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भारत–न्यूजीलैंड एफटीए: किसानों, युवाओं, नौकरियों और विकास के लिए महिलाओं के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक समझौता

दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए), जिस पर सोमवार को हस्ताक्षर किये जायेंगे, विकसित दुनिया के साथ भारत की सहभागिता में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह वैश्विक आर्थिक साझेदारियों को किसानों, महिलाओं, युवाओं और रोजगार सृजक उद्योगों के लिए ठोस लाभ में बदलने से जुड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण में हुई निर्णायक प्रगति को प्रतिबिंबित करता है।

यह एफटीए प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जिसमें यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ शामिल हैं, के साथ हुए कई ऐतिहासिक व्यापार समझौतों के बाद हो रहा है। ये समझौते वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं और निर्यातकों को दुनिया की कुछ सबसे लाभकारी अर्थव्यवस्थाओं में, यहां तक कि वर्तमान वैश्विक अनिश्चितता और उथल-पुथल के बीच भी, प्रतिस्पर्धा आधारित बढ़त प्रदान करते हैं।

निर्यात और रोजगार को मजबूत बढ़ावा 

दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभकारी इस समझौते के केंद्र में न्यूजीलैंड की यह प्रतिबद्धता है कि वह तुरंत ही सभी भारतीय उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर देगा, जिससे उस बाजार में एक महत्वपूर्ण बाधा दूर होगी, जहाँ हमारे प्रमुख निर्यात पर वर्तमान में 10% शुल्क लगाया जाता है।

यह वस्त्र, कालीन, धागे, कपड़े, फुटवियर, बैग, बेल्ट, वाहन घटक, मशीनरी, उपकरण, रत्न और आभूषण तथा हस्तशिल्प जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है। रोजगार के अवसरों का सृजन करने वाले ये उद्योग भारत के एमएसएमई इकोसिस्टम की रीढ़ हैं और इन्हें मूल्य प्रतिस्पर्धा और बाजार पहुँच से लाभ मिलेगा। इससे निर्यात बढ़ेगा और निर्माण केन्द्रों, कारीगर समुदायों और लघु उद्यमों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा। 

यह समझौता उस व्यापक दर्शन को प्रतिबिंबित करता है, जो 2014 में मोदी सरकार के गठन के बाद से भारत की व्यापार नीति का मार्गदर्शन कर रहा है। यह समावेश, सशक्तिकरण और साझा समृद्धि में निहित है। व्यापार को राष्ट्रीय परिवर्तन के उपकरण के रूप में देखा जाता है, जो किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों को लाभ पहुंचाता है।

नारी शक्ति

इस समझौते की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह भारत का पहला महिला-नेतृत्व वाला एफटीए है। वार्ता टीम की लगभग सभी सदस्य महिलायें थीं। इनमें मुख्य वार्ताकार, उप मुख्य वार्ताकार, क्षेत्र प्रमुख और न्यूजीलैंड में भारत की राजदूत शामिल हैं।

यह उपलब्धि मोदी सरकार में महिलाओं के बढ़ते महत्व को दर्शाती है। यह शासन, नेतृत्व और विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है और  राष्ट्रीय विकास के संचालक के रूप में नारी शक्ति के विचार को सुदृढ़ करती है।

किसान पहले

एफटीए की संरचना कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार की गयी है। न्यूज़ीलैंड कीवी, सेब और शहद के लिए कृषि उत्पादकता कार्ययोजनाओं का समर्थन करेगा। इन पहलों में बेहतर बीज सामग्री, अनुसंधान सहयोग, किसानों के लिए क्षमता निर्माण, बागवानी प्रबंधन प्रथाएं, कटाई के बाद सुधार, खाद्य सुरक्षा प्रणाली और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना शामिल है। सेब उत्पादकों और सतत मधुमक्खी पालन तौर-तरीकों के लिए परियोजनाएं उत्पादन और गुणवत्ता मानकों को बढ़ाएंगी, जिससे कृषि समृद्धि में वृद्धि होगी।

इसके साथ ही, भारत ने अपने प्रमुख कृषि हितों की मजबूती से सुरक्षा की है। डेयरी उत्पादों (जैसे दूध, क्रीम, व्हे, दही और पनीर); प्याज, चना, मटर, मकई, बादाम, चीनी और कुछ ख़ास तेल और वसा जैसी संवेदनशील वस्तुओं को शुल्क छूट से बाहर रखा गया है। समझौता सुनिश्चित करता है कि घरेलू किसान हानिकारक आयात प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रहें। किसानों और मछुआरों के हितों की रक्षा करना सभी व्यापार वार्ताओं में भारत के दृष्टिकोण का केंद्र रहा है।

