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मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत की बड़ी तैयारी, वित्त मंत्री के ‘3Fs’ फॉर्मूले से थमेगी महंगाई

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को पश्चिम एशिया संकट के बीच फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि घरेलू इकेनॉमी लगातार मजबूत बनी हुई है। भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक के 37वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फ्यूल बचाने की अपीलों के बाद कुछ लोगों द्वारा निराशावादी और नकारात्मक माहौल बनाए जाने की आलोचना की और कहा कि देश में भय फैलाने की कोई गुंजाइश नहीं है तथा लोगों में विश्वास बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की नीतिगत प्रतिक्रिया वृद्धि को बनाए रखने के लिए संतुलित तरीके से तैयार की गई है।

वित्त मंत्री ने बताया कि डीजल और पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से सरकार को एक लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ फर्टिलाइजर की कीमतें भी अकल्पनीय स्तर पर पहुंच गई हैं, जबकि सोने की ऊंची कीमतें बाहरी क्षेत्र पर कुछ चुनौतियां पैदा कर रही हैं। सीतारमण ने कहा कि ऐसे समय में 3एफ पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है और प्रधानमंत्री के आह्वानों का संदर्भ भी इसी पृष्ठभूमि में है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग स्थिति को लेकर यह दावा कर रहे हैं कि सब कुछ बर्बाद हो रहा है, जो सही नहीं है।

वित्त मंत्री ने कहा कि चुनौतियां मुख्य रूप से बाहरी कारणों से उत्पन्न हुई हैं, जबकि भारत की घरेलू आर्थिक स्थिति आज भी सकारात्मक और मजबूत बनी हुई है। उन्होंने कहा कि भारत भय फैलाने की स्थिति में नहीं है। हमें अपने शब्दों और कार्यों से लोगों में विश्वास पैदा करना चाहिए। सीतारमण ने यह भी कहा कि सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों के 8.1 लाख करोड़ रुपए के लंबित भुगतान का मामला उनकी कार्यशील पूंजी और वृद्धि को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने पब्लिक सेक्टर के उपक्रमों से कहा कि वे एमएसएमई को भुगतान करने में 45 दिन की समय-सीमा से अधिक विलंब न करें।

आरबीआई देगा सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश, बढ़ेगी वित्तीय मजबूती

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश देने की घोषणा की है। माना जा रहा है कि यह राशि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार को बड़ी वित्तीय राहत प्रदान करेगी।

यह अब तक का सबसे बड़ा लाभांश हस्तांतरण है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में आरबीआई ने सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का लाभांश दिया था, जो 2023-24 की तुलना में 27.4 प्रतिशत अधिक था। वहीं, 2023-24 में यह राशि 2.1 लाख करोड़ रुपये और 2022-23 में 87,416 करोड़ रुपये रही थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई से मिलने वाला यह बड़ा लाभांश सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखने, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, निवेश आय और केंद्रीय बैंक की बेहतर वित्तीय स्थिति के कारण इस बार रिकॉर्ड लाभांश संभव हो पाया है।

भारत का लक्ष्य इस वर्ष एक ट्रिलियन डॉलर और अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर का निर्यात करना : केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल


दिल्ली /सत्ता संदेश

निर्यात लक्ष्य एक राष्ट्रीय मिशन; लगभग 38 विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते बाजार पहुंच को बढ़ावा देंगे: श्री पीयूष गोयल

श्री पीयूष गोयल ने व्यवसायों से आयात रुझानों पर दृष्टि रखने, अवसरों की पहचान करने, आयात प्रतिस्थापन में देश की मदद करने की अपील की

स्वदेशी को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए श्री पीयूष गोयल ने घरेलू उत्पादों की सहायता करने का आग्रह किया

बढ़ती खपत अवसर प्रदान करती है, लेकिन आयात में वृद्धि को रोकने के लिए घरेलू उद्योग को आगे आना होगा; युवाओं और स्टार्टअप की अधिक भागीदारी की आवश्‍यकता : श्री पीयूष गोयल

