ब्रेकिंग न्यूज़
एचपीवी टीकाकरण:  लड़कियों के लिए एक साधारण सा टीका, सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन की दिशा में बहुत बड़ा कदम

प्रोफेसर हैराल्ड ज़ुर हाउज़ेन को 2008 में उनकी इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला कि ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) के हाई-रिस्क स्ट्रेन से लगातार होने वाला संक्रमण ही सर्वाइकल कैंसर का मूलभूत कारण है। यह दुनिया भर में रुग्‍णता और मृत्यु का एक महत्वपूर्ण कारण है, लेकिन कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) में इसका प्रभाव अधिक है। उनकी इस खोज ने रोगनिरोधी टीकों के साथ-साथ संक्रमण फैलाने वाले एजेंट का पता लगाने वाले परीक्षणों के विकास का भी मार्ग प्रशस्त किया। एक दशक बाद, 2018 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सर्वाइकल कैंसर के उन्‍मूलन की दिशा में एक पहल की घोषणा की, और 17 नवंबर 2020 को इस संबंध में एक वैश्विक रणनीति औपचारिक रूप से शुरू की गई, जिसे भारत सहित 194 देशों ने समर्थन दिया।

            कैंसर का उन्मूलन! वह भी कोई साधारण कैंसर नहीं, बल्कि सर्वाइकल कैंसर का उन्मूलन, जो अत्यधिक शारीरिक पीड़ा, भावनात्मक संघर्ष और आर्थिक कठिनाइयों का सबब है। भारत में महिलाओं में यह में दूसरा सबसे आम कैंसर है। हर साल इसके लगभग एक लाख नए मामले सामने आते हैं और इनमें से करीब आधे मामलों में मौत हो जाती है, जो दुनिया भर के कैंसर के बोझ का लगभग एक-चौथाई है। सर्वाइकल कैंसर में जीवन के खोए हुए वर्ष,  अन्य कैंसरों की तुलना में अधिक होते हैं, क्योंकि पीडि़त महिलाएँ अपेक्षाकृत कम उम्र की होती हैं और परिवार व समाज महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही होती हैं। कैंसर विशेषज्ञ के रूप में, मैंने उनकी तकलीफों को करीब से देखा है.. ऐसी महिलाएँ जिनमें चौथी स्‍टेज में इस रोग का पता चला, उनमें यूरिनरी फिस्टुला विकसित हो चुका था और कंसल्टिंग रूम में उनके दाखिल होने से पहले ही बदबू आने लगती थी; ऐसी महिलाएँ जो रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले रक्तस्राव का जिक्र करने में तब तक हिचकिचाती रहीं, जब तक कि बहू ने उनकी साड़ी पर दाग नहीं देख लिया; ऐसी महिलाएँ  जो अत्यधिक सायटिक और कमर दर्द, मूत्रवाहिनी या यूरेटर में रुकावट और गुर्दे फेल होने जैसी स्थितियों से जूझ रही थीं… फिर कुछ अपेक्षाकृत भाग्यशाली महिलाएँ  भी थीं, जिन्‍हें शुरुआती अवस्‍था ही इस रोग से ग्रसित होने के बारे में पता चल गया और जब यह बीमारी ठीक हो सकती थी, लेकिन सिर्फ़ रेडिकल सर्जरी या कीमो- और रेडिएशन थेरेपी से… ऐसे में गहन या एग्रेसिव सर्जरी का शरीर पर असर हुआ, लंबे समय तक चले रेडिएशन उपचार के कारण देखभाल करने वालों को पढ़ाई या काम से वंचित रहना पड़ा, और महंगी कीमो व इम्यूनोथेरेपी हुई… इसके अलावा, हमारे हरसंभव प्रयासों के बावजूद कुछ मामलों में कैंसर दोबारा लौट आया, जिसके लिए और भी जटिल प्रक्रियाओं, जैसे एक्सेंटरेशन सर्जरी और स्टोमा आदि की आवश्यकता पड़ी। हाँ, हम इलाज कर सकते थे, लक्षणों में राहत दे सकते थे, यहां तक कि हार्मोन रिप्लेसमेंट और अन्य सहायक देखभाल भी दे सकते थे, लेकिन इसकी  शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक कीमत चुकानी होती।