युवा और पेशेवर

समझौते का एक प्रमुख स्तंभ छात्रों और कुशल पेशेवरों के लिए बढ़ी हुई आवागमन की सुविधा है, जो भारत के युवाओं के लिए नए वैश्विक मार्ग का निर्माण करती है।

किसी भी द्विपक्षीय व्यापार समझौते में पहली बार, न्यूजीलैंड ने भारतीय छात्रों के आवागमन और अध्ययन के बाद काम करने के अवसरों के लिए एक संरचना-युक्त रूपरेखा पेश की है। भारतीय छात्रों पर कोई संख्यात्मक सीमा नहीं है। छात्रों को अध्ययन के दौरान प्रति सप्ताह कम से कम 20 घंटे काम करने की अनुमति दी जाएगी, जबकि अध्ययन के बाद काम करने के अधिकार – एसटीईएम  स्नातकों के लिए तीन वर्षों तक और डॉक्टर डिग्री के शोधार्थियों के लिए चार वर्षों तक – बढ़ाए गये हैं।

समझौता किसी भी समय 5,000 भारतीय पेशेवरों तक के लिए अस्थायी रोजगार प्रवेश वीज़ा मार्ग पेश करता है, जिसके तहत आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, निर्माण तथा योग, आयुर्वेद, भारतीय व्यंजन और संगीत शिक्षा जैसे चयनित पारंपरिक क्षेत्रों में तीन वर्षों तक रहने की अनुमति होगी। 

इसके अलावा, एक वर्किंग हॉलीडे वीज़ा योजना प्रत्येक वर्ष 1,000 युवा भारतीयों को न्यूज़ीलैंड में 12 महीने तक रहने और काम करने की अनुमति देगी, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैश्विक अनुभव को मजबूती मिलेगी।

निवेश और नवाचार

न्यूजीलैंड ने भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इससे विनिर्माण, अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं, नवाचार इकोसिस्टम और रोजगार सृजन को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक ‘पुनर्संतुलन खंड’ शामिल किया गया है, जिससे भारत को यह अधिकार मिलता है कि यदि निवेश संबंधी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं होतीं हैं, तो वह सुधारात्मक कदम उठा सकता है। यह समझौता अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कौशल विकास और नवाचार-आधारित क्षेत्रों में सहयोग को भी बढ़ावा देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दीर्घकालिक विकासात्मक साझेदारियों में व्यापार पूरक भूमिका निभाएगा।

व्यापार रणनीति

भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करने की स्पष्ट और भरोसेमंद व्यापार रणनीति को प्रतिबिंबित करता है, जो भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए सार्थक बाजार पहुँच की सुविधा देता है और घरेलू संवेदनशीलताओं का सम्मान करता है। 

आज भारत ताकत और विश्वसनीयता की स्थिति के साथ वार्ता करता है। पहले के दशकों में व्यापार समझौतों को अक्सर संवेदनशील क्षेत्रों को अपर्याप्त सुरक्षा दिए बिना अंतिम रूप दिया जाता था, इसके विपरीत वर्तमान वार्ताएं सुनिश्चित करती हैं कि कृषि, डेयरी और अन्य संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह से सुरक्षित रहें।

जैसे-जैसे भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपनी सहभागिता को प्रगाढ़ कर रहा है, विकसित दुनिया के साथ हुए व्यापार समझौते इस तथ्य का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि व्यापार नीति को कैसे राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के साथ संरेखित किया जा सकता है, जिससे विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में समावेशी वृद्धि और दीर्घावधि आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित होती है।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं)         

ट्रैक से संसद तक:

क्यों भारत के भविष्य का नेतृत्व महिलाओं को करना चाहिए

डॉ. पी टी ऊषा

मैंने अपना पूरा जीवन भागदौड़ में ही बिताया है, पहले केरल की कच्ची सड़कों पर, फिर वैश्विक मंचों पर और अब सार्वजनिक जीवन के गलियारों में। हर कदम पर मुझे कई मुश्किलो का सामना करना पड़ा है, कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अनकही बाधाओं का भी, जिन्होंने महिलाओं को यह बताया कि उनका यहाँ कोई स्थान नहीं है। मैंने यह भी देखा है कि जब ये बाधाएं टूटने लगती हैं तो क्या होता है। अवसर परिणामों को बदल देता है और इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह लोगों की सोच को बदल देता है।