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने आज कहा कि भारत ने इस वर्ष एक ट्रिलियन डॉलर और अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है। यही आत्मनिर्भर भारत की सच्ची पहचान होगी। नई दिल्ली में भारतीय व्यापार महोत्सव की वेबसाइट लॉन्च समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, इस वर्ष निर्यात 863 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत अधिक है। उन्होंने कहा कि वस्तुओं और सेवाओं दोनों के निर्यात में वृद्धि हुई है, जो वर्तमान वैश्विक परिवेश में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

श्री गोयल ने कहा कि यह केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि राष्ट्र का लक्ष्य है और केंद्र सरकार इसे अर्जित करने के लिए हर संभव सहायता देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में लगभग 38 विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की दिशा में प्रयास किए गए हैं। इससे भारतीय वस्तुओं को उन बड़े बाजारों में तरजीही पहुंच मिलेगी जहां प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम आयात शुल्क पर भारतीय सामान बेचा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ये समझौते धीरे-धीरे लागू होंगे और ओमान के साथ एफटीए पहली जून से लागू हो सकता है। कागजी कार्रवाई के लिए लंबित अन्य अंतिम रूप दिए गए एफटीए भी बाद में लागू हो जाएंगे।

श्री पीयूष गोयल ने हितधारकों से वाणिज्य मंत्रालय के व्यापार पोर्टल के माध्यम से आयात रुझानों का अध्ययन करने और घरेलू विनिर्माण तथा आयात प्रतिस्थापन के अवसरों की पहचान करने का आग्रह किया। उन्होंने देश में आयात की जा रही वस्तुओं पर निरंतर दृष्टि रखने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि ऐसे रुझान भारतीय व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करते हैं। श्री गोयल ने कहा कि वाणिज्य मंत्रालय को विदेशों से भारत में आने वाले उत्पादों को उजागर करते हुए इन अवसरों को अधिक व्यवस्थित तरीके से प्रदर्शित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आयात प्रतिस्थापन और निर्यात विकास के दो प्रमुख पहलू हैं और मंत्रालय उन क्षेत्रों को भी प्रदर्शित करेगा जहां भारत की शक्ति और क्षमता है ताकि व्यवसाय इन अवसरों का लाभ उठा सकें।

श्री पीयूष गोयल ने घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने और स्वदेशी भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विदेशी वस्तुओं के प्रति थोड़ी सी भी प्राथमिकता घरेलू उद्योग को कमजोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मध्यम वर्ग का विस्तार हो रहा है और उपभोग बढ़ रहा है, भारत के लिए अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करना आवश्यक है, अन्यथा आयात इस कमी को पूरा करेगा। श्री गोयल ने व्यवसायों और उपभोक्ताओं से देश के भीतर आपूर्तिकर्ता और ग्राहक बनकर एक-दूसरे की सहायता करने का आग्रह किया। उन्‍होंने कहा कि यदि भारतीय स्वदेशी मेला जैसी पहलों के माध्यम से इस भावना को मजबूत किया जाता है, तो यह भारत में निर्मित उत्पादों को बढ़ावा देने वाले एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में परिवर्तित हो सकता है।

श्री गोयल ने कहा कि पूंजीगत वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में भारत अभी भी विदेशी देशों पर बहुत हद तक निर्भर है। उन्होंने राजकोट, जालंधर, लुधियाना, बटाला और पुणे सहित औद्योगिक समूहों से आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू उत्पादन बढ़ाने का आह्वान किया।

केंद्रीय मंत्री ने चिकित्सा उपकरणों के बढ़ते घरेलू उत्पादन को भी रेखांकित किया और विशाखापत्तनम में निर्मित सीटी स्कैन मशीन को उदृत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पादों को अधिक अपनाने से मांग बढ़ेगी और परिचालन का परिमाण भी बढ़ेगा।

