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Chabahar port strike : अमेरिका ने चाबहार को बनाया निशाना, तनाव का माहौल

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

अमेरिका और ईरान के बीच हो रही जंग की आंच चाबहार बंदरगाह तक पहुंच चुकी है। होर्मुज और आसपास के इलाकों में 90 से अधिक ठिकानों पर हवाई हमलों के बाद अमेरिकी सेना ने चाबहार को भी निशाना बनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान में अमेरिकी सेना की एयर स्ट्राइक के बाद चाबहार और आसपास के क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। हमलों में बंदरगाह, एक समुद्री यातायात नियंत्रण टावर और पास की सैन्य संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचा है।

पश्चिम एशिया में संकट कितना गहरा?

गुरूवार को ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर खामेनेई को मशहद शहर में सुपुर्द-ए-खाक भी किया जाना है, ऐसे में अमेरिकी हमलों के बाद पश्चिम एशिया में संकट गहराने लगा है। दोनों पक्षों की तरफ से आक्रामक बयानबाजी का सिलसिला भी जारी है।

अमेरिका ने ईरान के चाबहार पर हमला किया, संघर्ष पर ट्रंप क्या बोले?

दरअसल, अमेरिका ने बुधवार-गुरुवार की दरम्यानी रात ईरान के दक्षिण-पूर्वी बंदरगाह शहर चाबहार पर नए हमले किए। रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देश दूसरे दिन भी एक-दूसरे पर लगातार हमले कर रहे हैं। ईरान की सरकारी मीडिया में आई खबरों के मुताबिक चाबहार में विस्फोटों की आवाज सुनी गई। शहर के कुछ हिस्सों में बिजली भी गुल हो गई। स्थानीय लोगों ने कई धमाके सुने। आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी जगहों पर भी नुकसान की खबर है। यह हमले चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि अप्रैल में अमेरिका-ईरान युद्धविराम की घोषणा के बाद से भारत की मदद के विकसित इस रणनीतिक बंदरगाह पर पहली बार हमले हुए हैं। 

90 ईरानी ठिकानों पर हमले, अमेरिकी सेना क्या बोली?

अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, समुद्र में बने बुनियादी ढांचे और सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया गया। वाशिंगटन की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि इन जगहों की मदद से ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाता है। खतरों को भांपते हुए अमेरिकी सेना की मध्य पूर्व कमान- सेंटकॉम (CENTCOM) ने लगभग 90 ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया। एक्स पर जारी बयान में सेंटकॉम ने लिखा, अमेरिकी सेंट्रल कमांड बलों ने ईरान के खिलाफ अतिरिक्त हमले शुरू किए हैं। इसका मकसद होर्मुज में खतरों को कम करना और जहाजों को नुकसान पहुंचाने की ईरान की ताकत पर नकेल कसना है।

इन हमलों के बाद अमेरिका ने कहा कि वाणिज्यिक जहाजों और नागरिक दल के खिलाफ हालिया आक्रामकता अनुचित हैं। इसके लिए ईरान जवाबदेह है। अमेरिकी हमलों से पहले मंगलवार को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे तीन मालवाहक जहाजों पर कथित तौर पर ईरान की सेना ने हमले किए। ट्रंप ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि अगर तेहरान महत्वपूर्ण शिपिंग लेन में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना जारी रखेगा, तो इसके अंजाम ‘बहुत खराब’ होंगे।

ईरान ने अमेरिका पर पलटवार करने के लिए कुवैत और बहरीन में उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। ट्रंप के आक्रामक बयान के बीच ईरान की संसद के अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार गालिबाफ ने कहा, अमेरिका ने अभी तक यह नहीं सीखा है कि धमकाना और वादे तोड़ना बीते दिनों की बात हो चुकी है।

ट्रंप ने क्यों कहा- ईरान के साथ वार्ता समय की बर्बादी?