यही कारण है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवाँ संशोधन) विधेयक, 2023—नारी शक्ति वंदन अधिनियम—केवल एक विधायी उपलब्धि नहीं है। यह एक लंबे समय से प्रतीक्षित संरचनात्मक सुधार है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना न तो कोई रियायत है और न ही दिखावा। यह अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में एक ज़रुरी कदम है।

खेलों ने हमें क्या सिखाया है

जब मैंने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लिया और कुछ ही सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई, तब बहुत कम भारतीय लड़कियां थीं, जो वैश्विक मंच पर खुद को देख पाती थीं। लेकिन पिछले कई दशकों में यह स्थिति बदली है। प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और पहचान तक पहुंच में सुधार के साथ, भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल करने लगीं है।

पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू, विनेश फोगाट और मैरी कॉम जैसी एथलीटें अकेले नहीं उभरीं। वे एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम हैं, जिसने धीरे-धीरे ही सही, पहुंच को व्यापक बनाना शुरू किया। प्रतिनिधित्व आकांक्षाएं पैदा करता है और आकांक्षा, जब समर्थित होती है, तो उपलब्धि दिलाती है।

सबक साफ है। जब महिलाओं को स्थान दिया जाता है, तो वे व्यवस्था में केवल भाग नहीं लेतीं, वे शानदार प्रदर्शन भी कर दिखाती हैं।

हर भारतीय के लिए बेहतर शासन

भारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व का प्रभाव पहले ही देखा जा चुका है। 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद से, विभिन्न राज्यों में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है।

ये महज़ “महिलाओं के मुद्दे” नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं। महिला नेता अक्सर सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी शासन से जुड़ी उन रोजमर्रा की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो परिवारों और समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।

इस प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तारित करना केवल निष्पक्षता की बात नहीं है। यह शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है।

प्रतिनिधित्व का आर्थिक महत्व

भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी विश्व में सबसे कम है, जो लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है। यह केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक आर्थिक समस्या भी है।

विधानसभाओं में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व उन नीतियों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है, जो इस अप्रयुक्त क्षमता को उजागर करती हैं, जैसे किफायती बाल देखभाल, सुरक्षित कार्यस्थल, ऋण तक पहुंच और महिला उद्यमियों के लिए समर्थन। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से भारत की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है।

अधिक समावेशी संसद न केवल एक लोकतांत्रिक आवश्यकता है, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता भी है।

सुरक्षा, गरिमा और भागीदारी

भारत भर में लाखों महिलाओं के लिए, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी अभी भी सुरक्षा, भेदभाव और असमान पहुंच की चिंताओं से प्रभावित है। चाहे खेल हो, शिक्षा हो या कार्यस्थल, ये समस्याएं हमारे समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं।

संसद में अधिक महिलाओं का मतलब है कि कानून और नीतियां महज़ समझ से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की हकीकत से आकार लेती हैं। इसका मतलब है प्रवर्तन के लिए मजबूत वकालत, सहायता प्रणालियों के लिए संसाधनों का बेहतर आवंटन और एक न्याय ढांचा, जो उत्तरदायी और सुलभ हो।

शासन तभी अधिक प्रभावी होता है, जब वह उन लोगों के अनुभवों को दर्शाता है, जिनकी वह सेवा करता है।

प्रतिनिधित्व और आकांक्षाओं की शक्ति

भारत में सत्ता की छवि लंबे समय से मुख्य रूप से पुरुष प्रधान रही है। उस छवि को बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह एक बदलावकारी प्रक्रिया है।

जब मणिपुर, झारखंड, राजस्थान या भारत के किसी भी हिस्से की कोई युवती अपने जैसी दिखने वाली, अपने जैसी बोलने वाली और समान पृष्ठभूमि से आने वाली किसी महिला को देश के कानूनों को आकार देते हुए देखती है, तो यह सिर्फ प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि यह संभावनाओं के प्रति उसके विश्वास को भी बदल देती है।

आकांक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का आधार है। विधानसभाओं में आरक्षण से स्तर कम नहीं होता, बल्कि अवसरों का दायरा बढ़ता है।