श्री गोयल ने कहा कि भारत को केवल विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने मात्र से आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को निरंतर बड़ी उपलब्धियों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, नए विचार उत्पन्न करने चाहिए और प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा परिकल्पित अमृत काल के दौरान विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर निरंतर कार्य करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उद्योगों, व्यवसायों और नागरिकों के उत्साह के साथ-साथ 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक भावना से यह विश्वास मिलता है कि विश्‍व की कोई भी शक्ति भारत की प्रगति को रोक नहीं सकती। भारत मंडपम में आयोजित हो रहे भारतीय स्वदेशी मेले का उल्‍लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थल स्वयं भारत की विविधता को दर्शाता है, क्योंकि यहाँ उपयोग की जाने वाली सामग्री और उत्पाद देश के विभिन्न कोनों से आए हैं।

श्री गोयल ने गुणवत्ता और उत्पादकता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी देश में गुणवत्ता मानकों में सुधार और उत्पादकता में वृद्धि चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर गुणवत्ता और पैकेजिंग के बिना भारत वैश्विक बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत तेजी से प्रगति कर रहा है और इसके निर्यात में भी लगातार वृद्धि हो रही है।

कृषि और मत्स्य पालन सेक्‍टरों की क्षमता को रेखांकित करते हुए श्री गोयल ने कहा कि किसानों और मछुआरों के उत्पादों सहित भारत का कृषि निर्यात लगभग 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि इन सेक्‍टरों में मूल्यवर्धन का स्तर अभी भी कम है। उन्होंने कहा कि यदि युवा उद्यमी मूल्यवर्धित सेक्‍टरों में प्रवेश करें और लघु, मध्यम एवं वृहत्तर स्तर पर प्रसंस्करण और विनिर्माण इकाइयां स्थापित करें तो अपार संभावनाएं हैं।

श्री गोयल ने कहा कि जब भारत निर्यात-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाता है, तो गुणवत्ता मानक स्वाभाविक रूप से बेहतर होते हैं। उन्होंने कहा कि यदि स्वदेशी उत्पाद निर्यात-योग्य हो जाएं, तो लोग विदेशी वस्तुओं की ओर रुख नहीं करेंगे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और परिचालन के दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री गोयल ने कहा कि सूक्ष्‍म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की परिभाषा का विस्तार किया गया है और अब 500 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाले उद्यम एमएसएमई के दायरे में आते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार उद्यमों को और अधिक विकसित होते देखना चाहती है और उनके साथ खड़ी है।

उन्होंने आयोजकों से आग्रह किया कि वे भारतीय व्यापार महोत्सव में देश भर से विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों को आमंत्रित करें। कार्यक्रम में 1,000 व्यवसायों की भागीदारी का हवाला देते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य से 25 महिला उद्यमियों को आमंत्रित किया जाए, जिससे अकेले ही लगभग 700-750 प्रतिभागी शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग और बढ़ती खपत व्यापारियों, उद्योगों और लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असीम अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने सावधान किया कि यदि घरेलू उद्योग देश की आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहते हैं, तो आयात इस कमी को पूरा करेगा।

उन्होंने इस पहल में युवा उद्यमियों, स्टार्टअप्स और देश भर के युवाओं सहित अगली पीढ़ी को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आयात प्रतिस्थापन और वर्तमान में आयात किए जा रहे उत्पादों से संबंधित अवसरों को प्रदर्शित किया जाना चाहिए ताकि लोग घरेलू विनिर्माण की संभावनाओं को समझ सकें।

श्री गोयल ने भारतीय स्वदेशी मेले में रुपे कार्ड और यूपीआई संचालित करने वाली एनपीसीआई को शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि यूपीआई का व्यापक उपयोग हो रहा है, जबकि रुपे कार्ड का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। उन्होंने मेले के पूरे परिसर में 50 से 100 कियोस्क स्थापित करने का सुझाव दिया, जहां आगंतुक आधार और अन्य पहचान दस्तावेजों का उपयोग करके रुपे डेबिट कार्ड प्राप्त कर सकें और यूपीआई या रुपे कार्ड के माध्यम से सभी लेनदेन डिजिटल रूप से कर सकें।

