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नागरिकों और बिज़नेस के लिए सुविधा – डिजिटल इंडिया की 11 साल की विरासत

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

सिर्फ़ दस साल पहले, उत्तर प्रदेश के एक दूर-दराज़ के गाँव में किसान को सब्सिडी पाने या पैदावार बढ़ाने की सलाह लेने के लिए कागज़ों के ढेर खंगालने पड़ते थे। उस समय लाइनों में खड़ा होना आम बात थी। लेकिन आज, वह किसान बिना किसी बिचौलिए के फसल की मदद ले सकता है और सब्सिडी भी सीधे उसके बैंक अकाउंट में जमा हो जाती है।

आजकल, किसी भी गली में चलते हुए, आप एक साइलेंट रेवोल्यूशन महसूस कर सकते हैं। एक ऐसा रेवोल्यूशन जिसने ज़िंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है। पहले, एक फल बेचने वाले या तिपहिया वाहन चालक को कैश में लेन-देन करना पड़ता था। लेकिन अब वह अपना ठेला या ऑटो रिक्शा घुमाते हुए गर्व से QR कोड दिखाता है।

102.86 करोड़ नागरिकों की डिजिटल कनेक्टिविटी ने भारत को मज़बूत बनाया है। इसमें देश के 99.56 करोड़ ब्रॉडबैंड सब्सक्राइबर के बड़े समुदाय ने मदद की है। मोबाइल डेटा 8 से 10 रुपये प्रति GB पर बहुत सस्ता है। इस तरह, प्रति व्यक्ति महीने का डेटा इस्तेमाल 24.01 GB के बहुत बड़े लेवल पर पहुँच गया है। इस डिजिटल बुनियाद ने नागरिकों और सरकार के बीच के रिश्ते को पूरी तरह बदल दिया है। यह रिश्ता भरोसे, ट्रांसपेरेंसी और डिजिटल मैनेजमेंट पर आधारित है। इस अंतर को पाटना इस क्रांति का पहला कदम था एक्सेस को डेमोक्रेटाइज़ करना और एक मज़बूत और देसी डिजिटल आइडेंटिटी फ्रेमवर्क बनाना जो टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता की गारंटी देता है।

‘भारतनेट’ प्रोग्राम बड़े पैमाने पर लागू किया गया और लगभग 2.2 लाख ग्राम पंचायतों को हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड से जोड़ा गया। इस तरह, यह पक्का हुआ कि ज्योग्राफिकल हालात आर्थिक मौकों के रास्ते में रुकावट न बनें। 144 करोड़ से ज़्यादा आधार आइडेंटिटी बनाने के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ी छलांग ने ‘जन धन’, ‘आधार’ और ‘मोबाइल’ (JAM) की तिकड़ी को बढ़ावा दिया।

सरकार ने सॉवरेन डिजिटल आइडेंटिटी फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करके डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के ज़रिए नागरिकों को 51.5 लाख करोड़ रुपये सक्सेसफुली ट्रांसफर किए हैं। इस सिस्टम ने पैसे की बर्बादी और बिचौलियों की ज़रूरत को असरदार तरीके से खत्म कर दिया है। इसने करोड़ों परिवारों के हाथों में फाइनेंशियल ऑटोनॉमी देकर उनके जीवन को आसान बनाने में काफी सुधार किया है।

डीपीआई: रोजमर्रा की जिंदगी और उद्यमिता में बदलाव जब से नींव रखी गई है, भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) ने समस्याओं को हल करने के लिए समाधान बनाकर नागरिकों के दैनिक जीवन को बदल दिया है। डिजिलॉकर जैसे प्लेटफॉर्म ने नागरिकों और व्यवसायों के लिए इस प्रक्रिया को बेहद आसान बना दिया है।

डिजिलॉकर के 700 मिलियन से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं और प्लेटफॉर्म पर 900 मिलियन से अधिक दस्तावेज हैं। इसने कागजी कार्रवाई को खत्म करके केवाईसी प्रक्रियाओं और दस्तावेज़ सत्यापन को तुरंत पूरा करना संभव बना दिया है। इससे उद्यमों के लिए लागत और समय में काफी कमी आई है। दिनों के बजाय अब बैंकों, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और वित्तीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को ग्राहकों को सत्यापित करने में कुछ ही क्षण लगते हैं। सरकार ने सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) के माध्यम से 19.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद की है।

दूर से सरकारी सेवाओं का फ़ायदा उठाने के लिए, ‘उमंग’ ऐप ने केंद्र और राज्य सरकारों की सेवाओं को सीधे नागरिकों की पहुँच में ला दिया है। यह ऐप अब 11.6 करोड़ से ज़्यादा रजिस्टर्ड यूज़र्स को सर्विस दे रहा है, जिसके ज़रिए 2,572 सरकारी सेवाओं का फ़ायदा उठाया जा सकता है और अब तक 797.84 करोड़ से ज़्यादा ट्रांज़ैक्शन किए जा चुके हैं। इस पूरे इकोसिस्टम का सबसे ज़रूरी हिस्सा ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस’ (UPI) है। सड़क किनारे ठेला लगाने वाले फल बेचने वाले को जो QR कोड सुविधा देता है, वह एक सॉवरेन पेमेंट रेल है जिस पर रोज़ाना 75 करोड़ ट्रांज़ैक्शन होते हैं। आज, दुनिया भर में होने वाले कुल इंस्टेंट डिजिटल पेमेंट में से लगभग आधे अकेले भारत में होते हैं और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने भी UPI को दुनिया का सबसे बड़ा इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम माना है।

यह उन 24 देशों के लिए ज़रूरी हो गया है जिनके साथ भारत ने औपचारिक रूप से MoU साइन किए हैं ताकि वे इसके डिजिटल गवर्नेंस प्लेटफ़ॉर्म को अपना सकें और ऐसा ही पेमेंट सिस्टम बना सकें।

इसके अलावा, UPI अब यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर और फ्रांस समेत 9 देशों में चालू है। टेक्नोलॉजी को ‘पब्लिक गुड’ मानने की यह सोच सीधे तौर पर हेल्थ के क्षेत्र में बराबरी और लोगों की ज़िंदगी को आसान बनाने से जुड़ी है। ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म के ज़रिए, भारत ने 48 करोड़ से ज़्यादा फ़्री टेली-कंसल्टेशन दिए हैं, जिससे दूर-दराज़ और पिछड़े इलाकों के मरीज़ स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से सलाह ले पाए हैं। इसी तरह, दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन कैंपेन एक देसी प्लेटफॉर्म से चलाया गया।

COVID-19 वैक्सीन की 220 करोड़ से ज़्यादा डोज़ दी गईं और ‘Covin’ के ज़रिए ट्रांसपेरेंट तरीके से ट्रैक की गईं। इसने एक मज़बूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जिसकी दुनिया भर के हेल्थकेयर सिस्टम ने स्टडी की है। भविष्य की ओर देखते हुए, डिजिटल इंडिया के 11वें साल पूरे होने के साथ, यह मिशन कटिंग-एज टेक्नोलॉजी की ओर मज़बूती से बढ़ रहा है, जिसका मकसद यह पक्का करना है कि भारत और डेवलपिंग देशों की चुनौतियों का सामना करने के लिए उनका इस्तेमाल पब्लिक इंटरेस्ट में किया जाए। सालों से, कंप्यूटिंग पावर की ज़्यादा कीमत ने छोटे शहरों के टैलेंटेड युवा इनोवेटर्स को एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से दूर रखा।

‘IndiaAI’ मिशन के तहत, भारत स्टार्टअप्स के लिए बिज़नेस करने में आसानी बढ़ाने के लिए सिस्टमैटिक तरीके से इस रुकावट को दूर कर रहा है। सरकार ने इसे सभी के लिए आसान बनाने के लिए एक बड़ी, शेयर्ड कंप्यूटिंग फैसिलिटी बनाई है। देश के घरेलू स्टार्टअप्स और स्टूडेंट्स को सिर्फ़ Rs 65 प्रति घंटे पर वर्ल्ड-क्लास कंप्यूटिंग कैपेसिटी देकर, इसका मकसद ज़मीनी लेवल पर इनोवेटर्स को बढ़ावा देना है।

हमारा लक्ष्य भारत को AI एप्लीकेशन्स के लिए दुनिया का हब बनाना है, इसके टैलेंटेड वर्कफोर्स का फ़ायदा उठाकर, जो सभी सेक्टर्स में सर्विस डिलीवरी को बेहतर बना सकता है और देश और विदेश में एंटरप्राइज़ेज़ की प्रोडक्टिविटी बढ़ा सकता है। साथ ही, भारत अपने हार्डवेयर का भविष्य भी सुरक्षित कर रहा है।

‘सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम’ के तहत, देश भर में Rs 1.65 लाख करोड़ के इन्वेस्टमेंट वाले 12 सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और पैकेजिंग प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी गई है। इसी रफ़्तार को आगे बढ़ाते हुए, यूनियन बजट 2026-27 में ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) की घोषणा की गई है।

2.0 की घोषणा की गई है। यह नया चरण केवल विनिर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरणों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने पर केंद्रित है। इस योजना के तहत 24 सेमीकंडक्टर डिजाइन स्टार्टअप को मंजूरी मिलने के साथ, भारत तेजी से अपनी क्षमता निर्माण को गहन प्रौद्योगिकी कौशल में बदल रहा है।

यह एक जीवंत घरेलू फैबलेस इकोसिस्टम को बढ़ावा दे रहा है जो आधुनिक दुनिया को शक्ति देने वाले चिप्स को डिजाइन करता है। इस पहल की असली विरासत एक ऐसे देश की मानसिकता में निहित है, जो अब अपनी उंगलियों पर नवाचार, निर्बाध व्यावसायिक संचालन और शासन चाहता है। यह सुनिश्चित करके कि तकनीक समावेशी, आसानी से सुलभ और संप्रभु शक्ति का स्रोत हो, ‘डिजिटल इंडिया’ चुपचाप उस ‘विकसित भारत’ की नींव रख रहा है जिसका हम 2047 में सपना देखते हैं।

अल नीनो की चुनौती और जल संरक्षण का संकल्प : डॉ. राजभूषण चौधरी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

आज, धरती का पर्यावरण एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ कुदरत के संकेत तेज़ी से साफ़ दिख रहे हैं और मौसमों का पारंपरिक चक्र बुरी तरह प्रभावित होता दिख रहा है।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दूर की सोच से मई के आखिर में ही साफ़ इशारा कर दिया था कि इस बार गर्मी बहुत ज़्यादा पड़ेगी। उन्होंने सभी देशवासियों से भरपूर पानी पीने और पानी के सोर्स को बचाने के प्रति सचेत रहने की भावुक अपील की थी। प्रधानमंत्री की यह अपील आज के पहले कभी न हुए पर्यावरण संकट के बीच देश को एक सुरक्षित रास्ता दिखाने वाली एक राह दिखाने वाली रोशनी साबित हो रही है।

धरती का लगातार बढ़ता तापमान और मौसमी चक्रों में भारी उतार-चढ़ाव इस बात का साफ़ सबूत है कि क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ़ दूर की बात नहीं रह गई है। बल्कि, यह हमारे समय की सबसे बड़ी एडमिनिस्ट्रेटिव और सोशल चुनौती बन गई है। बेवक्त भारी बारिश, लंबे समय तक सूखा और गर्मी के मौसम का भयंकर रूप आज पूरी दुनिया के लिए गहरी चिंता का विषय है। इस ग्लोबल एटमोस्फेरिक उथल-पुथल के केंद्र में प्रशांत महासागर से शुरू होने वाली एक बहुत ही जटिल हाइड्रो-मेटियोरोलॉजिकल घटना है, जिसे मॉडर्न साइंस की भाषा में ‘एल नीनो’ कहा जाता है। भारत जैसे विशाल, घनी आबादी वाले और मुख्य रूप से खेती पर निर्भर देश के लिए, यह एल नीनो साइकिल सिर्फ़ लैबोरेटरी रिसर्च का विषय नहीं हो सकता। यह एक बहुत ही गंभीर और प्रैक्टिकल मुद्दा है जो सीधे देश भर के लाखों किसान परिवारों की ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हमारी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है।

