देने के लिए अच्छी स्थिति में है।

लेखक केंद्रीय कपड़ा मंत्री हैं। इस लेख में दिए गए विचार उनके निजी विचार हैं।

सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा, कल्याण और गरिमा हेतु ठोस सुधार होना चाहिए

डॉ. वीरेंद्र कुमार

एक साफ-सुथरे एवं स्वस्थ देश की जिम्मेदारी हजारों सफाई कर्मचारियों के कंधों पर है। ये सफाई कर्मचारी अक्सर कठिन एवं जोखिम भरी परिस्थितियों में काम करते हुए हमें हर दिन आवश्यक सेवाएं प्रदान करते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और हमारे शहरों व समुदायों के कामकाज में उनका योगदान अमूल्य है।

इसलिए उनकी सुरक्षा, कल्याण और गरिमा सुनिश्चित करना महज एक सामाजिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि एक समावेशी और मानवीय समाज के निर्माण का एक जरूरी हिस्सा भी है।

इस जिम्मेदारी को समझते हुए, केन्द्र सरकार ने ‘नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड   सैनिटेशन इकोसिस्टम (नमस्ते)’ और ‘राष्ट्रीय नेशनल सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम (एनएसकेएफडीसी) के वित्तीय सहायता कार्यक्रमों के जरिए सफाई कर्मचारियों के जीवन एवं उनकी आजीविका की सुरक्षा के लिए कई व्यापक उपाय किए हैं।

ये उपाय जोखिम भरे शारीरिक तरीकों से हटकर, स्वच्छता के एक ऐसे सुरक्षित एवं गरिमापूर्ण इकोसिस्टम की दिशा में निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मशीनीकरण, पेशेगत सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कौशल विकास और टिकाऊ आजीविका पर आधारित है।

एक सुरक्षित स्वच्छता इकोसिस्टम का निर्माण 

‘नमस्ते’ का मुख्य लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है: सीवर और सेप्टिक टैंक की जोखिम भरी  सफाई को खत्म करना और सफाई कार्यों के दौरान होने वाली मौतों को शून्य तक ले आना। इस योजना का उद्देश्य स्वच्छता से जुड़ी श्रमशक्ति को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ना और सफाई कर्मचारियों के लिए सुरक्षा उपकरण, पेशेगत प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाएं एवं आजीविका के अवसर सुनिश्चित करना है। यह मशीनों एवं सुरक्षा उपकरणों के उपयोग को भी बढ़ावा देती है ताकि किसी भी कर्मचारी को अनावश्यक रूप से जोखिम भरी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।

इस योजना के तहत 91,000 से अधिक सीवर एवं सेप्टिक टैंक से जुड़े श्रमिकों की जानकारी जुटाई गई है। इनमें से 90,000 से अधिक श्रमिकों की जानकारियों का सत्यापन किया जा चुका है। जहां 87,000 से अधिक श्रमिकों को व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट प्रदान की गई हैं, वहीं लगभग 77,000 श्रमिकों को स्वास्थ्य-बीमा योजना  के दायरे में लाया गया है।

जानकारी जुटाने एवं उनके सत्यापन की यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे श्रमिकों को औपचारिक मान्यता मिलती है और एक ऐसा रास्ता तैयार होता है जिसके माध्यम से वे सरकारी कल्याणकारी व सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं। साथ ही, इससे कार्यान्वयन एजेंसियों को उनकी जरूरतों को समझने और पेशेगत सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, प्रशिक्षण एवं आजीविका के मामले में उचित कदम उठाने में मदद मिलती है।

संस्थागत तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बड़ी नगर पालिकाओं और जिलों में स्थापित  स्वच्छता से संबंधित आपातकालीन प्रतिक्रिया इकाइयों (ईआरएसयू) को 750 से अधिक सुरक्षा उपकरण भेजे गए हैं। ये इकाइयां आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करती हैं और सीवर व सेप्टिक-टैंक की सफाई के काम को सुरक्षित एवं मशीनों के जरिए करने में मदद करती हैं।

जागरूकता और व्यवहारगत बदलाव भी एक अहम पहलू है। देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंक की जोखिम भरी सफाई को रोकने हेतु 1,600 से अधिक कार्यशालाएं  आयोजित की गई हैं। इन कार्यशालाओं में सफाई के असुरक्षित तरीकों से जुड़े खतरों के बारे में बताने और मशीनों से सुरक्षित सफाई के महत्व पर जोर देने के उद्देश्य से  कर्मचारियों, अधिकारियों तथा अन्य हितधारकों को एकजुट किया गया है।

मशीनीकरण: जोखिम भरे श्रम से सुरक्षित उद्यम तक

स्वच्छता संबंधी कार्यों के रूपांतरण में मशीनीकरण की अहम भूमिका है। जब तकनीक़ से इन कार्यों को सुरक्षित रूप से किया जा सकता है, तो किसी भी कर्मचारी को सीवर या सेप्टिक टैंक में स्वयं उतरने की जरूरत क्यों हो।

इसलिए, केन्द्र सरकार सफाई कर्मचारियों को सफाई से जुड़ी मशीनों एवं वाहनों का मालिक तथा संचालक बनने में मदद करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। लगभग 1,000 सफाई कर्मचारियों को 370 से अधिक सफाई के वाहन खरीदने हेतु लगभग 35 करोड़ रुपये की अग्रिम पूंजीगत सब्सिडी जारी की गई है।

यह सहायता महज उपकरण प्रदान करने से कहीं बढ़कर है। यह कर्मचारियों को जोखिम भरे काम से हटाकर मशीनीकृत सफाई सेवाओं, उद्यमिता और टिकाऊ आय अर्जित करने  की दिशा में बढ़ने में मदद कर रही है।

इसका व्यापक उद्देश्य सफाई कर्मचारियों को महज कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी  के रूप में नहीं, बल्कि कुशल पेशेवरों, सेवा प्रदाताओं और उद्यमियों के रूप में मान्यता  दिलाना है। सफाई के वाहनों एवं उपकरणों के मालिक बनने से जहां कार्यस्थल पर सुरक्षा बेहतर हो सकती है, वहीं व्यापक वित्तीय आजादी और दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा के अवसर भी सृजित हो सकते हैं।

मात्र सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्तियों और परिवारों के लिए सुरक्षित एवं गरिमापूर्ण आजीविका बनाने के साधन तैयार करना: यही सशक्तिकरण का मूलमंत्र है।

कचरा बीनने वालों तक कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार

स्वच्छता और साफ-सफाई के कार्यों का दायरा सिर्फ सीवरों एवं सेप्टिक टैंकों की सफाई तक ही सीमित नहीं है। कचरे को एकत्रित करके, उसे छांटकर और उसकी पुनर्प्राप्ति व पुनर्चक्रण में मदद करके, कचरा बीनने वाले भी एक बेहद जरूरी जन-सेवा करते हैं। फिर भी, उनमें से कई लोगों ने लंबे समय से बिना किसी उचित पहचान, पेशेगत सुरक्षा या सामाजिक सुरक्षा के ही काम किया है।

उनके योगदानों को देखते हुए, सरकार ने 2024 में ‘नमस्ते’ योजना का विस्तार किया और इसमें ठोस कचरा प्रबंधन में संलग्न कचरा बीनने वालों को भी शामिल किया। इस कदम का उद्देश्य जानकारी जुटाने (प्रोफाइलिंग), पेशेगत सुरक्षा के उपायों, स्वास्थ्य सेवा, कौशल विकास और आजीविका में मदद के जरिए कचरा बीनने वालों को सुरक्षित, गरिमापूर्ण और टिकाऊ आजीविका उपलब्ध कराना है।

इस विस्तारित घटक के तहत, 3.80 लाख से अधिक कचरा बीनने वालों के बारे में जानकारियां जुटाई गई हैं। इनमें से लगभग 2.60 लाख लोगों का सत्यापन ई-केवाईसी के जरिए किया गया है। जहां 1.30 लाख से अधिक कचरा बीनने वालों को पीपीई किट प्राप्त हुई हैं, वहीं 1.20 लाख से अधिक लोगों के डेटा को आयुष्मान कार्ड बनाने के लिए प्रोसेस किया गया है।

‘नमस्ते’ योजना के तहत कचरा बीनने वालों को शामिल करना, चक्रीय अर्थव्यवस्था और ठोस कचरे के प्रबंधन में उनके योगदानों को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे उन्हें पहचान से संबंधित दस्तावेज, पेशेगत सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने में मदद मिल रही है। साथ ही, उनके लिए टिकाऊ आजीविका के रास्ते भी खुल रहे हैं।

एनएसकेएफडीसी के जरिए आर्थिक सशक्तिकरण

सुरक्षा और गरिमा के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण भी जरूरी है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम (एनएसकेएफडीसी) इस दिशा में अहम भूमिका निभा रहा  है। यह संस्था आय सृजन वाली गतिविधियों, उद्यमिता, कौशल विकास और सफाई से जुड़े वाहनों व उपकरणों को खरीदने के लिए रियायती दरों पर वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। एनएसकेएफडीसी, भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत कार्यरत एक उपक्रम है।

वर्ष 2014-15 और 2025-26 के बीच, एनएसकेएफडीसी ने 2,383 करोड़ रुपये से अधिक  की आर्थिक सहायता जारी की, जिससे देश भर में 3.42 लाख से अधिक लोगों को लाभ  हुआ।

इस सहायता के दायरे के बारे में पता वर्ष-दर-वर्ष के आधार पर होने वाले इसके विस्तार से चलता है। वर्ष 2014–15 में 19,000 से अधिक लाभार्थियों को 134 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता प्रदान की गई थी, जो 2025–26 में बढ़कर 223 करोड़ रुपये से अधिक हो गई और इससे लगभग 29,000 लोगों को लाभ हुआ।

इन आंकड़ों की तह में ऐसे लोग और परिवार हैं जो बेहतर आर्थिक सुरक्षा की दिशा में  बढ़ना चाहते हैं। रियायती दरों पर ऋण, पूंजीगत सब्सिडी और आजीविका में मदद देकर, एनएसकेएफडीसी लाभार्थियों को उत्पादक परिसंपत्तियां हासिल करने, अपना उद्यम स्थापित करने और आय के स्थायी स्रोत बनाने में मदद कर रहा है।

आर्थिक सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा का एक ज़रूरी पूरक है। यह परिवारों को भविष्य की योजना बनाने, शिक्षा में निवेश करने और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की बेहतर क्षमता विकसित करने में समर्थ बनाता है।

सफाई कर्मचारियों के योगदानों को मान्यता

सम्मान और मान्यता उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी कि वित्तीय और संस्थागत सहायता।

अपनी तरह के एक अहम आयोजन में, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) ने 23 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में अपना 33वां स्थापना दिवस मनाया। इस कार्यक्रम में 900 से अधिक सफाई कर्मचारियों के साथ-साथ केन्द्र तथा राज्य सरकारों व केन्द्र-शासित प्रदेशों के प्रशासन, शहरी स्थानीय निकायों, सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों, नागरिक समाज के संगठनों और अन्य हितधारकों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

इस अवसर पर, 250 सफाई कर्मचारियों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया। एनसीएसके का 2026 का वार्षिक कैलेंडर भी जारी किया गया। साथ ही, एनसीएसके की मिस्ड-कॉल सुविधा (80 4735 9520) भी शुरू की गई ताकि संबंधित लोग अपनी शिकायतों और बातों को दर्ज करा सकें।

ऐसी पहलें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि गरिमा को सिर्फ वित्तीय सहायता से नहीं मापा जा सकता। यह इस बात से भी झलकता है कि समाज जरूरी सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने वाले लोगों को कितनी मान्यता देता है, उनका कितना सम्मान करता है और उनकी बातें कितनी सुनता है।

सफाईमित्र सुरक्षा एवं सम्मान

हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में हाइब्रिड मोड में आयोजित राष्ट्रीय स्तर के ‘सफाईमित्र सुरक्षा एवं सम्मान शिविर’ में देश भर से 3,800 से अधिक शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी), ग्रामीण स्थानीय निकायों (आरएलबी) और संबंधित विभागों की भागीदारी, हमारे सफाईमित्रों के सम्मान, गरिमा और महत्व को बनाए रखने की हमारी प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

इस राष्ट्रीय शिविर के दौरान, लाभार्थियों ने कुल 2,24,521 ‘नमस्ते’ कार्ड डाउनलोड किए। जबकि, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा लाभों तक पहुंच आसान बनाने हेतु 57,967 आयुष्मान कार्ड वितरित किए गए।

इस शिविर में विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत 1,53,253 पंजीकरण भी किए गए ताकि लाभार्थियों को कल्याणकारी एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल सके। पेशेगत सुरक्षा को बेहतर बनाने की कोशिश के तहत, इसमें शामिल जगहों पर सफ़ाई मित्रों को 1.28 लाख से अधिक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट वितरित किए गए।

सुरक्षा से अवसर की ओर

इसलिए, सफाई कर्मचारियों के कल्याण के प्रति सरकार का दृष्टिकोण व्यापक है।

प्रोफाइलिंग से मान्यता हासिल होती है और लक्षित उपायों के लिए आधार बनता है। पीपीई और सुरक्षा उपकरण काम से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद करते हैं। स्वास्थ्य सेवा संबंधी कवरेज सामाजिक सुरक्षा का एक अहम जरिया है। मशीनीकरण से जोखिम भरे शारीरिक तरीकों पर निर्भरता कम होती है। कौशल विकास और वित्तीय सहायता से स्वरोजगार और उद्यमिता के अवसर सृजित होते हैं।

ये सभी उपाय मिलकर सफाई के काम के स्वरूप को ही बदलने का प्रयास कर रहे हैं।

लक्ष्य महज जोखिम भरे कार्य को थोड़ा सुरक्षित बनाना भर नहीं है। लक्ष्य जोखिम भरे  तरीकों को खत्म करना, मशीनी एवं कुशल सफाई सेवाओं को बढ़ावा देना और गरिमापूर्ण  आजीविका के रास्ते बनाना है।

सुरक्षित एवं गरिमापूर्ण भविष्य का संकल्प

सफाई के काम में आमूल बदलाव का अंतिम उद्देश्य लोगों का कल्याण है। इसका उद्देश्य  यह सुनिश्चित करना है कि हमारे समाज को साफ-सुथरा रखने के क्रम में किसी भी सफाई कर्मचारी को अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक सुरक्षा, कामकाज की सुरक्षित परिस्थितियों और आर्थिक अवसरों को सुलभ कराना भी है। सबसे बढ़कर, इसका उद्देश्य उन सभी लोगों की गरिमा को मान्यता देना है जो हमारे देश की सफाई और भलाई में योगदान देते हैं।

‘नमस्ते’ और एनएसकेएफडीसी के वित्त-पोषण एवं आजीविका संबंधी कार्यक्रम इस बदलाव में महत्वपूर्ण साधन हैं। ये साधन सुरक्षा को सामाजिक सुरक्षा के साथ, मशीनीकरण को उद्यमिता के साथ और कल्याण को सशक्तिकरण के साथ जोड़ते हैं।

अब जबकि भारत एक साफ-सुथरे, स्वस्थ और समावेशी भविष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमारा संकल्प अटूट रहना चाहिए: जो लोग हमारे देश को साफ रखते हैं, वे खुद भी सुरक्षा, गरिमा, संरक्षा और अवसरों से परिपूर्ण हों और अपना दायित्व सहजता से निभा पाएं।

 (लेखक केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री हैं)

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए न्याय और सुरक्षा को सुदृढ़ करना

एक संवैधानिक गारंटी

रामदास अठावले, सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री

एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की नींव इस भरोसे पर टिकी होती है कि प्रत्येक नागरिक गरिमा, समानता और सुरक्षा के साथ जीवन यापन कर सके। अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए यह प्रतिबद्धता मजबूत संवैधानिक सुरक्षा उपायों, प्रभावी कानूनों और उत्तरदायी संस्थाओं के माध्यम से ठोस रूप लेती है। इसलिए, भारत सरकार ने अत्याचारों की रोकथाम, पीड़ितों की सुरक्षा और समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानूनी और संस्थागत फ्रेमवर्क को लगातार मजबूत किया है।

इस फ्रेमवर्क का आधार दो प्रमुख कानून हैं: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (PCR Act) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST (PoA) Act)। वर्षों से इन कानूनों को विधायी संशोधनों, बेहतर राहत और पुनर्वास प्रावधानों, विशेष न्यायिक तंत्रों, शिकायत-निवारण प्रणालियों तथा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता के जरिए सुदृढ़ किया गया है।

न्याय के लिए एक अधिक सशक्त कानूनी फ्रेमवर्क

जाति-आधारित अत्याचारों के प्रति संवेदनशील समुदायों की चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से समाधान करने के लिए एससी/एसटी (PoA) अधिनियम, 1989 में उल्लेखनीय विकास हुआ है। इस दिशा में एक बड़ा कदम 26 जनवरी 2016 से प्रभावी हुए संशोधनों के जरिए उठाया गया।

इन संशोधनों में अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए अनन्य विशेष न्यायालयों (Exclusive Special Courts) की स्थापना और अनन्य विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। अधिनियम में कई नए प्रकार के अत्याचारों को भी शामिल किया गया, जिससे एससी और एसटी समुदायों को उपलब्ध कानूनी सुरक्षा का दायरा व्यापक हुआ।

उतना ही महत्वपूर्ण पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों से जुड़ा एक समर्पित अध्याय जोड़ना भी था। पीड़ितों, उनके आश्रितों और गवाहों के प्रति राज्य सरकारों की जिम्मेदारियों को और सुदृढ़ किया गया-यह स्वीकार करते हुए कि न्याय केवल मामले के पंजीकरण और मुकदमे की सुनवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें प्रभावित लोगों की सुरक्षा, गरिमा और पुनर्वास भी शामिल होना चाहिए।

इसके बाद, 14 अप्रैल 2016 को एससी/एसटी (PoA) नियम, 1995 में संशोधन किए गए। इन संशोधनों ने राहत और पुनर्वास फ्रेमवर्क को मजबूत किया, अत्याचार के 47 अपराधों के लिए निर्धारित राहत राशि में वृद्धि की और पीड़ितों तथा उनके आश्रितों को समय पर वित्तीय सहायता के वितरण पर जोर दिया।

समय पर न्याय की उपलब्धता सुनिश्चित करना

20 अगस्त 2018 को एससी/एसटी (PoA) अधिनियम में किए गए संशोधन के माध्यम से और भी महत्वपूर्ण बदलाव पेश किए गए। इस संशोधन ने इस कानून के तहत मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। इसके अलावा, अधिनियम के तहत अपराध के आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता को भी हटा दिया गया।

उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था: प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचार से जुड़े अपराधों के पंजीकरण, जांच और अभियोजन में बाधा नहीं बननी चाहिए।

एससी/एसटी (PoA) नियम, 1995 में 27 जून 2018 को भी संशोधन किया गया, जिसने मृत्यु, चोट, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, एसिड हमले, संपत्ति के नुकसान और कानून के दायरे में आने वाले अन्य अपराधों के मामलों में राहत प्रावधानों को और मजबूत किया।

ये सुधार इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करते हैं कि कानून को केवल कागजों पर ही मजबूत नहीं होना चाहिए, बल्कि जब कोई पीड़ित सुरक्षा और न्याय की गुहार लगाए, तब उसे सुलभ और संवेदनशील भी होना चाहिए।

त्वरित सुनवाई के लिए अनन्य विशेष न्यायालयों का सुदृढ़ीकरण

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 217 अनन्य विशेष न्यायालय स्थापित किए जा चुके हैं। यह अधिनियम संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, उन जिलों में सत्र न्यायालयों को विशेष न्यायालय के रूप में नामित करने का भी प्रावधान करता है जहां मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।

अनन्य विशेष न्यायालयों की स्थापना और सुदृढ़ीकरण का उद्देश्य अधिनियम के तहत मामलों की त्वरित सुनवाई और प्रभावी निस्तारण को सुगम बनाना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि पीड़ितों की पहुंच विशेष न्यायिक तंत्र तक हो।

शिकायत निवारण को नागरिकों के निकट लाना

कानूनी सुरक्षा तभी सार्थक होती है जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों और उचित सहायता प्राप्त कर सकें। इसे ध्यान में रखते हुए, 13 दिसंबर 2021 को एससी और एसटी पर अत्याचार के खिलाफ राष्ट्रीय हेल्पलाइन (NHAA) शुरू की गई, जिसे बाद में ‘संबल’ (SAMBAL) नाम दिया गया।

टोल-फ्री नंबर 1800-202-1989 और शॉर्ट कोड हेल्पलाइन 14566 को एससी/एसटी (PoA) अधिनियम के प्रावधानों के बारे में अधिक जागरूकता फैलाने और सूचना, मार्गदर्शन तथा शिकायत निवारण तंत्र तक पहुंच को आसान बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह अत्याचार से प्रभावित व्यक्तियों को अपने कानूनी अधिकारों और उपलब्ध उपायों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम प्रदान करता है।

जागरूकता और सुलभता को बढ़ाकर, यह हेल्पलाइन सुरक्षा और न्याय के व्यापक संस्थागत फ्रेमवर्क को मजबूती प्रदान करती है।

ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वयन को सुदृढ़ बनाना

किसी भी कानून की प्रभावशीलता अंततः उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। इसलिए, सरकार ने हितधारकों तथा संबंधित मंत्रालयों और विभागों के साथ परामर्श के बाद पीसीआर अधिनियम, 1955 और एससी/एसटी (PoA) अधिनियम, 1989 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए योजना दिशानिर्देश जारी किए हैं।

ये दिशानिर्देश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सहायता प्रदान करने तथा रोकथाम, सुरक्षा, राहत, पुनर्वास और जागरूकता से संबंधित उपायों को मजबूत करने के लिए एक संरचित रूपरेखा तैयार करते हैं।

सरकार ने कार्यान्वयन के दौरान सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का भी समाधान किया है। उदाहरण के लिए, एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से दूसरे में स्थानांतरित होने वाले पीड़ितों या आश्रितों को राहत प्रदान करने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारी के संबंध में प्रश्न उठे थे।

स्पष्टता और एकरूपता लाने के लिए, 20 जून 2025 को जारी एक स्पष्टीकरण में यह निर्धारित किया गया कि एससी/एसटी (PoA) नियमों के तहत निर्धारित राहत राशि उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा प्रदान की जाएगी जहां अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।

ऐसे उपाय महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कानून के तहत उपलब्ध सुरक्षा तब भी प्रभावी रहनी चाहिए जब पीड़ित या उनके आश्रित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं से बाहर चले जाएं। यह स्पष्टीकरण राहत राशि के समय पर वितरण की सुविधा प्रदान करता है और कार्यान्वयन में निरंतरता को मजबूत करता है।

पीड़ितों और सामाजिक समावेशन पर केंद्रित केंद्रीय सहायता

पीसीआर अधिनियम, 1955 और एससी/एसटी (PoA) अधिनियम, 1989 के कार्यान्वयन के लिए केंद्र प्रायोजित योजना प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करने, पीड़ितों को राहत और पुनर्वास प्रदान करने तथा सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

वर्ष 2014-15 से अब तक इस योजना के तहत 5,012.17 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है। इस अवधि के दौरान, अत्याचार के लगभग 7,26,588 पीड़ितों को राहत प्रदान की गई है, जबकि 2,21,716 जोड़ों को अंतरजातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन राशि प्राप्त हुई है।

ये आंकड़े केवल वित्तीय आवंटन और लाभार्थियों की संख्या से कहीं अधिक हैं। ये सरकार के उस निरंतर प्रयास को दर्शाते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि पीड़ितों को आवश्यकता पड़ने पर सहायता मिले और समानता तथा समावेशन को बढ़ावा देने वाले उपायों के माध्यम से सामाजिक सद्भाव को बल मिले।

केंद्र में न्याय, गरिमा और समानता

एससी/एसटी (PoA) अधिनियम और नियमों को सुदृढ़ करना, विशेष न्यायिक तंत्र की स्थापना, राहत और पुनर्वास प्रावधानों में वृद्धि, एक राष्ट्रीय हेल्पलाइन का गठन, कार्यान्वयन दिशानिर्देश जारी करना और निरंतर केंद्रीय वित्तीय सहायता-ये सभी मिलकर एससी और एसटी समुदायों की सुरक्षा की दिशा में एक व्यापक दृष्टिकोण तैयार करते हैं।

हमारी प्रतिबद्धता केवल अत्याचार होने के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं है। यह समान रूप से रोकथाम, जागरूकता, संस्थागत जवाबदेही, समय पर राहत, पुनर्वास और ऐसी परिस्थितियां बनाने के बारे में भी है जिसमें प्रत्येक नागरिक गरिमा के साथ और बिना किसी डर के जी सके।

भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, गरिमा और न्याय की गारंटी देता है। इन मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर सतर्कता, प्रभावी कार्यान्वयन और केंद्र, राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के बीच घनिष्ठ सहयोग की आवश्यकता है।

सरकार इन तंत्रों को मजबूत करने, कार्यान्वयन की चुनौतियों का समाधान करने और यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना जारी रखेगी कि कानूनी सुरक्षा उपाय ज़मीनी स्तर पर सार्थक सुरक्षा में परिवर्तित हों। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए न्याय केवल एक संवैधानिक वादा नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे गरिमा, सुरक्षा, समानता और अवसर की एक जीवंत वास्तविकता के रूप में अनुभव किया जाना चाहिए।

(लेखक सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री हैं)

एक सफ़र ने मुझे सेवा और मोदी के बारे में क्या सिखाया : उदय माहुरकर

उदय माहुरकर, पत्रकार


यह एक उभरते हुए पत्रकार और एक युवा पॉलिटिकल ऑर्गनाइज़र की कहानी है, जिन्होंने अभी-अभी एक नई पॉलिटिकल ज़िम्मेदारी संभाली थी…

साल था 1987। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस का नेशनल पॉलिटिक्स पर दबदबा था, जबकि BJP सिर्फ़ दो लोकसभा सीटों और अनिश्चित संभावनाओं के साथ एक नई उभरती हुई ताकत थी।

ऐसे समय में, 1987 की शुरुआत में, अहमदाबाद में द इंडियन एक्सप्रेस में मेरे चीफ़ रिपोर्टर, सीनियर पत्रकार किरीटभाई भट्ट ने नए नियुक्त गुजरात स्टेट ऑर्गनाइज़ेशन सेक्रेटरी नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा जताई। इसके बाद, हम नरेंद्रभाई से मिलने अहमदाबाद में BJP के खानपुर ऑफ़िस गए। नरेंद्रभाई के साथ पॉलिटिकल और सोशल मुद्दों पर 30 मिनट की बातचीत ने हमें बहुत इम्प्रेस किया।

उनसे मिलने के बाद बाहर आते हुए, किरीटभाई – जो अपने लेफ़्टिस्ट झुकाव के बावजूद वैल्यूज़-बेस्ड जर्नलिज़्म के लिए मेरे आइडल रहे हैं – ने मुझसे कहा, “मोदी बहुत आगे जाएंगे। वह बहुत फ़ोकस्ड, मैच्योर और दयालु इंसान हैं, जिनकी सोशल और पॉलिटिकल मुद्दों पर अच्छी पकड़ है।” 1987 के आखिर तक, पॉलिटिकल माहौल बदल गया था। बोफोर्स स्कैंडल से राजीव गांधी को नुकसान हुआ था, जबकि गुजरात में अमर सिंह चौधरी की सरकार गुटबाजी, जाति की राजनीति और बढ़ती निराशा से जूझ रही थी।

इन सबके बीच, गुजरात में सालों में सबसे बुरा सूखा पड़ा, जिससे लोग पलायन कर रहे थे, पीने के पानी के लिए रेल ट्रांसपोर्ट बंद हो गया और चारे की भारी कमी हो गई जिससे जानवर मर रहे थे।

सूखे का लेवल बहुत ज़्यादा था:

राज्य के 19 में से 17 ज़िले प्रभावित हुए, जिनमें कच्छ, बनासकांठा, मेहसाणा और जामनगर सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में से थे। लगभग दो करोड़ जानवरों को सूखे का सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ। चारा पंजाब और दूसरी जगहों से मंगाना पड़ा, और लगभग 7 लाख जानवरों को कैटल कैंप में रखा गया। राहत ऑपरेशन का मकसद लगभग 12 लाख मज़दूरों को रोज़गार देना था। लेकिन उनका पेमेंट कभी भी समय पर नहीं किया गया, कभी-कभी तो पूरा भी नहीं।

कई मज़दूरों को तो अपने अधिकारों के बारे में भी पता नहीं था! मुश्किलों में घिरी राजीव गांधी सरकार ने राहत के लिए करीब 65 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, लेकिन सवाल उठ रहे थे कि क्या यह मदद दूर-दराज के गांवों तक पहुंच रही है। यह असल में और असल में, दोनों तरह से एक कागज़-सी पतली सरकार थी।

इस बीच, नरेंद्र मोदी को ‘न्याय यात्रा’ का आइडिया आया, जिसने असल में दिखाया कि सेवा के लिए कमिटमेंट क्या होता है। न्याय यात्रा ने इंसानियत-पहले और सेवा-पहले के सिद्धांतों के साथ बहुत ही बेसिक सवालों को हल किया।

पहला था वेरिफिकेशन: ग्राउंड लेवल पर चेक करना कि राहत साइटों पर काम करने वालों को सरकारी गाइडलाइंस के हिसाब से सैलरी और फायदे मिल रहे हैं या नहीं और कहाँ नहीं, यह रिकॉर्ड करना।

दूसरा था अवेयरनेस: काम करने वालों, किसानों और आदिवासी समुदायों को उनके अधिकारों और उनके प्रति सरकार की ज़िम्मेदारियों के बारे में बताना, ताकि वे खुद अपना हक ले सकें।

तीसरा था न्याय: करप्शन और कमियों के सबूत इकट्ठा करना और उन्हें ठीक करने के लिए राज्य अधिकारियों के सामने फॉर्मली पेश करना।
मोदी ने राहत के हकों का डिटेल्ड ब्यौरा तैयार किया और काम करने वालों को गाँव-गाँव जाकर उनके डिस्ट्रीब्यूशन को वेरिफाई करने और लोगों को असलियत समझाने के लिए ट्रेन किया।

यात्रा में चार रथ शामिल थे, जिनमें से हर एक पुराने ज़माने की हुड वाली जीप पर बना था। उन्हें पर्दों से सजाया गया था ताकि वे चलते-फिरते स्टेज का काम कर सकें। यह भी मोदी की एक नई पहल थी। उस समय, रिसोर्स की कमी की वजह से, BJP की गुजरात यूनिट मिनी ट्रक नहीं खरीद सकती थी, इसलिए मोदी और उनकी टीम ने जीपों को रथ में बदल दिया।

40 दिन की यह यात्रा गुजरात के चारों कोनों—गोधरा, पालनपुर, जामनगर और भुज—से शुरू हुई और इसे चार बड़े नेताओं—केशुभाई पटेल, शंकरसिंह वाघेला, सुरेशभाई मेहता, काशीराम राणा/मकरंद देसाई ने लीड किया। यह यात्रा 6 दिसंबर, अंबेडकर की पुण्यतिथि (पुण्य तिथि) को शुरू हुई और 12 जनवरी 1988, स्वामी विवेकानंद की जयंती पर खत्म हुई।

‘यात्रा’ शब्द—जो पहली बार देश की पॉलिटिकल डिक्शनरी में आ रहा था और पॉलिटिकल और सोशल मैसेजिंग का एक ज़रूरी ज़रिया बनने वाला था, जैसा कि 1990 में श्री लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ/अयोध्या यात्रा के मामले में हुआ था—मोदी ने ही सोचा था। यात्रा का मतलब है बड़े पैमाने पर तीर्थयात्रा। इसलिए, भारतीय संदर्भ में इस शब्द का एक पवित्र मतलब था। यहीं पर नई सोच और सेवा के प्रति समर्पण काम आता है। ये ‘रथ’ उन राहत सेंटरों पर गए जहाँ एक जगह 500 से 1,000 लोग मौजूद थे। वहाँ, नेताओं ने अकाल के हालात को देखते हुए लोगों के हक के बारे में बताया, जैसे मुफ़्त पानी, बच्चों के साथ रहने की जगह और दूसरी ज़रूरी सुविधाएँ। इससे मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बना और लोगों की हमदर्दी मिली।

यात्रा सीधे तौर पर राहत लेकर आई। कार्यकर्ताओं ने राहत सेंटरों पर ‘सुखरी’ (गुड़, गेहूं के आटे और घी से बनी एक लंबे समय तक चलने वाली मिठाई), मूंगफली, चना और गुड़ बाँटा, ताकि गर्मी में कड़ी मेहनत कर रहे मज़दूर भूखे न रहें। सेवा के इस छोटे से काम ने प्रभावित लोगों में भरोसा जगाने में बड़ी भूमिका निभाई।

यात्रा के दौरान, नरेंद्र मोदी मवेशियों की हालत को लेकर परेशान थे। उन्होंने BJP कार्यकर्ताओं को ‘बेलबार’ (मवेशियों के लिए शेड) का इंतज़ाम करने के लिए मोटिवेट किया। सूखे के दौरान, किसान अपने बैलों को वहीं छोड़ देते थे और संकट खत्म होने के बाद, वे उन्हें वापस ले जाते और खेती फिर से शुरू कर देते थे। यह ‘सेवा’ की भावना का एक और प्रैक्टिकल एक्सप्रेशन था। जानवरों की यह देखभाल मोदी की ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा रही है। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो वे रेगुलर तौर पर जानवरों के हेल्थ कैंप लगाते थे, जहाँ गायों और भैंसों की आँखों के मोतियाबिंद का भी इलाज किया जाता था।

इस ट्रिप ने ज़मीनी लेवल पर तुरंत एक कनेक्शन बनाया। मैंने ऐसी कई मीटिंग्स कवर कीं। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के लोग इस ट्रिप से गहराई से जुड़े।

इन सेशन में बार-बार यही पैटर्न देखा गया: मज़दूरों तक पहुँचने से पहले ही उनकी मज़दूरी रोक ली गई या कम कर दी गई। BJP कार्यकर्ताओं ने सिस्टमैटिक तरीके से इन शिकायतों को रिकॉर्ड किया। मज़दूरों को मिली मज़दूरी का रिकॉर्ड रखने और उस पर साइन या अंगूठा लगाने के लिए बढ़ावा दिया गया। जहाँ मज़दूरों को उनकी तय मज़दूरी से कम दिया जा रहा था, वहाँ गाँव के सरपंचों ने लिखकर बयान दिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस और माँग पत्रों के ज़रिए सरकार की नाकामी के बारे में सच बताया गया, जिससे सरकार और उसकी एडमिनिस्ट्रेटिव मशीनरी पर दबाव पड़ा।

इस यात्रा से मज़दूरों ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई। अपने हक़ के बारे में पता चलने पर, मज़दूरों ने कॉन्ट्रैक्टर और अधिकारियों से अपनी मज़दूरी के बारे में सवाल पूछना शुरू कर दिया। इससे कॉन्ट्रैक्टर और एडमिनिस्ट्रेशन पर उन्हें उनका बकाया देने का दबाव पड़ा। अमर सिंह सरकार को एक्शन लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। गरीबों के हक़ में लगातार वकालत ने उस समय की सरकार को राहत कामों का दायरा बढ़ाने पर मजबूर कर दिया।

इस यात्रा ने BJP को ग्रामीण इलाकों में अपना बेस मज़बूत करने में मदद की। पहले, पार्टी को मुख्य रूप से शहरी मिडिल क्लास की पार्टी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसने मज़दूरों, किसानों और आदिवासी समुदायों के बीच अपना सपोर्ट बढ़ाया। इससे बड़ी संख्या में नए कार्यकर्ता भी पार्टी में शामिल हुए। लेकिन सबसे ज़रूरी बात यह है कि मोदी के ‘सेवा’ मॉडल ने BJP और लोगों के बीच एक इमोशनल कनेक्शन बनाया। इसीलिए 1989 से, जब नरेंद्र मोदी ने राज्य में ऑर्गेनाइज़ेशनल और एडमिनिस्ट्रेटिव ज़िम्मेदारियाँ संभालीं और बाद में प्रधानमंत्री बने, BJP कभी भी लोकसभा या असेंबली चुनाव नहीं हारी।

इस तरह, न्याय यात्रा असल में मोदी की पॉलिटिकल-कम-सोशल सोच का एक ब्लूप्रिंट थी जो पॉलिटिकल मीडियम/पब्लिक लाइफ़ के ज़रिए लोगों की सेवा पर आधारित थी। इसने यह पक्का किया कि सरकारी फ़ायदे सही लाभार्थियों तक पहुँचें, उन बिचौलियों को हटाया जो पब्लिक का पैसा दूसरी जगह ले जाते थे और नागरिकों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया। यह उनकी 25 साल की सरकारों का एक ज़रूरी हिस्सा रहा है। और यह यह भी दिखाता है कि मोदी क्यों सफल हुए हैं…क्योंकि सेवा से बढ़कर कुछ नहीं जुड़ता!

(लेखक एक अनुभवी पत्रकार और जाने-माने लेखक हैं)

‘ब्लू इकॉनमी’ से बदलेगी भारत की विकास की दिशा, विकसित भारत 2047 का नया विज़न!

डॉ. जितेंद्र सिंह, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री

सदियों से, समुद्र ने भारत के व्यापार को आगे बढ़ाया है, इसके तटीय इलाकों की संस्कृतियों को आकार दिया है और इसके स्ट्रेटेजिक असर को मज़बूत किया है। आज, 11,098 km की कुल तटरेखा, विशाल समुद्री संसाधनों और हिंद महासागर में एक अहम जगह के साथ, यह भारत के विकास को एक नया आयाम देता है।

अब जब देश ‘विकसित भारत 2047’ की ओर बढ़ रहा है, तो ‘ब्लू इकॉनमी’ खुशहाली, स्थिरता और देश की ताकत के एक मज़बूत रास्ते के तौर पर उभर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके को भारत के विकास के विज़न के सेंटर में रखा है। 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण में, उन्होंने ‘ब्लू इकॉनमी’ को उन सात धाराओं या ‘स्पत-धारा’ में से एक बताया जो देश को आगे ले जाएंगी।

‘ब्लू इकॉनमी’ सिर्फ़ समुद्र से जुड़ी इकॉनमी नहीं है, बल्कि यह लोगों, विचारों और संभावनाओं से जुड़ी इकॉनमी है। यह मछुआरों और तटीय समुदायों के लिए बेहतर रोज़ी-रोटी पक्का करने, एंटरप्रेन्योर और इन्वेस्टर के लिए मौके बनाने, खाने और एनर्जी सिक्योरिटी को मज़बूत करने और साइंस के सही इस्तेमाल से क्लाइमेट-रेज़िलिएंट तट बनाने के बारे में है। सबसे बढ़कर, यह इकोनॉमिक ग्रोथ को एनवायरनमेंटल ज़िम्मेदारी के साथ बैलेंस करने के बारे में है।

इस मौके के साथ कुछ तुरंत आने वाली चुनौतियाँ भी आती हैं। मरीन पॉल्यूशन और क्लाइमेट चेंज मरीन रिसोर्स पर बहुत ज़्यादा दबाव डाल रहे हैं। ये चुनौतियाँ इनोवेशन, सस्टेनेबल दखल और इन्वेस्टमेंट के लिए कैटलिस्ट बन सकती हैं। टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट, वेंचर क्रिएशन और कैपिटल जुटाने में तेज़ी लाकर, भारत मरीन रिन्यूएबल एनर्जी, मरीन बायोटेक्नोलॉजी, एडवांस्ड फिशरीज़, ओशन डेटा सर्विसेज़, सस्टेनेबल टूरिज्म और डीप-सी टेक्नोलॉजी जैसे उभरते सेक्टर को ‘ब्लू इकॉनमी’ ग्रोथ के पावरफुल ड्राइवर में बदल सकता है।

एक मज़बूत ‘ब्लू इकॉनमी’ इनकम और न्यूट्रिशनल सिक्योरिटी को बेहतर बनाने के लिए सस्टेनेबल फिशरीज़ और एक्वाकल्चर को बदल सकती है। मॉडर्न पोर्ट, शिपिंग और लॉजिस्टिक्स ट्रेड में कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ा सकते हैं। मरीन रिन्यूएबल एनर्जी भारत को क्लीन एनर्जी में बदलने में मदद कर सकता है। जहाँ मरीन टूरिज्म से लोकल बिज़नेस और नौकरियाँ बन सकती हैं, वहीं ओशन साइंस, फोरकास्टिंग और डिजिटल सर्विसेज़ जान, प्रॉपर्टी और रोजी-रोटी की रक्षा कर सकती हैं। ये सभी एरिया मिलकर मैरीटाइम सिक्योरिटी, टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की लीड करने की क्षमता को मज़बूत कर सकते हैं।

इसलिए, भारत ‘ब्लू इकॉनमी’ को अलग-अलग स्कीम के सेट के तौर पर नहीं, बल्कि नेशनल डेवलपमेंट के लिए एक इंटीग्रेटेड स्ट्रैटेजी के तौर पर देखता है। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि साइंस को ऐसी पॉलिसी बनानी चाहिए जो ऐसे एंटरप्राइज और इंस्टीट्यूशन को बढ़ावा दें जो लोगों और धरती के लिए असल वैल्यू बना सकें। मिनिस्ट्री ऑफ़ अर्थ साइंसेज़ इस बदलाव के लिए साइंटिफिक, टेक्नोलॉजिकल और इंस्टीट्यूशनल नींव रख रहा है।

‘डीप ओशन मिशन’ के ज़रिए, जो मरीन स्पेशल प्लानिंग, ओशन मॉनिटरिंग नेटवर्क, डिजिटल प्लेटफॉर्म, फोरकास्टिंग सिस्टम और एडवांस्ड मरीन सर्विसेज़ से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट हैं, मिनिस्ट्री समुद्र से जुड़ी जानकारी को आम लोगों के फायदे में बदल रही है। डीप-सी रिसर्च, मरीन बायोटेक्नोलॉजी, ओशन एनर्जी और डिसेलिनेशन से जुड़े एरिया में स्वदेशी क्षमताएँ रिसोर्स कंजर्वेशन, इनोवेशन और आत्मनिर्भरता का रास्ता बना रही हैं। मछली पालन से जुड़ी सलाह, शुरुआती चेतावनी देने वाली सर्विस और कोस्टल मैनेजमेंट के तरीके, तटीय इलाकों में लोगों की रोज़ी-रोटी को सपोर्ट कर रहे हैं और साथ ही आपदा की तैयारी को भी मज़बूत कर रहे हैं।

अगले फेज़ में स्केल, स्पीड और असर होना चाहिए। भारत को इंटीग्रेटेड ओशन गवर्नेंस, बेहतर कोऑर्डिनेशन, एक भरोसेमंद प्रोजेक्ट पाइपलाइन और सबूतों के आधार पर फैसले लेने के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी के ज़्यादा इस्तेमाल की ज़रूरत है। ‘ब्लू इकॉनमी’ में इन्वेस्टमेंट 2015–2025 के दौरान लगभग Rs 3.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2026–2035 के दौरान लगभग Rs 25.8 लाख करोड़ होने का अनुमान है, जो एक ऐतिहासिक मौका है।

इस पोटेंशियल को सस्टेनेबल नतीजों में बदलने के लिए, फाइनेंसिंग के नए तरीके, ज़िम्मेदार प्राइवेट कैपिटल, स्टार्टअप में हिस्सा लेना और ट्रांसपेरेंट इम्प्लीमेंटेशन ज़रूरी होगा। कोस्टल कम्युनिटी को इस पूरी यात्रा में एक्टिव पार्टिसिपेंट और मुख्य बेनिफिशियरी बने रहना होगा।

सबसे रोमांचक चैप्टर भारत के युवाओं से जुड़ा है। ओशन इकॉनमी में हर युवा एंटरप्रेन्योर, इन्वेस्टर, साइंटिस्ट, टेक्नोलॉजिस्ट, प्रोफेशनल और स्किल्ड वर्कर के लिए बहुत ज़्यादा पोटेंशियल है। पोर्ट, शिपिंग, लॉजिस्टिक्स, फिशरीज़ और टूरिज्म जैसे ट्रेडिशनल सेक्टर को ऑटोमेशन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लीन फ्यूल, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और भरोसेमंद ऑपरेशन के ज़रिए नया रूप दिया जा रहा है। मरीन रिन्यूएबल एनर्जी, मरीन बायोटेक्नोलॉजी, डीप-सी टेक्नोलॉजी, एक्वाकल्चर, मरीन रोबोटिक्स, मरीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आइलैंड टूरिज्म, इलेक्ट्रिक बोट्स और ग्रीन मैरीटाइम सिस्टम जैसे उभरते सेक्टर नए करियर, बिज़नेस और इन्वेस्टमेंट के मौके बना रहे हैं।

यह भविष्य की जरूरतों के लिए कौशल विकसित करने, स्टार्टअप शुरू करने, स्वदेशी तकनीक विकसित करने, जिम्मेदारी से निवेश करने और खोजों को ऐसे समाधानों में बदलने का समय है जिन्हें बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है। हमारे विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, उद्योगों और तटीय समुदायों को एक साथ प्रयोग और उद्यम के केंद्र के रूप में उभरना चाहिए। भारतीय युवा उन्नत मछली पकड़ने की प्रणाली, स्वच्छ जहाज, मजबूत बंदरगाह, समुद्र से जुड़े डेटा प्लेटफॉर्म, जैव-आधारित उत्पाद और प्रौद्योगिकियां डिजाइन कर सकते हैं जो गहरे समुद्र का पता लगाने के साथ-साथ इसके नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी कर सकते हैं।

‘नीली अर्थव्यवस्था’ भविष्य का वादा नहीं है। यह एक राष्ट्रीय मिशन है जिसे एक ऐसी पीढ़ी की आवश्यकता है जो इसे आगे बढ़ाने का साहस रखे। मैं भारत के युवाओं को परिवर्तन की इस ‘नीली लहर’ में अपनी कल्पना, साहस और नई सोच का योगदान देने के लिए आमंत्रित करता हूं। आइए अपने महासागरों को नवप्रवर्तन की प्रयोगशाला, आजीविका का स्रोत और स्थायी समृद्धि का साधन बनाएं। आइए हम सब एक ऐसी समुद्री अर्थव्यवस्था बनाने के लिए मिलकर काम करें जो उत्पादक होने के साथ-साथ जिम्मेदार भी हो, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर सशक्त हो और ‘सप्त-धारा’ की भावना के अनुरूप हो। ‘विकसित भारत 2047’ की ओर हमारी यात्रा न केवल जमीन पर बल्कि उस विशाल नीले सागर में भी तय होगी जो इस देश को घेरे हुए है और हमें जोड़ता है।

{लेखक केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं।}

अब AI बोलेगा आदिवासी भाषाओं में! ‘आदिवाणी’ से जनजातीय भाषाओं को मिलेगी डिजिटल आवाज : रंजना चोपड़ा

भारत 700 से अधिक जनजातीय समुदायों और 100 से भी ज़्यादा विशिष्ट जनजातीय भाषाओं और बोलियों का घर है, फिर भी इनमें से बहुत कम के पास अपनी लिपि, शब्दकोश या ऑनलाइन उपस्थिति है। स्वास्थ्य संबंधी किसी सरकारी परामर्श को पढ़ने की कोशिश कर रहे गोंडी भाषी किसान के लिए या पाठ्यपुस्तक में किसी शब्द को खोज रहे संथाली छात्र के लिए डिजिटल दुनिया ने अब तक उनकी भाषा में बात नहीं की थी। ‘आदिवाणी’ एक-एक वाक्य, एक-एक रिकॉर्डिंग और एक-एक अनूदित पृष्ठ के माध्यम से इस स्थिति को बदल रही है।

आदिवाणी एक एआई-आधारित अनुवाद और भाषा प्रौद्योगिकी मंच है, जिसे जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) के अंतर्गत आईआईटी दिल्ली द्वारा विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सीधा और स्पष्ट है: ऐसे उपकरण तैयार करना जो अंग्रेजी और हिंदी को जनजातीय भाषाओं के साथ संवाद करने में सक्षम बनाएं, और जनजातीय भाषाओं को भी लिखित और मौखिक दोनों माध्यमों में उनका उत्तर देने की सुविधा दें।

आदिवाणी चार भाषाओं-संथाली, मुंडारी, भीली और गोंडी-के साथ लाइव हो चुकी है। इसके ठीक पीछे कुई और गारो भाषाएं हैं, जबकि अगले चरण के लिए कातकरी, कोया, कोकबोरोक, बेट्टा कुरुबा, चोधरी, थाडो कुकी और तांगखुल सहित आठ अन्य भाषाओं को तैयार किया जा रहा है।

सिर्फ एक अनुवादक नहीं, एक संपूर्ण टूलकिट

आदिवाणी केवल एक अनुवादक न होकर एक ही छत के नीचे संपूर्ण टूलकिट उपलब्ध कराती है। यह टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट ट्रांसलेशन की सुविधा देती है, जो अंग्रेजी या हिंदी पाठ को तुरंत जनजातीय भाषा में और जनजातीय भाषा को वापस हिंदी या अंग्रेजी में बदल देता है; स्पीच-टू-टेक्स्ट (ASR), जो बोली जाने वाली जनजातीय भाषा को लिखित रूप में परिवर्तित करता है और ऐसी भाषाओं के लिए जीवनरेखा का काम करता है जिनके पास धाराप्रवाह पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम या न के बराबर है; टेक्स्ट-टू-स्पीच, जो लिखे हुए पाठ से प्राकृतिक जनजातीय वाणी (ऑडियो) तैयार करता है ताकि निरक्षर व्यक्ति भी सुनकर जानकारी प्राप्त कर सकें; और स्पीच-टू-स्पीच, जो एक ऐसी बहु-चरणीय प्रणाली है जिससे अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले दो लोग लगभग वास्तविक समय में एक-दूसरे की बात समझ सकते हैं। इस प्लेटफॉर्म में ‘ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन’ (OCR) की सुविधा भी है, जो केवल कागजों पर मौजूद पुरानी पाठ्यपुस्तकों, लोक पांडुलिपियों, प्राथमिक पुस्तकों और शब्दकोशों को डिजिटाइज़ करती है-जो अक्सर किसी बोली के अंतिम बचे हुए दस्तावेज़ होते हैं। इसके साथ ही एक सार्वजनिक मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल भी उपलब्ध कराया गया है, जिसमें निरंतर सुधार के लिए शब्दकोश, सीखने के मॉड्यूल और फीडबैक तंत्र मौजूद हैं।

हाशिए से मुख्यधारा के केंद्र में लाना

दशकों से भारत की जनजातीय भाषाएं देश के डिजिटल और प्रशासनिक जीवन के हाशिए पर रही हैं। मौखिक इतिहास, पारिस्थितिक ज्ञान और सांस्कृतिक स्मृतियों से समृद्ध होने के बावजूद वे इंटरनेट, एआई प्रणालियों और अक्सर नीतियों से लगभग अदृश्य रही हैं। आदिवाणी इस स्थिति को बदल रही है। कल्याणकारी योजनाओं की अधिसूचनाएं, स्वास्थ्य परामर्श या एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों के अध्याय जो कभी केवल हिंदी या अंग्रेजी में उपलब्ध थे, अब संथाली या भीली में सटीकता और सम्मान के साथ रूपांतरित किए जा सकते हैं और किसी निरक्षर व्यक्ति को बोलकर सुनाए जा सकते हैं। दूसरी ओर, सरकारी अधिकारी, शिक्षक और स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी यह समझ सकते हैं कि कोई जनजातीय नागरिक अपनी भाषा में क्या कहना चाह रहा है। यह संवाद दोनों तरफ से होता है और यही इसकी मुख्य विशेषता है: आदिवाणी सिर्फ जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा तक पहुंच प्रदान नहीं कर रही है, बल्कि मुख्यधारा को भी जनजातीय भारत तक पहुंच उपलब्ध करा रही है।

यह परियोजना जनजातीय भाषाओं को एआई के लिए केवल डेटा स्रोत नहीं मानती, बल्कि उन्हें मौखिक परंपरा, कृषि, पारिस्थितिकी और सामुदायिक पहचान से जुड़ी जीवंत ज्ञान प्रणालियों के रूप में देखती है।

सिर्फ जनजातीय भारत के लिए नहीं-सभी के लिए एक मंच

आदिवाणी का दायरा केवल जनजातीय परिवारों तक ही सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं और भाषाविदों को दुनिया की सबसे कम प्रलेखित भाषाओं के लिए एक प्रामाणिक और उपयोगी डेटासेट मिलता है। जनजातीय जिलों में तैनात सिविल सेवकों, डॉक्टरों, शिक्षकों और एनजीओ के फील्ड कार्यकर्ताओं को (जिनमें से अधिकांश स्वयं जनजातीय नहीं हैं) एक रियल-टाइम अनुवादक साथी मिल जाता है, जो असहज और त्रुटिपूर्ण संचार को एक सार्थक संवाद में बदल देता है। भाषाविज्ञान और नृविज्ञान के छात्रों को ऐसी डिजिटाइज़्ड पांडुलिपियां और मौखिक अभिलेखागार मिलते हैं, जो अन्यथा स्थानीय पुस्तकालयों में बिना देखे नष्ट हो जाते। इसके अलावा प्रत्येक भारतीय को डिजिटल रिकॉर्ड में एक महत्वपूर्ण सुधार का लाभ मिलता है: जो भाषाएं केवल स्मृति में जीवित रहने के खतरे का सामना कर रही थीं, अब उन्हें ऑनलाइन सर्च करने, बोलने और सिखाने के लिए एक मंच मिल गया है।

यही बात आदिवाणी को एक साधारण अनुवाद ऐप से कहीं अधिक बनाती है; यह समावेशन का एक ऐसी सार्वजनिक अवसंरचना है जिसे समुदाय को केंद्र में रखकर तैयार किया गया है, न कि केवल एक प्राप्तकर्ता के रूप में।

पहले समुदाय, फिर तकनीक

आदिवाणी की सबसे विशिष्ट पहचान इसके एआई मॉडल नहीं, बल्कि इसकी कार्यप्रणाली है। मूल भाषियों, अनुवादकों, क्षेत्रीय भाषाविदों और समुदाय के वरिष्ठ नागरिकों को केवल एनोटेटर (डेटा विश्लेषक) नहीं, बल्कि ज्ञान भागीदार माना जाता है। प्रत्येक डेटासेट एक त्रि-स्तरीय कार्यप्रवाह मेकर-चेकर-सुपरचेकर से होकर गुजरता है, जहां समुदाय के समीक्षक उन सूक्ष्म बदलावों को पकड़ते हैं जिनके तहत एआई अक्सर किसी क्षेत्रीय भाषा को हिंदी या अंग्रेजी के अनुरूप ढालने का प्रयास करता है-जैसे कोई छूटा हुआ प्रत्यय, अत्यधिक सरलीकृत मुहावरा या पारंपरिक बोलचाल का खोया हुआ लहज़ा। मशीन द्वारा किए गए अनुवाद को कभी भी अंतिम नहीं माना जाता; मुख्य डेटाबेस में शामिल करने से पहले उसे सुधार के लिए मूल भाषियों के पास भेजा जाता है। यह ऐसा एआई विकास है जो सहमति, सांस्कृतिक सम्मान और इस समझ पर आधारित है कि भाषा केवल डेटासेट नहीं, बल्कि किसी समाज की अपनी पहचान को याद रखने का माध्यम है।

यहीं पर राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी वाक्य के एआई मॉडल तक पहुंचने से बहुत पहले, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों के TRIs ज़मीनी स्तर पर डेटा संकलन के पूरे प्रयास का संचालन करते हैं। वे मूल भाषियों को जोड़ते हैं, विभिन्न गांवों और ब्लॉकों में बोली की भिन्नताओं की पुष्टि करते हैं, और प्रशिक्षण डेटा में शामिल करने से पहले प्रत्येक अनूदित या लिप्यंतरित नमूने की जांच करते हैं। उनका क्षेत्रीय अनुभव यह तय करता है कि कौन सी रिकॉर्डिंग प्रामाणिक है और अनुवाद में किन मुहावरों का मूल अर्थ खो गया है। इस प्रकार वे समुदाय की स्थानीय भाषा और उपयोगी डिजिटल डेटा के बीच पहली जांच कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। TRIs द्वारा ज़मीनी स्तर पर की जाने वाली इस सतत समीक्षा के बिना, आदिवाणी के मॉडल में वही विसंगतियां आ सकती थीं जिन्हें दूर करने के लिए यह परियोजना शुरू की गई है।

आगे की राह 

आदिवाणी का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है। अगले नौ महीनों में इसकी योजना दस और भाषाओं को जोड़ने, अपनी स्पीच रिकॉग्निशन और वॉयस तकनीक को बेहतर बनाने तथा सत्यापित रिकॉर्डिंग का एक बहुत बड़ा संग्रह तैयार करने की है, जिसमें प्रति भाषा सैकड़ों-हजारों रिकॉर्डिंग शामिल होंगी। आंकड़ों से परे, आदिवाणी एक बड़े उद्देश्य का प्रतीक है: यह इस बात का प्रमाण है कि तकनीक जनजातीय भाषाओं को मिटाने के बजाय उनका संरक्षण और संवर्धन कर सकती है। ऐसे देश में जहां प्रत्येक  कुछ वर्षों में भाषाएं विलुप्त हो रही हैं, आदिवाणी जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी आवाज़ और शर्तों पर सुने जाने का अधिकार देती है, और बाकी भारत को उन्हें सुनने की एक ठोस वजह प्रदान करती है।

(लेखिका सचिव- जनजातीय कार्य मंत्रालय हैं)

नेक्स्ट-जेनरेशन GSTऔर भारत के विकास का अगला चरण : निर्मला सीतारमण

‘विकसित भारत’ बनने के भारत के संकल्प के लिए एक ऐसी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें हर स्तर और आकार के उद्यम फल-फूल सकें, चाहे उनकी शुरुआत कहीं से भी हुई हो। पिछले बारह वर्षों में हमारी सरकार ने इन अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण के लिए निरंतर कार्य किया है। वर्ष 2017 में जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) लागू होने से अप्रत्यक्ष कराधान के लिए एक साझा राष्ट्रीय ढांचा स्थापित हुआ। ‘नेक्स्ट- जेनरेशन का जीएसटी’ (Next-Gen GST) नौ वर्षों के क्रियान्वयन तथा करदाताओं और राज्यों के अनुभवों के आधार पर इसी प्रयास को आगे बढ़ाता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, नेक्स्ट- जेनरेशन जीएसटी की परिकल्पना दो परस्पर जुड़े उद्देश्यों के साथ की गई थी: कर दरों को कम व तर्कसंगत बनाना और अनुपालन को अधिक सरल बनाना। दरों में किए गए संशोधन 22 सितंबर 2025 से प्रभावी हुए। प्रक्रियात्मक सुधारों का अगला चरण शीघ्र ही जीएसटी परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सम्मिलित रूप से, इन प्रयासों का उद्देश्य परिवारों को राहत देना, व्यवसायों को अधिक निश्चितता प्रदान करना और करदाताओं के लिए एक ऐसी प्रणाली सुनिश्चित करना है जिसमें वे बिना किसी अनावश्यक कठिनाई के अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें।

राज्य इस पूरी यात्रा में बराबर के साझेदार रहे हैं। वे परिषद में अपनी प्राथमिकताओं और अनुभवों को लेकर आए, निर्णयों को आकार देने में सहयोग किया और उनके क्रियान्वयन का दायित्व संभाला। मैं इस प्रतिबद्धता के लिए उनका आभार व्यक्त करती हूँ। जीएसटी की प्रगति प्रत्येक सरकार के उत्तरदायित्वों का सम्मान करते हुए एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने की इसी तत्परता पर टिकी है।

इसके परिणाम विश्वास को सुदृढ़ करते हैं। अक्टूबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच, दर्ज की गई कर-योग्य आपूर्ति के मूल्य में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 25.8% की वृद्धि हुई। कर दरों की हल्की संरचना के साथ-साथ दर्ज आर्थिक गतिविधियों में भी व्यापक विस्तार देखा गया है। यह उस सुधार के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक आधार है जिसका उद्देश्य उद्यमों और सार्वजनिक वित्त दोनों को संबल प्रदान करना है।

यह सुदृढ़ता हालिया राजस्व आंकड़ों में स्पष्ट दिखाई देती है। अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान सकल जीएसटी संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि से 11.6% अधिक है। जून से सितंबर तक के प्रत्येक महीने में वार्षिक आधार पर दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की गई; इन चार महीनों का कुल संग्रह मिलकर लगभग 15% की गति से बढ़ा। कर वापसी (रिफंड) के बाद शुद्ध संग्रह में भी इस छमाही के दौरान 10.4% की वृद्धि हुई। इस प्रकार, करदाताओं को दी गई राहत और विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों में वृद्धि साथ-साथ हुई है।

इस विस्तार का दायरा उसके पैमाने जितना ही महत्वपूर्ण है। सभी 11 क्षेत्रक समूहों और सभी प्रमुख राज्यों में दर्ज कर-योग्य आपूर्ति में वृद्धि देखी गई। भारत जैसी विविध अर्थव्यवस्था में यह व्यापक प्रसार अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभिन्न क्षेत्रों और भौगोलिक हिस्सों में होने वाली यह वृद्धि अधिक से अधिक व्यवसायों को विस्तार लेते बाज़ारों में भाग लेने का अवसर देती है, और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न मांग, निवेश तथा रोज़गार से अधिकाधिक समुदायों को लाभान्वित करती है।

सुधार के बाद की अवधि की तुलना में उपभोक्ताओं को की गई प्रत्यक्ष बिक्री (बी2सी) में भी 26.7% की बढ़ोतरी हुई। जब कर राहत का प्रभाव कीमतों में दिखाई देता है, तो परिवारों के पास अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने या बचत करने के लिए अधिक गुंजाइश होती है। उपभोक्ता राहत और उद्यम विकास आपस में गहराई से जुड़े हैं: परिवारों की क्रय शक्ति व्यवसायों द्वारा दी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की मांग को बनाए रखती है। इसका लाभ परिवार से लेकर खुदरा विक्रेता, आपूर्तिकर्ता और उत्पादक तक सभी तक पहुंचता है।

लघु और मध्यम उद्यमों के लिए एक राष्ट्रीय बाज़ार तभी सार्थक होता है जब वह उनके स्थानीय परिवेश से परे ग्राहकों तक पहुँचने का व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त करे। द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों के व्यवसायों को स्थानीय स्तर पर निवेश और रोज़गार जारी रखते हुए ऐसे संबंध बनाने में सक्षम होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, इन शहरों में विस्तार करने वाले उद्यम स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं और वितरकों के लिए नए अवसर सृजित कर सकते हैं। जीएसटी का साझा ढांचा इन कड़ियों को सुदृढ़ करता है; और सरल प्रशासनिक व्यवस्था को इन्हें बनाए रखना और भी सहज बनाना होगा।

इस व्यवस्था में सहभागिता अत्यंत व्यापक रही है। अगस्त के अंत तक केंद्र और राज्य क्षेत्राधिकारों के अंतर्गत कुल जीएसटी पंजीकरण लगभग 1.71 करोड़ तक पहुंच गए, जो एक वर्ष पहले की तुलना में लगभग 15% अधिक हैं। अप्रैल-जुलाई 2026 की कर अवधियों के लिए, निर्धारित तिथि तक दाखिल किए गए जीएसटीआर-3बी रिटर्न पिछले वर्ष की समान अवधियों की तुलना में 12.6% अधिक थे। ये सुधार प्रशासन पर एक समान दायित्व भी डालते हैं: नियमित अनुपालन को विश्वसनीय सेवा, स्पष्ट मार्गदर्शन और समस्याओं के समयबद्ध समाधान द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।

इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की कार्यप्रणाली इस अनुभव का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुधार-उपरांत आंकड़े दर्शाते हैं कि इनपुट टैक्स क्रेडिट के माध्यम से चुकाई गई कर देयता का अनुपात बढ़ा है, जबकि कर-योग्य आपूर्ति के सापेक्ष संचित क्रेडिट में कमी आई है। यह उन व्यवसायों के लिए उत्साहवर्धक है जो पात्र क्रेडिट के प्रभावी उपयोग पर निर्भर करते हैं। किसी छोटे उद्यम के लिए उसकी कार्यशील पूंजी ही यह तय करती है कि वह कितनी सुगमता से कच्चा माल खरीद सकता है, कोई ऑर्डर पूरा कर सकता है और अगला काम हाथ में ले सकता है।

कर वापसी (रिफंड) भी उतनी ही प्रासंगिक है। अप्रैल-सितंबर के दौरान लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये की धनराशि रिफंड के रूप में लौटाई गई। व्यवसायों के प्राप्य बकाये को वापस लौटाना एक सुव्यवस्थित कर प्रणाली का अनिवार्य अंग है। इस प्रक्रिया में अधिक निश्चितता और पूर्वानुमेयता उद्यमों को अधिक आत्मविश्वास के साथ खरीद और उत्पादन की योजना बनाने में सहायता करेगी। किसी करदाता को देय रिफंड प्राप्त होने का अनुभव प्रशासनिक दक्षता का एक प्रमुख पैमाना होता है।

राज्यों की राजस्व स्थिति भी अधिक सुदृढ़ हुई है। इस वर्ष अप्रैल-सितंबर के दौरान एकीकृत माल और सेवा कर (आईजीएसटी) निपटान में उनके हिस्से सहित राज्यों की कुल एसजीएसटी प्राप्तियों में लगभग 16% की वृद्धि हुई। ये संसाधन बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं में निवेश को गति प्रदान करते हैं, जिससे परिवारों और उद्यमों को अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बेहतर परिवेश मिलता है। इस प्रकार, ये लाभ एक-दूसरे को सशक्त बनाते हैं: परिवारों को मिलने वाली राहत मांग को बढ़ावा देती है, उद्यम आर्थिक गतिविधियों को सुदृढ़ करते हैं, और सार्वजनिक राजस्व विकास को निरंतर बनाए रखने में सहायक होता है।

यह अनुभव भविष्य में किए जाने वाले कार्यों को भी रेखांकित करता है। एक विकासशील प्रणाली को इस बात के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए कि छोटे प्रतिभागियों पर इसका कितना आर्थिक व समय संबंधी भार पड़ता है। उनका समय और संसाधन सीमित होते हैं। रिटर्न दाखिल करने, क्रेडिट या रिफंड की व्यवस्था में प्रत्येक सुधार से ऐसे संसाधनों की अधिक से अधिक बचत होनी चाहिए, ताकि उनका उपयोग व्यवसाय के संचालन और विस्तार में किया जा सके।

7 अक्टूबर को जीएसटी परिषद के समक्ष रखे जाने वाले प्रस्ताव राज्यों के साथ निरंतर विचार-विमर्श और समन्वय के माध्यम से तैयार किए गए हैं। ये प्रस्ताव अनुपालन में लगने वाले समय और लागत को कम करने के उद्देश्य से पंजीकरण, रिटर्न, रिफंड, विवादों के निपटारे और इनपुट टैक्स क्रेडिट के सुगम प्रवाह से जुड़े हैं। करदाताओं का अनुभव ही इसके क्रियान्वयन का मुख्य मार्गदर्शक बना रहना चाहिए।

जीएसटी की बढ़ती परिपक्वता हमें सुधारों के अगले चरण के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करती है। स्पष्टता, निश्चितता और करदाता के प्रति सम्मान की यही प्रतिबद्धता प्रत्यक्ष करों से जुड़े हमारे कार्य को भी दिशा देती है। एक भरोसेमंद कर प्रणाली उद्यमों को अपने तात्कालिक दायित्वों से आगे बढ़कर योजना बनाने तथा ऐसे अवसरों में निवेश करने में सक्षम बनाती है जिनके फलने-फूलने में समय लगता है। वे चाहे कहीं भी कार्य कर रहे हों, उन्हें यह भरोसा दिलाना प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप एक ‘विकसित भारत’ की आर्थिक शक्ति के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है।

******

(लेखिका केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री हैं)

पॉलिटिकल विल, पब्लिक इन्वेस्टमेंट और पार्टिसिपेशन मिलकर भारत के टूरिज्म सफ़र को मिलेगा नया आकार

टूरिज्म का भविष्य पार्टनरशिप में है।

गजेंद्र सिंह शेखावत, भारत सरकार के केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री

टूरिज्म कभी भी सिर्फ़ सरकारी काम नहीं रहा है, और न ही कभी होगा।
किसी भी यात्री की हर यात्रा को एक कॉम्प्लेक्स इंफ्रास्ट्रक्चर का सपोर्ट मिलता है: सरकारें और लोकल एडमिनिस्ट्रेशन, एयरलाइंस और ट्रांसपोर्ट प्रोवाइडर, होटल और होमस्टे, टूर ऑपरेटर और गाइड, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और कंटेंट क्रिएटर, कारीगर और एंटरप्रेन्योर – सबसे बढ़कर, लोकल कम्युनिटी जिनकी ज़िंदगी, परंपराएं और नज़ारे किसी भी डेस्टिनेशन को उसकी खास पहचान देते हैं।

