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पेपर लीक विधेयक को मिली मंजूरी…दोषियों को होगी 10 साल की सजा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है। जंतर मंतर पर छात्रों के आंदोलन के बीच शुक्रवार को हुई बैठक में बिल को मंजूरी मिली। विधेयक में पेपर लीक करने वालों के खिलाफ 10 साल की सजा और 10 करोड़ के जुर्माने का प्रावधान है।

संशोधन बिल में पेपर लीक माफियाओ के खिलाफ कड़े प्रावधान हैं। फास्ट ट्रैक कोर्ट को तीन महीने में फैसला सुनाना होगा। विधेयक में दोषी को 10 साल की सजा और 10 करोड़ के जुर्माने का प्रावधान है। जानकारी के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह इस विधेयक को सोमवार को संसद में पेश करेंगे।

मौजूदा कानून में क्या है?

पेपर लीक और नक़ल के खिलाफ मौजूदा कानून सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 2024 है। सरकार इसे और सख्त बना रही है। अभी व्यक्तिगत मामलों में तीन से पांच साल की सजा और दस लाख रुपए तक का जुर्माना है। वहीं सर्विस प्रोवाइडर पर एक करोड़ तक का जुर्माना है। संगठित अपराध में पांच से दस साल की सजा और न्यूनतम एक करोड़ का जुर्माना है।

मौजूदा कानून में एक और प्रावधान जोड़ा जाएगा, जिसके तहत ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट अनिवार्य होंगे। इसमें विभिन्न स्तरों पर दंड का प्रावधान किया जाएगा। मौजूदा अधिनियम में आवश्यक संशोधन/अपडेट किए जाएंगे. डीओपीटी (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) मंत्रालय इस विधेयक का नोडल मंत्रालय होगा।

पीएम मोदी ने दिया था कड़ा संदेश

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को घोषणा की थी कि अगले हफ्ते संसद में एक विधेयक पेश किया जाएगा, जिसमें प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सख्त प्रावधान होंगे। प्रधानमंत्री ने एक वीडियो संदेश में कहा कि विधेयक के मसौदे पर शुक्रवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की होने वाली बैठक में चर्चा की जाएगी, जिसमें प्रस्तावित कानून को अंतिम रूप दिया जाएगा।

पीएम मोदी ने कहा, सोमवार को जब संसद के मॉनसून सत्र का दूसरा हफ्ता शुरू होगा, तो प्रश्नपत्र लीक के मामलों में सख्त कार्रवाई के प्रावधानों वाला एक विधेयक लाया जाएगा और हम उसे जल्द से जल्द पारित कराने की कोशिश करेंगे।

प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें ज्ञात है कि प्रश्नपत्र लीक कोई छोटी समस्या नहीं है और लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए ऐसी घटनाएं बेहद कष्टदायक होती हैं। उन्होंने कहा कि इसलिए, जब से नीट प्रश्नपत्र लीक के आरोप सामने आए हैं (करीब ढाई महीने पहले)तब से कई कड़े कदम उठाए गए हैं।

विपक्ष ने क्या कहा?

कांग्रेस ने प्रश्नपत्र लीक में शामिल लोगों को दंडित करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने की प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा को बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम करार दिया था. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रश्नपत्र लीक रोकने में मोदी सरकार की विफलता, ऐसी घटनाएं होने पर उन्हें स्वीकार नहीं करने और उनकी निष्पक्ष जांच कराने में असमर्थता के लिए विद्यार्थी वास्तविक जवाबदेही चाहते हैं।

रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा, मांगें स्पष्ट हैं-पहली, शिक्षा मंत्री (धर्मेंद्र) प्रधान को बर्खास्त किया जाए। दूसरी, विद्यार्थियों से माफी मांगी जाए। तीसरी, उन पर हमला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

दिल्ली में जारी है प्रदर्शन

बता दें कि दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्रों का आंदोलन जारी है। सोनम वांगचुक ने भले ही अनशन तोड़ दिया है, लेकिन CJP के नेतृत्व में छात्रों का विरोध प्रदर्शन अब भी हो रहा है. अभिजीत दिपके ने कहा है कि जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हो जाता, तब तक हमारा धरना जारी रहेगा।

Delhi : VP हाउस में हुई CJP और मोदी सरकार के बीच हुई बैठक

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

पेपर लीक से जुड़े मामले और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बीच शुक्रवार को दिल्ली के विट्ठल हाउस में केंद्र सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों की अहम बैठक हुई। यह बैठक करीब एक घंटे तक चली। बता दें कि आंदोलन शुरू होने के बाद दोनों पक्षों की यह दूसरी मुलाकात रही है। हालांकि बैठक से पहले CJP के फाउंडिंग प्रेसिडेंट अभिजीत दिपके ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के अलावा हमें कुछ भी मंजूर नहीं है। जब तक धर्मेंद्र प्रधान अपना इस्तीफा नहीं दे देते है, तब तक हमारा चलता रहेगा।

कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से सौरव दास और आशुतोष रांका सरकार के साथ बातचीत में शामिल हुए। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की अगुवाई में होने वाली यह बैठक पहले कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होनी थी। लेकिन केंद्रीय मंत्रियों की सुरक्षा को देखते हुए जगह बदल कर विट्ठल हाउस कर दिया गया।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ही समाधानः दिपके

केंद्र सरकार के साथ बातचीत शुरू होने से पहले अभिजीत दिपके ने कहा, “यह विरोध-प्रदर्शन देश के युवाओं का है और यह सिर्फ सोनम वांगचुक या दिपके तक सीमित नहीं है। यह प्रदर्शन देश के युवाओं का है, विपक्षी पार्टियों का नहीं। अगर सरकार विरोध-प्रदर्शन का हल चाहती है, तो वह सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है।”

सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल खत्म किए जाने को लेकर दिपके ने कहा, “मुझे लगता है कि सरकार ने वांगचुक को हिरासत में रखा था। जेपी नड्डा उनसे मिल सकते थे, लेकिन कोई भी विपक्षी सांसद उनसे नहीं मिल सका। हम भी उनसे नहीं मिल सके। मुझे बहुत खुशी है कि सोनम सर ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है।”

बातचीत के जरिए मुद्दों का समाधानः जितेंद्र सिंह

इससे पहले केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को कॉकरोच जनता पार्टी से सरकार के साथ एक और दौर की बातचीत के लिए आगे आने की अपील की। उन्होंने अपनी अपील में कहा कि बातचीत के जरिए ही मुद्दों का समाधान हो सकता है और आगे का रास्ता निकाला जा सकता है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक रिपोर्ट में कहा कि पिछले 24 घंटे में सरकार की ओर से सीजेपी को बातचीत के लिए ‘कम से कम चार बार’ न्यौता भेजा गया है। उन्होंने कहा, “मैं इस प्रदर्शन में शामिल छात्रों और युवा साथियों से अपील करना चाहता हूं कि वे बातचीत के लिए आगे आएं। हमारे दरवाजे उनके लिए खुले हैं।” उनका कहना है कि यह सरकार की ओर से की गई एक ‘विनम्र अपील’ है।

उन्होंने बताया कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ यह बैठक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता नड्डा की अगुवाई में होगी।

सोनम वांगचुक की हड़ताल पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, दिल्ली सरकार को भेजा नोटिस

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर रहे सोनम वांगचुक का मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गया है। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक बीती 28 जून से आमरण अनशन कर रहे हैं। सोनम वांगचुक द्वारा की जा रही भूख हड़ताल को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस फैसले पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका पर मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खण्डपीठ सुनवाई कर रही थी।

याचिका सामाजिक कार्यकर्ता और वकील राकेश कुमार सैनी ने दाखिल की है। याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वांगचुक को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जाए और उनकी जान बचाने के लिए जरूरत पड़ने पर उन्हें जबरन भोजन (फोर्स-फीडिंग) दिया जाए। दायर याचिका में केंद्र और दिल्ली सरकारों को वांगचुक को जबरन खाना खिलाने के निर्देश देने की मांग की गई है।

बता दें कि सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे हैं। यहां उनके भूख हड़ताल को 18 दिन हो चुके हैं। वे कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक के समर्थन में अनशन पर बैठे हैं। पार्टी संस्थापक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि मई में हुई परीक्षा पेपर लीक की घटनाओं से लाखों छात्र प्रभावित हुए।

वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर चिंता जताई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनका शरीर लगातार कमजोर हो रहा है, मांसपेशियों में दर्द है और उनका वजन 8.5 किलोग्राम कम हो चुका है। उनका ब्लड प्रेशर 109/70 दर्ज किया गया है। हजारों समर्थक उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग हैं।

उधर, सीजेपी ने घोषणा की है कि वह संसद के मानसून सत्र के पहले दिन, यानी 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद भवन तक एक शांतिपूर्ण मार्च निकालेगी। सीजेपी ने देश भर के छात्रों, अभिभावकों और आम नागरिकों से इस मार्च में शामिल होने की अपील की है। इस आंदोलन की मुख्य मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाना है।

प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी को हाईकोर्ट में दी चुनौती
जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की कथित निरंतर निगरानी को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में मांग की गई है कि विरोध स्थल पर अंधाधुंध फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और निगरानी टावर का संचालन असंवैधानिक घोषित किया जाए, साथ ही ऐसी निगरानी को निलंबित करने और सार्वजनिक प्रदर्शनों में निगरानी को विनियमित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया जाए।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिरस्थाई विरासतः संस्थाएं, विचार और राष्ट्र निर्माण