ओशनोग्राफी के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में, प्रशांत महासागर के इक्वेटोरियल क्षेत्र में पूरब से पश्चिम की ओर चलने वाली तेज़ व्यापारिक हवाएँ गर्म सतह के पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं। इसके असर से दक्षिण अमेरिका में पेरू के तट से दूर समुद्र की गहराई से ठंडा, पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर उठता है। यह प्रक्रिया ग्लोबल एटमोस्फेरिक सर्कुलेशन का बैलेंस बनाए रखने में मदद करती है और भारतीय मानसून को पॉजिटिव बूस्ट देती है। हालाँकि, एल नीनो इफ़ेक्ट के दौरान, ये व्यापारिक हवाएँ अचानक कमज़ोर हो जाती हैं और कभी-कभी, उनकी दिशा पूरी तरह से उलट भी जाती है। इस वजह से, समुद्र की सतह का गर्म पानी पश्चिम की ओर जाने के बजाय दक्षिण अमेरिका के तटीय इलाकों की ओर वापस बहने लगता है। समुद्र की सतह का यह असामान्य गर्म होना पूरे एटमोस्फेरिक प्रेशर ज़ोन को बिगाड़ देता है, जिससे बादल बनने और बारिश की ग्लोबल ज्योग्राफी बदल जाती है। इस घटना से पेरू के कुछ हिस्सों में बहुत ज़्यादा बारिश और बाढ़ आती है, वहीं भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में हवा का दबाव बढ़ जाता है, जिससे मानसूनी हवाओं की रफ़्तार कमज़ोर हो जाती है। भारत के ज़मीनी हिस्से पर इसका सीधा असर बारिश की भारी कमी, बिखरे हुए मानसून और गर्मियों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के रूप में दिखता है। यह एक साइंटिफिक तबाही है जिसमें देश के पूरे हाइड्रोलॉजिकल साइकिल और पानी के सर्कुलेशन को अस्थिर करने की पूरी क्षमता है। इसके साथ ही, वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के बदलते पैटर्न और एल नीनो के असर ने मिलकर देश के लिए पानी के संकट और मौसम की अस्थिरता की स्थिति पैदा कर दी है।

प्रधानमंत्री ने हमेशा पानी की सुरक्षा को सबसे ज़्यादा प्राथमिकता दी है, इसे राष्ट्रीय संप्रभुता और रक्षा सुरक्षा के बराबर रखा है। उनका साफ़ मानना ​​है कि पानी बचाना हर नागरिक की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा और एक बड़ा जन आंदोलन बनना चाहिए। इसी सोच के आधार पर उन्होंने ‘कैच द रेन’ कैंपेन शुरू किए, जिसका मूल मंत्र है कि मॉडर्न तकनीकों का इस्तेमाल करके, हमें बारिश के पानी की हर बूंद को वहीं बचाना चाहिए जहाँ वह धरती पर गिरती है। देश के इतिहास में पहली बार, मौजूदा सरकार ने ‘जल शक्ति मंत्रालय’ के रूप में एक जुड़ा हुआ और मज़बूत एडमिनिस्ट्रेटिव ढांचा बनाया, जो देश की पानी की प्लानिंग को एक नई, साइंटिफिक और सही दिशा देने में सच में एक बदलाव लाने वाली पहल साबित हुई है।

बढ़ते कंक्रीटीकरण और बिना प्लान के इस्तेमाल की वजह से धरती के पानी के लेवल में लगातार हो रही गिरावट को रोकने और पानी के सोर्स की लंबे समय तक सुरक्षा पक्का करने के लिए, सरकार ने पॉलिसी और प्रोग्राम का एक बहुत बड़ा और आपस में जुड़ा हुआ फ्रेमवर्क बनाया है।

देश में ‘जल जीवन हरियाली मिशन’ ने पर्यावरण संतुलन और पानी बचाने को एक नई तेज़ी दी है। ‘जल जीवन मिशन’ के ज़रिए आज ‘हर घर जल’ के संकल्प के साथ देश के हर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाके में शुद्ध, टेस्टेड और लगातार पीने के पानी की सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है। इसके अलावा, ‘अटल भूजल योजना’ के तहत, ज़्यादा इस्तेमाल वाले इलाकों में कम्युनिटी की भागीदारी को बढ़ावा देकर साइंटिफिक मैनेजमेंट और ग्राउंड वॉटर लेवल का रिचार्ज किया जा रहा है। कृषि क्षेत्र की स्थिरता के लिए, ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ के तहत, ‘Per Drop More Crop’ के सिद्धांत पर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक माइक्रो-इरिगेशन तकनीकों को पूरे देश में बढ़ाया जा रहा है ताकि पानी का हर हिस्सा पानी के हर हिस्से तक पहुँच सके।

भारत ने कैसे किया होर्मुज संकट का मुकाबला : हरदीप सिंह पुरी  

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब फरवरी के अंत में होर्मुज की खाड़ी बंद हुई, तो भारत सरकार ने एक प्राथमिकता का चयन किया – हमारे देश के नागरिकों, विशेष रूप से सबसे कमजोर समुदायों, को अभूतपूर्व आपूर्ति और मूल्य व्यवधानों से सुरक्षित रखना। इस प्राथमिकता के आस-पास ही अन्य प्रयास किये जाने थे। यह भावना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की थी और यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा व्यवधान के लगभग चार महीनों तक बनी रही। 

तथ्यों के पता चलने से पहले ही भारत को लेकर निर्णय किये जा रहे थे: तर्क यह था कि एक ऐसा देश, जो अपने  कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, होर्मुज के बंद होने से संभल नहीं पायेगा, जिससे होकर दुनिया का 20-30% से अधिक हाइड्रोकार्बन गुजरता है। पेट्रोल पंप में कुछ ही दिनों में तेल ख़त्म हो जाएगा, कीमतें आसमान छुएंगी (जैसे कि कई अन्य देशों में हुआ) और अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। आज स्टॉक भरे हुए हैं, पंप खुले हैं, और भारतीय उपभोक्ता ने इस संकट के दौरान ऊर्जा के लिए दुनिया के किसी भी अन्य उपभोक्ता की तुलना में कम भुगतान किया है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे कैसे किया गया और इससे गलत आख्यानों को जवाब भी मिल जाएगा।

28 फरवरी को ईरान पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर सबसे महत्वपूर्ण मार्ग-खंड बंद हो गया और एलपीजी आपूर्ति ने भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश की, क्योंकि दुनिया में केवल अमेरिका और मध्य पूर्व ही प्रमुख एलपीजी निर्यातक हैं। भारत की लगभग 60% एलपीजी पहले मध्य पूर्व से आती थी और यह आपूर्ति तुरंत लगभग शून्य हो गई। फिर आपूर्ति और मांग, दोनों को लेकर एक युद्धकक्ष ऑपरेशन शुरू हुआ, हर कार्गो, हर रिफाइनरी, हर बॉटलिंग प्लांट की निगरानी की गयी, ताकि पूरे देश के सभी रसोईघरों में खाना पकाने के लिए आग जलती रहे।

आपूर्ति के संबंध में, 8 मार्च को एलपीजी नियंत्रण आदेश पारित किया गया, जिसके तहत सभी रिफाइनरियों को अपना एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के लिए सभी सी3-सी4 कार्बन स्ट्रीम को बदलने का निर्देश दिया गया। जो रिफाइनरी कभी कुकिंग गैस नहीं बनाती थीं, बदलाव किया गया और उत्पादन 35  टीएमटी प्रति दिन से बढ़कर 54 टीएमटी प्रति दिन हो गया। युद्ध की सर्वाधिक विभीषिका के दौरान, जब होर्मुज से कोई भी जहाज बाहर नहीं निकल रहा था, तब 12 से अधिक भारतीय एलपीजी जहाजें चुपचाप होर्मुज से बिना कोई टोल दिए निकाल दी गईं – किसी भी देश के लिए यह सबसे बड़ी संख्या थी। कार्गो सुरक्षित किए गए तथा यानबू और फुजैरा बंदरगाहों से लाल सागर रास्ते के जरिए कार्गो जहाज-से-जहाज स्थानांतरित किये गये। अमेरिका से कार्गो को सुरक्षित करने की स्थिति में भी खाली जहाज भेजे गए, नए माल लेने के लिए जहाज हॉर्मुज के अंदर भेजे गए तथा अल्जीरिया, जापान और कनाडा जैसे कई देशों के साथ नई आपूर्ति व्यवस्था शुरू की गयी। मैंने हर उस देश के ऊर्जा मंत्री से कई बार बात की, जो एलपीजी निर्यात कर सकता था। मैं यह बात कहना चाहता हूँ कि खाड़ी क्षेत्र के अंदर या बाहर का हर उत्पादक, जिसके साथ हमने व्यापार किया, हमारे साथ खड़ा रहा। 

हालांकि, आपूर्ति प्रयास का केवल आधा हिस्सा था, क्योंकि मांग को भी प्राथमिकता देना जरूरी था। घरों में जाने वाला रसोई गैस पूरा सुरक्षित रखा गया और इस कीमती आपूर्ति को काले बाज़ारियों से बचाने के लिए डिजिटल सत्यापन कोड अनिवार्य किया गया। हर नागरिक को उनके ज़रूरत के समय सिलेंडर मिलें, लेकिन कोई भी सिलेंडर जमा न कर सके, इसके लिए 25 दिन और 45 दिन की सीमा लगाई गई। चूँकि, वाणिज्यिक सिलेंडरों को नियंत्रित नहीं किया जाता और कोई भी खरीदार उपलब्ध पूरी आपूर्ति एक साथ खरीद सकता था, इसलिए इन्हें उद्योग संघों और राज्य नागरिक आपूर्ति विभागों के माध्यम से भेजा गया, ताकि हर किसी को पर्याप्त मिले और कोई भी जमा न कर सके। उद्योग को पाइप प्राकृतिक गैस अपनाने के लिए कहा गया, बड़े रसोईघरों और प्रतिष्ठानों को अन्य ईंधनों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जहाँ संभव था और घरेलू पाइप गैस और सीएनजी को बिना कटौती वाले वर्ग में रखा गया। सरकार के सभी विभागों ने मिलकर नगर निगम की शीघ्र मंज़ूरी के ज़रिए पाइप गैस कनेक्शनों की ओर बदलाव को संभव बनाया। कई उपभोक्ता, जिनमें प्रवासी भी शामिल थे, एजेंट से सिलेंडर खरीदते थे, जो अब डीएसी की शर्तों के कारण सिलेंडर नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पूरे देश में 5 किलो का मुफ्त व्यापार सिलेंडर उपलब्ध कराया गया, जब तक इसका इस्तेमाल लगभग दोगुना नहीं हो गया। लोगों में भय पैदा करने वाले और खराब स्थिति बताने वाले झूठी अफवाहें फैलाने लगे और झूठे वीडियो शेयर करने लगे ताकि कमी, घबराहट और अराजकता का माहौल पैदा किया जा सके, जबकि सरकार हर दिन युद्धकक्ष मोड में कई क्रांतिकारी कदम उठा रही थी, ताकि देश में किसी भी जगह आपूर्ति में बाधा न आये।

इस सब के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का दृढ़ संकल्प था – भारतीय नागरिक को सुरक्षा दी जायेगी चाहे खजाने पर कितना भी बोझ क्यों न पड़े —रूस-यूक्रेन संघर्ष और जीवन को संकट में डालने वाली कोविड चुनौती से पैदा हुए ऊर्जा संकट के दौरान यही ‘भारत की राह’ रही है। फरवरी और जून के बीच, रसोई गैस के अंतरराष्ट्रीय मानक, सऊदी सी पी, में लगभग 50% की वृद्धि हुई, और फिर भी, उस आयात दर पर ₹1,600 से अधिक की कीमत वाला सिलेन्डर उज्ज्वला घर तक ₹642 में पहुँचा। मोदी सरकार हर उज्ज्वला सिलेंडर पर लगभग ₹900 का और हर अन्य घर के लिए जाने वाले सिलेंडर पर करीब ₹600 का नुकसान उठाती है, आज सभी भारतीय परिवार अपने रसोई गैस के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, स्पेन या फ्रांस के घरों की तुलना में बहुत कम भुगतान कर रहे हैं।

मार्च में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर की कटौती का साहसिक निर्णय लिया गया, जिससे कीमत-वृद्धि में कमी आयी, जबकि कच्चे तेल की कीमत लगभग दोगुनी हो गयी थी और सरकारी तेल कंपनियों ने इस तिमाही में हर दिन 500 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाया। इसी अवधि में, अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 40% से अधिक और ब्रिटेन में करीब 20% बढ़ी, जबकि यूरोप के बड़े हिस्से में भी दहाई अंक की वृद्धि हुई, लेकिन भारत में कीमत में लगभग 7% की ही वृद्धि हुई।