यह भी महत्वपूर्ण है कि ईरान में अमेरिकी सेना के ताजा हमलों से पहले नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा था कि ईरान के साथ मौजूदा हालात में बातचीत करना उन्हें समय की बर्बादी लगता है। तल्ख अंदाज में ट्रंप ने तेहरान के नेताओं को बेवकूफ भी बताया था। उन्होंने शांति समझौते को लेकर भी कहा कि ईरान की तरफ से सीजफायर का उल्लंघन किया गया, ऐसे में उन्हें लगता है कि समझौता टूट चुका है। तेहरान की तरफ से भी अमेरिका को दो-टूक जवाब दिया गया है।

फ्रांस में G-7 सम्मेलन की शुरुआत, इस बार इन खास मुद्दों पर होगी विशेष चर्चा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

फ्रांस में सोमवार (15 जून) से शुरू हो रही ग्रुप ऑफ सेवेन (जी-7) की बैठक इस बार काफी दिलचस्प होने वाली है। दरअसल, यह सम्मेलन उस समय हो रहा है, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने पर हाल ही में समझौता करने पर सहमति बनी है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस पूरे सम्मेलन में छाए रहने की उम्मीद है। दूसरी तरफ जी-7 देश अब रूस-यूक्रेन संघर्ष और इस समूह के ही एक सदस्य अमेरिका की टैरिफ और कूटनीति को लेकर भी चर्चाएं कर सकते हैं। 

इस बार जी-7 की अध्यक्षता फ्रांस के पास है। बीते साल जब यह सम्मेलन हुआ था, तब इसकी अध्यक्षता कनाडा के पास थी। इसी तरह फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका भी रोटेशन प्रणाली के तहत जी-7 की अध्यक्षता और इसकी मेजबानी कर चुके हैं। दूसरी तरफ भारत बीते कुछ वर्षों में जी-7 का सदस्य न होने के बावजूद इसके लिए मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया जाता रहा है। 


क्या है जी-7 सम्मेलन, इसका क्या इतिहास?

जी7 के गठन की कहानी भी काफी दिलचस्प है। दरअसल, 1970 का दौर, वह समय था, जब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था तेल के बढ़ते दामों की वजह से मुश्किल में थी। खासकर तेल पैदा करने वाले देशों के संगठन- ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) यानी पेट्रोल निर्यातक देशों के संगठन की मनमानी की वजह से। 

1975
ओपेक की तरफ से तेल के निर्यात पर लगी पाबंदियों का असर ऐसा हुआ कि तब अमेरिका के वित्त मंत्री जॉर्ज शुल्ज ने एक बैठक बुला ली। पहली बैठक में छह देश इकट्ठा हुए और आर्थिक संकटों से निपटने पर चर्चा की। फैसला हुआ कि एक साल बाद यह देश फिर मिलेंगे और उठाए गए कदमों की समीक्षा करेंगे। 

1976
एक साल बाद जब यह बैठक फिर हुई तो कनाडा को भी इसका हिस्सा बना लिया गया। इस तरह जी7 अस्तित्व में आया।  

1977
यूरोपीय आयोग (ईसी) के अध्यक्ष को भी जी7 की बैठकों के लिए आमंत्रित कर दिया गया। सामूहिक तौर पर यूरोप जी7 का हिस्सा नहीं बना।

1997
रूस को इस समूह में शामिल किया गया था। इसके बाद यह जी-8 बन गया। हालांकि, 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद रूस को समूह से निलंबित कर दिया गया और यह वापस जी-7 बन गया

इस बार क्या है जी-7 का एजेंडा?

इस बार फ्रांस के इवियन-लेस-बैंस में हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा कई गंभीर वैश्विक राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक चुनौतियों पर केंद्रित है। इनमें सबसे प्रमुख यूक्रेन युद्ध और दुनियाभर में अमेरिका की वजह से फैला व्यापारिक असंतुलन है। 

1. यूक्रेन का युद्ध
जी-7 देश यूक्रेन के प्रति अपनी एकजुटता और समर्थन दिखाना चाहते हैं, क्योंकि रूस और यूक्रेन का युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की इस चर्चा के लिए सम्मेलन में मौजूद रहेंगे, जिन्होंने युद्ध खत्म करने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ आमने-सामने की बातचीत का प्रस्ताव रखा है। यूरोपीय नेता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह समझाने का प्रयास करेंगे कि वे पुतिन के साथ सार्थक बातचीत के लिए एक साझा और मजबूत दृष्टिकोण अपनाएं।

