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DPIIT ने 12 वर्षों की उपलब्धियां गिनाईं, भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम बना विकास का बड़ा इंजन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

सरकार के देशव्यापी अभियान के तहत 12 वर्ष के शासन की वर्षगांठ मनाने के हिस्से के रूप में, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने चंडीगढ़ में एक क्षेत्रीय प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की, जिसमें विभाग की प्रमुख पहलें, संरचनात्मक सुधार और पिछले दशक में हुई उपलब्धियों को उजागर किया गया।

पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए DPIIT के संयुक्त सचिव श्री सुमीत कुमार जारंगल ने भारत के औद्योगिक और स्टार्टअप इकोसिस्टम की परिवर्तनकारी यात्रा का खाका पेश करते हुए कहा कि नीति सुधार, नवाचार और उद्यमिता ने देश की आर्थिक मजबूती और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर कर सामने आए हैं।

12 वर्षों के परिवर्तनकारी शासन

उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए श्री जारंगल ने कहा कि भारत ने कई वैश्विक व्यवधानों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए गहरे संरचनात्मक सुधार लागू किए, जिनसे निवेशकों का भरोसा बढ़ा और औद्योगिक वृद्धि को गति मिली।

पिछले दशक में, भारत ने वित्त वर्ष 2014‑15 से वित्त वर्ष 2025‑26 के बीच कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) प्रवाह USD 843 बिलियन आकर्षित किए, जो पिछले बारह वर्ष की अवधि की तुलना में 169 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद, देश ने वित्त वर्ष 2025‑26 में ऐतिहासिक USD 94.53 बिलियन दर्ज किए, जिनमें से 90 प्रतिशत से अधिक इक्विटी प्रवाह स्वत: मार्ग के माध्यम से आए।

संयुक्त सचिव ने यह भी कहा कि मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी प्रमुख पहलों ने निवेशों को विनिर्माण शक्ति में बदला है। 14 रणनीतिक क्षेत्रों में PLI योजनाओं ने रु 2.40 लाख करोड़ के निवेश आकर्षित किए, रु 22.66 लाख करोड़ के उत्पादन का सृजन किया, रु 15.20 लाख करोड़ से अधिक के निर्यात को बढ़ावा दिया और 14 लाख से अधिक नौकरियां पैदा कीं।

उन्होंने कहा कि भारत आज घरेलू स्तर पर उपयोग होने वाले मोबाइल फोन का 99.2 प्रतिशत निर्माण करता है, जबकि फार्मा सेक्टर ने 191 बल्क ड्रग्स के घरेलू उत्पादन के माध्यम से आयात निर्भरता में उल्लेखनीय कमी की है, और PLI द्वारा समर्थित उत्पादन का निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान है।

भरोसा-आधारित शासन और व्यापार करने की सुगमता

ब्रीफिंग में सरकार के नियमों को सरल बनाने और व्यापार करने में आसानी लाने के सतत प्रयासों को भी रेखांकित किया गया। जन‑विश्वास अधिनियम, 2026 के माध्यम से 47,000 से अधिक अनुपालनों को समाप्त किया गया है और कई कानूनी प्रावधानों का तर्कसंगतकरण किया गया, जो प्रवर्तन‑आधारित विनियमन से भरोसा‑आधारित शासन की दिशा में बदलाव को दर्शाता है।

नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, जो 32 केंद्रीय मंत्रालयों और 34 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों से जुड़ा है, ने 13.7 लाख से अधिक आवेदन संसाधित किए और 8.5 लाख से अधिक अनुमोदन सुगम किए, जिससे निवेश के लिए एक सहज पारिस्थितिकी तंत्र बना है। सुधारों को और मजबूत करने के लिए बिजनेस रिफॉर्म्स एक्शन प्लान (BRAP), उद्योग समागम और जिला‑स्तरीय BRAP जैसी पहलों को भी आगे बढ़ाया जा रहा है।

स्टार्टअप इंडिया समावेशी वृद्धि चला रहा है

स्टार्टअप क्रांति पर ध्यान केंद्रित करते हुए श्री जारंगल ने कहा कि 16 जनवरी 2016 को शुरू की गई स्टार्टअप इंडिया पहल उद्यमिता का समर्थन करने वाला एक व्यापक मंच बन चुकी है, जो स्टार्टअप मान्यता, सीड फंडिंग, वेंचर कैपिटल समर्थन, क्रेडिट गारंटी, कर‑प्रोत्साहन, खरीद नीतियों में सुधार और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंच जैसी सुविधाएँ प्रदान करती है।

आज भारत में 2.35 लाख से अधिक DPIIT‑मानी गई स्टार्टअप हैं, जो लगभग 24 लाख प्रत्यक्ष नौकरियाँ दे रही हैं, जिनमें से आधे से अधिक नौकरियाँ टियर‑II और टियर‑III शहरों से उत्पन्न हुईं। इन स्टार्टअप में से लगभग आधे में कम से कम एक महिला निदेशक या भागीदार है, जो इस पारिस्थितिकी तंत्र की समावेशी प्रकृति को दर्शाता है।

उन्होंने यह भी बताया कि स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम (SISFS), स्टार्टअप्स के लिए क्रेडिट गारंटी स्कीम (CGSS), स्टार्टअप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स (FFS 1.0) और हाल ही में लॉन्च किया गया स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 जैसी प्रमुख पहलों से स्टार्टअप जीवन‑चक्र के विभिन्न चरणों में पूँजी तक पहुंच मजबूत हो रही है।

FFS 1.0 के तहत लगभग रु 27,600 करोड़ के निवेश 1,450+ स्टार्टअप्स में सुगम किए गए, जबकि SISFS के तहत 215+ इनक्यूबेटरों के माध्यम से रु 945 करोड़ से अधिक मंजूर किए गए। CGSS ने स्टार्टअप उधारकर्ताओं को रु 1,350 करोड़ से अधिक की गारंटी प्रदान करके समर्थन दिया है।

हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ नवाचार हब के रूप में उभर रहे हैं

संयुक्त सचिव ने कहा कि हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ मिलकर लगभग 15,500 DPIIT‑मानी गई स्टार्टअप का हिस्सा हैं, जो 1.7 लाख से अधिक प्रत्यक्ष नौकरियाँ पैदा कर रहे हैं।

क्षेत्र में वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) के माध्यम से FFS के अंतर्गत 115+ स्टार्टअप्स में रु 2,270 करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है, जबकि लगभग 260 स्टार्टअप्स ने स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम का लाभ उठाया है। CGSS के जरिए क्रेडिट सहायता ने लगभग रु 180 करोड़ के गारंटीकृत ऋण सक्षम किए हैं, और तीनों क्षेत्रों में 320+ स्टार्टअप्स को आयकर छूट के लिए सर्टिफिकेट ऑफ एलिजिबिलिटी प्रदान किए गए हैं।

इन सफलताओं ने दिखाई कि क्षेत्र का नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो रहा है और यह रोजगार सृजन तथा आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है।

लॉजिस्टिक्स और नवाचार ने प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूती दी

जारंगल ने लॉजिस्टिक्स और नवाचार में हुई प्रगति पर भी प्रकाश डाला। पीएम गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान और नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी जैसी पहलों के समर्थन से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत GDP के लगभग 7.9 प्रतिशत तक घट गई है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता और लचीलापन बढ़ा है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 2014 से वैश्विक नवाचार सूचकांक (Global Innovation Index) में भारत का 38 पायदान उन्नयन और पेटेंट फाइलिंग में 236 प्रतिशत की वृद्धि देश को एक वैश्विक नवाचार और प्रौद्योगिकी हब के रूप में उभरने का संकेत देती है।