एक और कहानी यह थी कि पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, विदेशी भंडार ख़त्म हो जाएंगे और हमारी आर्थिक संभावनाएँ धुंधली हो जाएंगी। भंडार खुद जवाब देते हैं, जो लगभग 690 बिलियन डॉलर के करीब है। यह संघर्ष शुरू होने के सप्ताह में रिकॉर्ड किये गये उच्चतम दर से केवल थोडा कम है और भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की है।

यह कहा गया कि भारत के पास केवल 8 या 9 दिन का भंडार है और उसके पास ज्यादा भंडार रखने की वास्तविक क्षमता नहीं है, यह दावा 1.5 बिलियन लोगों वाली बड़ी ऊर्जा अर्थव्यवस्था के काम करने के तरीके को गलत रूप में समझता है। आप किसी देश को कुछ गुफाओं से नहीं चला सकते, क्योंकि जमीन के भीतर रखी गई ऊर्जा से कुछ भी कमाई नहीं होती और उसे रखने में बहुत ज़्यादा खर्च भी आता है। इसके बजाय आप इसे इम्पोर्ट टर्मिनल, डिपो, पाइपलाइन, रिफाइनरी और पूरे देश में फैले स्टोरेज के सिस्टम के जरिए चलाते हैं, और आज भारत के पास 24 रिफाइनरी हैं, 47,000 किलोमीटर से ज्यादा तेल और गैस की पाइपलाइनें हैं, और 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं जो प्रतिदिन करीब 8 करोड़ लोगों की सेवा करते हैं।

उस प्रणाली की वास्तविकता की जांच, महाप्रलय का भय दिखाने वाले किसी भविष्यवक्ता की स्लाइड पर दिखाए गए आंकड़े से नहीं होती। असली जांच है – आधुनिक समय के सबसे बड़े ऊर्जा संकट के लगभग चार महीने गुजर जाने के बाद, क्या देश को अपने लोगों पर राशनिंग लागू करनी पड़ी, क्या ईंधन सिर्फ सम-विषम नंबर प्लेट्स के हिसाब से देना पड़ा, क्या घर में ऑफिस बनाना पड़ा या क्या हर दिन 5 बजे अपने पंप बंद करने पड़े। भारत को इनमें से कोई काम नहीं करना पड़ा। यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि पिछले कई सालों में इसकी तैयारी की गई थी। हमारे कच्चे तेल के बास्केट को 27 देशों से बढ़ाकर 41 करना, हमारे आयात टर्मिनल को दुगना करना, और प्रधानमंत्री मोदी के तहत एक दशक में बनाए गए पाइपलाइन और भंडार, होर्मुज के बंद होने पर ये सभी चीजें उपयोगी साबित हुईं; यही वजह थी कि रोशनी जलती रही।

इस स्तर का संकट एक देश को उसकी असली क्षमता दिखाता है। भारत ने होर्मुज के बंद होने की बाधा पार की और देश में कहीं भी बिना किसी कमी के आपूर्ति जारी रही। इस अनुभव से सीख लेकर, हम अपनी ऊर्जा सुदृढ़ता को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त क्षमताओं का निर्माण करेंगे, लेकिन जब इस संघर्ष का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक पंक्ति मौजूद रहनी चाहिए: मानव स्मृति का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट हमारे तटों तक पहुंचा, लेकिन 150 करोड़ भारतीय नागरिक सुरक्षित रहे।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।)  

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परिवर्तन की जड़ें: ई-गवर्नेंस से बदलता ग्रामीण भारत :प्रो. एस. पी. सिंह बघेल

कुछ क्षण केवल एक उपलब्धि भर नहीं होते, वे एक पूरी यात्रा को रोशन कर देते हैं। राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2026 के लिए चार पंचायती राज पहलों का चयन ऐसा ही एक क्षण है, ऐसा क्षण जो किसी एक कार्यालय का नहीं, बल्कि हर ग्राम पंचायत और हर उस नागरिक का है, जिसने डिजिटल रूप से सशक्त ग्रामीण भारत के सपने पर भरोसा किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदृष्टि से प्रेरित होकर, भारत की पंचायतें भरोसे, तकनीक और परिवर्तन का एक नया अध्याय लिख रही हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सुशासन के बारह परिवर्तनकारी वर्षों के इस पड़ाव पर यह सम्मान विशेष महत्व रखता है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार पंचायती राज संस्थाएं मात्र योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित निकायों से आगे बढ़कर, शासन की तीसरी स्तरीय व्यवस्था की आत्मविश्वासी, सक्षम और तकनीकी रूप से दक्ष संस्थाओं के रूप में स्थापित हुई हैं।

प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग द्वारा स्थापित राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से उत्कृष्ट लोक सेवा वितरण के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान है। इस वर्ष सात श्रेणियों में चयनित 17 परियोजनाओं में से 4 पंचायती राज क्षेत्र से संबंधित हैं, जो ज़मीनी स्तर पर नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण बनाने हेतु पिछले बारह वर्षों के निरंतर प्रयासों का स्वाभाविक परिणाम है।

ग्राम पंचायतों के प्रदर्शन के मूल्यांकन हेतु पंचायती राज मंत्रालय की प्रमुख पहल, पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स (PAI), को डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से डिजिटल परिवर्तन की श्रेणी में स्वर्ण पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इस सूचकांक के आने से पहले, देश की 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रदर्शन के मूल्यांकन के लिए कोई मानकीकृत, डेटा आधारित राष्ट्रीय ढांचा उपलब्ध नहीं था। आज यह सूचकांक डेटा, प्रदर्शन, पहचान और जनभागीदारी को आपस में जोड़ने वाली एक पारदर्शी जवाबदेही व्यवस्था का निर्माण कर रहा है।

उल्लेखनीय यह है कि दो ग्राम पंचायतों ने अपने स्वयं के प्रयासों से यह सम्मान अर्जित किया है। महाराष्ट्र के सांगली जिले की कडेपुर ग्राम पंचायत ने ग्रासरूट स्तर की पहलों की श्रेणी में स्वर्ण पुरस्कार प्राप्त किया है। यहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉकचेन जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग से 1,300 से अधिक सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध कराई जा रही हैं। वहीं, पश्चिम त्रिपुरा की बिजय नगर ग्राम पंचायत को रजत पुरस्कार मिला है। पंचायत ने अपने स्वयं के स्रोतों से आय में लगभग 194 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है और महिलाओं के बीच शत-प्रतिशत डिजिटल साक्षरता हासिल की है। महाराष्ट्र के नंदुरबार जिला परिषद के स्वास्थ्य विभाग को ‘ई-आरोग्य धमनी’ पहल के माध्यम से दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए जिला स्तरीय पहल श्रेणी में गोल्ड अवार्ड के लिए चयनित किया गया।

ये पुरस्कार मिलकर एक महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। ई-गवर्नेंस में उत्कृष्टता अब केवल राज्यों की राजधानियों या जिला मुख्यालयों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह समान रूप से हमारे गांवों और ग्राम सभाओं में भी स्थापित हो चुकी है। इस वर्ष 30 राज्यों की 1.65 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों ने इसमें भाग लिया, जो हमारे द्वारा मिलकर तैयार की गई संस्थागत क्षमता और विश्वास को दर्शाता है।

यह उपलब्धि संयोग से नहीं मिली है। पिछले बारह वर्षों में मंत्रालय ने पंचायतों को निरंतर बेहतर साधन उपलब्ध कराए हैं। ई-ग्राम स्वराज प्लेटफॉर्म के माध्यम से 2.59 लाख से अधिक पंचायतों में योजना निर्माण, बजट और भुगतान प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण किया गया है, जिससे पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से ₹3.16 लाख करोड़ से अधिक के ऑनलाइन लेन-देन संभव हुए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सभासार प्लेटफॉर्म, जो 23 भारतीय भाषाओं में कार्य करता है, अब 1.35 लाख से अधिक पंचायतों में चंद मिनटों में ग्राम सभा की कार्यवाही तैयार कर देता है। मेरी पंचायत ऐप, जिसे 1 करोड़ से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है, विकास कार्यों की जानकारी सीधे नागरिकों तक पहुंचा रहा है।

इन प्रयासों के साथ-साथ, स्वामित्व योजना के तहत 3.30 लाख गांवों में ड्रोन सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है तथा जून 2026 के मध्य तक 1.94 लाख गांवों के लिए 3.19 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके हैं, जिससे ग्रामीण परिवारों के संपत्ति अधिकार सुदृढ़ हुए हैं और उन्हें ऋण सुविधा प्राप्त करने में आसानी हुई है। पंद्रहवें वित्त आयोग की अवधि में ग्रामीण स्थानीय निकायों को ₹2.82 लाख करोड़ की अनुदान राशि जारी की गई, जो अब तक की सर्वाधिक है। सोलहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2026 से 2031 के लिए ₹4.35 लाख करोड़ की सिफारिश की है, जो लगभग 84 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।

इस सोच को आगे बढ़ाने के लिए मंत्रालय ने ‘सेवा से समृद्धि: पंचायतों के नेतृत्व में सेवा वितरण’ विषय पर क्षेत्रीय कार्यशालाओं की एक श्रृंखला शुरू की है। इन कार्यशालाओं में पंचायत प्रतिनिधि, जिला स्तरीय अधिकारी और विषय विशेषज्ञ मिलकर स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और बुनियादी सुविधाओं जैसे क्षेत्रों में लोगों तक बेहतर सेवाएं पहुंचाने के उपायों पर चर्चा कर रहे हैं। इन कार्यशालाओं के माध्यम से सफल स्थानीय पहलों और नवाचारों को साझा किया जा रहा है, ताकि राज्य एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकें और अच्छे मॉडलों को व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके। इनकी उपयोगिता और विस्तार की संभावनाएं बहुत व्यापक हैं। NAeG 2026 में चयनित पंचायती राज संस्थाओं की उपलब्धियां देशभर की पंचायतों को प्रेरित कर रही हैं, और अनेक पंचायतें अपने गांवों में बेहतर सेवाएं पहुंचाकर समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने के लिए ऐसे मॉडलों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सदैव यह बल देते रहे हैं कि सुशासन वही है जो नागरिकों का जीवन सरल बनाए। पारदर्शी और तकनीक सक्षम व्यवस्थाओं के माध्यम से प्राप्त ‘ईज़ ऑफ़ लिविंग’ ही किसी सरकार की मंशा और क्षमता की सच्ची कसौटी है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि दूसरों का सम्मान करना स्वयं के सम्मान का मार्ग प्रशस्त करता है। पंचायतों को डिजिटल साधनों से सशक्त बनाकर और उनकी क्षमता पर विश्वास जताकर, केंद्र सरकार ने इस महत्वपूर्ण मंच पर देश को सम्मानित होने का मार्ग प्रशस्त किया है।

जैसे-जैसे भारत 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, सशक्त पंचायतों की भूमिका और भी केंद्रीय होती जा रही है। लगभग 90 करोड़ नागरिकों के ग्रामीण भारत में निवास करने के साथ, हमारी पंचायती राज संस्थाओं की मजबूती ही हमारी सामूहिक प्रगति की गति तय करेगी। विकसित पंचायत, विकसित भारत से अलग नहीं, बल्कि उसकी सबसे मजबूत नींव है।

ये चार राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार बेहतर प्रदर्शन, प्रगति और निरंतर आगे बढ़ने के प्रतीक हैं। ये जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे प्रत्येक सरपंच, पंचायत सचिव और महिला जनप्रतिनिधि के लिए एक प्रेरणा हैं कि उनके समर्पण और प्रयासों को पहचान मिल रही है, उनकी सराहना की जा रही है और उन्हें सम्मानित किया जा रहा है। बारह वर्षों के निरंतर प्रयासों ने ही ऐसी उत्कृष्टता के उभरने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है। NAeG 2026 में मिली पहचान से लेकर देशभर में बढ़ती सेवा से समृद्धि कार्यशालाओं की गति तक, यह सफलता इस बात की पुष्टि करती है कि ग्रामीण भारत में ई-गवर्नेंस की जड़ें वास्तव में गहरी हो चुकी हैं, और विकसित पंचायत के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण की यह यात्रा हर गुजरते वर्ष के साथ और सशक्त होती जा रही है।

(लेखक केंद्रीय पंचायती राज राज्य मंत्री हैं।)