2. ईरान के साथ शांति समझौता
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के लिए जिस समझौते की रूपरेखा तैयार हुई है, उस पर इस सम्मेलन में प्रमुखता से चर्चा होगी। जी-7 नेता इस समझौते का विस्तृत विवरण जानना चाहते हैं, खासकर यह कि वैश्विक व्यापार के लिए अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को शिपिंग ट्रैफिक के लिए कितनी जल्दी खोला जा सकता है। 

3. वैश्विक आर्थिक असंतुलन और व्यापार
चर्चा का एक और बड़ा विषय चीन के साथ-साथ अमेरिका की व्यापार नीतियां और वैश्विक आर्थिक असंतुलन है। फ्रांस ने इस असंतुलन को स्पष्ट करते हुए कहा है कि चीन बहुत अधिक उत्पादन करता है, अमेरिका बहुत अधिक उपभोग करता है और यूरोप बहुत कम निवेश करता है। इसके अलावा, सम्मेलन में चीन के रिकॉर्ड व्यापार मुनाफे और रोजमर्रा के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) के बाजार पर चीन के दबदबे को लेकर चिंताएं उठाई जाएंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ से जुड़े व्यापारिक तनावों पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। 

4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
तेजी से बढ़ती एआई तकनीक से जुड़े अवसरों और संभावित खतरों पर चर्चा करने के लिए फ्रांस ने ओपनएआई, गूगल, एंथ्रोपिक और मिस्ट्रल एआई जैसी प्रमुख कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी आमंत्रित किया है। इसके अंतर्गत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे अहम विषयों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

5. विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ
जी-7 नेता कई उभरते बाजारों और विकासशील देशों पर बढ़ रहे भारी कर्ज के बोझ से निपटने के लिए अपना संकल्प जाहिर करेंगे, हालांकि इसके ठोस कदम क्या होंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

फ्रांस में होने वाले जी-7 सम्मेलन में कौन-कौन ले रहा हिस्सा?

फ्रांस के इवियन-लेस-बैंस में आयोजित हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन में मुख्य सदस्य देशों के अलावा कई अतिथि देशों के नेताओं और तकनीकी दिग्गजों को भी आमंत्रित किया गया है।

जी-7 का हिस्सा देश
सम्मेलन में जी-7 के सातों मुख्य सदस्य देश और इनके प्रमुख शामिल होंगे। इनमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मेजबान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी और जापान की प्रधानमंत्री सनाई तकाइची हिस्सा लेंगी। इनके साथ ही, यूरोपीय संघ (ईयू) भी हमेशा की तरह इस सम्मेलन में अपना प्रतिनिधित्व करेगा।

आमंत्रित देश
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कई गैर-जी7 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अतिथि के रूप में विशेष निमंत्रण दिया है। जिन प्रमुख नेताओं ने सम्मेलन में हिस्सा लेने की पुष्टि की है, उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल-सीसी, कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी।

इनके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, केन्या और दक्षिण कोरिया के नेता भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को भी निमंत्रण दिया गया है, लेकिन उनके शामिल होने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

एआई और टेक कंपनियों के अधिकारी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीकों, उसके खतरों और अवसरों पर चर्चा करने के लिए दुनिया की प्रमुख टेक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। इनमें ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो एमोडाई के साथ-साथ गूगल और मिस्ट्रल एआई के प्रतिनिधि शामिल हैं।

जी-7 के किस नेता से डोनाल्ड ट्रंप का कब और क्या विवाद हुआ है? 

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर: ईरान पर अमेरिकी सैन्य हमलों में ब्रिटिश बेस के इस्तेमाल की अनुमति न देने और युद्ध में मदद न करने पर ट्रंप ने स्टार्मर की कड़ी आलोचना की। उन्होंने स्टार्मर की तुलना विंस्टन चर्चिल से करते हुए कहा, “हम विंस्टन चर्चिल से नहीं निपट रहे हैं।” ट्रंप ने सोशल मीडिया पर यह भी ताना मारा कि “हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हमारे युद्ध जीतने के बाद उसमें शामिल होते हैं।”

