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न्यायाधिकरण सुधार विधेयक 2026: स्वतंत्र और आत्मनिर्भर न्यायाधिकरणों की दिशा में बड़ा कदम

एक न्यायाधिकरण, जो अपने आप में पूर्ण है : एन. वेंकटरमण

भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (उच्चतम न्यायालय)

हमारे सार्वजनिक अधिनियमों में न्यायाधिकरणों के गठन से जुड़े कुछ ही प्रश्न ऐसे हैं, जिनकी इतनी बार पुनर्समीक्षा हुई है। 1987 के एस. पी. संपत कुमार मामले से लेकर नवंबर 2025 में मद्रास बार एसोसिएशन से संबंधित निर्णय तक, न्यायालयों ने कानून निरस्त किये, निर्देश जारी किए और फिर उसी आधार पर स्वयं को नए कानूनों की समीक्षा करते हुए पाया। यह विषय इतने चक्र से गुजरा है, जो अपने आप में दर्शाता है कि समस्या कितनी कठिन रही है। न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 इसीलिए ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अंततः वास्तविक समस्या की पहचान कर ली है और उम्मीद है कि समाधान भी खोज लिया है।

दूसरे देशों और स्वयं के अनुभव से मिली सीख

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। दूसरे देशों को भी इसका सामना करना पड़ा है और उनका निदान ध्यान देने योग्य है। ब्रिटेन में जब सर एंड्रयू लेगट ने 2001 में इस क्षेत्र की समीक्षा की, तो पाया कि सत्तर से अधिक न्यायाधिकरणों का प्रशासन उन्हीं विभागों द्वारा किया जा रहा था, जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते थे। उन्होंने इसे मूल दोष माना। उनका उपाय कार्यकाल में बदलाव या योग्यताओं को परिष्कृत करना नहीं था। उनका समाधान था कि न्यायाधिकरणों को उनके प्रायोजक विभागों से अलग कर उनका प्रशासन एकल सेवा के अधीन किया जाए। यही सुधार 2007 के अधिनियम का आधार बना। यह सुधार संरचनात्मक था। उसने निर्भरता के लक्षणों को नहीं, बल्कि निर्भरता की वजह का समाधान किया।

भारत ने न्यायाधिकरणों की व्यवस्था को प्रारंभिक चरण में ही अपनाया और, कुल मिलाकर, यह सफल रही। 1941 में स्थापित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण आज भी विशेषज्ञतापूर्ण न्यायनिर्णयन के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है। इस प्रारूप को अनुच्छेद 323ए और 323बी तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 द्वारा आगे बढ़ाया गया और बाद में विभिन्न नियामक क्षेत्रों में उस उच्च स्तर पर इसका विस्तार हुआ, जिसे उच्च न्यायालय नहीं ले सकते थे। पर हमारी समस्या अलग तरह की थी। जैसा कि न्यायालय की 2020 की टिप्पणी में कहा गया कि स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब न्यायाधिकरणों को अपने कार्य करने के लिए कार्यपालिका के कंधों का सहारा न लेना पड़े।

पहले के प्रयासों से समस्या का समाधान क्यों नहीं हो सका

इस बारे में सुधार एक से अधिक बार किए गए हैं और हर बार सच्ची भावना के साथ किए गए हैं। इसके बाद होने वाली अधिकांश मुकदमेबाजी इस बात को लेकर रही कि कार्यकाल तीन वर्ष का होना चाहिए या चार या पांच वर्ष का, न्यूनतम आयु पचास वर्ष होना स्वीकार्य है या नहीं, और एक नाम या दो नामों की समिति की सिफारिश होनी चाहिए। सम्मानपूर्वक कहना होगा कि इनमें से कोई भी बात मूल समस्या तक नहीं पहुंचती। स्वतंत्र न्यायाधिकरण अंकगणित पर निर्भर नहीं करते। कार्यकाल, आयु और नामों की संख्या वे लक्षण हैं जिनके माध्यम से रोग का निदान किया गया है। वे स्वयं बीमारी नहीं हैं।

मूल बात

मूल बात यह है कि न्यायाधिकरण एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर संस्था होनी चाहिए। उसका अपना प्रतिष्ठान होना चाहिए, अपने सदस्यों के चयन का उसका अपना साधन होना चाहिए, उन पर निगरानी रखने और उन्हें अनुशासित करने की अपनी व्यवस्था होनी चाहिए तथा परिसर, कर्मचारियों और धन की अपनी व्यवस्था होनी चाहिए। जहां ये सभी व्यवस्थाएं मौजूद हों, वहां स्वतंत्रता स्वाभाविक रूप से आ जाती हैं।

नया विधेयक उन सभी बिंदुओं पर न्यायालय को उत्तर देता है, जिन पर न्यायालय अपनी बात कह चुका है। लेकिन इससे भी बढ़कर एक ऐसी संस्था स्थापित करने का प्रयास है जो उन उत्तरों को स्वयं लागू करने योग्य बना दे। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना कानून द्वारा की जानी है। उसका अस्तित्व, गठन और कार्य किसी कार्यपालिका आदेश से नहीं, बल्कि अधिनियम से संचालित होंगे और उसे चयन, निगरानी, अनुशासन तथा न्यायाधिकरणों की आवश्यकताओं के आकलन का दायित्व है। उसके चारों ओर एक स्थायी पेशेवर सचिवालय स्थापित किया जाएगा।

सर्वोच्चता, समान दूरी और नियंत्रण जो व्यवस्था को प्रभावी बनाते हैं

विधेयक में उन प्रत्येक बिंदुओं पर न्यायिक सर्वोच्चता बनाए रखी गयी है, जहां उसका महत्व है। आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी और उसमें न्यायिक बहुमत का प्रावधान है। समितियों की अध्यक्षता न्यायिक रूप से की जाती है तथा निर्णायक मत न्यायिक अध्यक्ष के पास ही होता है। चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन—सभी का नेतृत्व न्यायिक तौर पर किया जाता है।

यह उस बात के अनुरूप है जो न्यायालय आर. गांधी मामले के बाद से कहता आया है कि कार्यपालिका, जो सबसे बड़ी वादी है, उन लोगों के चयन में प्रमुख भूमिका नहीं निभा सकती जो उसके मामलों का निर्णय करते हैं।

इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण यह है कि सर्वोच्चता का अर्थ नियंत्रण नहीं है। पूरी व्यवस्था न्यायिक पक्ष को सौंप देना भी चुनौतियों के रूप में देखा जाता है। इसलिए यह विधेयक न्यायाधिकरण को तीन स्तरों से कार्यपालिका और न्यायपालिका से समान दूरी पर रखता है। केंद्र सरकार नियमों द्वारा व्यापक सिद्धांत निर्धारित करती है। आयोग उन नियमों को लागू करने के तरीके को नियंत्रित करने वाले विनियम बनाता है। सचिवालय इसी ढांचे के तहत काम करता है। उसे कार्य करने के तरीके के बारे में मार्गदर्शन दिया गया है, लेकिन परिचालन स्तर पर उसे निर्देशित नहीं किया जाता और वह अपने कार्य अधिनियम से प्राप्त करता है, न कि अधिकार या कार्य किसी दूसरे को सौंपे जाने के प्रत्यायोजन से।

इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग, सचिवालय और कार्यपालिका के संयोजन से उत्पन्न नियंत्रण और संतुलन की वास्तविक व्यवस्था है। सचिवालय पात्रता की जांच और उसका अभिलेखन तैयार करेगा, जिसके आधार पर प्रत्येक निर्णय लिया जाना है। वह प्रकाशित विनियमों से बंधा है और अपने कार्यों का रिकॉर्ड रखेगा।

विधेयक द्वारा कायम यही वह नाजुक संतुलन है। इसमें न तो प्रशासन में न्यायिक हस्तक्षेप है और न ही वास्तविक रूप से कार्यपालिका पर निर्भरता, जबकि चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन में न्यायिक सर्वोच्चता बनी रहती है। कनाडा ने 2014 में इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया था, जब उसने अपने संघीय न्यायाधिकरणों की सहायक सेवाओं को एक ही संगठन के अधीन लाते हुए उनके न्यायनिर्णयन संबंधी स्वतंत्रता बरकरार रखी।

इस प्रकार के कानून का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह न्यायिक चुनौती में टिकता है या नहीं। इसका मूल्यांकन इस तथ्य के आधार पर होना चाहिए कि क्या वह उन स्थितियों को समाप्त करता है, जिनसे ये चुनौतियां पैदा हुईं। विधेयक इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। यदि यह अपने निर्धारित स्वरूप में काम करता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायाधिकरण व्यवस्था में काफी सुधार आएगा। इसमें वादी को अंततः ऐसा मंच मिलेगा जो उचित रूप से गठित, पर्याप्त रूप से व्यवस्थित होगा, जहां रिक्तियां समय पर भरी जाएंगी तथा जो अपने कार्य-प्रदर्शन के लिए जवाबदेह होगा। विकसित किया गया यह मॉडल, यदि सफल रहा तो भविष्य में अन्य प्रकार के चयन के लिए भी काफी उपयोगी होगा।

आत्मनिर्भर चिकित्सा तकनीक : सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं और विकसित भारत की मजबूत नींव

जगत प्रकाश नड्डा

भारत ने पिछले एक दशक में स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार किया है। सरकारी और निजी क्षेत्र में अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जांच केंद्रों और मेडिकल कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है। यह सरकार की ऐसी नीतियों को दर्शाता है, जिनका केंद्र आम नागरिक की स्वास्थ्य सुरक्षा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को हर नागरिक तक पहुंचाने के लिए काम किया है। इन लगातार किए गए प्रयासों का परिणाम है कि देश में लोगों द्वारा अपनी जेब से स्वास्थ्य सेवाओं पर किए जाने वाले खर्च में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी कमी आई है। यह खर्च पहले 65 प्रतिशत तक था, जो अब घटकर 43 प्रतिशत रह गया है।

