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भारत की औषधि रणनीति पैमाने से नवाचार की ओर बढ़ रही है, ताकि देश को बायोफार्मा और उच्च-मूल्य वाले चिकित्सा विज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके

जगत प्रकाश नड्डा           

वैश्विक स्तर पर, कुल औषधि राजस्व में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो गयी है। लंबे समय से जेनरिक दवाओं में अग्रणी देश होने के कारण ‘विश्व की फ़ार्मेसी’ के रूप में प्रसिद्ध भारत का औषधि उद्योग अब पैमाने से नवाचार की ओर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत सरकार भविष्य के अनुरूप एक नीतिगत रूपरेखा को गति दे रही है, ताकि देश जेनरिक दवाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखते हुए इन उभरते क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त कर सके।

केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के मिशन बायोफार्मा निर्माण शक्ति की घोषणा इस दिशा में एक निर्णायक कदम को रेखांकित करती है। यह अगले 8 से 10 वर्षों में भारत को बायोफार्मा नवाचार और उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सेवाओं के वैश्विक केन्द्र बनाने के देश के संकल्प का संकेत देती है। यह विज़न गहरी वैज्ञानिक क्षमताओं के निर्माण, नवाचार-आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने और भारत को अगली पीढ़ी की दवाओं के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में उभरने में सक्षम बनाने पर आधारित होगा।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर और उन्नत चिकित्सीय क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं को गति देना है। यह कार्यक्रम औषधि विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की मौजूदा पहलों का पूरक है, जैसे फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना (पीआरआईपी), अनुसंधान विकास और नवाचार योजना, बायोनेस्ट आदि, जिनका उद्देश्य जैव- औषधि समेत जीवन विज्ञान क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है। ये पहलें भारत के नवाचार इकोसिस्टम को मजबूत करने, उद्योग-अकादमी सहयोग को बढ़ावा देने तथा जेनेरिक दवाओं से नवाचार संचालित दवा अनुसंधान और विकास की ओर बदलाव को सक्षम करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ किण्वन-आधारित निर्माण क्षमताओं का विकास करना है। एंटिबायोटिक, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के निर्माण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, यह क्षेत्र लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। अवसंरचना में निवेश करके, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाकर तथा लक्षित प्रोत्साहन प्रदान करके, भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में घरेलू क्षमता का निर्माण करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

भारत के नैदानिक ​​अनुसंधान इकोसिस्टम का विस्तार भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। 1,000 मान्यता प्राप्त नैदानिक ​​प्रयोग केंद्र स्थापित किये जायेंगे, जो वैश्विक दवा विकास गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को बेहतर बनायेंगे। अपनी लागत लाभ और कुशल शोधकर्ताओं की बढ़ती संख्या के साथ, भारत कुशल और उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक ​​प्रयोग के लिए असाधारण अवसर प्रदान करता है। साथ ही, नियामक व्यवस्था को मजबूत करने और संस्थागत क्षमताओं को बढ़ाने से भारत की मौजूदा व्यवस्था वैश्विक मानकों के अधिक अनुरूप होगी, जिससे तेज अनुमोदन संभव होंगे और वैश्विक हितधारकों के बीच विश्वास बढ़ेगा।

पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने पीएलआई और थोक दवा (बल्क ड्रग) पार्क योजनाओं के सहारे सक्रिय औषधि सामग्री (एपीआई) और मुख्य आरंभिक सामग्रियों (केएसएम) के स्थानीय उत्पादन में तेज़ी से प्रगति हुई है। इससे देश में दवाओं की कीमतें घटाने में मदद मिली है, जो विश्व स्तर पर सबसे कम कीमतों में से एक है और इसके कारण नागरिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल की लागत किफायती बनी रहती है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना ने सस्ती कीमतों पर गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है, जिसके तहत 19,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं। कैंसर और दुर्लभ रोगों की दवाओं जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाओं पर सीमा-शुल्क को सुव्यवस्थित करने जैसे पूरक उपाय जीवन रक्षक उपचारों तक पहुंच को और सुलभ बना रहे हैं। जैसे-जैसे उन्नत चिकित्सा प्रक्रियाएं अधिक व्यापक होंगी, किफायती दर और समान पहुंच सुनिश्चित करना केंद्रीय नीति की प्राथमिकता बनी रहेगी।

जैसे-जैसे उद्योग विकसित हो रहा है, भारत का उद्देश्य न केवल स्थापित बाजारों में बल्कि उभरते क्षेत्रों में, विशेष रूप से नवाचार-संचालित क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को मजबूत करना है। सुधार, इस बदलाव के केंद्र में हैं। नियामक समन्वय, अनुमोदन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और तेजी से मंजूरी जैसे प्रयास व्यापार करने में आसानी को बढ़ा रहे हैं। गुणवत्ता मानकों और नियामक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाने से भारतीय औषधि उत्पादों पर वैश्विक विश्वास की निरंतरता सुनिश्चित होती है। हालांकि, आरएंडडी निवेश बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसका समाधान करने के लिए, सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूती देना आवश्यक होगा, ताकि दीर्घकालिक नवाचार को बनाए रहा जा सके।

नीतिगत समर्थन, तकनीकी प्रगति और बाजार का आपसी समन्वय; औषधि क्षेत्र के लिए विकास का एक अद्वितीय अवसर प्रस्तुत करता है। भारत का घरेलू बाजार, जिसका मूल्य पहले से ही ₹4 लाख करोड़ से अधिक है, निरंतर विस्तार के लिए तैयार है। अगले दशक में, भारत न केवल जेनेरिक दवाओं में एक अग्रणी देश के रूप में, बल्कि नवोन्मेषी दवाओं, किण्वन-आधारित उत्पादों और अगली पीढ़ी की चिकित्सा-सेवाओं में भी एक शक्तिशाली केंद्र के रूप में उभरने के लिए बेहतर स्थिति में है।

निष्कर्ष के तौर पर, भारत का औषधि क्षेत्र नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जो नवाचार, सुदृढ़ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा द्वारा परिभाषित होता है। बायोफार्मा शक्ति कार्यक्रम जैसी पहलों, नैदानिक अवसंरचना के विस्तार और लक्षित निर्माण प्रोत्साहनों के समर्थन से, भारत धीरे-धीरे मात्रा-संचालित जेनेरिक दवा केंद्र से उच्च-मूल्य वाले बायोफार्मा नवाचार अग्रणी देश की ओर आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल में भारत की भूमिका को मजबूत करने और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न, विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।  

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(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री हैं)

आखिरकार सुनी गई आधी आबादी की आवाज़
  • आर. विमला, आईएएस

नारी शक्ति वंदन अधिनियमऔर भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का न्यायोचित स्थान’

जब महिलाएँ सशक्त होती हैं, तो भारत मजबूत होता है। घर की गरिमा से लेकर संसद में समान आवाज़ तक, यह एक नए और आत्मविश्वास से भरे भारत की परिकल्पना है।” प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

भारत की महिलाएँ सदैव महान कार्यों में सक्षम रही हैं। वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी ने बड़े-बड़े दार्शनिकों को निरुत्तर कर दिया था। पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर ने जिस न्यायपूर्ण तरीके से अपने राज्य का शासन चलाया, उसकी बराबरी उनके समकालीन शासक नहीं कर सके। रानी लक्ष्मीबाई साहस की एक अमर मिसाल बन गईं। फिर भी, स्वतंत्र भारत—जो समानता के सिद्धांत पर आधारित एक संवैधानिक गणराज्य है ने इन महान महिलाओं की उत्तराधिकारियों को अपनी विधायिकाओं में शायद ही कोई जगह दी। पहली लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या मात्र 4.4 प्रतिशत थी। सात दशक बाद, 17वीं लोकसभा में भी यह आंकड़ा बढ़कर केवल 14.4 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया। व्यक्तिगत प्रतिभा ने तो अपनी जगह बना ली थी, लेकिन व्यवस्थागत बदलाव अभी भी नहीं आया था। असल में, महिलाएं अपने ही लोकतंत्र में एक तरह से ‘मेहमान’ बनकर ही रह गईं।

हमारे संविधान ने पहले ही दिन से यह स्वीकार किया था कि जब सदियों से ढांचागत विसंगतियां जड़ जमाए बैठी हों, तो केवल औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं होती। ‘संरक्षणात्मक भेदभाव’ के सिद्धांत के तहत अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और बाद में पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गईं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था सफल रही है: 24 मार्च 2026 तक, निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से लगभग 49.75 प्रतिशत महिलाएँ हैं। जिन जगहों पर महिलाएँ शासन करती हैं, वहाँ पानी की आपूर्ति सुचारू होती है, साफ़-सफ़ाई की स्थिति बेहतर होती है और लड़कियाँ स्कूल जाना जारी रखती हैं। इसके बावजूद, संसद में भी इसी सिद्धांत को लागू करने के उद्देश्य से जो विधेयक पेश किए गए थे, वे राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में दशकों तक बार-बार निष्प्रभावी होते रहे।

वह क्षण जिसने सब कुछ बदल दिया –

वह अधूरी कड़ी 19 सितंबर 2023 को पूरी हुई। भारत के नए संसद भवन में आयोजित कामकाज के पहले ही सत्र में, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को संसद के दोनों सदनों में, प्रत्येक राजनीतिक दल के सर्वसम्मत समर्थन से पारित किया गया। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विधेयक पेश करते हुए दोनों सदनों को बताया: “यह कानून केवल एक कानून नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक भारतीय महिला की शक्ति, त्याग और सामर्थ्य के प्रति एक श्रद्धांजलि है।”

यह अधिनियम लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उप-कोटा भी शामिल है। नए संसद भवन का यह पहला अधिनियम होना अपने आप में एक घोषणा थी: अमृत काल के लोकतंत्र की संरचना पूरे भारत के लिए और सभी की भागीदारी के साथ निर्मित की जाएगी।

इस अधिनियम में बदलाव लाने की अपार क्षमता है, क्योंकि इसके लागू होने से संसद में महिला सदस्यों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। महिला विधायक निरंतर स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं—ये वही क्षेत्र हैं, जहाँ भारत में लैंगिक असमानता सबसे अधिक है। एक ऐसी संसद, जिसमें एक-तिहाई सदस्य महिलाएँ होंगी, वह अलग तरह के प्रश्न पूछेगी और अलग तरह के विचार सुनेगी। इससे भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार होगा, न कि केवल उसकी बाहरी छवि में।

गरिमा से लोकतंत्र तक की यात्रा

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा यह समझा है कि ज़मीनी स्तर पर सशक्तिकरण के बिना राजनीतिक सशक्तिकरण खोखला होता है। उनके द्वारा शुरू की गई यह यात्रा अत्यंत बुनियादी गरिमा से लेकर सर्वोच्च लोकतांत्रिक भागीदारी तक एक सुविचारित पथ पर आगे बढ़ती है। इसकी शुरुआत एक शौचालय से हुई। स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाए गए 10 करोड़ घरेलू शौचालयों ने उन महिलाओं को सुरक्षा और आत्म-सम्मान लौटाया, जिन्हें लंबे समय से इन दोनों से वंचित रखा गया था। जल जीवन मिशन ने 15 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुँचाया। महिलाओं को मीलों पैदल चलकर पानी ढो कर लाने से मुक्ति मिली जिससे उनका सुबह का कीमती समय जाया हो जाता था।

