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बिरसा हरित ग्राम योजना ने बदली झारखंड के किसानों की तस्वीर, बंजर भूमि बनी आय का मजबूत स्रोत

रांची / सत्ता संदेश

झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी बिरसा हरित ग्राम योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बनती जा रही है। कभी अनुपयोगी और बंजर पड़ी भूमि अब फलदार पौधों, हरित खेती और बागवानी गतिविधियों के जरिए किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन रही है। योजना के प्रभाव से हजारों ग्रामीण परिवारों को रोजगार और अतिरिक्त आमदनी के अवसर मिले हैं।

राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना का मुख्य उद्देश्य बंजर और परती भूमि का उत्पादक उपयोग करना, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण परिवारों की आय में वृद्धि करना है। इसके तहत किसानों को आम, अमरूद, नींबू, कटहल, पपीता और अन्य फलदार पौधों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही पौधारोपण, सिंचाई और रखरखाव के लिए भी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, योजना के तहत बड़ी मात्रा में अनुपयोगी भूमि को बागवानी क्षेत्र में परिवर्तित किया गया है। इससे न केवल हरित आवरण बढ़ा है बल्कि किसानों को दीर्घकालिक आय का नया साधन भी मिला है। कई गांवों में ऐसे किसान सामने आए हैं जिन्होंने पहले खाली पड़ी जमीन पर फलदार पौधे लगाए और अब उनकी फसल से नियमित आमदनी प्राप्त कर रहे हैं।

योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसे ग्रामीण रोजगार से जोड़ा गया है। पौधारोपण, सिंचाई, रखरखाव और फसल प्रबंधन के कार्यों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। इससे गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं और पलायन की समस्या को कम करने में भी मदद मिली है।

विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड जैसे राज्य, जहां बड़ी मात्रा में भूमि वर्षो तक अनुपयोगी पड़ी रहती है, वहां ऐसी योजनाएं कृषि और पर्यावरण दोनों दृष्टि से लाभकारी साबित हो सकती हैं। बागवानी आधारित खेती किसानों को पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर और स्थायी आय देने की क्षमता रखती है।

योजना का पर्यावरणीय प्रभाव भी उल्लेखनीय माना जा रहा है। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से हरित क्षेत्र में वृद्धि हुई है, मिट्टी संरक्षण को बढ़ावा मिला है और स्थानीय जैव विविधता को भी लाभ पहुंचा है। इसके अलावा जल संरक्षण और सूक्ष्म जलवायु सुधार में भी ऐसे प्रयास सहायक साबित हो रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों के कई लाभार्थियों का कहना है कि योजना ने उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार किया है। जहां पहले भूमि बेकार पड़ी रहती थी, वहीं अब वही जमीन परिवार की आय बढ़ाने का माध्यम बन गई है। कई किसानों ने फल उत्पादन के साथ-साथ सब्जी और अन्य सहायक कृषि गतिविधियां भी शुरू की हैं।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि योजना का प्रभावी क्रियान्वयन जारी रहता है और किसानों को बाजार, भंडारण तथा प्रसंस्करण सुविधाओं से जोड़ा जाता है, तो यह झारखंड के ग्रामीण विकास मॉडल की एक बड़ी सफलता बन सकती है।

बिरसा हरित ग्राम योजना इस बात का उदाहरण बनकर उभरी है कि सही नीति, सामुदायिक भागीदारी और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग से बंजर भूमि को भी समृद्धि और रोजगार का आधार बनाया जा सकता है।

कम बारिश और अल नीनो की आशंका को देखते हुए राज्यों को तैयारी तेज करने के निर्देश: कृषि मंत्री चौहान

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने शुक्रवार को सभी राज्य सरकारों से अपील की है कि वे संभावित कम वर्षा और अल नीनो जैसी मौसमीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पहले से ही आवश्यक तैयारियां सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि बदलते जलवायु पैटर्न के कारण कृषि क्षेत्र पर असर पड़ सकता है, इसलिए समय रहते रणनीति बनाना जरूरी है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुमान का हवाला देते हुए मंत्री ने कहा कि इस वर्ष मानसून सामान्य से कम रहने की संभावना जताई गई है। ऐसे में किसानों की फसलों, सिंचाई व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को कम करने के लिए राज्य स्तर पर सक्रियता जरूरी है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार, अल नीनो जैसी परिस्थितियां अक्सर मानसूनी वर्षा को प्रभावित करती हैं, जिससे कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे हालात में जल प्रबंधन, वैकल्पिक फसल योजना और समय पर बीज उपलब्धता जैसी व्यवस्थाएं बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

मंत्री चौहान ने कहा कि राज्यों को कृषि विभाग, आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और मौसम विभाग के साथ मिलकर एक समन्वित कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। इसमें सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा देना, पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना और किसानों को समय पर सलाह देना शामिल होना चाहिए।

विशेषज्ञों के अनुसार, कम वर्षा की स्थिति में सबसे अधिक असर धान, गन्ना और कुछ अन्य पानी-प्रधान फसलों पर पड़ता है। इसलिए कृषि नीति में फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) और सूखा-सहिष्णु किस्मों को बढ़ावा देना लंबे समय से एक महत्वपूर्ण रणनीति माना जाता है।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि केंद्र और राज्य मिलकर किसानों तक मौसम आधारित कृषि सलाह पहुंचाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल अलर्ट सिस्टम का विस्तार कर रहे हैं। इससे किसानों को बुवाई और सिंचाई के समय पर निर्णय लेने में मदद मिलती है।

कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर राहत एवं सहायता योजनाओं को तेजी से लागू किया जाएगा। उन्होंने राज्यों को चेताया कि किसी भी प्रकार की देरी से किसानों को नुकसान बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मानसून की अनिश्चितता कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में वैज्ञानिक खेती, जल संरक्षण और तकनीकी हस्तक्षेप ही दीर्घकालिक समाधान हैं।

फिलहाल सरकार का फोकस तैयारी और जोखिम प्रबंधन पर है, ताकि संभावित कम बारिश का प्रभाव किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम रहे।

महाराष्ट्र के नासिक में प्याज किसानों का प्रदर्शन, खरीद मूल्य के विरोध में राजमार्ग जाम

नासिक/ सत्ता संदेश

महाराष्ट्र के Nashik जिले में सोमवार को प्याज किसानों ने सरकार द्वारा तय किए गए खरीद मूल्य के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। किसानों ने अपनी मांगों को लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग पर धरना देते हुए यातायात को पूरी तरह बाधित कर दिया, जिससे कई घंटों तक वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि प्याज का मौजूदा खरीद मूल्य उनकी लागत के मुकाबले बेहद कम है, जिससे खेती करना घाटे का सौदा बनता जा रहा है। किसानों ने आरोप लगाया कि उन्हें अपनी उपज का उचित दाम नहीं मिल रहा, जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।

किसानों ने बताया कि खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी की बढ़ती लागत के बावजूद प्याज का बाजार मूल्य काफी नीचे बना हुआ है। इसी वजह से बड़ी संख्या में किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है और कई किसान कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं।

प्रदर्शन के दौरान किसानों ने सड़क पर बैठकर नारेबाजी की और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना था कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस आश्वासन नहीं दिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और यातायात को वैकल्पिक मार्गों की ओर मोड़ा गया। पुलिस अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर स्थिति को शांत करने का प्रयास किया।

किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन को और व्यापक स्तर पर तेज किया जाएगा। उन्होंने सरकार से प्याज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाने और खरीद व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की।

यह विरोध ऐसे समय में हुआ है जब महाराष्ट्र में प्याज उत्पादन और कीमतों को लेकर पहले भी कई बार किसान आंदोलन कर चुके हैं। राज्य में प्याज की खेती बड़े पैमाने पर होती है और इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर किसानों की आजीविका पर पड़ता है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने शी-मार्ट्स के माध्यम से पूरे भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले ग्रामीण विपणन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक रूपरेखा तैयार की


दिल्ली /सत्ता संदेश

डीएवाई-एनआरएलएम ने पूरे भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले ग्रामीण विपणन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए शी-मार्ट्स पर राष्ट्रीय परामर्श का नेतृत्व किया

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय (एमओआरडी) ने दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के माध्यम से 14-15 मई , 2026 को भुवनेश्वर, ओडिशा के मेफेयर कन्वेंशन हॉल में शी-मार्ट्स (स्वयं सहायता उद्यमी-ग्रामीण परिवर्तन के लिए विपणन के अवसर) पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया। इस परामर्श ने बजट घोषणा – 2026 के कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त किया। इस परामर्श की मेजबानी ओडिशा आजीविका मिशन (ओएलएम), मिशन शक्ति विभाग, ओडिशा सरकार ने की और राष्ट्रीय सहायता संगठन (एनएसओ) के रूप में पीआरएडीएएन ने इसे सुगम बनाया।

राज्य मिशन निदेशकों, सीईओ, राज्य ग्रामीण आजीविका मिशनों (एसआरएलएम) के वरिष्ठ अधिकारियों, नाबार्ड के प्रतिनिधियों, क्षेत्र विशेषज्ञों, विकास कार्यकर्ताओं, वित्तीय संस्थानों और पारिस्थितिकी तंत्र भागीदारों ने एक साथ मिलकर महिला नेतृत्व वाले ग्रामीण उद्यमों और बाजार प्रणालियों को मजबूत करने के लिए रणनीतिक हस्तक्षेपों पर विचार-विमर्श किया।

इस परामर्श का उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त जमीनी प्रतिक्रिया, सुझावों और प्रासंगिक जानकारियों के माध्यम से शी-मार्ट्स पहल के परिचालन दिशानिर्देशों को अंतिम रूप देना था। प्रमुख विषयों में संस्थागत संरचना, वित्तपोषण मॉडल, अभिसरण मार्ग, निगरानी प्रणाली, व्यावसायिक प्रक्रियाएं, शासन संरचनाएं, प्रौद्योगिकी एकीकरण और कार्यान्वयन रणनीतियां शामिल थीं।