आगे का रास्ता

भविष्य के रोडमैप का उल्लेख करते हुए संयुक्त सचिव ने कहा कि स्टार्टअप इंडिया मान्यता का विस्तार, वित्तपोषण मैकेनिज्म को मजबूत करना, डीप‑टेक नवाचार को बढ़ावा देना और उभरते उद्यमी क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाने पर आगे भी ध्यान केंद्रित करेगा। स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0, FFS 1.0, SISFS, CGSS और TEJAS जैसी पहलों से जिले‑स्तर पर पूँजी और नवाचार समर्थन और गहरा होगा।

उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य इन परिवर्तनकारी नीतियों और उद्यमशीलता के अवसरों को जमीनी स्तर तक ले जाना है, ताकि नवाचार‑प्रेरित वृद्धि देश के हर कोने तक पहुंचे।

अपने दौरे के हिस्से के रूप में, श्री जारंगल क्षेत्रीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के हितधारकों से भी बातचीत करेंगे, और DPIIT द्वारा भारत भर में नवाचार और उद्यमिता को मजबूत करने के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराएंगे।

IIT रोपड़ और RGNAU के बीच समझौता, ड्रोन तकनीक में शुरू होगा संयुक्त पीजी डिप्लोमा कार्यक्रम

यूएवी ऑपरेशंस और ड्रोन टेक्नोलॉजी में युवाओं को मिलेगा विशेष प्रशिक्षण, शोध और कौशल विकास को मिलेगा बढ़ावा

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रोपड़ और राजीव गांधी नेशनल एविएशन यूनिवर्सिटी के बीच यूएवी (अनमैन्ड एरियल व्हीकल) ऑपरेशंस और ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस समझौते के तहत दोनों संस्थान मिलकर एक वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू करेंगे।

एमओयू पर आईआईटी रोपड़ के निदेशक प्रोफेसर राजीव आहूजा और आरजीएनएयू के कुलपति प्रोफेसर भृगु नाथ सिंह ने दोनों संस्थानों के शिक्षकों और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए।

दो संस्थानों में होगा अध्ययन

संयुक्त पीजी डिप्लोमा कार्यक्रम के तहत पहले सेमेस्टर की पढ़ाई आरजीएनएयू में कराई जाएगी, जबकि दूसरे सेमेस्टर में विद्यार्थी आईआईटी रोपड़ में प्रशिक्षण और अध्ययन करेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को ड्रोन और यूएवी तकनीक की गहन सैद्धांतिक जानकारी के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना है।

पाठ्यक्रम को इस प्रकार तैयार किया गया है कि छात्रों को ड्रोन संचालन, डिजाइन, तकनीकी अनुप्रयोग, सुरक्षा मानकों और उभरती विमानन तकनीकों की व्यापक समझ विकसित हो सके।

शोध और कौशल विकास को मिलेगा बढ़ावा

इस अवसर पर प्रोफेसर राजीव आहूजा ने कहा कि यह साझेदारी ड्रोन तकनीक और यूएवी क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और कौशल विकास के नए अवसर उपलब्ध कराएगी। उन्होंने कहा कि दोनों संस्थान मिलकर भविष्य की तकनीकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों को उद्योग-उन्मुख प्रशिक्षण प्रदान करेंगे।

दोनों संस्थानों ने तकनीकी शिक्षा, क्षमता निर्माण और ड्रोन क्षेत्र में अनुसंधान गतिविधियों को मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।

बढ़ती मांग को पूरा करेंगे प्रशिक्षित पेशेवर

भारत में ड्रोन और विमानन क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। कृषि, रक्षा, निगरानी, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर सर्वेक्षण जैसे क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यह संयुक्त कार्यक्रम उद्योग की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित और कुशल पेशेवर तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

यह पहल देश में ड्रोन इकोसिस्टम को मजबूत बनाने और युवाओं को उभरती तकनीकों में करियर के नए अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

12 वर्षों में विज्ञान की उड़ान: लैवेंडर खेतों से चंद्रमा तक भारत की नई पहचान

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब जम्मू के डोडा जिले की एक लैवेंडर किसान मौसम के पहले फूल तोड़ती है, तब वह विज्ञान नीति के
बारे में नहीं सोचती। लेकिन सच यह है कि केंद्र शासित प्रदेश की बंजर पहाड़ियों को बैंगनी फूलों की
सुगंधित खेती में बदलने के पीछे पिछले एक दशक में किया गया उद्देश्यपूर्ण और दूरदर्शी वैज्ञानिक
निवेश ही है। यह ग्रामीण आजीविका में आई ऐसी क्रांति है, जिसकी शुरुआत एक प्रयोगशाला से हुई थी।
असल में, भारत में पिछले बारह वर्षों की विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का यही
अर्थ है। विज्ञान केवल ज्ञान बढ़ाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह हमारे नागरिकों के दैनिक जीवन को
बेहतर बनाने वाली एक जीवंत और प्रभावशाली शक्ति बन गया है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभाला, तब उन्होंने एक ऐसी सोच प्रस्तुत की जिसमें
विज्ञान को केवल किसी विभाग का काम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मिशन माना गया। इसके बाद के
वर्षों में इस दृष्टि ने ऐसे परिणाम दिए, जो एक पीढ़ी पहले असाधारण माने जाते। आज भारत चंद्रमा के
दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतार चुका है, पहली बार अपनी स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित कर चुका
है, पुणे से पटना तक सुपरकंप्यूटर स्थापित कर चुका है और एक ऐसे अंतरिक्ष अर्थतंत्र का निर्माण कर
चुका है जिसमें देशी स्टार्टअप्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

लेकिन इन उपलब्धियों की असली कहानी यह नहीं है कि हमने क्या हासिल किया, बल्कि यह है कि इन
उपलब्धियों ने आम नागरिकों के जीवन को किस तरह प्रभावित किया। विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं

तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विकास और नागरिक सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम
बन चुका है।

किसानों का उदाहरण लें। भारतीय कृषि में मौसम हमेशा से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
पिछले एक दशक में पृथ्वी अवलोकन (अर्थ ऑब्जर्वेशन) और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में व्यापक सुधार
किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप आज किसानों को सटीक और स्थानीय स्तर पर मौसम की जानकारी
मिल रही है। यह केवल संभावनाओं पर आधारित अनुमान नहीं, बल्कि इतनी सटीक जानकारी है कि कोई
किसान परिवार यह तय कर सकता है कि फसल आज काटनी है या कल तक इंतजार करना है।

आज यदि बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवात बनता है, तो हमारी आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां तटीय
समुदायों को कई घंटे, और कई बार कई दिन पहले ही सचेत कर देती हैं। इसका महत्व केवल आंकड़ों में
नहीं मापा जा सकता; इसका वास्तविक मूल्य उन अनगिनत जानों और आजीविकाओं में दिखाई देता है
जो समय रहते बचाई जा रही हैं।

जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों और नदी घाटियों में विज्ञान ने “अरोमा मिशन” के रूप में दस्तक दी। इस
कार्यक्रम के तहत किसानों को लैवेंडर की खेती से जोड़ा गया तथा उन्हें तकनीक, बेहतर बीज और बाज़ार
तक पहुँच उपलब्ध कराई गई। जो पहल एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई थी, वह आज
भारत की “पर्पल रिवोल्यूशन” (बैंगनी क्रांति) के रूप में जानी जाती है। इसके माध्यम से हजारों किसान
परिवार सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती से सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं। इस समृद्धि के
पीछे विज्ञान ने एक शांत लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई है।

इसी प्रकार के प्रयासों के तहत केसर की खेती का विस्तार, औषधीय जड़ी-बूटियों का उत्पादन और भारत
में पहली बार हींग की खेती की शुरुआत की गई। इन पहलों ने साबित किया है कि यदि नवाचार जमीन
से जुड़ा हो, तो वह किसी भी औद्योगिक तकनीक जितना परिवर्तनकारी हो सकता है।

विज्ञान के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा है। किफायती ग्रामीण
आवास के लिए विकसित 3डी-प्रिंटेड घरों के मॉडल से लेकर खाद्य पदार्थों में मिलावट की पहचान करने
वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों तक, तकनीक को उन समस्याओं के समाधान के लिए
इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सामना समाज के सबसे कमजोर वर्ग करते हैं।

कंप्यूटिंग, सेंसर तकनीक और इंजीनियरिंग को एक साथ जोड़ने वाले “राष्ट्रीय अंतःविषय साइबर-
फिजिकल सिस्टम मिशन” के तहत देशभर में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं। इन
केंद्रों ने एक हजार से अधिक स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया है, जो सटीक कृषि, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता
और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान पर काम कर रहे हैं।

भारत को स्वस्थ बनाना: जैव प्रौद्योगिकी की नई क्रांति

यदि कोई क्षेत्र भारतीय विज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति को सबसे प्रभावशाली ढंग से दिखाता है, तो वह
जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र है। दशकों तक भारत की फार्मास्युटिकल ताकत मुख्य रूप
से विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) तक सीमित रही। हम उन दवाओं के जेनेरिक संस्करण बनाते थे, जिनकी
खोज दूसरे देशों में होती थी। अब यह कहानी बदल रही है।

दशकों में पहली बार भारत में खोजी गई स्वदेशी एंटीबायोटिक “नैफिथ्रोमाइसिन” का विकास केवल एक
वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की घोषणा भी है। सरकार के
सहयोग से शोधकर्ताओं और उद्योग जगत की साझेदारी से विकसित यह दवा इस बात का प्रमाण है कि
भारत की प्रयोगशालाएँ अब केवल दवाएँ बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई दवाओं की खोज और
विकास के वैश्विक अग्रिम मोर्चे पर भी काम कर सकती हैं। यह वह क्षमता है जो दुनिया के केवल कुछ
देशों के पास ही है।

इसी तरह एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि देश में हीमोफीलिया के लिए पहली सफल स्वदेशी जीन थेरेपी
क्लीनिकल ट्रायल रही, जिसे वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में सम्पन्न किया गया।

हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है जिसके उपचार के लिए मरीजों को जीवनभर महंगे इलाज की
आवश्यकता होती है।

जीन थेरेपी की विशेषता यह है कि यह बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय उसके मूल
आनुवंशिक दोष को ठीक करने का प्रयास करती है। आनुवंशिक रोगों के बड़े बोझ वाले भारत जैसे देश के
लिए यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण है और भविष्य की चिकित्सा प्रणाली को बदलने की क्षमता रखती है।

इसके साथ-साथ “जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट” के तहत भारत की विविध आबादी से जुड़े 10,000 से अधिक
मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। इससे देश में ऐसी वैज्ञानिक नींव तैयार हो रही है,
जिसके आधार पर भविष्य में प्रत्येक व्यक्ति की जैविक संरचना के अनुसार व्यक्तिगत और अधिक
प्रभावी उपचार उपलब्ध कराए जा सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत केवल बीमारियों का इलाज करने
की दिशा में ही नहीं, बल्कि “व्यक्तिगत चिकित्सा” के उस युग की ओर बढ़ रहा है, जहां उपचार हर
मरीज की आनुवंशिक विशेषताओं के अनुरूप होगा।

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घरेलू जैव-
चिकित्सा (बायोमेडिकल) क्षमता कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत की प्रतिक्रिया, अपने स्वयं के टीकों का
विकास करना, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और 1.4 अरब लोगों तक उन्हें पहुंचाना, हमारे जैव
प्रौद्योगिकी तंत्र में वर्षों से किए गए निवेश का परिणाम थी।

इस सफलता के पीछे बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल(बीआईआरएसी) की महत्वपूर्ण
भूमिका रही है। इस संस्था ने बायोटेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, शैक्षणिक शोध और व्यावसायिक
उत्पादन के बीच की दूरी कम करने तथा वैज्ञानिक नवाचारों को आम लोगों तक पहुँचाने में अहम
योगदान दिया है।

आज भारत में जैव-उद्यमियों की एक नई पीढ़ी उभर रही है, जो प्रिसिजन मेडिसिन, टिकाऊ जैव-
आधारित सामग्री और अगली पीढ़ी की डायग्नोस्टिक तकनीकों पर काम कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण

बात यह है कि यह नवाचार केवल अमेरिका की सिलिकॉन वैली तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के
शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से भी उभर रहा है।

इसी दिशा में जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। इस परियोजना के तहत
10,000 से अधिक भारतीयों के मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। भारत जैसी अत्यंत
विविध आबादी वाले देश के लिए यह उपलब्धि भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था की मजबूत वैज्ञानिक नींव
तैयार कर रही है।

इससे आने वाले समय में ऐसी स्वास्थ्य सेवाओं का मार्ग प्रशस्त होगा, जहाँ उपचार केवल बीमारी के
आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की विशिष्ट आनुवंशिक संरचना के अनुसार तय किया जाएगा।
अर्थात भारत व्यक्तिगत चिकित्सा के नए युग की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ हर मरीज को उसकी
जैविक आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सटीक और प्रभावी इलाज मिल सकेगा।

सितारों तक पहुंच, नागरिकों से जुड़ाव

23 अगस्त 2023 को जब चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर अपने अंतिम
चरण में उतर रहा था, एक ऐसा क्षेत्र जहां इससे पहले कोई देश नहीं पहुँच पाया था, तब करोड़ों भारतीयों
की निगाहें उस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं। लैंडिंग का वह पल केवल तकनीकी सफलता नहीं था,
बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामर्थ्य का प्रतीक भी था। भारत ने वह कर दिखाया था जो दुनिया का
कोई अन्य देश नहीं कर सका था।

इसके बाद चंद्रमा की सतह से प्राप्त जानकारियाँ और लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर से पृथ्वी पर
भेजा गया वैज्ञानिक डेटा निस्संदेह अंतरिक्ष विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। लेकिन उतना ही
महत्वपूर्ण वह प्रभाव भी था, जो इस उपलब्धि ने देश की नई पीढ़ी की कल्पनाओं, आकांक्षाओं और
आत्मविश्वास पर डाला।