भारत और खाड़ी संकट का आर्थिक प्रभाव: सब कुछ स्थिर और सामान्य रहा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब फरवरी के अंत में हवाई हमलों के कारण हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हो गया — ऐसा समुद्री मार्ग जिससे होकर दुनिया के कच्चे तेल का करीब एक-पांचवां हिस्सा और भारत के कच्चे तेल और खाना पकाने के गैस का अधिकांश हिस्सा गुजरता है — तो भारत के लिए कहानी पहले ही लिखी हुई लग रही थी। एक ऐसा देश, जो अपने कच्चे तेल का दस में से नौ हिस्सा और आधे से ज्यादा खाना पकाने के गैस का खाड़ी से आयात करता है, उसके लिए आम तौर पर यही उम्मीद की जा रही थी कि पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगेंगी, रसोई में गैस खत्म हो जाएगी, रुपये की कीमत गिरेगी और डॉलर के लिए होड़ मचेगी। लगभग चार महीने बाद, जब जलडमरूमध्य फिर से खुल गया और कच्चे तेल की आपूर्ति अपने संकट-पूर्व स्तर के करीब पहुँच गयी, तो इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। एक भी रिटेल आउटलेट बंद नहीं हुआ। जिस भी परिवार को सिलेंडर चाहिए था, उसे सिलेंडर मिल गया। भारत को न तो 1991 जैसे और न ही 2013 जैसे हालात का सामना करना पड़ा। व्यापक आर्थिक स्थिरता बनी रही।

यह कोई संयोग नहीं था और न ही यह सिर्फ़ किस्मत की बात थी। यह एक ऐसे सरकार का काम था, जिसने वही तरीका अपनाया, जो उसने महामारी के समय अपनाया था — जानबूझकर और धीरे-धीरे कदम उठाना, एक ही बार में कोई बड़ा या नाटकीय बदलाव करने के बजाय एक उपाय के ऊपर दूसरे उपाय को जोड़ना। पहली प्राथमिकता घर-परिवार थे। इस पूरी अवधि के दौरान, एक भी रिटेल आउटलेट का स्टॉक खत्म नहीं हुआ और हर रसोईघर में सिलेंडर मौजूद रहा। आयात से जुड़ी लागत के कारण 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 1,600 रुपये से ऊपर चली गई थी, फिर भी घरों के लिए इसकी कीमत 900 रुपये के आसपास ही रखी गई और सबसे गरीब लोगों के लिए तो यह कीमत और भी कम थी। महामारी के शुरुआती महीनों की यादें एक सबक थीं, जब प्रवासी मजदूरों में मची घबराहट के कारण गांवों की ओर लौटने वालों की लहर चल पड़ी थी। वाणिज्यिक और थोक उपयोगकर्ताओं को घरों की जरूरत को प्राथमिकता देने के लिए कहा गया।

पूरी अर्थव्यवस्था को चलाने वाले ईंधन के मामले में, सरकार ने इसका बोझ खुद उठाने का फ़ैसला किया, न कि इसे आम लोगों पर डाला। सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में दस रुपये प्रति लीटर की कटौती की, जिससे उसे लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ, इसके अलावा विमानन ईंधन पर भी बोझ कम किया गया। इसके बाद तेल विपणन कंपनियों ने दो महीने से ज़्यादा समय तक पंप पर कीमतें स्थिर रखीं और फिर एक बार मामूली बदलाव किया। इसके पीछे की वजह साफ़ है: ऐसी अनिश्चितता के समय में, सिर्फ़ सरकार के पास ही जोखिम उठाने के लिए ज़रूरी बैलेंस शीट और समय होता है; और इसने परिवारों और कंपनियों पर असर डालने के बजाय राजकोषीय खाते पर बोझ डालने का विकल्प चुना। एयरलाइंस के लिए खास समर्थन तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण-गारंटी योजना, कोविड के दौर में अपनाए गए खास और असरदार उपायों के मॉडल पर ही आधारित थीं।


कीमत में राहत के पीछे आपूर्ति की मजबूत स्थिति थी। घरेलू रिफाइनरियों ने एक हफ्ते में ही रसोई गैस का उत्पादन आधा बढ़ा दिया, जिससे आयात से आने वाली गैस की कमी काफी हद तक पूरी हो गई। भारत ने जल्दी ही अपने स्रोतों का विस्तार किया, अमेरिका और रूस से खरीद बढ़ायी और नए आपूर्तिकर्ता देश जोड़े, ताकि जलडमरूमध्य से होकर कम ऊर्जा आये; साथ ही रूसी कच्चा तेल खरीदना जारी रखने के लिए ज़रूरी छूट भी हासिल कर ली। सरकार ने लंबी अवधि के लिए भी कदम उठाए: घरों को सिलेंडर के बदले पाइप से गैस पहुँचाना, कोयले गैसीकरण कार्यक्रम, ईथेनॉल मिश्रण को और बढ़ावा देना तथा प्रधानमंत्री की संयुक्त अरब अमीरात यात्रा के दौरान रणनीतिक तौर पर कच्चा तेल भंडारण पर सहमति। भारत उन कुछ देशों में से एक था, जिसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम हो जाने के बावजूद अपना कार्गो लाना जारी रखा।

बाहरी खातों को भी उतने ही धैर्य के साथ संभाला गया। सरकार ने सरकारी कर्ज़ की विदेशी संस्थागत खरीद पर लगी रोक और पूंजीगत लाभ टैक्स हटा दिए और पूर्ण पहुँच रूट के तहत प्रतिभूतियों का दायरा बढ़ाया, जिससे बॉन्ड मार्केट में पैसा आया। एक नई गैर-निवासी डॉलर जमा योजना से काफी बड़ी राशि में डॉलर आने की उम्मीद है। सालों में किए गए मुक्त व्यापार समझौते धीरे-धीरे अपने काम कर रहे थे: अप्रैल और मई 2026 के दौरान गैर-तेल, गैर-रत्न-आभूषण के अलावा वस्तु और सेवाओं का निर्यात पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 12 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया। प्रमुख आंकड़े भरोसा दिलाते हैं। पिछले वित्त वर्ष में सकल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पैंतालीस अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो महामारी के बाद के वर्षों के सत्तर से अस्सी अरब डॉलर की सीमा को पार कर गया।

चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 26 में जीडीपी का केवल 0.6 प्रतिशत था और अब उम्मीद है कि वित्त वर्ष 27 में यह इससे थोड़ा ही ज़्यादा होगा। ईमानदारी से यह भी मानना ​​होगा कि किस्मत ने भी साथ दिया। बंद होने के कुछ ही हफ्तों में कच्चा तेल एक सौ बीस डॉलर के पार पहुंच गया, लेकिन मई से चीन की तेल खरीद में कमी और अमेरिका के रिजर्व से लगातार तेल जारी होने से यह फिर से सौ डॉलर से नीचे आ गया, और चीन के उर्वरक निर्यात को फिर से शुरू करने से बजट को होने वाले भारी नुकसान से बचाया जा सका। अगर संघर्ष लंबे चले होते, या तेल एक सौ बीस डॉलर के करीब स्थिर रहता, तो स्थिति इतनी आरामदायक नहीं होती; ठोस नीति और अच्छी किस्मत दोनों ने अपना काम किया। वास्तव में, किस्मत अंततः ठोस नीतिकारों का ही साथ देती है।

आने वाले बदलावों के संकेत के तौर पर, गोल्डमैन सैक्स ने हाल ही में भारत के लिए अपने वृद्धि पूर्वानुमान को सीवाई 26 के लिए 6.8% और वित्त वर्ष 27 के लिए 6.5% तक बढ़ा दिया है, जो पहले के पूर्वानुमानों से दोनों के लिए 30 बीपी अधिक हैं। हालांकि, मध्यम अवधि में आत्मसंतोष की कोई गुंजाइश नहीं है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ गठबंधन विभाजित हैं, हथियारबंद आपूर्ति श्रृंखलाएँ हैं और ऐसी पूंजी, जो कभी भी आ-जा सकती है, भुगतान संतुलन पर दबाव उस संघर्ष से भी लंबा रह सकता है, जिसने उसे खतरे में डाला था। भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित करने पर बहुत अधिक ध्यान देना चाहिए। संतुलित द्विपक्षीय निवेश संधि रूपरेखा, कर नीति में निश्चितता, राज्य सरकारों द्वारा अनुबंधों की अखंडता का सम्मान, भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स और एकल-खिड़की मंजूरी, जो वास्तव में काम करती हो, अब उन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं
को आकर्षित करेंगे, जो अपने जोखिम को कम करने के लिए अलग-अलग जगहों पर विस्तार करने की कोशिश कर रही हैं।

असली समस्या आयात पर निर्भरता है और यह सिर्फ़ ऊर्जा से संबंधित नहीं है। माल व्यापार घाटा राष्ट्रीय आय का लगभग आठ प्रतिशत है; अगर तेल निकाल दें, तो यह पांच प्रतिशत है; तेल और सोना निकाल दें, तो भी यह साढ़े तीन प्रतिशत रहता है। तुलनात्मक रूप से बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। भारत को उन चीज़ों का उत्पादन देश में ही करना चाहिए जिन्हें वह प्रतिस्पर्धी ढंग से बना सकता है और जिनकी उसे ज़रूरत है। देश की कंपनियों और व्यापार संघों को अपने समझौतों पर ज्यादा मेहनत करना होगा — खासकर यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ के नए समझौते, जो इस साल लागू होंगे और श्रम-गहन निर्यात को बढ़ावा देंगे। यह सब कुशल लोगों के बिना संभव नहीं है, इसलिए युवाओं को व्यापार से जुड़े कौशल सिखाने का काम अब युद्ध स्तर पर किया जाना चाहिए।

इन कामों के लिए लगन और तेज़ी की ज़रूरत होगी। इन पर ध्यान देते हुए, सरकार को दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर भी ध्यान देना होगा जिसने अब तक निराश किया है, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आगमन पर भी विचार करना होगा कि भारतीय काम और भारतीय जीवन के लिए इसके मायने क्या होंगे। खाड़ी संघर्ष ने एक प्रकार की सहनशीलता की परीक्षा ली; आने वाले साल दूसरे प्रकार की परीक्षाएं लेंगे। भारत
ने पहली परीक्षा को अच्छे ढंग से पूरा किया। यह आत्मविश्वास का एक कारण है — और अगले काम में लगने का भी कारण है।

(वी. अनंत नागेश्वरन भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

MSME दिवस 2026 पर विशेष: कैसे डिजिटल पोर्टल भारत के 8 करोड़ MSME के कामकाज के तरीके में चुपचाप बड़ा बदलाव ला रहे हैं

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

एक दशक पहले किसी भी सरकारी जिला कार्यालय में जाइए। वहां कागजों की फाइलों का ढेर, काम के बोझ से परेशान कर्मचारी और पंजीकरण प्रमाणपत्र या भुगतान विवाद के निपटारे के लिए कई दिनों, कभी-कभी कई हफ्तों तक इंतजार करते उद्यमी आम दृश्य हुआ करते थे। आज देश के किसी भी कोने में बैठा एक कारीगर अपने मोबाइल से कुछ ही मिनटों में अपना उद्यम पंजीकृत कर सकता है, अपने उत्पादों को राष्ट्रीय ऑनलाइन बाजार में बेचने के लिए सूचीबद्ध कर सकता है और अपनी कार्यशाला से बाहर निकले बिना बकाया भुगतान की शिकायत भी दर्ज करा सकता है। यह केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि व्यवस्था में आया एक बड़ा बदलाव है।

भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) देश की अर्थव्यवस्था का छोटा हिस्सा नहीं हैं। वर्ष 2026 के एमएसएमई दिवस पर यह समझना जरूरी है कि इनका योगदान कितना बड़ा है। ये देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 31.1 प्रतिशत, विनिर्माण उत्पादन में 35 प्रतिशत से अधिक और कुल निर्यात में लगभग 48.58 प्रतिशत का योगदान देते हैं। साथ ही, ये लगभग 38 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं, जो दुनिया के अधिकांश देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। इसके बावजूद, कई दशकों तक ये उद्यम औपचारिक व्यवस्था से दूर रहे। इन्हें संस्थागत ऋण आसानी से नहीं मिला, बड़े सरकारी और निजी खरीद बाजारों तक पहुंच सीमित रही और जटिल नियम-कायदों का सामना करना पड़ा, जिनका लाभ अक्सर बड़े उद्योगों को मिलता था।