श्री गोयल ने कहा कि इस पहल के लिए बैंकों को एक साथ लाने से भारत की भुगतान प्रणालियों के व्यापक अंगीकरण को प्रोत्साहन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि भारत मंडपम नियमित रूप से प्रदर्शनियों और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन करता है। ऐसी पहल से अधिक लोगों को पूरे देश में रुपे और यूपीआई को अपनाने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस तरह की छोटी-छोटी पहल भारत की अमृतकाल यात्रा को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करेंगी और जनभागीदारी के माध्यम से समृद्ध और विकसित भारत की राह को सुदृढ़ करेंगी। उन्होंने कहा कि जब प्रत्येक व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ाता है, तो देश 140 करोड़ कदम आगे बढ़ता है।

श्री गोयल ने सभी हितधारकों से भारतीय व्यापार महोत्सव को सफल बनाने के लिए मिलकर काम करने का आग्रह किया और कार्यक्रम के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं।

भारतीय व्यापार महोत्सव 12 अगस्त – 15 अगस्त 2026 तक चलेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्ञान और मूर्त संसाधनों के योगदान को मापने के लिए रूपरेखा” पर आधारित शोधपत्र पर जानकारी और सुझाव आमंत्रित

दिल्ली /सत्ता संदेश

एक प्रतिस्पर्धी वातावरण में तकनीकी में तेजी से परिवर्तन, जटिल कौशल मांग और संगठनात्मक नवाचार अर्थव्यवस्था में ज्ञान के बढ़ते महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। इस संदर्भ में, अर्थव्यवस्था में ज्ञान के योगदान का आकलन करना और इसमें हो रहे परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए नीतिगत उपायों की सिफारिश करना आवश्यक हो गया है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्ञान और मूर्त संसाधनों के योगदान को मापने के लिए एक रूपरेखा विकसित करने का प्रयास कर रहा है। इस दिशा में पहले से कोई समान पहल न होने के कारण, यह प्रयास एक नई पहल है और इसमें विशेषज्ञों एवं अन्य हितधारकों के सहयोग की आवश्यकता है।

भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद की अध्यक्षता में फरवरी 2025 में हुई एक बैठक की सिफारिशों के आधार पर, इस उद्देश्य के लिए एक तकनीकी सलाहकार समूह (टीएजी) का गठन किया गया था। इसकी अध्यक्षता उस समय क्षमता विकास आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने की। इस समूह में विचार मंच, उद्योग निकायों, शिक्षाविदों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल थे। सितंबर 2025 में एक विचार-विमर्श कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य मूर्त संसाधनों का वर्गीकरण विकसित करना और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उनके योगदान को मापने के लिए संभावित मात्रात्मक संकेतकों और डेटा स्रोतों की पहचान करना था। टीएजी के सुझावों, विचार-विमर्श सत्र से प्राप्त विचारों और विशेषज्ञों के साथ हुई बाद की चर्चाओं के आधार पर, भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्ञान और मूर्त संसाधनों के योगदान को मापने के लिए एक रूपरेखा पर एक आधार पत्र मंत्रालय में तैयार किया गया है। यह आधार पत्र https://mospi.gov.in/announcements पर उपलब्ध है।

इस शोधपत्र में निम्‍नलिखित चार अध्याय हैं:

अध्याय 1: ज्ञान और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था—अवधारणात्‍मक विचार

