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ग्रेट निकोबार: भारत की समुद्री रणनीति का प्रमुख केंद्र : एडमिरल डी. के. जोशी

“जो राज्य अपनी सीमाओं, साझेदारियों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।”

– कौटिल्य

कौटिल्य की यह सीख सदियों पहले ही शासन और रणनीति की मूल सोच का हिस्सा बन चुकी थी, और आज के समय में यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक होकर सामने आई है। आज देशों की परीक्षा केवल उनकी अर्थव्यवस्था के आकार या सैन्य ताकत से नहीं हो रही, बल्कि इस बात से हो रही है कि वे भूगोल को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, भविष्य का कितना सही अनुमान लगाते हैं और अवसर के खतरे में बदलने से पहले कितनी तेजी से निर्णय लेते हैं। ग्रेट निकोबार भारत के लिए ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा है।

यह भारतीय मानचित्र के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित एक दूरस्थ द्वीप जैसा प्रतीत होता है। ऐसी जगह जिसे दशकों से लगभग अछूता छोड़ दिया गया है और जिसे वैसे ही रहने देना चाहिए। परंतु ग्रेट निकोबार भारत की अग्रिम समुद्री चौकी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के समीप स्थित यह द्वीप दुनिया की ओर भारत की सबसे अहम सामरिक अवसर में से एक है। 

अत: ग्रेट निकोबार के प्रस्तावित विकास को केवल एक अवसंरचना परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह केवल एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप या बिजली संयंत्र बनाने का प्रश्‍न नहीं है। यह वास्तव में इस बात की सामरिक परीक्षा है कि क्या भारत अपनी इस दुर्लभ भौगोलिक बढ़त को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने के लिए तैयार है।

सदियों से हिंद महासागर ने भारत की नियति को आकार दिया है। इसी समुद्री क्षेत्र ने हमारे व्यापार, हमारे विचारों और हमारे  सभ्यतागत प्रभाव को विश्‍व भर में पहुंचाया, परन्‍तु कई बार यही हमारी कमजोरियों का कारण भी बना। तथापि, स्वतंत्रता के पश्‍चात् लंबे समय तक भारत की सामरिक सोच मुख्य रूप से स्‍थल-आधारित रही।

यह निर्विवाद है कि ग्रेट निकोबार अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थान है। यह अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किलोमीटर है, जो सम्‍पूर्ण द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग 2 प्रतिशत है। इसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को परियोजना के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है, जो द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 प्रतिशत है।

यह दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित है तथा मलक्का स्‍ट्रेट, 60 चैनल, सुंडा स्‍ट्रेट और लोम्बोक स्‍ट्रेट जैसे प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों के समीप आता है। वास्तविक सामरिक दृष्टि से देखें तो यह भारत की पूर्वी समुद्री चौकी है।

इसका महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे केवल भूभाग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि महासागरीय रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए। कल्पना कीजिए उन जहाजों की, जो अदन की खाड़ी से मलक्का स्‍ट्रेट की ओर बढ़ रहे हैं, ऊर्जा से भरे मालवाहक जहाज, जो पश्चिम एशिया और अफ्रीका से पूर्वी एशिया की ओर जा रहे हैं, एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला कंटेनर यातायात तथा नौसैनिक संसाधन, निगरानी मंच और लॉजिस्टिक श्रृंखलाएँ, जो इन जलमार्गों से होकर गुजर रही हैं।

हिंद महासागर अब शांत समुद्र नहीं रहा। यह तेजी से एक भीड़भाड़ वाले सामरिक क्षेत्र में बदल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, कंटेनर यातायात, नौसैनिक तैनाती, द्वीपीय सुविधाएं, समुद्र के नीचे बिछी केबलें और समुद्री निगरानी अब एक बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुकी हैं। यह शायद मुख्य भूमि पर बैठे कई लोगों को दिखाई न दे, परन्‍तु देशों के भविष्य के लिए यह बेहद निर्णायक है।

हाल की एक महत्वपूर्ण प्रगति यह है कि अंडमान सागर को थाईलैंड की खाड़ी से जोड़ने वाली दशकों पुरानी कैनल परियोजना को स्थगित कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब लगभग 90 किलोमीटर लंबे मल्टी-मोडल लैंड ब्रिज की योजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। यह परियोजना टेंथ पैरेलल के साथ दो नव-डिज़ाइन किए गए गहरे समुद्री बंदरगाहों को जोड़ेगी — एक अंडमान सागर के किनारे रणोंग में और दूसरा थाईलैंड की खाड़ी के किनारे चुम्फोन में। इसके साथ दोहरी ट्रैक्‍स वाली उच्च गति रेल, बहु-लेन सड़क, तेल एवं गैस के लिए ऊर्जा पाइपलाइनें तथा वायु एवं डिजिटल ग्रिड भी प्रस्तावित हैं। ये सभी कारक मिलकर इंडो-पैसिफिक व्यापार मार्गों को पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और आर्थिक शक्ति का केंद्र सीधे अंडमान बेसिन की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।

मलक्का स्‍ट्रेट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक चोकपॉइंट्स में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और अत्यंत मूल्यवान ऊर्जा संसाधनों (तेल और एलएनजी) तथा वैश्विक व्यापार का प्रमुख मार्ग है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी 60 चैनल से लगभग 45 किलोमीटर दूर है, जो मलक्का स्‍ट्रेट को अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों से जोड़ती है। अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख जहाज मलक्का स्‍ट्रेट 60 चैनल मार्ग से गुजरते हैं।

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे सामरिक चोकपॉइंट्स के निकट स्थित होने के कारण यह द्वीप भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है। कोई भी गंभीर सामुद्रिक शक्ति ऐसे भौगोलिक तथ्यों की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती। 

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अनेक शक्तिशाली देश बंदरगाहों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं, समुद्री पहुँच सुविधाओं, नौसैनिक संसाधनों, निगरानी प्रणालियों और आर्थिक गलियारों के माध्यम से निरंतर अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहे हैं।

भारत का उत्तर संकोचपूर्ण नहीं हो सकता। उसका उत्तर सामरिक सुदृढ़ीकरण होना चाहिए। संप्रभुता केवल मानचित्र पर सीमाएँ खींच देने से सुदृढ़ नहीं होती। वह तब सशक्त होती है जब कोई भूभाग जुड़ा हुआ, आबाद, सुविधायुक्त, उत्पादक और सामरिक रूप से उपयोगी बनता है। अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, टाउनशिप और विद्युत संयंत्र अलग-अलग परियोजनाएँ नहीं हैं। ये सभी मिलकर उस पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का निर्माण करते हैं, जिसकी सहायता से भारत एक निर्णायक सामुद्रिक स्थान पर विश्वसनीय, सतत और बहुआयामी उपस्थिति बनाए रख सकता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समुचित जांच-पड़ताल और आपत्तियों के निस्तारण के बाद यह स्वीकार किया कि यह परियोजना केवल द्वीप और उसके आसपास के सामरिक क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सिंगापुर केवल इसलिए एक महान सामुद्रिक केंद्र नहीं बना क्योंकि उसका भौगोलिक स्थान अनुकूल था। उसने उस स्थान के आस-पास आवश्यक क्षमताओं का निर्माण किया। भौगोलिक स्थिति ने उसे अवसर दिया, और उसके अवसंरचनात्मक विकास ने उस अवसर को प्रभाव में परिवर्तित किया। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कोई दूरस्थ द्वीप भी, यदि उसे लॉजिस्टिक और परिचालन अवसंरचना से सुसज्जित किया जाए, तो असाधारण सामरिक महत्व प्राप्त कर सकता है। सामुद्रिक शक्ति केवल भूगोल से नहीं बनती; वह भूगोल का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता विकसित करने से निर्मित होती है।

ग्रेट निकोबार भारत को यह सब एक संतुलित और विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण के साथ करने का अवसर प्रदान करता है। यह व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है, विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम कर सकता है, साथ ही भारत की सामुद्रिक पहुँच को विस्तारित कर सकता है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार और व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक सामरिक मंच के रूप में कार्य कर सकता है। ग्रेट निकोबार में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के उस सामग्री पर निर्भरता को कम कर सकता है जिसे वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिप किया जाता है। इससे सप्लाई चेन सुदृढ होगी, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और भारत को अपने सामग्री की आवाजाही पर अधिक नियंत्रण और निश्चितता प्राप्त होगी।

निस्संदेह, ग्रेट निकोबार पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस स्तर की किसी भी परियोजना को पारिस्थितिक सावधानी, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक निगरानी और वास्तविक शमन उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए। विकास लापरवाह नहीं हो सकता। लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सामरिक चिंतन पर स्थायी वीटो का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। वास्तविक चुनौती पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच चयन करने की नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ाया जाए।

वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सामरिक द्वीप का उत्तरदायित्‍व पूर्वक विकास करना चाहता है, अथवा फिर ऐसे समय में जब पूरा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पुनर्गठित हो रहा है, वह इस द्वीप को अविकसित और अपर्याप्त रूप से जुड़ा हुआ छोड़ देगा।

भारत एक कॉन्टिनेंटल और सामुद्रिक — दोनों प्रकार की शक्ति है। लंबे समय तक स्थलीय सोच ने सामुद्रिक दृष्टिकोण पर हावी रहा है। अत: ग्रेट निकोबार परियोजना कोई विलासिता नहीं, बल्कि सामरिक दूरदृष्टि का प्रतीक है। किसी राष्ट्र की नियति केवल उन खतरों से निर्धारित नहीं होती जिनका वह सामना करता है, बल्कि उन अवसरों से भी तय होती है जिन्हें वह समय रहते पहचान लेता है। ग्रेट निकोबार ऐसा ही एक अवसर है। इसकी उपेक्षा करना भूगोल की उस सामरिक शक्ति को अनुपयोगी छोड़ देना होगा, जिसे बाद में अन्य शक्तियाँ अपने अनुसार आकार दे सकती हैं। वहीं, इसका विवेकपूर्ण विकास भूगोल को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

भारत को सामरिक दृष्टि से सोचने के लिए किसी से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल  उत्तरदायित्‍व पूर्वक, निर्णायक रूप से और स्पष्ट राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है। इंडो-पैसिफिक की इस शताब्दी में, ग्रेट निकोबार भारत का अंतिम छोर नहीं है, यह भविष्य के प्रवेश द्वार पर स्थित भारत का वॉचटावर है।

(लेखक वर्तमान में अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल तथा द्वीप विकास एजेंसी के उपाध्यक्ष हैं। वे भारतीय नौसेना के पूर्व नौसेना प्रमुख (Chief of the Naval Staff) रह चुके हैं और वर्ष 2009-10 के दौरान अंडमान तथा निकोबार कमान (A&N Command) के कमांडर-इन-चीफ भी रहे हैं।)