अब स्थिति तेजी से बदल रही है। एमएसएमई के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए कई डिजिटल पोर्टल शुरू किए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक उनकी किसी खास समस्या का समाधान करता है। इन पहलों ने सरकार और छोटे उद्यमियों के बीच संबंधों को पूरी तरह बदलना शुरू कर दिया है।

अंगुलियों पर औपचारिक पहचान

सबसे बड़ी और बुनियादी समस्या यह थी कि बिना औपचारिक पंजीकरण के कोई भी उद्यम सरकारी योजनाओं, बैंक ऋण या सरकारी ठेकों का लाभ नहीं ले सकता था। उद्यम पोर्टल पर कागज रहित, आधार आधारित सत्यापन और स्व-घोषणा की व्यवस्था ने पहले की लंबी और जटिल प्रक्रिया को कुछ ही मिनटों की ऑनलाइन प्रक्रिया में बदल दिया। आज 8.7 करोड़ उद्यम इस पोर्टल के माध्यम से औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के इतिहास में इतने बड़े स्तर पर औपचारिक पंजीकरण का यह एक दुर्लभ उदाहरण है।

लेकिन केवल औपचारिक पंजीकरण ही पर्याप्त नहीं है। यदि सबसे छोटे और कमजोर उद्यम इससे बाहर रह जाएं, तो इसका पूरा लाभ नहीं मिल सकता। इसी उद्देश्य से उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म शुरू किया गया। यह उन सूक्ष्म और अनौपचारिक उद्यमों के लिए बनाया गया है, जिनके पास सामान्य पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं थे। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, इस मंच पर अब तक 3.28 करोड़ ऐसे उद्यम जुड़ चुके हैं। इससे पहली बार लाखों छोटे कारोबार सरकारी सहायता और योजनाओं की पहुंच में आए हैं, जो पहले किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे।

सरकारी खरीद में समान अवसर

पहले छोटे उद्यमों के लिए ग्राहकों तक पहुंच बनाना आसान नहीं था। यह अक्सर भौगोलिक दूरी, सीमित संपर्कों और सरकारी खरीद की जटिल प्रक्रियाओं पर निर्भर करता था। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जेम) ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। यह एक पारदर्शी ऑनलाइन मंच है, जहां कोई भी पंजीकृत एमएसएमई सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को सीधे सामान और सेवाएं बेच सकता है। इससे सरकारी खरीद प्रणाली अधिक खुली और सभी के लिए समान अवसर वाली बन गई है।

आज जेम पर 11.14 लाख से अधिक एमएसएमई विक्रेता पंजीकृत हैं। इनमें 2.03 लाख महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाले और 61 हजार अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले उद्यम शामिल हैं। जेम के माध्यम से अब तक 18.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी खरीद हो चुकी है। यह केवल कारोबार का आंकड़ा नहीं है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, छोटे उद्यमों की मजबूती और आपूर्ति श्रृंखला के विस्तार का भी प्रमाण है।

नकदी की उपलब्धता आसान बनाना

यदि पंजीकरण और बाजार तक पहुंच एमएसएमई सुधारों की मजबूत नींव हैं, तो समय पर धन उपलब्ध होना उसकी सबसे बड़ी ताकत है। लंबे समय तक सबसे बड़ी समस्या यह रही कि बड़े खरीदार छोटे उद्यमों के भुगतान 60, 90 या कभी-कभी 180 दिनों तक रोककर रखते थे। इससे छोटे कारोबारियों को महंगे अनौपचारिक कर्ज का सहारा लेना पड़ता था। इस समस्या के समाधान के लिए व्यापार प्राप्तियों के छूटकरण प्रणाली (टीआरईडीएस) शुरू की गई। अब एमएसएमई अपने बिल इस डिजिटल मंच पर अपलोड कर सकते हैं, जहां बैंक और वित्तीय संस्थान उन बिलों के बदले तुरंत धन उपलब्ध कराते हैं। इससे कारोबार के लिए आवश्यक कार्यशील पूंजी समय पर मिल जाती है।

वर्ष 2021 से 2026 के बीच टीआरईडीएस के माध्यम से 8.35 लाख करोड़ रुपये के बिलों का भुगतान कराया जा चुका है। इसका अर्थ है कि हजारों छोटे उद्यम अपने कर्मचारियों का वेतन समय पर दे सके, उन्हें साहूकारों से महंगा कर्ज नहीं लेना पड़ा और केवल भुगतान में देरी के कारण उनका कारोबार बंद नहीं हुआ।

शिकायतों का समाधान और न्याय तक आसान पहुंच

सबसे अच्छी व्यवस्था में भी कभी-कभी समस्याएं आती हैं। इन्हें दूर करने के लिए एमएसएमई चैंपियंस पोर्टल बनाया गया है। यह एक डिजिटल मंच है, जहां उद्यमी सलाह ले सकते हैं, अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 24 जून 2026 तक इस पोर्टल पर प्राप्त कुल शिकायतों में से 1,85,253 शिकायतों यानी 99.66 प्रतिशत का समाधान किया जा चुका है।

एमएसएमई समाधान पोर्टल विशेष रूप से छोटे उद्यमों के बकाया भुगतान की समस्या को दूर करने के लिए बनाया गया है। इसके साथ ही एमएसएमई ऑनलाइन विवाद समाधान (ओडीआर) पोर्टल न्याय तक पहुंच को और आसान बनाता है। इस पोर्टल के माध्यम से छोटे उद्यम अपने व्यावसायिक विवादों का समाधान ऑनलाइन सुलह और मध्यस्थता के जरिए कर सकते हैं। इससे देश के सबसे छोटे कारोबारियों के लिए न्याय प्राप्त करना पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल और सुलभ हो गया है।

नई पीढ़ी के डिजिटल मंच

इस वर्ष का एमएसएमई दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं है, बल्कि डिजिटल बदलाव के एक नए दौर की शुरुआत भी है। भारत अब अपनी डिजिटल व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पीएमईजीपी 2.0 पोर्टल आवेदन से लेकर अनुदान मिलने तक की पूरी प्रक्रिया को और सरल बनाएगा। एमएसएमई समाधान 2.0 बकाया भुगतान के मामलों का और तेज़ी से निपटारा करेगा। वहीं, एमएसएमई ग्लोबल मार्ट 2.0 एक सरकारी सहयोग वाला ऑनलाइन बाजार होगा, जो ओएनडीसी व्यवस्था से जुड़ा रहेगा। इसके माध्यम से छोटे उद्यम एक-दूसरे के साथ और सीधे ग्राहकों को भी अपने उत्पाद बेच सकेंगे, साथ ही वैश्विक बाजार तक पहुंच बना सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के इस दौर में सरकार का संकल्प स्पष्ट है कि इस परिवर्तन की यात्रा में कोई भी उद्यमी पीछे न छूटे।

बड़ी तस्वीर

ये सभी डिजिटल मंच अलग-अलग काम नहीं करते, बल्कि मिलकर एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था बनाते हैं, जो नियमों का पालन आसान करती है, विभिन्न सरकारी आंकड़ों को आपस में जोड़ती है और सरकार तथा उद्यमों के बीच तुरंत सूचना का आदान-प्रदान संभव बनाती है। इनसे केवल सुविधा ही नहीं बढ़ी है, बल्कि उन पुराने लाभों को भी खत्म किया गया है, जो पहले केवल बड़े, शहरी और प्रभावशाली कारोबारों को मिलते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के संकल्प में एमएसएमई क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। “सबका साथ, सबका विकास” केवल एक नारा नहीं, बल्कि सरकार की कार्यशैली का आधार है। 1 अप्रैल 2014 को एमएसएमई क्षेत्र को दिया गया बैंक ऋण 10.40 लाख करोड़ रुपये था, जो 31 दिसंबर 2025 तक बढ़कर 36.79 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी 12 वर्षों में इसमें 268 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो बड़े उद्योगों की तुलना में अधिक तेज रही। इस दृष्टि से एमएसएमई के लिए तैयार की गई डिजिटल व्यवस्था, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने का मजबूत आधार बन चुकी है।

देश में भविष्य के अधिकांश नए रोजगार एमएसएमई क्षेत्र से ही आएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का विस्तार भी इसी क्षेत्र के माध्यम से होगा और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से औपचारिक व्यवस्था की ओर बदलाव भी इसी के जरिए पूरा होगा। इसलिए एमएसएमई के लिए तैयार की जा रही डिजिटल व्यवस्था विकसित भारत की मजबूत नींव है। हर नया पंजीकरण, हर समय पर मिला भुगतान और हर ऑनलाइन सुलझा विवाद वर्ष 2047 के विकसित भारत की दिशा में उठाया गया एक स्थायी कदम है।

आज लाखों छोटे उद्यमों को बाजार, वित्त और सरकारी सेवाओं से जोड़ने वाले ये डिजिटल मंच केवल तकनीकी सुविधा नहीं हैं। वे एक ऐसे भारत की मजबूत आधारशिला हैं, जहां हर छोटे उद्यमी को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले और कोई भी पीछे न रह जाए।

(लेखक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं।)

नरेन्‍द्र मोदी: सबसे लंबे समय तक ‘प्रत्‍यक्ष रूप से निर्वाचित’ प्रधानमंत्री

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता को लेकर चल रही बहस के बीच, मुझे मेरे पिता, स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी की 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अभूतपूर्व जीत के बारे में बताई गई एक दिलचस्प बात याद आती है। उस समय बाबा भारत के 13वें राष्ट्रपति थे। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े होने के बावजूद, उनके बीच बहुत अच्छे संबंध थे, जो शायद एक सच्चे लोकतंत्र की वास्‍तविक पहचान है।

चुनाव परिणाम आने के बाद, मोदी जी राष्ट्रपति भवन में बाबा से मिलने आए। बातचीत के दौरान, बाबा ने मोदी जी से चुनाव के बारे में उनका विश्लेषण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि तीन दशकों के बाद किसी राजनीतिक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है। तब बाबा ने अपने विशिष्‍ट प्रोफ़ेसर वाले अंदाज़ में पूछा, ‘और क्या?’ जब मोदी जी चुप रहे, तो बाबा ने बताया कि 2014 का लोकसभा चुनाव इतिहास में अनोखा था, क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर एक नया चेहरा पहले ही घोषित कर दिया गया था। भारतीय जनता पार्टी को मिला लोगों का अपार समर्थन केवल उनकी पार्टी के लिए नहीं था, बल्कि यह लोगों का श्री नरेन्‍द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए सीधा जनादेश था। दूसरे चुनावों के विपरीत, जहाँ प्रधानमंत्री का चेहरा या तो मान लिया जाता है पर आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया जाता; या परंपरा के अनुसार नवनिर्वाचित सांसद उनका चुनाव करते हैं; या यह गठबंधन के गणित से तय होता है और यह प्रक्रिया चुनाव के बाद होती है। मोदी जी से पहले डॉ. मनमोहन सिंह, जो कभी जन-नेता नहीं रहे, उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने चुना था। भारत के दो प्रधानमंत्री, श्री पी.वी. नरसिम्हा राव और श्री एच.डी. देवेगौड़ा – तो प्रधानमंत्री बनने के समय संसद के सदस्य भी नहीं थे। सरल शब्दों में कहें तो, प्रधानमंत्री का चुनाव वरिष्ठ राजनेता करते थे। 2014 भारतीय राजनीति के चुनावी समीकरणों में एक बहुत बड़ा बदलाव था, जहां देश की जनता ने श्री नरेन्‍द्र मोदी को लगभग ‘राष्ट्रपति चुनाव’ की ही तरह, स्पष्ट रूप से और बिना किसी संदेह के अपना प्रधानमंत्री चुना।

उल्‍लेखनीय है कि 2014 से पहले श्री नरेन्‍द्र मोदी जी ‘राष्ट्रीय’ राजनीति में नए थे। उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने लंबे कार्यकाल के दौरान अपनी एक विशिष्‍ट पहचान बनाई थी, लेकिन 2014 उनका पहला लोकसभा चुनाव था। यह एक अनोखी बात है कि पहली बार सांसद बनने वाले व्यक्ति ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार संसद भवन में प्रवेश किया। (पुरानी) संसद की सीढ़ियों पर ‘प्रणाम’ करने का उनका भावुक कदम हृदय को छू लेने वाला ऐसा क्षण था, जिसने करोड़ों भारतीयों के हृदय में अपनी जगह बना ली।

चुनाव में विजय का कभी भी कोई एक कारण नहीं होता; यह कई कारकों से जुड़ी एक जटिल प्रक्रिया है। भाजपा का ज़मीनी स्तर पर मज़बूत संगठन, अलग-अलग जातियों और समुदायों तक लगातार पहुँचने की रणनीति, अपनी गलतियों को शीघ्र पहचानना और तुरंत सुधार करने की इच्छाशक्ति — ये कुछ ऐसी मुख्य बातें हैं जिन्होंने विद्यमान भाजपा को चुनाव जीतने वाली एक ऐसी शक्ति बना दिया है, जिसे वर्तमान में रोक पाना दुष्‍कर लगता है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि श्री नरेन्‍द्र मोदी जी का चेहरा शायद भाजपा का सबसे मज़बूत ट्रंप कार्ड है। लोग उनमें एक ऐसा मज़बूत नेता देखते हैं, जो अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत के दम पर आगे बढ़ा है, न कि कांग्रेस की तरह वंशवादी विरासत या परिवार-शासित क्षेत्रीय पार्टियों की मज़बूत पकड़ के कारण।

एक तरह से श्री नरेन्‍द्र मोदी भाजपा के पर्याय बन गए हैं। मैं हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बारे में बंगाल के मित्रों के साथ हुई कुछ बातचीत का उल्‍लेख करना चाहूंगी। जहां मेरे अपने रिश्तेदार अभी भी कांग्रेस के कट्टर समर्थक हैं और बंगाल में कांग्रेस को मिले मामूली 2.9 प्रतिशत वोट शेयर में उनका भी योगदान था, वहीं मेरे अधिकतर दोस्तों और परिचितों ने भाजपा को वोट दिया था। चुनाव से पहले, मैं उनसे पूछती थी कि वे किस पार्टी को वोट देंगे। अधिकतर लोगों का उत्तर यही होता था कि वे ‘मोदी’ को वोट देंगे। मैं उन्हें याद दिलाती थी कि यह विधानसभा चुनाव है और मोदी जी चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उनका उत्तर हमेशा यही होता था—’ओई एक-ई व्यापार’—यानी ‘बात एक ही है’।

श्री नरेन्‍द्र मोदी जी न केवल देश के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले चुने हुए प्रधानमंत्री हैं, बल्कि शायद स्‍वतंत्रता के बाद देश ने जितने भी प्रधानमंत्री देखे हैं, उनमें से वे सबसे मज़बूत नेताओं में से एक हैं। वे गठबंधन सरकारों, जो अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए दूसरों पर निर्भर रहती हैं, के उन व्‍यावधानों (अक्सर ब्लैकमेल करने वाले तरीकों) का शिकार हुए बिना एक मज़बूत और स्थिर सरकार देने में सफल रहे हैं। कोई उनकी कई नीतियों या काम करने के तरीके से असहमत हो सकता है और लोकतंत्र में ऐसा होना बिल्कुल सामान्य बात है; लेकिन कोई भी उनके करिश्मे और ‘आकांक्षी भारत’ के लिए प्रेरणा के तौर पर भारतीय मतदाताओं के साथ उनके जुड़ाव को नकार नहीं सकता। यह बात 2019 और फिर 2024 में भी स्‍पष्‍ट रूप से दिखी। आप श्री नरेन्‍द्र मोदी को पसंद करें या नापसंद, लेकिन आप ‘ब्रांड मोदी’ की अनदेखी नहीं कर सकते। बड़ी ताक़त के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है। एक आम नागरिक के रूप में, मैं प्रार्थना करती हूँ कि वे लोगों से प्राप्‍त भारी जनादेश के साथ पूरा न्याय करें और हमारे देश को और भी ऊंचाइयों तक ले जाएँ।

(लेखिका एक स्‍तम्‍भकार हैं और ‘प्रणब माय फादर: अ डॉटर रिमेंबर्स’ पुस्‍तक की लेखिका हैं। वह वर्तमान में ‘प्रणब मुखर्जी लिगेसी फाउंडेशन’ की संचालक हैं।)

एक बार की इमरजेंसी: हमेशा के लिए चेतावनी: अर्जुन राम मेघवाल

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

‘इमरजेंसी’ शब्द से बेचैनी और चिंता होती है। इसका मतलब आमतौर पर यह होता है कि किसी बड़े मकसद के नाम पर नॉर्मल नियम और डेमोक्रेटिक प्रोसेस को कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है। हालांकि, सभी इमरजेंसी एक जैसी नहीं होतीं। उदाहरण के लिए, हॉस्पिटल में इमरजेंसी सर्विस जान बचाती हैं और मुश्किल समय में तुरंत मदद देती हैं। साथ ही, युद्ध, क्लाइमेट चेंज और नेचुरल रिसोर्स की कमी जैसी ग्लोबल चुनौतियां भी इमरजेंसी हैं। इनसे निपटने के लिए दुनिया के सभी देशों को मिलकर काम करना होगा और छोटी सोच से ऊपर उठना होगा। आज का समाज भी हमेशा जल्दी में जी रहा है। सब कुछ तुरंत करने, तुरंत नतीजे पाने और बिना देर किए फैसले लेने की होड़ में लोग एक तरह की अनदेखी और अघोषित इमरजेंसी का सामना कर रहे हैं। इसके उलट, हाल ही में मनाए गए इंटरनेशनल योगा डे ने हमें शांति, बैलेंस, सब्र और मेडिटेशन की अहमियत याद दिलाई। इतिहास गवाह है कि इंसानी समाज ने समय-समय पर कई मुश्किलों का सामना किया है।

लेकिन एक पुरानी सभ्यता और डेमोक्रेटिक देश होने के नाते भारत के लिए, 1975 में पॉलिटिकल वजहों से लगाई गई ‘नेशनल इमरजेंसी’ सबसे दर्दनाक और चिंताजनक चैप्टर रही है। यह घटना आज भी हमें अपनी डेमोक्रेसी, संविधान और नागरिकों की आज़ादी की रक्षा के लिए सतर्क रहने की सीख देती है।

आज पूरा देश ‘संविधान हत्या दिवस’ मना रहा है। 1975 में लगाई गई इमरजेंसी भारत के डेमोक्रेटिक इतिहास पर एक ऐसा दाग है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। आधी सदी बाद भी उस काले और दर्दनाक दौर की यादें ‘डेमोक्रेसी की माँ’ भारत को हिला देती हैं।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि डेमोक्रेसी की रक्षा करना हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। साथ ही, यह हमें उन मुश्किल संघर्षों और कुर्बानियों की भी याद दिलाता है जिनसे हमें आज़ादी और डेमोक्रेटिक अधिकार मिले। इतिहास के इस सबसे मुश्किल दौर से सीखते हुए, हमें अपनी डेमोक्रेसी की रक्षा के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए। भारत एक ऐसा देश है जिसकी सभ्यता और संस्कृति सदियों से डेमोक्रेटिक परंपराओं में डूबी हुई है। यहाँ बहस, बातचीत और चर्चा की एक समृद्ध परंपरा है, जिसने जनता की भागीदारी पर आधारित शासन व्यवस्था को आकार दिया है।

मज़बूत किया गया। पुराने ज़माने की सभा और समिति जैसी संस्थाएँ और 12वीं सदी का ‘अनुभव मंडप’ डेमोक्रेटिक संस्थाओं के विकास के अहम उदाहरण हैं।
हमारा संविधान इन हमेशा रहने वाले डेमोक्रेटिक मूल्यों का जीता-जागता दस्तावेज़ है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान को “जीवन का एक ज़रिया बताया था जिसमें सदियों की भावना समाई हुई है”। लेकिन इमरजेंसी लगाकर इन बुनियादी डेमोक्रेटिक सिद्धांतों को किनारे कर दिया गया, जिससे संविधान की पवित्र भावना और डेमोक्रेटिक सिस्टम को गहरी चोट पहुँची।

1975 की नेशनल इमरजेंसी सिर्फ़ एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि इसने भारत में डेमोक्रेटिक सोच-विचार और पब्लिक लाइफ़ के कामकाज पर गहरा असर डाला। इंदिरा गांधी के सत्ता पर केंद्रित और अपने फ़ायदे के लिए राज ने संविधान की बुनियादी भावना को किनारे कर दिया और नैतिक शासन के सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुँचाया।

1971 के लोकसभा चुनावों में गड़बड़ियाँ, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फ़ैसला और उनके इस्तीफ़े के लिए बढ़ती जनता की आवाज़ भारत में अंदरूनी अशांति नहीं थी। असल में, यह संकट खुद इंदिरा गांधी के लिए था, जो लंबे समय से वंशवाद पर आधारित राजनीतिक विरासत का फायदा उठा रही थीं। लेकिन अपने इस राजनीतिक संकट से निपटने के लिए ‘अंदरूनी अशांति’ के नाम पर पूरे देश पर इमरजेंसी लगाना एक गंभीर और गलत फैसला था। घटनाओं का सिलसिला इंदिरा गांधी की लोकतंत्र विरोधी सोच को साफ तौर पर सामने लाता है। 19 मार्च 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान, वह कोर्ट में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद, 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट नंबर 24 ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें 6 साल के लिए किसी भी चुने हुए पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद, इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी। कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर संसद की कार्यवाही में शामिल होने की इजाजत दी, लेकिन आखिरी फैसले तक उन्हें संसद में वोट देने और सैलरी लेने की इजाजत नहीं दी। इस बीच, 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की लीडरशिप में हुई एक बड़ी पब्लिक रैली ने इंदिरा गांधी पर इस्तीफ़ा देने का दबाव और बढ़ा दिया। देश भर में अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों और जनता की तरफ़ से उनके इस्तीफ़े की मांग तेज़ हो गई। इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं के फ़ैसलों से नाखुश इंदिरा गांधी ने संविधान के आर्टिकल 352 के तहत नेशनल इमरजेंसी लगाने का फ़ैसला किया। 25 जून 1975 की आधी रात को उन्होंने प्रेसिडेंट फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को यूनियन कैबिनेट की पहले से मंज़ूरी लिए बिना इमरजेंसी लगाने की सलाह दी। यह सलाह ऑफ़िशियल लेटरहेड पर नहीं, बल्कि सादे कागज़ पर भेजी गई थी।

इसके बाद 26 जून को सुबह 6 बजे कैबिनेट मीटिंग बुलाई गई, जो सिर्फ़ एक फॉर्मेलिटी थी। इस तरह, ज्यूडिशियरी को नज़रअंदाज़ करके और कैबिनेट की कलेक्टिव ज़िम्मेदारी को कमज़ोर करके संविधान की मूल भावना को गहरी चोट पहुंचाई गई। यह घटना सत्ता के टॉप लेवल पर मौजूद इंस्टीट्यूशन्स की साख में गिरावट और पॉलिटिकल पावर बचाने के लिए अपनाए गए तानाशाही तरीकों का एक उदाहरण बन गई। इ