अध्याय 2: उपलब्ध पद्धतियाँ और मात्राएँ

अध्याय 3: भारत का पारंपरिक ज्ञान—आयाम एवं चुनौतियाँ, और

अध्याय 4: अर्थव्यवस्था में ज्ञान के योगदान का मूल्यांकन; एक रूपरेखात्मक परिचय।

पहले अध्याय में ज्ञान के आयामों, उसके सृजन और विकास पर वैचारिक विचार-विमर्श किया गया है, साथ ही इसमें अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव से संबंधित हालिया चर्चाओं पर भी विचार किया गया है। दूसरे अध्याय में अनुसंधान एवं विकास, बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और अकादमिक संसाधनों के मूल्यांकन के लिए उपलब्ध पद्धतियों का वर्णन किया गया है और ज्ञान के इन घटकों के मूल्यांकन के लिए कुछ मापदंड प्रस्तुत किए गए हैं। तीसरे अध्याय में भारतीय अर्थव्यवस्था में पारंपरिक ज्ञान की भूमिका और विभिन्न कार्यों में इस पारंपरिक ज्ञान की भूमिका का विश्लेषण किया गया है। इसमें इसके संरक्षण, प्रलेखन और वर्गीकरण से संबंधित साहित्य और पहलों की समीक्षा की गई है और संबंधित मापदंड प्रस्तुत किए गए हैं। अध्याय 4 में अर्थव्यवस्था पर ज्ञान के प्रभाव को समझने के लिए साक्ष्यों को एक व्यापक ढांचे में समेकित करने का प्रारंभिक प्रयास किया गया है और इसके आवश्यक घटकों को परिभाषित किया गया है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य सचिव श्री रतन पी. वाटल की अध्यक्षता में ज्ञान प्रणाली पर एक समिति का गठन किया है। इस समिति को अर्थव्यवस्था में ज्ञान और मूर्त संसाधनों के योगदान को मापने के लिए एक व्यावहारिक नीति पत्र तैयार करने का दायित्व सौंपा गया है। उपर्युक्त आधार पत्र ही व्यावहारिक नीति पत्र का आधार बनेगा।

सभी हितधारकों और आम जनता से परामर्श प्रक्रिया के अंतर्गत आधार पत्र पर टिप्पणियाँ और सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं। अपनी जानकारी 15 जून 2026 तक   maneesh.jindal@mospi.gov.in और neeraj.kumar007[at]nic[dot]in ईमेल पतों पर इस मंत्रालय को भेजी जा सकती हैं। इससे इस रूपरेखा को शीघ्र अंतिम रूप देने में सहायता मिलेगी।

अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) ने वित्त वर्ष 2025-26 में 15.9 प्रतिशत की मजबूत ऋण वृद्धि दर्ज की, जो सुदृढ़ आर्थिक गतिविधि और ऋण मांग को दर्शाती है
कृषि और संबद्ध क्षेत्र के ऋण में वृद्धि वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 15.7 प्रतिशत हो गई है, जो एक वर्ष पहले 10.4 प्रतिशत थी, यह ग्रामीण मांग में निरंतरता और ऋण प्रवाह में सुधार को दर्शाता है

औद्योगिक ऋण वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है जो पिछले वर्ष यह 8.2 प्रतिशत था, यह वृद्धि सूक्ष्म, लघु, एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को ऋण देने की तेज गति से हुई

एनबीएफसी, व्यापार और वाणिज्यिक अचल संपत्ति क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि से सेवा क्षेत्र में ऋण वृद्धि पिछले वर्ष के 12 प्रतिशत से बढ़कर 19 प्रतिशत हो गई है

वाहन और स्वर्ण समर्थित ऋणों की मजबूत मांग और आवास ऋण की स्थिर स्थिति के कारण व्यक्तिगत ऋणों में 16.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो पिछले वर्ष के 11.7 प्रतिशत से अधिक है

दिल्ली /सत्ता संदेश

वित्तीय वर्ष 2025-26 में गैर-खाद्य ऋण में पिछले वर्ष की तुलना में 15.9 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई, जो कि वर्ष 2025 की इसी अवधि (10.9 प्रतिशत) की तुलना में 497 आधार अंकों की उल्लेखनीय वृद्धि है। मार्च 2026 में कुल बकाया ऋण 212.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 29.2 लाख करोड़ रुपये अधिक है।