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

इतिहास अक्सर महान नेताओं को उनके राजनीतिक संघर्षों के जरिए याद करता है। लेकिन राजनेताओं के चिरस्मरणीय योगदान राजनीति के दायरे तक ही सीमित नहीं होते। उनकी वास्तविक विरासत उनके द्वारा सृजित संस्थाओं, परिपोषित विचारों और आने वाली पीढि़यों के लिए छोड़े गए आदर्शों में होती है। राष्ट्र भारत केसरी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 125वां जन्म दिवस मना रहा है। इस अवसर पर उनके सार्वजनिक जीवन के एक ऐसे पहलू को स्मरण करना प्रासंगिक होगा जिसकी ओर व्यापक रूप से गौर करने की जरूरत है। यह पहलू है, राष्ट्र निर्माण की बुनियाद के रूप में संस्थाओं का सृजन करने की उनकी आजीवन प्रतिबद्धता। 

स्वतंत्र भारत का उदय सिर्फ एक राजनीतिक संघर्ष से नहीं हुआ। उसे विश्वविद्यालय बनाने थे जो नागरिकों को शिक्षित करने में सक्षम हों। ऐसी अनुसंधान संस्थाएं खड़ी करनी थीं जो वैज्ञानिक ज्ञान का प्रसार कर सकें। उसे ऐसे उद्योग तैयार करने थे जो आर्थिक आत्मनिर्भरता पैदा कर सकें। सभ्यता की विरासत की रक्षा करने वाले सांस्कृतिक संगठनों और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाली लोक संस्थाओं को तैयार करना था। डॉ मुखर्जी ने जल्दी ही समझ लिया था कि राष्ट्र का भविष्य सिर्फ दूरद्रष्टा नेतृत्व पर ही निर्भर नहीं करता। यह उन मजबूत संस्थाओं पर भी निर्भर करता है जो नेताओं और सरकारों से ज्यादा टिकाऊ होंगी। 

उनका असाधारण शैक्षिक कॅरियर उनके विश्वास को प्रतिबिंबित करता है। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने। उन्होंने वैसे समय में यह कार्यभार संभाला जब उच्चतर शिक्षा भारत के बौद्धिक जागरण का केंद्र बन रही थी। उनके लिए विश्वविद्यालय सिर्फ स्नातक तैयार करने के स्थल नहीं थे। वे वैसे सुविज्ञ नागरिकों को गढ़ने वाले संस्थान थे जो सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के साथ योगदान करने में सक्षम हों। उनकी राय थी कि शिक्षा को राष्ट्र निर्माण के वृहत्तर कार्य से अलग नहीं किया जा सकता।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रगति के प्रति उनका समर्पण विश्वविद्यालयों के परिसर से कहीं आगे बढ़कर था। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की कोर्ट और काउंसिल के सदस्य के तौर पर, उन्होंने भारत के प्रमुख वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों में से एक को मज़बूत बनाने में योगदान दिया। 1947 में, उन्होंने ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ पावर इंजीनियरिंग’ की आधारशिला रखी क्योंकि वे भली-भांति समझते थे कि स्वतंत्र भारत की आर्थिक प्रगति के लिए इंजीनियरिंग की शिक्षा और प्रौद्योगिकी क्षमता बहुत ज़रूरी होगी। नवाचार को मुख्य नीतिगत लक्ष्य बनाए जाने से बहुत पहले ही, उन्होंने यह समझ लिया था कि वैज्ञानिक उत्कृष्टता और औद्योगिक विकास ही देश की दीर्घकालिक मज़बूती तय करेंगे।

स्वतंत्रता के बाद, जब डॉ. मुखर्जी भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने, तब इस दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप दिया गया। उन शुरुआती सालों में, नए नए आज़ाद देश के सामने एक औद्योगिक आधार तैयार करने की बड़ी चुनौती थी। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और सिंदरी फर्टिलाइज़र फैक्ट्री जैसे संस्थान सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के तौर पर नहीं, बल्कि तकनीकी क्षमता और आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के भारत के संकल्प के प्रतीक के तौर पर स्थापित किए गए थे। डॉ. मुखर्जी के लिए, औद्योगीकरण कभी भी अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं था; यह राष्ट्रीय क्षमता और सामूहिक आत्मविश्वास में किया गया एक निवेश था।