            और भी दुखद बात यह थी कि इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती थी। 1940 के दशक से ही पश्चिमी देशों में नियमित पैप स्मीयर जांच के माध्यम से द्वितीयक रोकथाम की व्यवस्था की गई थी, जिससे न केवल कैंसर का पता लगाया जा सकता था, बल्कि रोग की प्रारंभिक अवस्‍थाओं का भी पता लगाया जा सकता था। सर्वाइकल कैंसर की नेचुरल हिस्ट्री को एक सदी से अधिक समय से अच्छी तरह से दर्ज किया गया है। इसमें 10–15 वर्षों का लंबा प्रीकैंसरस चरण होता है, जिसे सर्वाइकल इंट्राअपिथीलियल नियोप्लासिया (सीआईएन) कहा जाता है, गर्भाशय ग्रीवा या सर्विक्स को ब्रश करके स्लाइड पर इकट्ठा की गई कोशिकाओं की माइक्रोस्कोप से जांच करके जिसका पता लगाया जा सकता है। इस अवस्‍था में इस रोग का उपचार सरल डे-केयर प्रक्रियाओं के जरिए आसानी से किया जा सकता है, जिनमें गर्भाशय निकालने की आवश्यकता नहीं होती। भारत और अन्य निम्न-मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) में हमारे पास इतनी बुनियादी सुविधाएँ और प्रशिक्षित जनशक्ति नहीं थी कि 30 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं की जीवन में एक बार भी जांच की जा सके, जबकि हर 3 साल के अंतराल पर यह जांच कराने की सलाह दी गई थी। यहाँ तक कि अच्छे तृतीयक केंद्रों में भी प्रयोगशालाएँ प्रतिदिन सीमित संख्या में ही महिलाओं की जांच कर पाती थीं। देशभर में स्त्रीरोग विशेषज्ञों और पैथोलॉजिस्ट द्वारा नियमित रूप से आउटरीच कैंप आयोजित किए जाते थे, ताकि वंचितों की मदद की जा सके, लेकिन ये प्रयास समुद्र में एक बूंद के समान थे। यहाँ तक कि आज भी, विजुअल इंस्‍पेक्‍शन (वीआईए) के माध्यम से राष्ट्रीय स्क्रीनिंग कार्यक्रम होने के बावजूद, स्क्रीनिंग कवरेज 5% से अधिक नहीं है, और जिन महिलाओं का टेस्‍ट पॉजिटिव पाया जाता है, उन्हें अस्पताल लाकर रोग की पुष्टि के लिए बायोप्सी और उपचार कराना भी बेहद कठिन होता है।

           सर्वाइकल कैंसर की प्राथमिक रोकथाम के लिए एचपीवी टीकाकरण ने 2006 में एक उम्मीद भरे सुपरहीरो की तरह इस परिदृश्य में प्रवेश किया। शुरुआत में यह तीन खुराक वाला टीका था, लेकिन लगातार  शोध से यह साबित हुआ कि इसे दो खुराक तक घटाया जा सकता है, और आगे चलकर यह भी पाया गया कि केवल एक खुराक ही 85–90% कैंसर से सुरक्षा देने के लिए पर्याप्त है। एक साधारण सा इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन इतनी बड़ी तकलीफ से बचा सकता है?! यह वास्तव में बेहद उत्साहजनक संभावना थी। रोकथाम के लिए टीकाकरण में सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता है। अब तक 500 मिलियन से अधिक खुराकें दुनिया भर में और लगभग 4 मिलियन खुराकें भारत में दी जा चुकी हैं। व्यवस्थित परीक्षणों और पोस्ट-मार्केटिंग सर्विलांस से प्राप्त समेकित आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि टीका लगवाने वाली महिलाओं में सामान्य आबादी  की तुलना में प्रतिकूल प्रभावों में कोई वृद्धि नहीं हुई है। उनमें क्षणिक हल्की प्रतिक्रियाएँ देखी गई हैं, जो सभी टीकों में सामान्य होती हैं। इन टीकों का प्रजनन क्षमता, जन्म दर, जन्मजात विकृतियों या मासिक धर्म के पैटर्न पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया गया है। एचपीवी टीकों की प्रभावशीलता बहुत अच्‍छी है, क्योंकि ये टीके उनमें शामिल वायरस के प्रकारों से लगभग पूरी तरह सुरक्षा प्रदान करते हैं। पहली पीढ़ी के टीके एचपीवी के दो सबसे खतरनाक प्रकारों — एचपीवी 16 और 18—के खिलाफ बनाए गए थे, जो वैश्विक स्तर पर सर्वाइकल कैंसर के 70% और भारत में लगभग 85% मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों, जिन्‍होंने 2007–08 में इस टीके के शुरू होने के तुरंत बाद ही एचपीवी टीकाकरण लागू कर दिया था, वहाँ प्रीकैंसर तथा कैंसर के मामलों में महत्वपूर्ण कमी देखी गई है। स्वीडन, डेनमार्क, कनाडा और अमेरिका जैसे अन्य देशों से भी इसी तरह के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।  

            डब्ल्यूएचओ की सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन पहल का लक्ष्य सर्वाइकल कैंसर को एक दुर्लभ कैंसर बनाना है, जिसके होने की दर प्रति 1 लाख में केवल 4 मामलों तक सीमित हो।  इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2030 तक : 15 वर्ष की आयु से पहले 90% लड़कियों का एचपीवी टीकाकरण, 35 और 45 वर्ष की आयु में 70% महिलाओं की एचपीवी परीक्षण द्वारा स्क्रीनिंग, और जिन महिलाओं में रोग के लक्षण पाए जाएं, उनमें से 90% का उपचार – जैसे कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्यों को हासिल करना आवश्यक है। वैश्विक घोषणा के शुरू होने के बाद से हम आधे से अधिक रास्‍ता पार कर चुके हैं, लेकिन अभी भी इन लक्ष्यों की प्राप्ति से काफी दूर हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) जैसे संगठनों के प्रतिनिधित्‍व वाला चिकित्‍सा समुदाय लंबे अरसे से एचपीवी टीकाकरण को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किए जाने की मांग कर रहा है। आखिरकार, अब उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है— माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 28 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान को देशव्यापी स्‍तर पर लॉन्‍च किया जाना- महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों को महत्व दिलाने की दिशा में सर्वोच्च राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत है, जिसकी वे हकदार हैं। पहुँच, किफायत  और उपलब्धता जैसी प्रमुख चिंताओं का सरकार ने पूरी तरह समाधान कर दिया है। अब सभी अभिभावकों को इस सुनहरे अवसर के बारे में जागरूक होने की आवश्‍यकता है, ताकि उनकी 14 साल की बेटियाँ नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निशुल्‍क टीकाकरण का लाभ उठा सकें। हमारी बेटियों के लिए एक साधारण सा टीका, सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन और विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बहुत महत्‍वपूर्ण साबित होगा।

नीरजा भटला

प्रोफेसर एमेरिटसराष्ट्रीय कैंसर संस्थान झज्जर,

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानदिल्ली के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की पूर्व प्रमुख

खेलो इंडिया जनजातीय खेल: भारत के ओलंपिक सपनों की ओर एक मजबूत कदम

डॉ. मनसुख मांडविया द्वारा
भारत की खेल यात्रा अद्भुत विविधता से भरी हुई है। उत्तर-पूर्व के पहाड़ों से लेकर मध्य
भारत के जंगलों तक, हमारे देश के हर कोने में प्रतिभा मौजूद है। खेलो इंडिया कार्यक्रम की
शुरुआत को अब आठ वर्ष हो चुके हैं, और इतने कम समय में यह एक राष्ट्रीय आंदोलन के
रूप में विकसित हो चुका है। युवा खेल, विश्वविद्यालय खेल, बीच गेम्स और विंटर गेम्स जैसे
विभिन्न आयामों के माध्यम से, खेलो इंडिया ने देशभर के युवा खिलाड़ियों की विविध
प्रतिभाओं को पहचानने और उभारने में सफलता प्राप्त की है।
खेलो इंडिया जनजातीय खेल (केआईटीजी) का समावेश इस यात्रा में एक और महत्वपूर्ण कदम
है। इसका पहला संस्करण 25 मार्च से 3 अप्रैल तक छत्तीसगढ़ में आयोजित किया जाएगा,
जिसमें 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 3,000 खिलाड़ी भाग लेंगे। इन खेलों में
सात पदक खेल शामिल होंगे—एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, भारोत्तोलन , तीरंदाजी, तैराकी और
कुश्ती प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी।
इन खेलों का आयोजन बस्तर क्षेत्र के जनजातीय बहुल जिलों, जो प्राचीन दंडकारण्य क्षेत्र का
हिस्सा हैं, के साथ-साथ सरगुजा क्षेत्र, रायगढ़ और मानपुर जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा। यह
केवल एक और खेल प्रतियोगिता की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह हमारे माननीय प्रधानमंत्री
श्री नरेंद्र मोदी के उस संकल्प का हिस्सा है, जिसके तहत भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र
(इकोसिस्टम) को व्यापक बनाते हुए हर खिलाड़ी तक अवसर पहुँचाना है—चाहे वह किसी भी
भौगोलिक या सामाजिक पृष्ठभूमि से आता हो। सीधे शब्दों में कहें तो यह हाशिए पर पड़े
खिलाड़ियों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास है।