पिछले बारह वर्षों में भारत की अंतरिक्ष यात्रा महत्वाकांक्षा और जनहित के अनूठे संगम की कहानी रही
है। जहाँ चंद्रयान-3 ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया, वहीं आदित्य-एल1 ने चुपचाप सूर्य का
अध्ययन करने का अपना मिशन शुरू किया। यह मिशन अंतरिक्ष मौसम को समझने में मदद कर रहा
है, जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी पर मौजूद उपग्रहों, बिजली ग्रिडों और संचार प्रणालियों पर पड़ता है।

इसी क्रम में स्पेडेक्स मिशन ने भारत को उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल कर दिया, जिन्होंने
अंतरिक्ष में दो यानों को सफलतापूर्वक जोड़ने की क्षमता प्रदर्शित की है। यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष
स्टेशनों और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

वहीं शुभांशु शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिनों का ऐतिहासिक प्रवास भारत के मानव
अंतरिक्ष मिशन के सपनों को वास्तविकता के और करीब ले आया। यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि
नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी थी कि भारत अब मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों
की ओर बढ़ रहा है।

इन उपलब्धियों का महत्व केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। इन्होंने देश के युवाओं में विज्ञान,
प्रौद्योगिकी और नवाचार के प्रति नई रुचि पैदा की है तथा यह विश्वास मजबूत किया है कि भारत न
केवल वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति का हिस्सा है, बल्कि उसका नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आया परिवर्तन केवल अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं है, चाहे वे कितने भी
महत्वपूर्ण क्यों न हों। वर्ष 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण और
ग्राउंड सिस्टम सहित पूरे अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया।

इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे,
वहीं आज उनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप्स रॉकेट बना रहे हैं, उपग्रह डिजाइन
कर रहे हैं और कृषि निगरानी से लेकर आपदा प्रबंधन तक अनेक क्षेत्रों के लिए तकनीकी समाधान
विकसित कर रहे हैं।

भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के बाद से
भारतीय प्रक्षेपण यानों ने 399 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसके चलते भारत
दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों और देशों के लिए एक विश्वसनीय एवं पसंदीदा साझेदार बनकर उभरा
है।

आज भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रही। यह हजारों युवा
इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के प्रयासों से निर्मित एक राष्ट्रीय संपत्ति बन चुकी है। निजी क्षेत्र
की बढ़ती भागीदारी ने नवाचार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।

आने वाले वर्षों के लिए भारत की योजनाएँ और भी महत्वाकांक्षी हैं। वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष
स्टेशन स्थापित करने की परिकल्पना की गई है, जबकि वर्ष 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन भेजने
का लक्ष्य रखा गया है। यह दर्शाता है कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल वर्तमान उपलब्धियों तक सीमित
नहीं है। इसकी महत्वाकांक्षा दीर्घकालिक है, दृष्टि स्पष्ट है और दिशा लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़
रही है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत का भविष्य केवल आशाजनक नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की संभावनाओं
से भी परिपूर्ण दिखाई देता है।

नवाचार के माध्यम से आत्मनिर्भरता

“आत्मनिर्भर भारत” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह
एक मार्गदर्शक दर्शन बन चुका है। 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ शुरू किया गया

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन केवल एक नई तकनीक में निवेश नहीं है, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण
तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास है।

क्वांटम कंप्यूटिंग ऐसी जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखती है जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटर हल
नहीं कर सकते। क्वांटम संचार लगभग अभेद्य साइबर सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जबकि क्वांटम
सेंसिंग नेविगेशन, चिकित्सा इमेजिंग और भू-वैज्ञानिक खोजों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। भारत
अब इन सभी क्षमताओं का विकास अपने देश में ही कर रहा है। इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध
संस्थानों और उद्योगों को जोड़ने वाले विशेष थीमैटिक हब स्थापित किए गए हैं।

इसी तरह राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत पुणे, चेन्नई, खड़गपुर और अन्य शहरों में उच्च-प्रदर्शन
कंप्यूटिंगकी सुविधाएं विकसित की गई हैं। इससे भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और
स्टार्टअप्स को वह कंप्यूटिंग शक्ति उपलब्ध हो रही है, जो पहले केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित
थी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। “भारतजेन”, देश का पहला सरकारी
वित्तपोषित बहुभाषी जनरेटिव एआई कार्यक्रम, ऐसे बड़े भाषा मॉडल विकसित कर रहा है जो भारतीय
भाषाओं में सोच और संवाद कर सकें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के
लाभ केवल अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के हर नागरिक तक पहुँचें।

इस आत्मनिर्भरता की दृष्टि को साकार करने में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल
रिसर्च(सीएसआईआर) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारतीय इंजीनियरों द्वारा पूरी तरह
स्वदेशी रूप से विकसित हंसा-एन.जी. प्रशिक्षण विमान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार
किया गया है। यह भारत की विमानन तकनीक में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

इसी प्रकार भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संचालित पोत स्वच्छ समुद्री परिवहन की दिशा में एक
महत्वपूर्ण कदम है। वहीं टिकाऊ विमानन ईंधन पर चल रहा शोध विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम
करते हुए पर्यावरण-अनुकूल हवाई यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

सीएसआईआर इनोवेशन कॉम्प्लेक्स, देश की अपनी तरह की पहली सुविधा, ऐसी प्रयोगशाला के रूप में
विकसित की गई है जहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान और उद्यमशीलता का संगम होता है। इसका उद्देश्य
वैज्ञानिक खोजों को तेजी से बाजार में उपयोगी उत्पादों में बदलना है। इन प्रयासों के परिणाम स्पष्ट
दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2014 में भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे, जबकि आज उनकी संख्या
400 से अधिक हो चुकी है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि जब दूरदर्शी नीतियाँ, सार्वजनिक
निवेश और उद्यमशीलता की ऊर्जा एक साथ काम करती हैं, तो असाधारण परिवर्तन संभव हो जाते हैं।
आत्मनिर्भर भारत की यह यात्रा केवल तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की
कहानी है जो अपने ज्ञान, नवाचार और प्रतिभा के बल पर वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ आगे
बढ़ रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की तकनीकें

भारत के वैज्ञानिक परिवर्तन की कहानी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में हुए रणनीतिक विकास का उल्लेख किए
बिना अधूरी है। अप्रैल 2026 में कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर
रिएक्टर की पहली क्रिटिकलिटी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह रिएक्टर पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों
और इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया है। इसका विकास इंदिरा गांधी सेंटर फॉर अटॉमिक रिसर्च ने
किया है, जबकि इसका निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने है।

यह रिएक्टर भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की ओर बढ़ने में एक महत्वपूर्ण कड़ी
है। इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम भंडार का ऊर्जा उत्पादन के
लिए उपयोग करना है। ऐसे समय में जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, घरेलू ईंधन संसाधनों
से स्वच्छ और निरंतर ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि
राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का भी प्रश्न है।

परमाणु विज्ञान का प्रभाव अब केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में भी
इसका बड़ा योगदान दिखाई दे रहा है।

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल को इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी से “रेज ऑफ होप एंकर सेंटर ” के रूप
में मान्यता मिलना भारत की कैंसर चिकित्सा क्षमता का वैश्विक सम्मान है। इसके साथ ही होमी भाभा
कैंसर अस्पताल नेटवर्क के विस्तार और उन्नत रेडियोफार्मास्यूटिकल दवाओं के उपयोग से देशभर में
कैंसर रोगियों को बेहतर और आधुनिक उपचार उपलब्ध हो रहा है। रेडियोफार्मास्यूटिकल्स ऐसी विशेष
दवाएँ होती हैं जिनमें रेडियोधर्मी कणों का उपयोग कैंसर की पहचान और उपचार के लिए किया जाता है।
इससे मरीजों को अधिक सटीक और प्रभावी चिकित्सा मिल पाती है।

वर्ष 2025 का शांति अधिनियम भी परमाणु क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। इस कानून
ने भारत के परमाणु क्षेत्र के नियामक और कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया है तथा इस क्षेत्र में अधिक
निवेश और भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया है। आने वाले वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में परमाणु
ऊर्जा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

दूसरी ओर, भारत का “डीप ओशन मिशन”पृथ्वी के अंतिम बड़े अनछुए क्षेत्र-गहरे समुद्र तक देश की
वैज्ञानिक पहुँच का विस्तार कर रहा है। समुद्र की गहराइयों में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स और कोबाल्ट-
समृद्ध परतों जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, बैटरियों और उन्नत
औद्योगिक उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। इन संसाधनों का दोहन भारत की आयातित महत्वपूर्ण खनिजों
पर निर्भरता को कम कर सकता है।

इसके साथ ही यह मिशन उन्नत पनडुब्बी वाहनों, सेंसर प्रणालियों और समुद्री अनुसंधान तकनीकों का भी
विकास कर रहा है। इससे भारत को अपने समुद्री क्षेत्र में वैज्ञानिक, आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति
को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु तकनीक और समुद्री विज्ञान में हो रहे ये निवेश केवल वर्तमान की आवश्यकताओं
को पूरा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि आने वाले दशकों में भारत को तकनीकी रूप से सक्षम, ऊर्जा के
क्षेत्र में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

विकसित भारत की ओर: विज्ञान ही भविष्य की दिशा

जब भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और एक पूर्ण विकसित राष्ट्र
बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी केवल इस यात्रा का सहायक साधन
नहीं होंगे, बल्कि वे इसकी गति और स्वरूप दोनों निर्धारित करेंगे। पिछले बारह वर्षों में किए गए निवेशों
ने केवल संस्थान और आधारभूत संरचनाएँ ही नहीं बनाई हैं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक ऐसी
संस्कृति विकसित की है जो वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास से परिपूर्ण
है।

अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन भारत के शोध एवं नवाचार तंत्र को नई दिशा देने के लिए
किया गया है। इसका उद्देश्य मिशन-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना, शिक्षा जगत और उद्योग के
बीच सहयोग को मजबूत करना तथा युवा शोधकर्ताओं को सशक्त बनाना है। इसके साथ ही एक लाख
करोड़ रुपये की पूंजी वाले नए “रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड” की स्थापना भारत द्वारा अपनी
बौद्धिक क्षमता पर लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि देश
की सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान भारत की अपनी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और समुदायों के
भीतर मौजूद है।

जम्मू-कश्मीर के डोडा का लैवेंडर किसान, वेल्लोर का जीनोमिक्स शोधकर्ता, बेंगलुरु का स्पेस स्टार्टअप
उद्यमी और कलपक्कम का परमाणु इंजीनियर- ये सभी एक ही कहानी के पात्र हैं। यह उस भारत की
कहानी है जिसने सोच-समझकर और दृढ़ निश्चय के साथ विज्ञान को अपने विकास के केंद्र में रखा। यह
कहानी केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि उस मजबूत नींव की कहानी है जो पिछले बारह वर्षों में
तैयार हुई है। यह नींव व्यापक, गहरी और स्थायी है- ऐसी नींव जिस पर एक विकसित, आत्मनिर्भर और

वैज्ञानिक दृष्टि से आत्मविश्वासी भारत का निर्माण होगा। विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक
प्रगति का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जो ज्ञान, नवाचार, अनुसंधान और
वैज्ञानिक सोच के आधार पर विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाए। पिछले वर्षों की उपलब्धियाँ इसी
भविष्य की आधारशिला हैं, और आने वाले दशकों में यही विज्ञान भारत की नियति को आकार देगा।

(लेखक भारत सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री तथा
प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष विभाग में राज्य मंत्री हैं)

नीतिगत गतिरोध से विकसित भारत तक: मोदी युग ने भारत को नए सिरे से परिभाषित किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

वर्ष 2014 के बाद से, भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसकी अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत हुई है। बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से बेहतर हुआ है। महिलाएं बेहद सशक्त हुईं हैं। किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं और गरीब अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हुए हैं। इन तमाम बदलावों में एक ही बात साझा है: प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि और उनका नेतृत्व।

भारत के लोगों ने उनके दूरदर्शी एवं संवेदनशील नेतृत्व का भरपूर समर्थन किया है और उन्हें देश का सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाला निर्वाचित प्रधानमंत्री बनाया है। बीते 10 जून को उन्होंने राष्ट्र की सेवा में 4,399 दिन पूरे किए और अपनी पहली चुनावी जीत के बाद जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए।

यह ऐतिहासिक उपलब्धि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। देश के लोगों ने ऐसे समय में 2014 में मोदी सरकार को भारी बहुमत से सत्ता सौंपी, जब अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी और यूपीए सरकार के बदनाम कार्यकाल के दौरान नीतिगत गतिरोध, भ्रष्टाचार, घोटालों एवं विवादों को लेकर जनता में निराशा लगातार बढ़ रही थी।

संवेदनशील नेतृत्व – 2014 से देश निरंतर बदलाव की यात्रा पर है। मोदी सरकार ने 81 करोड़ से अधिक लोगों के लिए मुफ्त अनाज की व्यवस्था की, 58 करोड़ जन धन बैंक खातों के जरिए वित्तीय समावेशन को संभव बनाया और 16 करोड़ घरों तक नल के पानी का कनेक्शन पहुंचाया। दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना, ‘आयुष्मान भारत’ के जरिए 12 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की गारंटी मिल रही है। 

कई युवा भारतीयों के लिए यह कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि मोदीजी द्वारा – पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री के रूप में – लाए गए बड़े बदलावों से पहले जीवन कितना चुनौतीपूर्ण था। उनके निर्णायक नेतृत्व और नेक एवं संवेदनशील दृष्टिकोण ने देश को ‘विकसित भारत 2047’ मिशन की दिशा में आगे बढ़ाया है। इस मिशन में भारत की विरासत पर गर्व और विकास का एक महत्वाकांक्षी एजेंडा शामिल है।

नारी शक्ति

प्रधानमंत्री के लिए महिलाएं केवल सहायता की लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता हैं। सबसे पहले उनकी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान दिया गया: स्वच्छ भारत मिशन के तहत 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए। इससे उनकी सुरक्षा और सम्मान में वृद्धि हुई। वहीं, उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए। इससे महिलाओं को धुएं से भरी रसोई के खतरों से मुक्ति मिली।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की पहल ने बेटियों की शिक्षा एवं उनके कल्याण के महत्व को और ठोस बनाया है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए, प्रधानमंत्री ने महिलाओं के नेतृत्व में विकास को आगे बढ़ाने के लिए देश की विधायिकाओं में महिलाओं की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की है।

किसानों का कल्याण

किसानों का कल्याण प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों का एक मुख्य आधार रहा है। किसानों के योगदान को मान्यता देते हुए, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के जरिए उन्हें सीधे आय संबंधी सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत बांटे गए कुल 4.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि से लगभग 10 करोड़ किसान परिवारों को लाभ हुआ है।

सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भी काफी बढ़ोतरी की है, जो अब उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना है। साथ ही, किफायती दरों पर फसलों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराकर किसानों को वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी से बचाया गया है।

युवाओं के लिए अवसर

युवा भारतीयों के लिए अवसर सृजित करने के उद्देश्य से, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी प्रमुख पहलें शुरू की गई हैं। ‘कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय’ के रूप में एक समर्पित मंत्रालय के गठन से जहां युवाओं को आधुनिक अर्थव्यवस्था के अनुकूल कौशल से लैस करने में मदद मिली है, वहीं भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्षेत्र में उभरती हुई क्रांति का लाभ उठाने के लिए तैयार भी किया गया है।

‘स्टार्टअप इंडिया’ और नवाचार को दिए गए व्यापक समर्थन ने कई युवाओं को नौकरी खोजने वाला से हटकर नौकरी देने वाला बनने में मदद की है। इन पहलों ने उद्यमिता (एंटरप्रेन्योरशिप) की एक ऐसी नई लहर की नींव रखी है, जिसमें आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के मामले  में अहम योगदान देने की क्षमता है।

अर्थव्यवस्था और जीवनयापन में सुगमता

वर्ष 2014 से पहले, भारत की गिनती दुनिया की “फ्रैजाइल फाइव” (कमजोर पांच) अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में होती थी। निवेशकों का भरोसा भी लगातार कम हो रहा था। साहसिक सुधारों, निवेशकों के लिए अनुकूल नीतियों, वित्तीय अनुशासन और अपेक्षाकृत कम महंगाई के सहारे, भारत अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है और यह कारोबार व निवेश का एक आकर्षक स्थल बनता जा रहा है।

भारत ने विभिन्न विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। इससे हमारे युवाओं, किसानों, छोटे व्यवसायों, कारीगरों और श्रमिकों के लिए वैश्विक स्तर पर नए अवसर खुले हैं। और ऐसा भारत के हितों से समझौता किए बिना किया गया है। यह यूपीए सरकार द्वारा किए गए कुछ लापरवाही भरे समझौतों से बिल्कुल अलग है।

सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और करों की कम दरों जैसे बड़े सुधारों के जरिए  कारोबार जगत और मध्यम वर्ग का भरोसा भी बढ़ाया है। इंटरनेट की पैठ और डिजिटल भुगतान प्रणाली के तेज विस्तार के साथ मिलकर, ‘डिजिटल इंडिया’ पहल ने अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डालने के साथ-साथ नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को भी आसान बनाया है।

कई पुराने एवं मामूली अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाने तथा अनुपालन के अनावश्यक बोझ को कम करने से कारोबार जगत को और भी अधिक लाभ हुआ है। मध्यम वर्ग को भी काफ़ी राहत मिली है और 12.75 लाख रुपये तक की सालाना आय को आयकर से छूट दे दी गई है।

आधुनिक बुनियादी ढांचा

मोदी सरकार देश के बुनियादी ढांचे में तेजी से बदलाव ला रही है। सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वर्ष 2014 में सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या 74 थी और अब यह 160 से अधिक हो गई है।

बड़े पैमाने पर रेलवे के विद्युतीकरण, महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना और राष्ट्रीय राजमार्गों  व एक्सप्रेसवे के तेज विस्तार ने देश के कई हिस्सों के बुनियादी ढांचे को दुनिया के बेहतरीन बुनियादी ढांचों की बराबरी में ला खड़ा किया है।

प्रधानमंत्री की इस ऐतिहासिक उपलब्धि का वास्तविक महत्व कार्यकाल के दिनों की गिनती में नहीं, बल्कि किए गए व्यापक बदलावों में निहित है। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने गरीबों एवं  किसानों के कल्याण, मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं और उभरते भारत की महत्वाकांक्षाओं को शासन के केन्द्र में रखा है।

अब जबकि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है, 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण के नए संकल्प के साथ बदलाव की यह यात्रा निरंतर जारी रहेगी।

कैबिनेट की बड़ी मंजूरी: अमरावती में बनेगा 1,235 करोड़ रुपये का सरकारी आवासीय परिसर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति (CCEA) ने आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावती में जनरल पूल रेजिडेंशियल अकोमोडेशन (GPRA) परियोजना के निर्माण को मंजूरी दे दी है। यह अमरावती और पूरे आंध्र प्रदेश में केंद्र सरकार की पहली GPRA आवासीय परियोजना होगी।

सरकार के अनुसार इस परियोजना का उद्देश्य केंद्र सरकार के कर्मचारियों को उनके कार्यस्थलों के निकट आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण आवास उपलब्ध कराना है, जिससे उनके आर्थिक बोझ को कम करने, कार्यकुशलता बढ़ाने और बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

17 एकड़ में विकसित होगा आधुनिक आवासीय परिसर

प्रस्तावित GPRA कैंपस लगभग 17 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जाएगा। परियोजना के तहत टाइप-II से टाइप-VI श्रेणी तक की कुल 1,504 आवासीय इकाइयों का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए 11 आधुनिक आवासीय टावर बनाए जाएंगे।

परियोजना में 1,972 कार पार्किंग क्षमता वाली बेसमेंट पार्किंग सुविधा भी विकसित की जाएगी। कुल निर्मित क्षेत्र लगभग 31.30 लाख वर्ग फुट (2,90,762 वर्ग मीटर) होगा, जिसमें 9.10 लाख वर्ग फुट का बेसमेंट क्षेत्र शामिल है।

पर्यावरण अनुकूल और ग्रीन बिल्डिंग मानकों पर होगा निर्माण

सरकार ने बताया कि परियोजना को आधुनिक पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप विकसित किया जाएगा। सभी भवनों का डिजाइन ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, स्थानीय निर्माण सामग्री के उपयोग और निवासियों के स्वास्थ्य व सुविधा को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाएगा।

परिसर को न्यूनतम GRIHA 4-स्टार रेटिंग प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ विकसित किया जाएगा। यह परियोजना नवीनतम ऊर्जा संरक्षण और सतत भवन संहिता (ECSBC 2024) तथा इको निवास संहिता (ENS 2024) के अनुरूप होगी।

मिलेंगी सभी आधुनिक सुविधाएं

GPRA परिसर में निवासियों की सुविधा के लिए बैंक और एटीएम, डाकघर, शिशुगृह (क्रेच), सामुदायिक भवन, भोजन सुविधा, फूड कोर्ट, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, सर्विस सेंटर और गेस्ट हाउस जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

इसके अलावा परिसर को दिव्यांगजन अनुकूल बनाया जाएगा और सभी सार्वजनिक स्थानों पर बाधा-मुक्त पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।

रोजगार सृजन को भी मिलेगा बढ़ावा

सरकार का अनुमान है कि परियोजना के निर्माण चरण के दौरान प्रतिवर्ष लगभग 7 लाख मानव-दिवस रोजगार सृजित होंगे। वहीं परियोजना के संचालन और रखरखाव चरण में प्रतिवर्ष लगभग 50,000 मानव-दिवस रोजगार के अवसर उपलब्ध होते रहेंगे।

1,234.91 करोड़ रुपये होगी लागत

परियोजना की कुल अनुमानित लागत 1,234.91 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है। इसका वित्तपोषण भारत सरकार द्वारा बजटीय सहायता के माध्यम से किया जाएगा।

परियोजना का क्रियान्वयन आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के माध्यम से किया जाएगा। सरकार ने बताया कि परियोजना के लिए निविदा-पूर्व प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और टेंडर दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं।

कैबिनेट ने अहमदाबाद मेट्रो रेल परियोजना के चरण 2ए को दी स्वीकृति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अहमदाबाद मेट्रो रेल परियोजना के चरण 2(ए) को स्‍वीकृति दे दी है। चरण 2(ए) के कार्यान्वित होने पर अहमदाबाद-गांधीनगर गलियारे में 77.63 किलोमीटर का सक्रिय मेट्रो रेल नेटवर्क हो जाएगा। चरण 2(ए) कॉरिडोर में स्थित स्टेशनों के नाम हैं- आश्रम रोड, कोटेश्वर प्राचीन मंदिर, साबरमती नदी, सरदार नगर और एयरपोर्ट।

इस परियोजना की कुल लागत, जिसमें निर्माण के दौरान ब्याज भी शामिल है, 2,169.04 करोड़ रुपये होगी।

अहमदाबाद मेट्रो रेल परियोजना का चरण 2(ए) शहर के बुनियादी ढांचे के विकास में एक महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है।

अहमदाबाद मेट्रो परियोजना के चरण 2(ए) में लगभग 6.032 किलोमीटर के नए मेट्रो कॉरिडोर के विकास की परिकल्पना की गई है, जिसका उद्देश्य हवाई अड्डे से निर्बाध कनेक्टिविटी प्रदान करके और उन प्रमुख आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्रों को जोड़कर सार्वजनिक परिवहन को काफी हद तक बढ़ाना है, जिनमें वर्तमान में कुशल ट्रांजिट पहुंच का अभाव है।

इस चरण का उद्देश्य आवासीय और वाणिज्यिक केंद्रों सहित प्रमुख क्षेत्रों को अहमदाबाद-गांधीनगर गलियारे के साथ सुचारू रूप से एकीकृत करना है। इसके अलावा, 2029 के विश्व पुलिस खेलों और 2030 के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए आसपास के क्षेत्र में खेल सुविधाओं को बढ़ाने की भी संभावना है।

अहमदाबाद मेट्रो रेल परियोजना का चरण 2(ए) शहर के लिए एक क्रांतिकारी विकास सिद्ध होगा। यह बेहतर सम्‍पर्क, यातायात जाम में कमी, पर्यावरणीय लाभ, आर्थिक विकास और जीवन की बेहतर गुणवत्ता प्रदान करने का आश्‍वासन देता है। प्रमुख शहरी चुनौतियों का समाधान करते हुए और भविष्य के विस्तार के लिए आधार प्रदान करते हुए, चरण 2(ए) शहर के विकास पथ और स्थिरता को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

रक्षा क्षेत्र में MSME और स्टार्ट-अप्स की भागीदारी बढ़ाने के लिए दिल्ली में दो दिवसीय कार्यशाला

रक्षा खरीद, iDEX, स्वदेशीकरण और परीक्षण प्रक्रियाओं पर विशेषज्ञ देंगे जानकारी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य MSME और स्टार्ट-अप्स को रक्षा इकोसिस्टम के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराना तथा उन्हें रक्षा उत्पादन और नवाचार से जुड़े अवसरों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करना है।

इस दौरान प्रतिभागियों को रक्षा खरीद प्रक्रिया, स्वदेशीकरण पहलों, iDEX ढांचे, परीक्षण एवं प्रमाणन प्रक्रियाओं तथा प्रौद्योगिकी परिप्रेक्ष्य क्षमता रोडमैप (TPCR) के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी। कार्यक्रम में रक्षा मंत्रालय, सेवा मुख्यालयों, डीजीक्यूए, iDEX-DIO और अन्य संबंधित संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारी एवं विशेषज्ञ विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन देंगे।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को एयर मार्शल प्रवीण केशव वोहरा और मेजर जनरल डॉ. अशोक कुमार संबोधित करेंगे।

पहले दिन रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया, खरीद श्रेणियों, राजस्व खरीद मानदंडों, स्वदेशीकरण सुधारों, सृजन पोर्टल, आयात प्रतिस्थापन रणनीतियों तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) से जुड़े विषयों पर चर्चा होगी।

दूसरे दिन के सत्रों में iDEX पहल, प्रोटोटाइप विकास, परीक्षण एवं मूल्यांकन प्रक्रियाएं, प्रमाणन प्रणाली, उपयोगकर्ता परीक्षण, पर्यावरणीय परीक्षण, अनुसंधान एवं विकास में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की भूमिका तथा प्रौद्योगिकी तत्परता स्तरों (Technology Readiness Levels) पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

कार्यक्रम में TPCR पर विशेष सत्र और निवेशकों एवं वेंचर कैपिटलिस्ट्स के साथ एक पैनल चर्चा भी आयोजित की जाएगी। साथ ही प्रतिभागियों को प्रश्नोत्तर सत्रों के माध्यम से अपनी व्यावहारिक समस्याओं और जिज्ञासाओं के समाधान का अवसर मिलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता को और मजबूती मिलेगी तथा भारतीय उद्योग और सशस्त्र बलों के बीच सहयोग को नया आयाम प्राप्त होगा। यह कार्यशाला रक्षा क्षेत्र में नवाचार, स्वदेशी तकनीक और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

शोभा करंदलाजे ने 114वें अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का किया नेतृत्व

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम तथा श्रम और रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने जिनेवा में आयोजित 114वें अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। इसमें उन्होंने समावेशी विकास, लैंगिक समानता और सामाजिक संवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

जिनेवा में आयोजित 114वें अंतर्राष्ट्रीय आईएलसी के दौरान, केंद्रीय मंत्री ने नेपाल के युवा, श्रम और रोजगार मंत्री रामजी यादव के साथ द्विपक्षीय बैठक की। नेपाल ने भारत के डिजिटल पोर्टल की सराहना की। भारत ने “पड़ोसी प्रथम” नीति के अंतर्गत नेपाल भारत का एक प्राथमिकता वाला साझेदारी की बात पर जोर दिया। दोनों मंत्रियों ने कौशल विकास, श्रम गतिशीलता और डिजिटल प्रौद्योगिकी साझा करने के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। इस चर्चा में दोनों देशों के श्रमिकों के लिए अवसरों और कल्याण को बढ़ाने और दीर्घकालिक और सौहार्दपूर्ण संबंधों को और मजबूत करने की साझा प्रतिबद्धता की पुष्टि की गई।

राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे और अंगोला की लोक प्रशासन, श्रम एवं सामाजिक सुरक्षा मंत्री टेरेसा रोड्रिग्स डियास की बैठक में श्रम एवं रोजगार, कौशल विकास, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सामाजिक सुरक्षा एवं कार्यबल प्रशिक्षण के क्षेत्र में सहयोग को सुदृढ़ करने पर चर्चा हुई। दोनों मंत्रियों ने रोजगार सेवाओं, कौशल विकास, कार्यबल नियोजन एवं डिजिटल प्रशासन के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। अंगोला ने भारत के डिजिटल उत्पादों की सराहना करते हुए ज्ञान साझा करने का अनुरोध किया। भारत ने अंगोला को रोजगार सेवाओं, श्रमिक पंजीकरण, नौकरियों और कौशल मिलान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म के डिजाइन, विकास और संचालन में तकनीकी सहायता एवं क्षमता निर्माण सहायता प्रदान करने की पेशकश की।

शोभा करंदलाजे ने जिनेवा में फ्रांस, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और कनाडा के श्रम मंत्रियों से भी भेंट की और कौशल की पारस्परिक मान्यता एवं मांग-आधारित कौशल विकास के माध्यम से भारत से कुशल मानव शक्ति के प्रवास के लिए कानूनी मार्गों पर चर्चा की।

प्रधानमंत्री नीति आयोग की 11वीं शासी परिषद की बैठक की अध्यक्षता करेंगे

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी 11 जून को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में नीति आयोग की 11वीं शासी परिषद की बैठक की अध्यक्षता करेंगे। प्रधानमंत्री के ‘टीम इंडिया’ के विजन के अनुरूप विकसित भारत के लक्ष्य के अंतर्गत इस वर्ष का विषय ‘2047 तक विकसित भारत के लिए समावेशी मानव विकास’ है। इसका उद्देश्य आयु, क्षेत्र, लिंग या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना प्रत्येक भारतीय के कल्याण और विकास पर ध्यान केंद्रित करना है। शासी परिषद की बैठक में इस विजन को साकार करने और इसे देश भर के प्रत्येक नागरिक के लिए ठोस, मापनीय परिणामों में परिणत करने के दृष्टिकोण पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

इस शासी परिषद की बैठक में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल एक साथ मिलकर समावेशी मानव विकास प्रारूप पर चर्चा करेंगे। यह चार मुख्य स्तंभों पर आधारित है: (i) मूलभूत मानव पूंजी और भविष्य के लिए तैयार कौशल; (ii) उत्पादक रोजगार, उद्यमिता और विकेंद्रीकृत विकास; (iii) स्वास्थ्य, पोषण और कल्याण एवं (iv) सभी के लिए समानता और गरिमा। बैठक में देश भर में उद्यमिता को बढ़ावा देने, कौशल विकास को बढ़ाने और स्थायी रोजगार के अवसर सृजित करने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

इन चर्चाओं में शासन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई), अभिसरण, साझेदारी और डेटा-आधारित प्रणालियों सहित प्रमुख सहायक तत्वों का लाभ उठाते हुए एक कार्यान्वयन प्रारूप तैयार करने पर बल दिया जाएगा। इसके साथ ही अल्प, मध्यम और दीर्घकालिक परिणामों पर नज़र रखने के लिए एक संरचित तंत्र भी स्थापित किया जाएगा, जिससे जवाबदेही और मापने योग्य प्रभाव सुनिश्चित हो सके। समावेशी मानव विकास पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ राज्य के दृष्टिकोणों को संरेखित करने पर विशेष बल दिया जाएगा, जिससे न्यायसंगत और सतत विकास की दिशा में एक एकीकृत और सहयोगात्मक दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया जा सके।

नीति आयोग की शासी परिषद 26 से 28 दिसंबर, 2025 के दौरान आयोजित मुख्य सचिवों के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन की सिफारिशों पर भी ध्यान केंद्रित करेगी। मुख्य सचिवों के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन में निम्नलिखित पांच प्रमुख विषयों (i) प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा: नींव रखना (ii) स्कूली शिक्षा: आधारभूत संरचना (iii) कौशल विकास: भविष्य के लिए तैयार कार्यबल (iv) उच्च शिक्षा: ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और (v) खेल और पाठ्येतर गतिविधियाँ: कक्षाओं से परे की सिफारिशें की गईं।

11वीं शासी परिषद की बैठक में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/प्रशासक, केंद्रीय मंत्री पदेन सदस्य और विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में और नीति आयोग के उपाध्यक्ष, सदस्य और मुख्य कार्यकारी अधिकारी उपस्थित रहेंगे।

दक्षिण एशिया में रोजगार और विकास की नई राह बनेगा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र: विश्व बैंक

कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रणालियों में निवेश से खुलेंगे आर्थिक विकास के नए अवसर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

विश्व बैंक समूह ने कहा है कि दक्षिण एशिया अपने विकास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां हर वर्ष लाखों युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में स्थायी और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन गया है। विश्व बैंक के अनुसार कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और मूल्यवर्धन आधारित खाद्य प्रणालियों का विस्तार रोजगार, निवेश, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के व्यापक अवसर प्रदान कर सकता है।

विश्व बैंक समूह ने बताया कि दक्षिण एशिया का कृषि क्षेत्र सालाना 700 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का है और क्षेत्र के लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है। इसके बावजूद कृषि का क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 16 प्रतिशत है। चिंता की बात यह है कि क्षेत्र में उत्पादित कुल खाद्य पदार्थों का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हर वर्ष बर्बाद हो जाता है, जो लगभग 30 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है।

विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि परिवर्तन का अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग, सप्लाई चेन, विपणन और मूल्यवर्धन गतिविधियों के विस्तार से लाखों नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। इससे खाद्य हानि कम होगी और किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 1950-51 के 51 मिलियन टन से बढ़कर आज 330 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। वहीं पिछले दशक में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात लगभग 4.9 बिलियन डॉलर से बढ़कर 10 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। वर्तमान में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के विनिर्माण मूल्यवर्धन में लगभग 9 प्रतिशत और कुल निर्यात में करीब 13 प्रतिशत योगदान दे रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि प्रभावी नीतियां और लक्षित निवेश कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को बदल सकते हैं। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकरण योजना और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना जैसी पहलों ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विश्व बैंक समूह ने कहा कि तीव्र शहरीकरण, बढ़ता मध्यम वर्ग, समृद्ध कृषि जैव-विविधता और सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग दक्षिण एशिया को खाद्य प्रणालियों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए विश्व बैंक समूह एग्रीकनेक्ट और सैपलिंग जैसी पहलों पर काम कर रहा है। एग्रीकनेक्ट का उद्देश्य वर्ष 2030 तक 3 करोड़ किसानों को बाजारों से जोड़ना है, जबकि सैपलिंग सरकारों, निवेशकों, उद्योग जगत और विकास साझेदारों को एक मंच पर लाकर नीति सुधारों और निवेश को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।

नीति संवाद में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स हब, प्रोसेसिंग क्लस्टर और कृषि-औद्योगिक पार्कों में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही डिजिटल तकनीकों के उपयोग, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करने और कौशल विकास कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता भी बताई गई।

यह विचार दो दिवसीय क्षेत्रीय उच्च स्तरीय नीति संवाद मूल्य को उजागर करना: दक्षिण एशिया में रोजगार सृजन और सतत विकास के लिए खाद्य प्रसंस्करण को आगे बढ़ाना” के उद्घाटन अवसर पर सामने आए। इस कार्यक्रम का आयोजन 9 जून 2026 को अहमदाबाद, गुजरात में भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और विश्व बैंक समूह की सैपलिंग पहल के सहयोग से किया गया।

कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, उद्योगपतियों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स, निवेशकों और दक्षिण एशियाई देशों के प्रतिनिधियों सहित लगभग 200 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं, जो क्षेत्र में मजबूत, समावेशी और दीर्घकालिक खाद्य प्रणालियों के निर्माण पर चर्चा कर रहे हैं।