जिला अस्पताल में जन्म लेने वाले नवजात शिशु से लेकर बड़े अस्पताल में इलाज करा रहे कैंसर मरीज तक, आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसेमंद, अच्छी गुणवत्ता वाले और किफायती चिकित्सा उपकरण बेहद जरूरी हो गए हैं। प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के तहत सरकार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत कर रही है। इसके लिए प्रयोगशालाओं को बेहतर बनाने, गंभीर मरीजों के इलाज की सुविधाएं बढ़ाने, बीमारियों की निगरानी व्यवस्था मजबूत करने और आपात स्थिति से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर निवेश किया जा रहा है। जैसे-जैसे भारत 2047 तक विकसित भारत बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, अब जोर एक आत्मनिर्भर चिकित्सा तकनीक  क्षेत्र तैयार करने पर है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को और सस्ता, आसानी से उपलब्ध और किसी भी संकट के समय मजबूत बनाना है।

पहले ,भारत कई आधुनिक और जटिल चिकित्सा उपकरणों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों से होने वाले आयात पर निर्भर था। इन तकनीकों से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार तो हुआ, लेकिन इससे इलाज की लागत बढ़ी, आपूर्ति व्यवस्था पर बाहरी निर्भरता बनी रही और इन उपकरणों की पहुंच सीमित रही। इसी जरूरत को देखते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा उपकरण नीति, 2023 में देश के भीतर आधुनिक चिकित्सा उपकरण बनाने की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य चिकित्सा उपकरणों को सस्ता बनाना और जांच की लागत कम करना है। सरकार ने चिकित्सा उपकरणों के पूरे क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना, चिकित्सा उपकरण पार्क और दवा एवं चिकित्सा तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने वाली योजना शामिल हैं।

इन पहलों से देश में चिकित्सा उपकरणों के निर्माण, नए शोध, निवेश और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए बेहतर माहौल तैयार हो रहा है। नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना के तहत 50 से अधिक आधुनिक चिकित्सा उपकरणों का देश में उत्पादन शुरू हो चुका है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है, जो वैश्विक निवेशकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। ये उपलब्धियां बताती हैं कि भारत धीरे-धीरे दुनिया के चिकित्सा तकनीक क्षेत्र में एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में उभर रहा है।

सिर्फ चिकित्सा उपकरणों का निर्माण केंद्र बनने के अलावा, भारत तेजी से आधुनिक चिकित्सा तकनीकों को अपना भी रहा है, ताकि लोगों का जीवन बेहतर बनाया जा सके। आधुनिक जांच सुविधाओं, शरीर की अंदरूनी तस्वीर लेने वाली मशीनों, शरीर में लगाए जाने वाले चिकित्सा उपकरणों, गहन चिकित्सा की मशीनों और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती दर पर उपलब्ध कराने से मरीजों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम होता है। साथ ही इलाज की गुणवत्ता और समय पर इलाज मिलने में भी सुधार होता है। देश में ही चिकित्सा उपकरण बनने से विदेशों से आयात पर निर्भरता घटती है, आपूर्ति व्यवस्था मजबूत होती है और लागत कम करने के अवसर बढ़ते हैं।

भारत का विश्व स्तर पर पहचान बना चुका दवा उद्योग, मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता, तेजी से फैलता डिजिटल ढांचा, तेजी से बढ़ता नए उद्यमों का क्षेत्र और कुशल मानव संसाधन अगली पीढ़ी की चिकित्सा तकनीक विकसित करने के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चिकित्सा उपकरण के रूप में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर (एसएमडी) , इंटरनेट से जुड़े चिकित्सा उपकरण, रोबोट आधारित तकनीक और दूर से जांच जैसी नई तकनीकों में भारत के पास देश और दुनिया की स्वास्थ्य जरूरतों के लिए नए समाधान विकसित करने के बड़े अवसर हैं।

जैसे-जैसे भारतीय कंपनियां दुनिया के बाजार में विस्तार कर रही हैं, गुणवत्ता भी भारत में बने चिकित्सा उपकरणों की सबसे बड़ी पहचान बनती जा रही है। सरकार नियामक व्यवस्था को मजबूत करने, मान्यता प्राप्त जांच सुविधाओं का विस्तार करने, चिकित्सा उपकरणों की प्रभावशीलता से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाण तैयार करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था विकसित करने पर जोर दे रही है। इससे मरीजों की सुरक्षा बढ़ेगी और वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता भी मजबूत होगी।

दुनिया के स्तर पर प्रतिस्पर्धी चिकित्सा तकनीक  क्षेत्र तैयार करने के लिए सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थानों, स्वास्थ्य सेवा देने वालों, नए उद्यमों और निवेशकों के बीच करीबी सहयोग जरूरी है। जब प्रयोगशालाओं में तैयार विचार आसानी से कारखानों तक और वहां से मरीजों तक पहुंचते हैं, तभी नए आविष्कारों को वास्तविक लाभ में बदला जा सकता है। सरकार ऐसी स्थिर और पारदर्शी नीतियां बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, जिनसे शोध, निवेश, तकनीकी साझेदारी और कारोबार करना आसान हो।

भारत जैसे-जैसे विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास एक-दूसरे को और मजबूत करेंगे। एक मजबूत चिकित्सा उपकरण उद्योग उच्च मूल्य वाले उत्पादन, कुशल रोजगार, निर्यात और तकनीकी क्षमता को बढ़ावा देगा। साथ ही इससे स्वास्थ्य सेवाएं अधिक सस्ती, आसानी से उपलब्ध और किसी भी संकट के समय अधिक मजबूत बनेंगी।

भारत का चिकित्सा तकनीक क्षेत्र एशिया का चौथा सबसे बड़ा बाजार है और दुनिया के शीर्ष 20 बाजारों में शामिल है। फिलहाल इसका आकार 15 से 16 अरब डॉलर है और यह करीब 12 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ रहा है। इस वजह से यह देश के सबसे तेजी से बढ़ते विनिर्माण क्षेत्रों में से एक बन गया है।

विकसित भारत का लक्ष्य गुणवत्ता, नए आविष्कार और सभी को साथ लेकर चलने के आधार पर दुनिया में नेतृत्व करने पर जोर देता है। सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है कि नई चिकित्सा तकनीकें भारत की प्रमुख स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करें। इनमें माताओं और बच्चों का स्वास्थ्य, गैर-संचारी रोग, आपातकालीन चिकित्सा, कैंसर, हृदय रोग और ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत लगातार एक आत्मनिर्भर चिकित्सा तकनीक व्यवस्था तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य केवल भारत में चिकित्सा उपकरण बनाना नहीं है, बल्कि हर नागरिक को समय पर अच्छी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, देश की स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करना और बेहतर स्वास्थ्य के लिए भारत को दुनिया के एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित करना है।

(लेखक भारत सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री हैं।)

लोकतंत्र को युवाओं को चुप न करा कर उनकी बात सुननी चाहिए : गुंजीत रुचि बावा

लुधियाना / सत्ता संदेश

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए प्रदर्शनों के दौरान युवा प्रदर्शनकारियों के साथ किए गए व्यवहार पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए, पंजाब राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की उपाध्यक्ष गुंजीत रुचि बावा ने संयम, संवेदनशीलता और युवा नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के सम्मान का आह्वान किया है।

छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई के दृश्यों पर प्रतिक्रिया देते हुए, बावा ने कहा कि ये तस्वीरें बेहद परेशान करने वाली थीं और हर बाल अधिकार समर्थक के मन में यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या देश के युवाओं की बात सुनी जा रही है या उन्हें केवल दबाया जा रहा है। परीक्षा में कथित अनियमितताओं और शिक्षा सुधारों को लेकर जवाबदेही की मांग कर रहे छात्रों के नेतृत्व में हुए इस विरोध प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, जिसमें लोगों के घायल होने और बल प्रयोग की व्यापक आलोचना की खबरें सामने आईं।

अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया साझा करते हुए, बावा ने कहा, “मेरा दिल उन बच्चों के लिए दुखी है जिन्हें मैंने बेरहमी से पिटते देखा। पुलिसकर्मी भी उसी उम्र के बच्चों के माता-पिता हैं। हो सकता है कि वे भी उन कोमल युवा शरीरों पर पड़ने वाली हर लाठी की चोट से सिहर उठे हों, फिर भी कर्तव्य ने उन्हें कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया। ये गुंडे, अपराधी या असामाजिक तत्व नहीं थे। ये साधारण मध्यम-वर्गीय घरों के सपने देखने वाले बच्चे थे, जो अपने प्रतिनिधियों को उनकी उदासीनता से जगाने के लिए संसद की ओर मार्च कर रहे थे।”

उन्होंने आगे कहा कि जहां कानून और संवैधानिक मूल्य युवाओं को शांतिपूर्वक अपने डर, चिंताओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करने का अधिकार देते हैं, वहीं परेशान करने वाले दृश्य बताते हैं कि अत्यधिक बल प्रयोग के कारण यह अधिकार दब गया है। उन्होंने कहा, “हमारे सामने सवाल केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने का नहीं है; सवाल यह है कि क्या हम एक समाज के रूप में अपने युवाओं की बात सम्मान के साथ सुनने के लिए पर्याप्त जगह बना रहे हैं। यह सामूहिक आत्म-मंथन का क्षण है—खुद से यह पूछने का कि हम अपने बच्चों के प्रति कहाँ विफल रहे हैं।”

बावा ने सभी संबंधित पक्षों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि युवा नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी का स्वागत बातचीत, सहानुभूति और संवैधानिक संवेदनशीलता के साथ किया जाए, और इस बात को दोहराया कि भारत के युवाओं की आवाज़ सम्मान की हकदार है, डर की नहीं।

प्रधानमंत्री मोदी के भारत के 5एफविज़न को बुनता टेक्स 2026 : पबित्रा मार्गेरिटाो

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

कश्मीरी पश्मीना की नरम गर्माहट से लेकर असम के मूंगा सिल्क की शानदार चमक तक, राजस्थानी बांधनी के जीवंत ज्यामितीय पैटर्न से लेकर कांजीवरम सिल्क की सदाबहार और बेहतरीन बनावट तक, भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता धागों से बुना एक जीता-जागता नक्शा है। आज, सभ्यता की यह बेमिसाल तस्वीर एक ही छत के नीचे एक साथ नज़र आ रही है। नई दिल्ली के प्रसिद्ध भारत मंडपम में 14 से 17 जुलाई तक भारत टेक्स 2026 का आयोजन, हमारे देश की खूबसूरत विविधता को एक ही मंच पर ला रहा है।