कम ब्याज दर के माहौल के बीच, सरकार द्वारा समर्थित पूंजीगत व्यय चक्र और समय पर किए गए संरचनात्मक सुधारों के चलते निजी निवेश बढ़ रहे हैं और घरेलू ऋण मांग को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर कॉरपोरेट और व्यक्तिगत उधारकर्ताओं दोनों का विश्वास बहाल हो रहा है।

वित्त वर्ष 2025-26 में ऋण वृद्धि व्यापक आधार पर हुई है, जिसमें सेवा क्षेत्र का बड़ा योगदान है। इसके बाद व्यक्तिगत ऋण खंड, कृषि और संबद्ध गतिविधियां और उद्योग का स्थान रहा है।

क्षेत्रीय ऋण वितरण – मुख्य बिंदु:

क्षेत्रीय ऋण वितरण (वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि प्रतिशत में

  • कृषि एवं संबद्ध गतिविधियां: इस क्षेत्र में ऋण वृद्धि दर बढ़कर 15.7 प्रतिशत हो गई, जो पिछले वर्ष दर्ज की गई 10.4 प्रतिशत वृद्धि से 528 बीपीएस अधिक है। यह कृषि क्षेत्र को मिल रहे सुदृढ़ समर्थन को दर्शाता है। ग्रामीण मांग में निरंतरता और ग्रामीण ऋण के औपचारिकरण से वित्त वर्ष 2025-26 में प्राथमिक क्षेत्र के ऋण उपयोग में सकारात्मक गति प्राप्त हुई है।
  • औद्योगिक क्षेत्र: औद्योगिक क्षेत्र को दिए गए ऋण में पिछले वर्ष की 8.2 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में लगभग दोगुनी दर से 15.0 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सूक्ष्म और लघु उद्योगों ने वित्त वर्ष 2025-26 में 33.1 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.7 गुना अधिक है। मध्यम आकार के उद्योगों में भी इसी तरह के सकारात्मक रुझान देखे गए हैं, जहां ऋण में 21.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई है। औद्योगिक ऋण के प्रमुख चालक हैं: अवसंरचना, बुनियादी धातु और धातु उत्पाद, रसायन और रासायनिक उत्पाद, पेट्रोलियम, कोयला उत्पाद और परमाणु ईंधन आदि।
  • सेवा क्षेत्र: सेवा क्षेत्र के ऋण में वार्षिक आधार पर 19.0 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई (पिछले वर्ष इसी अवधि में 12.0 प्रतिशत की तुलना में)। सेवा क्षेत्र का कुल ऋण में 28 प्रतिशत का योगदान है। यह वृद्धि मुख्य रूप से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, व्यापार और वाणिज्यिक अचल संपत्ति जैसे क्षेत्रों से उच्च मांग के कारण हुई।
  • व्यक्तिगत ऋण खंड: कुल ऋण में 33 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले व्यक्तिगत ऋण खंड में वित्त वर्ष 2025-26 में 16.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो एक वर्ष पहले दर्ज की गई ऋण वृद्धि (11.7 प्रतिशत) से 455 बीपीएस अधिक है। आवास खंड में वृद्धि स्थिर रही, जबकि वाहन ऋण और सोने के आभूषणों के बदले दिए जाने वाले ऋणों में तीव्र गति बनी रही।

मजबूत ऋण वृद्धि घरेलू अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ वातावरण को दर्शाती है और भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में ऋण की बढ़ती मांग का संकेत देती है। मजबूत ऋण वृद्धि के परिणामस्वरूप निगम और व्यक्ति व्यवसाय विस्तार और टिकाऊ वस्तुओं की खरीद के लिए ऋण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, जिससे अचल परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से अतिरिक्त क्षमता विकास द्वारा औद्योगिक गतिविधि में पहले से अधिक तेजी आ रही है और रोजगार के अधिक अवसर पैदा हो रहे हैं।