भारत की महिलाओं ने खेल जगत, सशस्त्र बलों, विमानन और व्यावसायिक पदों पर पहले ही कई बाधाओं को पार कर लिया है। विधायी प्रतिनिधित्व इस यात्रा का स्वाभाविक अगला कदम है।

अब है कार्यवाही का वक्त

राज्यसभा में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करने के बाद, मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि कैसे विविध दृष्टिकोण बहस और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं। फिर भी, आज लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 15 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है। अब बस इसे पूरी तरह, निष्ठापूर्वक और बिना देर किए लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रुरत है।

भारत अपनी आधी आबादी को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों में कम प्रतिनिधित्व देते हुए, विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं रख सकता। आधी प्रतिभा को दरकिनार करके विकसित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता, न ही आधी आवाज़ पर सच्चा लोकतंत्र फल-फूल सकता है।

आगे का रास्ता साफ है। सवाल यह है कि क्या हम उस पर चलने का दृढ़ संकल्प रखते हैं।

(लेखक राज्यसभा सांसद, भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ, भारत की अध्यक्ष हैं।)

आखिरकार सुनी गई आधी आबादी की आवाज़
  • आर. विमला, आईएएस

नारी शक्ति वंदन अधिनियमऔर भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का न्यायोचित स्थान’

जब महिलाएँ सशक्त होती हैं, तो भारत मजबूत होता है। घर की गरिमा से लेकर संसद में समान आवाज़ तक, यह एक नए और आत्मविश्वास से भरे भारत की परिकल्पना है।” प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

भारत की महिलाएँ सदैव महान कार्यों में सक्षम रही हैं। वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी ने बड़े-बड़े दार्शनिकों को निरुत्तर कर दिया था। पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर ने जिस न्यायपूर्ण तरीके से अपने राज्य का शासन चलाया, उसकी बराबरी उनके समकालीन शासक नहीं कर सके। रानी लक्ष्मीबाई साहस की एक अमर मिसाल बन गईं। फिर भी, स्वतंत्र भारत—जो समानता के सिद्धांत पर आधारित एक संवैधानिक गणराज्य है ने इन महान महिलाओं की उत्तराधिकारियों को अपनी विधायिकाओं में शायद ही कोई जगह दी। पहली लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या मात्र 4.4 प्रतिशत थी। सात दशक बाद, 17वीं लोकसभा में भी यह आंकड़ा बढ़कर केवल 14.4 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया। व्यक्तिगत प्रतिभा ने तो अपनी जगह बना ली थी, लेकिन व्यवस्थागत बदलाव अभी भी नहीं आया था। असल में, महिलाएं अपने ही लोकतंत्र में एक तरह से ‘मेहमान’ बनकर ही रह गईं।

हमारे संविधान ने पहले ही दिन से यह स्वीकार किया था कि जब सदियों से ढांचागत विसंगतियां जड़ जमाए बैठी हों, तो केवल औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं होती। ‘संरक्षणात्मक भेदभाव’ के सिद्धांत के तहत अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और बाद में पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गईं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था सफल रही है: 24 मार्च 2026 तक, निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से लगभग 49.75 प्रतिशत महिलाएँ हैं। जिन जगहों पर महिलाएँ शासन करती हैं, वहाँ पानी की आपूर्ति सुचारू होती है, साफ़-सफ़ाई की स्थिति बेहतर होती है और लड़कियाँ स्कूल जाना जारी रखती हैं। इसके बावजूद, संसद में भी इसी सिद्धांत को लागू करने के उद्देश्य से जो विधेयक पेश किए गए थे, वे राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में दशकों तक बार-बार निष्प्रभावी होते रहे।

वह क्षण जिसने सब कुछ बदल दिया –

वह अधूरी कड़ी 19 सितंबर 2023 को पूरी हुई। भारत के नए संसद भवन में आयोजित कामकाज के पहले ही सत्र में, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को संसद के दोनों सदनों में, प्रत्येक राजनीतिक दल के सर्वसम्मत समर्थन से पारित किया गया। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विधेयक पेश करते हुए दोनों सदनों को बताया: “यह कानून केवल एक कानून नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक भारतीय महिला की शक्ति, त्याग और सामर्थ्य के प्रति एक श्रद्धांजलि है।”

यह अधिनियम लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उप-कोटा भी शामिल है। नए संसद भवन का यह पहला अधिनियम होना अपने आप में एक घोषणा थी: अमृत काल के लोकतंत्र की संरचना पूरे भारत के लिए और सभी की भागीदारी के साथ निर्मित की जाएगी।

इस अधिनियम में बदलाव लाने की अपार क्षमता है, क्योंकि इसके लागू होने से संसद में महिला सदस्यों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। महिला विधायक निरंतर स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं—ये वही क्षेत्र हैं, जहाँ भारत में लैंगिक असमानता सबसे अधिक है। एक ऐसी संसद, जिसमें एक-तिहाई सदस्य महिलाएँ होंगी, वह अलग तरह के प्रश्न पूछेगी और अलग तरह के विचार सुनेगी। इससे भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार होगा, न कि केवल उसकी बाहरी छवि में।

गरिमा से लोकतंत्र तक की यात्रा

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा यह समझा है कि ज़मीनी स्तर पर सशक्तिकरण के बिना राजनीतिक सशक्तिकरण खोखला होता है। उनके द्वारा शुरू की गई यह यात्रा अत्यंत बुनियादी गरिमा से लेकर सर्वोच्च लोकतांत्रिक भागीदारी तक एक सुविचारित पथ पर आगे बढ़ती है। इसकी शुरुआत एक शौचालय से हुई। स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाए गए 10 करोड़ घरेलू शौचालयों ने उन महिलाओं को सुरक्षा और आत्म-सम्मान लौटाया, जिन्हें लंबे समय से इन दोनों से वंचित रखा गया था। जल जीवन मिशन ने 15 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुँचाया। महिलाओं को मीलों पैदल चलकर पानी ढो कर लाने से मुक्ति मिली जिससे उनका सुबह का कीमती समय जाया हो जाता था।

‘पीएम उज्ज्वला योजना’ के 10.56 करोड़ एलपीजी कनेक्शनों ने महिलाओं को धुएं से भरी रसोई से मुक्ति दिलाई। पीएम आवास योजना के तहत महिलाओं के नाम पर घर बनाए गए। 55 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के स्वामित्व वाले जन धन खातों ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की। ‘मुद्रा’  योजना के ऋण, स्वयं सहायता समूह, लखपति दीदी, सखी, वन स्टॉप सेंटर और तीन तलाक का उन्मूलन: प्रत्येक योजना उसी सीढ़ी का अगला पायदान थी, जो उन्हें केवल गुज़ारा करने की स्थिति से गरिमा की ओर, गरिमा से सामर्थ्य की ओर, और सामर्थ्य से नेतृत्व की ओर निरंतर बढ़ाती गई।

आधुनिक भारत के लिए एक दृष्टिकोण –

भारत को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को तुरंत लागू करने की आवश्यकता है। यह हमारे दौर के सबसे अधिक परिवर्तनकारी संभावित सुधारों में से एक है। महिलाओं के विधायी प्रतिनिधित्व को बढ़ाकर, यह हर स्तर पर नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी को बढ़ाएगा: चाहे वे बजट हों जो मातृ स्वास्थ्य के लिए धन उपलब्ध कराते हैं, वे कानून हों जो पीड़ितों की रक्षा करते हैं, या वे नीतियां हों जो लड़कियों को स्कूल में बनाए रखती हैं और उनकी शिक्षा को बढ़ावा देती हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत’ (2047 तक एक विकसित भारत) का दृष्टिकोण इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि कोई भी राष्ट्र अपनी पूरी क्षमता तक तब तक नहीं पहुँच सकता, जब तक उसके आधे नागरिक उन जगहों से बाहर रहें जहाँ सत्ता का संचालन होता है। जैसा कि उन्होंने हमेशा कहा है: “भारत तभी एक विकसित राष्ट्र बनेगा जब इसकी महिलाएँ न केवल अपने घरों में, बल्कि अपनी संसद में भी पूरी तरह सशक्त होंगी।” नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय महिलाओं के लिए कुछ नया सृजन नहीं करता है। इसने उस विद्वत्ता, साहस और नेतृत्व करने की इच्छाशक्ति के लिए एक संस्थागत स्थान सुनिश्चित कर दिया है, जो महिलाओं में पहले से ही मौजूद है।

शौचालय की गरिमा से लेकर संसद में समान आवाज़ तक, यह मात्र एक विधायी यात्रा नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की कहानी है जिसने अंततः पूर्णता की ओर बढ़ने का निर्णय लिया है।

“आधी आबादी को आखिरकार सुना गया। नज़रिया साफ़ है। ये मुहीम जारी रहेगी।”