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी: ट्रंप कनाडा के साथ व्यापार असंतुलन से नाराज रहते हैं और अक्सर कार्नी को गवर्नर कहकर बुलाते हैं। दावोस विश्व आर्थिक मंच में कार्नी की एक परोक्ष टिप्पणी के जवाब में ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “कनाडा अमेरिका की वजह से ही जिंदा है। अगली बार बयान देते समय इसे याद रखना, मार्क।” इतना ही नहीं, पिछले साल जब कनाडा ने जी-7 का आयोजन किया था, तब भी ट्रंप कुछ कारणों से जी-7 की बैठक को बीच में ही छोड़कर अमेरिका लौट गए थे।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों: अप्रैल में व्हाइट हाउस में ईस्टर लंच के दौरान, ट्रंप ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की मदद न करने पर फ्रांस की आलोचना की और मैक्रों के वैवाहिक जीवन का मजाक उड़ाया। उन्होंने वियतनाम के एक वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि मैक्रों की पत्नी ब्रिजिट उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव करती हैं। इसे लेकर बाद में मैक्रों ने पलटवार किया था और ट्रंप के बयान को अनुचित करार दिया। इसके अलावा, ट्रंप अक्सर व्यापार वार्ता को लेकर मैक्रों के लहजे की मजाकिया नकल भी उतारते हैं।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी: बीते साल अक्तूबर में ट्रंप ने मेलोनी की खूब तारीफ की थी, लेकिन ईरान के खिलाफ युद्ध में इटली के मदद करने से इनकार करने और पोप लियो XIV के साथ ट्रंप के विवाद पर मेलोनी ने ट्रंप को फटकार लगाई थी। इसके बाद से ही दोनों नेताओं के बीच विवाद पैदा हो गया। ट्रंप ने इटली के एक अखबार से कहा था, “क्या लोग उसे (मेलोनी को) पसंद करते हैं? मुझे विश्वास नहीं होता… मुझे लगा था कि उसमें साहस है, लेकिन मैं गलत था।”

जापान की प्रधानमंत्री सनाई ताकाइची: ताकाइची की पहली व्हाइट हाउस यात्रा के दौरान (अक्तूबर के बाद), जब एक जापानी पत्रकार ने ईरान पर अचानक हमले को लेकर सवाल पूछा, तो ट्रंप ने जापान को असहज करते हुए पर्ल हार्बर का अप्रत्याशित हवाला दिया। ट्रंप ने कहा, “जापान से बेहतर सरप्राइज के बारे में कौन जानता है? आपने मुझे पर्ल हार्बर के बारे में क्यों नहीं बताया?।” बता दें कि पर्ल हार्बर द्वितीय विश्व युद्ध के समय की घटना थी, जिसमें जापान ने अमेरिका पर हमला किया था। इसके बाद अमेरिका ने पलटवार करते हुए जापान पर दो परमाणु बम गिरा दिए थे। 

जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज: अप्रैल में मर्ज ने ईरान युद्ध में अमेरिका की रणनीति की आलोचना करते हुए कहा था कि अमेरिका अपमानित हो रहा है। इस पर ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पलटवार करते हुए कहा कि मर्ज को अपने देश की आव्रजन  और ऊर्जा समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। इस विवाद के कुछ दिनों बाद ही अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5,000 सैनिकों को वापस बुलाने का ऐलान कर दिया। डी-डे (द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना की विजयी का दिन) की सालगिरह से पहले भी दोनों के बीच एक असहज स्थिति तब बन गई थी, जब ट्रंप ने मर्ज से कहा था कि वह ऐतिहासिक दिन जर्मनी के लिए सुखद नहीं था।

हेगसेथ ने भारत-पाक संघर्षविराम पर ट्रंप के दावे का किया समर्थन, भारत को बताया हिंद-प्रशांत रणनीति का प्रमुख साझेदार

सिंगापुर / सत्ता संदेश

अमेरिका के रक्षा मंत्री Pete Hegseth ने शनिवार को राष्ट्रपति Donald Trump के उस दावे का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने तथा संघर्षविराम स्थापित करने में अमेरिकी भूमिका का उल्लेख किया था। साथ ही हेगसेथ ने भारत को अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति का एक प्रमुख और विश्वसनीय साझेदार बताया।

सिंगापुर में आयोजित Shangri-La Dialogue के दौरान अपने संबोधन और बातचीत में हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका क्षेत्रीय स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए अपने सहयोगियों और साझेदार देशों के साथ लगातार संपर्क में रहता है। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप की कूटनीतिक पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया में तनाव कम करने के प्रयासों में अमेरिकी नेतृत्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि भारत का आधिकारिक रुख लंबे समय से यह रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय रूप से किया जाना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। नई दिल्ली कई अवसरों पर इस नीति को स्पष्ट रूप से दोहरा चुकी है।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों पर जोर