पीएम स्वनिधि योजना: स्ट्रीट वेंडर्स के एम्पावरमेंट और फाइनेंशियल इनक्लूजन के लिए एक ट्रांसफॉर्मेटिव टूलम

मनोहर लाल / विद्युत मंत्री

भारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2050 तक देश की लगभग 50% आबादी शहरी इलाकों में रहेगी। अभी, लगभग 66% शहरी वर्कफ़ोर्स इनफ़ॉर्मल सेक्टर में शामिल है, जो शहरी अर्थव्यवस्था का एक अहम पिलर है। इस इनफ़ॉर्मल सेक्टर में स्ट्रीट वेंडर्स की भूमिका खास तौर पर खास है। ये लाखों वेंडर्स जो फल, सब्ज़ी, चाय, नाश्ता, कपड़े और रोज़ाना की दूसरी ज़रूरतें देते हैं, न सिर्फ़ करोड़ों नागरिकों की ज़िंदगी आसान बनाते हैं, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत करते हैं। इसके बावजूद, फ़ॉर्मल बैंकिंग और क्रेडिट तक उनकी पहुँच लंबे समय तक सीमित रही। क्रेडिट हिस्ट्री न होने की वजह से, उन्हें अक्सर ज़्यादा ब्याज़ दरों पर इनफ़ॉर्मल लोन लेना पड़ता था, जिससे उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लोन चुकाने में खर्च हो जाता था।

भारतीय स्ट्रीट वेंडर्स बदलते ग्लोबल हालात और अलग-अलग आर्थिक रुकावटों के बीच भी अपनी हिम्मत और मज़बूती के लिए जाने जाते हैं। PM SWANIDHI ने इस एंटरप्रेन्योरशिप की भावना को नई एनर्जी दी है। यह सिर्फ़ क्रेडिट देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सम्मान, पहचान और नए मौकों का एक मज़बूत ज़रिया बन गया है।

इस स्कीम की सफलता का मुख्य आधार “होल ऑफ़ गवर्नमेंट अप्रोच” रहा है, जिसमें केंद्र, राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों और बैंकिंग संस्थानों के मिलकर किए गए प्रयासों ने इसे पूरे देश में अभूतपूर्व तरीके से आगे बढ़ाया है और शानदार नतीजे हासिल किए हैं।

इस स्कीम के तहत, लाखों वेंडर्स के बैंक अकाउंट एक्टिवेट किए गए, उनके फाइनेंशियल व्यवहार को रिकॉर्ड किया जाने लगा और पहली बार, उनके लिए एक फॉर्मल क्रेडिट हिस्ट्री बनाई गई। इससे उन्हें भविष्य में ज़्यादा लोन और फाइनेंशियल सर्विस मिलना आसान हो गया है और वे आज बैंक के सम्मानित ग्राहक और उद्यमी बनकर उभरे हैं।

इस स्कीम का एक और ज़रूरी पहलू डिजिटल एम्पावरमेंट है। UPI और QR-कोड आधारित पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कैशबैक इंसेंटिव दिए गए हैं। इस पहल ने अब तक 55 लाख वेंडर्स को डिजिटल इकॉनमी से जोड़ा है, उनके लेन-देन को ट्रांसपेरेंट बनाया है और उनकी फाइनेंशियल क्रेडिबिलिटी को मज़बूत किया है। स्कीम का विज़न सिर्फ़ बिज़नेस तक ही सीमित नहीं रहा है। ‘स्वनिधि से समृद्धि’ पहल के ज़रिए, बेनिफिशियरीज़ और उनके परिवारों को भारत सरकार की आठ बड़ी वेलफेयर स्कीम्स से जोड़ा गया है। अब तक इन स्कीम के तहत 50 लाख से ज़्यादा स्ट्रीट वेंडर्स की प्रोफाइलिंग की जा चुकी है और 1.52 करोड़ से ज़्यादा लोगों को फ़ायदे दिए जा चुके हैं। पेंशन, इंश्योरेंस, हेल्थ सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी जैसी सुविधाओं तक पहुँच देकर, यह पहल स्ट्रीट वेंडर्स और उनके परिवारों के लिए एक बड़े सोशल सिक्योरिटी सिस्टम का ज़रिया बन गई है। इसके अलावा, FSSAI के साथ मिलकर फ़ूड सेफ्टी और हाइजीन पर ट्रेनिंग भी दी गई है, जिससे खास तौर पर स्ट्रीट फ़ूड वेंडर्स की क्वालिटी, हाइजीन और कस्टमर का भरोसा बढ़ा है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी इस स्कीम का योगदान काफ़ी सराहनीय रहा है। कुल बेनिफिशियरीज़ में से लगभग 46% महिलाएँ हैं। इससे उनकी इनकम, सामाजिक इज़्ज़त और परिवार के फ़ैसलों में हिस्सेदारी बढ़ी है। साल 2023 और 2025 में किए गए इंडिपेंडेंट इम्पैक्ट असेसमेंट ने भी इस स्कीम के दूरगामी असर की पुष्टि की है। लगभग 95% बेनिफिशियरीज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार फ़ॉर्मल फ़ाइनेंशियल सिस्टम से लोन लिया है, जो फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इतना ही नहीं, लगभग 30% बेनिफिशियरी PM SWANIDHI से आगे बढ़कर दूसरे फॉर्मल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से लोन भी ले पाए हैं, जो उनके बढ़ते फाइनेंशियल कॉन्फिडेंस और मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल का सबूत है। इस स्कीम के बेनिफिशियरी की इनकम में सालाना लगभग 20% की एवरेज ग्रोथ दर्ज की गई है। इसके साथ ही, हाउसिंग, न्यूट्रिशन, हेल्थकेयर और बच्चों की एजुकेशन जैसे एरिया में भी सुधार देखा गया है। 2023 और 2025 के बीच UPI बेस्ड ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल लगभग 45% से बढ़कर 83% हो गया है। स्कीम के बड़े पैमाने पर और पॉजिटिव असर को देखते हुए, अगस्त 2025 में, केंद्रीय मंत्रालय ने इसके रीस्ट्रक्चर्ड फॉर्म को मार्च 2030 तक बढ़ाने की मंजूरी दी। रीस्ट्रक्चर्ड स्कीम के तहत, स्ट्रीट वेंडर्स की क्रेडिट लिमिट बढ़ा दी गई है और स्कीम का दायरा अर्बन लोकल बॉडीज से आगे बढ़ाकर सेंसस टाउन्स/पेरी अर्बन तक कर दिया गया है। इसके साथ ही, कैपेसिटी बिल्डिंग पर खास जोर दिया जा रहा है ताकि स्ट्रीट वेंडर्स बदलती इकोनॉमिक जरूरतों के हिसाब से अपने बिजनेस को और मजबूत कर सकें। SWANIDHI क्रेडिट कार्ड की शुरुआत भी इसी कड़ी में एक अहम कदम है। यह सुविधा स्ट्रीट वेंडर्स को उनकी तुरंत की फाइनेंशियल और पर्सनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शॉर्ट-टर्म बिना ब्याज का क्रेडिट देती है। हालांकि PM SWANIDHI योजना ने स्ट्रीट वेंडर्स को फाइनेंशियल ताकत दी है, लेकिन आज कई जगहों पर उन्हें शहर की प्लानिंग के स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं माना जाता है। उन्हें प्लान्ड वेंडिंग जगहों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कोई तय जगह न होने की वजह से उनकी रोजी-रोटी और ग्राहकों तक पहुंच पर असर पड़ता है। इस चुनौती से निपटने के लिए, आने वाले सालों में राज्य सरकारों और शहरी लोकल बॉडीज़ को स्ट्रीट वेंडर्स को शहरी प्लानिंग के फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस दिशा में एक छोटी सी पहल – स्ट्रीट फूड हब के ज़रिए, उन्हें सुविधाजनक और ऑर्गनाइज़्ड कमर्शियल जगहें उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे

भारत और ओमान द्वारा एक नए आर्थिक गलियारे को गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और ओमान के बीच वाणिज्यिक रिश्ते सदियों से चलते आ रहे हैं। दोनों देशों का एक साझा इतिहास प्राचीन नावों के पाल पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा है और पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए कायम रहा है। भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) इस सभ्यतागत बंधन को और मजबूत करता है। एक ऐसे दौर में जब वैश्विक व्यापार भू-राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद से जूझ रहा है, यह समझौता भरोसेमंद साझेदारों के साथ आर्थिक जुड़ाव को गहरा करने के भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। वर्ष 2022 में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद, यह सीईपीए खाड़ी देशों के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को मजबूती से स्थापित करता है। 

द्विपक्षीय व्यापार में लगातार विस्तार हुआ है और वित्त वर्ष 2025-26 में यह 11.18 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। जबकि, सेवाओं का व्यापार 2024 में 863 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। आर्थिक रिश्तों का विविधीकरण हुआ है और इसमें परंपरागत वस्तुओं से परे इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का समावेश हुआ है। फिर भी, काफी अनछुई संभावनाएं अभी भी बाकी हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार, निवेश, पेशेवर आवाजाही और नियामकीय सहयोग को शामिल करके, यह सीईपीए अधिक सुदृढ़, समन्वित और व्यापक आर्थिक साझेदारी का एक व्यापक ढांचा तैयार करता है।

भारतीय निर्यात के विकास का प्रवेश द्वार

इस सीईपीए के तहत ओमान की 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच हासिल है। इस समझौते से पहले, भारत के निर्यात का सिर्फ लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ही सर्वाधिक तरजीह वाले देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन) की व्यवस्था के तहत ओमान में शुल्क-मुक्त प्रवेश करता था, जबकि शेष पर 5 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था। इस सीईपीए के तहत, भारत के वर्तमान निर्यात की 99.38 प्रतिशत मात्रा अब शुल्क-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाएगी।

भारतीय निर्यातकों की दृष्टि से, ये लाभ काफी महत्वपूर्ण हैं। ओमान के ‘विजन 2040’ के तहत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक विविधीकरण में उसके द्वारा किए जा रहे निवेश से मांग में वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में 875.83 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात के 2030 तक बढ़कर 1.3 से 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होने का अनुमान है। शून्य शुल्क की सुविधा के जरिए वस्त्र एवं परिधान सेक्टर को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी। इससे तिरुपुर, सूरत, लुधियाना और कोयंबटूर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी और साथ ही रोजगार भी सृजित होगा।

मौके व्यापक और विविध हैं। आयात पर निर्भर ओमान का दवा बाजार भारतीय कंपनियों के लिए मजबूत संभावनाएं पेश करता है। नियामकीय मंजूरियों में तेजी, गुणवत्ता प्रमाणपत्रों की मान्यता और प्रमुख उत्पादों के शुल्क-मुक्त पहुंच से अनुपालन संबंधी लागत में कमी आएगी और बाजार में पैठ बढ़ेगी। चावल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मसाले और कन्फेक्शनरी सहित कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण आधारित निर्यात को भी लाभ होगा।

खुलते बाजार, हितों का संरक्षण

भारत के हालिया व्यापार समझौतों के अनुरूप, इस सीईपीए में एक संतुलित और सुविचारित दृष्टिकोण का समावेश है। जहां एक ओर भारत प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने एवं वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में शामिल होने के लिए बाजारों को खोल रहा है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहा है। दुग्ध तथा अनाज जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के साथ-साथ रबर, वस्त्र और जूते जैसे उद्योग सुरक्षित बने हुए हैं। यह दृष्टिकोण बाहरी बाजारों तक पहुंच  और घरेलू कमजोरियों से बचाव को एक साथ जोड़ता है।

भारत ने ओमान से आयात होने वाले लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों पर लागू होने वाली अपनी 77 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों को उदार बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इससे ओमान के प्रमुख निर्यातों, खासकर मेथनॉल और निर्जल अमोनिया जैसे औद्योगिक इनपुट को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। ओमान को धातुओं और मिश्र धातुओं की एक विस्तृत श्रृंखला में तरजीही बाजार पहुंच हासिल होगी। इससे हमारे दोनों देशों को कम उत्पादन लागत का लाभ उठाने में मदद मिलेगी।

जिन क्षेत्रों में भारत के रक्षात्मक हित हैं, उन क्षेत्रों में टैरिफ दर कोटा (टीआरक्यू) के जरिए  ओमान को पहुंच प्रदान की गई है। यह व्यवस्था निर्दिष्ट मात्रा की सीमा के भीतर खजूर, संगमरमर और चुनिंदा पेट्रोकेमिकल जैसे उत्पादों के तरजीही निर्यात की अनुमति देती है। बेहद सावधानीपूर्वक तैयार किया गया जुड़ाव का यह तरीका प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ-साथ संक्रमण काल ​​के दौरान कमजोर क्षेत्रों को सहायता भी प्रदान करता है।

व्यापार, प्रतिभा और विश्वास

यह सीईपीए भारतीय सेवा प्रदाताओं को उन सभी क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं प्रदान करता है, जहां भारत की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत है। इनमें आईटी, पेशेवर सेवाएं और निर्माण क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न क्षेत्रों में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने वाले प्रावधानों के साथ, भारतीय कंपनियों को ओमान में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने के अधिक मौके मिलेंगे।

प्रतिभाओं की दृष्टि से भी, यह समझौता एक बड़ी उपलब्धि है। कंपनी के भीतर स्थानांतरित कर्मचारियों (इंट्रा-कॉरपोरेट ट्रांसफरी) की सीमा को 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर, भारतीय कंपनियों को अब विशिष्टता प्राप्त कर्मचारियों को आसानी से तैनात करने तथा बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति को और अधिक मजबूत करने की सुविधा मिल गई है। इसके अलावा, किसी भी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में पहली बार, ओमान ने स्वतंत्र पेशेवरों के लिए एक समर्पित आवाजाही की व्यवस्था स्थापित की है। अब जबकि वैश्विक स्तर पर जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण कारखानों में श्रमिकों की कमी हो रही है और आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर एआई एवं रोबोटिक्स के साथ जुड़ रहा है, ऐसे में यह प्रावधान भारतीय प्रतिभाओं के लिए दुनिया भर में एक सशक्त मिसाल कायम करता है।

इस सीईपीए में समर्पित स्वास्थ्य सेवा का एक परिशिष्ट भी शामिल है, जो आयुर्वेद जैसी पारंपरिक प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में शामिल करने में सुविधा प्रदान करता है। साथ ही, यह चिकित्सा पेशेवरों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को भी सुव्यवस्थित करता है। इसके अलावा, एक अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा समझौते से संबंधित बातचीत से भविष्य में भारतीय प्रवासी समुदाय को दोहरे योगदान के बोझ से बचाया जा सकेगा।

क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण

भारत-ओमान सीईपीए नियामकीय सहयोग, सामंजस्यपूर्ण मानकों और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाओं के जरिए गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करके टैरिफ से परे जाता है। यह भारत के आधुनिक व्यापार समझौतों से जुड़े उच्च मानकों को दर्शाता है और सीमा के भीतर मौजूद वाणिज्य में रुकावट डालने वाली विभिन्न बाधाओं को दूर करता है।

भारत एक बेहद ही एकीकृत क्षेत्रीय व्यापार संरचना की नींव रख रहा है। भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से जुड़े सभी साझेदार मिलकर अब वैश्विक जीडीपी का लगभग 67 प्रतिशत और वस्तुओं एवं सेवाओं के वैश्विक आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हैं। खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के मिलन बिंदु पर स्थित, ओमान को एक अनूठी भौगोलिक हैसियत हासिल है। सोहार, दुक्म और सलालाह जैसे ओमान के लॉजिस्टिक्स व औद्योगिक केन्द्र भारत की मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी विशेषज्ञता एवं प्रतिभाओं को व्यापक मध्य पूर्व और अफ्रीका के साथ जोड़कर मूल्य श्रृंखलाओं को एकीकृत कर सकते हैं। इसका परिणाम क्षेत्रीय संपर्क और विकास के लिए निर्मित एक साझेदारी के रूप में सामने होगा।

व्यापार समझौते तभी सफल होते हैं जब वे भरोसा पैदा करते हैं, व्यवसायों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, श्रमिकों को नए कौशल हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं और अर्थव्यवस्थाओं को स्थायी साझेदारी बनाने के लिए आगे बढ़ाते हैं। यह सीईपीए ठीक यही काम कर रहा है। यह सदियों पुराने रिश्ते को इक्कीसवीं सदी की हकीकतों के अनुरूप एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी में परिवर्तित कर रहा है।  

भारत ने श्रमिकों, किसानों, MSME के लिए खाड़ी देश में अवसरों के द्वार खोले

दिल्ली / सत्ता संदेश

1 जून से लागू हो रहा भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस मिशन की एक निर्णायक उपलब्धि है, जिसका लक्ष्य नए बाजार खोलने और रोजगार सृजन को गति देने के जरिये भारत के छात्रों, कारीगरों, महिलाओं, किसानों, मछुआरों और एमएसएमई के लिए वैश्विक समृद्धि के मार्ग बनाना है।         

भारत और ओमान के बीच गहरे आर्थिक संबंध हैं और लोगों के आपसी संबंध प्रगाढ़ हैं। ओमान में लगभग 7 लाख भारतीय रहते हैं, जिनमें वे व्यापारी परिवार भी शामिल हैं, जिनकी जड़ें 200–300 साल पुरानी हैं। ओमान से भारत को भेजी जाने वाली वार्षिक धनराशि लगभग 2 बिलियन डॉलर है, जबकि देश में 6,000 से अधिक भारतीय उद्यम कार्यरत हैं। 

दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण रूप से सुदृढ़ करता है। यह तुरंत ही ओमान में 98% टैरिफ लाइनों के लिए 100 प्रतिशत शुल्क मुक्त बाजार पहुंच की सुविधा देता है, जिसमें 99.38 प्रतिशत निर्यात शामिल है।

यह सीईपीए से पहले की प्रणाली की तुलना में एक उल्लेखनीय सुधार को दर्शाता है। पहले की प्रणाली में केवल 15.3 प्रतिशत भारतीय निर्यात ओमान में शून्य शुल्क के साथ प्रवेश कर सकते थे। भारत की ऐसी वस्तुएं, जिन पर वर्तमान में ओमान में 5 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है और जिनकी कीमत लगभग 3.64 बिलियन डॉलर के निर्यात के बराबर है, अब काफी अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी।

भारत के एमएसएमई क्षेत्र के लिए, यह समझौता परिवर्तनकारी हो सकता है, क्योंकि सीईपीए से लाभान्वित होने वाले कई क्षेत्रों में छोटे व्यवसायों की प्रमुखता है। लोहा और इस्पात, वस्त्र, चमड़ा, वाहन कल-पुर्जे और औद्योगिक उपकरण जैसे कुछ क्षेत्रों में एमएसएमई को बड़े अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिससे उत्पादन, निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

बढ़ती वैश्विक अस्थिरता के युग में, सीईपीए भारतीय निर्यातकों को, जो आर्थिक मंदी और बढ़ते व्यापार बाधाओं का सामना कर रहे हैं, अपने बाजारों को विविध बनाने और परंपरागत बाजारों पर निर्भरता कम करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

रोज़गार सृजन – यह व्यापार समझौता श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, खाद्य प्रसंस्करण, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण और कुछ इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लाभ पहुँचाता है, जो भारत के प्रमुख रोजगार प्रदाता हैं।

ओमान को होने वाले वस्त्र निर्यात में वृद्धि से उत्पादन में बढ़ोतरी होगी और तिरुपुर, सूरत, लुधियाना, पानीपत, कोयंबटूर, करूर, भदोही, मुरादाबाद, जयपुर और अहमदाबाद जैसे प्रमुख क्लस्टर में रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। भारत भर के कारीगर और बुनकर भी अपने उत्पादों की उच्च अंतरराष्ट्रीय मांग से लाभान्वित होंगे।

भारत भर में, विशेष रूप से तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में, साथ ही महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों समेत चमड़ा और जूता के प्रमुख केंद्रों में भी रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

रत्न और आभूषण क्षेत्र एक अन्य उदाहरण है, जो दिखाता है कि सीईपीए रोजगार वृद्धि को किस प्रकार तेज करेगा। भारत के पास पहले से ही कटे और पॉलिश किए हुए हीरे, सोने और चांदी के आभूषण तथा हस्तनिर्मित आभूषण उत्पादन में मजबूत क्षमताएं हैं। शुल्क बाधाओं के हटने से, भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय और एशियाई प्रतिस्पर्धियों पर निर्णायक बढ़त मिलेगी। उद्योग जगत का अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में ओमान को होने वाला निर्यात बढ़ कर 150 मिलियन डॉलर तक हो सकता है। इससे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के आभूषण निर्माण केन्द्रों में महत्वपूर्ण रोजगार संभावनाएं सृजित होने की उम्मीद है।

किसान और मछुआरे – घरेलू किसानों और संवेदनशील कृषि हितों की सुरक्षा के लिए, भारत ने गेहूं, चावल, मक्का, मोटे अनाज, डेयरी, फल, सब्जियां, खाद्य तेल, तिलहन, चाय, कॉफी और शहद जैसे प्रमुख उत्पादों पर कोई टैरीफ छूट नहीं दी है।