जनजातीय क्षेत्रों के खिलाड़ियों ने लंबे समय से देश को गौरवान्वित किया है। राजस्थान के
महान तीरंदाज लिम्बा राम से लेकर झारखंड की तीरंदाजी स्टार दीपिका कुमारी तक, और
अनेक हॉकी खिलाड़ियों से लेकर ओलंपिक पदक विजेता मीराबाई चानू तक, उनकी उपलब्धियाँ
लाखों लोगों को प्रेरित करती हैं। ये उदाहरण इन क्षेत्रों में निहित अपार संभावनाओं को दर्शाते
हैं।
कई जनजातीय क्षेत्र ऐसे भी हैं जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का
सामना करते रहे हैं। इन क्षेत्रों के युवाओं के लिए पहचान और विकास के अवसर सीमित रहे
हैं। ऐसे में, इन क्षेत्रों में संगठित खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन युवाओं की ऊर्जा को
सकारात्मक और राष्ट्र निर्माण की दिशा में मोड़ने का कार्य करता है। यह अनिश्चितता को
अवसर में और अलगाव को समावेशन में बदलने का प्रयास है।
वास्तव में, हमारे माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण—“खेलेगा भारत तो
खिलेगा भारत”—आज साकार हो रहा है। खेल आज एक सशक्त माध्यम और समान अवसर
प्रदान करने वाला साधन बन चुका है, जो वंचित वर्गों के खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाने का अवसर देता है। जनजातीय क्षेत्रों में खेलो
इंडिया का विस्तार इसी दृष्टि का स्वाभाविक विस्तार है और यह इस विश्वास को मजबूत
करता है कि खेल राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
खेलो इंडिया जनजातीय खेलों का आयोजन स्थानीय खेल पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) पर
भी दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा। इससे जनजातीय क्षेत्रों में खेल अवसंरचना का विकास और
उन्नयन होगा, साथ ही स्थानीय कोच, प्रशिक्षकों और सहयोगी कर्मचारियों के लिए रोजगार के
अवसर भी उत्पन्न होंगे। स्कूलों और सामुदायिक संस्थानों को दैनिक जीवन में खेल को
शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे जमीनी स्तर पर एक स्थायी और
समावेशी खेल संस्कृति विकसित हो सके।
ये खेलो इंडिया जनजातीय खेल केवल एक बार आयोजित होने वाला आयोजन नहीं हैं, बल्कि
इन्हें खेलो इंडिया के वार्षिक कैलेंडर में स्थायी स्थान दिया जाएगा। इससे देशभर के
जनजातीय खिलाड़ियों को निरंतर और नियमित मंच मिलेगा, जो उनके दीर्घकालिक विकास
के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक संस्करण के साथ ये खेल व्यापक खेलो इंडिया
(इकोसिस्टम) पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक आधार के रूप में कार्य करेंगे। इस दृष्टि से,
जनजातीय खेल केवल एक मंच नहीं, बल्कि एक समृद्ध खेल संसार में प्रवेश का द्वार हैं।
इन खेलों के माध्यम से हम प्रतिभाओं की पहचान और उनके विकास का लक्ष्य रखते हैं।
राष्ट्रीय कोच, उच्च प्रदर्शन निदेशक और भारतीय खेल प्राधिकरण के तकनीकी विशेषज्ञ इन

खेलों में उपस्थित रहेंगे। चयनित खिलाड़ियों को उन्नत प्रशिक्षण के लिए भाखेप्रा केंद्रों में
भेजा जाएगा, जिससे वे अपने खेल करियर को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकें।
जैसे-जैसे भारत 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की तैयारी कर रहा है और 2036
ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए प्रयासरत है, वैसे-वैसे प्रतिभाओं का दायरा बढ़ाना और
भी आवश्यक हो जाता है। इसका अर्थ है देश के हर कोने तक पहुँचना और यह सुनिश्चित
करना कि हर युवा खिलाड़ी—विशेषकर जनजातीय समुदायों से—अवसरों से वंचित न रहे।
जनजातीय खेलों की शुरुआत इसी सोच का परिणाम है और यह भारत के विकसित होते खेल
तंत्र की मजबूती को दर्शाता है।
खेल उत्कृष्टता की यात्रा अक्सर उन गाँवों और समुदायों से शुरू होती है जहाँ सपने तो होते
हैं, लेकिन अवसर सीमित होते हैं। खेलो इंडिया जनजातीय खेलों के माध्यम से, सरकार खेल
को इन्हीं क्षेत्रों तक पहुँचा रही है। इस प्रक्रिया में हम न केवल भविष्य के चैंपियनों को खोज
रहे हैं, बल्कि भारत की प्रतिभा श्रृंखला को भी सशक्त बना रहे हैं, ताकि हम एक वैश्विक खेल
महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकें और 2036 तक शीर्ष 10 तथा 2047 तक शीर्ष 5
खेल राष्ट्र बनने के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को साकार कर सकें।
(लेखक भारत सरकार में युवा कार्यक्रम एवं खेल तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री हैं।)