(लेखिका महाराष्ट्र सरकार में रेजिडेंट कमिश्नर एवं सचिव पद पर कार्यरत हैं और आईआईटी बॉम्बे से पीएचडी कर रही हैं)

भारत की विकास गाथा के केंद्र में महिलाएँ
  • श्रीमती विजया रहाटकर

भारत की विकास गाथा को अक्सर संख्याओं, विकास दरों, अवसंरचना विस्तार और आर्थिक उपलब्धियों के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन, पिछले दशक का सबसे बड़ा बदलाव आँकड़ों से परे है। यह एक गहरे सामाजिक बदलाव में परिलक्षित होता है—महिलाओं का केवल भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को आकार देने वाले अग्रिम व्यक्तियों के रूप में उभरना।

महिलाओं के नेतृत्व में विकास की ओर यह बदलाव न तो आकस्मिक है और न ही अलग-थलग है। यह एक सोच-समझकर किये गये सतत प्रयास का परिणाम है, जो जीवन के हर चरण में महिलाओं को समर्थन देने के लिए एक सक्षम इकोसिस्टम का निर्माण करता है। लड़की के जन्म से लेकर उद्यमी, पेशेवर, या सार्वजनिक प्रतिनिधि के रूप में उसकी यात्रा तक, यह दृष्टिकोण समग्र, सतत और परिवर्तनकारी रहा है।               

राजनीतिक भागीदारी में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा गया है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 12,14,885 है, जिनकी कुल 24,41,781 निर्वाचित प्रतिनिधियों में हिस्सेदारी 49.75% है—इस प्रकार, महिलाएँ जमीनी स्तर पर शासन में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। इस क्रम में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी उपलब्धि है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। यह उच्च विधायी क्षेत्रों में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने में राष्ट्र की अडिग प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। इस ऐतिहासिक सुधार की वास्तविक क्षमता केवल इसके प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से ही हासिल की जा सकती है। अधिनियम की प्रावधानों को जल्द से जल्द लागू करने की आवश्यकता है, ताकि महिलाओं की आवाज़ को सिर्फ मान्यता ही न मिले, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संरचना में इसे संस्थागत रूप से समाहित किया जा सके। इसके जल्द लागू होने से न केवल समावेशी शासन को गति मिलेगी, बल्कि यह बेहतर प्रतिनिधित्व और न्यायसंगत राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक के रूप में भी कार्य करेगा।  

दशकों तक, लैंगिक पक्षपात ने भारत के जनसांख्यिकीय और सामाजिक संकेतकों को प्रभावित किया। आज, वह कहानी धीरे-धीरे फिर से लिखी जा रही है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों ने गहरी  जड़ें जमा चुकी मानसिकताओं को चुनौती देने और लड़की के मूल्य को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। इसका प्रभाव राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) में दिखाई देता है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का लैंगिक अनुपात दर्ज किया गया है, जो सिर्फ संख्यात्मक सुधार ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का भी संकेत देता है। ‘मिशन इंद्रधनुष’ जैसे कार्यक्रम जीवन के प्रारंभिक चरण में पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करते हैं। ‘मिशन सक्षम आंगनवाड़ी’, ‘पोषण 2.0’, तथा ‘पोषण अभियान’ के प्रयास कुपोषण का समाधान करते हैं—यह मानते हुए कि स्वस्थ बचपन, सशक्त वयस्कता की ओर पहला कदम होता है।  

माताओं के लिए, संस्थागत समर्थन में काफी विस्तार हुआ है। पीएमएमवीवाई के तहत, 4.28 करोड़ से अधिक महिलाओं को 20,149 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि वितरित की गयी है, जो गर्भावस्था के दौरान वित्तीय सहायता प्रदान करती है। 

महिलाएं केवल भाग ही नहीं ले रही हैं—वे नेतृत्व भी कर रही हैं। भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में संस्थापक और निर्णयकर्ताओं के रूप में महिलाओं की भूमिका में लगातार वृद्धि हो रही है और वे नवाचार और उद्यम में भी योगदान दे रही हैं। इस परिवर्तन में वित्तीय समावेश ने अहम भूमिका निभाई है। पीएमएमवाई के तहत, 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 57.79 करोड़ ऋण प्रदान किए गए हैं, जिनमें लगभग 66% लाभार्थी महिलाएं हैं। प्रत्येक ऋण केवल वित्तीय सहायता का ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आकांक्षाओं में विश्वास का भी प्रतीक है। इसके पूरक रूप में, जन धन योजना के तहत वित्तीय समावेश और गहरा हुआ है, जिसके अंतर्गत 57.93 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें से 32.29 करोड़ (55.7%) महिलाओं के हैं।

जमीनी स्तर पर, परिवर्तन का पैमाना और भी अधिक प्रभावशाली है। लगभग 10 करोड़ महिलाओं को 90 लाख से अधिक स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिससे सामूहिक सहनशीलता, वित्तीय स्वतंत्रता और सामाजिक आत्मविश्वास को बढ़ावा मिला है। इस इकोसिस्टम ने 3 करोड़ से अधिक महिलाओं को लखपति दीदी के रूप में उभरने में सक्षम बनाया है और स्वयं सहायता समूहों को 12.50 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बैंक ऋण प्राप्त हुआ है। इसके अलावा, 84 लाख ग्रामीण महिलाएं उद्यमी बन चुकी हैं, जबकि 5 करोड़ महिला किसानों ने उन्नत और सतत कृषि प्रथाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किये हैं।

स्वाभाविक रूप से अगला सवाल उठता है—क्या सशक्तिकरण, आजीविका से समृद्धि की ओर बढ़ सकता है? लखपति दीदी जैसी पहलों का लक्ष्य आय सृजन को मजबूत करना है, जबकि ड्रोन दीदी पहल, जिसका लक्ष्य 15,000 महिलाओं को ड्रोन पायलट के रूप में प्रशिक्षित करना है, एक दूरदर्शी दृष्टिकोण को परिलक्षित करती है—ग्रामीण महिलाओं को प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि इकोसिस्टम में एकीकृत करना।

सशक्तिकरण का मतलब रोजमर्रा के बोझ को आसान बनाना भी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10.56 करोड़ से अधिक धुँआ-रहित रसोई घरों ने स्वास्थ्य में सुधार किया है और कठिनाइयों को कम किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 11.8 करोड़ से अधिक शौचालयों के निर्माण ने गरिमा और सुरक्षा में वृद्धि की है। प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसकी 73% लाभार्थी महिलाएं हैं, के तहत निर्मित घरों ने स्वामित्व और सुरक्षा को मजबूत किया है। साथ मिलकर ये सभी पहलें दैनिक जीवन में गरिमा की परिभाषा को नए सिरे से स्थापित करती हैं।

इसके साथ ही, महिलाएं उन स्थानों में भी प्रवेश कर रही हैं, जिन्हें कभी उनकी पहुँच से बाहर माना जाता था। सशस्त्र बल इस बदलती हुई वास्तविकता को दर्शाते हैं, जहाँ महिलाएँ नेतृत्व और जिम्मेदारी की भूमिकाएँ निभा रही हैं, जिसमें युद्ध क्षेत्र भी शामिल हैं। सवाल अब यह नहीं है कि महिलाएँ सेवा कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि वे कितनी दूर तक नेतृत्व कर सकती हैं।

कार्यस्थल सुधारों ने भी इस बदलाव में योगदान दिया है। नयी श्रम संहिताएँ महिला कर्मचारियों को उचित सुरक्षा उपायों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में, जिसमें रात की शिफ्ट भी शामिल है, काम करने में सक्षम बनाकर समावेश को बढ़ावा देती हैं। ये संहिताएँ समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान पर जोर देती हैं—सुरक्षा से सशक्तिकरण की ओर बदलाव को रेखांकित करती हैं।

संस्थागत समर्थन एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने शिकायत निवारण से आगे बढ़कर सक्रिय जुड़ाव और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भी अपना विस्तार किया है। ‘शी सर्व्स’ जैसी पहल महिला अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन करती हैं, जबकि ‘यशोदा एआई’ उन्हें उभरते तकनीकी कौशल प्रदान करती है। ‘कैंपस कॉलिंग’ युवाओं में जागरूकता बढ़ाता है, ‘शी इज अ चेंज मेकर’ कार्यक्रम जमीनी स्तर पर नेतृत्व क्षमता को मजबूत करता है और ‘महिला जनसुनवाई’ सुलभ शिकायत निवारण सुनिश्चित करता है।

जो उभरकर सामने आता है, वह प्रयासों का एक शक्तिशाली समन्वय है, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास के नए युग को आकार दे रहा है।   

(लेखिका राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष हैं)