‘पीएम उज्ज्वला योजना’ के 10.56 करोड़ एलपीजी कनेक्शनों ने महिलाओं को धुएं से भरी रसोई से मुक्ति दिलाई। पीएम आवास योजना के तहत महिलाओं के नाम पर घर बनाए गए। 55 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के स्वामित्व वाले जन धन खातों ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की। ‘मुद्रा’  योजना के ऋण, स्वयं सहायता समूह, लखपति दीदी, सखी, वन स्टॉप सेंटर और तीन तलाक का उन्मूलन: प्रत्येक योजना उसी सीढ़ी का अगला पायदान थी, जो उन्हें केवल गुज़ारा करने की स्थिति से गरिमा की ओर, गरिमा से सामर्थ्य की ओर, और सामर्थ्य से नेतृत्व की ओर निरंतर बढ़ाती गई।

आधुनिक भारत के लिए एक दृष्टिकोण –

भारत को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को तुरंत लागू करने की आवश्यकता है। यह हमारे दौर के सबसे अधिक परिवर्तनकारी संभावित सुधारों में से एक है। महिलाओं के विधायी प्रतिनिधित्व को बढ़ाकर, यह हर स्तर पर नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी को बढ़ाएगा: चाहे वे बजट हों जो मातृ स्वास्थ्य के लिए धन उपलब्ध कराते हैं, वे कानून हों जो पीड़ितों की रक्षा करते हैं, या वे नीतियां हों जो लड़कियों को स्कूल में बनाए रखती हैं और उनकी शिक्षा को बढ़ावा देती हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत’ (2047 तक एक विकसित भारत) का दृष्टिकोण इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि कोई भी राष्ट्र अपनी पूरी क्षमता तक तब तक नहीं पहुँच सकता, जब तक उसके आधे नागरिक उन जगहों से बाहर रहें जहाँ सत्ता का संचालन होता है। जैसा कि उन्होंने हमेशा कहा है: “भारत तभी एक विकसित राष्ट्र बनेगा जब इसकी महिलाएँ न केवल अपने घरों में, बल्कि अपनी संसद में भी पूरी तरह सशक्त होंगी।” नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय महिलाओं के लिए कुछ नया सृजन नहीं करता है। इसने उस विद्वत्ता, साहस और नेतृत्व करने की इच्छाशक्ति के लिए एक संस्थागत स्थान सुनिश्चित कर दिया है, जो महिलाओं में पहले से ही मौजूद है।

शौचालय की गरिमा से लेकर संसद में समान आवाज़ तक, यह मात्र एक विधायी यात्रा नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की कहानी है जिसने अंततः पूर्णता की ओर बढ़ने का निर्णय लिया है।

“आधी आबादी को आखिरकार सुना गया। नज़रिया साफ़ है। ये मुहीम जारी रहेगी।”

(लेखिका महाराष्ट्र सरकार में रेजिडेंट कमिश्नर एवं सचिव पद पर कार्यरत हैं और आईआईटी बॉम्बे से पीएचडी कर रही हैं)

नए साल में नई आशा: एक भारत की भावना
  •  श्री सी. पी. राधाकृष्णन

मुझे अत्यंत हर्ष है कि मैं भारत और विश्वभर के सभी लोगों को बैसाखी, रोंगाली बिहू, महा बिषुबा पना संक्रांति, पोइला बोइशाख, विषु और तमिल पुथांडु के अवसर पर अपनी पारंपरिक नववर्ष की शुभकामनाएँ देता हूं, जो ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाते हैं। ये सभी शुभ अवसर सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली लेकर आएं।

चिथिरई का महीना कृषि की तैयारियों का समय होता है। किसान अपनी ज़मीन को उपजाऊ बनाने के लिए उस पर काम करना शुरू कर देते हैं। चूंकि हमारे लोग मानते हैं कि मेहनत से ही प्रगति होती है, इसलिए वे श्रम की शुरुआत का जश्न मनाते हैं। पूरे देश में, हमें इसी तरह के उत्सव देखने को मिलते हैं, जो भारत में एकता और साझा संस्कृति के उदाहरण हैं।

उत्तर भारत में, विशेषकर पंजाब में, लोग बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में मनाते हैं। दक्षिण में, केरल में विशु मनाया जाता है, जहां शुभ वस्तुओं (कानी) को देखना एक महत्वपूर्ण रिवाज है। असम में लोग बिहू मनाते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में पोइला बोइशाख को उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।

इसी प्रकार मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी लोग इस अवधि को विभिन्न पारंपरिक रूपों में नववर्ष के रूप में मनाते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार में देशभर से श्रद्धालु गंगा में पवित्र स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं, जो इस अवसर की पवित्रता को दर्शाता है।

तेलुगु भाषी लोगों ने हाल ही में अपना नववर्ष उगादी के रूप में मनाया, जबकि मराठी और कोंकणी समुदाय अपना नववर्ष गुड़ी पड़वा के रूप में मनाते हैं। हम एक प्राचीन सभ्यता से संबंधित हैं, जिसका प्रमाण हमारे पूर्वजों के वैज्ञानिक ज्ञान से मिलता है। ब्रह्मांड के प्रति उनकी सटीक समझ इन नववर्ष उत्सवों में झलकती  है।

इसी प्रकार, तमिल नववर्ष एक अत्यंत विशेष अवसर है, जो हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव मनाता है। यह एक ऐसा पर्व है जो परंपरा, परिवार, आध्यात्मिकता और अनुशासित जीवन शैली को एक साथ जोड़ता है। यह एक नई शुरुआत का संकेत देता है और हमें पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए नई आशा के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

आज हम वैश्विक कैलेंडर का पालन करते हैं, लेकिन हमें अपने तमिल कैलेंडर को भी याद रखना चाहिए, जो अपनी विशेषता के कारण केवल दिनों और महीनों को ही नहीं, बल्कि वर्षों को भी नाम देता है। ऐसे कुल 60 वर्ष-नाम होते हैं, और इस वर्ष का नाम “पराभव” है, जो इस चक्र का 40वां वर्ष है।

‘खगोल विज्ञान’शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका अर्थ है तारों के नियमों का अध्ययन। तमिल में इसे “वाणियल” कहा जाता है। हजारों वर्ष पहले ही तमिल विद्वानों ने यह समझ लिया था कि पृथ्वी गोल है और उन्होंने खगोलीय पिंडों की गति तथा उनके प्रभाव का अध्ययन किया था।

प्राचीन तमिल साहित्य, जैसे कि पतिरुप्पट्टू, ब्रह्मांड की प्रकृति और गति का वर्णन करता है। श्लोकों में बताया गया है कि संसार पाँच तत्वों से बना है और आकाशीय शक्तियों से शासित है। सिरुपनरुप्पदई जैसी अन्य रचनाएं ग्रहों की गति का उल्लेख करती हैं।

संगम साहित्य में ग्रहों और तारों के संदर्भ मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराणनुरु में शनि को काला (मैम्मीन) बताया गया है। आकाशीय प्रभावों के अध्ययन की परंपरा “कनियान” कहलाने वाले विद्वानों से जुड़ी थी। माना जाता है कि कवि कनियान पूंगुंद्रनार ने अपना नाम इसी परंपरा से लिया है। यहां तक ​​कि तोलकाप्पियम जैसे प्राचीन ग्रंथ भी ऐसे विद्वानों को “अरीवर” कहते हैं। ‘अकनानुरु’ जैसे साहित्य से पता चलता है कि विवाह जैसे शुभ आयोजन उचित तिथियों और समय का चुनाव करके संपन्न किए जाते थे।यह परंपरा आज भी तमिलनाडु में जारी है। चिथिरई के पहले दिन मंदिरों में पंचांग पढ़ा जाता है और लोग इसे सुनने के लिए एकत्रित होते हैं।

पंचांग में पाँच तत्व होते हैं: वार (दिन), तिथि, करण, नक्षत्र और योग। इनके आधार पर वर्षा, कृषि और वर्ष से जुड़े अन्य पहलुओं के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। हमारे पूर्वज समय को मापने के लिए सौर और चंद्र दोनों प्रणालियों का उपयोग करते थे। आज आधुनिक विज्ञान उन्नत उपकरणों से ग्रहण की गणना करता है, लेकिन पहले भी इन घटनाओं का अध्ययन कर उन्हें सटीक रूप से बताया जाता था।

हमारे पूर्वजों से मिला ज्ञान हमारी धरोहर है। हमें इसे सुरक्षित रखना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए। मंदिरों में पंचांग का पाठ सुनना इस परंपरा का सम्मान करने का एक तरीका है। नववर्ष का एक और पहलू यह दिखाता है कि हमारे लोग प्रकृति की समृद्धि का कितना सम्मान करते थे। घरों में फल और फूल जैसी शुभ वस्तुओं को सजाया जाता है और सुबह सबसे पहले उन्हें देखा जाता है।

वसंत ऋतु वह समय है, जब प्रकृति खुद को नया रूप देती है। पेड़-पौधे फिर से हरे-भरे हो जाते हैं और फूल-फल खिलते हैं। प्रकृति के साथ तालमेल में रहने वाले तमिल लोग “कणी कणल” की परंपरा के जरिए इस समृद्धि को देखकर वर्ष की शुरुआत करते हैं।

इसी तरह, इस दिन बनने वाले पारंपरिक भोजन में सभी स्वाद शामिल होते हैं, यहाँ तक कि कड़वा भी। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सुख और दुख दोनों तरह के अनुभव होते हैं, और हमें उन्हें संतुलन के साथ स्वीकार करना चाहिए।

इन त्योहारों में पूरे देश में और दुनिया के उन हिस्सों में भी, जहां भारतीय समुदाय रहते हैं, एक समानता दिखाई देती है। ये उत्सव हमारी सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता की याद दिलाते हैं, साथ ही देश की एकता को भी दिखाते हैं। ये हमें मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा देते हैं।

मैं युवाओं से आग्रह करता हूँ कि वे नए साल को सकारात्मक सोच, विश्वास और समर्पण के साथ मनाएं  और अपने पूर्वजों के दिखाए रास्ते पर चलें। आइए हम देश की प्रगति में योगदान देने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ें।

हमारा भारत हमेशा से अपनी सभ्यता के मूल्यों में एक रहा है और आगे भी एक बना रहेगा। बड़ों के आशीर्वाद से युवा पीढ़ी ‘एक भारत’ की भावना के साथ आगे बढ़े और 2047 तक ‘श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत’ के निर्माण में सफल हो।

(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)

पहुंच से प्राधिकार तक: नारीशक्ति को अगले दशक का भारत का निर्णायक सुधार बनाना
  • डॉ. संगीता रेड्डी

पिछले एक दशक में, भारत ने कुछ वैसा किया है जिसे कुछ ही देश बड़े पैमाने पर हासिल कर पाए हैं। भारत ने महिला सशक्तिकरण को इरादों से आगे जाकर बुनियादी ढांचे में बदल दिया है।

यह बदलाव कोई अनायास नहीं हुआ। यह सुनियोजित था। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, नीतिगत रूप से महिलाओं को विकास के केन्द्र में अधिक से अधिक रखा गया। ऐसा यह मानते हुए किया गया कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो पूरी अर्थव्यवस्था में तेजी आती है।

इसके नतीजे सामने हैं। और इन नतीजों को मापा जा सकता है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 57 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए हैं। इन खातों  में से 55 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के हैं। इस कदम से लाखों लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में पहली बार कदम रखने का मौका मिला है। लगभग 10 करोड़ महिलाएं, 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों में संगठित होकर, जमीनी स्तर पर उद्यमिता और स्थानीय आर्थिक मजबूती का वाहक बन रही हैं।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 10.5 करोड़ से अधिक परिवारों तक पहुंच चुकी है। इससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कम हुए हैं और महिलाओं को अधिक समय लेने वाले श्रम से मुक्ति मिली है। ऋण तक पहुंच बढ़ी है और मुद्रा योजना के तहत दिए गए लगभग 70 प्रतिशत ऋण महिला उद्यमियों को मिले हैं। महिला श्रमशक्ति की भागीदारी बढ़कर लगभग 37 प्रतिशत हो गई है। इससे महिलाओं की भागीदारी में लंबे समय से चला आ रहा गिरावट का रुझान अब उलट गया है।