हेगसेथ ने भारत को अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति का केंद्रीय साझेदार बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, समुद्री सहयोग और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों, मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोनों देशों को और करीब लाती है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका है और इस क्षेत्र में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में भारत के योगदान की सराहना की।

विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग, खुफिया साझेदारी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक समन्वय दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले गए हैं।

क्षेत्रीय सुरक्षा पर वैश्विक नजर

शांगरी-ला डायलॉग के दौरान दक्षिण एशिया, चीन, ताइवान, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे। भारत और अमेरिका दोनों ने क्षेत्रीय स्थिरता तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हेगसेथ का बयान एक ओर ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति की प्राथमिकताओं को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी संकेत देता है कि अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी दीर्घकालिक रणनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखता है।

हालांकि भारत-पाक संबंधों में अमेरिकी भूमिका को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध आने वाले वर्षों में और मजबूत होने की संभावना रखते हैं, विशेषकर रक्षा, सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्रों में।

ट्रंप के वादों और हकीकत के बीच फासला, अमेरिकी श्रमिकों को नहीं मिला अपेक्षित आर्थिक लाभ

वॉशिंगटन / सत्ता संदेश

अमेरिका में रोजगार, विनिर्माण और मजदूर वर्ग की आय बढ़ाने के वादों के साथ सत्ता में लौटे राष्ट्रपति Donald Trump की आर्थिक नीतियों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई अर्थशास्त्रियों और श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि तमाम बड़े वादों और नीतिगत घोषणाओं के बावजूद अमेरिकी श्रमिकों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया है।

ट्रंप ने अपने चुनावी अभियानों में बार-बार यह दावा किया था कि उनकी नीतियां अमेरिकी उद्योगों को पुनर्जीवित करेंगी, विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ाएंगी और विदेशी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित श्रमिकों को राहत प्रदान करेंगी। उन्होंने विशेष रूप से चीन के साथ व्यापार असंतुलन, विदेशी आयात और अमेरिकी नौकरियों के पलायन को प्रमुख मुद्दा बनाया था।

हालांकि कई आर्थिक अध्ययनों और श्रम बाजार के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक तस्वीर अधिक जटिल है। कुछ क्षेत्रों में निवेश और रोजगार बढ़ने के बावजूद व्यापक स्तर पर श्रमिकों की वास्तविक आय, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल रोजगार सृजन के आंकड़े किसी अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी नहीं बताते। महंगाई, आवास लागत, स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी आम श्रमिक की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। यदि मजदूरी की वृद्धि इन खर्चों की तुलना में धीमी रहती है, तो श्रमिकों की वास्तविक क्रय शक्ति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।

कई श्रम संगठनों का कहना है कि विनिर्माण क्षेत्र में कुछ सुधार जरूर देखने को मिले हैं, लेकिन स्वचालन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी संरचनात्मक चुनौतियां अभी भी अमेरिकी श्रमिकों के सामने मौजूद हैं। इसके कारण पारंपरिक औद्योगिक नौकरियों में स्थायी वृद्धि सीमित रही है।

दूसरी ओर, ट्रंप समर्थकों का तर्क है कि उनकी व्यापार नीतियों, कर सुधारों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने वाली योजनाओं ने अमेरिकी उद्योगों को मजबूती दी है। उनका कहना है कि आर्थिक लाभों का प्रभाव दीर्घकालिक होता है और कई क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम धीरे-धीरे दिखाई दे रहे हैं।

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी श्रम बाजार की स्थिति का मूल्यांकन केवल राजनीतिक वादों के आधार पर नहीं किया जा सकता। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, तकनीकी परिवर्तन, ऊर्जा लागत, ब्याज दरें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियां भी रोजगार और आय पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं।

वर्तमान बहस यह संकेत देती है कि अमेरिकी राजनीति में श्रमिक वर्ग का मुद्दा अभी भी केंद्रीय विषय बना हुआ है। चाहे रिपब्लिकन हों या डेमोक्रेट, दोनों दलों के लिए यह वर्ग चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि अमेरिकी श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार के लिए केवल संरक्षणवादी नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए कौशल विकास, आधुनिक उद्योगों में निवेश, शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को भी समान महत्व देना होगा।