हालाँकि, किसी भी संस्थान के निर्माण के लिए केवल भौतिक अवसंरचना या प्रशासनिक कुशलता की ही ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए सहानुभूति, जन-सेवा और नैतिक ज़िम्मेदारी की भावना की भी आवश्यकता होती है। डॉ. मुखर्जी में इन गुणों की झलक 1943 के बंगाल अकाल के दौरान ही साफ़ तौर पर दिखाई दी थी, जब उन्होंने  बीसवीं सदी की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी से प्रभावित लोगों के लिए बड़े पैमाने पर राहत कार्य करने में खुद को समर्पित कर दिया था। विभाजन के बाद, उन्होंने विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। वे समझते थे कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण में संस्थानों को फिर से खड़ा करने के साथ-साथ लोगों के दुख दर्द को कम करना और उस पर मरहम लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

उनका सार्वजनिक जीवन, भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरी समझ और सम्मान को भी दर्शाता था। ‘महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष के तौर पर, उन्होंने बौद्ध देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई। सभ्यतागत कूटनीति के स्थायी महत्व को समझते हुए, बुद्ध के मुख्य शिष्यों—अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन—के पवित्र अवशेषों का भारत में स्वागत करने में उन्होंने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। आज भी, मंगोलिया जैसे देशों के साथ इन पवित्र अवशेषों को साझा करने की भारत की कोशिशें यह दिखाती हैं कि किस तरह सांस्कृतिक विरासत अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को मज़बूत करती है और ऐतिहासिक संबंधों को और गहरा बनाती है।

साहित्य और विद्वता के प्रति भी उनकी चिंता उतनी ही स्पष्ट थी। उनके पत्रों से पता चलता है कि उन्होंने प्रसिद्ध कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की उनके व्यक्तिगत संकट के समय किस तरह मदद की थी। ऐसी घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि सार्वजनिक नेतृत्व को  केवल बड़े नीतिगत फैसलों से ही नहीं, बल्कि उदारता के उन शांत और मौन कार्यों से भी आंका जाता है, जिन पर शायद ही कभी लोगों का ध्यान जाता है।

डॉ. मुखर्जी ने संस्थागत निर्माण के इसी दृष्टिकोण को संविधान सभा में भी आगे बढ़ाया। संविधान के निर्माण को “एक बड़ी जिम्मेदारी” और “एक गंभीर और पवित्र विश्वास” के रूप में वर्णित करते हुए, उन्होंने संवैधानिक शासन के साथ जुड़ी नैतिक ज़िम्मेदारियों पर ज़ोर दिया। उनके वे शब्द आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। संविधान की ताकत अंततः न केवल उसके लिखित प्रावधानों पर, बल्कि संसद की शुचिता, सार्वजनिक संस्थानों की स्वतंत्रता, कानून के शासन और नागरिकों की जिम्मेदारी पर भी निर्भर करती है। संवैधानिक लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाओं पर जनता का भरोसा हो और वे ईमानदारी से काम करें।

जैसे-जैसे भारत एक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, डॉ. मुखर्जी की सोच हमें एक ज़रूरी बात याद दिलाती है। सिर्फ़ आर्थिक विकास से ही देश की तरक्की तय नहीं होती। संवहनीय विकास के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, सांस्कृतिक संरक्षण और लोगों का भरोसा जगाने वाले संस्थानों में लगातार निवेश की ज़रूरत होती है।

सड़कें, हवाई अड्डे और कारखाने बेहद जरूरी हैं, लेकिन उतने ही जरूरी वे विश्वविद्यालय भी हैं जो जिज्ञासा को प्रोत्साहित करते हैं, वे प्रयोगशालाएँ जो ज्ञान का विस्तार करती हैं, वे संग्रहालय जो विरासत को संजोते हैं और वे सार्वजनिक संस्थान जो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हैं, वे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

संस्थाओं में एक अद्भुत गुण होता है: वे सरकारों, राजनीतिक आंदोलनों और यहाँ तक कि कई पीढ़ियों से भी ज़्यादा समय तक बनी रहती हैं। वे संचित ज्ञान को संजोकर रखती हैं, बदलाव के बीच निरंतरता बनाए रखती हैं और समाज को दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती हैं। नेता इतिहास को आकार दे सकते हैं, लेकिन संस्थाएं सभ्यता को जीवित रखती हैं।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन का सबसे अहम सबक यही है। उनकी विरासत केवल उन पदों तक सीमित नहीं है जो उन्होंने संभाले या उन बहसों में भी नहीं है जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया, बल्कि यह उनके उस अटूट विश्वास में निहित है कि मजबूत संस्थान ही किसी राष्ट्र की आकांक्षाओं के सच्चे संरक्षक होते हैं।

जैसे-जैसे भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, ज्ञान, वैज्ञानिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले संस्थानों को मजबूत करना ही उनके प्रति सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री हैं।)