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसे कार्यक्रमों ने जीवन के महत्वपूर्ण चरणों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को बढ़ाया है और नाजुक स्थितियों में कमी लाई है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों ने समाज में गहराई से पैठी सोच को बदलना शुरू कर दिया है।

अलग-अलग, ये सभी कार्यक्रम बेहद ठोस हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो, ये कार्यक्रम भारत में महिलाओं को देखने के नजरिए में आए एक संरचनात्मक बदलाव को दर्शाते हैं। महिलाओं को अब मात्र समर्थन पाने वाली के बजाय विकास के वाहक के रूप में देखा जा रहा है।

नीति निर्माताओं और प्रशासकों के लिए, इसके सबक बिल्कुल साफ हैं: जब डिजाइन, कार्यान्वयन और जवाबदेही व्यवस्थित हों, तो व्यापक स्तर पर काम करना संभव होता है।

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपने काम के दौरान, मैंने देखा है कि जब प्रणालियां सैद्धांतिक मॉडलों के बजाय वास्तविक जरूरतों पर आधारित होती हैं, तो नतीजे बेहतर होते हैं। यही सिद्धांत यहां भी लागू होता है। जहां पहुंच सरल होती है, जहां वितरण में निरंतरता होती है और जहां नतीजों पर नजर रखी जाती है, वहां असर बिल्कुल साफ नजर आता है।

फिर भी, अगले चरण में और भी अधिक ध्यान देने की जरूरत होगी। क्योंकि हमारे सामने चुनौती अब नीति निर्माण की नहीं, बल्कि नीति के कार्यान्वयन की है।

कार्यक्रमों की व्यापकता के बावजूद, जागरूकता संबंधी कमजोरियां बनी हुई हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल होने के आंकड़े एकसमान नहीं है। अंतिम छोर तक आपूर्ति अभी भी स्थानीय क्षमता पर ही निर्भर हैं। अवसर पाने वाली प्रत्येक महिला की दृष्टि से, ऐसी कई और महिलाएं हैं जो नीतिगत कमियों की वजह से नहीं, बल्कि पहुंच की कमी के कारण हाशिए पर बनी हुई हैं।

यहीं पर प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका निर्णायक हो जाती है।

हमें योजनाओं की घोषणाओं से आगे बढ़कर, उनकी व्यापकता सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना होगा। आउटपुट को मापने से आगे बढ़कर नतीजों पर नजर रखने की दिशा में बढ़ना होगा। पात्रता को कागज़ पर दर्ज करने से आगे जाकर व्यवहार में उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। जिला स्तर पर स्वामित्व, डेटा-आधारित निगरानी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होंगे। प्रौद्योगिकी इस प्रक्रिया को गति दे सकती है, लेकिन यह जमीनी जवाबदेही का स्थान नहीं ले सकती।

आज हर नीति निर्माता के सामने बिल्कुल सीधा सा सवाल है: हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि कोई भी योग्य महिला पीछे न छूटे?

यहीं पर नारी शक्ति वंदन अधिनियम हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक बन सकता है।

विधायी निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाकर, नीति निर्माण को वास्तविक जीवन के अनुभवों के अनुरूप बनाने की संभावना पैदा होती है। महिला नेता समुदाय की वास्तविकताओं से जुड़ी अंतर्दृष्टि लेकर आती हैं – ऐसी अंतर्दृष्टि जो कार्यक्रमों को मजबूत कर सकती है, उनके कार्यान्वयन को बेहतर बना सकती है, लक्ष्यीकरण में सुधार कर सकती है और उन्हें तेजी से अपनाने में सहायक साबित हो सकती है।

उद्देश्यपूर्ण तरीके से कार्यान्वित किए जाने पर, नारी शक्ति वंदन अधिनियम का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है: नेतृत्व में अधिक महिलाएं आ सकती हैं, अधिक उत्तरदायी नीतियां बन सकती हैं, उच्च भागीदारी और मजबूत नेतृत्व क्षमता का निर्माण संभव हो सकता है। इसी तरह सुधार अपने-आप सुदृढ़ होता जाएगा। इसी तरह आत्मनिर्भर और विकसित भारत के लक्ष्य भी हासिल किए जा सकेंगे।

हम ज्ञान, नवाचार और प्रौद्योगिकी द्वारा परिभाषित दशक में कदम रख रहे हैं। भारत के पास पहले से ही एक मजबूत आधार मौजूद है। यहां वैश्विक स्तर पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) की शिक्षा में महिलाओं का अनुपात सबसे अधिक है। इस उपलब्धि को बिना कोई समय गवांए स्वास्थ्य सेवा, विज्ञान, उद्यम और शासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व में बदल देने का यही सही क्षण है।

पिछले दशक ने यह दर्शाया है कि नीति निर्माण और कार्यान्वयन के साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति का समन्वय होने पर क्या कुछ संभव हो सकता है। आज की ठोस बुनियाद पर, नारी शक्ति वंदन अधिनियम का कार्यान्वयन सशक्तिकरण को पहुंच से परे प्राधिकार तक ले जा सकता है।

लेकिन प्रतिनिधित्व को क्षमता में बदलना चाहिए और क्षमता का विकास संस्थागत समर्थन के जरिए होना चाहिए, ताकि कार्यान्वयन से सही नतीजे हासिल हो सकें।

अगले पांच वर्षों में, हमें महिलाओं को न केवल चुनावी रूप से, बल्कि संस्थागत रूप से भी नेतृत्व करने के लिए तैयार करने की दिशा में निवेश करना होगा। इसका सीधा मतलब है व्यवस्थित  मार्गदर्शन, नेतृत्व संबंधी प्रशिक्षण, नीतिगत अनुभव और प्रभावी शासन को संभव बनाने वाली प्रशासनिक सहायता प्रणाली।

इसका मतलब यह भी है कि हमें नीति निर्माण के तरीकों पर नए सिरे से विचार करना होगा। कार्यक्रम सुलभ, समझने में आसान और तेज गति से कार्यान्वित किए जा सकने वाले होने चाहिए। नीतियों को जरूरत के हिसाब से विकसित करने के लिए फीडबैक प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए। और सफलताओं को केवल कवरेज से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आय, शिक्षा और सशक्तिकरण जैसे नतीजों में हुए बदलाव के आधार पर मापा जाना चाहिए। अब जबकि भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है, ऐसे में यह कोई गौण मुद्दा नहीं है – यह हमारी सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। महिलाओं की भागीदारी आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और संस्थागत प्रभावशीलता से सीधे जुड़ी हुई है।

इसलिए सफलता का असली पैमाना यह नहीं होगा कि हम कितनी योजनाएं बनाते हैं, बल्कि यह होगा कि हम कितने लोगों के जीवन को बदल पाते हैं।

अगर भारत पहुंच के मामले में संतृप्ति हासिल कर लेता है, भागीदारी को मजबूत करता है और नेतृत्व को सक्षम बनाता है, तो वह न केवल अपनी महिलाओं को सशक्त बनाएगा बल्कि अपने विकास की राह को भी नए सिरे से निर्धारित करेगा।

नीति निर्माताओं और प्रशासकों के लिए जिम्मेदारियां बिल्कुल साफ हैं। इन्हें पूरा करने का समय अब ​​आ गया है।

(लेखिका अपोलो हॉस्पिटल्स में संयुक्त प्रबंध निदेशक हैं)

भारत के अंतिम छोर पर स्थित स्वास्थ्य एवं कल्याण इकोसिस्टम को मजबूत बनाना
  • श्री प्रतापराव जाधव

अब जबकि भारत सभी के लिए न्यायसंगत, समावेशी और समग्र स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमें एक मौलिक प्रश्न पूछना होगा: हम अंतिम गांव के अंतिम व्यक्ति तक सही समय पर गुणवत्तापूर्ण देखभाल पहुंचना कैसे सुनिश्चित करें?

इसका जवाब केवल बुनियादी ढांचे के विस्तार या उन्नत प्रौद्योगिकियों के उपयोग में ही नहीं, बल्कि उन प्रणालियों को मजबूत करने में भी निहित है जो स्वाभाविक रूप से सुलभ, सस्ती और समुदायों के भरोसे पर खरे उतरते हों। इस संदर्भ में, होम्योपैथी भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ-साथ एक मौन लेकिन शक्तिशाली ताकत के रूप में उभर रही है और जमीनी स्तर पर समग्र स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी ढांचे को बदल रही है।

हम यह दिखाई दे रहा है कि होम्योपैथी कैसे जनजातीय क्षेत्रों, ग्रामीण इलाकों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी वाले शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति से जुड़ी महत्वपूर्ण कमियों को दूर कर रही है। इसके प्रभाव का पता केवल व्यापकता से ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक जरूरत वाले स्थानों – यानी अंतिम छोर – तक पहुंचने की क्षमता से भी चल रहा है।

अब जबकि हर वर्ष 10 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘विश्व होम्योपैथी दिवस’ करीब है, यह इस बात पर विचार करने का एक सही मौका है कि यह प्रणाली केवल व्यक्तिगत कल्याण ही नहीं बल्कि समग्र कल्याण का एक ऐसा मॉडल बनाने में भी योगदान दे रही है जो किफायती, पर्यावरण के अनुकूल और सामाजिक रूप से समावेशी हो। इस वर्ष विश्व होम्योपैथी दिवस की थीम “सतत स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी” है।

18वीं शताब्दी में सैमुअल हैनिमैन द्वारा विकसित और 19वीं शताब्दी में भारत लाई गई, होम्योपैथी “सिमिलिया सिमिलिबस क्यूरेंचर” यानी “समान से समान का उपचार” के सिद्धांत पर आधारित है। दशकों से एक समग्र और रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए, यह भारत की बहुआयामी स्वास्थ्य एवं कल्याण प्रणाली का एक अभिन्न अंग बन गई है।

जमीनी स्तर पर होम्योपैथी की सबसे बड़ी खूबी इसकी निरंतर देखभाल सुनिश्चित करने की क्षमता है। कई पिछड़े इलाकों में स्वास्थ्य सेवा टुकड़ों में बिखरी हुई नहीं होती, बल्कि निरंतर  और रिश्तों से सचालित होती है। होम्योपैथी का व्यक्ति-केन्द्रित उपचार का दृष्टिकोण, खासतौर पर पुरानी बीमारियों, बार-बार होने वाले संक्रमणों और जीवनशैली संबंधी विकारों के प्रबंधन के क्रम में चिकित्सक और रोगी के बीच दीर्घकालिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। यह निरंतरता उपचार के प्रति रोगी के समर्पण और समग्र स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों में उल्लेखनीय सुधार करती है।

आज भारत में 290 से अधिक होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल हैं। साथ ही, देशभर में चिकित्सकों का एक विशाल नेटवर्क भी उपलब्ध है। फिर भी, होम्योपैथी के असली प्रभावों को संस्थानों में नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर – झारखंड के जनजातीय जिलों, छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में और हिमाचल प्रदेश की दूरदराज की बस्तियों में – बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। वहां एक अकेला चिकित्सक भी सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों में बदलाव ला सकता है।

होम्योपैथी की प्रमुख खूबियों में से एक इसकी सरलता भी है। दवाइयां किफायती होती हैं, इन्हें लाना-ले जाना आसान होता है और इनके भंडारण के लिए किसी जटिल भंडारण संरचना की जरूरत ही नहीं होती है। कमजोर आपूर्ति श्रृंखलाओं और सीमित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों वाले इलाकों में, होम्योपैथी की ये विशेषताएं अनमोल हो जाती हैं।