इसी वजह से ट्रंप के आर्थिक वादों और श्रमिकों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को लेकर बहस आने वाले समय में भी अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था का प्रमुख मुद्दा बनी रहने की संभावना है।

ईरान पर अमेरिका का फिर बड़ा प्रहार: 4 ड्रोन मार गिराए, 5वें के ठिकाने को किया तबाह; ट्रंप बोले- “ईरान अब कमजोर”

इंटरनेशनल डेस्क : मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने बुधवार को ईरान पर एक बार फिर जोरदार हमला किया है, जिसे अमेरिकी सेना ने “रक्षात्मक कार्रवाई” करार दिया है। इस हफ्ते में यह दूसरी बार है जब अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ ऐसी सैन्य कार्रवाई की है।

ड्रोन हमलों को किया नाकाम: अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, यह कदम तब उठाया गया जब ईरानी सेना की ओर से आक्रामक गतिविधियां देखी गईं। अमेरिकी सेना ने ईरान के 4 ड्रोन मार गिराए और एक ऐसे सैन्य ठिकाने पर हमला किया, जहां से पांचवां ड्रोन लॉन्च करने की तैयारी हो रही थी। अधिकारियों का दावा है कि इन ड्रोनों से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को गंभीर खतरा था।

डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान: “ईरान कमजोर स्थिति में” इस सैन्य कार्रवाई के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कैबिनेट बैठक में कहा कि ईरान अब “कमजोर स्थिति में बातचीत” कर रहा है। ट्रंप ने भरोसा जताया कि दोनों देशों के बीच जल्द ही समझौता हो सकता है। उन्होंने बताया कि पिछले हफ्ते के अंत में उनकी सरकार और तेहरान के बीच समझौते को लेकर काफी प्रगति हुई थी, हालांकि अभी बातचीत को अंतिम रूप देना बाकी है।

रणनीतिक उद्देश्य और चुनौतियां : राष्ट्रपति ट्रंप का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा समझौता करना है जिससे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ फिर से सामान्य रूप से खुल सके और ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर किया जा सके। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि वे ईरान के यूरेनियम को चीन या रूस ले जाने की अनुमति नहीं देंगे। हालांकि, अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों को लेकर रिपब्लिकन नेताओं में चिंता बनी हुई है।

बेटे की शादी में शामिल नहीं होंगे डोनाल्ड ट्रंप; ईरान के साथ बढ़ते तनाव को बताया मुख्य कारण

इंटरनेशनल डेस्क : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह घोषणा की है कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और बेटिना एंडरसन की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही हलचल और विशेष रूप से ईरान के साथ जारी तनाव के कारण उनका इस समय व्हाइट हाउस में रहना अनिवार्य है।

व्हाइट हाउस में रहना है जरूरी: ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट के माध्यम से जानकारी दी कि हालांकि वह इस खास मौके पर अपने परिवार और अपनी होने वाली बहू बेटिना के साथ रहना चाहते थे, लेकिन सरकारी कारणों और देश के प्रति अपने कर्तव्यों की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण समय में उनके लिए वाशिंगटन, डी.सी. में व्हाइट हाउस में मौजूद रहना अधिक आवश्यक है।

ईरान संकट और सुरक्षा की स्थिति: इससे पहले पत्रकारों से बातचीत के दौरान भी ट्रंप ने संकेत दिया था कि ‘ईरान और अन्य मुद्दों’ की वजह से उनके बेटे की शादी का समय अभी ठीक नहीं है। स्रोतों के अनुसार, सीजफायर के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच संबंध बेहद नाजुक बने हुए हैं, जिससे शांति समझौते या फिर से युद्ध छिड़ने की अनिश्चितता बनी हुई है। इसी नाजुक स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति ने अपनी यात्रा रद्द की है।

बहामास में होगी शादी: डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और बेटिना एंडरसन की शादी बहामास में एक निजी समारोह में होने वाली है, जिसमें परिवार और कुछ करीबी दोस्तों को ही आमंत्रित किया गया है। राष्ट्रपति ने समारोह में न पहुंच पाने के कारण सोशल मीडिया के जरिए ही जोड़े को अपनी शुभकामनाएं भेजी हैं।