विद्युत क्षेत्र में भारत के नेतृत्वकारी क्षमता की राह बुलंद करना: नई विकास गाथा को ऊर्जा प्रदान कर रहा है भारत
  • श्री मनोहर लाल

प्राचीन प्रार्थना “तमसो मा ज्योतिर्गमय” – अर्थात हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो – केवल आध्यात्मिक आकांक्षा भर नहीं, अपितु आधुनिक भारत की गाथा को भी दर्शाती है। बीते दशक में, कभी लगातार कमी से परिभाषित होने वाले विद्युत इकोसिस्‍टम को दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते, सबसे वैविध्‍यपूर्ण  और सुधार-प्रेरित विद्युत बाज़ारों में से एक में परिवर्तित कर हमने इस आदर्श भावना को वास्तविकता में बदल दिया है।

            जैसे-जैसे भारत स्वयं को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र, उभरती हुई डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में जिम्मेदार नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित कर रहा है, वैसे-वैसे विद्युत क्षेत्र हमारी राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता की आधारशिला बन गया है।             पिछले दशक में, हमने उत्पादन और पारेषण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिससे राष्ट्रीय ऊर्जा की कमी वित्त वर्ष 2013–14 में 4.2% से घटकर वित्त वर्ष 2025–26 तक मात्र 0.03% रह गई है। केवल वित्त वर्ष 2025–26 में ही (जनवरी 2026 तक), सभी स्रोतों से रिकॉर्ड 52.53 गीगावाट क्षमता जोड़ी गई है, जो एक ही वर्ष में जोड़ी गई अब तक की सर्वाधिक क्षमता है, जिसने  2024–25 में स्थापित 34.05 गीगावाट के पिछले सर्वोच्च स्तर को भी पार कर लिया है। कुल विद्युत उत्पादन वित्त वर्ष 2014 में 1,020.2

बीयू से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 1,830 बीयू हो गया है।  प्रति व्यक्ति खपत 2014 में 957 किलोवाट-घंटे से बढ़कर 2025 में 1,460 किलोवाट-घंटा हो गई है, जो आर्थिक विकास और बेहतर पहुँच को दर्शाती है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि हर घर, खेत और उद्योग के पास उसकी आवश्यकता के अनुसार विश्वसनीय विद्युत उपलब्‍ध हो  और भारत अब दुनिया में विद्युत का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता बन गया है।

            यद्यपि हम 520 गीगावाट से अधिक विद्युत उत्‍पादित करने में सक्षम हैं, लेकिन किसी भी प्रणाली की असली परीक्षा अधिकतम मांग या पीक लोड को बिना किसी तरह के संचालनात्मक दबाव के संभाल सकने की उसकी क्षमता होती है। साल 2024 की गर्मियों में अधिकतम मांग रिकॉर्ड 250 गीगावाट तक पहुँच गई थी और वित्त वर्ष 2025–26 में यह 242.49 गीगावाट रही। इससे पहले मांग में इस तरह की वृद्धि से ग्रिड पर दबाव पड़ सकता था, लेकिन हमारे लोड डिस्पैच केंद्रों ने लगभग शून्य ऊर्जा हानि के साथ इसे सफलतापूर्वक प्रबंधित किया। यह मजबूती दुनिया के सबसे बड़े समकालिक ग्रिडों में से एक के कारण संभव हुई है, जिसमें 120 गीगावाट अंतर-क्षेत्रीय स्थानांतरण क्षमता है, जो देश को “एक राष्ट्र-एक ग्रिड-एक फ्रीक्वेंसी” में एकीकृत करती है।

            प्रेरणादायक बात केवल यह नहीं है कि हम कितनी विद्युत का उत्‍पादन करते हैं, बल्कि यह भी है कि हम उसे कैसे उत्‍पादित करते हैं। गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित क्षमता का अंश तेजी से बढ़ा है, जिसकी बदौलत भारत 50% संचयी गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित विद्युत क्षमता हासिल करने के अपने एनडीसी लक्ष्य को निर्धारित समय से लगभग पाँच वर्ष पहले ही हासिल करने में समर्थ हो सका है। यह स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और जलवायु के प्रति हमारी संकल्‍पबद्धता को दर्शाता है। 2014 से, मिशन मोड योजनाओं के माध्यम से विद्युत क्षेत्र को नए रूप में ढाला गया है, जिन्होंने पहुँच का विस्तार करते हुए सतत परिवर्तन को भी गति दी है। दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना ने भारत के हर गांव तक बिजली पहुँचायी, इसके बाद सौभाग्य योजना आई, जिसने लाखों घरों को बिजली से रोशन किया और ऊर्जा तक पहुँच को सभी के लिए वास्तविकता बना दिया।

            एक अन्य परिवर्तनकारी सुधार सितंबर 2025 में समान आईएसटीएस सबस्टेशनों पर सौर और गैर-सौर घंटों के लिए अलग-अलग कनेक्टिविटी की शुरुआत है। सौर परियोजनाओं को सौर घंटों के दौरान पहुँच मिलती है, जबकि भंडारण और पवन परियोजनाओं को गैर-सौर घंटों में पहुँच मिलती है। इससे बड़ी मात्रा में अप्रयुक्त पारेषण क्षमता का उपयोग संभव होता है, अतिरिक्त लाइनों की आवश्यकता के बिना नवीकरणीय और भंडारण परियोजनाओं के कमीशनिंग में तेजी आती है, पारेषण लागत घटती है और संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होता है।

            डिजिटल सशक्तिकरण हमारे आधुनिकीकरण की गाथा का महत्वपूर्ण अंश है। संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) के तहत 3.03 लाख करोड़ रुपये के खर्च के साथ हम पूरे देश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लागू कर रहे हैं, जिससे उपयोगिताओं और नागरिकों के बीच संबंधों में परिवर्तन आ रहा है। इस योजना के सकारात्मक परिणाम भी सामने आ चुके हैं: एटी एंड सी हानियां 2021 में 21.91% से घटकर 2025 में 15.04% हो गई हैं, और प्रति यूनिट आपूर्ति पर अंडर-रिकवरी 69 पैसे से घटकर 6 पैसे रह गई है।

            जैसे-जैसे हमारी डिजिटल अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, भविष्य की मांग का पूर्वानुमान लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि वर्तमान मांग का प्रबंधन करना। डेटा सेंटर की क्षमता 2030 तक 1.4 गीगावाट से बढ़कर 9 गीगावाट होने का अनुमान है, और केवल ये सुविधाएँ ही भारत की कुल विद्युत खपत के लगभग 3% का उपयोग कर सकती हैं।             हमारा अगला लक्ष्य एआई, अनुसंधान एवं विकास और अन्य प्रौद्योगिकी-संचालित इकोसिस्टम से उत्पन्न विद्युत की विशाल और लगातार बढ़ती मांग को निरंतर रूप से पूरा करना है। जैसे-जैसे नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार हो रहा है, ऊर्जा भंडारण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत तेजी से बढ़ती डिजिटल अवसंरचना को स्वच्छ ऊर्जा से संचालित करने के लिए पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का बड़े पैमाने पर विकास कर रहा है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत को स्वच्छ ईंधनों के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है, ग्रिड स्थिरता और नवीकरणीय ऊर्जा की अधिक पैठ को बढ़ावा दे रहा है।

            हम परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी निर्णायक कदम उठा रहे हैं, जो कम कार्बन और विश्वसनीय पावर मिक्‍स का एक आवश्यक हिस्सा है। 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का हमारा लक्ष्य और SHANTI अधिनियम, 2025, हमारी तकनीकी संप्रभुता को प्रमाणित करते हैं और निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए कानूनी व नीतिगत ढाँचा तैयार करते हैं। अब हमें जो चाहिए, और जिसे यह समिट उत्प्रेरित कर सकता है, वह है तकनीक, वित्त और आपूर्ति श्रृंखलाओं में वैश्विक साझेदारियाँ। विकसित भारत को ऊर्जा प्रदान करने, ग्‍लोबल साउथ में विद्युतीकरण को तेज करने और मजबूत, भविष्य-सक्षम ऊर्जा तंत्र बनाने के लिए, हमें महत्वाकांक्षा तक सीमित न रह कर, समन्वित कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ना होगा। यही वह समय है जब सरकारें, उद्योग जगत के दिग्‍गज, नवप्रवर्तनकर्ता और वैश्विक साझेदार मिलकर एक ऐसी नई ऊर्जा संरचना का निर्माण करें—जो स्वच्छ, विश्वसनीय, डिजिटल रूप से एकीकृत और वैश्विक रूप से आपस में जुड़ी हुई हो। भारत को सीमा-पार विद्युत सहयोग का नेतृत्व करना चाहिए; अगली पीढ़ी के पारेषण, डिजिटल ग्रिड इंटेलिजेंस और ओएसओडब्ल्यूओजी -संरेखित बाजार तंत्र में साहसपूर्वक निवेश करना चाहिए; और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, हाइड्रोपावर नवाचार, लचीले गैस संसाधनों और स्वच्छ ऊर्जा का त्वरित उपयोग करना चाहिए। इस गति को ट्रांसमिशन सिस्टम ऑपरेटर और डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम ऑपरेटर के बीच मजबूत समन्वय और 2047 तक के लिए एकीकृत पावर सेक्टर रोडमैप द्वारा और भी सुदृढ़ किया जाना चाहिए, जो भारत को मजबूत, टिकाऊ और किफायती विद्युतीकरण का वैश्विक मॉडल बनाए।

            इस पृष्ठभूमि में, नई दिल्ली में आयोजित भारत इलेक्ट्रिसिटी समिट 2026 विशेष महत्व रखता है। यह ऐसे महत्वपूर्ण समय पर हो रहा है जब राष्ट्र टिकाऊ, सुरक्षित और प्रौद्योगिकी-संचालित विद्युत तंत्र की दिशा में अपने संक्रमण को तेज कर रहा है।

            “विकास को विद्युतीकृत करना, टिकाऊ भविष्य को मजबूत बनाना और दुनिया से जुड़ना” (अर्थात इलेक्ट्रिफाइंग ग्रोथ, एम्पावरिंग सस्टेनेबिलिटी, कनेक्टिंग ग्लोबली) विषय के साथ, यह समिट विभिन्न हितधारकों को एक मंच पर लाते हुए वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में भारत की नेतृत्वकारी  क्षमता को प्रदर्शित करेगा। यह बुनियादी ढाँचे के आधुनिकीकरण, नवीकरणीय क्षमता के विस्तार और ग्रिड विश्वसनीयता को मजबूत करने की भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करेगा। यह समिट सहयोग, नीतिगत संवाद और निवेश जुटाने के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक दोनों स्तर पर एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य करेगा।

            हमारा अनुमान है कि 2032 तक विद्युत उत्पादन में 345 बिलियन डॉलर और पारेषण एवं वितरण में 68 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश संभावित है, जबकि केवल ऊर्जा भंडारण में ही 35 बिलियन डॉलर से अधिक का अवसर मौजूद है। यह वास्तविक मांग पर आधारित है, क्योंकि भारत की कुल उत्पादन क्षमता पहले ही 520 गीगावाट से अधिक है और तेजी से बढ़ रही है, साथ ही ग्रिड के उत्सर्जन तीव्रता घट रही है।

आइए, हम सभी एकजुट होकर विकसित भारत को ऊर्जा प्रदान करें और ग्‍लोबल साउथ की साझा समृद्धि के मार्ग को आलोकित करें।

(लेखक भारत सरकार के केंद्रीय विद्युत मंत्री हैं)