घी, शहद, मीठे बिस्कुट, अंडे और कुछ मिष्ठान्न उत्पादों में भारत को प्रतिद्वंद्वियों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा, जिससे देश के कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी और ग्रामीण आय में वृद्धि होगी।

यह समझौता भारत के राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) प्रमाणन की स्वीकृति और मान्यता भी प्रदान करता है, जो भारतीय किसानों को ओमान में, जो एक प्रमुख खाद्य आयातक है, जैविक उत्पाद बेचने के लिए विशाल अवसर देगा।

समुद्री उत्पादों में भी विशाल संभावनाएँ हैं, जिनका अब तक उपयोग नहीं हो पाया है। 2022 और 2024 के बीच ओमान का समुद्री उत्पादों का आयात लगभग 119 मिलियन डॉलर था। भारत से आयात केवल 7.75 मिलियन डॉलर था, जिससे भारतीय समुद्री खाद्य निर्यात जैसे झींगा और जमे हुए कटलफिश के लिए विशाल अवसर मौजूद हैं। श्रम-गहन समुद्री उत्पाद उद्योग मछली पकड़ने, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, शीत-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स और निर्यात संचालन में अतिरिक्त नौकरियाँ उत्पन्न कर सकता है।  

दवा और पारंपरिक चिकित्सा – यूएसएफडीए, ईएमए, यूके एमएचआरए और टीजीए जैसे नियामकों द्वारा अनुमोदित भारतीय दवाएं 90 दिनों के भीतर ओमान में स्वचालित विपणन प्राधिकार प्राप्त करेंगी — जो भारतीय फार्मा निर्यातकों के लिए एक बड़ी सफलता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि सीईपीए भारत की पारंपरिक चिकित्सा सेवाओं के लिए अवसर पैदा करता है। यह पारंपरिक चिकित्सा में संयुक्त अनुसंधान की व्यवस्था करता है।  

सेवाएँ और आवागमन – समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू सेवा और आवागमन में निहित है। ओमान ने भारत के लिए विशिष्ट निर्यात क्षेत्रों में व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की है, जिनमें पेशेवर सेवाएँ, कंप्यूटर और आईटी सेवाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन, अनुसंधान और विकास तथा पर्यावरण सेवाएँ शामिल हैं। लेखा, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, निर्माण, शिक्षा और परामर्श जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवरों को बेहतर बाज़ार पहुँच से लाभ मिलने की उम्मीद है।  

महत्त्वपूर्ण रूप से, ओमान ने भारतीय पेशेवरों और श्रमिकों के लिए आवागमन प्रतिबद्धताओं में वृद्धि पर सहमति व्यक्त की है। अंतर-कॉर्पोरेट स्थानांतरित कर्मियों और संविदा सेवा प्रदाताओं को चार साल तक रहने की अनुमति दी जाएगी, जबकि व्यवसाय आगंतुकों और स्वतंत्र पेशेवरों को आसान अस्थायी प्रवेश की सुविधा मिलेगी। इसने अंतर-कॉर्पोरेट स्थानांतरित कर्मियों के लिए ऊपरी-सीमा को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है।

विकसित देशों के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की मोदी सरकार की पहल  प्रत्येक भारतीय के जीवन को बेहतर बनाने के प्रधानमंत्री के मिशन का हिस्सा है।

ओमान के साथ समझौता याद दिलाता है कि व्यापार; विकास, रोजगार सृजन और साझा समृद्धि का एक शक्तिशाली उपकरण है। एक विभाजित और संरक्षणवादी दुनिया में, पीएम मोदी स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि एक नया, आत्मविश्वासी भारत पीछे नहीं हटेगा। यह साझेदारियों, प्रतिस्पर्धा और वैश्विक सहभागिता के माध्यम से आगे बढ़ेगा।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं।)

माझे की सुरीली बेटीमोहिनी रसीला

गुरभजन सिंह गिल
चेयरमैन
पंजाबी लोक विरासत अकादमी
लुधियाना

पिछले वर्ष मोहिनी रसीला हमें सदा के लिए छोड़कर चली गईं। उनकी स्मृति में आज उनके परिवार द्वारा कलानौर के निकट गांव खुशिपुर (गुरदासपुर) में पहला “मोहिनी रसीला स्मारक मेला” आयोजित किया गया। इसमें माझे के लगभग सभी प्रमुख गायक शामिल हुए। मोहिनी रसीला पर राजपाल सिंह बाठ द्वारा संपादित पुस्तक “सुरों की नज़्म” का इस अवसर पर गुरमीत सिंह बाजवा ने गणमान्य अतिथियों से लोकार्पण करवाया। यह एक शुभ कार्य है। स्मरण के लिए पुस्तक से बड़ा कोई साधन नहीं। रछपाल रसीला इस प्रयास के लिए बधाई के पात्र हैं।

अब मुझसे पूछो—मोहिनी रसीला कौन थीं?

रावी नदी के इस पार और उस पार शब्द, सुर, संगीत और प्रतिभा की भरपूर फसल उगती है। 1947 से पहले जब वतन एक था, तब नदी के दोनों ओर के गवैये अक्सर आते-जाते रहते थे। अधिकतर गायक पुरुष होते थे। महिलाएँ भी गाती थीं, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर ही—तिंझण में चरखा कातते समय या विवाह-शादियों में। लंबे हेक वाले गीतों का बोलबाला था। बचपन में मैंने अपनी तायाजी की बेटियों, बहन जीतो और बहन वीरो को साथ बैठकर गाते सुना था। बहन वीरो द्वारा बजाई पीतल की गागर आज भी कई बार सपनों में सुनाई देती है।

“घड़ा बजता, घड़ोली बजती
कहीं गागर बजती सुन मुंडिया…”

अब गागर कहीं सुनाई नहीं देती। यह घर के बर्तनों से भी गायब हो गई है और संगीत वाद्यों से भी। कितना सोना रेत में मिलकर मिट्टी हो गया—लोग-संस्कृति के अनेक वाद्य विलुप्त होते जा रहे हैं।

इसी तरह लोक रंग के गायक और लेखक भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं—सोने की डलियों जैसे गायक। ढाढी सोहन सिंह सीतल, जसवंत सिंह चाड़ भट्टी, गुरचरण सिंह गोहलवड़, मूला सिंह पाखरपुरी, कविशर जोगा सिंह जोगी, कुलवंत सिंह बीए, बलदेव सिंह बैंकां और कई अन्य। लोक गायक देविंदर सिंह नबीपुर, अमरजीत गुरदासपुरी, हमारे गांव बसंतकोट के हरदेव सिंह खुशदिल, जसबीर खुशदिल खेलेयां वाला, ज्ञान सिंह कमल, जागीर सिंह तालिब, अमरीक सिंह हरगोबिंदपुरी, लखबीर सिंह लखा भरथ—ये सब जैसे खोए हुए रत्न हैं।

माझे की सुरीली बेटियों में जोगिंदर अरोड़ा, गुरमीत बावा, प्रीति बाला और मोहिनी रसीला भी उस दुनिया में चली गईं, जहाँ से कोई वापस नहीं आता।

अमरजीत गुरदासपुरी अक्सर कहते थे कि माझे की गायकी का रंग-ढंग और मधुरता रावी नदी का पानी पीने के कारण है।

रावी नदी धरती की सुरीली बेटी है। उसके किनारे चलने वाली हवा भी संगीत सा स्वर भरती है। इन्हीं में से रावी की बेटी, सोने की कण जैसी माझे की बेटी थी—मोहिनी रसीला।

किसी “है” को “था” कहना सबसे कठिन कार्य होता है।

गीतकार बाबू सिंह मान द्वारा लिखा और नरेंद्र बीबा द्वारा गाया एक गीत हमेशा यादों में बसता है—

“हाथों छोड़े सजनां नूं,
नाले याद करां नाले रोवां…”

…और इसी प्रकार आगे की पंक्तियाँ विरह, पीड़ा और स्मृतियों का गहरा भाव व्यक्त करती हैं।

उनके जीवनसाथी और मेरे छोटे भाई रछपाल रसीला की मनःस्थिति भी लगभग ऐसी ही है। उन्होंने बताया कि मोहिनी रसीला की याद में एक पुस्तक तैयार करवाई जा रही है। शब्दों का ताजमहल बनाना अच्छे लोगों की सोच का हिस्सा होता है।

रछपाल का गांव मेरे गांव बसंतकोट से मात्र दस किलोमीटर दूर है। पहले साइकिल से यात्रा करते समय ये रास्ते यादों में बसे रहते थे, अब नई सड़कों ने दूरी तो घटा दी है, लेकिन यादों के भीतर रास्ते और गहरे हो गए हैं।

लेखक मित्र राजपाल सिंह बाठ के अनुसार, मोहिनी रसीला का जन्म 28 मई 1961 को माता जसवंत कौर और पिता सरदार रजिंदर सिंह के घर गांव मियांकोट (कलानौर के निकट), जिला गुरदासपुर में हुआ था।

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मियांकोट से, मैट्रिक सरकारी हाई स्कूल कलानौर से और बीए आरआर डीएवी कॉलेज बटाला से की। उनके प्रमाणपत्रों पर उनका नाम कमलजीत कौर दर्ज है।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के इंटर-कॉलेज युवा महोत्सव में उन्होंने दो बार अपने कॉलेज की संगीत टीम का नेतृत्व किया—एक बार विजेता और एक बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया।

फरवरी 1980 में उनका विवाह लोक गायक रछपाल रसीला से हुआ। उनका एक पुत्र रूपिंदर सिंह ऑस्ट्रेलिया में परिवार सहित रहता है।

वे अपने गुरु लाल चंद यमला जट्ट को मानती थीं। उनकी आवाज़ में लोक गीत, दोहे, कथाएँ और धार्मिक गीत शामिल हैं।

मोहिनी रसीला और रछपाल रसीला की लोकप्रियता विदेशों तक पहुँची—इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर आदि देशों में उन्होंने अनेक कार्यक्रम किए।

उनकी रिकॉर्डिंग एचएसवी सोनोटोन, इनरिको, सीटीसी जैसी कंपनियों में हुई। वे आकाशवाणी जालंधर और दूरदर्शन जालंधर की मान्यता प्राप्त कलाकार थीं।

उन्हें कई पुरस्कार मिले—ढाढी अमर सिंह शौकी मेले का पुरस्कार, हाशिम शाह स्मृति पुरस्कार, और लाला चंद यमला जट्ट सम्मान आदि।

मोहिनी रसीला के लोकप्रिय गीतों में लोक गीत, लोक कथाएँ, दोहे और धार्मिक भजन शामिल हैं—जैसे “मैं माझे दी जट्टी”, “गुड्डी ले दे कागजां दी”, “शाहनी कौला”, “सोहनी”, “मिर्ज़ा साहिबां” आदि।

उनकी आवाज़ में “तेरा भाणा मीठा लागे”, “धन बाबा दीप सिंह जी” जैसे धार्मिक गीत भी प्रसिद्ध हैं।

कैंसर जैसी बीमारी ने इस सुरीली गायिका को घेर लिया और 29 मई 2025 को उन्होंने सदा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

माझे की यह बुलंद, सुरीली बेटी हमेशा के लिए चुप हो गई। अब केवल यादें शेष हैं—

“अहो गए सज्जण अहो गए,
लांघ गए दरिया…”

बुद्ध के मुख्य शिष्यों की पवित्र विरासत

अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के अवशेष आज क्यों महत्वपूर्ण हैं?