वस्त्र उद्योग सिर्फ हमारी विरासत की झलक नहीं है, यह भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक ढांचे की एक मज़बूत नींव भी है। यह क्षेत्र लगातार विकास और समानता का एक बहुत बड़ा इंजन बना हुआ है, जो जीडीपी में 2.3%, औद्योगिक उत्पादन में 13% और निर्यात में 8.6% का योगदान देता है। कृषि के बाद भारत में सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाला यह क्षेत्र 100 मिलियन से ज़्यादा लोगों की आजीविका का साधन है, जो ग्रामीण समुदायों को मज़बूत बनाता है और देश भर में लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है।

आर्थिक शक्ति के इस केंद्र को सही मायने में समझने के लिए भारत टेक्स का अनुभव करना बेहद ज़रूरी है। यह वैश्विक स्तर पर प्रमुख भारतीय वस्त्रों का व्यापार मेला है, जिसे पूरी दुनिया के सामने हमारे निर्माण और रचनात्मकता की क्षमता का दबदबा दिखाने के लिए तैयार किया गया है। यह एक ऐसा व्यापक बाज़ार है, जहाँ घरेलू निर्माणकर्ता, राज्यों के पवेलियन, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शक और वैश्विक खरीदार एक ही छत के नीचे होते हैं। इससे बड़े पैमाने पर सोर्सिंग, कॉर्पोरेट जुड़ाव और ब्रांड को प्रदर्शित करने के अवसर भी मिलते हैं।

इस शानदार पहल के सफ़र पर नज़र डालें तो मुझे भारत टेक्स के पिछले दो आयोजनों से बेहद गर्व की अनुभूति का स्मरण होता है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत टेक्स के पिछले संस्करण के दौरान संपूर्ण वस्त्र समुदाय को संबोधित किया था, तो उन्होंने बेहद खूबसूरती से कहा था कि हमने जो बीज बोया था, वह अब तेज़ी से बरगद के पेड़ का रूप ले रहा है। उन्होंने कहा कि यह भव्य आयोजन न केवल हमारी समृद्ध परंपराओं का जश्न मनाता है, बल्कि एक विकसित भारत की अपार संभावनाओं को भी उजागर करता है। पहले दो आयोजनों की ज़बरदस्त सफलता ने एक मज़बूत नींव रखी, बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को आकर्षित किया और सहयोग की दिशा में भी तेज़ी देखने को मिली। भारत टेक्स 2025 के दौरान मेरे व्यक्तिगत अनुभव ने भविष्य के लिए एक बहुत ही सकारात्मक नज़रिया हासिल किया, जहाँ मैंने सरकार से सरकार और व्यापार से सरकार के बीच गहन बातचीत को ठोस नतीजों में बदलते देखा और इसी के चलते भारत की कार्य क्षमता में बढ़ते वैश्विक भरोसे की झलक भी दिखी। यह तीसरा आयोजन उस रफ्तार को और आगे ले जाता है और शुरुआती संभावनाओं को पूरी तरह से औद्योगिक प्रभाव में बदलता है।

इस साल के कार्यक्रम का बहुत बड़ा पैमाना एक सोची-समझी औद्योगिक रणनीति को दर्शाता है। भारत मंडपम में खास प्रदर्शनी हॉलों में फैली यह प्रदर्शनी भारत की पूरी वस्त्र मूल्य श्रृंखला को दिखाती है, जिसमें फाइबर, यार्न, फैब्रिक, कपड़े और फैशन, होम टेक्सटाइल, तकनीकी वस्त्र और सहायक उद्योग शामिल हैं। इसमें 1,600 से ज़्यादा प्रदर्शक हिस्सा ले रहे हैं, जो स्थानीय उत्पादन की ताकत को सीधे वैश्विक मंच पर पेश करेंगे। यह प्रधानमंत्री मोदी के क्रांतिकारी 5एफ विज़न- फार्म (खेत) से फाइबर से फैक्ट्री से फैशन से फॉरेन (विदेश) तक के सफर को दर्शाता है। पूरी मूल्य श्रृंखला को एक ही औद्योगिक श्रृंखला में जोड़कर, यह कार्यक्रम विनिर्माण के हर चरण को देश में ही संभालने की भारत की आत्मनिर्भर क्षमता को दिखाता है।

इस पहल को दुनिया भर से ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। इस संस्करण में अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, जापान, पुर्तगाल, स्पेन, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका और नेपाल समेत 14 देशों के अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शक शामिल हैं, साथ ही, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ का भी मज़बूत संस्थागत प्रतिनिधित्व है। कई देशों के मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल और बड़े व्यापारिक प्रतिनिधि दीर्घकालीन साझेदारी की संभावना तलाशने के लिए इसमें हिस्सा ले रहे हैं। उम्मीद है कि चार दिनों में 110 से ज़्यादा पंजीकृत देशों से 7,000 से ज़्यादा खरीददार और 1.3 लाख व्यापारिक आगंतुक आएंगे, जो वहां दिखाए जा रहे 20,000 से ज़्यादा वस्त्र उत्पादों को देखेंगे। इस व्यावसायिक गतिविधि में 3,500 से ज़्यादा खास तौर पर आयोजित बिज़नेस टू बिज़नेस बैठकें होंगी। इसके अलावा, राज्य निवेशक संपर्क सत्र भी होंगे, जो अलग-अलग भारतीय राज्यों को अपने खास औद्योगिक ढ़ांचे को पेश करने का मंच प्रदान करेंगे।

उद्योगों को आगे बढ़ाने हेतु वास्तविक नेतृत्व के लिए ज्ञान और भविष्य की योजना के प्रति गहरी प्रतिबद्धता की ज़रूरत होती है। भारत टेक्स 2026 इस ज़िम्मेदारी को वैश्विक वस्त्र वार्ता के ज़रिए निभाता है, जिसमें पैनल चर्चा, राउंडटेबल, मास्टरक्लास, राज्य सत्र, अवॉर्ड्स पिच फेस्ट और कार्यशाला जैसे 100 से ज़्यादा खास सत्र शामिल हैं। 370 से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सीएक्सओ, पॉलिसी निर्माता और अन्वेषकों की अगुवाई में होने वाले ये खास सत्र व्यापार और निवेश को बढ़ाने, तकनीक और नवाचारों को आगे बढ़ाने और फैशन तथा क्राफ्ट को बेहतर बनाने पर फोकस करेंगे। इस कार्यक्रम में व्यापार, निवेशक, तकनीक और संस्थागत सहयोग से जुड़े कई रणनीतिक समझौतों और क्षेत्रों से जुड़ी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर और उन्हें लॉन्च भी किया जाएगा।

इन चर्चाओं में वहनीयता और सर्कुलैरिटी जैसे अहम पहलुओं पर भी खास ध्यान दिया जाएगा। पिछले कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि वैश्विक फैशन समुदाय तेज़ी से पर्यावरण के लिए फैशन के दृष्टिकोण को अपना रहा है और वहनीयता हमेशा से भारत की टेक्सटाइल विरासत का अहम हिस्सा रही है। भारत टेक्स का यह संस्करण वैश्विक पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों को एक बड़े अवसर में बदलता है और यह दिखाता है कि कैसे नवाचारों की मदद से हमारी पारंपरिक तकनीकें और बेहतर हुई हैं और इस दौरान ये भी ख्याल रखा गया है कि इस प्रक्रिया में संसाधनों का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल हो सके और बर्बादी कम हो, जिससे हमारे बुनकरों और कारीगरों को सीधा फायदा हो। हमारे वस्त्र मंत्री श्री गिरिराज सिंह जी के नेतृत्व में, मंत्रालय ने ज़मीनी स्तर पर इन आधुनिकीकरण और वहनीय वृद्धि की पहलों को तेज़ी से आगे बढ़ाया है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि हमारी पूरी वस्त्र मूल्य श्रृंखला को मज़बूत आधुनिक तकनीक, बड़े पैमाने पर लागू होने वाले नीतिगत फ्रेमवर्क और मज़बूत मार्केट लिंकेज का सहारा मिले।

आज भारत टेक्स में लगातार बढ़ता पैमाना और आत्मविश्वास जो दिख रहा है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक से लगातार किए जा रहे नीतिगत सुधारों का नतीजा है। पिछले 12 सालों में, मोदी सरकार ने बड़े बदलाव लाने वाले कदमों के ज़रिए वस्त्र मूल्य श्रृंखलाओं की हर कड़ी को मज़बूत किया है। वस्त्रों के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना ने ₹31,687 करोड़ से ज़्यादा के निवेश का वादा हासिल किया है। इससे मैन-मेड फाइबर वाले कपड़ों, फैब्रिक और टेक्निकल टेक्सटाइल के बड़े पैमाने पर निर्माण को बढ़ावा मिला है और साथ ही बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर भी पैदा हुए हैं। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री के दूरदर्शी 5एफ दृष्टिकोण को अपनाते हुए सात पीएम पार्क को एकीकृत विनिर्माण व्यवस्था के तौर पर विकसित किया जा रहा है। ज़मीनी स्तर पर लोगों को सशक्त बनाने का काम भी तेज़ी से चल रहा है, राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम के तहत 794 हैंडलूम क्लस्टर में लगभग ₹2,000 करोड़ का निवेश किया गया है। इससे 1.17 लाख बुनकरों को बेहतर करघे मिले हैं और लगभग 90,000 कामगारों को कौशल प्रशिक्षण दिया गया है। वहीं, राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम के तहत हस्तशिल्प क्षेत्र में ₹1,335 करोड़ से ज़्यादा का निवेश किया गया है। इसके अलावा, 1.5 लाख से ज़्यादा बुनकरों को गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जेम) से जोड़ा गया है और बुनकर मुद्रा योजना के तहत लगभग 3 लाख लोगों को बिना गारंटी के ऋण दिए गए हैं। अपने घरेलू निर्माताओं, कारीगरों और अन्वेषकों को सीधे वैश्विक बाज़ार से जोड़कर, इन व्यापक सुधारों ने हमें उस बड़े वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ने के लिए तैयार किया है, जिसकी झलक इस हफ्ते देखने को मिल रही है।

आज जब हम भारत मंडपम के जीवंत प्रदर्शनी हॉलों पर नज़र डालते हैं, तो हमारा नज़रिया इस व्यापार प्रदर्शनी के तात्कालिक दायरे से कहीं आगे तक विस्तृत होता नज़र आता है। यह आयोजन भारत के वस्त्र उद्योग को 350 बिलियन डॉलर के वैश्विक शक्ति केंद्र में बदलने के हमारे विज़न 2030 रोडमैप में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो विकसित भारत @ 2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। मैं आप सभी को भारत टेक्स 2026 में अगले चार दिनों तक हमारे साथ जुड़ने के लिए आमंत्रित करता हूं, ताकि आप हमारे श्रमिकों की अविश्वसनीय शक्ति, हमारे रचनाकारों के शानदार नवाचारों और वैश्विक वस्त्रों के भविष्य को देख सकें, जिन्हें गर्व से भारत में डिज़ाइन किया गया है, टिकाऊ तरीके से निर्मित किया गया है और बड़े पैमाने पर एकीकृत किया गया है।

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(लेखक केंद्रीय वस्त्र राज्य मंत्री हैं। व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं।)

स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन: विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की प्रगति का व्यावहारिक रास्ता

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

ब्रिक्स की भारत की अध्यक्षता दृढ़ता, नवाचार, सहयोग और स्थायित्व पर आधारित व्यावहारिक रास्तों को आगे बढ़ाने का अवसर देती है

वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, ऊर्जा की बढ़ती मांग और जलवायु से जुड़ी गंभीर चुनौतियों के इस दौर में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसी ऊर्जा प्रणालियों का निर्माण करने की जरूरत है जो स्वच्छ व अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित, सस्ती एवं भरोसेमंद होने के साथ-साथ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की विकास संबंधी जरूरतों तथा आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप भी हों।

स्वच्छ ऊर्जा दरअसल ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और दीर्घकालिक विकास की दृष्टि से तेजी  से अहम होती जा रही है। यह ईंधन बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव से पैदा होने वाले जोखिमों  को कम कर सकती है, ऊर्जा को अपेक्षाकृत अधिक सुलभ बना सकती है, रोजगार सृजित कर सकती है, घरेलू उद्योगों को मजबूत कर सकती है और देश को अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ बना सकती है। फिर भी, स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने के रास्ते एक जैसे नहीं हो सकते। इन रास्तों को राष्ट्रीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और विकास की प्राथमिकताओं के हिसाब से निर्धारित किया जाना चाहिए।

इसी बिंदु पर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच बेहतर सहयोग से स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने की प्रक्रिया में तेजी लाने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता और समावेशी विकास के साझा लक्ष्यों को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।

भारत का अपना अनुभव यह बताता है कि स्वच्छ ऊर्जा की शुरुआत लोगों से ही होनी चाहिए।

पिछले दशक में, प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) के तहत लगभग 28.6 मिलियन घरों को बिजली के कनेक्शन दिए गए। इससे सभी तक बिजली पहुंचाने का काम आगे बढ़ा और ग्रामीण व कम सुविधा वाले इलाकों में लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) के तहत महिलाओं को 105 मिलियन से अधिक एलपीजी कनेक्शन दिए गए। इससे खाना पकाने के साफ-सुथरे तरीकों को बढ़ावा मिला, घर में सेहत बेहतर हुई और कठिन श्रम का बोझ कम हुआ।

ये पहल एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करती हैं: स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने को केवल स्थापित मेगावाट या जोड़ी गई क्षमता के आधार पर नहीं मापा जा सकता, बल्कि इससे पैदा हुए अवसरों, सुदृढ़ हुई आजीविका और बेहतर हुए जीवन स्तर के आधार पर भी मापा जाना चाहिए।

लोगों को प्राथमिकता देने वाले इस दृष्टिकोण के साथ-साथ बड़े पैमाने पर काम और सहयोगी  बुनियादी ढांचे की भी जरूरत है। भारत की स्वच्छ ऊर्जा की कहानी में नवीकरणीय ऊर्जा अहम हो गई है। लेकिन इसकी सफलता इसे समर्थन प्रदान करने वाली प्रणालियों पर निर्भर करती है। सौर  और पवन ऊर्जा को तेजी से अपनाया जा सकता है, लेकिन इनकी पूरी क्षमता का लाभ तभी मिल पाएगा जब पारेषण (ट्रांसमिशन), वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन), भंडारण (स्टोरेज) और ग्रिड प्रबंधन एकसाथ मिलकर काम करें।

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार में सहायता प्रदान करने वाली प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। पारेषण संबंधी बुनियादी ढांचे (ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर) का निरंतर विस्तार हुआ है। इसके साथ-साथ ऊर्जा के भंडारण (एनर्जी स्टोरेज) और ग्रिड की सुदृढ़ता (ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी) के क्षेत्र में भी निवेश बढ़ा है। वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन) संबंधी सुधारों और उन्नत ग्रिड तकनीक को अपनाने से एक ऐसी बेहतर एवं भरोसेमंद ऊर्जा प्रणाली बनाने में मदद मिली है, जो नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी को समन्वित करने में सक्षम है।

भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित क्षमता अब 288 गीगावॉट से अधिक हो गई है। बड़े पैमाने की परियोजनाओं के अलावा, वितरित नवीकरणीय ऊर्जा (डीआरई) प्रणालियां – जैसे कि रूफटॉप सोलर, सोलर पंप, मिनी-ग्रिड और माइक्रो-ग्रिड – ग्रामीण और कम सुविधा वाले इलाकों में स्वच्छ ऊर्जा को और अधिक सुलभ बना रही हैं। ये प्रणालियां सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज, स्कूलों, हेल्थकेयर सेंटरों तथा स्थानीय व्यवसायों को मदद पहुंचाने के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका और स्थानीय आर्थिक सुदृढ़ता को भी बढ़ावा दे रही हैं।

भारत की ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ बड़े पैमाने पर इस दृष्टिकोण को दर्शाती है। इस योजना से अब तक लगभग 4 मिलियन परिवारों को लाभ हुआ है, जिससे उपभोक्ता अपेक्षाकृत अधिक विकेन्द्रीकृत एवं भागीदारी वाली ऊर्जा प्रणाली में योगदान देने वाले बन पाए हैं।

हालांकि, स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार में वित्त पोषण सबसे अहम तत्वों में से एक बना रहेगा। कई विकासशील देशों में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इन संभावनाओं को बड़े पैमाने पर लागू करने तथा बैंक से ऋण पाने योग्य परियोजनाओं में बदलने हेतु सस्ती और दीर्घकालिक पूंजी की जरूरत होती है।

आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा, वितरण संबंधी बुनियादी ढांचा, ग्रिड के आधुनिकीकरण, भंडारण प्रणाली और कम ऊर्जा खर्च करने वाली तकनीकों में निवेश बेहद जरूरी होगा। न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे संस्थान वित्त पोषण, तकनीक संबंधी साझेदारी और क्षमता विकास के जरिए विकासशील देशों की मदद करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों के लिए सुदृढ़ एवं विविधतापूर्ण आपूर्ति श्रृंखला बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए सुरक्षित, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा प्रणालियां  सुनिश्चित करने हेतु मैन्यूफैक्चरिंग, तकनीक, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना जरूरी होगा।

अब जबकि ब्रिक्स की भारत की अध्यक्षता आगे बढ़ रही है, सहयोग की एक ऐसी भविष्योन्मुखी रूपरेखा को मजबूत करने का अवसर है जो सामर्थ्य, बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता, विश्वसनीयता, तकनीक की सुलभता, सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला और सतत विकास का समर्थन करे।

चुनौती सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाने की ही नहीं, बल्कि ऐसे ऊर्जा प्रणाली के निर्माण की भी है जो सबके लिए सुलभ, किफायती एवं भरोसेमंद होने के साथ-साथ दीर्घकालिक आर्थिक विकास और मानव विकास को कायम रखने में सक्षम हों।

 (लेखक विद्युत राज्यमंत्री हैं)

मूल्य श्रृंखला का जुड़ाव: पीएम मित्र पार्क के ज़रिए कैसे भारत के टेक्सटाइल क्षेत्र की बदल रही है तस्वीर

पबित्रा मार्गेरिटा

सदियों से, भारत की पहचान उसके परिधानों से गहराई से जुड़ी रही है। चाहे वह कश्मीर के पश्मीना की लंबे समय तक रहने वाली गर्माहट हो, असम के मूंगा सिल्क की सुनहरी चमक हो, तमिलनाडु की शाही कांजीवरम साड़ियाँ हों, चंदेरी की बुनाई हो या सूरत के कारीगरों की कपड़ों पर मशहूर कारीगरी। आज भी यह क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बनकर खड़ा है, जो जीडीपी में 2.3%, औद्योगिक उत्पादन में 13% और निर्यात में 12% का योगदान देता है। खेती के बाद भारत में सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाला यह क्षेत्र 45 मिलियन लोगों को सीधे तौर पर और 100 मिलियन से ज़्यादा लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार देता है। इससे ग्रामीण समुदायों को मजबूती मिलती है और देश भर में लाखों महिलाओं के लिए आर्थिक आज़ादी का रास्ता खुलता है।

वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के एक साथ जुड़ी हुई व्यवस्था के उलट, भारत की वस्त्र मूल्य श्रृंखला ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग जगहों पर फैले हुए मॉडल के तौर पर विकसित हुई। कताई, बुनाई, प्रोसेसिंग, कपड़े सिलने और निर्यात जैसी गतिविधियाँ अलग-अलग राज्यों में स्वतंत्र रूप से विकसित हुईं, जिसका अर्थ था कि एक कपड़ा बनने के दौरान अक्सर कई राज्यों की सीमाओं से गुज़रता था। इस बिखराव के कारण कई संरचनात्मक बाधाएँ पैदा हुईं। इसने बड़े पैमाने पर काम करने, आधुनिकीकरण, ऑटोमेशन और आखिरकार मज़दूरों की उत्पादकता को सीमित कर दिया।

इसके साथ ही, मल्टी-मॉडल संपर्क में कमियों की वजह से लॉजिस्टिक्स का बोझ भी बढ़ जाता है। प्रोडक्शन के अलग-अलग चरणों के बीच हर बार सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने या संभालने में अतिरिक्त खर्च और ढुलाई का किराया लगता है। कई चरणों में लंबी दूरी तक सामान को एक जगह से दूसरी जगह भेजने से कुल लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है और सामान को तेज़ी से बाज़ार तक पहुँचाने की क्षमता खत्म हो जाती है, जो आज की रिटेल व्यवस्था में बार-बार ऑर्डर देने वाले साइकल में एक बहुत बड़ी और नुकसानदायक कमी है।

वर्तमान में पर्यावरण से जुड़ी ज़रूरतों पर भी ध्यान देने की ज़रुरत है। दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वस्त्र उद्योग की हिस्सेदारी 8% से 10% और औद्योगिक जल प्रदूषण में 20% है। हज़ारों छोटी-छोटी और अलग-अलग जगहों पर फैली इकाइयों में नियमों को लागू करना और सही तरीके से प्रबंधन करना पहले एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती रहा है।

इन रुकावटों को व्यवस्थित रूप से दूर करने के लिए, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल (पीएम मित्र) योजना शुरू की, जिसके लिए ₹4,445 करोड़ का बजट रखा गया। यह एक अहम कदम था, जो एक ऐसा व्यापक मॉडल पेश करता है, जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योगों से जुड़े लोगों और निजी साझेदारों के साथ मिलकर विकास को आगे बढ़ाती है।

इस योजना के केंद्र में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का दूरदर्शी ‘5एफ’ फ़ॉर्मूला है यानी फ़ार्म (खेत) से फ़ाइबर (रेशा) से फ़ैक्टरी (कारखाना) से फ़ैशन और फारेन (विदेश) तक पहुंच। यह सोच सीधे तौर पर उस बात को सामने लाती है, जो भारत को वैश्विक मंच पर अलग बनाती है: हमारी संपूर्ण और बेहद विविध मूल्य श्रंखला। कच्चे माल के आयात या सिर्फ तैयार कपड़ों की बनावट पर निर्भर रहने वाले दूसरे देशों के उलट, भारत वस्त्रों को बनाने की पूरी प्रक्रिया में शामिल है, जिसमें किसानों के खेतों से लेकर हाई-फ़ैशन रनवे तक की प्रक्रिया शामिल है। इस अनोखी समझ की वजह से, हमारी विकास रणनीति को वैश्विक प्रतिस्पर्धा और पूरी तरह से सामाजिक समानता के बीच एक खास संतुलन बनाने की ज़रुरत है। विस्तार करते समय, हमें हर क्षेत्र के कल्याण का ध्यान रखना होगा, ताकि साधारण किसान और ग्रामीण बुनकर से लेकर कपड़े के निर्यातक तक, कोई भी पीछे न छूटे। पीएम मित्र फ़्रेमवर्क इसी संतुलन को हासिल करता है।

इन पार्कों को कच्चे माल के मुख्य केंद्रों के पास रणनीतिक रूप से बनाने से ट्रांसपोर्ट का खर्च कम होता है और निर्माण के लिए बिना रुकावट आपूर्ति सुनिश्चित होती है। इससे ज़रूरी बात यह है कि इस नज़दीकी से शुरुआत से आखिर तक ट्रैकिंग भी मुमकिन हो पाती है। चूँकि वैश्विक ब्रांड ऑर्गेनिक या सस्टेनेबल प्रमाणीकरण की मांग करते हैं, इसलिए ये एकीकृत पार्क एक सत्यापन योग्य कस्टडी चेन देते हैं। इससे कड़े वैश्विक ईएसजी नियमों का पालन होता है और विदेशों में प्रीमियम कीमत पाने का रास्ता भी बनता है।

1,000 एकड़ से ज़्यादा के एक ही इलाके में कताई, बुनाई, प्रोसेसिंग और कपड़ा बनाने की सुविधाओं को एक साथ लाने से अलग-अलग राज्यों के बीच सामान ले जाने की ज़रूरत खत्म हो जाती है। इससे माल ढुलाई का खर्च और ट्रांसपोर्ट से होने वाला प्रदूषण भी बहुत कम हो जाता है और सामान तेज़ी से बाज़ार तक पहुँच पाता है। समर्पित माल गलियारे और एक्सप्रेसवे जैसे राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर से जुड़े होने के कारण, विदेशी बाज़ारों तक सामान पहुँचाना बहुत सस्ता और किफायती हो जाता है। हर पार्क में ‘प्लग-एंड-प्ले’ इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर होता है, जिसमें बिजली के खास सब-स्टेशन, लगातार पानी की सप्लाई और तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार फैक्ट्री शेड जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। इसके साथ ही, ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ज़ेडएलडी) तकनीक वाले उन्नत एडवांस्ड कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट और आधुनिक सुविधाएँ भी होती हैं, जिससे कारोबारियों पर ढ़ांचागत बोझ कम पड़ता है और कारोबार करने में आसानी होती है।

पीएम मित्र पार्क तेज़ी से कागज़ी योजनाओं को असल ज़मीनी हकीकत में बदल रहे हैं। इस योजना में सात रणनीतिक पार्क शामिल हैं: पाँच ग्रीनफील्ड डेवलपमेंट विरुधुनगर (तमिलनाडु), नवसारी (गुजरात), कलबुर्गी (कर्नाटक), धार (मध्य प्रदेश) और लखनऊ (उत्तर प्रदेश) और दो ब्राउनफील्ड डेवलपमेंट वारंगल (तेलंगाना) और अमरावती (महाराष्ट्र) में। अब तक, इस योजना में कुल ₹69,899 करोड़ के निवेश की दिलचस्पी दिखाई गई है, जिसमें से ₹27,658 करोड़ का निवेश पहले ही हो चुका है।

10 मई, 2026 को माननीय प्रधानमंत्री ने तेलंगाना के वारंगल में पहले कार्यरत पीएम मित्र पार्क का उद्घाटन किया। इस पार्क में पहले ही ₹3,862 करोड़ का निवेश हो चुका है और यहाँ विश्व-स्तरीय पर्यावरण अनुकूल बुनियादी ढ़ांचे पर काम किया जा रहा है। ये विशेषताएँ स्थायित्व के उन मानकों को दर्शाती हैं, जिन्हें सभी सात पार्क साइटों पर स्थापित किया जा रहा है।

पूरे देश में एक साथ काम शुरू होने से सहकारी संघवाद की तेज़ी और सफलता दोनों साफ दिखती है, जहां सभी सात राज्यों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं, 100% ज़मीन का अधिग्रहण हो चुका है और पर्यावरण से जुड़ी मंज़ूरी भी मिल गई है। पाँच ग्रीनफ़ील्ड साइट्स के लिए जेवी एग्रीमेंट और एसपीवी पूरी तरह से तैयार हैं, जिससे तेज़ी से काम आगे बढ़ रहा है। 2,158 एकड़ में फैले सबसे बड़े पार्क, धार (मध्य प्रदेश) में ₹21,436.9 करोड़ के निवेश में दिलचस्पी दिखाई गई है। इसी तरह गुजरात (₹13,084 करोड़), महाराष्ट्र (₹12,925 करोड़), तमिलनाडु (₹6,600 करोड़), उत्तर प्रदेश (₹5,345.8 करोड़) और कर्नाटक (₹1,700 करोड़) में भी काम को लेकर तेज़ी देखी गई है। तेज़ी से हो रहे इस काम के पीछे केंद्रीय वस्त्र मंत्री श्री गिरिराज सिंह का सक्रिय नेतृत्व है। उनके कुशल नेतृत्व में वस्त्र मंत्रालय अपने कामकाज के तरीकों में तेज़ी लाया है, मंत्रालय ने प्रशासनिक रुकावटों को दूर किया है और राज्य सरकारों के साथ अभूतपूर्व स्तर पर आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया है।

लेकिन आंकड़े तो कहानी का सिर्फ एक हिस्सा बताते हैं, असली पैमाना इसके मानवीय प्रभाव में दिखता है। प्रत्येक पार्क को संरचनात्मक रूप से इस प्रकार तैयार किया गया है कि इससे लगभग 3 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। यानी सभी सात स्थलों को मिलाकर, 21 लाख से अधिक औपचारिक आजीविकाएं हैं, जो हमारे ग्रामीण परिवारों और महिलाओं को अहम सामाजिक-आर्थिक नींव प्रदान करती हैं, जो पारंपरिक रूप से परिधान निर्माण उद्योग की रीढ़ हैं।

यह व्यापक ढ़ांचागत प्रयास वस्त्र क्षेत्र के महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण 2030 के लिए एक अहम लॉन्चपैड का काम करता है, जिसका लक्ष्य इस दशक के अंत तक भारत के वस्त्र उद्योग को 350 बिलियन डॉलर की वैश्विक महाशक्ति में बदलना है। ऐतिहासिक विखंडन को विश्व स्तरीय, एकीकृत पैमाने से बदलकर करके, पीएम मित्र एक बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन ला रहा है। सशक्त नेतृत्व के मार्गदर्शन में, हम भारत को वस्त्रों के निर्विवाद, टिकाऊ और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी केंद्र के तौर पर स्थापित कर रहे हैं।

(लेखक केंद्रीय वस्त्र राज्य मंत्री हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।)

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिरस्थाई विरासतः संस्थाएं, विचार और राष्ट्र निर्माण

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

इतिहास अक्सर महान नेताओं को उनके राजनीतिक संघर्षों के जरिए याद करता है। लेकिन राजनेताओं के चिरस्मरणीय योगदान राजनीति के दायरे तक ही सीमित नहीं होते। उनकी वास्तविक विरासत उनके द्वारा सृजित संस्थाओं, परिपोषित विचारों और आने वाली पीढि़यों के लिए छोड़े गए आदर्शों में होती है। राष्ट्र भारत केसरी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 125वां जन्म दिवस मना रहा है। इस अवसर पर उनके सार्वजनिक जीवन के एक ऐसे पहलू को स्मरण करना प्रासंगिक होगा जिसकी ओर व्यापक रूप से गौर करने की जरूरत है। यह पहलू है, राष्ट्र निर्माण की बुनियाद के रूप में संस्थाओं का सृजन करने की उनकी आजीवन प्रतिबद्धता। 

स्वतंत्र भारत का उदय सिर्फ एक राजनीतिक संघर्ष से नहीं हुआ। उसे विश्वविद्यालय बनाने थे जो नागरिकों को शिक्षित करने में सक्षम हों। ऐसी अनुसंधान संस्थाएं खड़ी करनी थीं जो वैज्ञानिक ज्ञान का प्रसार कर सकें। उसे ऐसे उद्योग तैयार करने थे जो आर्थिक आत्मनिर्भरता पैदा कर सकें। सभ्यता की विरासत की रक्षा करने वाले सांस्कृतिक संगठनों और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाली लोक संस्थाओं को तैयार करना था। डॉ मुखर्जी ने जल्दी ही समझ लिया था कि राष्ट्र का भविष्य सिर्फ दूरद्रष्टा नेतृत्व पर ही निर्भर नहीं करता। यह उन मजबूत संस्थाओं पर भी निर्भर करता है जो नेताओं और सरकारों से ज्यादा टिकाऊ होंगी। 

उनका असाधारण शैक्षिक कॅरियर उनके विश्वास को प्रतिबिंबित करता है। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने। उन्होंने वैसे समय में यह कार्यभार संभाला जब उच्चतर शिक्षा भारत के बौद्धिक जागरण का केंद्र बन रही थी। उनके लिए विश्वविद्यालय सिर्फ स्नातक तैयार करने के स्थल नहीं थे। वे वैसे सुविज्ञ नागरिकों को गढ़ने वाले संस्थान थे जो सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के साथ योगदान करने में सक्षम हों। उनकी राय थी कि शिक्षा को राष्ट्र निर्माण के वृहत्तर कार्य से अलग नहीं किया जा सकता।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रगति के प्रति उनका समर्पण विश्वविद्यालयों के परिसर से कहीं आगे बढ़कर था। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की कोर्ट और काउंसिल के सदस्य के तौर पर, उन्होंने भारत के प्रमुख वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों में से एक को मज़बूत बनाने में योगदान दिया। 1947 में, उन्होंने ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ पावर इंजीनियरिंग’ की आधारशिला रखी क्योंकि वे भली-भांति समझते थे कि स्वतंत्र भारत की आर्थिक प्रगति के लिए इंजीनियरिंग की शिक्षा और प्रौद्योगिकी क्षमता बहुत ज़रूरी होगी। नवाचार को मुख्य नीतिगत लक्ष्य बनाए जाने से बहुत पहले ही, उन्होंने यह समझ लिया था कि वैज्ञानिक उत्कृष्टता और औद्योगिक विकास ही देश की दीर्घकालिक मज़बूती तय करेंगे।

स्वतंत्रता के बाद, जब डॉ. मुखर्जी भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने, तब इस दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप दिया गया। उन शुरुआती सालों में, नए नए आज़ाद देश के सामने एक औद्योगिक आधार तैयार करने की बड़ी चुनौती थी। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और सिंदरी फर्टिलाइज़र फैक्ट्री जैसे संस्थान सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के तौर पर नहीं, बल्कि तकनीकी क्षमता और आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के भारत के संकल्प के प्रतीक के तौर पर स्थापित किए गए थे। डॉ. मुखर्जी के लिए, औद्योगीकरण कभी भी अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं था; यह राष्ट्रीय क्षमता और सामूहिक आत्मविश्वास में किया गया एक निवेश था।

हालाँकि, किसी भी संस्थान के निर्माण के लिए केवल भौतिक अवसंरचना या प्रशासनिक कुशलता की ही ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए सहानुभूति, जन-सेवा और नैतिक ज़िम्मेदारी की भावना की भी आवश्यकता होती है। डॉ. मुखर्जी में इन गुणों की झलक 1943 के बंगाल अकाल के दौरान ही साफ़ तौर पर दिखाई दी थी, जब उन्होंने  बीसवीं सदी की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी से प्रभावित लोगों के लिए बड़े पैमाने पर राहत कार्य करने में खुद को समर्पित कर दिया था। विभाजन के बाद, उन्होंने विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। वे समझते थे कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण में संस्थानों को फिर से खड़ा करने के साथ-साथ लोगों के दुख दर्द को कम करना और उस पर मरहम लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

उनका सार्वजनिक जीवन, भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरी समझ और सम्मान को भी दर्शाता था। ‘महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष के तौर पर, उन्होंने बौद्ध देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई। सभ्यतागत कूटनीति के स्थायी महत्व को समझते हुए, बुद्ध के मुख्य शिष्यों—अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन—के पवित्र अवशेषों का भारत में स्वागत करने में उन्होंने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। आज भी, मंगोलिया जैसे देशों के साथ इन पवित्र अवशेषों को साझा करने की भारत की कोशिशें यह दिखाती हैं कि किस तरह सांस्कृतिक विरासत अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को मज़बूत करती है और ऐतिहासिक संबंधों को और गहरा बनाती है।

साहित्य और विद्वता के प्रति भी उनकी चिंता उतनी ही स्पष्ट थी। उनके पत्रों से पता चलता है कि उन्होंने प्रसिद्ध कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की उनके व्यक्तिगत संकट के समय किस तरह मदद की थी। ऐसी घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि सार्वजनिक नेतृत्व को  केवल बड़े नीतिगत फैसलों से ही नहीं, बल्कि उदारता के उन शांत और मौन कार्यों से भी आंका जाता है, जिन पर शायद ही कभी लोगों का ध्यान जाता है।

डॉ. मुखर्जी ने संस्थागत निर्माण के इसी दृष्टिकोण को संविधान सभा में भी आगे बढ़ाया। संविधान के निर्माण को “एक बड़ी जिम्मेदारी” और “एक गंभीर और पवित्र विश्वास” के रूप में वर्णित करते हुए, उन्होंने संवैधानिक शासन के साथ जुड़ी नैतिक ज़िम्मेदारियों पर ज़ोर दिया। उनके वे शब्द आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। संविधान की ताकत अंततः न केवल उसके लिखित प्रावधानों पर, बल्कि संसद की शुचिता, सार्वजनिक संस्थानों की स्वतंत्रता, कानून के शासन और नागरिकों की जिम्मेदारी पर भी निर्भर करती है। संवैधानिक लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाओं पर जनता का भरोसा हो और वे ईमानदारी से काम करें।

जैसे-जैसे भारत एक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, डॉ. मुखर्जी की सोच हमें एक ज़रूरी बात याद दिलाती है। सिर्फ़ आर्थिक विकास से ही देश की तरक्की तय नहीं होती। संवहनीय विकास के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, सांस्कृतिक संरक्षण और लोगों का भरोसा जगाने वाले संस्थानों में लगातार निवेश की ज़रूरत होती है।

सड़कें, हवाई अड्डे और कारखाने बेहद जरूरी हैं, लेकिन उतने ही जरूरी वे विश्वविद्यालय भी हैं जो जिज्ञासा को प्रोत्साहित करते हैं, वे प्रयोगशालाएँ जो ज्ञान का विस्तार करती हैं, वे संग्रहालय जो विरासत को संजोते हैं और वे सार्वजनिक संस्थान जो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हैं, वे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

संस्थाओं में एक अद्भुत गुण होता है: वे सरकारों, राजनीतिक आंदोलनों और यहाँ तक कि कई पीढ़ियों से भी ज़्यादा समय तक बनी रहती हैं। वे संचित ज्ञान को संजोकर रखती हैं, बदलाव के बीच निरंतरता बनाए रखती हैं और समाज को दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती हैं। नेता इतिहास को आकार दे सकते हैं, लेकिन संस्थाएं सभ्यता को जीवित रखती हैं।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन का सबसे अहम सबक यही है। उनकी विरासत केवल उन पदों तक सीमित नहीं है जो उन्होंने संभाले या उन बहसों में भी नहीं है जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया, बल्कि यह उनके उस अटूट विश्वास में निहित है कि मजबूत संस्थान ही किसी राष्ट्र की आकांक्षाओं के सच्चे संरक्षक होते हैं।

जैसे-जैसे भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, ज्ञान, वैज्ञानिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले संस्थानों को मजबूत करना ही उनके प्रति सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री हैं।)

‘मुखर्जी का बलिदान राष्ट्र की एकता के लिए अमर प्रेरणा’ : पीएम मोदी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। 

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया। 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी। 

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दीपक’ यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया। 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।  

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को  निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।  

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया। 

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे। 

ई-जागृति: डिजिटल भारत में उपभोक्ता न्याय के लिए नई परिकल्पना  

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

न्याय में देरी, लंबे समय से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ी निराशाओं में से एक रही है। चाहे वह खराब उत्पाद हो, ऑनलाइन खरीदी गई वस्तु का न मिल पाना हो, या अनुचित सेवा अनुबंध हो, शिकायत दर्ज करने से लेकर राहत पाने तक की प्रक्रिया अक्सर धीमी, बोझिल और डराने वाली रही है। हालांकि, भारत की उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था समय के साथ लगातार विकसित हुई है, लेकिन इसे समर्थन देने वाली प्रणाली तेज़ी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के साथ कदम मिलाते हुए आगे नहीं बढ़ पायी।          

आज, उपभोक्ता ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल भुगतान प्रणाली और ऑनलाइन बाज़ार में बड़े पैमाने पर लेन-देन करते हैं। उपभोक्ता न्याय की पारंपरिक व्यवस्था—जो भौतिक रूप से दाखिल करने, व्यक्ति द्वारा एक-एक कर जांच करने, अलग-अलग सॉफ़्टवेयर प्लेटफार्म का उपुओग करने और आमने-सामने की सुनवाई के इर्द-गिर्द बनायी गयी थी—धीरे-धीरे अपर्याप्त सिद्ध होने लगी। डिजिटल युग में उपभोक्ता अधिकार सुनिश्चित करने के लिए केवल कानूनी सुधार ही पर्याप्त नहीं थे; इसके लिए न्याय देने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव करने की जरूरत थी।

यहीं पर ई-जागृति एक महत्वपूर्ण बदलाव लाती है। यह सिर्फ़ एक तकनीक प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था के केंद्र में पहुंच, पारदर्शिता और दक्षता को रखकर उपभोक्ता विवाद समाधान के तरीके की नए सिरे से परिकल्पना करने का प्रयास है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में एक आधुनिक फ्रेमवर्क की परिकल्पना की गयी थी, जो बाज़ार की उभरती वास्तविकताओं के अनुरूप काम करने में सक्षम हो। हालाँकि, कानून की भावना को प्रभावी सार्वजनिक सेवा में बदलने के लिए कई अलग-अलग पुरानी प्रणालियों को हटाकर एकीकृत डिजिटल इकोसिस्टम को अपनाने की जरूरत थी। पुराने प्लेटफॉर्म में एकरूपता की कमी, पुरानी संरचना, एक-दूसरे से जुड़कर काम करने की सीमित सुविधा और भौतिक प्रक्रियाओं पर अधिक निर्भरता जैसी समस्याएँ थीं। कई उपभोक्ताओं के लिए—विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन और अनिवासी भारतीय —न्याय पाने की प्रक्रिया की लागत अक्सर एक बड़ी बाधा बन जाती थी।

ई- जागृति उपभोक्ता शिकायत की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर इन संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करती है। ओटीपी आधारित पंजीकरण और ऑनलाइन दाखिल करने से लेकर डिजिटल जाँच, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान, वर्चुअल सुनवाई, बहुभाषी आदेश और वास्तविक समय में मामले की निगरानी तक, यह प्लेटफ़ॉर्म नागरिकों को किसी भौगोलिक या प्रक्रियात्मक जटिलता की बाधा के बिना न्याय पाने में मदद करता है।

ऐसे बदलाव का महत्व केवल सुविधा तक ही सीमित नहीं है। यह नागरिकों और सार्वजनिक संस्थानों के बीच रिश्ते को मौलिक रूप से बदल देता है। डिजिटल वर्कफ़्लो कागजी काम को कम करते हैं, अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में प्रक्रियाओं को एक जैसा बनाते हैं, विवेकाधीन देरी को कम करते हैं और पारदर्शिता बढ़ाते हैं। मामलों की स्वचालित सूची, ऑनलाइन डैशबोर्ड और तुरंत सूचना सुनिश्चित करती है कि कानूनी प्रक्रिया के दौरान शिकायतकर्ता को हर जानकारी मिलती रहे, जिससे प्रणाली में जनता का भरोसा मजबूत होता है।

इस प्लेटफ़ॉर्म ने न्याय को और अधिक समावेशी बनाने के लिए उभरती तकनीकों को भी अपनाया है। एआई-सहायता प्राप्त मामला विश्लेषण, वॉइस-टू-टेक्स्ट कार्यप्रणाली, टेक्स्ट-टू-स्पीच सुविधा, बहुभाषी इंटरफेस, उन्नत सर्च क्षमता और पहुँच प्राप्त करने के उपकरण जैसी विशेषताओं के जरिए समाज के विभिन्न हिस्सों से अधिक लोगों की भागीदारी संभव हुई है। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग और राज्य उपभोक्ता आयोगों में हाइब्रिड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का देश भर में लागू होना भी उतना ही अहम रहा है, जिससे वर्चुअल सुनवाई उपभोक्ता न्याय दिलाने की प्रक्रिया का एक ज़रूरी हिस्सा बन गई है। दूरदराज के जिलों या विदेशों में रहने वाले नागरिकों के लिए, इससे कानूनी लड़ाई की वित्तीय और लॉजिस्टिक लागत दोनों काफी हद तक कम हो गई हैं।

फिर भी, इस स्तर के तकनीकी बदलाव में चुनौतियाँ हमेशा मौजूद रहती हैं। डिजिटल सुधार अक्सर संस्थानों को स्थापित प्रथाओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर करते हैं और उपयोगकर्ताओं को अपरिचित प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ई-जागृति की शुरुआत के दौरान, डेटा स्थानान्तरण, भुगतान गेटवे एकीकरण, इंटरफेस की उपयोगिता और लंबे समय से चल रहे मैनुअल प्रक्रियाओं में बदलाव को लेकर चिंताएँ उभरीं। कानूनी पेशेवरों और अन्य हितधारकों के कुछ हिस्सों ने नई डिजिटल व्यवस्था को अपनाते समय कुछ चिंताएं जाहिर कीं।

इन चिंताओं को बाधा मानने की बजाय, कार्यान्वयन प्रक्रिया ने उन्हें निरंतर सुधार के मौकों के तौर पर देखा। उपभोक्ता आयोगों, कानूनी पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श से इस प्लेटफ़ॉर्म को बेहतर बनाने में मदद मिली। नियमित क्षमता निर्माण कार्यक्रम, क्षेत्रीय कार्यशालाएं, वर्चुअल प्रशिक्षण सत्र, साप्ताहिक शिकायत निवारण संवाद और लगातार तकनीकी समर्थन से हितधारकों का नई प्रणाली में धीरे-धीरे भरोसा बढ़ा। इस अनुभव से एक महत्वपूर्ण सबक मिला: डिजिटल परिवर्तन केवल इसलिए सफल नहीं होता कि तकनीक लागू की गई है, बल्कि इसलिए सफल होता है, क्योंकि संस्थाएं उपयोगकर्ता की प्रतिक्रिया के प्रति संवेदनशील रहती हैं और निरंतर सुधार के लिए प्रतिबद्ध रहती हैं।

शुरुआती परिणाम उत्साहवर्धक हैं। थोड़े ही समय में, ई-जागृति ने लाखों उपभोक्ताओं को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ला दिया है, दो लाख से अधिक मामलों के दाखिले की सुविधा दी है, उच्च समाधान दर हासिल की है और साठ से अधिक देशों के उपभोक्ताओं को भारत के उपभोक्ता विवाद निवारण व्यवस्था तक पहुंचने में सक्षम बनाया है। मानकीकृत डिजिटल वर्कफ़्लो ने दक्षता में सुधार किया है और उन प्रक्रियात्मक अड़चनों को कम किया है, जो पहले की प्रणाली की विशेषता थी।   

राष्ट्रीय ई-शासन पुरस्कार 2026 में रजत पुरस्कार के माध्यम से मान्यता, न केवल एक संस्थागत उपलब्धि के रूप में, बल्कि सरकारी प्रक्रिया की सफल पुनः डिज़ाइन की स्वीकृति के रूप में महत्वपूर्ण है। यह पुरस्कार इस बात को मान्यता देता है कि सार्थक डिजिटल शासन केवल मौजूदा प्रक्रियाओं को कंप्यूटरीकृत करने के बारे में नहीं है; यह उन्हें सरल, तेज़ और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए फिर से डिज़ाइन करने के बारे में है।

भारत की व्यापक डिजिटल इंडिया यात्रा ने दिखाया है कि जब मजबूत संस्थागत प्रतिबद्धता हो, तो तकनीक सार्वजनिक सेवा अदायगी को बदल सकती है। डिजिटल पहचान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से लेकर ऑनलाइन कराधान और स्वास्थ्य देखभाल प्लेटफार्मों तक, देश ने शासन में तकनीक की भूमिका का लगातार विस्तार किया है। अब उपभोक्ता न्याय भी उन क्षेत्रों की सूची में शामिल हो गया है, जिसमें संरचनात्मक डिजिटल सुधार हो रहे हैं। 

‘ई-जागृति’ की सफलता भविष्य के शासन सुधारों के लिए भी महत्वपूर्ण सबक देती है। डिजिटल प्लेटफार्मों को संस्थाओं के बजाय नागरिकों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाना चाहिए। पहुंच को बाद में सोची जाने वाली बात के बजाय एक मूल सिद्धांत के रूप में लिया जाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को निष्पक्षता से समझौता किए बिना पारदर्शिता और कुशलता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर, तकनीक को न्याय को सरल बनाना चाहिए, न कि उसमें जटिलता की नई परतें जोड़नी चाहिए।

जैसे-जैसे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था बढ़ती जा रही है, उपभोक्ता का विश्वास उन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर अधिक निर्भर करेगा, जो उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करती हैं। प्रभावी विवाद समाधान अब केवल एक प्रशासनिक उद्देश्य नहीं रहा; यह एक आर्थिक आवश्यकता बन गया है, जो बाजारों में भरोसे को मजबूत करता है और जिम्मेदार व्यावसायिक प्रथाओं को बढ़ावा देता है।

ई-जागृति प्लेटफार्म दिखाता है कि सोच-समझकर किया गया डिजिटल बदलाव कानूनी इरादे और नागरिक अनुभव के अंतर को कम कर सकता है। उपभोक्ता न्याय को तेज़, अधिक पारदर्शी और अधिक समावेशी बनाकर, यह एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत करता है—कि डिजिटल लोकतंत्र में, न्याय तक पहुंच भी सेवा तक पहुंच जितनी ही सहज होनी चाहिए। यही शायद इक्कीसवीं सदी में “ग्राहक देवो भव” का सबसे सार्थक रूप है।  

(लेखक केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा तथा उपभोक्ता कार्य, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री हैं)

नारी शक्ति: वादों से लेकर कर दिखाने तक: ब्रिक्स में भारत का योगदान

भारत ने 1 जनवरी 2026 को “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” की थीम के तहत ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली। महिलाओं से जुड़े मामलों में हमारा योगदान बेहद खास रहा है। हम सिर्फ़ कोई नारा या तारीफ़ के लिए सफल कहानियों का संग्रह पेश नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसा कामकाजी ढांचा लेकर आए हैं, जो करोड़ों महिलाओं तक पहुँचा है। यह ढांचा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां से शुरू होकर जहाँ भी जाता है, वहाँ आगे और विकसित होने के लिए तैयार रहता है।

यही भारत की खास बात है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से  भारत ने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एक राष्ट्रीय मिशन के तौर पर अपनाया है और इस काम को इतने बड़े पैमाने पर किया है, जिसकी बराबरी बेहद कम देश कर सकते हैं। 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान, भारत ने वैश्विक सोच को “महिलाओं के विकास” से बदलकर “महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास” की ओर मोड़ने में मदद की। यह महज़ शब्दों का बदलाव नहीं था, बल्कि सोच का भी बदलाव था। महिलाओं को सिर्फ़ लाभार्थी के तौर पर देखने के बजाय, उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका में देखना। कोच्चि में हम इसी बदलाव से जुड़ा सवाल उठा रहे हैं: एक बार वादा करने के बाद, उसे बड़े पैमाने पर, आख़िरी गाँव की आख़िरी महिला तक कैसे पहुँचाया जाए? भारत ने पिछले दस सालों में सिर्फ़ सैद्धांतिक तौर पर नहीं, बल्कि असल में इस सवाल का जवाब दिया है।

भारत के लिए यह सोच नई नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है। विकास की भाषा के आने से काफी पहले ही, हमारी संस्कृति ने नारी को शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्रोत माना था। ये तीनों ही वे आधार हैं, जिन पर कोई भी समाज तरक्की करता है और उन्हें देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता रहा है। दैवीय शक्ति को ही ‘शक्ति’ कहा जाता है और संस्कृत के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार, जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता भी प्रसन्न होते हैं। यह सम्मान सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं था: लोपामुद्रा और घोषा जैसी महिला ऋषियों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की और गार्गी और मैत्रेयी जैसी दार्शनिकों ने उपनिषदों के प्रसिद्ध वाद विवादों में अपनी बात मज़बूती से रखी। इसलिए, भारत के लिए महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास, किसी और से लिया हुआ विचार नहीं है, बल्कि एक प्राचीन विचार का ही आधुनिक रूप है।

शुरुआत फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से करते हैं। भारत की पंचायती राज संस्थाओं में चुने गए प्रतिनिधियों में से लगभग आधी महिलाएँ हैं, जो दुनिया में चुनी हुई महिला नेताओं के सबसे बड़े समूहों में से एक है। इसके अलावा नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का अंत सिर्फ़ प्रतिनिधित्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां से इसकी शुरुआत होती है। ऐसा मॉडल, जो महिलाओं को सेवाएँ तो देता है, लेकिन उन सेवाओं को तय करने वाले फ़ैसलों में उन्हें शामिल नहीं करता, वह असल में महिलाओं के नेतृत्व वाला मॉडल नहीं है।

भारत में सेवा पहुँचाने का ढाँचा तीन हिस्सों पर टिका है, जो एक साथ मिलकर ही काम करते हैं। पहला हिस्सा है पहुँच: डिजिटल जन अवसंरचना, फ़ायदों को सीधे महिलाओं के हाथों तक पहुँचाती है। आधार से जुड़े ट्रांसफ़र उन बिचौलियों की भूमिका को खत्म कर रहे हैं, जो पहले मदद पहुँचने से पहले ही उसे दूसरी तरफ़ मोड़ देते थे। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना इस पहुँच का व्यावहारिक उदाहरण है।  4.26 करोड़ से ज़्यादा माताओं को मातृत्व लाभ के तौर पर 20,060 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि सीधे उनके आधार से जुड़े खातों के ज़रिए मिली है। दूसरा हिस्सा है संस्थाएँ: डीएवाई-एनआरएलएम के तहत, 10.05 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण महिलाओं को 90.90 लाख से ज़्यादा स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जो दुनिया में महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक संस्थाओं का सबसे बड़ा नेटवर्क है। तीसरा हिस्सा है गतिशीलता—यानी मूल्य श्रृंखला में हमेशा सबसे नीचे बने रहने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ने का एक सोच-समझकर चुना गया रास्ता। भारत अब 65,949 एसएचजी महिलाओं को बिज़नेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट यानी बीसी सखी के तौर पर तैनात कर रहा है, जो दूर-दराज़ के इलाकों में जमा, क्रेडिट, धनराशि भेजने और पेंशन सेवाएँ पहुँचाती हैं। जो महिला कभी किसी लाभ के लिए कतार में लगती थी, अब वही महिला उस लाभ को दूसरों तक पहुँचाती है।

कुल मिलाकर ये सब मिलकर भागीदारी को आमदनी और मालिकाना हक में बदलते हैं। लखपति दीदी पहल के तहत, जून 2025 तक 1.48 करोड़ स्वयं सहायता समूह महिलाओं की सालाना कमाई कम से कम 1 लाख रुपए तक पहुँच गई थी और जनवरी 2026 में शुरू किए गए उद्यमिता पर केंद्रित एक राष्ट्रीय अभियान का मकसद 50,000 सामुदायिक संसाधन व्यक्ति के ज़रिए 50 लाख अतिरिक्त महिलाओं को प्रशिक्षण देना है। तरक्की का यही रास्ता औपचारिक कारोबार में भी दिखता है: पीएमएमवाई के तहत दिए गए ऋण में से 69 प्रतिशत और ‘स्टैंड-अप इंडिया’ के लाभार्थियों में से 84 प्रतिशत महिलाएँ हैं। डीपीआईआईटी द्वारा मान्यता प्राप्त 2.12 लाख स्टार्टअप्स में से 1.02 लाख से ज़्यादा स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या हिस्सेदार है और इनमें से कई स्टार्टअप बड़े शहरों के बजाय छोटे शहरों में हैं। हम ब्रिक्स को ये ब्रांड नाम नहीं, बल्कि उनके पीछे की कहानी पेश करते हैं: पहले पहुँच, फिर संस्थाएँ और फिर लाभार्थी से उद्यमी बनने का एक व्यवस्थित मार्ग।

आँकड़े भी इस बदलाव को दिखाते हैं। भारत में महिलाओं की कामकाजी आबादी में भागीदारी 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है और इसी दौरान महिलाओं में बेरोज़गारी दर 5.6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हो गई है। अब पहले से कहीं ज़्यादा महिलाएँ कार्यबल का हिस्सा हैं, इसलिए हमारा फोकस अब अगले चरण पर है, उनके काम की गुणवत्ता और आमदनी को और बेहतर बनाना।

इस साल महिलाओं से जुड़े कामों के लिए चार प्राथमिकता वाले क्षेत्र तय किए गए हैं और इनमें से एक सीधे हमारे अनुभव से जुड़ा है: जलवायु कार्यवाही, खाद्य सुरक्षा और पोषण में महिलाओं की भूमिका। इस बारे में साक्ष्य भी साफ नतीजे बयां करते हैं: जब फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाएं शामिल होती हैं, तो पोषण बेहतर मिलता है और समुदाय चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाते हैं। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। झारखंड में महिला किसानों को ऐसी बीजों की किस्मों की जानकारी है, जो सूखे के दौरान भी बची रहती हैं। राजस्थान में महिला पशुपालकों को उन रास्तों की भी जानकारी है, जिनसे सूखे के समय मवेशियों को सुरक्षित ले जाया जा सकता है। भारत का काम ऐसे संस्थान बनाना रहा है, जो इस जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल करें, न कि इसे नज़रअंदाज़ करें। मिशन पोषण 2.0 आंगनवाड़ी नेटवर्क के ज़रिए चलाया जाता है, जिसमें महिलाएं काम करती हैं और वे ही लोगों तक सेवा पहुंचाने की भरोसेमंद कड़ी होती हैं। जलवायु के अनुसार ढलने का काम भी इसी तरह होता है, चाहे वह लद्दाख में महिलाओं द्वारा बनाए गए ऊंचे इलाकों में पानी जमा करने के ढांचे हों या ओडिशा के तट पर वनस्पति के घने इलाकों को बचाने वाली समितियां। महिलाएं अब सिर्फ़ अनुकूलन की तकनीक का इस्तेमाल करने वाली नहीं रह गई हैं, बल्कि वे खुद इसे आगे बढ़ा भी रही हैं: नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत, स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को खेती में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह ज़्यादा कौशल और ज़्यादा आमदनी वाले काम की ओर एक सोच-समझकर उठाया गया कदम है।

एक खास बात जो पूरी तरह से भारत की वास्तविक विशेषता बन गई है।  एक ज़िला एक उत्पाद पहल के तहत अब 761 ज़िलों में 1,102 उत्पाद शामिल हैं। महिला समूह हथकरघा, जीआई टैग वाले शिल्प और क्षेत्रीय खाद्य पदार्थों जैसे स्थानीय विशेष उत्पादों को ब्रांडेड और तेज़ी से निर्यात होने वाले उत्पादों में बदल रहे हैं। सरकार भी इन उत्पादों के लिए बाज़ार तक पहुँचने का रास्ता बना रही है: अवसर योजना के तहत हवाई अड्डों पर महिलाओं के लिए आरक्षित रिटेल जगह और ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के तहत महिला-संचालित उद्यमों के लिए जेम पर एक खास स्थान। असल मायनों में यह टिकाऊ व्यवस्था है, जिसके तहत स्थानीय सामग्री, स्थानीय कौशल और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला, जो समुदाय के भीतर ही अपना मूल्य बनाए रखती हैं और ये विकास का ऐसा रूप भी है, जिसके लिए किसी महिला को बाज़ार तक पहुँचने के लिए अपना ज़िला छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास सरकार द्वारा की गई महज़ कोई घोषणा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे एक-एक हिस्से को जोड़कर तब तक बनाया और संचालित किया जाता है, जब तक कि यह उस आखिरी महिला तक न पहुँच जाए, जिसके लिए इसे बनाया गया था। जुलाई में कोच्चि में होने वाली मंत्रियों की बैठक में, भारत इस मॉडल को एक योगदान के तौर पर पेश करेगा, न कि किसी ऐसे उपाय के तौर पर, जिसे दूसरों को भी अपनाना ही हो। इसका मकसद यह है कि दूसरे इससे सीख सकें और इसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढाल सकें। यही व्यवस्था और इसके सफल होने के सबूत, भारत ब्रिक्स के सामने रख रहा है। यह आदान-प्रदान दोनों तरफ से होता है: भारत कोच्चि में अपने ब्रिक्स सहयोगियों के बेहतरीन तौर-तरीकों से सीखने और अपने अनुभव साझा करने के लिए तैयार है।

(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)