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हमारी आंगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी: समुदाय की भागीदारी से मजबूत होगा बच्चों का भविष्य

अन्नपूर्णा देवी, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री

2047 के भारत का निर्माण वे बच्चे करेंगे जिन्होंने अभी स्कूल में कदम भी नहीं रखा है। एक स्वस्थ, आत्मविश्वासी और सक्षम वयस्क बनने की उनकी यह यात्रा बहुत पहले, विशेष रूप से जीवन के पहले 1,000 दिनों में ही शुरू हो जाती है। लाखों भारतीय बच्चों और उनकी माताओं के लिए इस यात्रा का सबसे बड़ा संबल उनके पड़ोस की एक जानी-पहचानी संस्था है: आंगनवाड़ी।

कक्षा में प्रवेश करने से बहुत पहले ही बच्चों का आंगनवाड़ी में वजन और कद नापा जाता है, उन्हें गर्म पौष्टिक भोजन मिलता है और वे घर के बाहर पहली बार बाल-गीत सुनते हैं। यहीं गर्भवती माता-पिता को परामर्श भी दिया जाता है। आज 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्र नागरिक और सरकार के बीच पहले संपर्क बिंदु के रूप में काम कर रहे हैं, जो 8.9 करोड़ से अधिक बच्चों, महिलाओं और किशोरियों तक अपनी पहुंच बनाए हुए हैं। यहां कार्यरत 25.2 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं उसी समाज से आती हैं जिसकी वे सेवा करती हैं। आंगनवाड़ी हमेशा से स्थानीय समुदाय का ही एक हिस्सा रही है।

मार्च 2018 में जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ‘पोषण अभियान’ की शुरुआत की, तब यह जानी-पहचानी संस्था एक राष्ट्रीय आंदोलन की आधारशिला बन गई। 9 सितंबर 2026 को ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी’ थीम के साथ 9वें ‘राष्ट्रीय पोषण माह’ का शुभारंभ हुआ। गुणवत्तापूर्ण सेवाएं प्रदान करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह सरकार की है और यह प्रतिबद्धता अडिग है, लेकिन कोई भी आंगनवाड़ी केंद्र सही मायने में तभी सशक्त बनता है जब समुदाय उसे अपना माने। एक ‘विकसित भारत’ का निर्माण केवल ‘सबके प्रयास’ से ही संभव है; पोषण को केवल एक सरकारी सेवा के रूप में नहीं देखा जा सकता।

लाभार्थी से भागीदार तक

समुदाय का स्वामित्व अक्सर केवल एक अपील बनकर रह जाता था, लेकिन इस वर्ष इसे एक संस्थागत रूप दिया गया है। आंगनवाड़ी प्रबंधन समितियां माता-पिता, पंचायत प्रतिनिधियों और स्वयं सहायता समूहों को केंद्र से जोड़ती हैं ताकि हर पात्र बच्चे तक लाभ पहुंच सके। सोशल ऑडिट के माध्यम से समुदाय सेवाओं की समीक्षा करता है, अधिकारों की पुष्टि करता है और औपचारिक रूप से अपने निष्कर्ष दर्ज करता है। इस तरह जवाबदेही उन परिवारों की आंतरिक निगरानी में बदल जाती है जो इन सेवाओं का लाभ ले रहे हैं।

इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में माताएं हैं। ‘पूरक पोषण कार्यक्रम’ (SNP) का मेनू बोर्ड गर्म पके भोजन और ‘टेक-होम राशन’ (घर ले जाने वाले राशन) के दैनिक विवरण को प्रदर्शित करता है। जब एक मां को पता होता है कि उसके बच्चे का क्या अधिकार है, तो पारदर्शिता रोज़मर्रा की आदत बन जाती है। इस प्रकार समुदाय गुणवत्ता सुनिश्चित करने में एक जागरूक भागीदार बन जाता है।

पोषण माह 2026 के दौरान इन समितियों, सोशल ऑडिट और मेनू बोर्ड को सक्रिय किया जा रहा है; साथ ही ‘तिथि भोज’, चखने के सत्र और व्यंजन विधियों के प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।

मेनू बोर्ड से परे

पहला पहलू स्वयं भोजन है। ‘सुपोषित भारत’ के लिए संतुलित आहार आवश्यक है: अनाज और श्रीअन्न (मिलेट्स), दालें, मेवे और बीज, दूध और दुग्ध उत्पाद, अंडे, मौसमी फल और हरी सब्ज़ियां। जुलाई में जारी ‘पूरक पोषण कार्यक्रम के लिए व्यापक दिशानिर्देश, 2026’ में गर्म पके भोजन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत सूक्ष्म पोषक तत्वों के मानकों को सुदृढ़ किया गया है।

दूसरा पहलू प्रारंभिक बाल्यावस्था की शिक्षा है। बच्चा क्या खाता है और क्या सीखता है, ये दोनों आपस में गहरे जुड़े हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चे के शुरुआती तीन वर्षों में 34 विकासात्मक पड़ावों पर नज़र रखती हैं। ‘नवचेतना’ और ‘आधारशिला’ पाठ्यक्रम पोषण और देखभाल को स्कूल जाने की तैयारी से जोड़ते हैं।

तीसरा पहलू बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। गर्भावस्था के दौरान मां का पोषण ही बच्चे के जीवन की शुरुआत तय करता है। यह पोषण माह ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’ के दस वर्ष पूरे होने का भी प्रतीक है, जो प्रधानमंत्री के इस विश्वास को दर्शाता है कि किसी भी महिला को अपनी आजीविका और स्वास्थ्य के बीच किसी एक को चुनने के लिए विवश नहीं होना चाहिए। एक दशक में 4.65 करोड़ लाभार्थियों को उनके खातों में सीधे 21,511 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। ‘मिशन शक्ति’ के तहत इसे और मजबूत करते हुए दूसरी संतान कन्या होने पर अतिरिक्त लाभ प्रदान किया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 स्पष्ट करता है कि ऐसी वित्तीय सहायता तभी पूरी तरह प्रभावी होती है जब उसके साथ उचित परामर्श भी मिले, जिससे परिवार के भीतर समझदारी से निर्णय लिए जा सकें। राजस्थान के ‘कैश प्लस’ मॉडल की समीक्षा—जिसमें इस वित्तीय सहायता को निरंतर व्यवहार परिवर्तन संचार से जोड़ा गया था—दर्शाती है कि इस लाभ को भोजन पर खर्च करने वाली महिलाओं का अनुपात 30 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गया। साथ ही, जब पतियों और परिवारों को इस संवाद में शामिल किया गया तो मातृ पोषण से जुड़े भ्रम और भ्रांतियां भी दूर हुईं। यह साझेदारी आंगनवाड़ियों के इर्द-गिर्द इसलिए पनपती है क्योंकि मां का पोषण कभी भी केवल उसकी अकेले की ज़िम्मेदारी नहीं रहा है।

केंद्र में मौजूद नारी शक्ति का सम्मान

इस पूरे तंत्र के केंद्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता खड़ी हैं। सामुदायिक स्वामित्व का अर्थ यह कतई नहीं है कि पोषण और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल का सारा भार उन्हीं पर डाल दिया जाए। इसका वास्तविक अर्थ उनका सम्मान करना, उनका सहयोग करना और उन्हें सशक्त बनाना है। उनका अनुभव और उन पर बना विश्वास अमूल्य है।

इस सितंबर, मैं प्रत्येक नागरिक से आग्रह करती हूं कि वे अपने क्षेत्र के कम से कम एक आंगनवाड़ी केंद्र का दौरा अवश्य करें। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से बात करें, मेनू बोर्ड देखें और पूछें कि आप किस प्रकार सहयोग कर सकते हैं। पिताओं, दादा-दादी/नाना-नानी, पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों—सभी की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।

इस सितंबर हमारी आंगनवाड़ियों में जिन बच्चों का वजन नापा जा रहा है, वे उस समय अपने जीवन के तीसरे दशक (20s) में होंगे जब भारत अपनी आज़ादी के सौ वर्ष पूरे करेगा। उस वर्ष वे जिस स्वास्थ्य और आत्मविश्वास के साथ खड़े होंगे, उसे आज गढ़ा जा रहा है। जब प्रत्येक समुदाय अपनी आंगनवाड़ी की ज़िम्मेदारी लेगा, तभी भारत अपने हर बच्चे के भविष्य की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित कर सकेगा।

‘क्लीन सी, सेफ़ सी’ कैंपेन की बढ़ती पहुंच, 75 जगहों से 836 तटीय क्षेत्रों तक पहुंचा अभियान

-डॉ. जितेंद्र सिंह

समुद्र में एक ऐसी याद है जिसे कोई मॉनसून मिटा नहीं सकता। भारत के 11,098 km लंबे समुद्र तट पर सुबह की सैर करें। आपको उन लहरों में वही पुरानी कहानी दिखेगी जो कभी मसालों से लदे जहाज़ों को मालाबार तट पर लाती थी और मन्नार की खाड़ी में मोती खोजने वालों की मदद करती थी। समुद्र की इसी पुरानी और लगातार लय ने तय किया है कि भारतीय कैसे रहते हैं, व्यापार करते हैं, पूजा करते हैं और सपने देखते हैं।

लेकिन आज उसी बीच पर जाएं और लहरें कुछ और भी वापस ला रही हैं—एक फटा हुआ मछली पकड़ने का जाल जिसमें एक खाली शैम्पू का पाउच उलझा हुआ है; एक छोटा समुद्री कछुआ बोतल के ढक्कन की ओर बढ़ रहा है, उसे खाना समझकर; एक मछुआरे की सुबह की पकड़ उसके पिता से छोटी होती है और उसमें मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक होता है। एक समय भारत अपनी खुशहाली का अंदाज़ा मसल्स, क्लैम और मछलियों की ज़्यादा पकड़ से लगाता था। लेकिन आज का भारत उसी समुद्र से कचरे के रूप में एक संदेश पा रहा है। यह कहानी इस बारे में है कि पिछले दस सालों में हमने आखिरकार उस मैसेज को समझना और समुद्र को अपने तरीके से जवाब देना कैसे शुरू किया है।

बहुत लंबे समय से, समुद्र तट हमारे दिमाग में उतना ही बसा हुआ था जितना हमारे मैप में। हम बीच पर जाते थे, उनकी खूबसूरती देखते थे और कभी-कभी साइक्लोन से हुए नुकसान पर दुख जताते थे। लेकिन इसे हमारी साझी विरासत के तौर पर बचाने पर बहुत कम ध्यान दिया गया। पहले, समुद्र की रक्षा और उसके बचाव का काम ज़्यादातर सरकारी डिपार्टमेंट तक ही सीमित था। अलग-अलग डिपार्टमेंट अपने-अपने लेवल पर काम करते थे। रोज़ाना समुद्र की देखभाल करने के बजाय, ज़्यादातर ध्यान आपदाओं के बाद राहत और बचाव पर होता था। आम लोगों को – जैसे कोच्चि में कॉलेज स्टूडेंट, पुरी में स्कूल टीचर या पोरबंदर में दुकानदार – यह महसूस कराने के लिए कोई नेशनल प्लेटफॉर्म नहीं था कि समुद्र उनका है और इसे बचाना उनकी ज़िम्मेदारी है। इस बीच, समुद्र के लिए खतरा लगातार बढ़ता जा रहा था।

बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा, खासकर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, नदियों और झरनों के ज़रिए समुद्र में पहुँच रहा था। यह प्लास्टिक गायब नहीं होता, बल्कि टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है। ये पांच मिलीमीटर से भी छोटे टुकड़े होते हैं। मछलियां प्लास्टिक के इन छोटे टुकड़ों को खाना समझकर खा जाती हैं। यह प्लास्टिक फिर उन मछलियों तक पहुंचता है जिन्हें हम खाते हैं। अब यह भी पता चला है कि ये छोटे प्लास्टिक के कण धीरे-धीरे फूड चेन के ज़रिए हमारे शरीर में पहुंच सकते हैं। समुद्री जानवर छोड़े गए मछली पकड़ने के जालों में फंसकर मर रहे थे। रीफ, मैंग्रोव जंगल और मछलियों की आबादी पर भी धीरे-धीरे असर पड़ रहा था। लाखों तटीय परिवारों की रोजी-रोटी इन पर निर्भर है। सच कहूं तो, यह हमारे समय की सबसे कम ध्यान दी जाने वाली पर्यावरण समस्याओं में से एक थी। समस्या हमारे ठीक सामने थी, लेकिन हम इसे नज़रअंदाज़ करते रहे। यह भारत के नौ राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों को छूने वाली तटीय रेखा के साथ बढ़ रही थी।

यह बदलाव सिर्फ़ एक नई पॉलिसी से नहीं आया। असली बदलाव यह था कि मोदी सरकार ने सोच-समझकर यह तय किया कि सफाई अब किसी और पर नहीं छोड़ी जा सकती। इसे सबकी ज़िम्मेदारी बनाना होगा। 2014 में स्वच्छ भारत मिशन शुरू करते समय, प्रधानमंत्री ने इसे ‘जन आंदोलन’ बनाने की बात की थी। यह सोच समुद्र और तटों तक फैली हुई थी। इसी सोच का एक हिस्सा है ‘मिशन लाइफ’, यानी इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल। इसका मकसद है कि पर्यावरण की सुरक्षा हर नागरिक के लिए रोज़ की आदत बने, न कि कभी-कभार का काम। हमारी मिनिस्ट्री की ज़िम्मेदारी है कि वह समुद्र, पर्यावरण और धरती से जुड़े साइंटिफिक सिस्टम को समझे और उनकी स्टडी करे। तो हमारे सामने एक सीधा सवाल था – अगर भारत अपने शहरों को साफ़ करने के लिए करोड़ों लोगों को एक साथ ला सकता है, तो क्या यही काम अपने समुद्रों के लिए नहीं किया जा सकता?

इस सवाल का जवाब 2022 में ‘क्लीन ओशन, सेफ़ ओशन’ कैंपेन के रूप में मिला। इस कैंपेन का मकसद सिर्फ़ एक दिन के लिए बीच साफ़ करना और तस्वीरें खिंचवाना नहीं था। इसे लगातार चलने वाला, साइंस-बेस्ड और नागरिकों की भागीदारी वाला कैंपेन बनाया गया। हर साल इसे इंटरनेशनल कोस्टल क्लीनअप डे से जोड़ा जाता है। यह दिन सितंबर के तीसरे शनिवार को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1986 में हुई थी और आज दुनिया के 100 से ज़्यादा देशों में लोग अपने सबसे पास के बीच पर जाकर उसे साफ़ करते हैं—सिर्फ़ हाथों में ग्लव्स और कचरे के थैले लेकर, और मन में समुद्र को साफ़ रखने का संकल्प लेकर।

इस कैंपेन का छोटा सा इतिहास इसकी बढ़ती पहुँच की पूरी कहानी बताता है। पहले साल, ‘क्लीन सी, सेफ़ सी’ कैंपेन 75 दिनों तक चला और 75 जगहों पर पहुँचा। इसे ज़्यादातर हमारे समुद्र से जुड़े रिसर्च इंस्टीट्यूट ने चलाया। यह एक शुरुआत थी, कोई बहुत बड़ी कामयाबी नहीं। लेकिन धीरे-धीरे दूसरे मंत्रालय भी इससे जुड़ने लगे। सीमा जागरण मंच और पर्यावरण संरक्षण प्रतिभा जैसे वॉलंटरी संगठनों ने अपने नेटवर्क के ज़रिए लोगों को जोड़ा। यह मैसेज बीच पर रहने वाले लोगों में भी फैलने लगा। इस साल, यह कैंपेन 836 तटीय जगहों और एक लाख से ज़्यादा लोगों तक फैल गया।

भारत की भूली-बिसरी लौकी-वर्गीय सब्ज़ियों पर एक जेनेटिक नज़र

‘अक्ल की लौकी’ अब नहीं

हिंदी में एक कहावत है: ‘अक्ल की लौकी’। इसका मतलब है ‘दिमाग की जगह लौकी होना’, यानी किसी को बेवकूफ या नासमझ कहना। आम लोगों की सोच में लौकी बेकार और खोखली चीज़ है, जिसे गंभीरता से नहीं लिया जाता।

लेकिन असल में लौकी ही बाज़ी मार ले जाती है।

उत्तर भारत के ज़्यादातर गाँवों में फसल के मौसम में घूमिए, तो आपको ये हर जगह दिखेंगी: लौकी, तोरई, करेला, नेनुआ, चिचिंडा – ये सब घरों के बाहर बाँस के मचानों पर चढ़ी हुई मिलेंगी। ये सस्ती और देखने में साधारण होती हैं, और इतनी आम हैं कि खरीदते समय कोई इनके बारे में ज़्यादा सोचता भी नहीं। फिर भी, पोषण के मामले में ये बहुत काम की चीज़ें हैं। ये ऐसे देश में विटामिन और मिनरल देती हैं जहाँ चावल और गेहूँ पेट तो भर देते हैं, लेकिन खाने में ज़रूरी पोषक तत्वों की कमी रह जाती है। कृषि वैज्ञानिक ऐसी फसलों को ‘ऑर्फ़न क्रॉप्स’ (अनाथ फसलें) कहते हैं। जो लोग इन्हें उगाते और खाते हैं, उनके लिए ये बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन दशकों तक इन्हें नज़रअंदाज़ किया गया क्योंकि ब्रीडर्स ने चावल, गेहूँ, कपास और टमाटर को ज़्यादा पैदावार देने वाली किस्मों में बदल दिया, जिन्हें हम आज जानते हैं।

समस्या यह है। लौकी-वर्गीय लगभग सभी पौधों में फल लगने के लिए कीड़ों द्वारा परागण (पॉलिनेशन) की ज़रूरत होती है। एक बेल में हर एक मादा फूल के मुकाबले दर्जनों या सैकड़ों नर फूल लगते हैं, और सिर्फ़ मादा फूल ही फल में बदलते हैं। और तो और, वह अकेला मादा फूल खिलने के बाद कुछ ही घंटों तक पराग (पॉलेन) लेने के लिए तैयार रहता है, और पराग पहुँचाने के लिए मधुमक्खियों पर निर्भर रहता है। लौकी परिवार की सभी सब्ज़ियों में यही पैटर्न दिखता है: महीनों तक ज़ोरदार बढ़त के बाद भी फसल उतनी नहीं मिलती जितनी पौधे की मेहनत के हिसाब से मिलनी चाहिए।

इसे ऐसे समझिए। हम घरों में गाय इसलिए पालते हैं क्योंकि वे दूध देती हैं, न कि बैल के लिए। लेकिन अगर हमारे ज़्यादातर बछड़े बैल बन जाएँ, तो समस्या हो जाएगी। लौकी के साथ भी ठीक यही स्थिति है: बहुत ज़्यादा नर फूल और बहुत कम मादा फूल। पौधा उन नर फूलों पर बहुत ज़्यादा ऊर्जा खर्च करता है जिनसे कोई फल नहीं मिलता। किसान के लिए, यह निवेश पर बहुत कम रिटर्न है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER) मोहाली में डॉ. रवि देवानी की टीम, फ्रांस के पेरिस-सैक्ले में इंस्टीट्यूट ऑफ़ प्लांट साइंसेज में डॉ. बेंडाहमाने के रिसर्च ग्रुप के साथ मिलकर, अब इस गणित को बदलने की कोशिश कर रही है। ज़्यादा खाद या कीटनाशक इस्तेमाल करने के बजाय, वे उन जेनेटिक निर्देशों को समझना और बदलना चाहते हैं जो यह तय करते हैं कि कोई फूल नर होगा या मादा। उनका पहला फ़ोकस लौकी है। इसका जीनोम पूरी तरह से मैप किया जा चुका है और इसमें नए जेनेटिक निर्देश डालने की एक साबित तकनीक भी मौजूद है। इसलिए, यह उन दूसरी लौकी-वर्गीय सब्ज़ियों (जिन पर कम रिसर्च हुई है) की समस्या को हल करने के लिए सबसे सही शुरुआती पॉइंट है।

सोचिए कि आज हाइब्रिड बीज कैसे बनाए जाते हैं। बेहतर किस्में बनाने के लिए, बीज कंपनियाँ हाथ से दो पैरेंट पौधों का क्रॉस कराती हैं; वे एक पौधे के नर फूल से पराग (pollen) लेती हैं और उसे एक-एक करके दूसरे पौधे के मादा फूल तक पहुँचाती हैं। यह प्रक्रिया धीमी है और इसमें बहुत मेहनत लगती है। इसका खर्च बीज के पैकेट की कीमत में जुड़ जाता है। कई साल पहले, खरबूजे और खीरे के ब्रीडर्स ने ऐसी प्लांट लाइनें बनाकर इस समस्या को हल किया था जो लगभग पूरी तरह से मादा होती हैं – जैसे डेयरी के झुंड में ज़्यादातर गायें हों, न कि बैल। कम नर फूल, ज़्यादा फल। भारतीय लौकी-वर्गीय सब्ज़ियों में अभी तक ऐसा कोई नहीं कर पाया है।
पॉलिनेशन (परागण) भी अपने आप में एक समस्या है, और क्लाइमेट चेंज इसे और भी खराब कर देगा। जो पौधे पॉलिनेशन के छोटे से समय और किसी कीड़े की मदद पर निर्भर होते हैं, उनके लिए गर्मी की लहरें (heat waves) और मधुमक्खियों की घटती संख्या बुरी खबर है। रिसर्चर दो अलग-अलग समाधानों पर काम कर रहे हैं।

एक ऐसे फूल के बारे में सोचिए जो एक ही समय में नर और मादा दोनों हो, आत्मनिर्भर हो, जिसे किसी साथी, किसी कीड़े या पराग के ट्रांसफर की ज़रूरत न हो। यानी हर्माफ्रोडाइट (उभयलिंगी) पौधे, जिनमें एक ही फूल में नर और मादा दोनों हिस्से होते हैं, जिससे पौधा बिना किसी कीड़े के खुद को फर्टिलाइज़ कर सकता है। एक और, ज़्यादा क्रांतिकारी समाधान है ‘पार्थेनोकार्पी’, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘वर्जिन फ्रूट’ (बिना निषेचन के फल)। पार्थेनोकार्पी बिना फर्टिलाइज़ेशन के फल पैदा करने की क्षमता है। पार्थेनोकार्पिक बेल को समय पर मधुमक्खी की मौजूदगी की ज़रूरत नहीं होती: न पॉलिनेशन, न मधुमक्खियाँ, न कोई समस्या। चाहे एक तरीका इस्तेमाल किया जाए या दोनों को मिलाकर, ये फसलें गर्मी की दोपहर या मधुमक्खियों के खराब सीज़न से कम प्रभावित होंगी। दोनों रणनीतियाँ दूसरी फसलों में तो दिखाई गई हैं, लेकिन भारतीय लौकी-वर्गीय सब्ज़ियों में अभी तक नहीं। कई दशकों की सावधानीपूर्वक रिसर्च के बाद, डॉ. बेंदहमाने और डॉ. देवानी ने खरबूजे और खीरे में फूलों के लिंग को कंट्रोल करने वाले जेनेटिक स्विच की पहचान की—एक बार में एक जीन करके। उन्होंने अपनी खोजों को ‘साइंस’, ‘नेचर’ और ‘नेचर प्लांट्स’ जैसे जर्नल्स में पब्लिश किया। लेकिन यह अभी भी पता नहीं है कि क्या लौकी और उससे जुड़ी दूसरी प्रजातियां भी उन्हीं स्विच का इस्तेमाल करती हैं या उन्होंने अपने अलग स्विच विकसित कर लिए हैं।

लौकी और खीरे के पूर्वज करोड़ों साल पहले एक ही थे—इंसानों के अस्तित्व में आने से भी बहुत पहले। इतने लंबे समय में, उनके जेनेटिक निर्देशों में काफी अंतर आ गया है। इसलिए, जो स्विच खीरे में काम करता है, हो सकता है कि वह लौकी में काम न करे। इस प्रोजेक्ट में…

भूमिगत संरचना की सटीक जानकारी से बदलेगा भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार, ICAR की ‘मृदा आसूचना’ बनी नई ताकत

एम.एल. जाट और एन.जी. पाटिल

भारत अभूतपूर्व और ऐतिहासिक गति से अपने डिजिटल, फिजि़कल (भौतिक) और फिजिटल (फिजिकल+डिजिटल) भविष्य का निर्माण कर रहा है। देश हर वर्ष औसतन 4.5 लाख से अधिक रूट किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर केबल नेटवर्क का विस्तार कर रहा है, जबकि साथ ही लगभग 11,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और 6,500 किलोमीटर रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण किया जा रहा है और हर वर्ष लगभग 5,000 किलोमीटर रेलवे ट्रैक जोड़े जा रहे हैं। इस व्यापक विस्तार का अर्थ है कि देशभर में डिजिटल कनेक्टिविटी के 22.8 लाख किलोमीटर के आश्चर्यजनक विस्तार वाले बहुवर्षीय राष्ट्रीय विस्तार के साथ-साथ, देश प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर राजमार्ग और 12 से 15 किलोमीटर नई रेल लाइनों का निर्माण कर रहा है। फिर भी, जैसे-जैसे ये विस्तृत परिवहन गलियारे, अल्ट्रा-मेगा सौर पार्क और विशाल डिजिटल नेटवर्क विस्तार पा रहे हैं, कृषि विज्ञान के नेतृत्व में एक शांत तकनीकी सहयोग भूमि की सतह के ठीक नीचे हो रहा है।

बड़े परियोजनाओं के लिए बोली लगाने वालों को अक्सर पहले से मिट्टी की खुदाई की लागत का अनुमान तैयार करना पड़ता है, भले ही पहले से कोई भूवैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध न हो। चूंकि परियोजनाओं की निविदा प्रक्रिया की समय-सीमा बहुत कम होती है, इसलिए त्वरित और विश्वसनीय मृदा संबंधी आंकड़े इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं—विशेषकर तब, जब परियोजना भारत के बाहर स्थित हो और स्थानीय भू-भाग संबंधी आंकड़ों तक पहुंच कठिन हो। इसके अलावा, बोली जीतने के बाद, परियोजना क्रियान्वयन-कर्ताओं को बार-बार आने वाली करोड़ों रुपये की समस्या का सामना करना पड़ता है: नरम मिट्टी में आसानी से खुदाई करते हुए इंजीनियरिंग दल अचानक भूमिगत चट्टान की कठोर दीवार से टकरा जाता है, या भ्रामक काली कपास मिट्टी पर बनाई गई नई सड़क में दरारें पड़ने लगती हैं और वह उखड़ने लगती है। काम रुक जाता है, मशीनरी बेकार खड़ी रहती है और परियोजना की लागत आसमान छूने लगती है। इस महत्वपूर्ण सूचना अंतराल को पाटने के लिए, नागपुर स्थित आईसीएआर–राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी) के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी प्रतिमान विकसित किया है: मृदा आसूचना-आधारित पूर्वानुमानात्मक इंजीनियरिंग। दशकों से उपलब्ध मृदा विज्ञान संबंधी आंकड़ों को उन्नत मशीन लर्निंग के साथ जोड़कर, आईसीएआर बुनियादी ढांचा योजनाकारों को जमीन में पहली फावड़ी लगने से पहले ही पृथ्वी के बारे में “एक्स-रे दृष्टि” प्रदान कर रहा है—यह सिद्ध करते हुए कि कृषि अनुसंधान खेतों से कहीं आगे राष्ट्रीय विकास का एक आधारभूत चालक है।

गति और विस्तार की अनदेखी की गई चुनौतियां

भारत में वर्तमान अवसंरचना विस्तार की अत्यधिक तीव्र गति के कारण पारंपरिक नियोजन स्वयं एक बाधा बन गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल डिजिटल फुटप्रिंट लगभग 19.35 लाख रूट किलोमीटर से बढ़कर 42.36 लाख रूट किलोमीटर से अधिक हो गया है, जो कई वर्षों में हुए व्यापक विस्तार को दर्शाता है। इसी हालिया पांच-वर्षीय अवधि में, देश ने 57,125 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया है। इसी दौरान, भारतीय रेलवे ने 33,000 से अधिक रूट किलोमीटर का विद्युतीकरण किया है, जो औसतन लगभग 6,600 किलोमीटर प्रतिवर्ष है और ब्रॉड गेज नेटवर्क के विद्युतीकरण को लगभग 99.6% तक पहुंचाता है, जिसकी दर प्रतिदिन 15 से अधिक रूट किलोमीटर के विद्युतीकरण की है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में, भारत ने अपनी प्रमुख सौर योजना के तहत 54 से 56 बड़े पैमाने के सौर पार्कों को मंजूरी दी है, जिनकी स्वीकृत क्षमता लगभग 39.5 गीगावाट है, जिससे 100 से अधिक सार्वजनिक और निजी पार्कों में कुल ग्राउंड-माउंटेड सौर क्षमता 122 गीगावाट से अधिक हो गई है।

इन विशाल कार्यों में शामिल कई सरकारी और निजी एजेंसियां—चाहे वे भूमिगत संचार लाइनों को बिछाने, विद्युत पारेषण टावर खड़े करने या विशाल सौर संरचनाओं को आधार प्रदान करने का काम कर रही हों—सटीक भूमिगत आंकड़ों पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं। फिर भी, पारंपरिक प्रारंभिक भू-तकनीकी सर्वेक्षण में काफी समय और लागत लगती है। चूँकि, परियोजनाएं इतनी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, ये महत्वपूर्ण मृदा जांच अक्सर छोड़ दी जाती हैं या सीमित कर दी जाती हैं। इसका परिणाम? अनिश्चित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), भ्रामक लागत अनुमान और बोलीदाताओं के लिए गंभीर वित्तीय जोखिम।

कृषि-अवसंरचना संबंध

आईसीएआर-एनबीएसएस एवं एलयूपी ने इस सूचना-अंतराल को एक प्रमाणित, समय-परीक्षित प्रौद्योगिकी के माध्यम से दूर किया है, जो पूरे भारत और कई अन्य देशों में काम करती है। उपग्रह रिमोट सेंसिंग और मशीन लर्निंग का उपयोग करके, आईसीएआर स्थल-विशिष्ट भू-तकनीकी मृदा गुणों, जैसे मृदा की गहराई, अंतिम वहन क्षमता (सिविल इंजीनियरिंग संरचना को सहारा देने में निर्णायक कारक), स्‍थूल घनत्व आदि का पूर्वानुमान लगाता है, जिसके लिए भूमि की धीमी, महंगी और विघटनकारी ड्रिलिंग की आवश्यकता नहीं होती।

यह पद्धति पूरी तरह स्वचालित पाइपलाइन के अंतर्गत बहु-स्रोत भू-स्थानिक इनपुट पर मशीन-लर्निंग रिग्रेशन मॉडल का उपयोग करती है। उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन मॉडल, भू-भाग की ढलान संबंधी व्युत्पन्न आंकड़ों, लिथोलॉजी और भूजल स्तर को संसाधित करके, आईसीएआर का मृदा वर्गीकरण इंजन सटीक, स्थल-विशिष्ट पूर्वानुमान तैयार करता है। यह प्रणाली मृदा की गहराई (नरम, कठोर या मिश्रित परतों की गहराई) और अन्य मापदंडों का सटीक पूर्वानुमान लगाती है। इन मापदंडों का उपयोग इंजीनियरिंग एजेंसियों द्वारा प्रारंभिक भू-तकनीकी डिजाइन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने और बोली-पूर्व लागत अनुमान के लिए सीधे किया जाता है।

पारंपरिक क्षेत्र सर्वेक्षणों की तुलना में, यह डिजिटल समाधान लागत और समय दोनों में 75% की कमी करता है। तीन सदस्यों की एक छोटी टीम प्रतिदिन लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे मार्ग को संसाधित कर सकती है, जिससे यह बड़े पैमाने पर, समयबद्ध राष्ट्रीय नियोजन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बन जाता है। भारतभर में 50,000 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में इस पूर्वानुमानात्मक दृष्टिकोण का सत्यापन करने के बाद, क्षेत्र में सत्यापित आंकड़ों के मुकाबले लगभग 80% की पूर्वानुमान सटीकता (R² मान लगातार 0.78 से अधिक) प्राप्त हुई है, यहां तक कि कम आंकड़ों वाले क्षेत्रों में भी। अब इन परिकलन विधियों (एल्गोरिदम) को मानकीकृत कर दिया गया है।

वैश्विक उपस्थिति और वाणिज्यिक विश्वसनीयता

इस प्रणाली का भारत के अत्यंत विविध भौगोलिक क्षेत्रों में कठोर क्षेत्र-परीक्षण किया गया है—उत्तराखंड और असम के हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर राजस्थान के थार मरुस्थल तथा दक्कन के पठार और सिंधु-गंगा के मैदानों तक। क्षेत्रीय आंकड़ों के आधार पर मानकीकृत की गई यह प्रौद्योगिकी अब राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है। प्रमुख सार्वजनिक और निजी अवसंरचना कंपनियां भारत और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में 2,00,000 से अधिक रूट-किलोमीटर का मानचित्रण करने के लिए इस प्रणाली को अपना चुकी हैं, जिससे आईसीएआर के अनुसंधान पारितंत्र के लिए संसाधन जुटाने के साथ-साथ बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत भी हो रही है और भारतीय कंपनियों को आगे बढ़ने तथा वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाया जा रहा है।

अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड, स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड, टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड और केईसी इंटरनेशनल लिमिटेड सहित प्रमुख वैश्विक अवसंरचना कंपनियों ने इस समाधान को अपनाया है। केईसी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी, जो 100 से अधिक देशों में पारेषण लाइनों को डिजाइन और इनका निर्माण करती है, के लिए मृदा संबंधी आंकड़े वित्तीय अस्तित्व के लिए एक महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। नींव संबंधी गतिविधियां और परियोजना जोखिम पूरी तरह से मृदा के प्रकार पर निर्भर करते हैं। ऐसे उद्योग में जहां 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व आधार पर मार्जिन में मामूली 0.1% की कमी भी 6 करोड़ रुपये के वार्षिक नुकसान में बदल जाती है, सटीक मृदा आसूचना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, नाइजर, रूस, केन्या, मोरक्को, मोल्दोवा, मैक्सिको, मलेशिया, अबू धाबी, नेपाल, बांग्लादेश और ट्यूनीशिया जैसे भौगोलिक रूप से जटिल देशों में पारेषण लाइन परियोजनाओं के लिए बोली लगाते समय, मृदा संबंधी आंकड़ों की कमी या वास्‍तविक स्थिति का निष्‍पक्ष/सही प्रतिनिधित्‍व न करने वाले आंकड़े लाभप्रदता को प्रभावित कर सकते हैं। आईसीएआर की प्रौद्योगिकी विश्वसनीय तृतीय-पक्ष सत्यापन प्रदान करती है, जो ग्राहकों या परियोजना प्रबंधकों द्वारा मृदा की स्थिति के संबंध में किए गए दावों की जांच के लिए एक निष्पक्ष सत्यापनकर्ता के रूप में कार्य करती है, जिससे बोली लगाने में विश्वास बढ़ता है। छोटी लागत वाली निविदाओं के मामले में, जहां समय या वित्तीय सीमाओं के कारण भौतिक सर्वेक्षण संभव नहीं होते, यह पूर्वानुमानात्मक आंकड़ा इस कमी को पूरा करता है।

राष्ट्रीय प्रगति की प्रेरक

इस आंकड़े और विश्लेषण की सफलता ने अवसंरचना क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को आईसीएआर की प्रौद्योगिकी को विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों में व्यापक रूप से लागू करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे इसकी उपयोगिता विद्युत पारेषण लाइनों से आगे बढ़कर रेलवे, सौर ऊर्जा प्रतिष्ठानों और भूमिगत केबलिंग तक विस्तृत हो गई है।

उन्नत मृदा विज्ञान का उपयोग करके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निर्माण गलियारों के जोखिम को कम करते हुए, कृषि अनुसंधान ने स्वयं को भारत की व्यापक आर्थिक वृद्धि के एक अपरिहार्य चालक के रूप में सिद्ध कर दिया है। यह प्रौद्योगिकी दर्शाती है कि मृदा विज्ञान में निवेश केवल देश का पेट नहीं भरता, बल्कि उसके वैश्विक भविष्य की आधारशिला भी तैयार करता है। इस सफलता के आधार पर, आईसीएआर के वैज्ञानिक अब 90 मीटर रिजॉल्यूशन वाले मृदा गहराई मानचित्र और हाल ही में इसी रिजॉल्यूशन वाले मृदा बनावट मानचित्र जैसे पूर्वानुमानात्मक डिजिटल मृदा मानचित्र भी आत्मविश्वास के साथ तैयार कर रहे हैं। ये मानचित्र निकट भविष्य में भारत को डिजिटल कृषि की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाएंगे, विशेष रूप से भारत के किसानों को भूखंड-विशिष्ट समाधान उपलब्ध कराने में।

(लेखक एम.एल. जाट कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक हैं, एन.जी. पाटिल आईसीएआर-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी), नागपुर के निदेशक हैं)

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राष्ट्रीय पोषण माह 2026 शुरू, ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी’ बना थीम

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी

2047 का विकसित भारत उन बच्चों के हाथों से बनेगा, जो अभी स्कूल की दहलीज तक भी नहीं पहुँचे हैं। स्वस्थ और सक्षम बनने की उनकी यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण नींव जीवन के पहले एक हजार दिनों में ही रखी जाती है। करोड़ों भारतीय बच्चों और माताओं के लिए इस सफर का भरोसेमंद सहारा उनके आसपास ही मौजूद है—आँगनवाड़ी।

स्कूल जाने से बहुत पहले बच्चे का वजन और लंबाई आँगनवाड़ी में मापी जाती है। वहीं उसे गरम पका भोजन और घर के बाहर की दुनिया से जुड़ने का पहला अवसर मिलता है, और गर्भवती माँ को पोषण से जुड़ी पहली सलाह भी। देशभर के लगभग 14 लाख आँगनवाड़ी केंद्र 8.9 करोड़ से अधिक बच्चों, महिलाओं और किशोरियों तक पहुँच रहे हैं, और इन्हें चलाने वाली 25.2 लाख कार्यकर्ता व सहायिकाएँ उसी समाज से आती हैं, जिसकी वे सेवा करती हैं। आँगनवाड़ी हमारे समाज से अलग कोई व्यवस्था नहीं, हमारे अपने पड़ोस का हिस्सा है।

मार्च 2018 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पोषण अभियान की शुरुआत कर इसी परिचित व्यवस्था को देशव्यापी जनआंदोलन की मजबूत नींव बनाया। तब से हर सितंबर राष्ट्रीय पोषण माह और हर मार्च पोषण पखवाड़ा पोषण का संदेश देश के कोने-कोने तक पहुँचाने का माध्यम बने हैं।

इस वर्ष 9वाँ राष्ट्रीय पोषण माह 9 सितंबर 2026 से “हमारी आँगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी” थीम के साथ शुरू हो रहा है। गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है और इस दिशा में हमारा संकल्प मजबूत है। साथ ही, इन सेवाओं का प्रभाव तब और बढ़ता है, जब समुदाय आँगनवाड़ी को अपना मानता है। प्रधानमंत्री जी ने भी कहा है कि विकसित भारत का निर्माण सबके प्रयास से होगा।

लाभार्थी से भागीदार तक

इस वर्ष सामुदायिक भागीदारी को एक व्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। आँगनवाड़ी प्रबंधन समितियाँ माता-पिता, पंचायत प्रतिनिधियों और स्वयं सहायता समूहों को केंद्र के संचालन से जोड़ती हैं। वे देख सकते हैं कि बच्चों को क्या परोसा जा रहा है, हर हकदार बच्चे तक सेवाएँ पहुँच रही हैं या नहीं, और केंद्र को बेहतर बनाने के लिए किस सहयोग की आवश्यकता है। इसे प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है—सोशल ऑडिट, जो समुदाय को अपनी आँगनवाड़ी की समीक्षा करने और सामने आने वाली बातों के आधार पर सुधार की दिशा तय करने का अवसर देता है। जिस केंद्र से बच्चों और माताओं का जीवन जुड़ा है, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने में उन्हीं परिवारों की भागीदारी सबसे स्वाभाविक है।

इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में माँ है, और उसके हाथ में पारदर्शिता का सरल माध्यम है—मेन्यू बोर्ड। हर केंद्र पर लगा यह बोर्ड गरम पके भोजन और टेक-होम राशन का दिन-वार विवरण परिवारों के सामने रखता है। जब एक माँ जानती है कि उसके बच्चे को क्या मिलना चाहिए और केंद्र के साथ संवाद कर यह सुनिश्चित करती है कि उसे तय मात्रा और गुणवत्ता के अनुसार भोजन मिले, तो पारदर्शिता रोजमर्रा की व्यवस्था बन जाती है।

पोषण माह 2026 इसी भागीदारी को जमीन पर उतारने का अवसर है। जहाँ प्रबंधन समितियाँ गठित नहीं हुई हैं, वहाँ उनका गठन किया जाएगा; जहाँ मौजूद हैं, वहाँ उनकी पहली बैठकें और सोशल ऑडिट होंगे। हर केंद्र पर मेन्यू बोर्ड लगेगा। तिथि भोज और स्वस्थ व्यंजनों के प्रदर्शन जैसे आयोजन परिवारों, पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों को आँगनवाड़ी के और करीब लाएँगे।

मेन्यू बोर्ड से आगे

आँगनवाड़ी सेवाओं की पहली कसौटी है—पौष्टिक भोजन, जो संतुलित और विविधतापूर्ण भी हो: अनाज और श्री अन्न, दालें, मेवे और बीज, दूध और दुग्ध उत्पाद, अंडा, मौसमी फल तथा हरी सब्जियाँ। इसी दिशा में जुलाई में जारी पूरक पोषण कार्यक्रम के व्यापक दिशानिर्देश, 2026 महत्वपूर्ण कदम हैं, जिनमें पहली बार गरम पके भोजन का स्वरूप स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के पोषक मानकों को और मजबूत किया गया है।

भोजन के साथ बच्चे के शुरुआती विकास और सीखने पर भी उतना ही ध्यान जरूरी है। बच्चा क्या खाता है और कैसे सीखता है—दोनों गहराई से जुड़े हैं। आँगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले तीन वर्षों में विकास के 34 पड़ावों पर नजर रखती हैं, और नवचेतना तथा आधारशिला जैसे पाठ्यक्रम बच्चे को स्कूल के लिए तैयार करते हैं।

यह यात्रा जन्म से भी पहले शुरू होती है—गर्भावस्था में माँ का पोषण बच्चे के जीवन की शुरुआत को भी प्रभावित करता है। इसी संदर्भ में इस वर्ष प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके पीछे भावना यही रही है कि किसी महिला को गर्भावस्था के दौरान अपनी आजीविका और अपने स्वास्थ्य के बीच चुनाव न करना पड़े। इन दस वर्षों में 4.65 करोड़ लाभार्थियों तक ₹21,511 करोड़ सीधे उनके बैंक खातों में पहुँचे हैं। मिशन शक्ति के तहत यह योजना अब दूसरी संतान के रूप में बेटी के जन्म पर अतिरिक्त लाभ भी देती है।

सहायता का प्रभाव तब कई गुना बढ़ जाता है, जब वह अकेले नहीं, बल्कि निरंतर परामर्श और सहयोग के साथ पहुँचती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी इसी तथ्य को रेखांकित किया है कि नकद सहायता अपना पूर्ण उद्देश्य तभी सिद्ध करती है, जब उसके साथ ऐसा परामर्श भी जुड़ा हो, जो परिवार को सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम बनाए। सर्वेक्षण में राजस्थान के “कैश प्लस” मॉडल का उल्लेख है, जिसमें नकद सहायता के साथ सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संवाद को योजना का अभिन्न अंग बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि सहायता राशि को भोजन पर व्यय करने वाली महिलाओं का अनुपात 30 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गया, और जैसे-जैसे पति तथा परिवार के अन्य सदस्य इस संवाद से जुड़ते गए, मातृ पोषण से जुड़ी भ्रांतियाँ भी दूर होती गईं। शिशु का पोषण केवल माँ की जिम्मेदारी नहीं—इसमें परिवार, समुदाय और व्यवस्था, सभी की भूमिका है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का सम्मान

इस पूरे प्रयास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आँगनवाड़ी कार्यकर्ता है। सामुदायिक भागीदारी का उद्देश्य उसका दायित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे सहयोग और सम्मान देना है। स्थानीय परिवारों की जो समझ और भरोसा उन्होंने वर्षों में बनाया है, वह इस व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। जब कार्यकर्ता के साथ समुदाय खड़ा होता है, तो आँगनवाड़ी की ताकत कई गुना बढ़ जाती है।

इस सितंबर, मैं हर नागरिक से अपील करती हूँ कि वह अपने क्षेत्र की कम से कम एक आँगनवाड़ी अवश्य जाए। कार्यकर्ता से बात कीजिए, मेन्यू बोर्ड पढ़िए, बच्चों को मिल रही सेवाओं के बारे में जानिए—और सबसे महत्वपूर्ण, पूछिए कि आप क्या सहयोग कर सकते हैं।

इस सितंबर जिन बच्चों का वजन आँगनवाड़ी केंद्रों में लिया जा रहा है, वे 2047 में लगभग बीस-पच्चीस वर्ष के होंगे। वे जिस स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और क्षमता के साथ देश के विकास में योगदान देंगे, उसकी नींव आज रखी जा रही है। जब हर समुदाय अपनी आँगनवाड़ी को अपनी ज़िम्मेदारी मानकर उसके साथ खड़ा होता है, तब हर बच्चे का भविष्य और मजबूत होता है।

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(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

संवाद से परिणाम तक: आसियान-भारत कृषि सहयोग के तीन दशकों को किसानों की समृद्धि में बदलना

एम. एल. जाट और नवीन पी. सिंह

जब भारत और आसियान के 11 सदस्य देशों के अधिकारी और मंत्री नई दिल्ली में दो दिवसीय बैठक के लिए एकत्र हो रहे हैं, तो इस साझेदारी का वास्तविक सार किसी साझा विज्ञप्ति में नहीं, बल्कि 1992 से लगातार विकसित किए गए अनुसंधान, प्रशिक्षण और ज़मीनी स्तर के कार्यक्रमों में निहित है।

नई दिल्ली में 9 सितंबर को आयोजित होने वाली कृषि एवं वानिकी पर 9वीं आसियान-भारत मंत्रिस्तरीय बैठक (AIMMAF) एक स्थापित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी: मंत्रियों के विचारार्थ तकनीकी सिफारिशों पर चर्चा और उन्हें अंतिम रूप देने के लिए कृषि एवं वानिकी पर 10वां आसियान-भारत कार्य समूह (AIWGAF) एक दिन पहले बैठक करेगा। हालांकि यह एक औपचारिक प्रक्रिया या 1992 में भारत-आसियान क्षेत्रीय संवाद शुरू होने के बाद से विकसित तंत्र का एक सामान्य दौर लग सकता है, लेकिन औपचारिकताओं से परे जाकर यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस संस्थागत साझेदारी ने तीन दशकों में क्या हासिल किया है। इसलिए, यह बैठक न केवल प्रगति की समीक्षा करने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि इस दीर्घकालिक सहयोग को पूरे क्षेत्र के किसानों की समृद्धि, आजीविका और खाद्य प्रणालियों के लिए अधिक ठोस परिणामों में बदलने का भी अवसर देती है।

साझा कृषि वास्तविकताएं, साझा अवसर

भारत और ग्यारह आसियान सदस्य देश—जिनमें अक्टूबर 2025 में शामिल हुआ नया सदस्य तिमोर-लेस्ते भी शामिल है, अपार कृषि विविधता और विकास क्षमता वाले क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। आसियान के कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन क्षेत्र लगभग 93 मिलियन नौकरियों को सहारा देते हैं, जबकि भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्र लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल को रोज़गार प्रदान करते हैं।

दोनों ही क्षेत्रों में खेत मुख्य रूप से छोटे और खंडित हैं, उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है, तथा दोनों क्षेत्रों में एक जैसी फसलें और ईकोसिस्टम सीमाओं के पार फैले हुए हैं। इनमें धान, दालें, फल और मसालों से लेकर पशुधन, मत्स्पालन, मैंग्रोव और वन तक शामिल हैं। दोनों क्षेत्र जलवायु परिवर्तनशीलता, सीमा पार से आने वाले कीट-रोगों और कटाई के बाद होने वाले निरंतर नुकसान के बढ़ते दबाव का भी सामना कर रहे हैं।

यह समानताएं कृषि ज्ञान और प्रौद्योगिकियों को परस्पर साझा करने के लिए बेहद अनुकूल बनाती हैं, जिससे ‘भारत-आसियान मध्यम अवधि कार्य योजना 2026–2030’ के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है। यह योजना आसियान की नई ‘खाद्य, कृषि और वानिकी क्षेत्रीय योजना 2026–2030’ और इसके छह रणनीतिक स्तंभों-स्थिरता, डीकार्बोनाइजेशन, खाद्य सुरक्षा, व्यापार कनेक्टिविटी, डिजिटल नवाचार और सतत वन प्रबंधन-के अनुरूप है।

भारत का कृषि ज्ञान और तकनीकी आधार

इस साझेदारी में भारत का योगदान दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वित्तपोषित कृषि अनुसंधान और विस्तार प्रणालियों में से एक पर आधारित है। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत 114 अनुसंधान संस्थान तथा ब्यूरो, 80 कृषि विश्वविद्यालय और 731 जिला-स्तरीय विस्तार केंद्र (कृषि विज्ञान केंद्र) शामिल हैं। पिछले 12 वर्षों में इस नेटवर्क ने फसलों की 3,800 से अधिक किस्में जारी की हैं, जिनमें से लगभग 3,100 विशेष रूप से जलवायु अनुकूलता के लिए और लगभग 200 बेहतर पोषण गुणों के साथ विकसित की गई हैं। इसे एक राष्ट्रीय जीन बैंक का भी समर्थन प्राप्त है, जिसमें करीब 4,70,000 प्रविष्टियां (accessions) संरक्षित हैं।

भारत के कृषि रूपांतरण का पैमाना उसके उत्पादन में हुई वृद्धि में दिखता है। खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के लगभग 25.2 करोड़ टन से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 37.7 करोड़ टन हो गया है, जबकि इसी अवधि में दूध उत्पादन करीब 14.6 करोड़ टन से बढ़कर लगभग 24.8 करोड़ टन तक पहुंच गया है। मत्स्पालन में, उत्पादन पिछले दशक में लगभग दोगुना होकर करीब 2 करोड़ टन हो गया है, जो अनुमानित 3 करोड़ आजीविकाओं को सहारा दे रहा है; साथ ही 49 फिनफिश और शेलफिश प्रजातियों के लिए कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की गई हैं।

यही वह विशेषज्ञता है जिसे भारत इस साझेदारी में लाता है-किसी श्रेष्ठता के दावे के रूप में नहीं, बल्कि उन कृषि-पारिस्थितिक स्थितियों द्वारा गढ़े गए एक ठोस संसाधन आधार के रूप में, जो दक्षिण पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों से काफी मेल खाते हैं।

व्यावहारिक धरातल पर क्या है यह सहयोग

अनुसंधान अवसंरचना से परे, इस साझेदारी का अधिक ठोस योगदान मानव पूंजी के निर्माण और ज़मीनी स्तर के विस्तार को मजबूत करने में रहा है। आसियान-भारत फैलोशिप कार्यक्रम सदस्य देशों के छात्रों को प्रमुख भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जिससे वे क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के रूप में पहचाने गए क्षेत्रों में अनुसंधान और विशेषज्ञता से परिचित होते हैं।

भारत की अपनी विस्तार पहल भी यह दर्शाती हैं कि इस तरह के सहयोग को किस बड़े पैमाने पर व्यवहार में लाया जा सकता है। विकसित कृषि संकल्प अभियान 13.5 लाख से अधिक किसानों तक पहुंचा और अनुसंधान एवं नीतिगत ध्यान के लिए 500 से अधिक प्राथमिकता वाले मुद्दों की पहचान की। एक संबंधित आउटरीच पहल ने 728 जिलों में 1,34,000 से अधिक कार्यक्रम चलाए, 6,650 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए और 1,00,000 से अधिक फील्ड प्रदर्शन किए, जबकि इसका डिजिटल प्रसार लगभग 5 करोड़ हितधारकों तक पहुंचा।

ये घरेलू अनुभव आसियान के लिए केवल अपने बड़े पैमाने के कारण ही प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी हैं क्योंकि ये अपेक्षाकृत कम लागत वाले और व्यापक पहुंच वाले विस्तार मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें इस क्षेत्र के छोटे किसानों की कृषि प्रणालियों के अनुसार ढाला जा सकता है। अवसर इस बात में है कि मंत्रालयों और शोध संस्थानों के बीच केवल औपचारिक आदान-प्रदान से आगे बढ़कर ऐसे तंत्र बनाए जाएं जो ज्ञान, तकनीक और प्रशिक्षण को सीधे किसानों से जोड़ें-और यह केवल व्यापार उपकरणों के बजाय संस्थागत सहयोग के माध्यम से हो।

साझेदारी में अभी कहां काम बाकी है: अनुसंधान से ज़मीनी प्रभाव तक

एक ईमानदार आकलन यह है कि यह सहयोग अभी भी काफी हद तक अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और मंत्रालयों तक ही सीमित है। सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय विस्तार नेटवर्कों तक इसकी पहुंच तुलनात्मक रूप से सीमित है, जो इसके लाभों को व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत खेतों तक पहुंचा सकते हैं।

सात विषयगत क्षेत्र वर्तमान में इस तकनीकी सहयोग का आधार हैं: खाद्य और पोषण सुरक्षा; सतत वानिकी और मैंग्रोव प्रबंधन; पुनर्योजी (regenerative) एवं जलवायु-अनुकूल कृषि; पशुधन, डेयरी और पशु स्वास्थ्य; मत्स्यपालन और नीली अर्थव्यवस्था; कटाई उपरांत प्रबंधन और मूल्य श्रृंखलाएं; तथा डिजिटल कृषि। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र गहरे जुड़ाव के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करता है।

अगला कदम एक मजबूत संस्थागत अनुवर्ती कार्रवाई होना चाहिए: आसियान की परिस्थितियों में तनाव-सहनशील फसल किस्मों के बहु-स्थानिक परीक्षण, कीट-निगरानी के व्यावहारिक संयुक्त प्रोटोकॉल, और कटाई के बाद के नुकसान को मापने के लिए समान पद्धतियां, जिससे देशों के बीच सार्थक तुलना संभव हो सके। मत्स्य और वानिकी समुदाय, जिनकी आजीविका इन क्षेत्रों के निर्णयों से सीधे प्रभावित होती है, विशेष रूप से ऐसे सहयोग से लाभान्वित होंगे जो केवल अनुसंधान विनिमय से आगे बढ़कर व्यावहारिक और ज़मीनी स्तर की सहायता तक पहुंचे।

साझेदारी का आकलन घोषणाओं से नहीं, परिणामों से हो

इसलिए 9वीं AIMMAF का मूल्यांकन उसके संयुक्त बयान की भाषा से नहीं, बल्कि बैठक के बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। वास्तविक और कड़ी परीक्षा-विशेषकर भारत और आसियान में कृषि के विशाल पैमाने को देखते हुए-यह है कि क्या यह सहयोग 2026–2030 की कार्य योजना के दौरान मापने योग्य परिणाम देता है या नहीं।

इसका अर्थ कुछ ठोस प्रश्न पूछना है: आसियान की परिस्थितियों में भारत की कितनी फसल किस्मों का परीक्षण और उन्हें अपनाया गया? आसियान फैलोशिप से निकले कितने छात्र अपने राष्ट्रीय कृषि तंत्र को मजबूत करने के लिए वापस लौटे? क्या संयुक्त कीट-निगरानी और कटाई उपरांत प्रोटोकॉल सहमत रूपरेखाओं से आगे बढ़कर नियमित व्यवहार में आए? और क्या भारत के सिद्ध विस्तार मॉडलों को आसियान के छोटे किसानों की अर्थव्यवस्था के अनुसार सार्थक रूप से ढाला गया?

ये परिणाम इस सप्ताह नई दिल्ली में तुरंत दिखाई नहीं देंगे। ये समय के साथ खेतों, प्रयोगशालाओं, संस्थानों और अंततः 10वीं AIMMAF में प्रस्तुत साक्ष्यों में उभरेंगे। वहीं इस साझेदारी की वास्तविक सफलता का आकलन किया जाना चाहिए: भारत और आसियान भर के किसानों और ग्रामीण समुदायों की आजीविका, लचीलेपन, उत्पादकता और आय में।

(लेखक क्रमशः सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) तथा महानिदेशक, ICAR और सहायक महानिदेशक (अंतर्राष्ट्रीय संबंध), नई दिल्ली हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)

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भारत की 7.8% विकास दर पर सवाल और जवाब: आर्थिक मजबूती के पीछे क्या है?

डॉ. सौरभ गर्ग और डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन

अभिषेक आनंद, जोश फेल्मन और अरविंद सुब्रमण्यन ने यह पूछा है कि जिस तिमाही में ऊर्जा के क्षेत्र में जोरदार झटके लगे हों, उसमें भारत की विकास दर आखिर 7.8 प्रतिशत कैसे हो सकती है। बेशक, यह एक उचित सवाल है। इसका एक जवाब भी है और वह जवाब पिछले कुछ वर्षों से सबके सामने ही है। 

समय से ही शुरुआत करते हैं। इस तिमाही की अवधि अप्रैल से जून 2026 तक थी। इससे ठीक पहले ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इजराइल के बीच का संघर्ष चरम पर पहुंच गया था। तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया और भारत ने इसका असर महसूस किया। हालांकि मार्च और अप्रैल के शुरुआती दिनों में इस जबरदस्त व्यवधान में कमी आई। मई आते-आते दबाव के बदल छंट गए। जून तक, मुश्किल दौर बीत चुका था। तीन महीने वाली तिमाही की शुरुआत के कुछ मुश्किल हफ्ते उस तिमाही के आंकड़ों को मनगढ़ंत नहीं बना देते।

उन महीनों के सबूत एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। ऑटोमोबाइल की बिक्री में निरंतर बढ़ोतरी हुई। एक प्रतिस्पर्धी मुद्रा की मदद से बैंक ऋण और निर्यात में बढ़ोतरी हुई। जीएसटी की दरों में कटौती के बावजूद, इसका संग्रह मजबूत बना रहा और हाल ही समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में इसमें 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2025-26 तक के तीन वर्षों में, जीएसटी के सकल संग्रह में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ‘नॉमिनल जीडीपी’ में 31.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये दोनों आंकड़े बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं और दोनों ही लगभग एक-दूसरे से मेल खाते हैं। जीएसटी रिटर्न कंपनियां दाखिल करती हैं। ऋण संबंधी आंकड़े बैंकों से आते हैं। व्यापार के आंकड़े  बंदरगाहों से आते हैं। इनमें से कोई भी आंकड़ा सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा तैयार नहीं किया जाता है।

अर्थव्यवस्था आखिर टिकी क्यों रही? क्योंकि कई सुधारों को एक साथ अपनाया गया। वर्ष 2022-23 के बाद से केन्द्र सरकार का पूंजीगत व्यय 65 प्रतिशत बढ़ा है और इस वर्ष इसमें 11.5 प्रतिशत और बढ़ोतरी का बजट रखा गया है। एक दशक में बनाई गई सड़कें, बंदरगाहें और बिजली संयंत्र तेल के महंगे होने पर ठप्प नहीं पड़े। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने अनौपचारिक गतिविधियों के एक बड़े हिस्से को औपचारिक बनाया और उन्हें मापी जा सकने वाली अर्थव्यवस्था में शामिल किया है। दिवाला संहिता ने डूबे हुए कर्ज (बैड डेट) से निपटने के बैंकों और कंपनियों के तौर-तरीकों को बदल दिया। रियल एस्टेट कानून ने उस सेक्टर को साफ-सुथरा बनाया, जो कभी अटकी हुई परियोजनाओं और पैसे के अपारदर्शी लेन-देन के लिए जाना जाता था। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 2023 में उस सफाई अभियान का उल्लेख किया था। उसने नई दिल्ली पर कोई मेहरबानी नहीं की थी।

इसके बाद, तेल की कीमतों में अचानक आए उछाल से निपटने के लिए सरकार ने जो कुछ किया, वह भी सामने है। उसने कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ आम परिवारों और कंपनियों पर नहीं डाला। उसने इसकी लागत खुद वहन की। राजकोषीय गुंजाइश (फिस्कल स्पेस) का उद्देश्य ही यही है और भारत ने इसे तैयार किया है। इसका सबूत 2 सितंबर को मिला। जापान की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दिया और इसके साथ ही स्थिर संभावना भी जताई। इसके अलावा, देश की रेटिंग सीमा (कंट्री सीलिंग) को भी ए कर दिया। भारत को तीन दशकों से अधिक समय से ‘ए’ रेटिंग नहीं मिली है। एजेंसी ने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, जीएसटी, दिवाला संहिता और सकल गैर-निष्पादित ऋण अनुपात (ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग लोन रेश्यो) के 1.8 प्रतिशत तक कम होने का उल्लेख किया। उसने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार ने उच्च पूंजीगत व्यय को जारी रखते हुए भी अपने राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2025 में जीडीपी  के 4.7 प्रतिशत से घटाकर वित्तीय 2026 में 4.4 प्रतिशत कर लिया। टोक्यो स्थित एक रेटिंग समिति के लिए दिल्ली में किसी को खुश करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने भी उन्हीं सुधारों को देखा और वही नतीजा निकाला।

अब आलोचना के मुख्य बिंदु पर आते हैं। लेखकगण पूछते हैं कि अगर आज ये संकेतक 7.8 प्रतिशत की विकास दर को सही ठहराते हैं, तो पूर्व के वर्षों में वैसी ही विकास दर कमजोर संकेतकों के साथ क्यों संभव हुई थी? यह मान लेना कि विकास हमेशा एक जैसी चीजों से ही संभव होती है, जरूरी नहीं है। निर्यात और औपचारिक ऋण से प्रेरित तिमाही, घरेलू खर्च या सरकारी निवेश से चलने वाले वर्ष जैसी नहीं होगी। पूर्व के वर्षों में विकास के अपने कारण थे, जो उस समय साफ दिख रहे थे। वर्ष 2024-25 तक, शेयर बाजार तेजी से चढ़ा और अधिक संख्या में भारतीयों ने निवेश करना शुरू किया। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के बीच परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। गैर-बैंक और तकनीक-आधारित ऋणदाता तेजी से बढ़े। वाणिज्यिक क्षेत्र में कुल संसाधनों का प्रवाह तीन वर्षों में 72 प्रतिशत बढ़ा, जिसमें गैर-बैंकों की  हिस्सेदारी 96 प्रतिशत बढ़ी। ये असली कारण थे। बस, वे अलग थे।

मार्च 2023 से मार्च 2026 के बीच सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को दिए गए बकाया ऋण में 66.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुलाई 2026 में भी यह बढ़ोतरी लगभग 25 प्रतिशत की दर से जारी थी। ऐसा कहा जाता है कि ऊर्जा की कीमतों में अचानक उछाल से छोटी कंपनियों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। लेकिन उन्हें ऋण देने वाले इस बात से सहमत नहीं दिखते। ऋणदाता आम तौर पर उन कंपनियों को ऋण नहीं देते, जिनके असफल होने की आशंका होती है।

लेखकों के तर्क की तह में यह बात छिपी है कि सांख्यिकी मंत्रालय का काम सरकार की छवि को बेहतर दिखाना है। लेकिन आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते। वर्ष 2023-24 के लिए, मंत्रालय ने विकास दर के अनुमान को 9.2 प्रतिशत (पुरानी श्रृंखला के तहत) से घटाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया था। यानी, उन्होंने खुद ही लगभग दो प्रतिशत अंक कम कर दिए। अन्य आरोपों के मामले में भी गणित खिलाफ जाता है।

वर्ष 2024-25 में, नई श्रृंखला के तहत नॉमिनल जीडीपी की विकास दर पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम रही – 9.8 प्रतिशत  के मुकाबले 9.4 प्रतिशत  – जबकि असल विकास बढ़ी। नॉमिनल जीडीपी  सरकार के राजकोषीय लक्ष्यों का आधार होती है। सरकार सबसे ज़्यादा इसी आंकड़े को ऊंचा रखना चाहती है। अगर कोई मंत्रालय आंकड़ों में हेरफेर करता है, तो वह ऐसा अपनी कीमत पर नहीं करता। वर्ष 2024-25 और 2025-26 को मिलाकर देखें, तो नई श्रृंखला के तहत औसत असल विकास दर 7.0 प्रतिशत से बढ़कर 7.5 प्रतिशत हो जाती है। यह आधा प्रतिशत अंक अधिक है। अगर तीन वर्षों – 2023-24 से 2025-26 – को लें, तो नई में औसत ग्रोथ पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम है – 7.7 प्रतिशत  के मुकाबले 7.4 प्रतिशत।

लेखकगण अपनी बात एक कहावत के साथ खत्म करते हैं। वे लिखते हैं कि जो नियम आज लागू होता है, वही नियम पहले भी लागू होना चाहिए। यह सिद्धांत सही है। हमारी बस यही मांग है कि इसे पूरी तरह से लागू किया जाए। पिछले सालों के आंकड़े भी मौजूद हैं: जैसे घरेलू बचत, क्रेडिट में बढ़ोतरी, संसाधनों का प्रवाह, करों से होने वाली कमाई और निवेशकों का बढ़ता दायरा। अगर आप कुछ ही संकेतकों को देखें, तो पिछला समय कमजोर लग सकता है। लेकिन अगर आप सभी संकेतकों पर गौर करें, तो ऐसा नहीं लगता।

भारत ने एक बड़े झटके का सामना किया और आगे बढ़ता रहा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि उसने एक दशक में अपनी क्षमता बढ़ाई थी और वित्तीय मजबूती हासिल की थी। यह एक ठोस नतीजा है, न कि कोई बनावटी बात।

(लेखक सौरभ गर्ग, सचिव, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, वी. अनंत नागेश्वरन भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार)

शिक्षक सिर्फ पढ़ाते नहीं, भविष्य गढ़ते हैं: शिक्षा में बदलती भूमिका और बढ़ती जिम्मेदारी

शिक्षक: शिक्षा के कलाकार : जयंत चौधरी

किसी को भी पहली बार पढ़ना सीखने का सटीक दिन याद नहीं होता। लेकिन लगभग हर व्यक्ति उन शिक्षकों को जरूर याद रखता है, जिन्होंने उसे पढ़ाया होता है। भूल जाने वाले पल और कभी न भुलाए जाने वाले व्यक्ति के बीच का यही अंतर हमें शिक्षण कार्य के बारे में कुछ बेहद जरूरी बातें बता जाता है। एक शिक्षक अपने पीछे ऐसी चीजें छोड़ जाता है, जिन्हें आसानी से आंक पाना संभव नहीं होता: कोशिश करने का आत्मविश्वास, डटे रहने का अनुशासन, सवाल पूछने की जिज्ञासा, या कभी-कभी मात्र यह भरोसा कि इंसान और भी बहुत कुछ कर सकता है। इसलिए, शिक्षण को एक कला से कम कुछ भी नहीं माना जा सकता।

भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा हर वर्ष प्रदान किए जाने वाले ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ वास्तव में उन चुनिंदा लोगों के प्रति सम्मान होते हैं, जिनका योगदान दूसरों से कहीं बढ़कर रहा होता है। इन सबके अलावा, देश के हर कोने में – चाहे वह कक्षा हो या कौशल संबंधी प्रयोगशाला या पॉलिटेक्निक या खेल का मैदान या फिर संगीत कक्ष – विद्यार्थीगण धन्यवाद कहने का अपना-अपना तरीका ढूंढ ही लेते हैं। कभी हाथ से लिखी हुई एक टिप्पणी। कभी सुबह की सभा में आभार जताने का एक पल। कभी एक ऐसी खामोश सराहना जो दिन खत्म होने के काफी देर बाद तक शिक्षक के मन में बसी रहती है। ये कोई कमतर उत्सव नहीं हैं, बल्कि कई मायनों में ये सबसे सच्चे उत्सव हैं।

हालांकि, आंकड़े हमें एक और चिंताजनक कहानी बताते हैं। ओईसीडी का 2026 का ‘टीचर नॉलेज सर्वे’ किसी विषय की जानकारी होने और उसे पढ़ा पाने की क्षमता के बीच के अंतर की ओर इशारा करता है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से पता चलता है कि विषय का ज्ञान हमेशा कारगर शिक्षण-पद्धति में नहीं बदलता। बात बिल्कुल सरल, लेकिन बेहद जरूरी है: किसी चीज को गहराई से जानना और किसी दूसरे व्यक्ति को उसे सीखने में मदद करना – ये दोनों अलग-अलग कौशल  हैं। शिक्षण एक कला है और इसके लिए मानवीय रिश्तों एवं पढ़ाने के तरीकों की समझ के साथ-साथ कक्षा में थोड़ी नाटकीयता की भी जरूरत होती है।

यूनेस्को की ‘शिक्षकों से संबंधित वैश्विक रिपोर्ट 2024’ में इस पेशे की उपेक्षा  करने की कीमत को आंकड़ों में दर्शाया गया है। दुनिया को 2030 तक 44 मिलियन अतिरिक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की जरूरत होगी। और, इनमें से आधे से अधिक की जरूरत केवल उन शिक्षकों की जगह लेने के लिए होगी जो नौकरी छोड़ रहे हैं। वहीं, मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीच्यूट का अनुमान है कि स्वचालन (ऑटोमेशन) के कारण 2030 तक दुनिया भर में 75 मिलियन से 375 मिलियन कामगारों को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थिति में, योग्य शिक्षकों की अहमियत पहले से कहीं अधिक होगी।

भारत ने इस चुनौती को समय रहते भांप लिया है और इससे पूरी गंभीरता से निपटने की दिशा में कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत शुरू किए गए चार-वर्षीय ‘एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम’ में विषयगत   निपुणता तथा शिक्षण-पद्धति को एक ही स्नातक कि डिग्री में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण के पेशे की ओर आकर्षित करना है। सेवा में कार्यरत शिक्षकों के बीच एक जैसे मानक सुनिश्चित करने हेतु, ‘शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय पेशेवर मानक (एनपीएसटी)’ के तहत करियर में तरक्की को मात्र वरिष्ठता के बजाय, पढ़ाने की असल गुणवत्ता से जोड़ा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का लाभ उठाने हेतु, ‘नेशनल मिशन फॉर मेंटरिंग (एनएमएम)’ शिक्षकों को अलग-अलग क्षेत्रों के मार्गदर्शकों (मेंटर) से सीखने के लिए व्यवस्थित सहायता प्रदान करता है। मैंने भी इस मिशन के लिए एक मेंटर के तौर पर पंजीकरण कराया है। माननीय प्रधानमंत्री हर वर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं से न केवल बधाई देने के लिए, बल्कि उनकी बातें सुनने, जमीनी स्तर की उनकी कहानियां जानने और उनसे एक ऐसा दृष्टिकोण साझा करने के लिए भी मिलते हैं जो केवल अनुभवी नेतृत्व से ही प्राप्त हो सकता है। शिक्षण एक रचनात्मक काम है और अलग-अलग क्षेत्रों से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया इस रचनात्मकता को नयापन प्रदान करती है।

भारत में ‘शिक्षक’ किसे माना जाए, इसका दायरा भी बढ़ाया जा रहा है और शायद यह सबसे अनूठा विचार है। ‘समाज में सभी के लिए आजीवन सीखने की समझ (उल्लास)’ यानी ‘न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम’ इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर व्यक्ति को पढ़ा सकता है। इस वर्ष जब हम ‘अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मना रहे हैं, तो इस कार्यक्रम के तहत नौ राज्यों एवं केन्द्र-शासित प्रदेशों को पूरी तरह साक्षर घोषित किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के ‘विद्यांजलि’ पोर्टल में भी यही भावना दिखाई देती है। यह पोर्टल 8.75 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों को ऐसे वॉलंटियरों से जोड़ता है जो एक उपहार के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं – चाहे वह नृत्य से संबंधित हो या गणित से या सार्वजनिक भाषण या फिर शिल्प से – को कक्षाओं में प्रदर्शित करते हैं। हर वॉलंटियर एक शिक्षक की भूमिका निभाता है। ये वॉलंटियर जो भी विषय पढ़ाते हैं, उसे बराबर का महत्व दिया जाता है। क्योंकि वास्तव में, शिक्षण कोई तकनीकी काम नहीं बल्कि एक कला है। हर अध्याय को पढ़ाने की योजना एक रचना जैसी होती है। हर व्याख्या एक प्रदर्शन सरीखी होती है। 

कोई भी कला किसी भी कलाकार में भेद नहीं करती। इसलिए हमारे मन में ऊंच-नीच की जो भी धारणा है, उसे परख कर खत्म करना जरूरी है। कभी-कभी संगीत  शिक्षक या शारीरिक शिक्षा के शिक्षक को पूरक और व्यावसायिक शिक्षा के  प्रशिक्षक को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर देखा जाता। यह वर्गीकरण न केवल  अनुचित है, बल्कि पूरी तरह गलत भी है। परीक्षा का दबाव बढ़ने पर संगीत या व्यायाम मन को शांत कर सकते हैं, जिससे तैयारी में मदद मिलती है। भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकोनॉमी) के साथ, अनेक कला रूप विद्यार्थियों को आधुनिक दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक के लिए तैयार करेंगे। जैसे-जैसे खेल विश्वविद्यालय आकार ले रहे हैं और राष्ट्रीय खेल अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहे हैं, खेल प्रशिक्षक तथा शारीरिक शिक्षा के शिक्षक एक विश्वसनीय करियर के द्वार खोलेंगे। सटीक मैन्यूफैक्चरिंग सिखा रहे आईटीआई के प्रशिक्षक, ऐसे कौशल विकसित कर रहे हैं जो पुलों के निर्माण और अस्पतालों को सुदृढ़  बनाने में सहायक हैं। यही राष्ट्र निर्माण का एक दूसरा स्वरूप है।

आज के दौर में जब मशीनें लगभग हर उस काम को करने में सक्षम हो रही हैं जिसका पहले से अनुमान लगाया जा सकता है, तब भी एक काम ऐसा है जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता – और वह है शिक्षक का काम: एक ऐसा शिक्षक जो एक विद्यार्थी में ऐसी क्षमता देख लेता है जिसे खुद विद्यार्थी अभी नहीं देख पा रहा होता है। इस काम का कोई एल्गोरिदम नहीं है। यह स्कूल की घंटी बजने पर खत्म नहीं होता। और यह देश भर के हर तरह के संस्थान में, हर विषय के हर शिक्षक से जुड़ा है। 

एक लैटिन कहावत इस तथ्य को सटीक ढंग से रेखांकित करती है: नॉन स्कोलाए सेड विताए डिस्सिमस (Non scholae sed vitae discimus)। हम स्कूल के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए सीखते हैं।

और इंसानी संभावनाओं का सच्चा कलाकार माना जाने वाला एक शिक्षक ही वही व्यक्ति है, जो इसे संभव बनाता है।

(लेखक केन्द्रीय शिक्षा तथा कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्यमंत्री हैं।)

भारतीय नवाचार का वास्तविक हृदयस्थल: अनुसंधान प्रयोगशालाओं से ‘विकसित भारत’ की कक्षाओं तक

– डॉ. सुकांत मजूमदार

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उत्कृष्टता की पहचान नहीं हैं; ये हमारे देश के भविष्य को आकार देने वाले प्रमुख शिल्पकारों का सम्मान करते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न के मार्गदर्शन में तथा  ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में भारत की सामूहिक यात्रा में, नवाचार को अक्सर वैश्विक सूचकांक और वित्तीय खर्च जैसे तकनीकी नजरिए से देखा जाता है। फिर भी, नवाचार मूल रूप से एक मानवीय प्रयास है — यह छात्र की आँखों में जिज्ञासा की चमक और उस शिक्षक का अटूट समर्पण है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी बच्चा पीछे न छूट जाए।   

भारत में शिक्षा के मौजूदा विकास की सबसे खास बात यह है कि उच्च-स्तरीय प्रयोगशाला अनुसंधान और कक्षा की रोज़मर्रा की हकीकत के बीच सोच-समझकर एक पुल बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत, नवाचार की परिकल्पना सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने वाले एक उत्प्रेरक के तौर पर की गयी है। यह विज़न इस बात पर ज़ोर देता है कि देश की वास्तविक प्रगति तभी हो सकती है, जब हमारे  सबसे बेहतरीन शोध का फ़ायदा आखिरी कतार में बैठे आखिरी बच्चे तक पहुँचे। 

इस बड़े बदलाव के पैमाने को समझने के लिए, सबसे पहले भारत के राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम में व्यापक स्तर पर हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों को देखना होगा।

व्यापक नवाचार क्रांति: वैश्विक ऊँचाइयों को छूना

इक्कीसवीं सदी में अपनी संप्रभुता और आर्थिक नेतृत्व को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे देश के लिए, एक मज़बूत अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) इकोसिस्टम बहुत जरूरी है। भारत में एक मौलिक बदलाव आया है; देश अब मुख्य रूप से वैश्विक तकनीक को अपनाने के बजाय, वैश्विक चुनौतियों के लिए समाधान विकसित करने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। यह बदलाव वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बढ़ती रैंकिंग में प्रतिबिंबित होता है, जहाँ देश 2014 के 76वें स्थान से ऊपर उठकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुँच गया है।

हालाँकि, असली कहानी भारत की कार्यक्षमता में छिपी है। नवाचार इनपुट के 52वें स्थान की तुलना में, भारत नवाचार आउटपुट में अब दुनिया भर में 32वें स्थान पर है। यह दिखाता है कि देश में नवाचार इनपुट को बड़े प्रभाव वाले नतीजों में बदलने की क्षमता, कई दूसरे देशों के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर है। इस संस्कृति को 6,000 से ज़्यादा उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में आर एंड डी प्रकोष्ठ बनाकर और 59,300 अनुसंधान सहयोग स्थापित करके संस्थागत रूप दिया गया है।

प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप (पीएमआरएफ) द्वारा समर्थित भारत का प्रतिभा समूह भी अनुसंधान इकोसिस्टम के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है। पीएमआरएफ ने 3,688 विद्वानों का समर्थन किया है, जिसके परिणामस्वरूप 10,300 शैक्षिक पत्रिका प्रकाशन, 7,966 सम्मेलन पत्र, 834 पेटेंट दाखिले और 221 पेटेंट स्वीकृत हुए हैं। पीएमआरएफ 2.0 10,000 फ़ेलोशिप का समर्थन करने के लिए तैयार है, और प्रधानमंत्री अनुसंधान प्रभाग (पीएमआरसी) को पहले ही 3,600 से अधिक फ़ेलोशिप आवेदन प्राप्त हो चुके हैं, इस प्रकार भारत की बौद्धिक अवसंरचना का विस्तार जारी है। इसे उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (एचईएफए) ने और बढ़ावा दिया है, जिसने 111 संस्थानों में 281 परियोजनाओं के लिए ₹47,000 करोड़ से अधिक की मंजूरी दी है।

“भारत में एआई निर्माण” के विज़न को आगे बढ़ाने के लिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चार समर्पित उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें ₹1,490 करोड़ का संचयी निवेश किया जाएगा:

• स्वास्थ्य सेवा: आईआईएससी बेंगलुरु

• स्थायी शहर: आईआईटी कानपुर

• कृषि: आईआईटी रोपड़

• शिक्षा: आईआईटी मद्रास

जहां यह अवसंरचना भारत की प्रगति का आधार प्रदान करती है, वहीं ज्ञान का लोकतंत्रीकरण इसे जीवंत बनाता है।

ज्ञान को सबके लिए सुलभ बनाना: पहुँच और बौद्धिक संपदा

यह सुनिश्चित करने के लिए कि दूर-दराज़ के गाँव का कोई महत्वाकांक्षी शोधार्थी भी बड़े शहर के शोधार्थी जितने ही मौकों का फ़ायदा उठा सके, भारत ने अतीत में ज्ञान तक सीमित पहुँच वाली व्यवस्थाओं को खत्म करने की कोशिश की है। ‘एक राष्ट्र, एक सदस्यता’ (ओएनओएस) पहल शैक्षिक समानता के लिए एक अहम साधन है, जो 1.8 करोड़ छात्रों और संकाय सदस्यों को 13,000 अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक पत्रिकाओं तक पहुँच प्रदान करती है।

इसकी रफ़्तार भी उतनी ही अहम है। 2025 के 11.4 करोड़ संपूर्ण-पाठ डाउनलोड के बाद, 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही 6.26 करोड़ लेखों तक पहुँचा गया है। यह ज्ञान के प्रति उत्सुक देश की नब्ज़ को दर्शाता है।

ज्ञान तक पहुँच का यह विस्तार भारत के बौद्धिक संपदा इकोसिस्टम में आए बड़े बदलाव के साथ-साथ हुआ है। घरेलू पेटेंट दाखिला 2014–15 के 42,763 से बढ़कर 2024–25 में 1,10,375 हो गया है, जो 158% की भारी वृद्धि को रेखांकित करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2021–22 के बाद से इन दाखिलों में शिक्षा क्षेत्र की हिस्सेदारी तीन गुना बढ़ गई है, जो 11.15 प्रतिशत से बढ़कर 34.13 प्रतिशत हो गई है। कपिला कार्यक्रम जैसी पहल, जिसने 13,067 पेटेंट दाखिले में मदद की है, और 418 संस्थानों में आईडिया लैब नेटवर्क, आविष्कारकों की अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में मदद कर रहे हैं।

यह भारत की बढ़ती बौद्धिक संप्रभुता का परिणाम है। उच्च शिक्षा संस्थान अब केवल सीखने की जगहें नहीं रह गए हैं; वे तेज़ी से नवाचार-आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था के इंजन बन रहे हैं। भारत के लगभग 125 यूनिकॉर्न में से 86 उच्च शिक्षा संस्थानों से निकले हैं, जिनमें से 62 खास तौर पर आईएआईटी और आईएआईएससी से जुड़े हैं।

फिर भी, समावेश के बिना नवाचार केवल तकनीकी प्रगति है; सहानुभूति के साथ नवाचार एक सभ्यतागत विजय है। इस विजय का सबसे महत्वपूर्ण स्थान समावेशी कक्षा है।  

प्रौद्योगिकी का मानवीय चेहरा: समावेश का ज़मीनी आधार 

एनईपी 2020 और सतत विकास लक्ष्य 4 के संयोजन में, प्रौद्योगिकी को शिक्षा में समानता लाने वाले एक अहम माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है। इसका मकसद सीखने में आने वाली हर तरह की भौतिक और डिजिटल रुकावटों को दूर करके उन्हें अवसरों में बदलना है।

प्रशस्त ऐप जैसे उपाय आरपीडब्लूडी अधिनियम, 2016 के तहत 21 तरह की दिव्यांगताओं की शुरुआती पहचान में मदद करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो पाता है कि हर बच्चे की खास ज़रूरतों की स्कूल स्तर पर ही पहचाना की जा सके और उनका समाधान किया जा सके। सहानुभूति बढ़ाने के लिए, ‘प्रिया – एक्सेसिबल वॉरियर’ कॉमिक बुक जैसे संसाधन बच्चों को यह सिखाते हैं कि सभी के लिए सुलभता सुनिश्चित करना सबकी मिली-जुली ज़िम्मेदारी है।

भारत का डिजिटल समावेशी इकोसिस्टम – जिसमें भारतीय सांकेतिक भाषा (आईएसएल) के लिए पीएम ई -विद्या चैनल 31 और सीआईईटी-एनसीईआरटी के रोज़ाना के समावेशी प्रसारण शामिल हैं – यह पक्का करने की कोशिश करता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर किसी का अधिकार बने।

सबसे अहम बदलावों में से एक है ‘किताब एक, पढ़ें अनेक’ (केईपीए) पहल। ‘शिक्षा-प्राप्ति के लिए सार्वभौमिक डिज़ाइन’ (यूडीएल) पर आधारित इन भौतिक-सह-डिजिटल किताबों में छूकर महसूस किए जा सकने वाले डॉट्स, प्रिंट-से-ऑडियो तकनीक और आईएसएल वीडियो से जुड़े क्यूआर कोड होते हैं। जब इस्तेमाल में आसान, मज़बूत और रिचार्ज-योग्य उपकरण के साथ इनका उपयोग किया जाता है, तो ये किताबें ज्ञान तक पहुँचने का एक बहु संवेदी ज़रिया बन जाती हैं। इससे यह साबित होता है कि तकनीक तब अपने शिखर पर होती है, जब वह समाज के सबसे कमज़ोर तबके की मदद करती है।

हमेशा नई सोच रखने वाले शिक्षक: पंचतंत्र से दीक्षा तक

चाहे कितना भी आधुनिक भौतिक-सह-डिजिटल टूल क्यों न हो, उसे सही दिशा देने के लिए मानवीय मदद की ज़रूरत होती है। भारतीय परंपरा में, शिक्षक हमेशा से ही नई सोच और नवाचार के मुख्य स्रोत रहे हैं। समावेशी शिक्षा का सिद्धांत भारत की प्राचीन शिक्षण-पद्धति की समझ में भी प्रतिध्वनित होता है। 

पंचतंत्र का उदाहरण लें। जब आचार्य विष्णु शर्मा को राजा अमरशक्ति के उन पुत्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, जिन्हें पारंपरिक तरीकों से सीखने में मुश्किल होती थी, तो भी वे घबराए नहीं। उन्होंने नए तरीके अपनाए। उन्होंने कहानियों, बातचीत और व्यावहारिक उदाहरणों का इस्तेमाल करके उन्हें उनकी समझ के स्तर पर जाकर सिखाया। यह कालातीत विरासत हमें याद दिलाती है कि एक शिक्षक की असली काबिलियत इसी बात में है कि वह हर सीखने वाले की खास ज़रूरतों के हिसाब से अपने पढ़ाने के तरीके को अनुकूलित कर सके।

आज, दीक्षा जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए इस परंपरा को और मज़बूत किया जा रहा है; यह आधुनिक आचार्य के लिए एक डिजिटल साथी की तरह है। दिव्यांगता से जुड़े मुद्दों पर हर महीने होने वाले पाँच दिन के मुफ़्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम के ज़रिए, शिक्षकों को ऐसी नई और समावेशी रणनीतियाँ सिखाई जा रही हैं जिनसे वे अपनी कक्षा को भविष्य के लिए तैयार कर सकें।

भविष्य के निर्माता

वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बेहतर होती रैंकिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्कृष्टता केंद्र से लेकर केईपीए की पाठ्यपुस्तकों के छूकर महसूस किये जाने वाले पन्नों तक का सफ़र एक ही मिशन को दिखाता है: भारतीय छात्र का सशक्तिकरण। भारत एक ऐसा देश बना रहा है, जहाँ अनुसंधान तो उच्च-स्तरीय हो, लेकिन उसका फ़ायदा ज़मीनी स्तर तक पहुँचे; जहाँ प्रौद्योगिकी तो सबसे आधुनिक हो, लेकिन उसका हृदयस्थल पूरी तरह मानवीय हो।

शिक्षक इस नवाचार की कहानी के वास्तविक हृदयस्थल हैं। वे ही कागज़ पर बनी नीति को बच्चों के लिए संभावनाओं में बदलते हैं। वे ही ‘विकसित भारत’ के निर्माता हैं। जब भी कोई शिक्षक किसी संघर्ष कर रहे छात्र तक पहुँचने का नया तरीका ढूँढते हैं, तो वह काम न सिर्फ़ उस छात्र के भविष्य को बेहतर बनाता है, बल्कि देश की बौद्धिक शक्ति और नैतिक चरित्र को भी मज़बूत करता है। साथ मिलकर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि भविष्य के भारत में कोई भी सपना बहुत बड़ा न हो और कोई भी बच्चा उसे पूरा करने के अवसर से दूर न रहे।

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(लेखक केंद्रीय शिक्षा और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री हैं)

टीचर्स डे: NEP 2020 में टीचर्स की भूमिका और एक विकसित भारत की यात्रा

भारतीय परंपरा में, शिक्षा को हमेशा एक ऐसे सफ़र के तौर पर देखा गया है जो एक व्यक्ति को बनाता है और समाज को बेहतर बनाता है। ज्ञान एक व्यक्ति को दुनिया को समझने में मदद करता है, जबकि एक शिक्षक का मार्गदर्शन सीखने की प्रक्रिया को मकसद, दिशा और मतलब देता है। पुराने भारत के गुरुकुलों से लेकर आज के क्लासरूम तक, शिक्षक और सीखने वाले के बीच का रिश्ता इस सफ़र के दिल में रहा है और टीचर्स डे हमें इस रिश्ते को सेलिब्रेट करने का मौका देता है।

हर साल 5 सितंबर को, हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की याद में टीचर्स डे मनाते हैं, जो एक जाने-माने विद्वान, दार्शनिक और शिक्षक थे, जिनका जीवन शिक्षा की महिमा और समाज में शिक्षकों के गहरे योगदान का प्रतीक था। इसलिए, यह दिन सिर्फ़ तारीफ़ के दिन से कहीं ज़्यादा है। यह हमें उन सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाता है जिन्होंने सीखने और शिक्षकों के बारे में भारत की समझ को बनाया है।

हमारी पुरानी परंपरा में, शिक्षक को एक गाइड के तौर पर सम्मान दिया जाता था जो सीखने वाले को ज्ञान और बेहतर समझ की ओर ले जाता था। “गुरु देवो भवः” की भावना टीचर के लिए गहरे सम्मान को दिखाती है, जिनकी भूमिका अनुशासन, चरित्र, मूल्यों और ज़िम्मेदारी की भावना पैदा करने तक फैली हुई है। शिक्षा को व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था। भारत के शिक्षा सिस्टम में गुरु-शिष्य परंपरा आज भी ज़िंदा है। एक टीचर का योगदान सिर्फ़ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में भी अहम भूमिका निभाते हैं। टीचर छात्रों को गाइड करते हैं, उनकी खूबियों को पहचानते हैं, उन्हें अपनी पसंद को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनमें आत्मविश्वास जगाने में मदद करते हैं। उनके गाइडेंस का किसी व्यक्ति के जीवन पर लंबे समय तक चलने वाला असर हो सकता है।

और उन्हें सफल और ज़िम्मेदार इंसान बनने में मदद कर सकते हैं। इस तरह, टीचर और स्टूडेंट के बीच का रिश्ता युवाओं की ज़िंदगी को आकार देता रहता है।

यह समृद्ध एजुकेशनल विरासत भारत की शिक्षा की लंबी परंपरा में दिखती है। तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा जैसे हमारे पुराने शिक्षा केंद्रों ने भारत और विदेश के स्टूडेंट्स और स्कॉलर्स को आकर्षित किया है। ये केंद्र मैथ्स, एस्ट्रोनॉमी, मेडिसिन, फिलॉसफी, लिटरेचर, भाषाएं और बायोलॉजी जैसे विषयों पर स्कॉलरशिप, चर्चा और विचारों के लेन-देन के केंद्र बन गए।

इस परंपरा के मूल में इस बात की गहरी समझ थी कि इंसानी जीवन के लिए ज्ञान का क्या मतलब है। संस्कृत का मुहावरा “ज्ञानं मनुजस्य त्रितियं नेत्रियं नेत्रम्”, ज्ञान को इंसान की तीसरी आंख बताता है। ज्ञान हमें तुरंत से आगे देखने, गहराई से समझने और सोच-समझकर फैसले लेने में मदद करता है। इस प्रोसेस में टीचर की अहम भूमिका होती है, जो सीखने वाले को ज्ञान से समझ और समझ से समझ की ओर ले जाता है।

ये विचार ऐसे समय में और भी ज़रूरी हो जाते हैं जब भारत 21वीं सदी के मौकों के लिए अपने एजुकेशन सिस्टम को तैयार कर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, शिक्षा को भारत के एक विकसित और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनने के सफ़र के केंद्र में रखा गया है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 इस दिशा में एक अहम कदम है। यह पॉलिसी सीखने वाले को शिक्षा के केंद्र में रखती है और उसके पूरे विकास, बौद्धिक समझ, क्रिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिविटी, अनुभव से सीखने और स्किल्स को महत्व देती है। यह भारतीय भाषाओं पर भी फिर से ध्यान केंद्रित करती है और छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कोडिंग, रोबोटिक्स और दूसरी नई टेक्नोलॉजी जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए तैयार करती है।

टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर जानकारी हासिल करने और सीखने के नए रास्ते खोल रही है। टीचर इस सीखने की प्रक्रिया को संदर्भ, दिशा और इंसानी जुड़ाव देते हैं। मॉडर्न टेक्नोलॉजी से लैस एक क्लासरूम तब सच में सार्थक होता है जब टीचर छात्रों को सवाल पूछने, नई चीज़ें खोजने, जो उन्होंने सीखा है उसे समझने और लागू करने के लिए प्रेरित करते हैं। टीचर नए तरीके अपना रहे हैं, टेक्नोलॉजी को शामिल कर रहे हैं और छात्रों को उनकी रुचियों और क्षमताओं को खोजने में मदद कर रहे हैं, साथ ही शिक्षा में सुधार के नज़रिए को रोज़ाना के क्लासरूम के अनुभवों में भी बदल रहे हैं।

ज्ञान का बदलता स्वरूप भी टीचर की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। आज, स्टूडेंट्स के पास जानकारी के कई सोर्स हैं। टीचर उन्हें आइडिया को ध्यान से देखने, जानकारी और समझ में फर्क करने, काम के सवाल पूछने और ज्ञान का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करने में मदद करते हैं। इस तरह, एजुकेशन अच्छे फैसले लेने की काबिलियत, सेल्फ-कॉन्फिडेंस, कैरेक्टर और समाज में काम का योगदान देने की काबिलियत डेवलप करने का एक प्रोसेस बन जाती है।

प्रधानमंत्री ने हमेशा भविष्य के भारत को बनाने में टीचरों की अहमियत पर ज़ोर दिया है। डेवलप्ड इंडिया 2047 का उनका विज़न युवाओं को भारत की डेवलपमेंट जर्नी के सेंटर में रखता है, और उस भविष्य की नींव टीचरों के रोज़ाना के काम से रखी जा रही है। क्यूरियोसिटी को बढ़ावा देकर, कॉन्फिडेंस जगाकर, पोटेंशियल पहचानकर और टैलेंट को निखारने के मौके देकर, टीचर युवा भारतीयों को भविष्य की ज़िम्मेदारियों और मौकों के लिए तैयार करने में मदद कर रहे हैं।

गुरुकुल से डिजिटल क्लासरूम तक का सफ़र दिखाता है कि भारत में नई संभावनाओं को अपनाने और अपनी सभ्यता की समझ को आगे बढ़ाने की कितनी ज़बरदस्त क्षमता है। पढ़ाई के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन ज्ञान की खोज और टीचर की गाइड करने वाली भूमिका हमेशा हमारी पढ़ाई के सफ़र का सेंटर रही है।

इस टीचर्स डे पर, जब हम अपने टीचरों का सम्मान करते हैं, तो आइए हम उस भारतीय परंपरा का जश्न मनाएं जो ज्ञान को इंसान की ज़िंदगी के सबसे बड़े लक्ष्यों में से एक मानती है और इसे देने वालों का बहुत सम्मान करती है। आइए हम इस समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाएं और एक ऐसा एजुकेशन सिस्टम बनाएं जो हर सीखने वाले को अपनी क्षमता खोजने, समाज में योगदान देने और एक विकसित और ज्ञान से भरपूर भविष्य की ओर भारत के सफ़र में पूरे आत्मविश्वास के साथ हिस्सा लेने में मदद करे।

(लेखक केंद्रीय शिक्षा मंत्री और केंद्रीय कंज्यूमर अफेयर्स, फ़ूड और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन मंत्री हैं।)