उद्घाटन सत्र का नेतृत्व भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव श्री टी.के. अनिल कुमार ने किया, जिन्होंने वर्चुअल माध्यम से मुख्य उद्घाटन भाषण दिया। अपने मुख्य भाषण में, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि डीएवाई-एनआरएलएम का भविष्य उद्यम विकास और बाज़ार एकीकरण में निहित है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शी-मार्ट्स को सब्सिडी-आधारित संस्थागत मॉडलों के बजाय, महिलाओं के समूहों द्वारा संचालित, समुदाय के स्वामित्व वाले खुदरा और एकत्रीकरण प्रणालियों के रूप में उभरना चाहिए।

एमओआरडी की संयुक्त सचिव, सुश्री स्वाति शर्मा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस राष्ट्रीय परामर्श का उद्देश्य एक ऐसे कार्यकारी मंच के रूप में काम करना है, जहाँ राज्य/केंद्र शासित प्रदेश मसौदा रूपरेखा की गहन समीक्षा कर सकें, कार्यान्वयन में मौजूद कमियों की पहचान कर सकें और बड़े पैमाने पर इसे लागू करने के लिए व्यावहारिक विकल्प सुझा सकें।

एमओआरडी की संयुक्त सचिव, सुश्री रोहिणी आर. भाजीभाकरे भी वीबी-जीराम-जी की प्रमुख विशेषताओं को उजागर करने के लिए इस परामर्श में शामिल हुईं।

ओडिशा आजीविका मिशन की राज्य मिशन निदेशक डॉ. मोनिका प्रियदर्शनी ने मिशन शक्ति और सामुदायिक संस्थानों के माध्यम से विकेंद्रीकृत महिला नेतृत्व वाले उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में ओडिशा के अनुभव पर प्रकाश डाला।

डीएवाई-एनआरएलएम की ग्रामीण आजीविका विभाग की निदेशक, डॉ. मोलिश्री ने शी-मार्ट्स पहल के विकास और रणनीतिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया और आजीविका संवर्धन से उद्यम-आधारित ग्रामीण बाजार प्रणालियों की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारत सरकार के वीबी-जीराम-जी की सहायक आयुक्त सुश्री दीक्षा सुप्याल बिष्ट ने वीबी-जीराम-जी और शी-मार्ट्स के बीच संभावित अभिसरण के अवसरों पर चर्चा की, विशेष रूप से महिला-केंद्रित बुनियादी ढांचे, मांग सृजन और बाजार समर्थन प्रणालियों के संबंध में।

पहले दिन का एक प्रमुख आकर्षण “ग्रामीण विपणन के लिए एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में ‘शी-मार्ट्स’ पर आयोजित राष्ट्रीय पैनल चर्चा थी। इस पैनल ने शी-मार्ट्स के लिए स्केलेबल डिज़ाइन सिद्धांतों पर विचार-विमर्श करने हेतु सरकार, वित्त, प्रौद्योगिकी और सामाजिक उद्यम क्षेत्रों के विविध दृष्टिकोणों को एक साथ लाया। इस परामर्श में व्यापक उप-समूह विचार-विमर्श भी शामिल था, जिसमें पाँच विषयगत समूहों ने शी-मार्ट्स के मसौदा परिचालन ढाँचे की गहन समीक्षा की; इस समीक्षा में और अधिक विस्तार, जोड़, हटाव और किन पहलुओं से बचना है—इन सभी बिंदुओं पर विशेष रूप से विचार किया गया।

परामर्श के दूसरे दिन मानव संसाधन संरचना एवं महिला नेतृत्व, तकनीकी डिजाइन एवं कार्यान्वयन रणनीति तथा क्षमता निर्माण संरचना पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रतिभागियों ने महिला नेतृत्व वाली शासन प्रणाली और सामुदायिक स्वामित्व को बनाए रखते हुए पेशेवर खुदरा प्रबंधन प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया।

दो-दिवसीय परामर्श के दौरान, इस बात पर एक मज़बूत आम सहमति बनी कि शी-मार्ट्स को सब्सिडी पर निर्भर खुदरा दुकानों के बजाय, विकेंद्रीकृत, महिलाओं के नेतृत्व वाले, पेशेवर रूप से प्रबंधित और समुदाय के स्वामित्व वाले उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

परामर्श प्रक्रिया राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों, डीएवाई-एनआरएलएम और पारिस्थितिकी तंत्र भागीदारों की ओर से शी-मार्ट्स के लिए अंतिम परिचालन दिशानिर्देशों को सुदृढ़ करने और देश भर में चरणबद्ध कार्यान्वयन का समर्थन करने की साझा प्रतिबद्धता के साथ समाप्त हुई। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2029 तक 3 करोड़ अतिरिक्त ‘लखपति दीदी’ बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही, मंत्रालय ने एसआरएलएम को ‘शी-मार्ट्स’ स्थापित करने में सहायता देने का भी संकल्प लिया है। ये शी-मार्ट्स ऐसे टिकाऊ ग्रामीण विपणन मंच होंगे जो पूरे भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले उत्पादक समूहों के लिए आय के अवसर, उद्यम विकास, ब्रांडिंग और बाज़ार तक पहुँच को बेहतर बनाएंगे।