जनजातीय समुदायों, जो हमारी आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अक्सर बीमारियों का बेमेल बोझ झेलते हैं, के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सांस्कृतिक रूप से भी अनुकूल होना चाहिए। होम्योपैथी का सौम्य और गैर-आक्रामक रवैया पारंपरिक उपचार पद्धतियों के अनुरूप है, जिससे यह अपेक्षाकृत अधिक स्वीकार्य और सुलभ हो जाता है।

इसी क्षमता को पहचानते हुए, भारत सरकार ने होम्योपैथी को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं साथ जोड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत, 12,500 से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (आयुष) स्थापित किए गए हैं, जो सामुदायिक स्तर पर होम्योपैथी सहित व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि होम्योपैथी भारत में गैर-संक्रामक रोगों से निपटने में भी योगदान दे रही है। केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) ने मधुमेह, हृदय रोग और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से निपटने से संबंधित राष्ट्रीय कार्यक्रमों में होम्योपैथी को जोड़ा है। यह प्राथमिक देखभाल से परे इसकी प्रासंगिकता को दर्शाता है।

आपूर्ति के नए-नए मॉडल भी उतने ही उत्साहजनक हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के अंतर्गत सेवाओं के एक ही स्थान पर उपलब्ध होने की सुविधा ने पहुंच और विश्वास दोनों को बेहतर बनाया है। चलंत चिकित्सा इकाइयां जहां दूरदराज के इलाकों तक पहुंच रही हैं, वहीं सामुदायिक सहायता से जुड़ी पहलों और महामारी से निपटने से संबंधित कार्यक्रमों ने विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य परिदृश्यों में होम्योपैथी की अनुकूलता को प्रदर्शित किया है।

शायद सबसे कारगर मॉडल बुनियादी होम्योपैथी में प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का है। सही ज्ञान और रेफरल सिस्टम के सहयोग से, ये कार्यकर्ता न्यूनतम लागत पर स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार कर सकते हैं। स्वास्थ्य रक्षा जैसे कार्यक्रम और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीसीआरएच) द्वारा संचालित संपर्क संबंधी पहलों ने पहले ही दिखा दिया है कि समुदाय-आधारित दृष्टिकोण सार्थक नतीजे दे सकते हैं।

भविष्य को देखते हुए, सतत स्वास्थ्य एवं कल्याण के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत, पुरानी बीमारियों का बढ़ता बोझ और रोगाणुरोधी प्रतिरोध जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने हेतु ऐसे समाधानों की जरूरत है जो न केवल कारगर हों बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से व्यवहारिक भी हों।

होम्योपैथी इस दृष्टिकोण के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाती है। इसके कम लागत वाले उपचार परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर वित्तीय बोझ को कम करते हैं। जबकि इसका न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार स्वास्थ्य और कल्याण संबंधी कार्यप्रणालियों का समर्थन करता है।

अब हमारा ध्यान इन प्रयासों को व्यापक स्तर पर कार्यान्वित करने पर होना चाहिए।  इन प्रयासों में कम सुविधा वाले क्षेत्रों में प्रशिक्षण को मजबूत करना, दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना, गहन अनुसंधान एवं दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देना और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना शामिल है।

विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भौगोलिक स्थिति या सामाजिक-आर्थिक हैसियत की परवाह किए बिना गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रत्येक नागरिक तक पहुंचेगी। होम्योपैथी, अपने गहरे सामुदायिक जुड़ाव और टिकाऊ दृष्टिकोण के साथ, इस लक्ष्य को हासिल  करने का मार्ग प्रशस्त करती है।

हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की असली पहचान उसकी अत्याधुनिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि हाशिए  पर रहने वाले लोगों की सेवा करने की उसकी क्षमता में निहित है। जब एक सरल और किफायती उपाय किसी दूरदराज के गांव में एक परिवार को राहत पहुंचाता है, तो यह इस    सशक्त विचार को पुष्ट करता है – कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं अधिक समावेशी, अधिक मानवीय और वास्तव में सार्वभौमिक होती जा रही हैं।

[लेखक आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं]

भारत की विकास गाथा के केंद्र में महिलाएँ
  • श्रीमती विजया रहाटकर

भारत की विकास गाथा को अक्सर संख्याओं, विकास दरों, अवसंरचना विस्तार और आर्थिक उपलब्धियों के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन, पिछले दशक का सबसे बड़ा बदलाव आँकड़ों से परे है। यह एक गहरे सामाजिक बदलाव में परिलक्षित होता है—महिलाओं का केवल भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को आकार देने वाले अग्रिम व्यक्तियों के रूप में उभरना।

महिलाओं के नेतृत्व में विकास की ओर यह बदलाव न तो आकस्मिक है और न ही अलग-थलग है। यह एक सोच-समझकर किये गये सतत प्रयास का परिणाम है, जो जीवन के हर चरण में महिलाओं को समर्थन देने के लिए एक सक्षम इकोसिस्टम का निर्माण करता है। लड़की के जन्म से लेकर उद्यमी, पेशेवर, या सार्वजनिक प्रतिनिधि के रूप में उसकी यात्रा तक, यह दृष्टिकोण समग्र, सतत और परिवर्तनकारी रहा है।               

राजनीतिक भागीदारी में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा गया है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 12,14,885 है, जिनकी कुल 24,41,781 निर्वाचित प्रतिनिधियों में हिस्सेदारी 49.75% है—इस प्रकार, महिलाएँ जमीनी स्तर पर शासन में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। इस क्रम में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी उपलब्धि है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। यह उच्च विधायी क्षेत्रों में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने में राष्ट्र की अडिग प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। इस ऐतिहासिक सुधार की वास्तविक क्षमता केवल इसके प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से ही हासिल की जा सकती है। अधिनियम की प्रावधानों को जल्द से जल्द लागू करने की आवश्यकता है, ताकि महिलाओं की आवाज़ को सिर्फ मान्यता ही न मिले, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संरचना में इसे संस्थागत रूप से समाहित किया जा सके। इसके जल्द लागू होने से न केवल समावेशी शासन को गति मिलेगी, बल्कि यह बेहतर प्रतिनिधित्व और न्यायसंगत राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक के रूप में भी कार्य करेगा।  

दशकों तक, लैंगिक पक्षपात ने भारत के जनसांख्यिकीय और सामाजिक संकेतकों को प्रभावित किया। आज, वह कहानी धीरे-धीरे फिर से लिखी जा रही है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों ने गहरी  जड़ें जमा चुकी मानसिकताओं को चुनौती देने और लड़की के मूल्य को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। इसका प्रभाव राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) में दिखाई देता है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का लैंगिक अनुपात दर्ज किया गया है, जो सिर्फ संख्यात्मक सुधार ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का भी संकेत देता है। ‘मिशन इंद्रधनुष’ जैसे कार्यक्रम जीवन के प्रारंभिक चरण में पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करते हैं। ‘मिशन सक्षम आंगनवाड़ी’, ‘पोषण 2.0’, तथा ‘पोषण अभियान’ के प्रयास कुपोषण का समाधान करते हैं—यह मानते हुए कि स्वस्थ बचपन, सशक्त वयस्कता की ओर पहला कदम होता है।  

माताओं के लिए, संस्थागत समर्थन में काफी विस्तार हुआ है। पीएमएमवीवाई के तहत, 4.28 करोड़ से अधिक महिलाओं को 20,149 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि वितरित की गयी है, जो गर्भावस्था के दौरान वित्तीय सहायता प्रदान करती है। 

महिलाएं केवल भाग ही नहीं ले रही हैं—वे नेतृत्व भी कर रही हैं। भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में संस्थापक और निर्णयकर्ताओं के रूप में महिलाओं की भूमिका में लगातार वृद्धि हो रही है और वे नवाचार और उद्यम में भी योगदान दे रही हैं। इस परिवर्तन में वित्तीय समावेश ने अहम भूमिका निभाई है। पीएमएमवाई के तहत, 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 57.79 करोड़ ऋण प्रदान किए गए हैं, जिनमें लगभग 66% लाभार्थी महिलाएं हैं। प्रत्येक ऋण केवल वित्तीय सहायता का ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आकांक्षाओं में विश्वास का भी प्रतीक है। इसके पूरक रूप में, जन धन योजना के तहत वित्तीय समावेश और गहरा हुआ है, जिसके अंतर्गत 57.93 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें से 32.29 करोड़ (55.7%) महिलाओं के हैं।

जमीनी स्तर पर, परिवर्तन का पैमाना और भी अधिक प्रभावशाली है। लगभग 10 करोड़ महिलाओं को 90 लाख से अधिक स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिससे सामूहिक सहनशीलता, वित्तीय स्वतंत्रता और सामाजिक आत्मविश्वास को बढ़ावा मिला है। इस इकोसिस्टम ने 3 करोड़ से अधिक महिलाओं को लखपति दीदी के रूप में उभरने में सक्षम बनाया है और स्वयं सहायता समूहों को 12.50 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बैंक ऋण प्राप्त हुआ है। इसके अलावा, 84 लाख ग्रामीण महिलाएं उद्यमी बन चुकी हैं, जबकि 5 करोड़ महिला किसानों ने उन्नत और सतत कृषि प्रथाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किये हैं।

स्वाभाविक रूप से अगला सवाल उठता है—क्या सशक्तिकरण, आजीविका से समृद्धि की ओर बढ़ सकता है? लखपति दीदी जैसी पहलों का लक्ष्य आय सृजन को मजबूत करना है, जबकि ड्रोन दीदी पहल, जिसका लक्ष्य 15,000 महिलाओं को ड्रोन पायलट के रूप में प्रशिक्षित करना है, एक दूरदर्शी दृष्टिकोण को परिलक्षित करती है—ग्रामीण महिलाओं को प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि इकोसिस्टम में एकीकृत करना।

सशक्तिकरण का मतलब रोजमर्रा के बोझ को आसान बनाना भी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10.56 करोड़ से अधिक धुँआ-रहित रसोई घरों ने स्वास्थ्य में सुधार किया है और कठिनाइयों को कम किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 11.8 करोड़ से अधिक शौचालयों के निर्माण ने गरिमा और सुरक्षा में वृद्धि की है। प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसकी 73% लाभार्थी महिलाएं हैं, के तहत निर्मित घरों ने स्वामित्व और सुरक्षा को मजबूत किया है। साथ मिलकर ये सभी पहलें दैनिक जीवन में गरिमा की परिभाषा को नए सिरे से स्थापित करती हैं।

इसके साथ ही, महिलाएं उन स्थानों में भी प्रवेश कर रही हैं, जिन्हें कभी उनकी पहुँच से बाहर माना जाता था। सशस्त्र बल इस बदलती हुई वास्तविकता को दर्शाते हैं, जहाँ महिलाएँ नेतृत्व और जिम्मेदारी की भूमिकाएँ निभा रही हैं, जिसमें युद्ध क्षेत्र भी शामिल हैं। सवाल अब यह नहीं है कि महिलाएँ सेवा कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि वे कितनी दूर तक नेतृत्व कर सकती हैं।

कार्यस्थल सुधारों ने भी इस बदलाव में योगदान दिया है। नयी श्रम संहिताएँ महिला कर्मचारियों को उचित सुरक्षा उपायों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में, जिसमें रात की शिफ्ट भी शामिल है, काम करने में सक्षम बनाकर समावेश को बढ़ावा देती हैं। ये संहिताएँ समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान पर जोर देती हैं—सुरक्षा से सशक्तिकरण की ओर बदलाव को रेखांकित करती हैं।