ईरान से तनाव और गिरती अर्थव्यवस्था ने बिगाड़ा ट्रंप का खेल; लोकप्रियता 37% पर पहुंची

इंटरनेशनल डेस्क : अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए बुरी खबर सामने आई है। एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, ट्रंप की लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई है और उनकी कुल स्वीकृति रेटिंग (Approval Rating) घटकर अब केवल 37 प्रतिशत रह गई है।

आर्थिक नीतियों और महंगाई से जनता नाराज : सर्वेक्षण के नतीजों से पता चलता है कि अमेरिकी नागरिक ट्रंप की आर्थिक नीतियों से खासे असंतुष्ट हैं। करीब 66 प्रतिशत लोगों ने उनकी आर्थिक नीतियों के प्रति अपनी नाराजगी जताई है। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर उनकी रेटिंग गिरकर 34 प्रतिशत रह गई है, जबकि महंगाई के मुद्दे पर जनता ने उन्हें मात्र 27 प्रतिशत रेटिंग दी है। जीवन-यापन की लागत के मुद्दे पर उनकी लोकप्रियता सबसे कम, यानी 23 प्रतिशत पर सिमट गई है।

ईरान नीति पर भी उठे सवाल : ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव और ट्रंप के रुख को लेकर भी जनता में असंतोष है। सर्वेक्षण के अनुसार, 66 प्रतिशत अमेरिकियों ने ईरान से निपटने के उनके तरीके पर असहमति व्यक्त की है। ट्रंप ने हाल ही में ईरान के 14-सूत्रीय प्रस्ताव पर असहमति जताते हुए कहा था कि ईरान ने अभी तक पर्याप्त कीमत नहीं चुकाई है।

रिपब्लिकन समर्थकों का भरोसा बरकरार: भले ही कुल रेटिंग में गिरावट आई हो, लेकिन अपनी पार्टी के भीतर ट्रंप का जादू अभी भी बरकरार है। रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों के बीच उन्हें अभी भी करीब 85 प्रतिशत समर्थन प्राप्त है। वहीं, आव्रजन (Immigration) और सीमा नीतियों पर उन्हें 45 प्रतिशत लोगों की मंजूरी मिली है।

सर्वेक्षण का विवरण यह सर्वेक्षण: वॉशिंगटन पोस्ट, ABC न्यूज और इप्सोस (Ipsos) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की अस्वीकृति रेटिंग (Disapproval Rating) बढ़कर 62 प्रतिशत हो गई है, जो उनके दोनों कार्यकाल में अब तक का सबसे उच्च स्तर है।

ईरान के जंजान में भीषण विस्फोट: रिवोल्यूशनरी गार्ड के 14 जवानों की मौत, बिना फटे बमों ने बरपाया कहर

इंटरनेशनल डेस्क : ईरान के उत्तर-पश्चिमी प्रांत जंजान में एक दर्दनाक हादसा हुआ है, जहाँ बम निरोधक अभियान के दौरान हुए एक भीषण विस्फोट में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के 14 सदस्य मारे गए और दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

पुराने बमों ने ली जान : सरकारी समाचार एजेंसी फ़ार्स न्यूज़ के अनुसार, यह घटना तब हुई जब IRGC की एक विशेष इकाई क्षेत्र में बचे हुए बिना फटे बमों को निष्क्रिय करने और हटाने का अभियान चला रही थी। ये धमाका उन क्लस्टर बमों और गोला-बारूद के फटने से हुआ, जो ईरान-अमेरिका युद्ध के दौरान किए गए हमलों के बाद जमीन में दबे रह गए थे। गौरतलब है कि 7 अप्रैल को युद्धविराम लागू होने के बाद से रिवोल्यूशनरी गार्ड के सदस्यों की यह सबसे बड़ी सामूहिक मौत है।

कृषि भूमि और नागरिकों पर मंडराता खतरा: स्थानीय अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि युद्ध के दौरान गिरे ये बिना फटे बम नागरिकों और उपजाऊ भूमि के लिए एक स्थायी सुरक्षा खतरा बने हुए हैं। ईरानी मीडिया के अनुसार, इस क्षेत्र में बमों की मौजूदगी के कारण लगभग 1,200 हेक्टेयर कृषि भूमि वर्तमान में खतरे की चपेट में है, जिसका उपयोग करना असुरक्षित है।