सहभागिता की शक्ति: भारत टीबी के खिलाफ जंग में कैसे निर्णायक मोड़ ला रहा है
श्री जगत प्रकाश नड्डा
आज, जब भारत एक और टीबी-मुक्त भारत अभियान - एक 100 दिवसीय अभियान - की शुरुआत कर रहा है, तो मैं टीबी को समाप्त करने की हमारी यात्रा को अत्यंत गर्व और नई आशा के साथ याद करता हूँ। हाल के वर्षों में, भारत की टीबी के खिलाफ प्रतिक्रिया असाधारण रही है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की दूरदृष्टि से प्रेरित जनभागीदारी और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना पर आधारित है। समाज आधारित इस समग्र दृष्टिकोण ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी शक्ति साबित की है, जैसे कि मिशन इंद्रधनुष जैसी प्रमुख पहलों की सफलता को आगे बढ़ाना और सामुदायिक स्तर पर 'स्वस्थ महिलाएं, मजबूत परिवार' के संदेश को सुदृढ़ करना। दिसंबर 2024 में शुरू किए गए 100 दिवसीय गहन टीबी-मुक्त भारत अभियान के अनुभव ने जनशक्ति में हमारे विश्वास को और मजबूत किया है।
एक चिकित्सा अभियान के रूप में शुरू हुआ यह प्रयास अब एक जन आंदोलन बन चुका है। इसके परिणाम स्वयं ही सब कुछ बयां करते हैं: भारत में 2015 से टीबी के मामलों में 21% की गिरावट आई है—जो वैश्विक दर से लगभग दोगुनी है—साथ ही टीबी से होने वाली मृत्यु दर में भी 25% की गिरावट आई है। यह दर्शाता है कि जब विज्ञान, व्यवस्था और समाज मिलकर काम करते हैं तो क्या हासिल किया जा सकता है।
आज, भारत में टीबी के खिलाफ लड़ाई सामूहिक भागीदारी की शक्ति को दर्शाती है। केंद्रीय मंत्रालयों से लेकर ग्राम पंचायतों तक, डॉक्टरों से लेकर जन प्रतिनिधियों तक, हर कोई इसमें शामिल है। यहां तक ​​कि जिन मरीजों का इलाज पूरा हो चुका है, वे भी टीबी से जीत हासिल करने वाले अन्य लोगों का समर्थन कर रहे हैं। जिन मरीजों का इलाज पूरा हो चुका है, वे भी टीबी से ठीक हो चुके अन्य लोगों की मदद कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 25 अन्य मंत्रालयों, सभी पंचायती राज संस्थानों और सामुदायिक संगठनों के साथ मिलकर उनकी विशेषज्ञता, नेटवर्क और बुनियादी ढांचे को साझा करने के लिए हाथ मिलाया है।
टीबी रोगियों को मानसिक और सामाजिक सहायता प्रदान करने, उपचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को सुधारने और उनकी गरिमा को बहाल करने के लिए 2 लाख से अधिक मेरा भारत स्वयंसेवकों ने पंजीकरण कराया है।
विज्ञान और नवाचार का प्रभाव
हमारी रणनीति नए साक्ष्यों और उभरती चुनौतियों के जवाब में लगातार विकसित होती रही है। भारत के राष्ट्रीय टीबी प्रसार सर्वेक्षणों से पता चला है कि आधे मरीज़ों में विशिष्ट लक्षण नहीं दिखते हैं। इसके चलते लक्षणहीन संवेदनशील आबादी में सक्रिय परीक्षण की ओर बदलाव आया है। लक्षणहीन मामले संक्रमण फैलाते हैं – एक ऐसा रोगी जिसका परीक्षण नहीं हुआ है, अनजाने में दूसरों को संक्रमित कर सकते हैं, इसलिए शुरुआती जांच न केवल एक आवश्यकता है बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी भी है।
एआई-सक्षम छोटी एक्स-रे मशीनों और उन्नत आणविक परीक्षण तकनीक से लैस, निकश्या वाहन सबसे अधिक जोखिम वाले समुदायों के लिए आसान परीक्षण की सुविधा प्रदान करते हैं। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 20 करोड़ से अधिक लोगों की जांच की जा चुकी है, जिसके परिणामस्वरूप 32.65 लाख टीबी के मामले सामने आए हैं, जिनमें 10.9 लाख लक्षणहीन मामले भी शामिल हैं, जिनका अन्यथा इलाज संभव नहीं है। इस गति को बनाए रखते हुए, टीबी मुक्त भारत अभियान के अगले 100 दिनों में 3,000 से अधिक एआई-संचालित छोटे एक्स-रे उपकरण और अगली पीढ़ी की निदान मशीनें तैनात की जाएंगी।
डेटा-आधारित उपकरण उच्च जोखिम वाले गांवों और शहरी वार्डों की पहचान करने में मदद करेंगे जहां लक्षित परीक्षण का सबसे बड़ा प्रभाव हो सकता है।

भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। घनी आबादी और संवेदनशील समुदायों को देखते हुए, यदि परीक्षण और देखभाल को मजबूत नहीं किया गया तो यह बीमारी अनजाने में फैल सकती है। इसीलिए हम औपचारिक बस्तियों, प्रवासी श्रमिक समूहों और अन्य कमजोर आबादी जैसे उच्च जोखिम वाले शहरी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
आगे का रास्ता
जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमारा कार्य स्पष्ट होता जाता है; प्राप्त गति को बनाए रखना और इसे और भी तेज करना। भारत एक राष्ट्र है,जब हम साथ मिलकर काम करते हैं, तो सफलता हमेशा मिलती है। हमने पोलियो उन्मूलन के लिए साथ मिलकर काम किया। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में, हमने रिकॉर्ड समय में एक अरब से अधिक लोगों को कोविड-19 का टीका लगाया।'मेड इन इंडिया' विकास रणनीति के साथ, हम अपेक्षा से कहीं अधिक निश्चितता की ओर बढ़ रहे हैं। हम इस साझा मिशन में प्रत्येक नागरिक, संगठन और युवा मंच को शामिल करके शीघ्र निदान को बढ़ावा देना, निदान तक पहुंच का विस्तार करना और सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ाना जारी रखेंगे। भारत का टीबी विरोधी अभियान केवल एक जन स्वास्थ्य प्रयास नहीं है। यह एक जन भागीदारी का प्रयास है - जो किसी उद्देश्य के लिए एकजुट होने की हमारे देश की क्षमता का प्रमाण है।
यदि हम एकजुट होकर खड़े हों, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आने वाली पीढ़ी टीबी को इतिहास का एक अध्याय मात्र समझे, न कि उनके जीवन की एक वास्तविकता। यही वो भारत है जिसके लिए हम काम कर रहे हैं। यही वो भारत है जिसका निर्माण हम सब मिलकर करेंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे संयुक्त प्रयासों से हम अपने आदरणीय प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित संकल्प को प्राप्त कर लेंगे, 'हां, हम टीबी को खत्म कर सकते हैं'।
*******
(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री और रसायन एवं उर्वरक मंत्री हैं।)