इसलिए, सरकार की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ डेस्टिनेशन को प्रमोट करना नहीं है। बल्कि ऐसे हालात बनाना है जिसमें यह पूरा इकोसिस्टम फल-फूल सके।

भारत आज अपनी टूरिज्म यात्रा में एक अहम मोड़ पर है। आज का टूरिस्ट सिर्फ़ मॉन्यूमेंट्स नहीं देखना चाहता, बल्कि ऐसे एक्सपीरियंस की तलाश में है जो ज़िंदगी भर याद रहें। लोकल खाना, शानदार परंपराएं, म्यूज़िक, हैंडीक्राफ्ट, नेचर, होमस्टे और लोकल कम्युनिटी के साथ बातचीत अब उतने ही ज़रूरी हो गए हैं जितना कि पारंपरिक टूरिस्ट डेस्टिनेशन पर जाना।

इस बदलाव के लिए टूरिज्म के प्रति हमारी सोच और नज़रिए में भी वैसा ही बदलाव ज़रूरी है। हमें सिर्फ़ ‘डेस्टिनेशन’ से आगे बढ़कर ‘एक्सपीरियंस’ की ओर, अलग-अलग अट्रैक्शन से इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम की ओर और सरकार के प्रमोशन के ज़रिए ऐसी पार्टनरशिप की ओर बढ़ना होगा जो पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर की काबिलियत और हमारे लोगों की एनर्जी को एक साथ ला सके।

इंडियन टूरिज्म में हाल की पार्टनरशिप के अनुभव हमारे सामने मौजूद बहुत बड़ी क्षमता को दिखाते हैं। मिनिस्ट्री ऑफ़ टूरिज्म ने टेक्नोलॉजी, ट्रांसपोर्ट, हॉस्पिटैलिटी, कंटेंट और डिजिटल आउटरीच की काबिलियत को मिलाने के लिए इंडस्ट्री और दूसरे स्टेकहोल्डर्स के साथ एक्टिव रूप से पार्टनरशिप की है। ऐसी पार्टनरशिप न सिर्फ़ इसलिए कीमती हैं क्योंकि वे इनक्रेडिबल इंडिया का दायरा बढ़ाती हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे इंस्पिरेशन को एक्सेस से और एक्सेस को असली एक्सपीरियंस से जोड़ती हैं।

इस मामले में वाराणसी का उदाहरण खास तौर पर इंस्पायरिंग है। एक डेस्टिनेशन को सिर्फ़ मॉन्यूमेंट्स के कलेक्शन के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक वाइब्रेंट कल्चरल एक्सपीरियंस के तौर पर भी पेश किया जा सकता है – गंगा, क्लासिकल म्यूज़िक, हेरिटेज, बनारसी बुनाई, लोकल कम्युनिटी और ट्रेडिशनल हॉस्पिटैलिटी का एक अनोखा मिक्स। यही वह दिशा है जिसमें टूरिज्म को अब आगे बढ़ना चाहिए।

पहला पिलर पॉलिटिकल विल

टूरिज्म पब्लिक पॉलिसी के लगभग हर पहलू को छूता है। किसी डेस्टिनेशन पर जाने वाले टूरिस्ट का अनुभव सिर्फ़ इस बात से तय नहीं होता कि वह क्या देखने आया है, बल्कि सड़कों, एयरपोर्ट, रेलवे, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सफ़ाई, सिक्योरिटी, डिजिटल कनेक्टिविटी, अर्बन प्लानिंग, हेरिटेज कंज़र्वेशन और लोकल सर्विसेज़ की क्वालिटी से भी तय होता है।

इसलिए, टूरिज़्म को किसी एक टूरिज़्म डिपार्टमेंट की एडमिनिस्ट्रेटिव सीमाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए पूरी सरकार का एक इंटीग्रेटेड अप्रोच चाहिए।

ट्रांसपोर्टेशन, सिविल एविएशन, रेलवे, कल्चर, अर्बन डेवलपमेंट, एनवायरनमेंट, स्किल डेवलपमेंट, कॉमर्स और डिजिटल टेक्नोलॉजी, सभी को एक आम समझ के साथ आना होगा कि कोई डेस्टिनेशन सच में सफल क्यों होता है।

इस मामले में पॉलिटिकल विल का मतलब है टूरिज्म को सिर्फ़ एक सेकेंडरी इकोनॉमिक एक्टिविटी के बजाय रोज़गार, एंटरप्रेन्योरशिप, कल्चरल प्रोटेक्शन, रीजनल डेवलपमेंट और इंटरनेशनल कोऑपरेशन के लिए एक पावरफुल मीडियम के तौर पर पहचानना।

इसका मतलब यह भी है कि सबसे पॉपुलर डेस्टिनेशन से आगे देखें और कम जानी-मानी जगहों में इन्वेस्ट करने की हिम्मत रखें, जिनकी क्षमता का अब तक ज़्यादातर इस्तेमाल नहीं हुआ है।

दूसरा ज़रूरी एलिमेंट पब्लिक इन्वेस्टमेंट

टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर अब सिर्फ़ एयरपोर्ट, हाईवे और होटलों तक सीमित नहीं है। जबकि ये ज़रूरी हैं, मॉडर्न ट्रैवलर को साफ़ पब्लिक जगहों, अच्छी तरह से सुरक्षित ऐतिहासिक जगहों, इंटरप्रिटेशन सेंटर, सही साइनेज, पैदल चलने वालों के लिए आसान सुविधाएँ, एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी, डिजिटल जानकारी और ट्रेंड वर्कर की भी ज़रूरत होती है।

एक्सपीरियंस की क्वालिटी टूरिस्ट के किसी मॉन्यूमेंट में घुसने से बहुत पहले शुरू हो जाती है और उसके जाने के बहुत बाद तक जारी रहती है।
पब्लिक इन्वेस्टमेंट का एक और ज़रूरी काम है: यह एक ऐसा माहौल बनाता है जिसमें प्राइवेट इन्वेस्टमेंट वायबल और प्रॉफिटेबल हो सकता है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि टूरिज्म में सरकार को इन्वेस्ट करना चाहिए या प्राइवेट सेक्टर को।

ज़्यादा ज़रूरी सवाल यह है कि पब्लिक इन्वेस्टमेंट वह नींव कैसे बना सकता है जिस पर प्राइवेट कैपिटल, एंटरप्राइज और इनोवेशन बन सकें। एक आसान और अच्छी तरह से जुड़ी हुई जगह होटलों को आकर्षित करती है। एक अच्छी तरह से संभालकर रखी गई ऐतिहासिक जगह अनुभवों को आकर्षित करती है। एक मज़बूत लोकल इकॉनमी एंटरप्रेन्योर्स को आकर्षित करती है। और एक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर जहाँ ये सभी एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं, सस्टेनेबल और मज़बूत टूरिज्म बनाता है।

तीसरा ज़रूरी एलिमेंटपब्लिक पार्टिसिपेशन।

फिर भी एक तीसरी चीज़ है जिसके बिना न तो पॉलिटिकल विल और न ही पब्लिक इन्वेस्टमेंट अपना वादा पूरा कर सकते हैं: पब्लिक पार्टिसिपेशन। किसी भी जगह के असली गार्डियन वहाँ के लोग होते हैं।

कोई गाँव सिर्फ़ इसलिए आकर्षक नहीं बन जाता क्योंकि वहाँ सुंदर नेचुरल लैंडस्केप है। उसकी पहचान, उसकी परंपराएँ, खाना, क्राफ़्ट, कहानियाँ, म्यूज़िक और जिस स्पिरिचुअल तरीके से वहाँ के लोग विज़िटर्स का स्वागत करते हैं, वे जीते हैं। अगर टूरिज्म को सच में सबको साथ लेकर चलने वाला बनाना है, तो लोकल कम्युनिटी को सिर्फ़ टूरिज्म की चीज़ नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका मुख्य पार्टिसिपेंट और बेनिफिशियरी बनना चाहिए।

होमस्टे, लोकल खाना, हैंडीक्राफ्ट, लोक परफ़ॉर्मेंस, लोकल गाइड और लोकल तौर पर ऑर्गनाइज़ किए गए अनुभव टूरिज्म को एक बाहरी इकॉनमिक एक्टिविटी से लोकल खुशी का सोर्स बना सकते हैं। होमस्टे ऑपरेटर्स की डिजिटल कैपेबिलिटी को मज़बूत करने, कम जानी-मानी जगहों को ज़्यादा दिखने लायक दिखाने और अनछुए गांवों को ऑनलाइन बुक किए जा सकने वाले होमस्टे से जोड़ने की हाल की कोशिशें इस अप्रोच की क्षमता को दिखाती हैं।

मकसद यह पक्का करना होना चाहिए कि जब कोई जगह किसी टूरिस्ट का ध्यान खींचे, तो उस आकर्षण से पैदा होने वाले आर्थिक मौके उन लोगों तक पहुंचें जो उस जगह को उसकी पहचान देते हैं। एक युवा गांव वाला किसान, एंटरप्रेन्योर, फोटोग्राफर या हॉस्पिटैलिटी प्रोफेशनल बन सके।

एक महिला के नेतृत्व वाला एंटरप्राइज लोकल खाने या हैंडीक्राफ्ट को नेशनल और इंटरनेशनल मार्केट तक ले जा सके। एक कारीगर अपनी पीढ़ियों से मिले ज्ञान से एक इज्ज़तदार (गर्मजोशी भरी) रोजी-रोटी कमा सके। तभी टूरिज्म इनक्लूसिव डेवलपमेंट का सच्चा ज़रिया बन सकता है।

हालांकि, पार्टनरशिप और ज़मीनी स्तर पर पार्टनरशिप के नतीजों में एक बड़ा अंतर होता है। एग्रीमेंट पर साइन करना तो बस शुरुआत है।

सफलता का असली पैमाना ज़मीनी स्तर पर दिखना चाहिए: क्या जगहें ज़्यादा आसानी से मिलने लगी हैं? क्या विज़िटर का अनुभव बेहतर हुआ है? क्या लोकल एंटरप्राइज फले-फूले हैं? क्या रोज़गार बढ़ा है? क्या कारीगरों और समुदायों को नए बाज़ार मिले हैं? क्या सांस्कृतिक विरासत को सिर्फ़ इस्तेमाल करने के बजाय ठीक से बचाकर रखा गया है?