संस्थागत समर्थन एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने शिकायत निवारण से आगे बढ़कर सक्रिय जुड़ाव और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भी अपना विस्तार किया है। ‘शी सर्व्स’ जैसी पहल महिला अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन करती हैं, जबकि ‘यशोदा एआई’ उन्हें उभरते तकनीकी कौशल प्रदान करती है। ‘कैंपस कॉलिंग’ युवाओं में जागरूकता बढ़ाता है, ‘शी इज अ चेंज मेकर’ कार्यक्रम जमीनी स्तर पर नेतृत्व क्षमता को मजबूत करता है और ‘महिला जनसुनवाई’ सुलभ शिकायत निवारण सुनिश्चित करता है।

जो उभरकर सामने आता है, वह प्रयासों का एक शक्तिशाली समन्वय है, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास के नए युग को आकार दे रहा है।   

(लेखिका राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष हैं)

शुरुआती कदमों से भविष्य के सपनों तक: हर बच्चे के लिए सीखने का नया स्वरूप
  • श्री धर्मेंद्र प्रधान

राष्ट्रीय नवनिर्माण का क्षण

हर साल, जब स्कूलों के द्वार नए शैक्षणिक सत्र के लिए खुलते हैं, तो भारत सामूहिक संकल्प के सबसे गहन उदाहरणों में से एक का साक्षी बनता है। पहाड़ों और तटों से लेकर शहरों और दूरदराज के गांवों तक, लाखों बच्चे कभी-कभी अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों के बावजूद, नए जोश, नई आकांक्षाओं और अपार संभावनाओं के साथ अपनी कक्षाओं में कदम रखते हैं। यह एक शांत लेकिन शक्तिशाली राष्ट्रीय क्षण है। इस वर्ष भी लगभग दो करोड़ बच्चों ने पहली कक्षा में प्रवेश लिया है, जो आशा और एक साझा राष्ट्रीय जिम्मेदारी दोनों को समेटे हुए है।

भारत का स्कूली ढांचा बेहद विशाल है। इसमें 14.7 लाख से अधिक स्कूल, लगभग 25 करोड़ नामांकित छात्र और एक करोड़ से ज्यादा शिक्षक शामिल हैं। ये संख्याएं केवल प्रशासनिक स्तर को मापने का जरिया भर नहीं हैं, बल्कि ये शिक्षा के माध्यम से हमारे देश के भविष्य को गढ़ने की एक मजबूत प्रतिबद्धता की घोषणा करती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने रटने की आदत से आगे बढ़कर जिज्ञासा, समझ और समग्र विकास (होलिस्टिक डेवलपमेंट) को सीखने के केंद्र में रखा है। हर नया शैक्षणिक सत्र उस सपने को साकार करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।

बालवाटिका लागू होने से अब छोटे बच्चों की शुरुआती पढ़ाई स्कूल व्यवस्था का हिस्सा बन गई है। इससे बच्चे पहली कक्षा में बेहतर तैयारी और मजबूत बुनियादी कौशल के साथ प्रवेश करते हैं। बच्चे का स्कूल में दाखिला उसके जीवनभर के सीखने और समाज से जुड़ने की शुरुआत होता है। इसलिए जरूरी है कि यह सफर खुशी, अच्छे माहौल और अपनापन महसूस कराने वाला हो।

सीखने का सफर: पहले कदम से आत्मविश्वास तक

स्कूल का पहला दिन खास होता है। इसमें थोड़ी झिझक होती है, तो नए शुरुआत की खुशी भी होती है। छोटे-छोटे बच्चे अपने बड़े-बड़े भाव लेकर स्कूल आते हैं और उनकी जिज्ञासु आंखें एक नई दुनिया देखती हैं। जब बच्चे खुद को सुरक्षित और महत्वपूर्ण महसूस करते हैं, तो वे खुलने लगते हैं। वे ज्यादा भाग लेते हैं, सवाल पूछते हैं और उनकी जिज्ञासा बढ़ती है। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास भी मजबूत होता जाता है। शुरुआती साल खेल, खोज और नई चीज़ें सीखने पर आधारित होने चाहिए, यही जीवनभर की सीखने की यात्रा की शुरुआत है।

अच्छे रिश्ते बहुत मायने रखते हैं। एक समझदार और देखभाल करने वाला शिक्षक बच्चे की जिंदगी बदल सकता है। सहयोगी कक्षा माहौल बच्चे की चुप्पी को भागीदारी में और भागीदारी को आत्मविश्वास में बदल सकता है। जब बच्चा खुद को सच में समझा और सुना हुआ महसूस करता है, तो उसकी जिज्ञासा हिम्मत में बदल जाती है। और जब उसे अपनापन महसूस होता है, तो वह अपनी आवाज़ पहचानने लगता है।

इन प्रारंभिक वर्षों के केंद्र में बुनियादी साक्षरता और अंकगणित के प्रति एक मजबूत राष्ट्रीय प्रतिबद्धता निहित है। निपुण भारत मिशन के माध्यम से, भारत ने एक स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है: कक्षा 2 के अंत तक प्रत्येक बच्चा समझ के साथ पढ़ सके और बुनियादी अंकगणित कर सके। ध्यान उत्तरों को रटने से हटकर अवधारणाओं को समझने पर केंद्रित है। कक्षाओं को बच्चों को केवल उत्तर दोहराने के बजाय प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यह दृष्टिकोण अकादमिक शिक्षा से परे है। कला, खेल और मूल्य सीखने की प्रक्रिया के अनिवार्य अंग हैं। शिक्षा को ‘संपूर्ण बच्चे’ का निर्माण करना चाहिए- न केवल मन का, बल्कि शरीर और हृदय का भी। शारीरिक गतिविधि और पोषण दैनिक स्कूली जीवन का अभिन्न अंग हैं। एक स्वस्थ बच्चा बेहतर सीखता है, अधिक भाग लेता है और आत्म-सम्मान की स्वस्थ भावना के साथ विकसित होता है।

उभरती चुनौतियों का सामना

वैश्विक स्तर पर, बच्चों की जीवनशैली में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। खान-पान की आदतों में बदलाव और शारीरिक गतिविधि में कमी कई देशों के लिए चिंता का विषय बन गई है। भारत इस चुनौती का सक्रिय रूप से सामना कर रहा है। अनिवार्य शारीरिक शिक्षा, स्कूलों में मोटापे से निपटने के लिए ‘ऑयल बोर्ड’ और ‘शुगर बोर्ड’ जैसे उपाय और पोषण गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने वाली मजबूत पीएम-पोषण योजना स्कूलों को स्वास्थ्य और सक्रिय जीवनशैली की ओर उन्मुख कर रही है। इन प्रयासों का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना है जो स्वास्थ्य को समग्र विकास का केंद्र मानती हो।

हालांकि प्रौद्योगिकी शिक्षा और पहुंच के लिए एक शक्तिशाली माध्यम है, सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग से स्क्रीन टाइम, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। यह एक वैश्विक चिंता है, न कि केवल भारत तक सीमित। स्कूलों और परिवारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसका उपयोग सीखने के साधन के रूप में किया जाए, न कि ध्यान भटकाने के साधन के रूप में।

इस दृष्टिकोण में बच्चों का मानसिक और भावनात्मक कल्याण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों में सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा को शामिल किया गया है ताकि बच्चों के विकास में सहयोग मिल सके, ऐसे समय में जब बच्चे पिछली किसी भी पीढ़ी की तुलना में अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण दुनिया का सामना कर रहे हैं। सुरक्षित और तनावमुक्त वातावरण बनाने के लिए स्कूलों, अभिभावकों, शिक्षकों और समुदायों के संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं।

शिक्षकों की भूमिका

सुधार केवल नीतिगत दस्तावेजों के माध्यम से बच्चों तक नहीं पहुंचता, यह शिक्षकों के माध्यम से ही लागू होता है। वे ही शिक्षा के परिवर्तन के सच्चे सूत्रधार हैं, जो दूरदृष्टि और कक्षा की वास्तविकता के बीच की खाई को पाटते हैं। शिक्षकों को बहुभाषी वातावरण में पढ़ाना चाहिए और यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे की मातृभाषा का सम्मान किया जाए और उसे सीखने के एक सशक्त साधन के रूप में उपयोग किया जाए। इसे महत्व देकर, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि औपचारिक शिक्षा में उनका संक्रमण सहज, आत्मविश्वासपूर्ण और उनकी अपनी पहचान से जुड़ा हो। मैं अपने शिक्षकों से आह्वान करता हूं कि वे प्रत्येक बच्चे की गति, व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए और अपनी देखरेख में प्रत्येक छात्र के भावनात्मक और मानसिक कल्याण के प्रति सचेत रहते हुए योग्यता-आधारित शिक्षा को प्राथमिकता दें।

माता-पिता की भूमिका

शिक्षा विद्यालय के द्वार पर शुरू या समाप्त नहीं होती। घर ही पहला कक्षास्थल है और माता-पिता ही पहले शिक्षक। घर पर बच्चे जो अनुभव प्राप्त करते हैं, वही उनके विद्यालय में सीखने के तरीके को आकार देता है। पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना और बच्चे के प्रश्नों का धैर्यपूर्वक उत्तर देना, ज्ञान की जिज्ञासा को पोषित करने के सूक्ष्म कार्य हैं। मैं माता-पिता से आग्रह करता हूं कि वे सुनिश्चित करें कि बच्चों को संतुलित पोषण और पर्याप्त नींद मिले, उन्हें प्रतिदिन पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और बाहरी वातावरण का अनुभव मिले। माता-पिता को विद्यालय के साथ सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए और बच्चे की सफलता को केवल अंकों के आधार पर ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, दयालुता और सीखने में निरंतर रुचि के आधार पर भी मापना चाहिए। माता-पिता अपने बच्चे को जो सबसे बड़ा उपहार दे सकते हैं, वह है यह विश्वास दिलाना कि सीखना वास्तव में आनंददायक है।

एक साझा राष्ट्रीय प्रतिबद्धता

शिक्षा एक साझा जिम्मेदारी है। यह सरकारों, स्कूलों, शिक्षकों, अभिभावकों और समुदायों की जिम्मेदारी है। हर हितधारक की इसमें भूमिका है। हर बच्चे को सीखने की यात्रा में देखा, सुना और मार्गदर्शन किया जाना चाहिए। हमारी शिक्षा प्रणाली की सच्ची पहचान कुछ चुनिंदा उच्च उपलब्धि हासिल करने वालों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना हर बच्चा आत्मविश्वास और आनंद के साथ सीखता है या नहीं। आइए, समावेशी, नवोन्मेषी और भविष्य के लिए तैयार शिक्षा प्रणाली के निर्माण के प्रति अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को दोहराएं। साथ मिलकर, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर कक्षा सपनों को साकार करने का स्थान बने और आने वाले कल के नेताओं का निर्माण हो। 2047 तक विकसित भारत के अग्रदूत आज हमारी कक्षाओं में मौजूद हैं। आइए, उन्हें उड़ान भरने के लिए सुनहरे पंख दें।

(लेखक केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं)

विधायी नेतृत्व: नीति निर्धारण में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की परिवर्तनकारी शक्ति

विधायी नेतृत्व: नीति निर्धारण में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की परिवर्तनकारी शक्ति

  • श्रीमती अन्नपूर्णा देवी

भारत के समक्ष एक असाधारण अवसर है—अपनी विधायिकाओं को नया आकार देने, महिलाओं के नेतृत्व को आगे बढ़ाने और एक ऐसे लोकतंत्र की रचना करने का- जो सही मायनों में अपने लोगों की शक्ति को प्रतिबिंबित करता हो। जब महिलाएँ शासन में अपना उचित स्थान ग्रहण करती हैं, तब सभी की आवश्यकताओं के अनुरूप बेहतर नीतियाँ बनती हैं, और राष्ट्र अधिक उद्देश्य और शक्ति के साथ आगे बढ़ता है।

सितंबर 2023 में पारित संविधान (एक सौ छठा संशोधन) अधिनियम — नारी शक्ति वंदन अधिनियम — हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सुधारों में से एक है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में बनाया गया यह कानून हमारे देश के लोकतांत्रिक ढाँचे में महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाता है।

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के विजन में निहित यह ऐतिहासिक कानून, लोकसभा और राज्यों की  विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करते हुए विकसित भारत के निर्माण की दिशा में एक साहसिक कदम है।

यह मात्र संवैधानिक प्रावधान से कहीं बढ़कर है—यह एक परिवर्तनकारी विजन का संस्थागत रूप है, जहाँ महिलाएँ केवल लोकतंत्र में भागीदारी ही नहीं करतीं, बल्कि उसके ताने-बाने को भी आकार देती हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा महिला सशक्तिकरण और समावेशी विकास को दिए गए निरंतर समर्थन ने लंबे समय से चली आ रही उम्‍मीदों को हकीकत में बदलने की मजबूत प्रेरणा प्रदान की है। 

भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को केवल अधिक महिलाओं की ही नहीं, बल्कि ऐसी महिलाओं की आवश्यकता है जिनके पास नीतिगत परिणामों को आकार देने के लिए अधिकार, क्षमता और पर्याप्त अवसर हों। वर्तमान सरकार ने पिछले एक दशक में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण निवेश किया है, जिससे इस विधायी परिवर्तन के लिए मजबूत आधार तैयार हुआ है। जन धन खाताधारकों में 56% से अधिक महिलाएँ  हैं, जिससे वित्तीय समावेशन को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलता है। मुद्रा योजना के लगभग 67% लाभार्थी महिलाएँ  हैं, जो उद्यमिता में उनकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत स्वीकृत 73% से अधिक मकान महिलाओं के नाम पर हैं, जबकि उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 10 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शनों ने घरेलू जीवन स्तर में सुधार किया है। ये सभी कदम एक स्पष्ट नीतिगत दिशा — भागीदारी के जरिए सशक्तिकरण- की ओर इंगित करते हैं हालांकि, अब ध्यान भागीदारी से आगे बढ़कर निर्णय-लेने तक पहुँचने पर केंद्रित है।

हमारे देश का अपना अनुभव एक मजबूत मानक प्रस्तुत करता है। स्थानीय स्तर पर, अब पंचायती राज संस्थाओं में चुने गए प्रतिनिधियों में से लगभग 50% महिलाएँ हैं, यानी 12 लाख से अधिक नेताओं के रूप में वे स्थानीय शासन को दिशा दे रही हैं। उनका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। महिला-नेतृत्व वाली स्थानीय संस्थाओं ने विकास से जुड़े  जल, स्वच्छता, शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य देखरेख जैसे प्रमुख मुद्दों पर लगातार ध्यान केंद्रित किया है, जो दर्शाता है कि नेतृत्व में विविधता नीति निर्माण में सकारात्मक बदलाव लाती है।

अब यह प्रश्न नहीं रह गया है कि महिलाएँ प्रभावी नेतृत्व कर सकती हैं या नहीं; इसके प्रमाण पहले से मौजूद हैं। अब समय आ गया है कि भारत की उच्च विधायी संस्थाएँ महिलाओं के नेतृत्व को पूर्ण रूप से अपनाएँ और उसे बढ़ाएँ। नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने पहले ही आधार तैयार कर दिया है, जो सार्थक प्रतिनिधित्व के लिए एक मजबूत संरचनात्मक नींव प्रदान करता है। राजनीतिक दलों के पास अब इस गति को आगे बढ़ाने—उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को नए सिरे से परिभाषित करने, चुनावी अभियान के लिए वित्तीय संसाधनों तक पहुँच का विस्तार करने तथा महिला नेताओं के लिए स्पष्ट और सशक्त मार्ग तैयार करने का जबरदस्‍त अवसर है। उचित सुधारों के साथ, राजनीतिक दल विधायी समावेशन को विजन से जीवंत और जीती-जागती हकीकत में परिवर्तित कर सकते हैं।

सरकार संसद और राज्य विधानसभाओं में संस्थागत तत्परता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। पहली बार निर्वाचित होने वाले विधायकों को सशक्त नीतिगत अनुसंधान, समग्र विधायी प्रशिक्षण और मजबूत सहकर्मी नेटवर्क तक पहुँच प्रदान करके, सरकार उन आधारों में निवेश कर रही है जो बढ़ी हुई भागीदारी को अधिक प्रभावी और सटीक निर्णय-लेने में परिवर्तित करते हैं।  

प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार महिलाओं के नेतृत्व में विकास के विजन पर लगातार कार्य करती रही है, और उसने नारी शक्ति को भारत की विकास गाथा के केंद्र में स्थापित किया है। इस अधिनियम  का पारित होना विधायी स्तर पर इस विजन को दर्शाता है।

यदि इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाया जाए, तो इसकी संभावनाएँ असाधारण हैं। वास्तविक प्रभाव के साथ प्रतिनिधित्व असर को कई गुणा बढ़ा देता है। वास्‍तविक ताकत के साथ उपस्थिति सुधार को तेज करती है। भारत दोनों को अपनाने के लिए तैयार है—और इससे होने वाले लाभ परिवर्तनकारी होंगे। जैसे-जैसे देश 2047 तक विकसित भारत बनने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है, इसकी विधायी संस्थाओं की शक्ति एक महत्वपूर्ण कारक होगी। महिलाओं के विधायी नेतृत्व को बढ़ाना केवल निष्‍पक्षता का मामला नहीं है; यह स्वयं शासन को सुदृढ़ करने के बारे में है।

 नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने वास्तविक संभावनाओं का क्षण उत्पन्न किया है। अब इस क्षण को स्थायी परिवर्तन में बदलने का अवसर और शक्ति दोनों ही राजनीतिक संस्थाओं, दलों और नीति निर्माताओं के पास मौजूद हैं।

 प्रगति का असली पैमाना उन महिलाओं में दिखाई देगा, जो केवल सीटों पर बैठतीं ही नहीं, बल्कि उन्हें अधिकारपूर्वक संचालित भी करती हैं—जो साहसिक कानून तैयार करती हैं, परिवर्तनकारी एजेंडे तय करती हैं, और आने वाली पीढ़ियों के लिए शासन के स्वरूप को नया आकार देती हैं। इस बिल के लागू होने के साथ, भारत की विधायिकाओं की केवल संरचना ही नहीं बदलेंगी—बल्कि उनके उद्देश्य, शक्ति और वादे भी बदलेंगे।

(श्रीमती अन्नपूर्णा देवी, भारत सरकार की केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

भारतीय शासन व्यवस्था की पटकथा फिर से लिख रहा है मिशन कर्मयोगी

कल्पना करें कि राजस्थान के दूरदराज के किसी कोने में जिला कलेक्टर को एक ऐसी महत्वाकांक्षी कल्याण योजना की जिम्मेदारी सौंपी जाती है जिसके बारे में उसकी जानकारी बहुत कम है। एक दशक पहले उसे जानकारी के लिए कहीं धूल खा रही किसी नियमावली का सहारा लेना होता। या फिर वह अपने किसी वरिष्ठ सहयोगी की तीन बैठकों और लंच के बाद खाली होने का इंतजार करता। उसकी उम्मीद उस प्रशिक्षण कार्यक्रम पर भी टिकी हो सकती थी जो शायद एक या दो साल में कभी आता। लेकिन आज वह अपने फोन के जरिए आईगॉट (इंटिग्रेटेड गर्वनमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म) पर लॉग ऑन करता है। उसे मिनटों में ही अपनी जरूरत के अनुरूप एक सुव्यवस्थित कार्यकुशलता आधारित पाठ्यक्रम मिल जाता है। वह शाम तक सूचनाओं और आत्मविश्वास से लैस होकर योजना के लाभार्थियों की पहली बैठक की अध्यक्षता कर रहा होता है। यह बदलाव देखने में छोटा लग सकता है मगर हकीकत में किसी क्रांति से कम नहीं है।

चमक-दमक से दूर धैर्य के साथ पांच साल पहले शुरू किया गया मिशन कर्मयोगी एक क्रांति ला रहा है। यह नए भारत के लिए एक नई तरह के प्रशासनिक अधिकारी तैयार करने के उद्देश्य से चुपचाप काम कर रहा है।

इसके महत्व को समझने के लिए हमें पहले संदर्भ को जानना होगा। 2047 तक विकसित भारत के प्रधानमंत्री के निर्धारित लक्ष्य तक यूं ही नहीं पहुंचा जा सकता। इस मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें भारत गणतंत्र को चलाने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के जरिए सावधानी से एक-एक कदम आगे बढ़ना होगा। इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी, प्रौद्योगिकी या नीति नहीं है। सबसे ज्यादा अहमियत उन लगभग 3.5 करोड़ प्रशिक्षित, उत्साही और नागरिक केंद्रित सरकारी कर्मियों की क्षमता की है जो हर सुबह उठ कर भारतीय शासन को संचालित करते हैं।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में ज्यादातर समय क्षमता निर्माण का मॉडल सांयोगिक रहा है। किसी नौजवान अधिकारी को सेवा की शुरुआत के समय औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता था। फिर करियर के बीच में यदा-कदा उसे कुछ पाठ्यक्रमों में हिस्सा लेने का अवसर मिल सकता था। बाकी, उसे काम करते हुए और दूसरों को देख कर ही सीखना होता था। एक स्थिर और धीमी गति से आगे बढ़ते विश्व में यह काफी था। लेकिन कृत्रिम मेधा, जलवायु अवरोध, जनसांख्यिकीय दबाव और जबर्दस्त प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के युग में यह सरासर नाकाफी है। प्रशासन के सामने चुनौतियां जिस रफ्तार से आती हैं उसके सामने प्रशिक्षण की पुरानी प्रणालियों की गति कहीं नहीं टिकती।

‘मिशन कर्मयोगी’ को इसी बेमेल स्थिति के समाधान के रूप में की गई थी। 2021 में शुरू किया गया यह मिशन—जिसे उसी वर्ष अप्रैल में स्थापित ‘क्षमता निर्माण आयोग’ द्वारा संस्थागत रूप से संचालित किया गया, एक सचमुच महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए आगे बढ़ा। भारतीय सिविल सेवाओं की सीखने की संस्कृति को, समय-समय पर होने वाली और केवल नियमों के पालन तक सीमित प्रक्रिया से बदलकर, एक निरंतर चलने वाली, भूमिका-आधारित और स्वयं-निर्देशित विकास यात्रा में रूपांतरित करना इसका मकसद है। जैसा कि आयोग इसका वर्णन करता है, यह बदलाव ‘कर्मचारी’—यानी नियमों का पालन करने वाले एक पदाधिकारी से ‘कर्मयोगी’ बनने की ओर है: एक ऐसा लोक सेवक जो किसी उद्देश्य, सेवा-भाव और उत्कृष्टता से प्रेरित हो।

पाँच वर्षों के बाद, ये आंकड़े अत्यंत शिक्षाप्रद हैं। ‘आईगॉट’ (इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग) प्लेटफॉर्म पर अब 1.5 करोड़ से अधिक सरकारी अधिकारी सक्रिय शिक्षार्थी के रूप में जुड़े हैं — यह एक ऐसी संख्या है जो शुरुआत के समय काल्पनिक लगती थी। 4,600 से अधिक योग्यता-आधारित पाठ्यक्रमों के माध्यम से, इन अधिकारियों ने 8.3 करोड़ से अधिक पाठ्यक्रम पूरे किए हैं। अकेले पिछले ‘राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह’  के दौरान, भागीदारी के परिणामस्वरूप 4.5 मिलियन घंटे के पाठ्यक्रम नामांकन और 3.8 मिलियन घंटे की वास्तविक शिक्षा दर्ज की गई। ये केवल अमूर्त आंकड़े नहीं हैं। दर्ज किया गया प्रत्येक घंटा भारत में कहीं न कहीं एक लोक सेवक का प्रतिनिधित्व करता है — छत्तीसगढ़ में एक राजस्व निरीक्षक, पुणे में एक शहरी स्थानीय निकाय अधिकारी, मणिपुर में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, ये सब अपने साथी नागरिकों की बेहतर सेवा करने के लिए अपनी क्षमता बढ़ा रहें हैं।

जो बात आईगॉट प्लेटफॉर्म को वास्तव में परिवर्तनकारी बनाती है, वह केवल इसका पैमाना नहीं है, बल्कि इसकी ‘पहुँच की संरचना’  है। यह किसी भी समय और कहीं भी, स्मार्टफोन या डेस्कटॉप पर, कई भाषाओं में उपलब्ध है, और इसे शिक्षार्थी के पेशेवर प्रोफाइल के अनुसार बनाया गया है। पाठ्यक्रमों को हर तीन से छह महीने में अपडेट किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शासन में एआई टूल का उपयोग कैसे करें या नए वित्तीय नियमों को कैसे समझें, इससे संबंधित सामग्री वर्तमान और प्रासंगिक बनी रहे। दूसरे शब्दों में, यह प्लेटफॉर्म धूल फांकने वाली कोई डिजिटल लाइब्रेरी नहीं है — बल्कि यह सीखने का एक जीवंत और अनुकूलन योग्य तंत्र है। इस पर विचार कीजिए कि एक आदिवासी जिले की जूनियर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए इसका क्या अर्थ है, जिसे उसकी अपनी भाषा में बाल पोषण मूल्यांकन के नवीनतम प्रोटोकॉल समझाने वाला एक मॉड्यूल प्राप्त होता है। उसे अपने ब्लॉक में किसी प्रशिक्षक के आने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। वह सीखती है, और कार्य करती है। यही इस मिशन का ‘लोकतांत्रिक लाभांश’ है।

क्षमता निर्माण आयोग, इस तंत्र  के रणनीतिक संरक्षक के रूप में, एक साथ ‘वास्तुकार’  और ‘संचालक’ दोनों की भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय नीति बनाने वाले एक सचिव से लेकर ग्राम स्तर पर इसे लागू करने वाले एक पंचायत पदाधिकारी तक, यह पहचान करता है कि सार्वजनिक भूमिकाओं के विशाल स्पेक्ट्रम में किन योग्यताओं की आवश्यकता है। यह सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय मानक 2.0 ढांचे के माध्यम से देश के प्रशिक्षण संस्थानों के लिए गुणवत्ता मानक निर्धारित करता है, जिसके तहत देश भर के 200 से अधिक प्रशिक्षण संस्थान पहले ही मान्यता प्राप्त  कर चुके हैं। यह राज्यों के साथ मिलकर काम करता है। सभी 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अब औपचारिक समझौता ज्ञापनों  के माध्यम से जुड़ चुके हैं  ताकि ऐसी विशिष्ट ‘क्षमता निर्माण योजनाएं’  तैयार की जा सकें जो कार्यबल की दक्षताओं को संगठनात्मक लक्ष्यों के साथ जोड़ती हैं। ‘राष्ट्रीय कर्मयोगी जन सेवा कार्यक्रम’ जैसी ऐतिहासिक पहलों के माध्यम से, इसने एक मिलियन से अधिक प्रमाणित अधिकारियों को बड़े पैमाने पर व्यवहार प्रशिक्षण दिया  है, जो प्रत्येक नागरिक को अंतिम हितधारक के रूप में मानने की सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण कला है।

मिशन के इस अंतिम आयाम पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ के बारे में है जिसे ‘पूर्णता प्रमाण पत्र’ या ‘लॉग किए गए घंटों’ में आसानी से नहीं मापा जा सकता। मिशन कर्मयोगी की सबसे गहरी आकांक्षाओं में से एक है—दृष्टिकोण में बदलाव। यह राज्य और नागरिक के बीच एक ‘लेन-देन’ वाले संबंध से हटकर ‘नागरिक देवो भव’ की भावना से परिभाषित संबंध की ओर एक आंदोलन है: नागरिक ईश्वर के समान है, वह सर्वोच्च अधिकारी है जिसके प्रति राज्य का सेवक जवाबदेह है। जब रेलवे काउंटरों, राजस्व कार्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों पर नागरिक-केंद्रित अधिकारियों को इसके तहत प्रशिक्षित किया गया और बाद में नागरिकों का सर्वेक्षण किया गया  तो प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। उन्होंने बदलाव को महसूस किया। न केवल दक्षता में, बल्कि व्यवहार की आत्मीयता, तत्परता और बातचीत की मानवीय गुणवत्ता में भी। एक ऐसे युग में जब एआई प्रशासनिक कार्यों के विशाल हिस्सों को स्वचालित करने की चुनौती दे रहा है, यह मानवीय परत,  जो सहानुभूतिपूर्ण, सांस्कृतिक रूप से जागरूक और स्थानीय जड़ों से जुड़ी है कोई फालतू चीज़ नहीं, बल्कि भारत के शासन की सर्वोच्च शक्ति है।

इस मिशन ने अपनी तकनीकी महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ भारत की बौद्धिक विरासत का सम्मान करने का भी एक सचेत प्रयास किया है। ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रकोष्ठ’  के माध्यम से, पारंपरिक ज्ञान जिसमें सामुदायिक शासन और कृषि से लेकर वित्त और स्वास्थ्य सेवा तक के क्षेत्र शामिल हैं — को प्रशिक्षण सामग्री के ताने-बाने में बुना जा रहा है; इसे केवल अतीत की यादों के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ‘अमृत ज्ञान कोष’  भंडार, जिसमें 70 से अधिक पूर्ण केस स्टडीज़ शामिल हैं, शासन-प्रशासन से जुड़े ऐसे ज्ञान का एक संग्रह तैयार कर रहा है जिसकी जड़ें भारतीय संदर्भों और भारतीय समाधानों में निहित हैं। प्रशासनिक मानसिकता का यह ‘वि-औपनिवेशीकरण’,  जिसके तहत भारतीय लोक सेवकों को आधुनिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी ही सभ्यतागत विरासत के साथ आत्मविश्वासपूर्ण जुड़ाव स्थापित करने की ओर लौटाया जाता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख आकांक्षाओं में से एक है और ‘मिशन कर्मयोगी’ इसी आकांक्षा को साकार रूप दे रहा है।

‘साधना’ सप्ताह  2 से 8 अप्रैल तक मनाया जाने वाला राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह — इस पांच वर्षीय यात्रा का उत्सव और इसके अधूरे कार्यों के प्रति पुनर्संकल्प, दोनों है। ‘साधना’ शब्द यहाँ अत्यंत उपयुक्त है। इसका अर्थ है समर्पित अभ्यास; एक ऐसे व्यक्ति का अनुशासित दैनिक प्रयास जो किसी एक असाधारण कार्य के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने कौशल के प्रति निरंतर समर्पण के माध्यम से निपुणता प्राप्त करना चाहता है। जैसे ही हम सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के एक ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के साथ इस सप्ताह का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसमें लगभग 700 वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से और 3,000 से अधिक वर्चुअल माध्यम से शामिल हो रहे हैं, हम केवल एक वर्षगाँठ नहीं मना रहे हैं। हम अगले पांच वर्षों के लिए अपना लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं — एक ऐसे भविष्य की ओर जिसमें हर स्तर पर प्रत्येक सिविल सेवक निरंतर सीखने वाला, एक ‘नागरिक-चैंपियन’ और भारत की आकांक्षाओं का एक आत्मविश्वासी संरक्षक होगा।

विकसित भारत 2047 के लक्ष्य — सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज से लेकर शून्य शुद्ध उत्सर्जन के संकल्प तक, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना से लेकर वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व तक, केवल नीतिगत  माध्यम से पूरे नहीं होंगे। वे लोगों के माध्यम से पूरे होंगे: उस जिला अधिकारी द्वारा जो योजना को सही ढंग से समझ कर उसे पूरी शुद्धता के साथ लागू कर सके; उस शहरी योजनाकार द्वारा जो स्थानिक डेटा टूल का उपयोग कर सके; उस अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जो सार्वजनिक स्वास्थ्य अलर्ट को इस तरह संप्रेषित करे कि उसका समुदाय उस पर भरोसा करे। मिशन कर्मयोगी न केवल कल के लिए, बल्कि आने वाले दशकों के लिए उसी दल का निर्माण कर रहा है।

भारत की शासन-व्यवस्था की कहानी के लंबे और प्रकाशमान सफर में, यह शायद वह अध्याय है जिसमें शासन ने आखिरकार ‘सीखना’ सीख लिया।

(लेखक केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग और कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्यमंत्री हैं)

भारतीय शासन व्यवस्था की पटकथा फिर से लिख रहा है मिशन कर्मयोगी
  • डॉ जितेंद्र सिंह

कल्पना करें कि राजस्थान के दूरदराज के किसी कोने में जिला कलेक्टर को एक ऐसी महत्वाकांक्षी कल्याण योजना की जिम्मेदारी सौंपी जाती है जिसके बारे में उसकी जानकारी बहुत कम है। एक दशक पहले उसे जानकारी के लिए कहीं धूल खा रही किसी नियमावली का सहारा लेना होता। या फिर वह अपने किसी वरिष्ठ सहयोगी की तीन बैठकों और लंच के बाद खाली होने का इंतजार करता। उसकी उम्मीद उस प्रशिक्षण कार्यक्रम पर भी टिकी हो सकती थी जो शायद एक या दो साल में कभी आता। लेकिन आज वह अपने फोन के जरिए आईगॉट (इंटिग्रेटेड गर्वनमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म) पर लॉग ऑन करता है। उसे मिनटों में ही अपनी जरूरत के अनुरूप एक सुव्यवस्थित कार्यकुशलता आधारित पाठ्यक्रम मिल जाता है। वह शाम तक सूचनाओं और आत्मविश्वास से लैस होकर योजना के लाभार्थियों की पहली बैठक की अध्यक्षता कर रहा होता है। यह बदलाव देखने में छोटा लग सकता है मगर हकीकत में किसी क्रांति से कम नहीं है।

चमक-दमक से दूर धैर्य के साथ पांच साल पहले शुरू किया गया मिशन कर्मयोगी एक क्रांति ला रहा है। यह नए भारत के लिए एक नई तरह के प्रशासनिक अधिकारी तैयार करने के उद्देश्य से चुपचाप काम कर रहा है।