मरजेंसी के दौरान प्रेस की आज़ादी पर कड़ी पाबंदियां लगा दी गईं। इससे न सिर्फ़ पत्रकारों और ओपिनियन लीडर्स की आवाज़ दब गई, बल्कि करोड़ों नागरिकों को सच, ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी तक पहुंचने के उनके अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। यह वह दौर था जब देश की आत्मा हिल गई थी। आज़ादी के दीवानों की कुर्बानियों, कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली की ऐतिहासिक बहसों और डेमोक्रेटिक आदर्शों को किनारे कर दिया गया और पावर-सेंट्रिक और गैर-डेमोक्रेटिक सोच को प्राथमिकता दी गई। शासन के हर क्षेत्र में ऐसा लगा कि “नेशन फर्स्ट” के सिद्धांत की जगह “चेयर फर्स्ट” के सिद्धांत ने ले ली है। नागरिकों के फंडामेंटल राइट्स पर पाबंदियां लगा दी गईं। आर्टिकल 19 के तहत मिली बोलने की आज़ादी, संगठन बनाने का अधिकार और देश में कहीं भी आने-जाने की आज़ादी को एक ऑर्डर से सस्पेंड कर दिया गया। आर्टिकल 21 के तहत मिली जान और पर्सनल लिबर्टी की सुरक्षा भी लगभग खत्म कर दी गई। सबसे गंभीर बात यह थी कि नागरिकों को आर्टिकल 32 के तहत कोर्ट जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया, जिसे संविधान का “दिल और आत्मा” कहा जाता है। इसके साथ ही, मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) और डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल्स (DIR) का ज़ोरदार इस्तेमाल किया गया, जिसके तहत हज़ारों लोगों को जेल भेज दिया गया। इस तरह, भारत के डेमोक्रेटिक इतिहास के इस काले और दमनकारी दौर के निशान हर नागरिक ने किसी न किसी रूप में महसूस किए। मज़े की बात यह है कि आज उसी गांधी परिवार के वारिस राजनीतिक फ़ायदे के लिए संविधान की एक छोटी लाल कॉपी दिखाकर संविधान की रक्षा का दावा करते हैं। बीते ज़ख्मों को याद करते हुए, मोदी सरकार ने 11 जुलाई, 2024 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी करके 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया। यह दिन उन सभी लोगों की हिम्मत और योगदान को याद करने और सम्मान देने का मौका है, जिन्होंने नेशनल इमरजेंसी का विरोध किया और डेमोक्रेसी की रक्षा के लिए मज़बूती से खड़े रहे। वे दिन गए जब असहमति की आवाज़ों को दबा दिया जाता था और सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल करके समझदार लोगों की आवाज़ों को कुचल दिया जाता था। 21वीं सदी का भारत यह संदेश देता है कि हर समस्या का हल बातचीत, वाद-विवाद, बातचीत और डेमोक्रेटिक तरीकों से किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कभी ऐसी स्थिति न आए जिसमें इमरजेंसी की ज़रूरत पड़े। डेमोक्रेटिक संस्थाओं को मज़बूत करने और डेमोक्रेसी की भावना को आगे बढ़ाने का यही सही तरीका है। हर इमरजेंसी से बाहर निकलने के बाद राहत मिलती है। ऐसे मुश्किल और दर्दनाक अनुभवों पर सोचने से भविष्य के लिए ज़रूरी सबक मिलते हैं। समझदार वे हैं जो बीते हुए समय की घटनाओं पर सोचते हैं, खुद का इंट्रोस्पेक्शन करते हैं और उनसे सीखते हैं ताकि यह पक्का हो सके कि वही गलतियाँ दोबारा न हों।

आज, जब हम भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले चैप्टर को ‘संविधान हत्या दिवस’ के तौर पर याद करते हैं, तो आइए हम सभी लेवल पर संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को और मज़बूत करने का संकल्प लें। यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सही मूल्यों को अपनाना और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। तभी हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हैं और इस भारत के निर्माण में योगदान दे सकते हैं, जिसकी कल्पना सदियों पहले स्वामी विवेकानंद ने की थी। उनके शब्दों में – “हर देश का एक मकसद होता है, हर देश के पास दुनिया को देने के लिए एक संदेश होता है और हर देश के पास पूरा करने के लिए एक खास मिशन होता है।” आइए भारत का मानवीय सम्मान, विविधता में एकता, संवैधानिक मूल्यों और निस्वार्थ सेवा का संदेश 21वीं सदी की दुनिया में और ज़्यादा साफ़ और असरदार तरीके से गूंजे। अगर हम इन आदर्शों पर मज़बूती से खड़े रहते हैं, तो हम यह पक्का कर सकते हैं कि लोकतंत्र न सिर्फ़ ज़िंदा रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए और मज़बूत और समृद्ध भी हो।

(लेखक भारत सरकार में कानून और न्याय के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय मामलों के राज्य मंत्री हैं)

मोदी की व्यापार दृष्टि ने भारत को बदलने के लिए विश्व-स्तर पर अवसरों के द्वार खोले 

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

यूके के साथ ऐतिहासिक व्यापार समझौता, जो 15 जुलाई से लागू होगा, भारतीय किसानों, एमएसएमई, मछुआरों, स्टार्टअप और कारीगरों के लिए वैश्विक अवसर और समृद्धि लाएगा। यह नौकरियां सृजित करेगा और भारतीय नागरिकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले सामान को उचित कीमतों पर उपलब्ध कराएगा, जिससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत 2047 मिशन को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

भारत और यूके के बीच परिवर्तनकारी व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (सीईटीए) भारतीय वस्तुओं के लिए यूके में सभी क्षेत्रों में, विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों में, व्यापक बाजार पहुंच सुनिश्चित करेगा। दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद यह समझौता लगभग 100% व्यापार मूल्य को शामिल करते हुए लगभग 99% टैरिफ लाइनों पर तुरंत शुल्क समाप्त करेगा, जिससे भारतीय निर्यात के लिए अपार अवसर सृजित होंगे। 

सीईटीए एक जन-केंद्रित समझौता है, जिस पर पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर की उपस्थिति में हस्ताक्षर किये गये थे। यह समाज के हर हिस्से को फायदे देता है। किसानों को अपने घरेलू हितों से समझौता किए बिना उच्च मूल्य वाले निर्यात बाजारों तक पहुंच मिलेगी। मछुआरों को विशाल यूके बाजार में अधिक सीफ़ूड निर्यात से फायदा मिलेगा। श्रमिकों को श्रम-गहन क्षेत्रों में नई नौकरियों के अवसर मिलेंगे। महिला उद्यमी, युवा, स्टार्टअप्स और एमएसएमई को वैश्विक मूल्य-श्रृंखला तक बेहतर पहुँच मिलेगी। पेशेवरों को बेहतर आवागमन और मान्यता के अवसरों से फायदा मिलेगा।

किसानों के लिए समृद्धि  

सीईटीए भारतीय किसानों के लिए प्रीमियम यूके बाजार खोलता है, जो दूसरे यूरोपीय देशों को मिलने वाले फायदों के बराबर या उनसे भी बेहतर है। हल्दी, काली मिर्च, इलायची और प्रसंस्कृत सामान जैसे आम का गूदा, अचार और दालों को शुल्‍क-मुक्त पहुँच प्राप्त होगा। उच्च कृषि निर्यात से किसानों की आय बढ़ेगी और गुणवत्ता, पैकेजिंग और प्रमाणन के लिए और प्रोत्साहन मिलेगा। यह कृषि मूल्य श्रृंखला में कई नौकरियाँ भी पैदा करेगा।

साथ ही, सीईटीए घरेलू किसानों – खासकर डेयरी उत्पाद, खाद्यान्न, मोटे अनाज, सेब, ओट्स और खाद्य तेल से जुड़े किसानों – की सुरक्षा के लिए भारत के सबसे संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को अपने दायरे से बाहर रखता है। इन्हें समझौते से बाहर रखना, मोदी सरकार की खाद्य सुरक्षा, घरेलू मूल्य स्थिरता और कमजोर कृषि समुदायों को प्राथमिकता देने की रणनीति को प्रतिबिंबित करती है।

उद्योग को बढ़ावा

यूके के विशाल बाजार तक तुरंत शुल्क-मुक्त पहुंच भारतीय निर्माण को बढ़ावा देगी, जिससे पारंपरिक कारीगर, बड़े कारखाने और क्षेत्रीय औद्योगिक केंद्र प्रभावी तरीके से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। छोटे व्यवसायों को फायदा होगा, क्योंकि भारतीय उत्पादों को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर प्रतिस्पर्धा से जुड़ी स्पष्ट बढ़त मिलेगी। फुटबॉल, क्रिकेट गियर, रग्बी बॉल और खिलौने बनाने वाली कंपनियां, अन्य उत्पादों के साथ-साथ, यूके में अपने व्यवसाय को काफी विस्तार देने में सक्षम होंगी। 

शुल्कों को हटाने से खासकर श्रम-सघन क्षेत्रों में लंबे समय से चल रही टैरिफ बाधाओं का समाधान हुआ है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा और पैमाने में तुरंत लाभ होने की उम्मीद है। तिरुपुर के करघों से लेकर बेंगलुरु की लैब तक, सूरत के हीरे के कारीगरों से लेकर हैदराबाद के कोडर्स तक, यह समझौता असली अर्थव्यवस्था को छूता है।

सेवाएँ और पेशेवर

यूके ने सेवा क्षेत्र में अब तक की अपनी सबसे व्यापक प्रतिबद्धताओं में से एक प्रदान किया है, जिसमें भारत की निर्यात रुचि के सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों और 137 उप-क्षेत्रों को शामिल किया गया है। बेहतर बाजार पहुंच और नियामक सुनिश्चितता भारतीय सेवा प्रदाताओं को आईटी और आईटी-सक्षम सेवाओं, वित्तीय सेवाओं, पेशेवर सेवाओं, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, इंजीनियरिंग, दूरसंचार और परामर्श सेवाओं में सहायता करेगी।

भारत ने कुशल पेशेवरों के लिए अनुकूल आवागमन प्रावधान सुनिश्चित किए हैं, जिनमें संविदा सेवा प्रदाता, व्यापार यात्री, निवेशक, योग प्रशिक्षक, संगीता‍कार और रसोइये शामिल हैं। इस समझौते में व्यापार आगंतुक, कर्मचारियों का अंतर-कॉर्पोरेट तबादला, संविदा सेवा आपूर्तिकर्ता, स्वतंत्र पेशेवर और निवेशकों के लिए भी पूर्वानुमान योग्य आवागमन उपाय प्रदान किए गए हैं।

इसके अलावा, इस समझौते के तहत 1,800 भारतीय रसोइये, योग प्रशिक्षक और शास्त्रीय संगीतकार हर साल समर्पित आवागमन अवसरों का लाभ उठा सकेंगे।

नवोन्मेषी एफटीए  

पीएम मोदी के नेतृत्व में, एफटीए सिर्फ वस्तुएं और सेवाओं तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इन्होने नए मानक स्थापित किये हैं। ईएफटीए देशों—स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन—के साथ, भारत ने 100 बिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता हासिल की, जिससे प्रत्यक्ष रोजगार के एक मिलियन अवसरों के सृजन की उम्मीद है। न्यूज़ीलैंड के साथ एफटीए में, देश ने 15 साल में 20 बिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता हासिल की, जबकि ऑस्ट्रेलियाई एफटीए ने उस दोहरी कर-व्यवस्था की समस्या को सुलझा दिया, जिससे भारतीय आईटी कंपनियां समस्याओं का सामना करती थीं।  

यूके के साथ समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू है, दोहरा योगदान सिद्धांत। यह ऐतिहासिक व्यवस्था, जो सीईटीए के साथ प्रभावी होगी, भारतीय कर्मचारियों और नियोक्ताओं को अस्थायी कार्य-उत्तरदायित्व (असाइनमेंट) के दौरान यूके में दोहरी सामाजिक सुरक्षा योगदान देने से मुक्त करती है।  

75,000 से अधिक भारतीय पेशेवरों और 900 से अधिक कंपनियों को अस्थायी विदेशी कार्य-उत्तरदायित्व पर कर्मचारियों के लिए लगातार सामाजिक सुरक्षा कवरेज से फायदा मिलने की उम्मीद है।

सरकार की रणनीति

2014 में अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही थी और संभावित निवेशकों का भरोसा टूट रहा था। भारत को उन “कमजोर पांच” अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना जाता था, जो नीतिगत भटकाव और भारी भ्रष्टाचार घोटालों से जूझ रही थीं।

मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था में वैश्विक विश्वास बहाल करने और इसे निवेशकों के लिए आकर्षक बनाने के लिए एक सुदृढ़ दृष्टिकोण अपनाया। विकसित देशों के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर करना अगला कदम था। एफटीए व्यापार नीतियों के संबंध में अनिश्चितता को कम करके निवेशकों का भरोसा भी बढ़ाते हैं।

सरकार ने ऐसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ एफटीए किये, जो बड़े बाजार प्रदान करती हैं और भारत के प्रमुख व्यापार हितों के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा नहीं करतीं। इससे दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद स्थिति बनती है, जो पिछली सरकार के उस दृष्टिकोण से अलग है, जिसमें भारतीय व्यवसायों को जोखिम में डालते हुए देश के दरवाजे प्रतिद्वंद्वियों के लिए लापरवाही से खोल दिए गए थे।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत को अब एक मजबूत अर्थव्यवस्था और अस्थिर विश्व में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में व्यापक रूप से सम्मान दिया जाता है। इसने खुद को एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित किया है, जिसका एक आकर्षक बाजार है और यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बनी हुई है। महत्वपूर्ण और व्यापक सुधारों, व्यवसाय करने में आसानी में सुधार, छोटे अपराधों को अपराध मुक्त करने और पीएम के वैश्विक व्यक्तित्व ने भारत को एक आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित किया है। आज, दुनिया भारत की विकास कहानी का हिस्सा बनना चाहती है—और एफटीए पर हस्ताक्षर करना चाहती है।

इन व्यापार समझौतों ने घरेलू बाजार को भी धीरे-धीरे खोलना सुनिश्चित किया है। इससे भारतीय बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी होगा और स्थानीय निर्माता उच्च गुणवत्ता वाले सामान प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बनाने के लिए प्रोत्साहित होंगे, जो प्रधानमंत्री के विकसित भारत मिशन का एक मुख्य तत्व है।

सीईटीए प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच न्यायसंगत और महत्वाकांक्षी व्यापार समझौतों के लिए एक मानक है। यह भारत के मूल हितों से समझौता किए बिना वंचित लोगों के लिए आकर्षक वैश्विक अवसर खोलता है। यह दिखाता है कि नया भारत कैसे व्यापार करता है।

 (लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं।)

लोकतंत्र अमर रहे: आज़ादी को याद रखना क्यों ज़रूरी है

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

आपातकाल लागू हुए पचास साल हो चुके हैं, और देश आज भी उस दौर पर विचार कर रहा है जिसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक माना जाता है। ‘संविधान हत्या दिवस – लोकतंत्र अमर रहे’ (Long Live Democracy) के राष्ट्रीय आयोजन के समापन समारोह का मकसद सिर्फ़ इतिहास को याद करना नहीं है, बल्कि उन स्थायी मूल्यों पर चिंतन करना भी है जो हमारे गणतंत्र को बनाए रखते हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने एक बार कहा था:

“संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज़ नहीं है; यह जीवन का एक माध्यम है,
और इसकी भावना हमेशा उस दौर की भावना होती है।”

बहुत कम बातें हमारे संवैधानिक सफ़र के सार को इन शब्दों से बेहतर ढंग से बयां कर पाती हैं। संविधान केवल एक कानूनी ढांचा नहीं है जो राज्य के कामकाज को नियंत्रित करता है।
यह नागरिकों और संस्थाओं, अधिकारों और ज़िम्मेदारियों, तथा आज़ादी और जवाबदेही के बीच एक जीवंत समझौता है।

लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए उसे याद रखना ज़रूरी है।

भारत की लोकतांत्रिक भावना हमारी सभ्यता की परंपराओं में गहराई से बसी हुई है। सदियों से, हमारे समाज ने सलाह-मशविरे, सामूहिक विचार-विमर्श और जन-भागीदारी वाली संस्थाओं को बढ़ावा दिया है। यह याद रखना ज़रूरी है कि भारत को लोकतंत्र विरासत में नहीं मिला – उसने इसे खुद विकसित किया है। प्राचीन सभाओं और समितियों से लेकर आज़ादी के बाद की संसदीय प्रणाली तक, हमने हमेशा लोगों की सामूहिक इच्छा में विश्वास किया है।

संविधान ने इन परंपराओं को एक आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में बदल दिया, साथ ही उन मूल्यों को भी बनाए रखा जिन्होंने पीढ़ियों से इन्हें जीवित रखा था। संविधान की प्रस्तावना हमारी संवैधानिक दिशा-सूचक (कम्पास) बनी हुई है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व – ये केवल संवैधानिक आदर्श नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षाएं हैं। ये जन-नीति का मार्गदर्शन करती हैं, संस्थाओं को आकार देती हैं और राज्य तथा नागरिक के बीच संबंध तय करती हैं। साथ ही, इतिहास हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र को कभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।

1975-77 की इमरजेंसी (आपातकाल) आज़ाद भारत के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी। इसने दिखाया कि जब संवैधानिक सुरक्षा-उपाय कमज़ोर पड़ते हैं और लोगों की आज़ादी सीमित की जाती है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव पड़ सकता है। उस दौर का असर सिर्फ़ राजनीतिक जीवन तक सीमित नहीं था; इसने देश भर के नागरिकों के रोज़मर्रा के अनुभवों को प्रभावित किया और इसकी भारी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी। ये अनुभव हमें ज़ोरदार ढंग से याद दिलाते हैं कि संवैधानिक अधिकार केवल कागज़ी कानूनी सिद्धांत नहीं हैं; ये ऐसे सुरक्षा-कवच हैं जो सीधे तौर पर नागरिकों की गरिमा, आज़ादी और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को आकार देते हैं। जब इन अधिकारों में कटौती की जाती है, तो सिर्फ़ संस्थाओं को ही नुकसान नहीं पहुँचता – बल्कि आम लोगों, परिवारों और समुदायों की आज़ादी और आकांक्षाओं पर सबसे गहरा असर पड़ता है। फिर भी, उस दौर से हमें जो सबसे बड़ी सीख मिलती है, वह है लोकतंत्र की मज़बूती और मुश्किलों से उबरने की क्षमता।

भारत के लोगों ने संवैधानिक तरीकों में असाधारण भरोसा दिखाया। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं ने ही अंततः लोकतंत्र में आई कमियों को सुधारा। शांतिपूर्ण भागीदारी और मतदान के ज़रिए, नागरिकों ने इस सिद्धांत को फिर से साबित किया कि सत्ता की असली ताकत जनता के हाथ में होती है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है – मुश्किल दौर से सीखकर, खुद को ढालकर और सुधारकर और भी मज़बूत होकर उभरने की इसकी क्षमता।

इस मौके पर आयोजित एक विशेष प्रदर्शनी इस यादगार आयोजन का एक अहम हिस्सा है। यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे मुश्किल दौर में से एक की एक विज़ुअल यात्रा की तरह है – जिसमें इमरजेंसी के दौरान का आर्काइव मटीरियल, विरोध की कहानियाँ, संवैधानिक पड़ाव और लोगों के अनुभव दिखाए गए हैं। इस मौके का एक और अहम हिस्सा है – पद्म भूषण से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्री राम बहादुर राय का एक खास मेमोरियल लेक्चर – जो संवैधानिक सतर्कता और लोकतांत्रिक नवीनीकरण के बड़े विषय को आज के समय के हिसाब से प्रासंगिक बनाता है। आज के समय में, आज़ादी के लगभग आठ दशक बाद भी, लोकतंत्र का मतलब लगातार बदल रहा है। नागरिक अब सिर्फ़ प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि भागीदारी भी चाहते हैं। वे सिर्फ़ अधिकार ही नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन भी चाहते हैं। ऐसी पहल जो वित्तीय समावेशन, ज़मीनी स्तर पर भागीदारी और नागरिक-केंद्रित व्यवस्था को बढ़ावा देती हैं…

शासन-व्यवस्था ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की पहुँच को बढ़ाया है। साथ ही, नागरिकता की ज़िम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो गई है। एक मज़बूत लोकतंत्र जागरूक नागरिकों पर निर्भर करता है। आज, जब दुनिया भारत की ओर देखती है और इसे “लोकतंत्र की जननी” कहती है, तो यह प्राचीन राजाओं के धर्म से लेकर आधुनिक मतदाताओं की इच्छाशक्ति तक की हमारी लंबी सभ्यतागत यात्रा की मान्यता है।

लोगों के इतिहास और आज़ादी के जीवित नायकों को सामने लाना
इस समापन समारोह के हिस्से लोकतंत्र की इस व्यापक समझ को दर्शाते हैं कि यह एक जीवंत और विकसित होता राष्ट्रीय अनुभव है। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ (AKAM) के तहत 2021 में शुरू की गई एक अनूठी पहल – ‘डिजिटल डिस्ट्रिक्ट रिपॉजिटरी’ (DDR) प्रदर्शनी – का उद्देश्य देश के हर कोने से बलिदान, साहस और जन-भागीदारी की सैकड़ों कम जानी-पहचानी कहानियों को सामने लाना है। संस्कृति मंत्रालय ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की इन कम जानी-पहचानी कहानियों पर 10 लघु फिल्में भी बनाई हैं। ये पहल हमें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र तब मज़बूत होता है जब संवैधानिक मूल्यों को सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक जागरूकता और राष्ट्रीयता की गहरी भावना से बल मिलता है। अब तक DDR की समर्पित वेबसाइट पर 19,500 से ज़्यादा कहानियाँ मौजूद हैं।
DDR पहल में योगदान देने वाले संस्थानों और विभागों में, संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था – ‘सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज़ एंड ट्रेनिंग’ (CCRT) – ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कम ज्ञात पहलुओं को उजागर करने वाली बड़ी संख्या में कहानियों को संकलित और व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अवसर पर, हमारे साथ दो जीवित स्वतंत्रता सेनानी मौजूद हैं, जो साहस, बलिदान और सेवा के जीवंत प्रतीक हैं – महाराष्ट्र के श्री शेषराव लक्ष्मणराव खोट, जो एक युवा छात्र के रूप में हैदराबाद मुक्ति आंदोलन में शामिल हुए थे; और आंध्र प्रदेश के श्री एड्डुला सूर्यनारायण रेड्डी, जिन्होंने बचपन में ही स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करना शुरू कर दिया था और ग्यारह साल की उम्र में पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए थे। उनकी उपस्थिति हमें याद दिलाती है कि आज़ादी कोई दूर का इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवंत स्मृति है। विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता
इसके साथ ही ‘विरासत’ का 11वां संस्करण भी आयोजित हो रहा है। यह उन सांस्कृतिक परंपराओं, कलात्मक अभिव्यक्तियों और साझा विरासत का जश्न मनाता है, जिन्होंने पीढ़ियों के बीच बातचीत, विविधता और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा दिया है। यह स्वतंत्रता सेनानी, सांस्कृतिक दूरदर्शी और संस्था-निर्माता कमलादेवी चट्टोपाध्याय की याद को सम्मान देता है। शास्त्रीय प्रस्तुतियाँ उन संगीत परंपराओं पर आधारित हैं जो पीढ़ियों, क्षेत्रों और विचारधाराओं के बीच सदियों की बातचीत से विकसित हुई हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत खुद निरंतरता, विविधता, अनुशासन और रचनात्मक स्वतंत्रता के मूल्यों का प्रमाण है – ऐसे मूल्य जो एक जीवंत लोकतंत्र के लिए भी उतने ही ज़रूरी हैं।

प्रेजेंटेशन ‘एनाजरी: लोकनाद – जनजातीय समरसता का स्वर-संगम’ असम और नॉर्थ-ईस्ट की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का जश्न मनाता है। अलग-अलग समुदायों को दिखाने वाले अपने संगीत और नृत्य परंपराओं के ज़रिए, यह विविधता में एकता के विचार को खूबसूरती से दिखाता है, जो हमारे गणराज्य के बुनियादी सिद्धांतों में से एक है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत की ताकत कई पहचानों को एक साथ लाने की उसकी क्षमता में है। CCRT स्कॉलर्स की खास थीम वाली प्रेजेंटेशन, “साइलेंस से आवाज़ तक, अंधेरे से सुबह तक” खास तौर पर सार्थक है। भारतीय क्लासिकल संगीत की भाषा के ज़रिए, यह डर और दबाव से हिम्मत, नएपन और लोकतांत्रिक पुनरुत्थान तक के सफ़र को दिखाता है। इस याद में एक और मील का पत्थर महर्षि दयानंद सरस्वती कला गुरुकुल और कलाग्राम की नींव रखने से जुड़ा है, जिसे ऐसे सेंटर बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है जहाँ भारत की कलात्मक विरासत की पढ़ाई और प्रैक्टिस की जा सके। यह गुरुकुल सिस्टम की पुरानी परंपरा से प्रेरित है। जैसे डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए, वैसे ही कल्चरल परंपराओं को भी ऐसे इंस्टीट्यूशन्स की ज़रूरत होती है जो उन्हें बनाए रखें और नया करें। इस प्रिंसिपल के हिसाब से, सेवा पर्व दिखाता है कि कल्चरल एक्सप्रेशन्स का अभी भी लोगों की चेतना और सिविक सेंस पर असर पड़ता है। कुल मिलाकर, संविधान हत्या दिवस मनाने से जुड़े हिस्से एक कॉमन मैसेज देते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि डेमोक्रेसी सिर्फ़ एक पॉलिटिकल सिस्टम नहीं है; यह एक जीती-जागती परंपरा है। इसे पब्लिक पार्टिसिपेशन से बनाए रखा जाता है, और एक जागरूक और सतर्क नागरिक इसकी रक्षा करता है। जैसे-जैसे हम 2047 में आज़ादी की सौवीं सालगिरह की ओर बढ़ रहे हैं, आइए हम इस भावना को नए कमिटमेंट के साथ आगे बढ़ाएं! (लेखक भारत सरकार में कल्चर और टूरिज्म मिनिस्टर हैं)