श्री विवेक अग्रवाल

बुद्ध के दो मुख्य शिष्यों – अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान – के पवित्र अवशेष १ से १० जून तक उलानबटोर के गंदन मठ में प्रदर्शनी के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक विशेष विमान से मंगोलिया ले जाए जाएंगे ।

दो सहस्राब्दियों से अधिक समय से, बौद्ध जगत में अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के नाम अत्यधिक श्रद्धा के केंद्र रहे हैं । गौतम बुद्ध के दो मुख्य शिष्यों के रूप में, वे न केवल बुद्ध के सबसे करीबी आध्यात्मिक साथी थे, बल्कि उनके ज्ञानोदय के बाद धम्म के प्रमुख रक्षक और प्रसारक भी थे ।

बौद्ध परंपरा के अनुसार, सारिपुत्त और महामोग्गल्लान का जन्म वर्तमान नालंदा के पास, मगध क्षेत्र के पड़ोसी गांवों में एक ही दिन हुआ था । सारिपुत्त का जन्म उपतिस्स गांव में हुआ था, जबकि महामोग्गल्लान का जन्म कोलित गांव में हुआ था । बचपन की दोस्ती के बंधन में बंधे इन दोनों जिज्ञासुओं ने अंततः परम सत्य की खोज में एक साथ सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया । उनकी आध्यात्मिक यात्रा बुद्ध के सानिध्य में पूरी हुई, जहाँ वे जल्द ही प्रारंभिक संघ के दो सबसे प्रतिष्ठित सदस्यों के रूप में उभरे ।

सारिपुत्त को ज्ञान और सैद्धांतिक विश्लेषण के सर्वोच्च गुरु के रूप में जाना जाता था । बौद्ध ग्रंथ उन्हें “असाधारण बौद्धिक स्पष्टता” और “करुणा एवं सटीकता के साथ शिक्षाओं को समझाने की अद्वितीय क्षमता” से संपन्न बताते हैं । उन्होंने भिक्षुओं के अनुशासन की देखरेख की, ध्यान साधना का मार्गदर्शन किया और स्वतंत्र रूप से भिक्षुओं को दीक्षित करने वाले पहले अधिकृत शिष्य बने । बुद्ध के सीधे निर्देश के बाद, बुद्ध के पुत्र राहुल को सारिपुत्त द्वारा एक नवदीक्षित भिक्षु (सामनेर) के रूप में दीक्षित किया गया था । उनके नेतृत्व और धम्म पर असाधारण पकड़ के कारण, बुद्ध ने उन्हें धम्म का सेनापति” (धम्मसेनापति) की उपाधि दी थी ।

थेरवाद बौद्ध परंपरा के अनुसार, ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने तावतिंस स्वर्ग में अपनी माता (जिनका वहां पुनर्जन्म हुआ था) सहित देवताओं को अभिधम्म की शिक्षा दी थी । इस अवधि के दौरान, बुद्ध हर दिन कुछ समय के लिए मानव लोक में लौटते थे, जहाँ वे सारिपुत्त को उन शिक्षाओं का सारांश सुनाते थे, और फिर सारिपुत्त उन शिक्षाओं को व्यवस्थित रूप से जन-जन तक पहुँचाते थे ।

इसके विपरीत, महामोग्गल्लान को ध्यान और आध्यात्मिक उपलब्धियों के अग्रणी गुरु के रूप में सम्मान प्राप्त था । बौद्ध साहित्य में उन्हें गहन ध्यान शक्तियों और अस्तित्व के विभिन्न लोकों को देखने की क्षमता से युक्त बताया गया है । देवताओं, ब्रह्मों और दुखी अवस्थाओं में कष्ट भोग रहे जीवों के साथ अपने संवादों के माध्यम से, उन्होंने कर्म के सिद्धांतों और संसार की वास्तविकताओं को स्पष्ट किया । उनकी शिक्षाओं ने अनुयायियों को मानवीय कर्मों के नैतिक और आध्यात्मिक परिणामों की स्पष्ट समझ प्रदान की । गौतम बुद्ध ने अरहंत महामोग्गल्लान पर एक शिक्षक, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और प्रारंभिक संघ के रक्षक के रूप में गहरा भरोसा किया, जो अक्सर अनुशासन और सामुदायिक नेतृत्व के मामलों में बुद्ध की ओर से कार्य करते थे । उन्होंने देवदत्त द्वारा पैदा किए गए संघ-भेद (विभाजन) को दूर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भिक्षुओं को बुद्ध के साथ फिर से एकजुट करने और बौद्ध समुदाय की एकता को बनाए रखने में मदद मिली ।

पवित्र अवशेष और उनकी चिरस्थायी श्रद्धा

अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान का परिनिर्वाण बुद्ध और बौद्ध संघ के लिए एक अत्यंत भावुक क्षण था । अरहंत सारिपुत्त ने बुद्ध के महापरिनिर्वाण से कुछ समय पहले, कत्तिका/कार्तिक (अक्टूबर/नवंबर) महीने की पूर्णिमा को अंतिम मुक्ति (परिनिर्वाण) प्राप्त की, जबकि परंपरा के अनुसार अरहंत महामोग्गल्लान का परिनिर्वाण लगभग पंद्रह दिन बाद, उसी महीने की अमावस्या को हुआ था ।

बौद्ध परंपरा में, उन्हें आध्यात्मिक प्राप्ति का पवित्र प्रतीक और ज्ञानोदय का जीवंत स्मरण माना जाता है । इसलिए, अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के पवित्र अवशेष असाधारण महत्व रखते हैं, जो बुद्ध धम्म के त्रिरत्नों में से एक-‘संघ’ की साक्षात प्राप्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं । विभिन्न बौद्ध संस्कृतियों में, ये पवित्र अवशेष आज भी भक्ति, तीर्थयात्रा और आत्मचिंतन को प्रेरित करते हैं । उनका आदर प्राचीन भारत से आधुनिक विश्व तक बुद्ध की शिक्षाओं की निरंतरता का प्रतीक है । इस गहरी श्रद्धा का एक भव्य नजारा फरवरी २०२४ में थाईलैंड में देखा गया, जो हाल के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध राजकीय समारोहों में से एक था ।

थाईलैंड की ऐतिहासिक २०२४ अवशेष प्रदर्शनी

अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के अवशेष २३ फरवरी २०२४ को पहली बार भारत से बाहर गए, जब थाईलैंड ने बैंकॉक के सनम लुआंग में बुद्ध के पवित्र अवशेषों के साथ-साथ अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के अवशेषों की स्थापना के लिए एक भव्य राजकीय समारोह का आयोजन किया था । इस ऐतिहासिक आयोजन की संयुक्त अध्यक्षता सोमदेत फ्रा संघराजा सकल महा संघपरिणायक और प्रधान मंत्री स्रेत्था थाविसिन ने की थी ।

रॉयल थाई सरकार और भारत सरकार के सहयोग से “गंगा-मेकांग पवित्र बुद्ध अवशेष” पहल के तहत आयोजित यह प्रदर्शनी, महा वजिरालोंगकोर्न की छठी-चक्र वर्षगांठ के शुभ अवसर पर आयोजित उत्सवों का हिस्सा थी । भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (IBC) ने भारत से भिक्षुओं और शिक्षाविदों को लाने और बैंकॉक के सिल्पकर्न विश्वविद्यालय में एक पूर्ण दिवसीय विपश्यना कार्यक्रम आयोजित करके इस प्रदर्शनी के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

इस आयोजन ने भारी जन-भक्ति और अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया । बैंकॉक प्रदर्शनी के बाद, इन पवित्र अवशेषों को थाईलैंड के विभिन्न हिस्सों जैसे चियांग माई, उबोन रत्चाथानी और क्राबी ले जाया गया-जिससे देश के सभी क्षेत्रों के लगभग ५० लाख (५ मिलियन) बौद्धों को अवशेषों के दर्शन और श्रद्धा सुमन अर्पित करने का अवसर मिला ।

मंगोलिया के लिए इन अवशेषों का महत्व क्यों है?

अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के अवशेषों को मंगोलिया ले जाने की प्रासंगिकता ‘धम्म वाहक’ के रूप में उनकी भूमिका में निहित है-वे प्रारंभिक संघ के ऐसे स्तंभ थे जिनका जीवन बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार और सुरक्षा का साक्षात उदाहरण था । उनके दो मुख्य शिष्यों के पवित्र अवशेष संसार में उस ज्ञानोदय के संरक्षण, व्याख्या और प्रसार के प्रतीक हैं । अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान गहन साधना के माध्यम से धम्म की व्यावहारिक अनुभूति का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

मंगोलिया के लिए, इन अवशेषों का आगमन असाधारण अर्थ रखता है । मंगोलिया की बौद्ध पहचान ऐतिहासिक रूप से श्रद्धा, विद्वता, संन्यासी अनुशासन और ध्यान परंपरा में रची-बसी रही है । इन पवित्र अवशेषों की उपस्थिति एक पवित्र और प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करती है, जो बुद्ध धम्म की जीवंत छवि को पूर्ण करती है । मंगोलिया में उनकी उपस्थिति मंगोलियाई भिक्षु समुदाय (संघ) के लिए एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ आशीर्वाद है ।

(लेखक भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय में सचिव हैं)

आईपीएल 2026: वैभव सूर्यवंशी का तूफान, ऑरेंज कैप की रेस में निकले सबसे आगे

स्पोर्टस डेस्क: आईपीएल 2026 में ऑरेंज कैप की रेस अब अपने अंतिम पड़ाव पर है और यह बेहद रोमांचक हो गई है। राजस्थान रॉयल्स के युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी ने अपनी तूफानी बल्लेबाजी से दुनिया भर के दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया है और फिलहाल 680 रनों के साथ नंबर एक पर काबिज हो गए हैं।

सूर्यवंशी का रिकॉर्ड प्रदर्शन : एलिमिनेटर मुकाबले में सनराइजर्स हैदराबाद (SRH) के खिलाफ वैभव ने केवल 29 गेंदों पर 97 रनों की आतिशी पारी खेली, जिसमें 12 छक्के और 5 चौके शामिल थे। हालांकि वह महज 3 रनों से आईपीएल इतिहास के सबसे तेज शतक से चूक गए, लेकिन उन्होंने इस सीजन में अब तक 65 छक्के लगाकर एक नया रिकॉर्ड कायम कर दिया है। राजस्थान रॉयल्स ने यह मैच 47 रनों से जीतकर क्वालीफायर 2 में अपनी जगह पक्की कर ली है।ऑरेंज कैप के अन्य दावेदार वैभव सूर्यवंशी को कड़ी टक्कर मिल रही है:

साई सुदर्शन (गुजरात टाइटंस): 15 मैचों में 652 रनों के साथ दूसरे स्थान पर हैं।

शुभमन गिल (गुजरात टाइटंस): 618 रनों के साथ चौथे नंबर पर हैं और उनके पास अभी भी मैच बचे हैं।

विराट कोहली (आरसीबी): कोहली 600 रन बना चुके हैं और उनकी टीम सीधे फाइनल में पहुँच चुकी है, जहाँ उनके पास एक बड़ा मौका होगा।

अब क्वालीफायर 2 में राजस्थान रॉयल्स का सामना गुजरात टाइटंस से होगा। इस मैच में जो भी जीतेगा, वह फाइनल में आरसीबी (RCB) से भिड़ेगा। वैभव सूर्यवंशी अब 700 रनों के जादुई आंकड़े से मात्र 20 रन दूर हैं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026: दुनिया को सचेत उपभोग की ओर प्रेरित करना

श्री प्रतापराव जाधव

आज जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 मना रही है, मानवता एक निर्णायक सभ्यतागत मोड़ पर खड़ी है। वर्तमान में हम अभूतपूर्व तकनीकी और भौतिक प्रगति के युग में जी रहे हैं, फिर भी हम जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों, बढ़ते मानसिक तनाव, पर्यावरणीय क्षरण और जीवन जीने के अस्थिर तरीकों जैसी चुनौतियों का सामना भी कर रहे हैं। इनमें से कई संकटों के मूल में एक ही चुनौती नज़र आती है- वस्तुओं का अनियंत्रित और बिना सोचे-समझे किया जाने वाला उपभोग।

प्राकृतिक संसाधनों के ज़रुरत से ज्यादा दोहन से लेकर डिजिटल उपयोगिता पर अत्यधिक निर्भरता और अस्थिर जीवनशैली तक, आज आधुनिक समाज संतुलन से लगातार दूर होता जा रहा है। और इसी संदर्भ में, योग न केवल एक प्राचीन स्वास्थ्य अभ्यास के रूप में, बल्कि एक ज़िम्मेदार जीवन जीने के लिए एक कालातीत रूपरेखा के रूप में उभर कर सामने आता है। योग मानवता को आत्म-नियमन, संयम और सचेत विकल्पों की ओर एक शक्तिशाली मार्ग प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने भीतर और अपने आस-पास की दुनिया के साथ सामंजस्य कैसे स्थापित करें।

सोच समझकर वस्तुओं का उपभोग करने का आह्वान

अत्यधिक उपभोग की वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए, हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व ने ‘मिशन LiFE’ (लाइफ़स्टाइल फ़ॉर एनवायरनमेंट) के ज़रिए एक सशक्त दिशा प्रदान की है। COP26 में, प्रधानमंत्री ने एक ऐसे सिद्धांत को सामने रखा, जो योग के दर्शन से गहराई के साथ जुड़ा है: “आज ज़रूरत है सचेत और सोच-समझकर उपयोग करने की, न कि बिना सोचे-समझे और विनाशकारी तरीके से उपभोग करने की।”

हाल ही में, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और आपूर्ति-श्रृंखला में आई बाधाओं के बीच, प्रधानमंत्री ने इस अपील का विस्तार करते हुए इसे एक दैनिक नागरिक ज़िम्मेदारी का रूप दिया। उन्होंने नागरिकों को प्रोत्साहित किया कि वे जान-बूझकर ऐसे उपभोग को सीमित करें, जिनसे बचा जा सकता है, जैसे ईंधन बचाना, अनावश्यक ऊर्जा का उपयोग कम करना, और गैर-ज़रूरी खर्चों पर दोबारा विचार करना। यह अपील किसी चीज़ की कमी या अभाव पर आधारित नहीं है, बल्कि, यह सामूहिक सशक्तिकरण, निरंतरता और राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी के लिए एक रणनीतिक और नैतिक आह्वान है। जैसा कि उन्होंने हमें याद दिलाया: “हर छोटा-बड़ा प्रयास मायने रखता है, ठीक वैसे ही जैसे हर एक बूंद से घड़ा भरता है।”

ये विचार योग के बुनियादी सिद्धांतों से गहराई से जुड़े हुए हैं। योग दर्शन अपरिग्रह’ – यानी अनावश्यक चीज़ों को जमा करने से बचना और संतोष’ यानी अपनी असली ज़रूरतों से संतुष्ट रहना, की बात करता है। ये सिद्धांत मिलकर एक ऐसी सोच पैदा करते हैं, जो लोगों को अंधाधुंध उपभोग से दूर सचेत जीवन की ओर प्रेरित करती है। योग हमें निष्क्रिय उपभोक्ता से बदलकर इस धरती का ज़िम्मेदार रखवाला बनाता है।

पारिस्थितिक संतुलन के लिए एक साधन के रूप में योग

पृथ्वी पर इंसानी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तो काफ़ी संसाधन हैं, लेकिन इंसान की असीमित लालच को पूरा करने के लिए नहीं। योग प्रकृति के साथ हमारे आपसी जुड़ाव की भावना को गहरा करके इस जागरूकता को फिर से जगाने में मदद करता है। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जो भोजन हम करते हैं और जिस स्थिरता की हम तलाश करते हैं, ये सभी एक साझा पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं।

योग का अभ्यास धीरे-धीरे हमारे व्यवहार को भीतर से बदल देता है। यह मन की बेचैनी को शांत करता है, जल्दबाज़ी वाली आदतों को कम करता है और आत्म-अनुशासन को मज़बूत बनाता है। आज की दुनिया, जो पल भर के सुख और अत्यधिक उपभोगवाद से संचालित होती है, उसमें योग वह आंतरिक स्पष्टता पैदा करता है, जिसकी ज़रूरत हमें अपनी असली ज़रूरतों और कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं के बीच फ़र्क समझने के लिए होती है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण तथा आयुष, दोनों मंत्रालयों से जुड़े मंत्री के तौर पर, मैं हर दिन यह देखता हूँ कि योग किस तरह गैर-संक्रामक रोगों (एनसीडी) के खिलाफ एक निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य साधन के रूप में काम करता है। शारीरिक गतिविधि, मानसिक संतुलन और अनुशासित जीवन शैली को बढ़ावा देकर, योग अस्वस्थ आदतों और अत्यधिक चिकित्सीय हस्तक्षेपों पर हमारी निर्भरता को कम करता है। एक योगिक जीवन शैली स्वाभाविक रूप से सादगी, संयम, संतुलित पोषण, कम बर्बादी और संसाधनों के सचेत उपयोग को बढ़ावा देती है, ठीक वही व्यवहारिक बदलाव, जो पर्यावरणीय स्थिरता के लिए ज़रुरी है।

इस प्रकार, योग न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का एक मार्ग है, बल्कि यह व्यवस्था में जिम्मेदारीपूर्ण जीवन के लिए एक व्यावहारिक ढाँचा भी है।

भारत का वैश्विक योग नेतृत्व

आज, जब योग दुनिया के लिए भारत के सबसे प्रभावशाली योगदानों में से एक बन गया है। यह स्वास्थ्य, सद्भाव और सामूहिक कल्याण की एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति भी बन चुका है। जो योग एक प्राचीन सभ्यतागत प्रथा के रूप में शुरू हुआ था, वह आज एक वैश्विक आंदोलन बन गया है, जो भूगोल, राजनीति, भाषा और संस्कृति की सीमाओं से परे है।

हर साल, कई महाद्वीपों में लाखों लोग योग समारोहों में भाग लेते हैं। वे केवल आसन ही नहीं करते, बल्कि एक स्वस्थ, अधिक संतुलित और टिकाऊ जीवन की साझा आकांक्षा को भी अपनाते हैं। योग निवारक स्वास्थ्य सेवा, मानसिक कल्याण और सचेत जीवन शैली की एक सार्वभौमिक भाषा के रूप में उभरा है।

योग के ज़रिए, भारत ने दुनिया को समग्र स्वास्थ्य के लिए एक ऐसा गैर-बाध्यकारी और समावेशी ढाँचा प्रदान किया है, जो आधुनिक चिंताओं का समाधान शाश्वत ज्ञान के साथ करता है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 का यही महत्व है। चूँकि योग दुनिया भर में लाखों लोगों के जीवन को छूता है, इसलिए यह बड़े पैमाने पर व्यवहारिक परिवर्तन को प्रेरित करने के लिए एक बेजोड़ मंच भी प्रदान करता है। योग की सामूहिक भावना के ज़रिए, स्थिरता, संयम और सचेत जीवन-शैली के संदेश अधिक दूर तक पहुँच सकते हैं और लोगों के मन में गहरी छाप छोड़ सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के लिए एक सामूहिक संकल्प

सच्चा कल्याण अकेले अस्तित्व में नहीं हो सकता। मानव स्वास्थ्य, सामुदायिक कल्याण और संपूर्ण ग्रह का स्वास्थ्य आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। जलवायु परिवर्तन, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और पर्यावरण के क्षरण की चुनौतियों के लिए न केवल नीतिगत हस्तक्षेप, बल्कि व्यवहार में परिवर्तन भी ज़रुरी है।

इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर, आइए हम अपनी प्रतिबद्धता को योग मैट से आगे बढ़ाएं। आइए हम योग को केवल दैनिक अभ्यास के रूप में ही नहीं, बल्कि जीवन शैली के रूप में अपनाएं। एक ऐसी जीवन शैली जो सचेत उपभोग, आंतरिक अनुशासन और पारिस्थितिक जिम्मेदारी को प्रोत्साहित करती है।

आइए हम प्रधानमंत्री के सचेत जीवन जीने के आह्वान पर काम करें और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करें, जहां तरक्की और विकास को केवल हमारे उपभोग से नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी से जीने के तरीके से मापा जाए।

अपने आंतरिक वातावरण को बदलकर, हम सब मिलकर अपने ग्रह के बाहरी वातावरण को ठीक कर सकते हैं।

(लेखक आयुष मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री हैं।)

बहुपक्षवाद का संकट और डब्लूटीओ में सुधार की अनिवार्यता
  • श्री राजेश अग्रवाल

बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली औचित्य के गहरे संकट का सामना कर रही है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में, विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) वैश्विक व्यापार का केंद्रीय स्तंभ था, जो नियम-आधारित व्यवस्था की पेशकश करने के साथ तटस्थता, पूर्वानुमेयता और निष्पक्षता का वादा करता था। हालांकि आज, ये वादे काफी कमजोर प्रतीत होते हैं। डब्लूटीओ में विश्वास की कमी, किसी एक विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक असंतुलन, असमान प्रवर्तन और वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते स्वरुप के संचयी प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है।

इस संकट के मूल में है – वैश्विक उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण और आक्रामक व्यापार प्रथाओं की निरंतरता। समय के साथ, आपूर्ति श्रृंखलाएँ परस्पर अत्यधिक निर्भर हो गई हैं और उनका वितरण भी असमान है, जहाँ कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अनुपात से कई गुनी ज्यादा नियंत्रण रखती हैं। हालांकि, इस केंद्रीकरण ने कुछ मामलों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक कुशल बना दिया है, लेकिन इसने उन्हें काफी हद तक कमजोर भी बना दिया। व्यवधान—चाहे भू-राजनीतिक हो, आर्थिक हो, या पर्यावरण-संबंधी हों—अब प्रणालीगत नतीजे लेकर आते हैं। परिणामस्वरूप, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी अब केवल एक आर्थिक चिंता के रूप में नहीं देखी जाती; इसे अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व के मामले के तौर पर देखा जाने लगा है।

धारणा में हुए बदलाव ने नीतिगत प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी लहर को जन्म दिया है, जो बहुपक्षवाद के मौलिक सिद्धांतों को चुनौती देती हैं। देश घरेलू हितों की रक्षा के लिए संरक्षण उपायों, आक्रामक औद्योगिक नीतियों और निर्यात नियंत्रण को अपना रहे हैं। हालांकि ऐसी रणनीतियाँ अल्पकालिक सहनशीलता ला सकती हैं, लेकिन वे डब्लूटीओ की सहयोग भावना और कानूनी रूपरेखा को अक्सर कमजोर कर देती हैं। तकनीकी अवरोध, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक प्रभाव के उपकरण के रूप में बाज़ार पहुंच का बढ़ता उपयोग एक व्यापक परिवर्तन का संकेत देता है: व्यापार अब केवल आर्थिक लेन-देन ही नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति के बारे में है।

डब्लूटीओ सदस्यों के बीच एक व्यापक रूप से मान्य दृष्टिकोण यह है कि संगठन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को उनके प्रतिबद्धताओं के प्रति जवाबदेह ठहराने में अक्षम रहा है और इसने वर्तमान स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जब नियम असमान रूप से लागू किए जाते हैं या प्रवर्तन तंत्र विफल हो जाते हैं, तो प्रणाली में विश्वास कमजोर हो जाता है। कई देशों में, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों में, यह धारणा मजबूत हुई है कि डब्लूटीओ अब एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में कार्य नहीं करता। इसके बजाय, इसे एक ऐसे संस्थान के रूप में देखा जाता है, जो तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के प्रति अनुकूल होने के लिए संघर्ष कर रहा है।

इस संदर्भ में, सुधार प्रयासों का केंद्रीय उद्देश्य डब्लूटीओ की विश्वसनीयता को बहाल करना हो गया है। यद्यपि डब्लूटीओ सुधार की आवश्यकता पर सदस्यों के बीच व्यापक सहमति है, फिर भी इसे हासिल करने के तरीके पर सहमति न के बराबर है। सुधार की संरचना और विषय वस्तु पर बहसें लगातार विवादास्पद होती जा रही हैं। याओंडे के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में, सदस्यों ने डब्लूटीओ के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुन: पुष्टि की, जिनमें निष्पक्षता, पारदर्शिता, समावेश और सहमति-आधारित निर्णय शामिल हैं। इन सिद्धांतों ने लंबे समय से डब्लूटीओ को अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग बनाये रखा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी सदस्य, चाहे उनका आकार या उनकी आर्थिक शक्ति कुछ भी हो, वैश्विक व्यापार नियमों को अंतिम रूप देने में अपनी बात रख सकें। हालांकि, इन सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को, विशेष रूप से बहुपक्षीय समझौतों से जुड़ी चर्चाओं में, समस्याओं का सामना करना पड़ा है। ये समझौते डब्लूटीओ सदस्यों के उपसमूहों के बीच बातचीत के बाद तैयार किए गए हैं। इन्हें कई देश—विशेष रूप से वैश्विक उत्तर के देश —सहमति-आधारित नियम निर्माण की चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान मानते हैं। ऐसी सदस्यता के लिए, जहां विकास स्तर और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में व्यापक असमानताएँ मौजूद हैं, जटिल मुद्दों पर सर्वसम्मति प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। बहुपक्षीय समझौते आगे बढ़ने का एक तरीका प्रदान करते हैं, जिससे इच्छुक प्रतिभागी नए नियम स्थापित कर सकते हैं, इसमें उन देशों को रुकावट नहीं माना जाता, जो प्रतिबद्ध होने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, ऐसी ही प्रणाली डब्लूटीओ से पहले गैट, 1947 (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) के तहत अस्तित्व में थी।

इस मुद्दे पर भारत का रुख एक सावधानीपूर्वक तैयार संतुलनकारी कार्य को दर्शाता है। नियम-निर्माण को आगे बढ़ाने में बहुपक्षीय समझौतों की क्षमता को स्वीकार करते हुए भारत ने लगातार मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की है, ताकि ऐसे समझौतों द्वारा बहुपक्षीय प्रणाली को कमजोर न होना सुनिश्चित हो सके। बहुपक्षीय समझौतों को प्रमुख डब्लूटीओ सिद्धांतों को दरकिनार नहीं करना चाहिए, मौजूदा कार्यादेश को कमजोर नहीं करना चाहिए या गैर-प्रतिभागी सदस्यों के लिए नुकसानदेह नहीं होना चाहिए। उन्हें बहुपक्षीय रूपरेखा की जगह लेने के बजाय एक पूरक भूमिका निभानी चाहिए। भारत एक तदर्थ, समझौता-दर-समझौता मॉडल के बजाय बहुपक्षीय समझौतों को डब्लूटीओ संरचना में समेकित करने के लिए एक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

सुधार बहस का एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा, संगठन के पिछले कार्यादेशों को पूरा करने में विफलता से संबंधित है। यह कई विकासशील देशों के लिए असंतोष का एक प्रमुख कारण रहा है। ये अधूरी प्रतिबद्धताएं—जिनमें कृषि, विकास और विशेष व्यवहार प्रावधानों जैसे क्षेत्र शामिल हैं —केवल नियम बनाने की कमियों को ही नहीं दर्शातीं, बल्कि वैश्विक व्यापार प्रणाली में लंबे समय से मौजूद असमानताओं को दूर करने के अवसरों की चूक को भी उजागर करती हैं।

विशेष रूप से कृषि, इन असंतुलनों की गंभीरता को दर्शाती है। विकसित देशों ने अपने कृषि क्षेत्रों को सब्सिडी देने में महत्वपूर्ण लचीलापन बनाए रखा है, जिससे उनके किसान वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं। वहीं, विकासशील देशों को अपने किसानों को दिए जाने वाले समर्थन के प्रकारों और स्तरों में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। यह विषमता संरचनात्मक असुविधाओं को बनाए रखती है, वैश्विक दक्षिण में लाखों लोगों की आजीविका को कमजोर करती है और वैश्विक व्यापार प्रवाह को विकृत करती है।

कृषि से परे, ऐसी न्यायसंगत रूपरेखाओं की मांग बढ़ रही है, जो प्रौद्योगिकी स्थानांतरण और क्षमता निर्माण को नियंत्रित करती हैं। तेज़ तकनीकी प्रगति के युग में ज्ञान, नवाचार और ज्ञान-कौशल तक पहुँच आर्थिक विकास का एक प्रमुख निर्धारक बन गया है। फिर भी, मौजूदा नियम अक्सर मौजूदा पदानुक्रम को मजबूत करते हैं, जिससे विकासशील देशों की मूल्य श्रृंखला में ऊपरी पायदान पर चढ़ने की क्षमता सीमित हो जाती है। अधिक समावेशी और संतुलित व्यापार प्रणाली बनाने के लिए इन असमताओं को दूर करना आवश्यक है।

विशेष और विभेदपूर्ण व्यवहार (एस एंड डीटी) पर बहस डब्लूटीओ सुधार की जटिलताओं को और अधिक उजागर करती है। एस एंड डीटी मूल रूप से सबसे कम विकसित और विकासशील देशों को गैर-पारस्परिक बाजार पहुँच और व्यापार प्रतिबद्धताओं को लागू करने में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो अब एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है। कुछ विकसित देशों का तर्क है कि स्व-निर्धारण की मौजूदा प्रणाली अपेक्षाकृत उन्नत अर्थव्यवस्थाओं को उन प्रावधानों से लगातार लाभ उठाने की अनुमति देती है, जो कम विकसित राष्ट्रों के लिए बनाए गए थे। भारत इन चिंताओं को स्वीकार करता है, लेकिन सकल आर्थिक आकार जैसे मनमाने पैमानों पर आधारित सरल समाधानों के प्रति आगाह भी करता है।

इसके बजाय, ध्यान यह सुनिश्चित करने पर होना चाहिए कि एस एंड डीटी वास्तविक विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक प्रभावी उपकरण बना रहे। इसके लिए एक अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है—ऐसा दृष्टिकोण, जो विकासशील दुनिया में मौजूद आर्थिक स्थितियों की विविधता को मान्यता देता हो और उसी के अनुसार लचीलापन तैयार करता हो। यह मुद्दा और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि कई विकसित देशों ने कृषि सब्सिडी अधिकारों के संदर्भ में, जिसे कभी-कभी विपरीत एस एंड डीटी कहा जाता है, का फायदा उठाना जारी रखा है।

अंततः, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का भविष्य इसके सदस्यों की प्रतिस्पर्धी हितों को सुलझाने और साझा संस्थानों में विश्वास पुनः स्थापित करने की क्षमता पर निर्भर करता है। चुनौतियाँ कठिन हैं, लेकिन हित इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक कमजोर डब्लूटीओ से एक विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म देने का खतरा है, जो एकपक्षीय और शक्ति-आधारित सौदेबाज़ी पर आधारित हो सकती है। इसके विपरीत, सुधार किये गये और फिर से सशक्त बनाये गये डब्लूटीओ में एक अधिक सुदृढ़, समावेशी और सहयोगात्मक वैश्विक व्यवस्था को आधार प्रदान करने की क्षमता है।         