इसके महत्व को समझने के लिए हमें पहले संदर्भ को जानना होगा। 2047 तक विकसित भारत के प्रधानमंत्री के निर्धारित लक्ष्य तक यूं ही नहीं पहुंचा जा सकता। इस मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें भारत गणतंत्र को चलाने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के जरिए सावधानी से एक-एक कदम आगे बढ़ना होगा। इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी, प्रौद्योगिकी या नीति नहीं है। सबसे ज्यादा अहमियत उन लगभग 3.5 करोड़ प्रशिक्षित, उत्साही और नागरिक केंद्रित सरकारी कर्मियों की क्षमता की है जो हर सुबह उठ कर भारतीय शासन को संचालित करते हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ज्यादातर समय क्षमता निर्माण का मॉडल सांयोगिक रहा है। किसी नौजवान अधिकारी को सेवा की शुरुआत के समय औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता था। फिर करियर के बीच में यदा-कदा उसे कुछ पाठ्यक्रमों में हिस्सा लेने का अवसर मिल सकता था। बाकी, उसे काम करते हुए और दूसरों को देख कर ही सीखना होता था। एक स्थिर और धीमी गति से आगे बढ़ते विश्व में यह काफी था। लेकिन कृत्रिम मेधा, जलवायु अवरोध, जनसांख्यिकीय दबाव और जबर्दस्त प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के युग में यह सरासर

नाकाफी है। प्रशासन के सामने चुनौतियां जिस रफ्तार से आती हैं उसके सामने प्रशिक्षण की पुरानी प्रणालियों की गति कहीं नहीं टिकती।

‘मिशन कर्मयोगी’ को इसी बेमेल स्थिति के समाधान के रूप में की गई थी। 2021 में शुरू किया गया यह मिशन—जिसे उसी वर्ष अप्रैल में स्थापित ‘क्षमता निर्माण आयोग’ द्वारा संस्थागत रूप से संचालित किया गया, एक सचमुच महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए आगे बढ़ा। भारतीय सिविल सेवाओं की सीखने की संस्कृति को, समय-समय पर होने वाली और केवल नियमों के पालन तक सीमित प्रक्रिया से बदलकर, एक निरंतर चलने वाली, भूमिका-आधारित और स्वयं-निर्देशित विकास यात्रा में रूपांतरित करना इसका मकसद है। जैसा कि आयोग इसका वर्णन करता है, यह बदलाव ‘कर्मचारी’—यानी नियमों का पालन करने वाले एक पदाधिकारी से ‘कर्मयोगी’ बनने की ओर है: एक ऐसा लोक सेवक जो किसी उद्देश्य, सेवा-भाव और उत्कृष्टता से प्रेरित हो।

पाँच वर्षों के बाद, ये आंकड़े अत्यंत शिक्षाप्रद हैं। ‘आईगॉट’ (इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग) प्लेटफॉर्म पर अब 1.5 करोड़ से अधिक सरकारी अधिकारी सक्रिय शिक्षार्थी के रूप में जुड़े हैं — यह एक ऐसी संख्या है जो शुरुआत के समय काल्पनिक लगती थी। 4,600 से अधिक योग्यता-आधारित पाठ्यक्रमों के माध्यम से, इन अधिकारियों ने 8.3 करोड़ से अधिक पाठ्यक्रम पूरे किए हैं। अकेले पिछले ‘राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह’  के दौरान, भागीदारी के परिणामस्वरूप 4.5 मिलियन घंटे के पाठ्यक्रम नामांकन और 3.8 मिलियन घंटे की वास्तविक शिक्षा दर्ज की गई। ये केवल अमूर्त आंकड़े नहीं हैं। दर्ज किया गया प्रत्येक घंटा भारत में कहीं न कहीं एक लोक सेवक का प्रतिनिधित्व करता है — छत्तीसगढ़ में एक राजस्व निरीक्षक, पुणे में एक शहरी स्थानीय निकाय अधिकारी, मणिपुर में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, ये सब अपने साथी नागरिकों की बेहतर सेवा करने के लिए अपनी क्षमता बढ़ा रहें हैं। जो बात आईगॉट प्लेटफॉर्म को वास्तव में परिवर्तनकारी बनाती है, वह केवल इसका पैमाना नहीं है, बल्कि इसकी ‘पहुँच की संरचना’  है। यह किसी भी समय और कहीं भी, स्मार्टफोन या डेस्कटॉप पर, कई भाषाओं में उपलब्ध है, और इसे शिक्षार्थी के पेशेवर प्रोफाइल के अनुसार बनाया गया है। पाठ्यक्रमों को हर तीन से छह महीने में अपडेट किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शासन में एआई टूल का उपयोग कैसे करें या नए वित्तीय नियमों को कैसे समझें, इससे संबंधित सामग्री वर्तमान और प्रासंगिक बनी रहे। दूसरे शब्दों में, यह प्लेटफॉर्म धूल फांकने वाली कोई डिजिटल लाइब्रेरी नहीं है — बल्कि यह सीखने का एक जीवंत और अनुकूलन योग्य तंत्र है। इस पर विचार कीजिए कि एक आदिवासी जिले की जूनियर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए इसका क्या अर्थ है, जिसे उसकी अपनी भाषा में बाल पोषण मूल्यांकन के नवीनतम प्रोटोकॉल समझाने वाला एक मॉड्यूल प्राप्त होता है। उसे अपने ब्लॉक में किसी प्रशिक्षक के आने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। वह सीखती है, और कार्य करती है। यही इस मिशन का ‘लोकतांत्रिक लाभांश’ है।

क्षमता निर्माण आयोग, इस तंत्र  के रणनीतिक संरक्षक के रूप में, एक साथ ‘वास्तुकार’  और ‘संचालक’ दोनों की भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय नीति बनाने वाले एक सचिव से लेकर ग्राम स्तर पर इसे लागू करने वाले एक पंचायत पदाधिकारी तक, यह पहचान करता है कि सार्वजनिक भूमिकाओं के विशाल स्पेक्ट्रम में किन योग्यताओं की आवश्यकता है। यह सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय मानक 2.0 ढांचे के माध्यम से देश के प्रशिक्षण संस्थानों के लिए गुणवत्ता मानक निर्धारित करता है, जिसके तहत देश भर के 200 से अधिक प्रशिक्षण संस्थान पहले ही मान्यता प्राप्त  कर चुके हैं। यह राज्यों के साथ मिलकर काम करता है। सभी 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अब औपचारिक समझौता ज्ञापनों  के माध्यम से जुड़ चुके हैं  ताकि ऐसी विशिष्ट ‘क्षमता निर्माण योजनाएं’  तैयार की जा सकें जो कार्यबल की दक्षताओं को संगठनात्मक लक्ष्यों के साथ जोड़ती हैं। ‘राष्ट्रीय कर्मयोगी जन सेवा कार्यक्रम’ जैसी ऐतिहासिक पहलों के माध्यम से, इसने एक मिलियन से अधिक प्रमाणित अधिकारियों को बड़े पैमाने पर व्यवहार प्रशिक्षण दिया  है, जो प्रत्येक नागरिक को अंतिम हितधारक के रूप में मानने की सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण कला है।

मिशन के इस अंतिम आयाम पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ के बारे में है जिसे ‘पूर्णता प्रमाण पत्र’ या ‘लॉग किए गए घंटों’ में आसानी से नहीं मापा जा सकता। मिशन कर्मयोगी की सबसे गहरी आकांक्षाओं में से एक है—दृष्टिकोण में बदलाव। यह राज्य और नागरिक के बीच एक ‘लेन-देन’ वाले संबंध से हटकर ‘नागरिक देवो भव’ की भावना से परिभाषित संबंध की ओर एक आंदोलन है: नागरिक ईश्वर के समान है, वह सर्वोच्च अधिकारी है जिसके प्रति राज्य का सेवक जवाबदेह है। जब रेलवे काउंटरों, राजस्व कार्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों पर नागरिक-केंद्रित अधिकारियों को इसके तहत प्रशिक्षित किया गया और बाद में नागरिकों का सर्वेक्षण किया गया  तो प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। उन्होंने बदलाव को महसूस किया। न केवल दक्षता में, बल्कि व्यवहार की आत्मीयता, तत्परता और बातचीत की मानवीय गुणवत्ता में भी। एक ऐसे युग में जब एआई प्रशासनिक कार्यों के विशाल हिस्सों को स्वचालित करने की चुनौती दे रहा है, यह मानवीय परत,  जो सहानुभूतिपूर्ण, सांस्कृतिक रूप से जागरूक और स्थानीय जड़ों से जुड़ी है कोई फालतू चीज़ नहीं, बल्कि भारत के शासन की सर्वोच्च शक्ति है। इस मिशन ने अपनी तकनीकी महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ भारत की बौद्धिक विरासत का सम्मान करने का भी एक सचेत प्रयास किया है। ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रकोष्ठ’  के माध्यम से, पारंपरिक ज्ञान जिसमें सामुदायिक शासन और कृषि से लेकर वित्त और स्वास्थ्य सेवा तक के क्षेत्र शामिल हैं — को प्रशिक्षण सामग्री के ताने-बाने में बुना जा रहा है; इसे केवल अतीत की यादों के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ‘अमृत ज्ञान कोष’  भंडार, जिसमें 70 से अधिक पूर्ण केस स्टडीज़ शामिल हैं, शासन-प्रशासन से जुड़े ऐसे ज्ञान का एक संग्रह तैयार कर रहा है जिसकी जड़ें भारतीय संदर्भों और भारतीय समाधानों में निहित हैं। प्रशासनिक मानसिकता का यह ‘वि-औपनिवेशीकरण’,  जिसके तहत भारतीय लोक सेवकों को आधुनिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी ही सभ्यतागत विरासत के साथ आत्मविश्वासपूर्ण जुड़ाव स्थापित करने की ओर लौटाया जाता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख आकांक्षाओं में से एक है और ‘मिशन कर्मयोगी’ इसी आकांक्षा को साकार रूप दे रहा है।

‘साधना’ सप्ताह  2 से 8 अप्रैल तक मनाया जाने वाला राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह — इस पांच वर्षीय यात्रा का उत्सव और इसके अधूरे कार्यों के प्रति पुनर्संकल्प, दोनों है। ‘साधना’ शब्द यहाँ अत्यंत उपयुक्त है। इसका अर्थ है समर्पित अभ्यास; एक ऐसे व्यक्ति का अनुशासित दैनिक प्रयास जो किसी एक असाधारण कार्य के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने कौशल के प्रति निरंतर समर्पण के माध्यम से निपुणता प्राप्त करना चाहता है। जैसे ही हम सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के एक ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के साथ इस सप्ताह का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसमें लगभग 700 वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से और 3,000 से अधिक वर्चुअल माध्यम से शामिल हो रहे हैं, हम केवल एक वर्षगाँठ नहीं मना रहे हैं। हम अगले पांच वर्षों के लिए अपना लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं — एक ऐसे भविष्य की ओर जिसमें हर स्तर पर प्रत्येक सिविल सेवक निरंतर सीखने वाला, एक ‘नागरिक-चैंपियन’ और भारत की आकांक्षाओं का एक आत्मविश्वासी संरक्षक होगा।

विकसित भारत 2047 के लक्ष्य — सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज से लेकर शून्य शुद्ध उत्सर्जन के संकल्प तक, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना से लेकर वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व तक, केवल नीतिगत  माध्यम से पूरे नहीं होंगे। वे लोगों के माध्यम से पूरे होंगे: उस जिला अधिकारी द्वारा जो योजना को सही ढंग से समझ कर उसे पूरी शुद्धता के साथ लागू कर सके; उस शहरी योजनाकार द्वारा जो स्थानिक डेटा टूल का उपयोग कर सके; उस अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जो सार्वजनिक स्वास्थ्य अलर्ट को इस तरह संप्रेषित करे कि उसका समुदाय उस पर भरोसा करे। मिशन कर्मयोगी न केवल कल के लिए, बल्कि आने वाले दशकों के लिए उसी दल का निर्माण कर रहा है।

भारत की शासन-व्यवस्था की कहानी के लंबे और प्रकाशमान सफर में, यह शायद वह अध्याय है जिसमें शासन ने आखिरकार ‘सीखना’ सीख लिया।

(लेखक केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग और कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्यमंत्री हैं)