ट्रंप का कड़ा रुख और ईरान का नेतृत्व: इस बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा संघर्ष खत्म करने के लिए दिए गए नए प्रस्ताव पर असंतोष व्यक्त किया है। ट्रंप ने संकेत दिया कि वह इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें किसी अंतिम समझौते पर पहुंचने की संभावना पर संदेह है। इसके साथ ही ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व पर निशाना साधते हुए उसे ‘बेहद बिखरा हुआ’ और ‘अव्यवस्थित’ बताया, जिसमें उनके अनुसार तीन-चार अलग-अलग गुट आपस में उलझे हुए हैं।

अव्यवस्था के खिलाफ गठबंधन : दूसरी ओर, IRGC ने सोशल मीडिया के माध्यम से ट्रंप प्रशासन की आलोचना की है। उनका कहना है कि अमेरिका चीन, रूस और यूरोप को नियंत्रित करने के लिए ‘अव्यवस्थित रणनीति’ अपना रहा है, लेकिन ईरान अब इस ‘बाधा के विरुद्ध गठबंधन’ का केंद्र बन गया है।

व्हाइट हाउस डिनर के दौरान फायरिंग: सुरक्षित निकाले गए ट्रंप, हमलावर ‘कोल टॉमन एलन’ गिरफ्तार

इंटरनेशनल डेस्क : वॉशिंगटन के हिल्टन होटल में आयोजित ‘व्हाइट हाउस कॉरेस्पॉन्डेंस डिनर’ के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई जब एक हमलावर ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस घटना के समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वहां मौजूद थे, जिन्हें सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत सुरक्षित बाहर निकाल लिया।राष्ट्रपति ट्रंप ने बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर हमलावर का वीडियो और तस्वीरें साझा कीं, जिसमें वह तेजी से सुरक्षा घेरा तोड़कर होटल के अंदर घुसने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। सीक्रेट सर्विस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जवाबी फायरिंग की और हमलावर को जमीन पर गिराकर काबू में कर लिया।

गिरफ्तार हमलावर की पहचान कैलिफोर्निया के टॉरेंस निवासी 31 वर्षीय कोल टॉमन एलन के रूप में हुई है, जो कई हथियारों से लैस था।घटना के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और कैबिनेट के सभी सदस्य पूरी तरह सुरक्षित हैं।

उन्होंने सीक्रेट सर्विस की बहादुरी की सराहना की और स्पष्ट किया कि वे इन “बीमार लोगों और गुंडों” को अपने कार्यक्रमों का रुख बदलने की इजाजत नहीं देंगे। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है।

अमेरिका-ईरान के बीच ‘शांति वार्ता’ पर सस्पेंस: पाकिस्तान की कोशिशें तेज, ईरान ने रखी बड़ी शर्त

इंटरनेशनल डेस्क : अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की शांति वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसी बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर करीब 45 मिनट तक विस्तार से चर्चा की है। दोनों नेताओं के बीच यह सकारात्मक बातचीत ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र में तनाव कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

ट्रंप का डेलिगेशन और ईरान का इनकार : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि एक अमेरिकी डेलिगेशन सोमवार को शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद पहुंचेगा। हालांकि, ईरान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी IRNA ने इस्लामाबाद में बातचीत की खबरों को झूठा करार दिया है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह बातचीत की मेज पर तभी आएगा जब अमेरिका उसके बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाएगा।

ईरान को ‘चाल’ का डर और 22 अप्रैल की डेडलाइन: ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल को शक है कि यह बातचीत केवल एक चाल हो सकती है। उन्हें डर है कि बातचीत के बाद भी उन पर लगे प्रतिबंध नहीं हटेंगे और उनका फंसा हुआ पैसा वापस नहीं मिलेगा। गौरतलब है कि क्षेत्र में जारी युद्धविराम बुधवार 22 अप्रैल को खत्म होने वाला है, जिससे इस बातचीत की अहमियत और बढ़ गई है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता प्रधानमंत्री : शहबाज शरीफ ने ईरान को मनाने के लिए अपने हालिया सऊदी अरब, कतर और तुर्किये के दौरों का भी जिक्र किया। पाकिस्तान की सरकार और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर इस क्षेत्र में शांति बहाली के लिए सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं।