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WTO में भारत की व्यापार नीति की समीक्षा: दुनिया भारत की प्रगति पर ध्यान दे रही है 

पारदर्शिता बनाए रखना, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का एक संस्थागत कार्य है और व्यापार नीति समीक्षा (टीपीआर) इसके विभिन्न तरीकों में से एक है। यह समय-समय पर होने वाली एक उत्कृष्ट सहकर्मी समीक्षा प्रक्रिया है, जिसमें सचिवालय किसी सदस्य देश की व्यापार नीतियों और प्रथाओं का विस्तार से अध्ययन करता है, जिसमें वृहद् आर्थिक स्थितियां भी शामिल होती हैं और सदस्य पूरी प्रक्रिया के दौरान सोच-समझकर, सटीक और अक्सर आलोचनात्मक सवाल उठाते हैं। जुलाई 2026 के अंत में, भारत ने डब्ल्यूटीओ में अपनी आठवें टीपीआर का समापन किया, यह एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिसके लिए कई महीनों की तैयारी की गयी थी। इन तैयारियों में सचिवालय कर्मचारियों का दौरा, प्रतिनिधिमंडलों द्वारा 1,100 से अधिक सवाल पूछना, विचारों का आदान-प्रदान आदि शामिल थे। भारत ने अंतर-विभागीय और बहु-हितधारक संवाद के माध्यम से इन सवालों और स्पष्टीकरणों का जवाब दिया। यह भारत के लिए एक मौका था कि वह सदस्य देशों के सामने अपने आर्थिक और विकास विज़न की व्याख्या कर सके और यह बता सके कि भारत वैश्विक धन और समृद्धि में कैसे योगदान दे सकता है। 

भारत की पिछली व्यापार नीति की समीक्षा कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में 2021 में हुई थी। हालांकि, स्वास्थ्य संकट को नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन आर्थिक कमजोरियां और ऊर्जा स्रोतों सहित आवश्यक आपूर्ति की गंभीर कमी जैसी समस्याएं हाल के दिनों में बढ़ गई हैं। दुनिया महामारी संकट से उबर गई है, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों से नई चुनौतियां सामने आईं हैं। ऐसे माहौल में, आठवीं समीक्षा ने एक बहुत ही सकारात्मक तस्वीर पेश की: भारत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है, इसने वैश्विक व्यापार में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और इसे तेज़ी से एक अहम व्यापारिक साझेदार के तौर पर देखा जा रहा है। डब्ल्यूटीओ के सदस्यों ने विकसित भारत@ 2047 की दिशा में भारत के प्रयासों की सराहना की और स्वीकार किया कि भारत की मजबूत और निरंतर आर्थिक वृद्धि, दुनिया के साथ गहरे होते संबंध और तेजी से हुआ डिजिटल परिवर्तन एक साथ मिलकर 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने विज़न की दिशा में इसकी निरंतर प्रगति को रेखांकित करते हैं।

इस साल की समीक्षा की गंभीरता ही बहुत कुछ बताने वाली है। इस समीक्षा में डब्ल्यूटीओ के सदस्यों ने सभी क्षेत्रों के बारे में असाधारण रूप से व्यापक और निरंतर संवाद किया, जो भारत के व्यापार, नियामक और वृहद् आर्थिक नीतियों के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है। सदस्यों ने मोटे तौर पर भारत की आर्थिक मजबूती और बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के साथ रचनात्मक साझेदारी की सराहना की, साथ ही डिजिटल नवाचार, सीमा-शुल्क व व्यापार सुविधा, स्टार्ट-अप्स और मुक्त व्यापार समझौतों जैसी उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। इसलिए, इसमें शामिल होने वालों की संख्या सिर्फ़ बारीकी से जांच-परख का पैमाना नहीं है; यह इस बात का भी संकेत है कि भारत के आर्थिक बदलाव में अब कितनी दिलचस्पी ली जा रही है। 

यह बदलाव आंकड़ों में साफ़ दिखता है। 2021-22 और 2025-26 के बीच, भारत की अर्थव्यवस्था की सालाना औसत विकास दर लगभग 8 प्रतिशत रही। 2025-26 में कुल निर्यात रिकॉर्ड 863 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें 441.8 बिलियन डॉलर का वस्तु निर्यात और 421.3 बिलियन डॉलर का सेवा निर्यात शामिल है। कई सदस्यों ने भारत में डिजिटल रूप से दी जाने वाली सेवाओं के क्षेत्र में हुई शानदार प्रगति पर ज़ोर दिया। सातवें टीपीआर के बाद की अवधि में भारत के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुदृढ़ता स्थापित करने की स्पष्ट दिशा प्रतिबिंबित होती है, साथ ही देश ने व्यापारिक साझेदारों को भारत की विकास गाथा का हिस्सा बनने का अभूतपूर्व अवसर भी दिया। समीक्षा अवधि के दौरान, भारत ने अपनी गति फिर से हासिल की और वैश्विक बाजारों के लिए वस्तुओं और सेवाओं का एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत किया। 

शायद यह बदलाव साफ़ तौर पर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे ज़्यादा दिखाई देता है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) ने भारत को बड़ी आबादी के स्तर पर डिजिटल प्रणाली बनाने में मदद की है; अकेले एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) का भारत के डिजिटल भुगतान लेन-देन में 85 प्रतिशत और 2025 में दुनिया भर के वास्तविक समय पर हुए कुल भुगतान में लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा है। डब्ल्यूटीओ में सदस्यों ने खास तौर पर डीपीआई में भारत की उपलब्धियों का ज़िक्र किया। भारत के डिजिटल और विकास-उन्मुख सुधारों को विकासशील और सबसे कम विकसित देशों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है, जो अपने यहाँ डिजिटल बदलाव की कोशिश कर रहे हैं। यह भारत की उभरती हुई व्यापार गाथा का एक अहम पहलू है: खुलेपन को घरेलू क्षमताओं का भी समर्थन मिल रहा है, जिससे लेन-देन की लागत कम होती है और यह छोटे उद्यमों समेत सभी तरह के व्यवसायों को औपचारिक और डिजिटल अर्थव्यवस्था में शामिल होने में सक्षम बनाती है। 

भारत की व्यापार नीति बाहरी दुनिया पर अब ज़्यादा केंद्रित हो गई है, और विकसित तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का दायरा बढ़ रहा है— या तो लागू हो चुके हैं या इन पर बातचीत चल रही है। यह विस्तार साझेदारी में विविधता लाने और भारतीय सामान व सेवाओं के लिए बाज़ार तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने की कोशिशों को दिखाता है। साथ ही, जैसा टीआरपी चर्चाओं में रेखांकित किया गया था, भारत की एफटीए में भागीदारी, डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति उसकी लगातार और स्पष्ट प्रतिबद्धता के साथ-साथ जारी रहती है। 

टीपीआर यह भी दिखाता है कि अधिक खुलापन अपनाने का मतलब भारत के वैध सार्वजनिक नीतिगत हितों को छोड़ देना नहीं है। भारत ने सदस्यों को आश्वस्त किया कि वैश्विक बाजारों के साथ एकीकृत होने का उसका दृष्टिकोण, अपनी विशिष्ट विकास वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों के साथ संतुलित रहेगा। यह विशेष रूप से कृषि में साफ दिखाई देता है, जहां भारत ने किसानों की आजीविका की सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों और तकनीकी विनियमों से संबंधित मुद्दों पर, भारत ने पारदर्शिता, हितधारक परामर्श और डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुपालन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और इस संबंध में सदस्यों को स्पष्ट जानकारी दी।

यह आत्मनिर्भर भारत का एक सूक्ष्म अर्थ है। आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया की अर्थव्यवस्था से खुद को अलग-थलग करना नहीं है। भारत के लिए, इसका मतलब घरेलू क्षमताओं, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी क्षमता को विकसित करना है, ताकि देश वैश्विक व्यापार में अधिक ताकत के साथ हिस्सा ले सके। पिछले पांच सालों का रिकॉर्ड यह दिखाता है कि भारत यही संतुलन बना रहा है: जहां यह अवसर निर्मित करता है, वहां अधिक खुलापन रखना और साथ ही वैध घरेलू हितों की रक्षा करने की क्षमता बनाए रखना।

यह दृष्टिकोण ऐसे समय में विशेष महत्व रखता है, जब एकतरफा कदमों, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों और भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक व्यापार प्रणाली में भरोसे को कमजोर कर दिया है। इसलिए, डब्ल्यूटीओ को केंद्र में रखते हुए एक पूर्वानुमानित, नियम-आधारित और विकास-उन्मुख बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का विशेष महत्त्व है, जो इसके व्यापारिक हितों से कहीं ज़्यादा मायने रखती है। जैसा कि भारत की व्यापार नीति समीक्षा की अध्यक्ष ने अपने समापन भाषण में उल्लेख किया, भारत के प्रतिनिधिमंडल ने उस महत्व को प्रदर्शित किया है, जो देश टीपीआर व्यवस्था और बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को देता है। इस तरह, आठवां टीपीआर एक व्यापक संदेश देता है: भारत दुनिया से मुंह मोड़ने वाला सदस्य नहीं है। यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जो प्रगति को अपनाने और वैश्विक व्यापार प्रणाली के साथ गहराई से एकीकृत होने का प्रयास कर रही है, साथ ही यह सुनिश्चित कर रही है कि यह एकीकरण उसकी विकास प्राथमिकताओं, घरेलू क्षमताओं और राष्ट्रीय हितों के अनुकूल बना रहे।

(लेखक वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार, के वाणिज्य विभाग में सचिव हैं।)

प्राकृतिक खेती – सतत कृषि और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

भारत ने पिछले दशक में कृषि क्षेत्र में तेज प्रगति की है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, पिछले 5 सालों में विकास दर 4% से अधिक रही है। खाद्यान्न, बागवानी और तेलहन फसलों का बंपर उत्पादन हुआ है। यह किसानों द्वारा नई तकनीकों को अपनाने और सिंचाई वाले क्षेत्र का विस्तार, बेहतर जल उपयोग दक्षता और समय पर व पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्धता जैसी सरकार की ठोस नीतियों के समर्थन का परिणाम है। बागवानी फसलों की हिस्सेदारी भी काफ़ी बढ़ रही है और इसकी विकास दर अपेक्षाकृत अधिक है।      

हालांकि, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं, जिसके कारण मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और प्रमुख फसलों की उत्पादकता में स्थिरता आ रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (एनयूई) में धीरे-धीरे आई कमी के कारण एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है, जिसमें किसान रासायनिक खादों की मात्रा तो लगातार बढ़ा रहे हैं, लेकिन उत्पादकता में बहुत मामूली बढ़ोतरी ही हो रही है।    

सरकार की मृदा स्वाथ्य और उर्वरक योजना के तहत 26 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्डों का वितरण किया गया है। इससे प्राप्त डेटा के अखिल-इंडिया विश्लेषण से चिंताजनक बात सामने आई है कि मिट्टी में जैविक कार्बन (एसओसी)  और अन्य जरूरी सूक्ष्म-पोषक तत्वों की भारी कमी है। स्वस्थ मिट्टी में एसओसी 1% से अधिक होना चाहिए, लेकिन यह औसतन 0.5% के आसपास है और कुछ क्षेत्रों में यह 0.3% तक के यह खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

कम मात्रा में एसओसी से मिट्टी की सरंध्रता कम हो जाती है, जिसका दोहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है: पानी का जमीन में रिसाव और जल धारण क्षमता, दोनों में कमी आती है। परिणामस्वरूप, वर्षा और सिंचाई का पानी बह जाता है, जो ऊपरी मिट्टी को बहा ले जाता है और न तो यह जमीन के नीचे जाकर भूजल स्तर बढ़ा पाता है और न ही पौधों की वृद्धि के लिए आसानी से उपलब्ध रहता है।

कम एसओसी का एक और नकारात्मक प्रभाव यह है कि ऐसे मिट्टी पर उगाए जाने वाले पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता कम हो जाती है। समान उत्पादकता स्तर तक पहुँचने के लिए अधिक से अधिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ी हुई खुराक उर्वरक उपयोग दक्षता को और कम कर देती है, जिससे मृदा-स्वास्थ्य का नुकसान होता है और देश रासायनिक उर्वरकों या उनके घरेलू उत्पादन के कच्चे माल को आयात करने में अपनी कीमती विदेशी मुद्रा खर्च करता है।  

अत्यधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग ने उन लाभकारी सूक्ष्मजीवों और कीड़ों को भी कम कर दिया है, जो मिट्टी की सरंध्रता को बेहतर बनाने और गहरी मिट्टी से पोषक तत्वों को ऊपरी मिट्टी तक स्थानांतरित करने में मदद करते हैं, ताकि पौधे उन्हें अवशोषित कर सकें।

एक अन्य चिंताजनक प्रभाव उपज की गुणवत्ता और सुरक्षा पर पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि रसायन खाने-पीने और पशु चारे की श्रृंखला में पहुँच जायेंगे और आखिरकार मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करेंगे। ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें फलों, सब्जियों, अनाज और अन्य वाणिज्यिक फसलों में कीटनाशकों का न्यूनतम अवशेष स्तर तय सीमा को पार कर गया है, जिसके चलते निर्यात की खेपें रद्द होती हैं और वैश्विक बाजार में ब्रांड इंडिया की छवि पर बुरा पड़ता है।

हालांकि ये चिंताएँ कुछ समय से व्यक्त की जा रही हैं, लेकिन सरकार ने वर्ष 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की शुरुआत की, जिसका मुख्य उद्देश्य सतत कृषि के लिए पशुधन या गाय आधारित रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना है, ताकि मिट्टी की सेहत खासकर एसओसी में सुधार हो सके, पौष्टिक तत्वों के अवशोषण की क्षमता बढ़ सके और रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर देश की निर्भरता कम हो सके। 

प्राकृतिक खेती, जिसे इसके समर्थकों द्वारा आमतौर पर ‘जीरो बजट खेती’ कहा जाता है, एक ऐसी तकनीक पर आधारित है, जिसे किसानों ने कई सालों तक आज़माया और परखा है तथा इसे मान्यता दी है। इसके परिणाम भी बहुत उत्साहजनक रहे हैं। यह एक समग्र तकनीकी समाधान पर आधारित है, जिसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जाता है, जैसे स्थानीय नस्ल की गाय का गोबर और गोमूत्र, जिनकी लागत किसान के लिए लगभग शून्य होती है। 

बीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाला बीजामृत सूत्र बेहतर अंकुरण और मजबूत पौधों में मदद करता है, जबकि  जीवामृत, घन-जीवामृत और सप्तयांकुर का उपचार मित्र सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी और मृदा-उत्पादकता को काफी बढ़ा देता है। पौधों के स्वास्थ्य की रक्षा सौंठास्त्र और खट्टी लस्सी के इस्तेमाल से की जाती है, जो बैक्टीरिया और फफूंद संक्रमण को रोकते हैं, जबकि विभिन्न प्रकार के कीड़ों और कीट को नियंत्रित करने के लिए ‘नीमास्त्र’, ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘अग्निअस्त्र’ और ‘दशपर्णी अर्क’ का प्रयोग किया जाता है।

उपरोक्त सभी उपचारों की सावधानीपूर्वक तैयारी और उचित मात्रा में उपयोग से मिट्टी की सेहत के बेहतर परिणाम मिले हैं और उत्पादकता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है, जबकि उपज की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। 

मिशन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से प्रगति कर रहा है, जिसका लक्षित क्षेत्र 7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक है और यह 18 लाख से अधिक किसानों को कम से कम 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में कवर करता है। कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की टीम, जिसे किसान प्रशिक्षक और कृषि सखी संसाधन व्यक्ति के रूप में सहायता प्रदान कर रहे हैं, किसानो को जागरूक कर रही है, प्रशिक्षण दे रही है और इस खेती को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

जिन किसानों के पास स्थानीय नस्ल की गायें हैं, उन्हें खेत पर ही इन उपचारों को तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही, बड़ी संख्या में जैव-इनपुट संसाधन केंद्र भी मुख्य रूप से स्थानीय डेयरियों या पशु आश्रय गृहों के निकट स्थापित किए गए हैं, ताकि ये उपचार किसानों को मामूली कीमत पर उपलब्ध कराए जा सकें।

यह मिशन विज्ञान-आधारित रणनीति के माध्यम से लागू किया जा रहा है, ताकि किसान इन प्रथाओं को बिना किसी संदेह या हिचकिचाहट के अपना सकें। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने क्षेत्र और फ़सल-विशिष्ट क्षमता मानचित्र विकसित किए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्राकृतिक खेती कहाँ प्रभावी होगी। आईसीएआर के संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में इस देसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए इसकी प्रभावशीलता को वैज्ञानिक रूप से मान्यता देने के लिए ठोस प्रयास किये जा रहे हैं। आईसीएआर संस्थानों की निगरानी में किए गए कई प्रयोगों ने कई फसलों के लिए बहुत सकारात्मक परिणाम दिए हैं और अब मिशन के ज़रिए इनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।

प्राकृतिक उत्पादों का विपणन एक और महत्वपूर्ण रणनीति है, जो किसानों की आय में वृद्धि करेगी और उन्हें इन प्रथाओं को जारी रखने के लिए प्रेरित करेगी। राष्ट्रीय जैविक और प्राकृतिक कृषि केंद्र (एनसीओएनएफ) ने प्राकृतिक खेती के लिए प्रमाणीकरण नियम बनाये हैं। बड़ी संख्या में किसानों ने पहले ही सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिए हैं, जिससे वे अपने प्रमाणित विशिष्ट उत्पाद को ऊंची कीमतों पर बेच सकते हैं।

एक तरफ जहां इस मिशन के तहत प्रमाणन, विपणन और ब्रांडिंग के साथ शुद्ध प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ एक हाइब्रिड मॉडल को प्रोत्साहन देने की रणनीति में यह दिखाया गया है कि प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने और रासायनिक उर्वरकों की खुराक को कम करने से भी लंबे समय तक उत्पादकता बनी रह सकती है और मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। इस मॉडल को व्यापक स्वीकार्यता मिल सकती है। इसे अपनाने वाले किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हाइब्रिड मॉडल में प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने से रासायनिक उर्वरकों पर धीरे-धीरे निर्भरता कम होती है। यहाँ तक कि कुछ समय बाद, किसान कई फसलों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर सकते हैं और फिर भी उतनी ही पैदावार और आमदनी बनाए रख सकते हैं। 

मध्य पूर्व में चल रहे मौजूदा संकट से पैदा हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए, हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने देश के नागरिकों से सात सूत्रीय अपील की है, जिनमें रासायनिक खाद का समझदारी से इस्तेमाल और प्राकृतिक खेती को अपनाना शामिल हैं।

एक ओर जहाँ प्राकृतिक खेती को अपनाने से खेती में स्थायित्व आ रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने में भी मदद मिल रही है, जिनका आम तौर पर दूध देने की उम्र खत्म होने के बाद परित्याग कर दिया जाता है। इसका एक और फ़ायदा यह है कि घरेलु उपभोग और निर्यात के लिए सुरक्षित भोजन मिलता है, साथ ही देश की कीमती विदेशी मुद्रा की भी बचत होती है।             

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(लेखक भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)

स्टीलफ्रेम का पुनर्निर्माण : शासन करने से लेकर सेवातक, समयबद्ध सुधारों का सिलसिला

आर्टिकल /

जब अंग्रेज 1947 में भारत छोड़कर वापस ब्रिटेन जाने लगे, तो वे एक मुहावरा अपने पीछे छोड़ गए : “स्टील फ्रेम”। इसे वे भारतीय सिविल सेवा कहते थे, वह प्रशासनिक ढांचा जिसके जरिए ब्रिटिश राज अपनी हुकूमत चलाता था। स्टील आसानी से नहीं झुकता, और यही वास्‍तविक बात थी। यह ढांचा एक साम्राज्य को स्थिर बनाए रखने के लिए बनाया गया था, न कि उन लोगों की बात सुनने के लिए जिन पर उसने शासन किया था। आजादी के बाद दशकों तक हमें वो फ्रेम विरासत में मिला। हमने उसे नया नाम दिया, उसे खादी का आवरण पहनाया और खुद को बताया कि अब यह हमारा अपना है। लेकिन नियंत्रण के लिए बनाया गया फ्रेम स्‍वभाविक रूप से सेवा के लिए बनाया गया ढांचा नहीं है। और हमारे गणतंत्र के पहले कई दशकों तक, भारत अपने उपनिवेशक देश के ढांचे के अंदर ही बना रहा। एक ही फॉर्म को तीन प्रतियों में दाखिल करता रहा, उन्हीं ऊंची कुर्सियों के सामने कतारों में खड़ा होता रहा और अपने भाग्य के फैसले के लिए किसी “साहब” की प्रतीक्षा करता रहा।

मैंने अपने कामकाजी जीवन का अधिकांश समय इस ढांचे के अंदर बिताया है। पहले एक नागरिक के रूप में और एक प्रोफेशनल के रूप में, फिर भारत सरकार में कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन का प्रभार सौंपे गए मंत्री के रूप में, जिस विभाग का काम ही स्टील फ्रेम की जांच करना और यह पूछना है कि क्या फिर से तैयार करने की आवश्यकता है। इसलिए जब मुझसे पूछा जाता है कि क्या भारत ने अपनी नौकरशाही में सुधार किया है, तो मेरे उत्‍तर में न तो किसी संस्थान की रक्षा करने वाले व्यक्ति का ढाल बनना है, न ही किसी ऐसे व्यक्ति की निंदा है जिसने इसे छोड़ दिया है। यह एक ऐसे व्यक्ति का उत्तर है, जिसने एक ऐसी प्रणाली के बारह वर्षों के शांत लेकिन दृढ़ पुनर्निर्माण को अंदर से देखा है, जिसे स्वतंत्रता के बाद से सार्थक रूप से नहीं छुआ गया था। अगर श्री नरेन्द्र मोदी, जो अपनी पथ-प्रदर्शक सोच के लिए जाने जाते हैं, भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में पदभार नहीं संभालते तो शायद अब भी अछूता रह गया होता।

विचार करें कि हमने कहां से शुरुआत की। 2014 में, केंद्र सरकार से एक नागरिक की शिकायत को अगर हल कर लिया गया, तो इसे करने में औसतन 157 दिन लगे। अगर शिकायत दर्ज कर भी ली गई, तो इसका मतलब देश भर में फैले मुश्किल से दस हजार शिकायत अधिकारियों के साथ एक प्रणाली की खोज करना था, जिनमें से अधिकांश तक पहुंच नहीं थी और वे सभी किसी भी वास्तविक समय सीमा के प्रति कोई जवाबदेह नहीं थे। नौकरी के लिए सरकारी कार्यालय के बाहर कतार में खड़ा एक युवक, अपने पति की पेंशन फ़ाइल का पता लगा रही एक विधवा, यह जानने की कोशिश में लगा एक किसान कि उसके फसल बीमा दावे की फाइल किसी मंत्रालय की अलमारी में से क्यों गायब हो गई, इन सबके सामने एक ही स्थिति थी। उनका सामना नागरिकों को प्रतीक्षा कराने के लिए डिज़ाइन की गई एक सिस्‍टम से और ऐसे अधिकारियों से था, जिनका किसी भी परिणाम के प्रति कोई उत्‍तरदायित्‍व नहीं था। यह केवल अक्षमता नहीं थी। यह उस प्रशासन का अंतिम जीवित अवशेष था जिसका निर्माण समाधान उपलब्‍ध कराने के बजाय डराने के लिए किया गया था।

आज के साथ इसकी तुलना राय का विषय नहीं है; यह संख्याओं में वर्णित है। शिकायत निपटान का समय 157 दिन घटकर 15 दिन रह गया है। आज का हमारा सिस्‍टम नौ गुना अधिक सालाना लगभग 3 लाख से बढ़कर 27 लाख शिकायतों का निवारण करता है। इन शिकायतों का निवारण करने वाले अधिकारियों की संख्‍या दस गुना से अधिक बढ़कर एक लाख तक पहुंच गई है। इस वर्ष मार्च में ही, केंद्रीय सचिवालय ने लगातार पैंतालीसवें महीने में एक लाख शिकायतों के निवारण के आंकड़े को पार कर लिया है। हमने केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (सीपीजीआरएएमएस) का एक ऐसे प्‍लेटफॉर्म में निर्माण किया है जो अब 22 भाषाओं में बोलता है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके एक नागरिक की शिकायत को सही डेस्क पर ले जाता है। यहां तक कि एक दूरस्‍थ गांव में एक किसान की आवाज में, उसकी अपनी भाषा में, एक चैटबॉट के माध्यम से शिकायत दर्ज करने में सक्षम बनाता है। काफी जानबूझकर, हमने इसका नाम समाधान दीदी अर्थात् ‘समाधान करने वाली बहन’ रखा था। जिस ग्रामीण को अपने काम के लिए कभी जिला कार्यालय की यात्रा करने की आवश्यकता होती थी और उम्‍मीद करनी होती थी कि उसका काम सरलता से हो जाए, वह अब अपनी पंचायत में एक सामान्य सेवा केंद्र से यह काम कर सकता है। हर महीने की बीस तारीख को सीएससी-सीपीजीआरएएमएस दिवस के रूप में निर्धारित किया जाता है ताकि यह वादा अंतिम मील तक पहुंच सके।

लेकिन वह गहरा परिवर्तन, जिसे मैं स्टील फ्रेम का सच्चा सुधार मानता हूं, वह डिजिटल प्लंबिंग नहीं है। यह इस दर्शन में बदलाव है कि हम अपने प्रशासनिक अधिकारियों का निर्माण कैसे करते हैं। 70 वर्षों तक, सरकार “नियम-आधारित” संस्कृति पर चलती रही: एक अधिकारी को इस बात से आंका जाता था कि क्या उसने सही प्रक्रिया का पालन किया था, न कि इस बात से कि उसने नागरिक की समस्या को हल किया है या नहीं। 2020 में, हमने मिशन कर्मयोगी लॉन्च किया, जो प्रशासनिक सेवा क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम है। हमने इस कार्यक्रम को इसी “भूमिका-आधारित” संस्कृति में परिवर्तित करने के लिए लॉन्‍च किया था,  जहां एक अधिकारी को इस आधार पर प्रशिक्षित और मूल्यांकन किया जाता है कि उसकी नौकरी वास्तव में उससे क्या मांग करती है, न कि औपनिवेशिक युग की नियम पुस्तिका में क्‍या वर्णन किया गया है। आज एक ग्राम-स्तरीय क्लर्क से लेकर भारत सरकार के सचिव तक 1.65 करोड़ से अधिक सरकारी कर्मचारी, आईजीओटी कर्मयोगी नामक एक सामान्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सीखते हैं, जो अब हिंदी और सत्रह अन्य भारतीय भाषाओं में पांच हजार से अधिक पाठ्यक्रम संचालित करता है। पहली बार, हमने औपचारिक रूप से इस सीखने को एक अधिकारी की पदोन्‍नति के लिए आवश्‍यक वार्षिक मूल्‍यांकन अर्थात्  निष्‍पादन मूल्यांकन रिपोर्ट से जोड़ा है। अब निरंतर सीखना एक गुण नहीं रह गया, जिसका कोई अच्‍छा अधिकारी अभ्यास करता है, बल्कि इसे सीधे उसके करियर से जुड़ा हुआ एक मापतंत्र (मेट्रिक) बना दिया गया है। यह निष्‍पादन जवाबदेही है, एक नारे के रूप में नहीं बल्कि एक तंत्र के रूप में।

हमने अधिकारियों की भर्ती और प्रशिक्षण के तरीके से औपनिवेशिक अवशेषों को हटाने के लिए चुपचाप लेकिन लगातार काम किया है। 2016 के बाद से, निचले और मध्यम स्तर की सरकारी नौकरियों, ग्रुप सी और अराजपत्रित ग्रुप बी पदों के लिए साक्षात्कार, जिन पदों पर पारंपरिक रूप से एक साक्षात्कार का मतलब पक्षपात होता था और अक्सर रिश्वत दी जाती थी, को केंद्र सरकार के कार्यालयों में समाप्त कर दिया गया है। 24 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों ने भी इसका अनुसरण किया है। हमने पुरानी आवश्यकता को खत्‍म कर दिया कि एक उम्मीदवार को एक सरकारी फॉर्म भरने के लिए भरोसा करने से पहले एक राजपत्रित अधिकारी द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित और पुष्टि की जाए। यह एक औपनिवेशिक युग की प्रथा थी जो हर नागरिक को जालसाजी का दोषी मानती थी जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए। हम नौकरशाही औपचारिकता के लिए महीनों इंतजार करवाने के बजाय सफल उम्मीदवारों को पुलिस सत्यापन होने तक अस्थायी रूप से अपनी नई नौकरियों में शामिल होने देते हैं। हमने 1600 से अधिक अप्रचलित कानूनों को निरस्त कर दिया है, जिनका उद्देश्य केवल हमें यह याद दिलाना था कि हम पर पहले किसने शासन किया था। आज जब मैं युवा अधिकारियों से मिलता हूं, तो मैं उन्हें स्पष्ट रूप से बताता हूं कि मैंने इस साल की शुरुआत में उनसे क्‍या कहा था: कि अभी भी दिमाग में सबसे बड़ा सुधार करने की आवश्‍यकता यह है कि अपनी “औपनिवेशिक मानसिकता” को दूर किया जाए। जब प्रधानमंत्री ने हमारे मंत्रालय को नॉर्थ ब्लॉक, जिसका हर पत्‍थर किसी साम्राज्‍य पर शासन के लिए बिछाया गया था, से बाहर कर्तव्‍य भवन में स्‍थानांतरित किया, तो यह केवल पते में बदलाव नहीं था। यह एक वक्‍तव्‍य था कि भारत का कामकाजी शब्‍द कर्तव्य होना चाहिए, न कि नियंत्रण। 

इस सब के साथ-साथ एक शांत सुधार चल रहा है, जिसका उद्देश्य कार्यालय के बाहर के नागरिक के लिए नहीं बल्कि उन महिलाओं पर है जो कार्यालय को भीतर से चलाती हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास के अधिकांश समय में, सरकारी सेवारत महिलाओं को जन्म के समय अपने एक बच्चे को खो देने पर शोक मनाने के लिए कोई औपचारिक छुट्टी नहीं थी; आज वह साठ दिनों के विशेष मातृत्व अवकाश की हकदार है। यह एक ऐसी पात्रता है, जिसे हमने 2022 में प्रदान किया था। इसे मैं केवल करुणा की एक अतिदेय भावना कह सकता हूं, जिसे हमने तब से उन सभी माताओं को उपलब्‍ध कराया है जो सरोगेसी के माध्यम से भी अपने परिवार की देखरेख करती हैं। हम चाइल्ड केयर लीव की सुविधा का लाभ महिलाओं की हर पोस्टिंग तक उपलब्‍ध कराते हैं। यहां तक कि सरकार उसे विदेश यात्रा के लिए भी इसका उपयोग करने की अनुमति देती है। एक सिंगल मदर को एक कैलेंडर वर्ष में इसके छह अवसर देते हैं, जबकि दूसरों को केवल तीन की ही अनुमति दी जाती है। जो महिला जो अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने का साहस करती है, वह अब नब्बे दिनों की छुट्टी की हकदार है, जबकि उसकी शिकायत की जांच अपना काम करती है, यह छुट्टी उसके अपने खाते से नहीं काटी जाती है। दिव्‍यांग महिला अधिकारियों को नवजात शिशु की परवरिश में मदद करने के लिए मासिक भत्ता मिलता है। सरकारी कर्मचारी के दिव्यांग बच्चे के लिए शिक्षा भत्ता दोगुना कर दिया गया है। इनमें से कुछ भी जीडीपी चार्ट में दिखाई नहीं देगा, लेकिन यह इस बात में दिखाई देता है कि क्या एक महिला अब सरकारी सेवा में बने रहने का विकल्प चुनती है जिससे वे एक लंबे समय तक चुपचाप बाहर रही थी। यह भी कि सिविल सेवा ईमानदारी से कह सकती है कि वह जेंडर समानता का वास्‍तव में अनुपालन करती है, न कि केवल साल में एक बार बैनर पर प्रदशित करती है।

बेशक, इनमें से कोई भी मायने नहीं रखता है, जब तक कि एक आम नागरिक के जीवन में कुछ न बदले, और ऐसा न हो। पिछले कुछ वर्षों में रोजगार मेलों के माध्यम से 12 लाख से अधिक नियुक्ति पत्र दिए गए हैं, जो संपर्क और प्रभाव के पुरान‍े रिवाज के बिना वितरित किए गए हैं। मसूरी में एक कॉमन फाउंडेशन कोर्स है, जहां एक आईएएस अधिकारी और एक आईपीएस अधिकारी अपने अलग-अलग संवादहीनता को बनाए रखने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर प्रशिक्षण लेते हैं, ताकि जब वे वर्षों बाद किसी नागरिक से मिलें, तो वे तीन प्रतिस्पर्धी विभागों के बजाय एक सरकार के रूप में कार्य करें। यह सुविधा अब एक पेंशनभोगी के पास है, जो अब बैंक की कतार में खड़े होने के बजाय अपने घर से डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र बना सकती है। एक युवा आकांक्षी छात्र के पास जो हर परीक्षा के लिए एक ही फॉर्म भरने के बजाय यूपीएससी पोर्टल पर एक बार पंजीकरण करता है। सरकारी सेवा में ओबीसी प्रतिनिधित्व 2014 से 19 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गया है। अंग्रेजों ने हमें जो स्टील फ्रेम छोड़ा था, वह कभी भी रातोंरात नष्ट नहीं होने वाला था, और न ही होना चाहिए; संस्थाएं स्मृति को संजोती हैं और स्मृति के अपने उपयोग होते हैं। इन 12 वर्षों में हमने इसका पुनर्निर्माण करने की कोशिश की है, चुपचाप, अलग-अलग सेवाओं के माध्‍यम से, अलग-अलग नियमों के माध्‍यम से, ताकि जिस ढांचे ने कभी एक साम्राज्य को संभाला था, वही अब उस व्यवस्था को सहारा दे सके, जिसका वादा हमारे संविधान ने वास्तव में अपने लोगों से किया था: ऐसी सरकार जो शासन करने के बजाय सेवा करे और केवल प्रशासन करने के बजाय जनता के प्रति उत्‍तरदायी हो।

(लेखक केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री हैं)

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पीके/केसी/एसकेजे/जीआरएस 

उप-राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी

आज़ाद भारत के लिए गाइड

श्री सी.पी. राधाकृष्णन

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के इस खास मौके पर, मैं हर भारतीय को दिल से बधाई देता हूं। साथ ही, मैं उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को आदरपूर्वक नमन करता हूं जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।

पिछले हफ़्ते अंडमान और निकोबार आइलैंड्स की अपनी यात्रा के दौरान, मुझे ‘हर घर तिरंगा’ कैंपेन के तहत हमारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने और महान देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी द्वारा तिरंगा फहराने की ऐतिहासिक याद को सलाम करने का सम्मान मिला। मेरे लिए उस पवित्र ज़मीन पर खड़ा होना बहुत ही इमोशनल और गर्व का पल था, जहां श्री नेताजी की आज़ाद हिंद फौज ने 30 दिसंबर, 1943 को भारत की धरती पर पहली बार तिरंगा फहराया था। इस मौके ने मुझे सितंबर 1939 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मदुरै यात्रा की भी याद दिला दी, जब वे महान स्वतंत्रता सेनानी पासुमपोन मुथुरामलिंगा थेवर के बुलावे पर वहां पहुंचे थे। उस ऐतिहासिक पल ने इस इलाके के अनगिनत देशभक्तों के दिलों में आज़ादी की रोशनी जगा दी थी।

अंडमान में नेशनल मेमोरियल सेलुलर जेल का मेरा दौरा एक और बहुत प्रेरणा देने वाला पल था। इस जेल में भारत माता के महान सपूतों श्री वीर सावरकर जी, श्री योगेंद्र शुक्ला जी, श्री बटुकेश्वर दत्त जी, श्री सचिंद्रनाथ सान्याल जी और कई दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों को गुलामी की ताकतों ने अंधेरी कोठरियों में कैद करके रखा था। आज भी, नेशनल मेमोरियल की ये दीवारें उन वीरों के साहस, तकलीफों और महान बलिदानों की कहानियां कहती हुई लगती हैं, जिन्होंने भारत की आज़ादी और शान के लिए अपनी जान दे दी। इस दौरे ने मुझे उन सभी देश के वीरों को श्रद्धांजलि के तौर पर यह आर्टिकल लिखने की प्रेरणा दी, जिन्होंने करोड़ों लोगों के दिलों में देशभक्ति की आग जलाई और देश को आज़ादी पाने के रास्ते पर आगे बढ़ाया।

9 अगस्त को, जब हम ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की याद कर रहे थे, मुझे अंडमान द्वीप समूह में ‘हर घर तिरंगा’ कैंपेन शुरू करने का मौका मिला। साल 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान करके देश को “करो या मरो” का जोशीला नारा दिया था। इस आह्वान के नतीजे में पूरे देश में आज़ादी की गहरी चाहत पैदा हुई।

आज हमें आज़ादी की ताज़ी हवा में सांस लेने और डेमोक्रेटिक ढांचे के तहत संवैधानिक अधिकारों के साथ जीने का सौभाग्य मिला है, यह उन्हीं स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ी की वजह से है जिन्होंने अपने समय की विदेशी सरकारों के खिलाफ़ डटकर लड़ाई लड़ी। उस समय देश के कोने-कोने से करोड़ों बहादुर स्वतंत्रता सेनानी पूरी लगन और त्याग की भावना के साथ इस संघर्ष में शामिल हुए और कई बहादुरों ने भारत माता की आज़ादी के लिए अपनी जान दे दी।

स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवपूर्ण कहानी

चाहे आज़ादी के सिपाही उत्तर में कश्मीर से हों या दक्षिण में तमिलनाडु से, पश्चिम में गुजरात से हों या पूर्व में असम से—देश के हर इलाके, वर्ग और उम्र के महिला और पुरुष भारत माता की आज़ादी के आम लक्ष्य के लिए एक साथ लड़े।

रानी लक्ष्मीबाई जी की बहादुरी, जो पहले आज़ादी की लड़ाई के दौरान विरोध की अमर निशानी बन गईं, मंगल पांडे जी की हिम्मत और बाल गंगाधर तिलक जी का बेखौफ ऐलान—“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”—आज़ादी की तरफ बढ़ते देश के हर कदम को ताकत देता रहा।

इसी सिलसिले में ओ. चिदंबरम पिल्लई जी ने भी भारत का पहला स्वदेशी शिपिंग बिज़नेस शुरू करके गुलामी के राज के आर्थिक दबदबे को चुनौती दी। इससे यह साबित हुआ कि आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ जंग के मैदान तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि आर्थिक और व्यापारिक मैदान में भी लड़ी गई थी।

भगत सिंह जी, राजगुरु जी और सुखदेव जी की क्रांतिकारी सोच ने आने वाली पीढ़ियों को आज़ादी के लिए त्याग और बलिदान के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। उसी समय, रानी गाइदिन्ल्यू जी की अटूट भावना ने नॉर्थ-ईस्ट इंडिया में ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत की आग जलाए रखी।

असम की युवा बहादुर योद्धा कनकलता बरुआ जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का नेतृत्व किया, हाथों में राष्ट्रीय झंडा थामे, बहुत हिम्मत के साथ आगे बढ़ीं और अपनी जान दे दी। भगवान बिरसा मुंडा जी और कई दूसरे आदिवासी नेताओं ने भी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया।

इतिहास के पन्नों में ऐसी अनगिनत कहानियां हैं, जो हिम्मत, संघर्ष, धैर्य और पक्के इरादे से भरी हैं। इन सभी कहानियों ने मिलकर बहादुरी और बलिदान की एक समृद्ध विरासत बनाई है। वे हमें याद दिलाती हैं कि भारत की आज़ादी अनगिनत नायकों के मिले-जुले प्रयासों से मिली थी और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

स्वतंत्रता आंदोलन में तिरुपुर का योगदान

इस स्वतंत्रता दिवस पर, मैं तिरुपुर कुमारन जी को श्रद्धांजलि देता हूं, जिन्हें ‘कोडी कथा कुमारन’ के नाम से जाना जाता है, जिसका मतलब है ‘झंडे की रक्षा करने वाले कुमारन’। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, उन्होंने मेरे होमटाउन तिरुपुर में आज़ादी के लिए अपनी जान दे दी। मौत का सामना करते हुए भी उन्होंने देश के झंडे को ज़मीन पर नहीं गिरने दिया। इसीलिए उन्हें यह सम्मान वाली उपाधि मिली।

कम उम्र में ही कुमारन जी के दिल में देशभक्ति की लौ जल उठी थी। “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” के नारे से प्रेरित होकर वे आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए। महात्मा गांधी के आदर्शों से बहुत प्रभावित होकर कुमारन जी ने लोगों, खासकर युवाओं में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए ‘देशबंधु युवा संघ’ की स्थापना की। कुमारन जी का पक्का मानना ​​था कि सच्ची आज़ादी तभी मिल सकती है जब लोग विदेशी शासन के ज़ुल्म के बारे में जागरूक हों और उसके खिलाफ लड़ने की हिम्मत और साफ़ सोच विकसित करें।

गांधीवादी सामाजिक सुधार के सिद्धांतों को मानने वाले कुमारन जी ने नशा विरोधी अभियान को भी सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। वे इसे सामाजिक और राष्ट्रीय जागृति की दिशा में एक ज़रूरी कदम मानते थे। इसी मकसद से उन्होंने ताड़ी की दुकानों के सामने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और लोगों को नशे से दूर रहने और सेल्फ-डिसिप्लिन अपनाने के लिए प्रेरित किया।

10 जनवरी 1932 को ‘सिविल डिसओबिडिएंस मूवमेंट’ के दौरान कुमारन जी ने एक जुलूस निकाला। हाथों में तिरंगा लिए, वे कुछ बहादुर साथियों के साथ आगे बढ़े और तिरुपुर की सड़कें “वंदे मातरम” के जोशीले नारों से गूंज उठीं।

ब्रिटिश सरकार की पुलिस ने इस जुलूस पर हमला कर दिया। “वंदे मातरम” का नारा लगाते हुए और तिरंगे को सीने से लगाए हुए, कुमारन जी के सिर पर गंभीर चोटें आईं और उन्होंने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। शहादत के समय उनकी उम्र सिर्फ़ 27 साल थी।

जब मैं तिरुपुर कुमारन जी की उम्र का ज़िक्र करता हूँ, तो मुझे भारत माँ के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले कई नौजवानों की याद आती है। इनमें भगत सिंह (23 साल), सुखदेव (23 साल), राजगुरु (22 साल), खुदीराम बोस (18 साल), कनकलता बरुआ (18 साल), अनंत लक्ष्मण कन्हेरे (19 साल), वंचिनाथन (25 साल) और ऐसे ही कई दूसरे नौजवान शामिल हैं। उन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर जगह बनाई।

मैं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की पहल की तारीफ़ करता हूँ, जिसके ज़रिए राष्ट्रीय आंदोलन के उन गुमनाम नायकों को देश के सामने लाया जा रहा है, जिनके योगदान को इतिहास के पन्नों में लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। मैं सभी जाने-अनजाने स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ।

इस ऐतिहासिक मौके पर, आइए हम अपनी मातृभूमि के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों पर सोचें और अपना वादा फिर से पक्का करें। इस अमृतकाल में, आइए हम 2047 तक एक विकसित भारत बनाने के लिए खुद को समर्पित करें और देश की तरक्की और खुशहाली के लिए मिलकर काम करें।

यह उन बहादुर सपूतों को हमारी सच्ची और सही श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने बहुत हिम्मत से लड़ाई लड़ी और हमारी आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।

जय हिंद!

भारत माता की जय!

(लेखक भारत के वाइस प्रेसिडेंट हैं।)

MSME तंत्र को मजबूत करने के लिए सुधारों का अगला चरण : जीतन राम मांझी


संसद के दोनों सदनों द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 का पारित होना, एमएसएमई के लिए भारत के कानूनी ढांचे को तेज़ी से बदलते तंत्र के अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मूल अधिनियम के बाद से पिछले दो दशकों में, लाखों उद्यम औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बने हैं और एमएसएमई राष्ट्रीय विकास, निर्यात और रोज़गार सृजन में अहम योगदान देने वाले बन गए हैं। इस संशोधन का उद्देश्य एमएसएमई इकोसिस्टम को ज़्यादा संवेदनशील और भरोसे पर आधारित बनाना है। इससे पंजीकरण आसान होगा,  वर्गीकरण बेहतर होगा, ऋण तक पहुंच और समय पर भुगतान आसान होगा, विवादों का निपटारा डिजिटल और तेज़ होगा और नियमों का पालन आसान होगा।

इस संशोधन में उद्यमों के मुफ्त और स्वैच्छिक पंजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रावधान किया गया है। इससे कई तरह की बाधाएं दूर होंगी और सरकार को बेहतर तरीके से लाभ पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। अधिनियम के तहत पंजीकरण एक पात्रता है, जिसका दावा कोई भी कंपनी कर सकती है, यह कोई बाध्यता नहीं है।

यह संशोधन संयंत्र, मशीनरी या उपकरणों में निवेश और कारोबार के संयुक्त मानदंडों के आधार पर उद्यमों के वर्गीकरण के लिए एक स्पष्ट फ्रेमवर्क प्रदान करता है। इस वर्गीकरण से  फ्रेमवर्क  को प्रौद्योगिकी, लागत, बाजार और व्यवसाय मॉडल में आने वाले बदलावों के अनुसार तेज़ी से ढाला सकता है और यह केंद्र सरकार को अधिसूचना के माध्यम से इसकी सीमाओं को निर्धारित करने का अधिकार देता है।

ज़्यादातर एमएसएमई के लिए सबसे बड़ी चिंता नियमित नकद प्रवाह की होती है, क्योंकि किसी छोटे उद्यम का एक भी भुगतान न मिलने का व्यापक असर कर्मचारियों के समय पर वेतन, कच्चे माल की खरीद और अगले ऑर्डर को स्वीकार करने पर पड़ता है, जिससे  भुगतान में देरी होने से कंपनी के काम करने और आगे बढ़ने की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए इस संशोधन में इस समस्या को तीन चरणों – रोकथाम, समाधान और कार्यान्वयन के माध्यम से दूर करने की कोशिश की गई है।

रोकथाम: यह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के लिए ‘ट्रेड्स’ (टीआरइडीएस) के माध्यम से एमएसएमई से संबंधित रसीद (इनवॉइस) के भुगतान और जानकारी देने को अनिवार्य बनाकर पारदर्शिता लाता है। राज्य सरकारें भी यही नियम अपने राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर लागू कर सकती हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित एक डिजिटल प्लेटफॉर्म होने के नाते, ‘ट्रेड्स’ एक स्वीकृत इनवॉइस के आधार पर बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से तुरंत वित्तपोषण प्राप्त करने की सुविधा देता है। इससे आपूर्तिकर्ता को अग्रिम भुगतान मिल जाता है, जबकि खरीदार तय तिथि पर बैंक या वित्तीय संस्थान को भुगतान चुकता करता है। इस प्रकार, रिसिवेबल्स (मिलने वाली रकम) आपूर्तिकर्ता के लिए लिक्विडिटी का ज़रिया बन जाता है, जिससे कंपनी को अपने कामकाज का प्रबंधन करने, बिलों का भुगतान करने और व्यवसाय को आगे बढ़ाने में आसानी होती है।

समाधान: यह इस अधिनियम के विवाद-समाधान फ्रेमवर्क को और अधिक मजबूत करता है। यह राज्य सरकारों को मध्यस्थता और सुलह के लिए अतिरिक्त ‘सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषदों’ (एमएसइएफसी) की स्थापना करने में सक्षम बनाता है। यह मध्यस्थता और सुलह के लिए समय-सीमा निर्धारित करता है तथा ऑनलाइन विवाद-समाधान को वैधानिक मान्यता प्रदान करता है। इससे मामलों का तेजी से निपटारा होगा और एक ऐसी व्यवस्था तैयार होगी जिससे कंपनी प्रक्रिया और समय-सीमा की निश्चितता के साथ अपने जायज़ दावों को पेश कर सकेगी।

कार्यान्वयन: ‘सुविधा परिषदों’ द्वारा दिए गए निर्णय के तहत मिलने वाली रकम को ज़मीन के लगान की बकाया राशि की तरह वसूला जा सकता है। यदि कोई खरीदार किसी फैसले को अदालत में चुनौती देना चाहता है, तो उसे तय राशि का 75 प्रतिशत अदालत में जमा कराना होगा और यदि वह चुनौती छह महीने तक लंबित रहती है, तो अदालत उस जमा राशि में से आधी राशि आपूर्तिकर्ता को जारी कर सकती है। इस प्रकार, लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी के कारण जायज दावों को खारिज नहीं किया जा सकेगा और अदालत में बीतने वाला समय अब केवल खरीदार के पक्ष में नहीं होगा।

यह संशोधन उद्यमों के लिए अनुपालन के प्रति अधिक संतुलित और विश्वास-आधारित दृष्टिकोण की दिशा में बदलाव को भी दर्शाता है। छोटे-मोटे उल्लंघन के लिए अब पहली बार में केवल चेतावनी दी जाएगी और अपराध दोहराए जाने पर अलग-अलग आर्थिक जुर्माने लगाए जा सकते हैं। नियमों के पालन की प्रक्रिया को ज़्यादा अनुमान लगाने लायक और आसान बनाकर,  कंपनियाँ अब अपनी ऊर्जा अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने पर लगा सकती हैं। इससे व्यवसाय करने में सुगमता (ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस) और विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा मिलेगा।

आखिर में, यह संशोधन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में विश्वास का एक प्रतीक है, जो उन्हें नवाचार करने, रोज़गार पैदा करने, नए बाज़ारों में प्रवेश करने और अधिक प्रतिस्पर्धी बनने में सक्षम बनाएगा। एक अधिक मजबूत और गतिशील एमएसएमई क्षेत्र ‘विकसित भारत’ के लक्ष्यों को प्राप्त करने में अहम भूमिका निभाएगा।

(लेखक केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री हैं)

पाठकों में फिर से रूचि जगाना: किताबों को फिर से  बैठक कक्ष में जगह देना

‘बच्चे की दुनिया को समृद्ध बनाने के कई छोटे-छोटे तरीके हैं। उनमें से सबसे अच्छा तरीका है, पढ़ने का आनंद।’    

अर्चना शर्मा अवस्थी  और  युवराज मलिक

भारत में शिक्षा पर चर्चा लंबे समय से ‘पहुँच’ पर केंद्रित रही है – यानि स्कूलों तक, किताबों तक, डिजिटल संसाधनों तक पहुँच। ये चीजें बहुत जरूरी हैं, लेकिन जब हम भारतीय शिक्षा के एक नए चरण की दहलीज पर खड़े हैं, तो हमारे सामने एक और इतना ही जरूरी सवाल है:  

क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जो पढ़ती है?

यह ऐसा सवाल है – जो सुनने में तो आसान लगता है, लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं – जिसने राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय (आरईपी) या राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय की शुरुआत की। इस प्लेटफ़ॉर्म की परिकल्पना केवल एक डिजिटल संग्रहालय के रूप में नहीं, बल्कि घर, स्कूल और समुदाय के स्तर पर भारत की पढ़ने की संस्कृति को समृद्ध करने के जीवंत प्रयास के रूप में की गयी थी।

आज, आरईपी में 23 भाषाओं में 7,000 से ज्यादा चयनित किताबें मौजूद हैं, जो सैकड़ों प्रकाशकों के साथ साझेदारी में विकसित की गई हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के विज़न के अनुरूप हैं। लेकिन इसका उद्देश्य कभी भी एक ऐसा संग्रह बनाना नहीं था, जो लगातार बढ़ता ही जाए। इसके पीछे एक सोच-समझकर अपनाया गया तरीका है: एक ऐसा संग्रह बनाए रखना, जो चयनित, प्रासंगिक और जीवंत हो – जिसे लगातार अद्यतन किया जाता है, जिसमें महत्वपूर्ण किताबें जोड़ी जाती हैं और अप्रासंगिक किताबों को हटाया जाता है। पैमाना मायने रखता है, लेकिन प्रासंगिकता, गुणवत्ता और लगातार जुड़ाव अधिक महत्वपूर्ण हैं।

बाधाओं को दूर करना, आदतों का प्रतिस्थापन नहीं

भारत के कई बच्चों के लिए – खासकर ग्रामीण, अर्ध-शहरी और पिछड़े क्षेत्रों में – पाठ्यपुस्तकों के अलावा अन्य किताबों तक पहुंच एक बड़ी चुनौती है। सबसे नज़दीकी किताब की दुकान कई किलोमीटर दूर हो सकती है। स्कूल के पुस्तकालय में या तो किताबें पुरानी होती हैं या स्कूल अवधि के बाद उपलब्ध नहीं होती हैं। इन बच्चों के पास कल्पना तो है, लेकिन पठन-सामग्री मौजूद नहीं है।

राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय इस कमी को पूरा करता है: एक बच्चा, चाहे वह कहीं भी रहता हो या उसके परिवार का आय स्तर कुछ भी हो, अब अपने घर में पहले से मौजूद उपकरण के जरिए हजारों किताबों के पुस्तकालय तक पहुँच सकता है। बच्चे कभी भी और कहीं भी इन किताबों को पढ़ सकते हैं। यह हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भाषाओं में किताबों पढ़ने का भी अवसर देता है।

लेकिन यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि यह पहल असल में क्या नहीं है।

यह छोटे बच्चों को ज्यादा समय तक स्क्रीन के सामने बिठाने का प्रयास नहीं है। यह परिवारों के लिए एक आमंत्रण है कि वे अपने पास मौजूद उपकरणों का अधिक सार्थक उपयोग करें – उस समय को साझा और समृद्ध अनुभव में बदलें, जो अन्यथा निष्क्रिय होकर, अकेले बैठकर या हानिकारक स्क्रॉलिंग या चीजें देखने में बीत जाता है।

           माता-पिता का छोटे बच्चे को ज़ोर से पढ़कर सुनाना।

             बड़े भाई/बहन का कहानी सुनाना। 

         परिवार का साथ बैठकर पढ़ने के लिए समय निकालना।

ऐसे समय में जब स्क्रीन अक्सर लोगों को एक-दूसरे से दूर करके अपने में ही उलझाए रखती है, किताबें – जिन्हें इन्हीं उपकरणों के ज़रिए पढ़ा जा सकता है – लोगों को फिर से एक साथ लाने की ताकत रखती हैं।

पढ़ने को स्क्रीन टाइम नहीं, बल्कि पारिवारिक समय बनाना।

राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय का उद्देश्य प्लेटफॉर्म के आयामों से कहीं अधिक गहरा है: इसका मकसद पढ़ने की आदत को फिर से घर के बैठक कक्ष में लाना है। 

पढ़ना सिर्फ एक शैक्षणिक गतिविधि नहीं है। यह एक सामाजिक और भावनात्मक गतिविधि भी है। जब परिवार के सदस्य या दोस्त साथ में पढ़ते हैं, तो वे बातचीत, सहानुभूति और सोचने-समझने के लिए जगह बनाते हैं – यह साथ मिलकर ध्यान देने का एक ऐसा गुण है, जो ऐप-सूचना और रोज़मर्रा की ज़रूरतों में बंटी ज़िंदगी में अब कम ही देखने को मिलता है। इस बारे में हुए अध्ययन लगातार बताते हैं कि जिन बच्चों को पढ़कर सुनाया जाता है और जो अपने आस-पास बड़ों को पढ़ते हुए देखते हैं, उनमें न सिर्फ़ पढ़ने-लिखने की बेहतर समझ विकसित होती है, बल्कि उनकी अंदरूनी दुनिया भी ज़्यादा समृद्ध होती है।

आरईपी अंतरपीढ़ी सहयोग की संभावनाएं भी खोलता है। युवा पाठक अपने दादा-दादी या नाना-नानी को पढ़कर सुना सकते हैं। किशोर अपने बड़ों की पसंदीदा कहानियों को पढ़ सकते हैं। ऐसा करने पर, पढ़ना सिर्फ़ अकेले में किया जाने वाला या मजबूरी का काम नहीं रह जाता, बल्कि कुछ और ही बन जाता है – इसे ‘मेरा समय’ के साथ-साथ ‘हमारा समय’ भी कहा जा सकता है।

ऐसा करने पर, पढ़ना सिर्फ़ अकेले में किया जाने वाला या मजबूरी का काम नहीं रह जाता, बल्कि कुछ और ही बन जाता है – इसे ‘मेरा समय’ के साथ-साथ ‘हमारा समय’ भी कहा जा सकता है।

एक समाज के रूप में, हमें अपने आप से एक आसान, लेकिन गहन सवाल पूछना चाहिए: क्या हम स्क्रीन के निष्क्रिय उपयोग का एक हिस्सा वापस ले सकते हैं और उसे उपयोगी पढ़ाई में बदल सकते हैं? हमारा मानना है कि जवाब हाँ है – यदि हम किताबें उपलब्ध कराएं, उन्हें आकर्षक बनाएं और पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि अपनी पसंद का काम बनाएं। 

शिक्षकों के साथ काम करना: अगला चरण  

‘राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय’ अपने अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, लेकिन शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। शिक्षक, पुस्तकालयाध्यक्ष और स्कूल के अग्रणी सिर्फ़ सीखने-सिखाने में मदद करने वाले नहीं होते, बल्कि वे संस्कृति को आकार देने वाले भी होते हैं। पढ़ने की जो आदतें बच्चे स्कूल में विकसित करते हैं, वे अक्सर जीवन भर उनके साथ रहती हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारा सुझाई गई किताबें एक युवा व्यक्ति की सोच का दिशा बदल सकती हैं।

स्कूल जीवन में आरईपी के अर्थपूर्ण समावेश के लिए कई स्तरों पर सोच-समझकर कोशिशें करनी होंगी:

• पुस्तकालय-कक्षाओं को केवल निगरानी वाले अध्ययन कक्ष के बजाय, सक्रिय ज्ञान-प्राप्ति स्थान के रूप में पुनर्जीवित करना,  

• निर्देश के अनुसार पढ़ने और कहानी सुनाने वाले सत्रों को प्रोत्साहित करना, जहां शिक्षक अपनी पसंदीदा किताबें साझा करें 

• सहपाठियों के नेतृत्व में किताब पर चर्चा और पठन-समूह बनाना, जिससे पढ़ने की आदत पर छात्रों को अपना अधिकार महसूस हो

• पढ़ाई को स्कूल जीवन की दैनिक दिनचर्या में शामिल करना, ताकि यह सुबह की सभा जितना ही स्वाभाविक लगे

• विभिन्न लेखन विधियों को समझकर लेखन कौशल में सुधार करना।

एक जीवंत और विकसित होता पुस्तकालय 

पारंपरिक पुस्तकालय अपने अलमारियों में स्थिर और भौतिक आयामों से बंधे होते हैं – इसके विपरीत राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय को गतिशील बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह आपके हाथ में किताबों का खजाना है। यह पाठकों को यह व्यक्त करने भी मौका देता है कि कौन सी अन्य किताबें जोड़ी जानी चाहिए। उपलब्ध किताबें भारत की समृद्ध विरासत और संस्कृति के बारे में भी हैं, जिसे युवा पीढ़ी को जानना चाहिए।

इसका बहुभाषी आधार भी उतना ही अहम है। एक बच्चा उस भाषा में सबसे बेहतर और स्वाभाविक रूप से पढ़ता है, जिसमें वह सोचता है। 23 भाषाओं में किताबें पेश करके – आगे और विस्तार करने की महत्वाकांक्षा के साथ – आरईपी भारत की भाषाई विविधता का सम्मान करता है, इसे केवल एक प्रबंधनीय चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि एक रचनात्मक ताकत के रूप में देखता है, जिसका जश्न मनाया जाना चाहिए। इस प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद हर भाषा एक दरवाज़े की तरह है, जिससे गुज़रकर बच्चा एक नई दुनिया में कदम रख सकता है। 8 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए, यह प्लेटफ़ॉर्म माता-पिता और शिक्षकों को कहानियाँ ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

एक सामूहिक ज़िम्मेदारी

अंततः, राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय की सफलता केवल डाउनलोड और पंजीकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या से तय नहीं होगी, भले ही ये संकेत महत्वपूर्ण हैं। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि क्या पढ़ना फिर से एक आदत बन जाता है – घरों में, स्कूलों में, भारत के विविध और अद्वितीय समुदायों के एकांत कोनों में। किसी दूर-दराज़ इलाके के बच्चे की आँखें तब चमक उठती हैं, जब वह ऐसी किताब पढ़ता है, जिसके बारे में उसने सिर्फ़ सुना होता है।

पढ़ने के लिए राष्ट्रीय आह्वान

यह प्लेटफ़ॉर्म ‘राष्ट्रीय काव्य उत्सव’ जैसी गतिविधियाँ भी आयोजित करता रहता है और नागरिकों से कहानी सुनाने में योगदान देने का आह्वान भी करता है। राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय में और भी कई मज़ेदार और दिलचस्प गतिविधियाँ लगातार शामिल होती रहेंगी।

भारत हमेशा से कहानियों की सभ्यता रहा है। लिखित रूप से पहले की मौखिक परंपराओं से लेकर हिंदी, संस्कृत, तमिल, बंगाली, मराठी और अन्य कई भाषाओं के महान साहित्य तक, इस देश में कहानियों की कभी कमी नहीं रही। आज संकट कहानियों पर नहीं, बल्कि उन्हें खोजने की आदत पर है – यानि शांति से बैठकर किसी वाक्य को समझने और किसी किताब को वह समय देने की इच्छाशक्ति, जिसकी वह मांग करती है।

“जब नागरिक पढ़ते हैं, तो देश आगे बढ़ता है।”

                                 – माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी

(सुश्री अर्चना शर्मा अवस्थी, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग में अपर सचिव हैं। श्री युवराज मलिक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के निदेशक हैं।)

राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय https://ndl.education.gov.in/home पर और एंड्राइड व आईओएस पर निःशुल्क उपलब्ध है।

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ट्रिब्यूनल सुधार: संस्थाओं को मज़बूत करना, न्याय को आगे बढ़ाना

न्याय में आसानी, बिज़नेस करने में आसानी और एक विकसित भारत के लिए एक सुधार रोडमैप @2047

एक विकसित भारत की ओर भारत का सफ़र सुधारों की एक कहानी है, जो देश के लोगों की क्षमताओं और उम्मीदों के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। यह सिर्फ़ आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंस्टीट्यूशनल सुधारों का भी सफ़र है। जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ती है, बिज़नेस बढ़ते हैं, निवेश बढ़ता है और देश ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मज़बूत करता है, आर्थिक गतिविधियों को सपोर्ट करने वाले संस्थानों को भी तेज़ी, पारदर्शिता और भरोसे के साथ आगे बढ़ना होगा। हाल ही में पास हुआ ट्रिब्यूनल सुधार बिल, 2026 इस दिशा में एक ज़रूरी कदम है।

ट्रिब्यूनल सुधार बिल, जिसे अब ज़रूरी संसदीय मंज़ूरी मिल गई है और जो कानून बन रहा है, ट्रिब्यूनल के असल अधिकार क्षेत्र को बदले बिना उनके गवर्नेंस स्ट्रक्चर को मज़बूत करने की कोशिश करता है। इसका मुख्य फ़ोकस इंस्टीट्यूशनल है: नियुक्तियों, गवर्नेंस, पारदर्शिता, सेवा की शर्तों, निष्पक्षता और कुशलता में सुधार। इस लिहाज़ से, यह बिल भारत के लीगल और रेगुलेटरी इकोसिस्टम को ज़्यादा मॉडर्न, भरोसेमंद और असरदार बनाने के मकसद से एक बड़े सुधार के सफ़र के अगले फेज़ को दिखाता है। पिछले एक दशक में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में, देश ने अलग-अलग एरिया में बड़े स्ट्रक्चरल सुधार देखे हैं। GST ने इनडायरेक्ट टैक्स सिस्टम को बदल दिया; इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड ने इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन फ्रेमवर्क को मज़बूत किया; GIFT सिटी फाइनेंशियल फ्रेमवर्क और ‘जन विश्वास’ पहल ने डीक्रिमिनलाइज़ेशन को बढ़ावा दिया और लीगल कम्प्लायंस का बोझ कम किया; डिजिटल इंडिया ने गवर्नेंस को टेक्नोलॉजी से जोड़ा है; हज़ारों कम्प्लायंस कम हुए हैं; कॉलोनियल ज़माने के कानून रद्द कर दिए गए और नए क्रिमिनल कानूनों ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को मॉडर्न बनाया। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल “रिफॉर्म, परफॉर्मेंस और ट्रांसफॉर्मेशन” के इस बड़े कॉन्सेप्ट में पूरी तरह से फिट बैठता है।

मॉडर्न इकॉनमी की ज़रूरतों के कॉन्टेक्स्ट में देखने पर ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स की इंपॉर्टेंस साफ़ हो जाती है। ट्रिब्यूनल टैक्सेशन, कंपनी लॉ, सिक्योरिटीज़, एनवायरनमेंट और दूसरे रेगुलेटरी मामलों जैसे खास एरिया से डील करते हैं। इनका मकसद संवैधानिक अदालतों की जगह लेना नहीं है, बल्कि खास न्यायिक फैसले देकर और एक असरदार न्याय व्यवस्था में योगदान देकर न्याय व्यवस्था को पूरा करना है।

बढ़ती अर्थव्यवस्था में, झगड़ा सिर्फ अकाउंटिंग, कैलकुलेशन या कानूनी चूक का सवाल नहीं है। झगड़े के पीछे एक एंटरप्रेन्योर का भरोसा, एक इंडस्ट्री का इन्वेस्टमेंट, एक बिज़नेस का भविष्य, रोज़गार के मौके और आर्थिक गतिविधियों का जारी रहना हो सकता है। जब झगड़े समय पर और सही तरीके से सुलझ जाते हैं, तो कैपिटल फिर से प्रोडक्टिव सर्कुलेशन में आ जाता है और आर्थिक व्यवस्था में भरोसा मज़बूत होता है।

ऐसा होता है। इसलिए, ‘ईज़ ऑफ़ जस्टिस’ और ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ आपस में जुड़े हुए हैं और एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

42वें कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट के ज़रिए 1976 में संविधान में आर्टिकल 323A और 323B जोड़े गए। इनके ज़रिए एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और दूसरे स्पेशल केस के सिस्टम की नींव रखी गई। इसका मकसद ऐसे केस के लिए एक स्पेशलिस्ट ज्यूडिशियल सिस्टम बनाना था, जिनके लिए खास जानकारी और एक्सपर्टीज़ की ज़रूरत होती है।

समय के साथ, अलग-अलग मिनिस्ट्री और डिपार्टमेंट के तहत कई ट्रिब्यूनल बनाए गए। इससे उनका सिस्टम बिखर गया। एडमिनिस्ट्रेटिव तरीकों में भी अंतर आने लगे और अलग-अलग प्रोसीजर की संख्या बढ़ गई। इस सिस्टम को सही और आसान बनाने की ज़रूरत को देखते हुए, मोदी सरकार ने 2015 में ट्रिब्यूनल को फिर से बनाने का प्रोसेस शुरू किया। 2017 के फाइनेंस एक्ट ने एक जैसे काम करने वाले ट्रिब्यूनल को मिला दिया और उनकी संख्या 26 से घटाकर 19 कर दी। इसके बाद 2017 और 2020 में ट्रिब्यूनल रूल्स आए।

इसके बाद 2021 में ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स ऑर्डर और ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट आया। इसके ज़रिए ट्रिब्यूनल की संख्या 19 से घटाकर 16 कर दी गई। हालाँकि, इन कानूनों के कई नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियरी की आज़ादी और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया था।

रोजर मैथ्यू बनाम मद्रास बार एसोसिएशन और 19 नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले समेत कई न्यायिक फैसलों में लगातार यह माना गया है कि ट्रिब्यूनल के सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा की शर्तें ज्यूडिशियरी की आज़ादी के हिसाब से होनी चाहिए। इन मामलों में यह भी साफ़ किया गया कि ट्रिब्यूनल को एग्जीक्यूटिव के कंट्रोल से आज़ाद रखा जाना चाहिए।

साथ ही, एक नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, जो ट्रिब्यूनल के सिस्टम को ट्रांसपेरेंट और इंडिपेंडेंट तरीके से चला सके। इसी बैकग्राउंड में और संविधान और सुप्रीम कोर्ट के बताए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026 लाया गया है। इसका मकसद देश में एक मॉडर्न, इंडिपेंडेंट और यूनिफॉर्म ट्रिब्यूनल सिस्टम बनाना है, जो असरदार तरीके से काम कर सके।

इस बिल का सबसे ज़रूरी प्रस्तावना नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन है। प्रस्तावित कमीशन के तहत 16 ट्रिब्यूनल को एक कॉमन सिस्टम के तहत लाया जाएगा। इससे उनके एडमिनिस्ट्रेशन और कामकाज के लिए एक यूनिफॉर्म इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क बनेगा। प्रस्तावित कमीशन को सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज या हाई कोर्ट के एक पूर्व चीफ जस्टिस हेड करेंगे। उनके साथ दो ज्यूडिशियल मेंबर और दो टेक्निकल मेंबर होंगे।

इस प्रोविज़न का मकसद ट्रिब्यूनल के एडमिनिस्ट्रेशन में ज्यूडिशियल एक्सपर्टीज़ और टेक्निकल एक्सपर्टीज़ दोनों का बेहतर कोऑर्डिनेशन पक्का करना है। नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन को ट्रिब्यूनल में अपॉइंटमेंट के प्रोसेस में अहम रोल देने का प्रस्ताव है। इसमें मेंबर की खोज और सिलेक्शन, अपॉइंटमेंट, जांच और हटाने से जुड़े प्रोसेस शामिल होंगे। इन सभी कामों के लिए एक इंस्टीट्यूशनल व्यवस्था बनाकर, बिल का मकसद अपॉइंटमेंट प्रोसेस को ज़्यादा ट्रांसपेरेंट, स्ट्रीमलाइन्ड, मेरिट-बेस्ड और इंडिपेंडेंट बनाना है। इसलिए, नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन के तहत एक अलग सेक्रेटेरिएट बनाने का भी प्रस्ताव है। इससे सभी ट्रिब्यूनल के एडमिनिस्ट्रेशन में एक जैसापन लाने में मदद मिलेगी।

एक ऐसे सिस्टम में एक जैसापन बहुत ज़रूरी है जहां ट्रिब्यूनल अलग-अलग खास एरिया में काम करते हैं, लेकिन उनकी इंस्टीट्यूशनल ज़रूरतें काफी हद तक एक जैसी होती हैं। अपॉइंटमेंट, सर्विस की शर्तों और सिलेक्शन प्रोसेस के लिए साफ क्राइटेरिया तय करने के साथ-साथ सभी ट्रिब्यूनल के लिए एक कॉमन नेशनल ट्रिब्यूनल डेटा ग्रिड बनाने से एडमिनिस्ट्रेटिव बिखराव कम होगा और पूरे ट्रिब्यूनल सिस्टम में ज़्यादा एक जैसापन और निरंतरता आएगी।

बिल में ट्रिब्यूनल के चेयरपर्सन और मेंबर के लिए पांच साल का टर्म तय किया गया है। यह टर्म एक तय मैक्सिमम एज लिमिट के तहत होगा। हालांकि, कोई अलग से मिनिमम एज लिमिट तय नहीं की गई है। सैलरी, अलाउंस और सर्विस की दूसरी शर्तें नियमों के ज़रिए तय करने का प्रस्ताव है। यह साफ़ प्रोविज़न ज़रूरी है, क्योंकि सर्विस की शर्तों में स्टेबिलिटी और रिलायबिलिटी इंस्टीट्यूशनल स्टेबिलिटी और ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस को मज़बूत करती है। खास बात यह है कि बिल किसी भी ट्रिब्यूनल के ओरिजिनल जूरिस्डिक्शन में कोई बदलाव नहीं करता है। हर ट्रिब्यूनल का जूरिस्डिक्शन उसके अपने ओरिजिनल कानून के हिसाब से तय होता रहेगा। इस रिफॉर्म को समझने के लिए इस अंतर को समझना ज़रूरी है। बिल ट्रिब्यूनल के जूरिस्डिक्शन को एक जगह से दूसरी जगह रीडिस्ट्रिब्यूट करने के बारे में नहीं है। इसका मकसद उस इंस्टीट्यूशनल अरेंजमेंट को मज़बूत करना है जिसके ज़रिए ट्रिब्यूनल अपने जूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए, ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल को संविधान के प्रिंसिपल्स के हिसाब से ज्यूडिशियल एडमिनिस्ट्रेशन को मज़बूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। एक ट्रिब्यूनल सिस्टम जो इंडिपेंडेंट, ट्रांसपेरेंट, प्रोफेशनली चलता है और समय पर जस्टिस देने में सक्षम है, वह रूल ऑफ़ लॉ को मज़बूत करता है और ज्यूडिशियल सिस्टम में लोगों का भरोसा बढ़ाता है।

यह सिर्फ़ भारत की उभरती इकॉनमी के लिए एक एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म नहीं है। यह डेवलपमेंट के लिए एक बड़े फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है। एक डेवलप्ड इकॉनमी को न सिर्फ़ सड़क, रेलवे, पोर्ट, सी लेन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत होती है, बल्कि एक मज़बूत लीगल, ज्यूडिशियल और इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क की भी ज़रूरत होती है। असरदार ट्रिब्यूनल इस इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा हैं।

इस एक्ट से बनी मज़बूत इंस्टीट्यूशनल व्यवस्था समय पर अपॉइंटमेंट, बेहतर गवर्नेंस, ट्रांसपेरेंट प्रोसेस और झगड़ों का असरदार और तेज़ी से हल पक्का करने में मदद करेगी। इससे एक ऐसा ट्रिब्यूनल सिस्टम डेवलप होगा जो ज़्यादा स्ट्रीमलाइन्ड, भरोसेमंद और नागरिकों, बिज़नेस और इकॉनमी की ज़रूरतों के लिए ज़्यादा रिस्पॉन्सिव होगा। यह एक मॉडर्न लीगल सिस्टम बनाने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है जो मॉडर्न इकॉनमी और डेवलप्ड इंडिया की उम्मीदों के हिसाब से हो। बेहतर गवर्नेंस, इंस्टीट्यूशनल इंडिपेंडेंस, ट्रांसपेरेंसी और एफिशिएंसी को मज़बूत करके, यह रिफॉर्म ‘ईज़ ऑफ़ जस्टिस’ को बढ़ावा देगा, ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ को मज़बूत करेगा और इंडिया के लीगल और इंस्टीट्यूशनल सिस्टम को और मज़बूत करेगा।

जैसे-जैसे इंडिया ‘डेवलप्ड इंडिया @2047’ की ओर बढ़ रहा है और रिफॉर्म की रफ़्तार तेज़ कर रहा है, रिफॉर्म की भावना देश के डेवलपमेंट में योगदान देने वाले हर इंस्टीट्यूशन तक पहुँचनी चाहिए। मज़बूत संस्थाएँ भरोसा जगाती हैं, भरोसा इन्वेस्टमेंट बढ़ाता है, इन्वेस्टमेंट से इकोनॉमिक ग्रोथ बढ़ती है और एक असरदार ज्यूडिशियरी यह पक्का करती है कि यह अच्छा चक्र ‘कानून के राज’ से चलता रहे। ‘ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026’ इस चक्र को मज़बूत करने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है।

(लेखक भारत सरकार में कानून और न्याय के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय मामलों के राज्य मंत्री हैं)

समावेशी, पारदर्शी सरकारी खरीद का बेहतरीन प्लेटफॉर्म है जेम :  पीयूष गोयल

सरकारी खरीद के लिए सरकार का ई-मार्केटप्लेस (जेम) वैश्विक स्तर पर एक पारदर्शी, समावेशी और कुशल प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है, जो 1.37 लाख सरकारी खरीदारों को 25 लाख विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं से जोड़ता है।       

जेम प्लेटफार्म की विशेषता है कि यह खरीद से जुड़ी सभी प्रमुख गतिविधियों को एक बड़े डिजिटल मार्केटप्लेस में एकीकृत करता है। यह वैश्विक सर्वोत्तम तौर-तरीकों को सरकार के समावेशी विकास के साथ जोड़ता है, जिससे यह पीएम मोदी के विकासित भारत 2047 के विजन को आगे बढ़ाने वाला इंजन बन जाता है।

2016 में पीएम द्वारा इस परिवर्तनकारी डिजिटल पहल की शुरुआत के एक दशक में, जेम ने भ्रष्टाचार को मिटाकर और स्टार्टअप, एमएसएमई, महिला उद्यमियों और छोटे शहरों के व्यवसायों को बढ़ावा देकर, सरकारी खरीद में क्रांति ला दी है।

उपयोगकर्ता-अनुकूल यह प्लेटफ़ॉर्म वास्तव में एक रत्न है, जिसने विवादित आपूर्ति और निपटान महानिदेशालय की जगह ली है, जिसकी प्रणालियाँ अस्पष्ट और गैर-प्रतिस्पर्धी थीं। इससे खरीदारी प्रणाली के केवल कुछ सुविधा-प्राप्त लोगों को ही अनुचित फ़ायदा मिलता था।  

यह उचित है कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का नया, आधुनिक कार्यालय, वाणिज्य भवन, उसी ज़मीन पर बना है, जहाँ कभी वह पुरानी और संदिग्ध प्रतिष्ठा वाली संस्था हुआ करती थी।

वाणिज्य और उद्योग के मंत्री के रूप में, मुझे गर्व है कि जेम, जिसे 9 अगस्त 2016 को लॉन्च किया गया था, अपनी शानदार सेवा के दस साल पूरे कर रहा है। यह सिर्फ आंकड़ों का जश्न मनाने वाला पड़ाव नहीं है; बल्कि यह इस बात में एक बुनियादी और सफल बदलाव है कि कैसे सरकारी खरीद देश के निर्माण में योगदान देती है।

पारदर्शिता, व्यवसाय करने में आसानी

उत्पाद खोजने और बोली लगाने से लेकर अनुबंध देने और भुगतान करने तक, पूरी खरीद प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर जेम ने मनमाने फैसलों को खत्म किया है, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है और लोगों के भरोसे को मजबूत किया है। हर लेन-देन का एक डिजिटल रिकॉर्ड बनता है जिसकी जांच की जा सकती है; इससे जवाबदेही बढ़ती है और सरकारी खरीद के प्रति निष्ठा मजबूत होती है।

जेम पीएम मोदी के व्यवसाय करने में आसानी मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एकल डिजिटल विंडो, आसान पंजीकरण, मानकीकृत प्रक्रिया और नियमित नीतिगत सुधार – जैसे अमानत राशि को ख़त्म करना और लेन-देन शुल्क को युक्तिसंगत बनाना – के जरिये जेम ने भागीदार बनने की बाधाओं को काफी हद तक कम किया है, जिससे सरकारी खरीद तक पहुंच आसान हो गयी है। 

आत्मनिर्भर भारत

जेम ने आत्मनिर्भरता और स्वदेशी उद्यमों को बढ़ावा देने के लक्ष्य को मजबूती से आगे बढ़ाया है। घरेलू निर्माताओं और सेवा प्रदाताओं को प्राथमिकता देकर, इसने स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत किया है और देशी उत्पादन को प्रोत्साहित किया है।

पोर्टल पर दिया गया हर ऑर्डर भारत की निर्माण क्षमता और आर्थिक संप्रभुता में एक निवेश है। खास बात यह है कि जेम में मात्रा के आधार पर लगभग 60% ऑर्डर और सकल माल मूल्य (जीएमवी) में 45% से ज़्यादा की हिस्सेदारी सूक्ष्म और लघु उद्यमों (एमएसई) की है।

समावेशी सरकारी खरीद 

जेम, पीएम मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ मिशन के अनुरूप समावेशी विकास का एक महत्वपूर्ण इंजन के रूप में सेवाएं देता है। यह स्टार्टअप्स, छोटे व्यवसायों और महिलाओं द्वारा संचालित उद्यमों को बिना किसी बाधा या मध्यस्थ के सरकारी खरीदारों के सामने अपने उत्पादों और सेवाओं को आसान तरीके से पेश करने का मौका देता है।  

प्रवेश करने की बाधाओं को खत्म करके और सरकारी खरीद तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाकर, जेम ने पूरे देश के छोटे व्यवसायों को राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भागीदार बनने और उस व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए सशक्त बनाया है, जिस पर कभी स्थापित कंपनियों का दबदबा हुआ करता था।

जेम के माध्यम से 12 लाख से अधिक सूक्ष्म और लघु उद्यमों ने 9 लाख करोड़ रुपये से अधिक के सरकारी ऑर्डर पूरे किए हैं। 2.20 लाख से ज्यादा महिला उद्यमियों ने 99,713 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर हासिल किए हैं, जबकि 42,000 से अधिक स्टार्टअप्स ने 65,600 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर पूरे किए हैं। जेम ने 69,000 से ज्यादा एससी/एसटी उद्यमियों को सरकारी खरीद में भाग लेने का अवसर दिया है, और उन्होंने 23,145 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर पूरे किए हैं।

विकास का उत्प्रेरक

ये उपलब्धियाँ इस बात की फिर से पुष्टि करती हैं कि जेम की भूमिका एक डिजिटल खरीद प्लेटफ़ॉर्म से कहीं ज़्यादा है। यह प्लेटफार्म समावेशी विकास, उद्यमिता और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए उत्प्रेरक है, जो सुनिश्चित करता है कि हर योग्य उद्यम को भारत के विकास में योगदान देने का समान अवसर मिले।    

कई मायनों में, जेम की यात्रा ‘विकसित भारत 2047’  की आकांक्षाओं को दर्शाती है, जो प्रधानमंत्री के विकसित भारत के विजन के अनुरूप है – एक ऐसा भारत जो पारदर्शी, समावेशी, नवोन्वेषी और डिजिटल रूप से संप्रभु हो।

हम जेम के दूसरे दशक में प्रवेश कर रहे हैं, हमारा विज़न इसे एक स्मार्ट, हरित और विश्व-स्तरीय प्लेटफ़ॉर्म के रूप में विकसित करना है, जो नई तकनीकों का उपयोग करता है और साथ ही हितधारकों, खासकर हमारे नवोन्मेषियों, स्टार्टअप्स, छोटे कारोबार, महिलाएं, युवा और छोटे शहरों और वंचित वर्गों से आने वाले उद्यमियों की भागीदारी को बढ़ाता है ।

भारत के सबसे सफल डिजिटल सरकारी खरीद इकोसिस्टम्स में से एक के रूप में, जेम यह दिखाता है कि कैसे तकनीक, डेटा विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपयोगकर्ता-केंद्रित डिज़ाइन सार्वजनिक खर्च में गति, दक्षता और पैसों की सही कीमत प्रदान कर सकते हैं। पिछले दो वित्त वर्षों में, इस प्लेटफ़ॉर्म का वार्षिक जीएमवी 5 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया है, जिससे इसका कुल मूल्य लगभग 20 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसमें अब 10,644 उत्पाद श्रेणियां और 350 सेवा श्रेणियां शामिल हैं।

चाहे वह जीवन रक्षक दवाइयाँ और टीके हों, जो अस्पतालों तक तेजी से पहुँच रहे हैं, रक्षा सामग्री और ड्रोन हों, जो कुशलता से पहुंचाए जा रहे हैं, उच्च गुणवत्ता वाले उपकरण हों, जो कक्षाओं को बदल रहे हैं, या विश्वसनीय अवसंरचना हो, जो गांवों को सशक्त बना रही है – पारदर्शी और कुशल खरीद सार्वजनिक सेवाओं की उच्च गुणवत्ता और संसाधनों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करती है।

इस बदलाव के सच्चे लाभार्थी भारत के नागरिक हैं। आईआईटी दिल्ली के एक अध्ययन (जुलाई-अगस्त, 2026) में पाया गया कि जेम के माध्यम से खरीदारी से पिछले तीन वित्त वर्षों (वित्त वर्ष 2023-24 से 2025-26) में 86,571.69 करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ हुआ, जिसमें कीमत और प्रक्रिया की दक्षता से हुई बचत शामिल है। इसी तरह, अध्ययन में जेम के 101 उत्पादों की तुलना फ्लिपकार्ट, अमेज़न, इंडियामार्ट जैसे प्लेटफार्मों पर उपलब्ध समान वस्तुओं से की गई। इसमें पता चला कि जेम की कीमतें 74.3% वस्तुओं के सन्दर्भ में सस्ती थीं, जिससे लगभग 13.6% की कुल बचत हुई।

जेम पोर्टल भारत की आर्थिक वृद्धि और पीएम मोदी के विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण इंजन के रूप में कार्यरत है। यह समाज के वंचित वाले वर्गों को सशक्त बनाता और उनका उत्थान करता है तथा उद्यमिता को बढ़ावा देता है। साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि टैक्स देने वालों का पैसा प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों को कुशलतापूर्वक खरीदने में इस्तेमाल हो।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं)

बराबर समय, तय रिटायरमेंट उम्र और मेरिट के आधार पर सिलेक्शन से हमारे ट्रिब्यूनल में काबिल लोग आएंगे और वे वहीं बने रहेंगे: -जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी

AVJ हाइट्स के अपार्टमेंट मालिक लंबे समय से ऑर्डर का इंतज़ार कर रहे हैं। उनका बिल्डर, AVJ डेवलपर्स, 2019 में दिवालिया हो गया था। क्रेडिटर्स ने 4 जुलाई, 2024 को रिवाइवल प्लान को मंज़ूरी देने के लिए वोट किया। यह प्लान आठ दिन बाद नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के सामने गया। लगभग दो साल बाद भी, इसे मंज़ूरी का इंतज़ार था।

अप्रैल 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ाइल को देखा और एक बड़ा सवाल पूछा। उसने नेशनल लेवल पर डेटा मांगा। देश भर में NCLT बेंच के सामने रेज़ोल्यूशन प्लान की मंज़ूरी के लिए लगभग 383 एप्लीकेशन पेंडिंग थीं। देरी 48 दिन से 738 दिन तक थी। कुछ मामलों में यह 4 साल के करीब थी। कोर्ट ने साफ़ कहा कि तस्वीर “बहुत निराशाजनक और गंभीर” है।[1]

यह कानून की नाकामी नहीं है; यह काबिलियत की नाकामी है।

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड 330 दिनों की बाहरी लिमिट तय करता है। कानून का पालन किया गया है; कैलेंडर का नहीं।
यह कानून की नाकामी नहीं है; यह काबिलियत की नाकामी है।

ट्रिब्यूनल कभी भी बाद में नहीं सोचे गए। 1976 में संविधान में जोड़ा गया पार्ट XIV-A एक वजह से बनाया गया था। उनका मकसद उन झगड़ों को तेज़ी से और एक्सपर्ट तरीके से निपटाना था जो आम अदालतों पर बोझ डाल रहे थे। एल. चंद्र कुमार (1997) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाई कोर्ट का कॉम्प्लिमेंट बताया था। इसलिए, मेरिट का टेस्ट यह नहीं है कि ट्रिब्यूनल फेयर (बेगुनाह) है या नहीं। टेस्ट यह है कि क्या यह उन अदालतों से ज़्यादा तेज़ और एक्सपर्ट है जिनका बोझ यह कम करता है। मौजूदा डेटा के आधार पर, वे हमेशा ऐसे नहीं होते हैं।

इसका स्केल बहुत बड़ा है। लोकसभा में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, 2025 में 16 मुख्य ट्रिब्यूनल में 5.36 लाख केस पेंडिंग थे। डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRTs) में सबसे ज़्यादा 2.45 लाख केस पेंडिंग थे, इसके बाद कस्टम, एक्साइज और सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (CESTAT) में 71,454 केस थे।4

इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में NCLT के सामने लगभग 30,600 केस लिस्ट किए गए थे। इसमें चेतावनी दी गई थी कि मौजूदा डिस्पोज़ल रेट पर, उन्हें डिस्पोज़ होने में एक दशक5 लग सकता है। 31 जनवरी 20266 तक सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में 69,581 केस पेंडिंग थे। आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल में 11,000 से ज़्यादा केस पेंडिंग हैं।7

देरी कहाँ से शुरू होती है? अक्सर, खाली कुर्सी से।

पर्सनेल, पब्लिक ग्रीवांस, लॉ और जस्टिस पर पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी ने 7 अगस्त 2026 को ट्रिब्यूनल सिस्टम पर रिपोर्ट दी। इसके नतीजे बहुत बुरे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) अपनी कम से कम कानूनी ताकत से कम के साथ काम कर रहा है। NCLT के 95 परसेंट से ज़्यादा स्टाफ कॉन्ट्रैक्ट पर हैं। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल में पिछले पांच महीनों में पेंडिंग केसों की संख्या में 19,275 की बढ़ोतरी हुई है। ट्रिब्यूनल बनने के बाद से TDSAT की मंज़ूरी देने की क्षमता में कोई बदलाव नहीं आया है।

खाली जगहें सिर्फ़ एडमिनिस्ट्रेटिव डिटेल्स नहीं हैं। कोई भी बेंच बिना कोरम (कम से कम अटेंडेंस) के नहीं बैठ सकती। जो मामला लिस्ट नहीं हो सकता, उसकी सुनवाई नहीं हो सकती। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026 इसी बात को जड़ से सुलझाता है।

खाली पद क्यों बने रहते हैं?

क्योंकि सर्विस की शर्तें कभी तय नहीं की गईं। कोई भी जज या सीनियर प्रोफेशनल अपनी पुरानी प्रैक्टिस या प्रैक्टिस को अनिश्चित और छोटे समय के लिए नहीं छोड़ेगा। ट्रिब्यूनल के अलग-अलग समय, अलग-अलग रिटायरमेंट की उम्र और चुनने के अलग-अलग तरीके रहे हैं। हर खाली पद को एक नई एक्सरसाइज के तौर पर लिया गया है। विज्ञापन, जांच और मंज़ूरी आमतौर पर खाली पद के खाली होने के बाद शुरू होती है, उससे पहले नहीं।

यह चेयरमैन के लिए रिटायरमेंट की उम्र सत्तर साल और सदस्य के लिए 67 साल तय करता है, जिसमें पांच साल का समय होता है। यह वह कम से कम लिमिट है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास बार एसोसिएशन के मामलों में तय किया था और एक से ज़्यादा बार लागू किया था। बिल चार साल के समय या पचास साल की कम से कम उम्र को फिर से लागू नहीं करता है, जिसे कोर्ट ने नवंबर 2025 में रद्द कर दिया था। तय रिटायरमेंट की उम्र के साथ पांच साल का समय एक करियर है, सिर्फ़ एक समय नहीं। इसलिए, वकालत या प्रैक्टिस छोड़ना सही है।

चुनाव भी समय-समय पर होने वाले प्रोसेस के बजाय एक परमानेंट प्रोसेस बन जाता है। एक परमानेंट सेक्रेटेरिएट खाली पदों की स्थिति पर नज़र रखेगा, पोस्ट का विज्ञापन करेगा और एलिजिबिलिटी चेक करेगा। एडमिनिस्ट्रेटिव मिनिस्ट्री, जो अक्सर इन ट्रिब्यूनल के सामने सबसे बड़ा केस लड़ने वाला होता है, उस जांच से बाहर रखा जाता है। नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन (NTC) द्वारा बनाई गई सर्च-एंड-सिलेक्शन कमेटी में एक चेयरमैन होता है जो सुप्रीम कोर्ट का पूर्व जज या हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस होना चाहिए, साथ ही दो ज्यूडिशियल मेंबर होते हैं जो हाई कोर्ट के पूर्व जज होने चाहिए और दो टेक्निकल मेंबर होते हैं जिन्हें पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, फाइनेंस, लॉ या टेक्नोलॉजी जैसे एरिया में कम से कम 25 साल का एक्सपीरियंस होना चाहिए। पैनल के एक्सपर्ट कैंडिडेट के अपने फैसलों और काम को पहले से पब्लिश क्राइटेरिया के आधार पर इवैल्यूएट करेंगे। कमेटी की अध्यक्षता एक ज्यूडिशियल मेंबर करेगा जिसके पास कास्टिंग वोट होगा। यह एक तय टाइम फ्रेम के अंदर एक वेटिंग लिस्ट के साथ एक नाम रिकमेंड करेगा।

एक नाम मायने रखता है। नामों का एक पैनल फाइनल चॉइस को एग्जीक्यूटिव के पास वापस भेजता है। यह आखिरकार उसी देश को हरा देता है जिसे कमेटी में ज्यूडिशियल दबदबा हासिल करने का मकसद था। एक नाम पर फैसला उसे मेरिट के आधार पर ठीक वहीं छोड़ देता है जहां उसे रखा गया था।

एक आलोचना का सीधा जवाब मिलना चाहिए। सरकार खुद इन पोस्ट को भरने में धीमी रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में ऐसा कहा था, और सही भी कहा था।9 इसका जवाब कोई नया भरोसा नहीं हो सकता। जो भी हो, यह बदलाव इस समस्या को भी हल करता है। यह एक ऐसा स्ट्रक्चर होना चाहिए जो देरी का पता लगाए, जवाबदेही पक्का करे और जिसे बेहतर बनाया जा सके। एक परमानेंट सेक्रेटेरिएट, एक लाइव वेटिंग लिस्ट और खास

जो टाइम लिमिट तय की गई है, वह बस एक रिकॉर्ड है। जहां कोई कदम चूक जाता है, उसे पहचाना जा सकता है और सवाल उठाए जा सकते हैं।
एक जैसी सर्विस की शर्तें अपने आप में दशकों से पेंडिंग केसों का बैकलॉग खत्म नहीं कर देंगी। जैसा कि स्टैंडिंग कमिटी ने रिकमेंड किया है, रजिस्ट्री स्टाफ, कोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल सिस्टम में भी सुधार होना चाहिए।10 लेकिन किसी भी ट्रिब्यूनल ने बिना किसी मेंबर के केस का निपटारा नहीं किया है।

ए. वी. जे. हाइट्स में, फ्लैट तैयार हैं और प्लान भी तैयार है। बस एक बेंच की कमी है जो इसे सही समय पर पढ़ सके। कुर्सी भरी होनी चाहिए और वह किसी के बैठने लायक होनी चाहिए। यह बिल यही चाहता है।

(लेखक भारत के एक जाने-माने कानून के जानकार और भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं।)

न्यायाधिकरण सुधार विधेयक 2026: स्वतंत्र और आत्मनिर्भर न्यायाधिकरणों की दिशा में बड़ा कदम

एक न्यायाधिकरण, जो अपने आप में पूर्ण है : एन. वेंकटरमण

भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (उच्चतम न्यायालय)

हमारे सार्वजनिक अधिनियमों में न्यायाधिकरणों के गठन से जुड़े कुछ ही प्रश्न ऐसे हैं, जिनकी इतनी बार पुनर्समीक्षा हुई है। 1987 के एस. पी. संपत कुमार मामले से लेकर नवंबर 2025 में मद्रास बार एसोसिएशन से संबंधित निर्णय तक, न्यायालयों ने कानून निरस्त किये, निर्देश जारी किए और फिर उसी आधार पर स्वयं को नए कानूनों की समीक्षा करते हुए पाया। यह विषय इतने चक्र से गुजरा है, जो अपने आप में दर्शाता है कि समस्या कितनी कठिन रही है। न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 इसीलिए ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अंततः वास्तविक समस्या की पहचान कर ली है और उम्मीद है कि समाधान भी खोज लिया है।

दूसरे देशों और स्वयं के अनुभव से मिली सीख

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। दूसरे देशों को भी इसका सामना करना पड़ा है और उनका निदान ध्यान देने योग्य है। ब्रिटेन में जब सर एंड्रयू लेगट ने 2001 में इस क्षेत्र की समीक्षा की, तो पाया कि सत्तर से अधिक न्यायाधिकरणों का प्रशासन उन्हीं विभागों द्वारा किया जा रहा था, जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते थे। उन्होंने इसे मूल दोष माना। उनका उपाय कार्यकाल में बदलाव या योग्यताओं को परिष्कृत करना नहीं था। उनका समाधान था कि न्यायाधिकरणों को उनके प्रायोजक विभागों से अलग कर उनका प्रशासन एकल सेवा के अधीन किया जाए। यही सुधार 2007 के अधिनियम का आधार बना। यह सुधार संरचनात्मक था। उसने निर्भरता के लक्षणों को नहीं, बल्कि निर्भरता की वजह का समाधान किया।

भारत ने न्यायाधिकरणों की व्यवस्था को प्रारंभिक चरण में ही अपनाया और, कुल मिलाकर, यह सफल रही। 1941 में स्थापित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण आज भी विशेषज्ञतापूर्ण न्यायनिर्णयन के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है। इस प्रारूप को अनुच्छेद 323ए और 323बी तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 द्वारा आगे बढ़ाया गया और बाद में विभिन्न नियामक क्षेत्रों में उस उच्च स्तर पर इसका विस्तार हुआ, जिसे उच्च न्यायालय नहीं ले सकते थे। पर हमारी समस्या अलग तरह की थी। जैसा कि न्यायालय की 2020 की टिप्पणी में कहा गया कि स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब न्यायाधिकरणों को अपने कार्य करने के लिए कार्यपालिका के कंधों का सहारा न लेना पड़े।

पहले के प्रयासों से समस्या का समाधान क्यों नहीं हो सका

इस बारे में सुधार एक से अधिक बार किए गए हैं और हर बार सच्ची भावना के साथ किए गए हैं। इसके बाद होने वाली अधिकांश मुकदमेबाजी इस बात को लेकर रही कि कार्यकाल तीन वर्ष का होना चाहिए या चार या पांच वर्ष का, न्यूनतम आयु पचास वर्ष होना स्वीकार्य है या नहीं, और एक नाम या दो नामों की समिति की सिफारिश होनी चाहिए। सम्मानपूर्वक कहना होगा कि इनमें से कोई भी बात मूल समस्या तक नहीं पहुंचती। स्वतंत्र न्यायाधिकरण अंकगणित पर निर्भर नहीं करते। कार्यकाल, आयु और नामों की संख्या वे लक्षण हैं जिनके माध्यम से रोग का निदान किया गया है। वे स्वयं बीमारी नहीं हैं।

मूल बात

मूल बात यह है कि न्यायाधिकरण एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर संस्था होनी चाहिए। उसका अपना प्रतिष्ठान होना चाहिए, अपने सदस्यों के चयन का उसका अपना साधन होना चाहिए, उन पर निगरानी रखने और उन्हें अनुशासित करने की अपनी व्यवस्था होनी चाहिए तथा परिसर, कर्मचारियों और धन की अपनी व्यवस्था होनी चाहिए। जहां ये सभी व्यवस्थाएं मौजूद हों, वहां स्वतंत्रता स्वाभाविक रूप से आ जाती हैं।

नया विधेयक उन सभी बिंदुओं पर न्यायालय को उत्तर देता है, जिन पर न्यायालय अपनी बात कह चुका है। लेकिन इससे भी बढ़कर एक ऐसी संस्था स्थापित करने का प्रयास है जो उन उत्तरों को स्वयं लागू करने योग्य बना दे। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना कानून द्वारा की जानी है। उसका अस्तित्व, गठन और कार्य किसी कार्यपालिका आदेश से नहीं, बल्कि अधिनियम से संचालित होंगे और उसे चयन, निगरानी, अनुशासन तथा न्यायाधिकरणों की आवश्यकताओं के आकलन का दायित्व है। उसके चारों ओर एक स्थायी पेशेवर सचिवालय स्थापित किया जाएगा।

सर्वोच्चता, समान दूरी और नियंत्रण जो व्यवस्था को प्रभावी बनाते हैं

विधेयक में उन प्रत्येक बिंदुओं पर न्यायिक सर्वोच्चता बनाए रखी गयी है, जहां उसका महत्व है। आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी और उसमें न्यायिक बहुमत का प्रावधान है। समितियों की अध्यक्षता न्यायिक रूप से की जाती है तथा निर्णायक मत न्यायिक अध्यक्ष के पास ही होता है। चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन—सभी का नेतृत्व न्यायिक तौर पर किया जाता है।

यह उस बात के अनुरूप है जो न्यायालय आर. गांधी मामले के बाद से कहता आया है कि कार्यपालिका, जो सबसे बड़ी वादी है, उन लोगों के चयन में प्रमुख भूमिका नहीं निभा सकती जो उसके मामलों का निर्णय करते हैं।

इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण यह है कि सर्वोच्चता का अर्थ नियंत्रण नहीं है। पूरी व्यवस्था न्यायिक पक्ष को सौंप देना भी चुनौतियों के रूप में देखा जाता है। इसलिए यह विधेयक न्यायाधिकरण को तीन स्तरों से कार्यपालिका और न्यायपालिका से समान दूरी पर रखता है। केंद्र सरकार नियमों द्वारा व्यापक सिद्धांत निर्धारित करती है। आयोग उन नियमों को लागू करने के तरीके को नियंत्रित करने वाले विनियम बनाता है। सचिवालय इसी ढांचे के तहत काम करता है। उसे कार्य करने के तरीके के बारे में मार्गदर्शन दिया गया है, लेकिन परिचालन स्तर पर उसे निर्देशित नहीं किया जाता और वह अपने कार्य अधिनियम से प्राप्त करता है, न कि अधिकार या कार्य किसी दूसरे को सौंपे जाने के प्रत्यायोजन से।

इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग, सचिवालय और कार्यपालिका के संयोजन से उत्पन्न नियंत्रण और संतुलन की वास्तविक व्यवस्था है। सचिवालय पात्रता की जांच और उसका अभिलेखन तैयार करेगा, जिसके आधार पर प्रत्येक निर्णय लिया जाना है। वह प्रकाशित विनियमों से बंधा है और अपने कार्यों का रिकॉर्ड रखेगा।

विधेयक द्वारा कायम यही वह नाजुक संतुलन है। इसमें न तो प्रशासन में न्यायिक हस्तक्षेप है और न ही वास्तविक रूप से कार्यपालिका पर निर्भरता, जबकि चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन में न्यायिक सर्वोच्चता बनी रहती है। कनाडा ने 2014 में इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया था, जब उसने अपने संघीय न्यायाधिकरणों की सहायक सेवाओं को एक ही संगठन के अधीन लाते हुए उनके न्यायनिर्णयन संबंधी स्वतंत्रता बरकरार रखी।

इस प्रकार के कानून का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह न्यायिक चुनौती में टिकता है या नहीं। इसका मूल्यांकन इस तथ्य के आधार पर होना चाहिए कि क्या वह उन स्थितियों को समाप्त करता है, जिनसे ये चुनौतियां पैदा हुईं। विधेयक इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। यदि यह अपने निर्धारित स्वरूप में काम करता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायाधिकरण व्यवस्था में काफी सुधार आएगा। इसमें वादी को अंततः ऐसा मंच मिलेगा जो उचित रूप से गठित, पर्याप्त रूप से व्यवस्थित होगा, जहां रिक्तियां समय पर भरी जाएंगी तथा जो अपने कार्य-प्रदर्शन के लिए जवाबदेह होगा। विकसित किया गया यह मॉडल, यदि सफल रहा तो भविष्य में अन्य प्रकार के चयन के लिए भी काफी उपयोगी होगा।