इसलिए पार्टनरशिप को सिर्फ़ साइन किए गए एग्रीमेंट की संख्या से नहीं, बल्कि उनसे बनने वाली वैल्यू से मापा जाना चाहिए।

इंडियन टूरिज्म का भविष्य आखिरकार ऐसे रिश्तों के ताने-बाने से तय होगा: सेंटर और राज्यों के बीच; सरकार और इंडस्ट्री के बीच; टेक्नोलॉजी और परंपरा के बीच; ग्लोबल फोरम और लोकल कम्युनिटी के बीच; और पब्लिक इन्वेस्टमेंट और प्राइवेट एंटरप्राइज के बीच।

भारत के पास सभ्यता, संस्कृति, प्रकृति और विविधता की एक असाधारण विरासत है। अब हमें इंस्टीट्यूशनल कल्पना की ज़रूरत है – ताकि उस विरासत को ट्रैवलर्स और एंटरप्रेन्योर्स की नई पीढ़ी की उम्मीदों से जोड़ा जा सके। मकसद सिर्फ़ भारत में ज़्यादा टूरिस्ट लाना नहीं होना चाहिए।

मकसद यह पक्का करना होना चाहिए कि टूरिज्म से बनने वाले मौके भारत के अंदरूनी हिस्सों तक पहुँचें।
इसलिए, हमारी सफलता का असली पैमाना सिर्फ़ हमारे किनारों पर आने वाले टूरिस्ट की संख्या नहीं होगी, बल्कि उनके आने से बेहतर हुई ज़िंदगी की संख्या होगी।

टूरिज्म, अपने सबसे अच्छे रूप में, एक लेन-देन है; ट्रैवलर एक जगह खोजता है, और वह जगह ट्रैवलर के ज़रिए अपने लिए नई संभावनाएँ खोजती है। अगर हम पॉलिटिकल विल, पब्लिक इन्वेस्टमेंट, प्राइवेट एंटरप्राइज और अपने लोगों की भागीदारी को एक साथ जोड़ सकें, तो टूरिज्म सिर्फ एक इकोनॉमिक सेक्टर से कहीं ज़्यादा बन सकता है।

यह एक बड़ा ज़रिया बन सकता है जिससे भारत दुनिया के सामने अपनी सभ्यता पेश कर सके, देश के अंदर अपनी कम्युनिटी को मज़बूत कर सके, अपने युवाओं के लिए रोज़ी-रोटी बना सके, अपनी कल्चरल विरासत को बचा सके और साझा खुशहाली के नए दरवाज़े खोल सके।

आखिर में, इंडियन टूरिज्म का भविष्य सिर्फ सरकार नहीं तय करेगी। इसे पार्टनरशिप में और इस पक्के विश्वास के साथ तय किया जाएगा कि टूरिज्म से पैदा हुई खुशहाली का पहला हक उन लोगों और जगहों पर होना चाहिए जो भारत को घूमने लायक बनाती हैं।

TTDI 2026 में भारत की 31वीं रैक, PM मोदी का ‘विकास भी, विरासत भी’ का कॉन्सेप्ट का दिख रहा है असर

लेखक : गजेंद्र सिंह शेखावत, भारत सरकार के संस्कृति और पर्यटन मंत्री

किसी देश में टूरिज्म सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ता कि वहां खूबसूरत पहाड़, पुराने मंदिर या बीच हैं। टूरिस्ट को वहां पहुंचने के लिए अच्छी सड़कें और फ्लाइट्स चाहिए होती हैं। उन्हें रहने के लिए होटल या होमस्टे चाहिए होते हैं। उन्हें सही जानकारी, सिक्योरिटी, साफ-सफाई और अच्छे तौर-तरीके भी चाहिए होते हैं। सबसे बढ़कर, उन्हें ऐसा अनुभव चाहिए होता है जिसे वे ज़िंदगी भर याद रख सकें। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का ट्रैवल एंड टूरिज्म डेवलपमेंट इंडेक्स इन चीजों को मापता है। इसकी 2026 की रिपोर्ट बताती है कि भारत ने इस दिशा में काफी तरक्की की है।

भारत 2014 में दुनिया में 65वें नंबर से 2024 में 39वें नंबर पर आ गया है और अब 160 इकॉनमी में 31वें नंबर पर है। हमारा ओवरऑल स्कोर 4.42 है, जो 2024 के मुकाबले 4.3 परसेंट ज़्यादा है। यह नए मेथड से दोबारा कैलकुलेट किए गए 2019 के 4.36 स्कोर के मुकाबले 1.4 परसेंट की बढ़ोतरी भी दिखाता है। भारत साउथ एशिया और कम इनकम वाले देशों में पहले नंबर पर है। यह सिर्फ़ रैंकिंग में सुधार नहीं है। यह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकास भी, विरासत भी’ के आइडिया पर चल रही टूरिज्म पॉलिसी के असर को ग्लोबल पहचान है।

इस साल की रैंकिंग को समझने के लिए एक बात जानना ज़रूरी है। 2019 के इंडेक्स में चार बड़े सेक्टर और 90 इंडिकेटर थे। 2026 में, देशों को 17 पिलर और 102 इंडिकेटर पर आंका गया है। लोगों की राय पर आधारित इंडिकेटर्स को 33 से घटाकर 18 कर दिया गया है। यानी, पहले से ज़्यादा असली डेटा के आधार पर असेसमेंट किया गया है। देशों की संख्या भी 140 से घटाकर 110 कर दी गई है, इसलिए पुरानी और नई रैंकिंग की सीधे तुलना करना सही नहीं होगा। लेकिन इसी आधार पर बढ़ा हुआ स्कोर भारत की तरक्की को साफ तौर पर साबित करता है। 13 इंडिकेटर्स में भारत दुनिया के टॉप 10 देशों में शामिल है। विदेशी टूरिस्ट के एवरेज आने और टूरिज्म डेटा समय पर देने के मामले में भारत टॉप पर है।

यह याद रखना चाहिए कि भारत में विदेशी टूरिस्ट के आने का एवरेज समय लगभग 17-18 दिन है, जो दूसरे बड़े टूरिज्म वाले देशों के एवरेज से दोगुने से भी ज़्यादा है। एयरपोर्ट कनेक्टिविटी में यह चौथे और प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस, होटल रेट्स, खरीदने की ताकत और अच्छी सैलरी वाली टूरिज्म जॉब्स में छठे नंबर पर है। रोड डेंसिटी में भारत 10वें नंबर पर है। नए हाईवे, बेहतर रेल सर्विस, नए एयरपोर्ट और रीजनल फ्लाइट्स अब देश में टूरिज्म को बढ़ावा दे रही हैं। उड़ान स्कीम के 687 रूट 95 एयरपोर्ट को जोड़ते हैं। भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी डायवर्सिटी है। ट्रैवल रिसोर्स के मामले में हम दुनिया में चौथे नंबर पर हैं।

नेचुरल रिसोर्स में हम 7वें, कल्चरल रिसोर्स में 9वें और बिज़नेस, एजुकेशन और दूसरे नॉन-हॉलिडे ट्रैवल रिसोर्स में 8वें नंबर पर हैं। इंडिया बड़े स्पोर्ट्स स्टेडियम और टॉप यूनिवर्सिटी में तीसरे और ग्लोबल शहरों में पांचवें नंबर पर है। इसका मतलब है कि इंडिया सिर्फ़ छुट्टियां मनाने वाला देश नहीं है। यह कॉन्फ्रेंस, स्पोर्ट्स, एजुकेशन, शादी, स्पिरिचुअलिटी, हेल्थ और बिज़नेस से जुड़े ट्रैवल का भी एक बड़ा हब बन रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी का विज़न साफ़ है – विरासत को बचाना और उसे स्थानीय लोगों की खुशहाली से भी जोड़ना। इसी विज़न के साथ, टूरिज़्म मिनिस्ट्री ने सिर्फ़ देखने लायक जगहें बनाने के बजाय पूरे डेस्टिनेशन को डेवलप करने पर ज़ोर दिया है। स्वदेश दर्शन के तहत, 15 थीम पर आधारित टूरिज़्म सर्किट में 5,295 करोड़ रुपये से ज़्यादा के 76 प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी गई है और 75 पूरे हो चुके हैं। स्वदेश दर्शन 2.0 के तहत, 2,207 करोड़ रुपये से ज़्यादा के 53 प्रोजेक्ट्स आगे बढ़ रहे हैं। प्रसाद योजना के तहत 54 प्रोजेक्ट्स तीर्थ स्थलों पर सफ़ाई, सुरक्षा, सुविधाएँ और रोज़गार बढ़ा रहे हैं।

इन कोशिशों का असर रिपोर्ट में दिख रहा है। टूरिस्ट का आना कुछ महीनों तक सीमित नहीं है, इससे जुड़े इंडिकेटर्स में भारत की रैंकिंग 80 से सुधरकर 46 हो गई है। आबादी के हिसाब से होटल रूम की उपलब्धता का अनुपात 117वें से 84वें नंबर पर आ गया है। डिजिटल पर्यटन सेवाओं का उपयोग 106वें से 91वें स्थान पर, सरकारी पर्यटन व्यय 113वें से 101वें स्थान पर और पर्यटन का आर्थिक प्रभाव 41वें से 31वें स्थान पर आ गया है। छोटे किराये के आवास में भी सुधार हुआ है।

हाल ही में विश्व पर्यटन दिवस पर घोषित टूरिज्म डिजिटल स्टैक के शुभारंभ, आने वाले वर्षों में डिजिटल पर्यटन सेवाओं की रैंकिंग और पर्यटन में निवेश पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दी जा रही सुविधाओं और प्रोत्साहनों, होटल के कमरों की तेजी से बढ़ती संख्या और आबादी के अनुपात में कमरों की उपलब्धता के संकेतकों में भी सुधार होना तय है। इसका सीधा लाभ नए शहरों, गांवों, होमस्टे और स्थानीय व्यवसायों को मिल रहा है। डिजिटल सुविधा ने इस बदलाव को तेज कर दिया है।

ई-वीज़ा अब 172 देशों के नागरिकों के लिए उपलब्ध है। लगभग 78 प्रतिशत वीज़ा इलेक्ट्रॉनिक रूप से जारी किए जाते हैं और लगभग 95 प्रतिशत ई-वीज़ा आवेदन 72 घंटों के भीतर संसाधित किए जाते हैं टेक्नोलॉजी अब छोटे होटलों, गाइड, टूर ऑपरेटर और सर्विस प्रोवाइडर को बड़े मार्केट से जोड़ने का ज़रिया बन रही है, जिससे टूरिस्ट को आसानी हो रही है। टूरिज्म में यह बढ़ोतरी इकॉनमी और रोज़गार में भी दिख रही है। टूरिज्म नेशनल ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट में 5.22 परसेंट का योगदान देता है।

साल 2023-24 में, इस सेक्टर ने 8.46 करोड़ नौकरियों को सपोर्ट किया। 2025 में, घरेलू टूरिस्ट विज़िट 428.55 करोड़, विदेशी टूरिस्ट विज़िट 2.53 करोड़ और टूरिज्म से विदेशी मुद्रा की कमाई 2,76,831 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इन आंकड़ों के पीछे गाइड, टैक्सी ड्राइवर, कारीगर, बुनकर, लोक कलाकार, ढाबे, छोटे होटल और होमस्टे चलाने वाले लाखों परिवार हैं। इसलिए, टूरिज्म डेवलपमेंट का फायदा सीधे आम नागरिक तक पहुंचता है।

टूरिज्म को लंबे समय तक सफल बनाने के लिए, हमें नेचर और लोकल कम्युनिटी का ध्यान रखना होगा। इसीलिए टूरिज्म सस्टेनेबिलिटी में भारत की 7th रैंक खास तौर पर ज़रूरी है। हमारा लक्ष्य सिर्फ़ टूरिस्ट की संख्या बढ़ाना नहीं है। हम चाहते हैं कि टूरिस्ट ज़्यादा समय तक रुकें, लोकल प्रोडक्ट खरीदें, आस-पास की नई जगहें देखें और एक आरामदायक अनुभव के साथ लौटें। टूरिज्म मित्र, टूरिज्म दीदी, रूरल होमस्टे, साफ़-सफ़ाई, वेस्ट मैनेजमेंट और कम्युनिटी की भागीदारी जैसी कोशिशें इसी सोच का हिस्सा हैं।

हालांकि, यह कामयाबी आत्मसंतुष्टि का कारण नहीं हो सकती। हमें अच्छे होटल, ट्रेंड गाइड, आसान एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी और बेहतर डेस्टिनेशन मैनेजमेंट पर और काम करना होगा। AI और डिजिटल टेक्नोलॉजी को यात्राओं को आसान और पर्सनलाइज़्ड बनाना होगा। कम पॉपुलर साइट्स को भी ऐसा बनाना होगा कि टूरिस्ट उन्हें आसानी से ढूंढ सकें, बुक कर सकें और वहां सुरक्षित अनुभव कर सकें। TTDI की 31st रैंक कोई डेस्टिनेशन नहीं, बल्कि सही दिशा का सबूत है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, टूरिज्म भारत की वाइब्रेंट सभ्यता को दुनिया से जोड़ने और हर सेक्टर में रोज़गार पैदा करने में एक बड़ी ताकत बन रहा है।