भारत की व्यापक व्यापार रणनीति, बहुपक्षीय मंचों में भागीदारी को द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों के  साथ जोड़ती है। जैसे-जैसे व्यापार नीति जटिल होती जा रही है—जिसमें नियामक मानक, डिजिटल शासन और आपूर्ति श्रृंखला का एकीकरण शामिल है—समान विचारधारा वाले भागीदारों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) मजबूत आर्थिक एकीकरण के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभरे हैं। हालांकि, वर्तमान  में जारी चर्चाओं में भारत की रचनात्मक भागीदारी इस कार्य की तात्कालिकता और जटिलता, दोनों को प्रतिबिंबित करती है। संतुलित, समावेशी और भविष्य-केंद्रित सुधारों को समर्थन देकर, भारत यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि डब्लूटीओ तेजी से बदलती दुनिया में प्रासंगिक बना रहे—एक ऐसा संस्थान, जो न केवल व्यापार को प्रबंधित करने में सक्षम हो, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत वैश्विक आर्थिक भविष्य को आकार देने की भी क्षमता रखता हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डब्लूटीओ व्यवसायों को निश्चितता, पूर्वानुमेयता, समावेशिता, समानता और सरलता प्रदान करता है, यानि नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था।

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व्यक्त किए गए विचार निजी हैं        

(लेखक वाणिज्य विभाग के सचिव हैं )            

आईटी नियम दूसरा संशोधन, 2026: भारत के डिजिटल शासन की दिशा में एक बड़ा कदम
  • श्री वैभव गग्गर, सुश्री काम्या वहिल

भारत का डिजिटल इकोसिस्टम तेज़ी से विकसित हुआ है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अब लोगों के संवाद करने और जानकारी तक पहुंचने के तरीकों में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। इससे जवाबदेही और ऑनलाइन नुकसान से जुड़ी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं और मौजूदा नियामक व्यवस्था को इसके अनुरूप विकसित होने की आवश्यकता है। इसी संदर्भ में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में प्रस्तावित बदलाव, जो 30 मार्च 2026 को प्रकाशित किए गए, भारत की डिजिटल नियामक प्रणाली में प्रक्रियागत कमियों को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। इन ड्राफ्ट संशोधनों का उद्देश्य भाग-II के तहत मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण, परामर्श और दिशा-निर्देशों के अनुरूप इंटरमीडियरीज़ की अनुपालना को मजबूत करना तथा भाग-III के तहत डिजिटल मीडिया कंटेंट नियमन प्रणाली की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाना है।

सबसे पहले, नियम 3(1)(जी) और 3(1)(एच) के तहत डेटा संरक्षण और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की जिम्मेदारियों से संबंधित स्पष्टीकरण दिया गया है। प्रस्तावित संशोधन स्पष्ट करता है कि रिकॉर्ड सुरक्षित रखने से जुड़े नियम अन्य लागू कानूनों के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों के अतिरिक्त होंगे। इससे वह अस्पष्टता दूर होती है, जिसके कारण कभी-कभी इंटरमीडियरीज़ अलग-अलग या न्यूनतम अनुपालन वाला दृष्टिकोण अपनाते थे। आईटी अधिनियम डिजिटल प्लेटफॉर्मों को अकेले काम करने की अनुमति नहीं देता। उन्हें आपराधिक प्रक्रिया कानून, वित्तीय नियमों और उनके उद्योग से जुड़े अन्य नियमन का भी पालन करना होता है। इस दृष्टि से यह स्पष्टीकरण उचित और आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संशोधन रिकॉर्ड सुरक्षित रखने से संबंधित है, न कि डेटा तक पहुंच से। ऐसे डेटा का खुलासा कानूनी प्रक्रियाओं और संवैधानिक सुरक्षा के अधीन रहेगा। हालांकि, इस तरह का सामान्य सुरक्षा प्रावधान यह आशंका भी पैदा कर सकता है कि इंटरमीडियरीज़ उपयोगकर्ता डेटा को अनिश्चितकाल तक सुरक्षित रखें, क्योंकि विभिन्न कानूनी व्यवस्थाएं बिना आवश्यकता, उद्देश्य-सीमा या अनुपातिकता का उल्लेख किए ऐसी शर्तें लागू कर सकती हैं। यदि भविष्य में ऐसी चिंताएं सामने आती हैं, तो उन्हें दूर करने के लिए अतिरिक्त स्पष्टीकरण जारी किया जा सकता है।

दूसरा, प्रस्तावित नियम 3(4) मंत्रालय द्वारा जारी परामर्श, स्पष्टीकरण और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) को आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत बाध्यकारी दायित्व बनाने का प्रयास करता है। धारा 79 के तहत इंटरमीडियरीज़ को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए सीमित दायित्व से सुरक्षा प्राप्त थी, बशर्ते वे उचित प्रक्रिया का पालन करें और अवैध गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी न करें। यह प्रावधान उन्हें बड़े पैमाने पर उपयोगकर्ता सामग्री की निगरानी करने की बाध्यता से बचाता था। सुप्रीम कोर्ट ने ‘श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ’ मामले में कहा था कि “सेफ हार्बर” सिद्धांत इंटरमीडियरीज़ को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने से बचाता है, जब तक कि वे अवैध गतिविधि की “वास्तविक जानकारी” मिलने पर कार्रवाई करते हैं। इस सिद्धांत ने प्लेटफॉर्मों को सूचना प्रवाह में निष्पक्ष बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेकिन तब से डिजिटल इकोसिस्टम काफी बदल चुका है। प्लेटफॉर्म अब केवल निष्क्रिय मध्यस्थ नहीं रहे। उनका विशाल आकार और एल्गोरिद्म आधारित कार्यप्रणाली ऑनलाइन नुकसान और जनमत को प्रभावित करने के तरीकों को बदल चुकी है। ऐसे में केवल अदालत के आदेश या औपचारिक नोटिस पर आधारित मॉडल धीरे-धीरे अप्रभावी साबित हो रहा है। नियम 3(4) शासन व्यवस्था को अधिक लचीला बनाकर इस कमी को दूर करने का प्रयास करता है। यह कंटेंट हटाने के लिए कानूनी आदेश की आवश्यकता समाप्त नहीं करता, बल्कि प्रशासनिक साधनों के माध्यम से प्लेटफॉर्मों के संचालन को दिशा देने की कोशिश करता है। हालांकि, अत्यधिक हस्तक्षेप को लेकर चिंताएं भी जायज़ हैं। चूंकि “सेफ हार्बर” हमेशा शर्तों पर आधारित रहा है, इसलिए उचित आचरण के मानक समय के साथ बदल सकते हैं। इसे अधिक वैध और संतुलित बनाने के लिए यह आवश्यक होगा कि ऐसे परामर्श और SOP पारदर्शिता के साथ जारी किए जाएं, जिनमें प्रकाशन, तर्कसंगत कारण और जहां संभव हो, हितधारकों से परामर्श शामिल हो।

तीसरा, संशोधन प्रस्तावित करता है कि नियम 8.1 की उपधारा में बदलाव कर भाग-III के नियम 14, 15 और 16 को केवल प्रकाशकों पर ही नहीं, बल्कि इंटरमीडियरीज़ और उनके प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रकाशित समाचार एवं समसामयिक घटनाओं से जुड़े कंटेंट पर भी लागू किया जाए। “उपयोगकर्ता” और “प्रकाशक” के बीच का अंतर हमेशा स्पष्ट नहीं होता। यह डिजिटल मीडिया निगरानी ढांचे के दायरे का महत्वपूर्ण विस्तार है, जो पहले मुख्यतः संगठित समाचार प्रकाशकों तक सीमित था। संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी स्रोत से आने वाले कंटेंट के गंभीर उल्लंघनों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। इससे पारंपरिक प्रकाशकों और समान प्रकार की गतिविधियों में लगे डिजिटल माध्यमों के बीच नियामक समानता को बढ़ावा मिलेगा।

इस प्रकार, संशोधन नियामक समानता को मजबूत करता है और मौजूदा ढांचे की संरचनात्मक कमियों को दूर करने का प्रयास करता है। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाग-III का उपयोग केवल गंभीर और प्रणालीगत नुकसान पहुंचाने वाली उपयोगकर्ता-जनित सामग्री तक सीमित रहना चाहिए। अत्यधिक सख्ती से लागू किए जाने पर वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति और खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। इसलिए मंत्रालय यह विचार कर सकता है कि नियम 14 से 16 के तहत हस्तक्षेप स्पष्ट मानकों — जैसे पहुंच, प्रभाव और जोखिम — के आधार पर किया जाए तथा न्यूनतम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाए जाएं। इससे खुले और बहुलतावादी डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र को बनाए रखने में मदद मिलेगी।

अंत में, नियम 14 में “शिकायतों” शब्द को बदलकर “मामलों” किए जाने का प्रस्ताव एक प्रतिक्रियात्मक से अधिक सक्रिय नियामक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है। अंतर-विभागीय समिति (IDC) अब केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सरकार द्वारा संदर्भित व्यापक और प्रणालीगत मुद्दों पर भी विचार कर सकेगी। ऐसे समय में, जब संगठित दुष्प्रचार अभियान जैसी समस्याएं व्यक्तिगत शिकायतों के दायरे से बाहर होती हैं, यह लचीलापन समयानुकूल और आवश्यक दोनों है। हालांकि, IDC के अधिकार क्षेत्र के विस्तार के साथ प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। विचार किए गए “मामलों” की प्रकृति का समय-समय पर खुलासा और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करेगा तथा मनमानी हस्तक्षेप की आशंकाओं को कम करेगा।

समग्र रूप से देखा जाए तो, ये ड्राफ्ट संशोधन भारत की इंटरमीडियरी जवाबदेही प्रणाली को आधुनिक बनाने का एक व्यावहारिक प्रयास हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि स्थिर कानूनी सिद्धांत तेजी से बदलती तकनीकी वास्तविकताओं का पूर्ण समाधान नहीं दे सकते। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती इनके क्रियान्वयन में निहित है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि विस्तारित नियामक शक्तियों का उपयोग पारदर्शी, अनुपातिक और इंटरनेट के खुले स्वरूप को बनाए रखने वाले तरीके से किया जाए। यदि सावधानीपूर्वक लागू किया गया, तो ये सुधार जवाबदेही और नवाचार के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं, बिना स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कमजोर किए।

(लेखक श्री वैभव गग्गर वरिष्ठ अधिवक्ता और सुश्री काम्या वहिल अधिवक्ता हैं।)