भू-आर्थिक विखंडन और भू-राजनीतिक दबावों से घिरे चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है और यह लगातार दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक रही है।

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र, जो आर्थिक विकास का प्राथमिक इंजन है, अपनी सर्वोत्तम स्थिति में है। इसकी मजबूत पूंजी, ऐतिहासिक रूप से कम अवमूल्यन वाली परिसंपत्तियां और निरंतर लाभप्रदता अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता को बढ़ाती है। ऋण को लोकतांत्रिक और औपचारिक बनाने के लिए सरकार के निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में व्यापक स्तर पर ऋण वृद्धि हो रही है।

*(वार्षिक वृद्धि की गणना 4 अप्रैल, 2025 और 31 मार्च, 2026 के ऋण उपयोग के आधार पर की गई है। 31 दिसंबर, 2025 से बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम 2025 के तहत अंतिम रिपोर्टिंग पखवाड़े की परिभाषा को महीने के अंतिम दिन में बदल दिया गया है। तदनुसार, दिसंबर 2025 से आगे की वार्षिक वृद्धि दरें चालू वर्ष के महीने के अंत के आंकड़ों और पिछले वर्ष के संबंधित महीने के अंतिम रिपोर्टिंग पखवाड़े (पुरानी परिभाषा के अनुसार) के आंकड़ों पर आधारित हैं।)

भारत का सीफूड निर्यात: वृद्धि से वैश्विक प्रतिस्पर्धा तक

भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, रोजगार, निर्यात आय और सतत् आजीविका में एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरा है, जिसे साल 2015 के बाद से भारत सरकार द्वारा किए गए रिकॉर्ड ₹39,272 करोड़ के निवेश ने मजबूती प्रदान की है। यह क्षेत्र प्राथमिक स्तर पर लगभग 3 करोड़ मछुआरों और मत्स्य किसानो को समर्थन देता है और मूल्य श्रृंखला में इसका प्रभाव लगभग दोगुना है। वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा जल कृषि उत्पादक होने के नाते, भारत वैश्विक मछली उत्पादन में लगभग 8% हिस्से का योगदान देता है। कभी अधिकांशतः पारंपरिक रहा यह क्षेत्र, पिछले दशक में एक वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में बदल गया है, जहां छोटे स्तर के मछुआरों के लिए समावेशी विकास सुनिश्चित किया गया है। यह परिवर्तन उत्पादन में हुई वृद्धि से रूपष्‍ट प्रतिबिम्‍बित होता है, जहाँ मछली उत्पादन 2019–20 में 141.64 लाख टन से बढ़कर 2024–25 में 197.75 लाख टन हो गया, औसत वार्षिक वृद्धि लगभग 7% दर्ज की गई।

भारत का सीफूड निर्यात मजबूत और सतत् वृद्धि दर्ज कर रहा है, जो पिछले 11 वर्षों में 7%  की औसत वार्षिक दर से बढ़ा है। इस अवधि में समुद्री उत्पादों का निर्यात दोगुने से अधिक बढ़ा, जो 2013–14 में ₹30,213 करोड़ से बढ़कर 2024–25 में ₹62,408 करोड़ हो गया, जिसमें प्रमुख योगदान ₹43,334 करोड़ के झींगा (श्रिंप) निर्यात का है।

भारत का सीफूड निर्यात एक व्यापक और विविध उत्पाद श्रृंखला को कवर करता है, जिसमें 350 से अधिक प्रकार के उत्पाद लगभग 130 वैश्विक बाजारों में भेजे जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका निर्यात का सबसे बड़ा गंतव्य बना हुआ है, जिसका साल 2024–25 के कुल निर्यात मूल्य में 36.42%  का हिस्सा रहा, इसके बाद चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण पूर्व एशिया, जापान और मध्य पूर्व का स्थान है, जबकि अन्य बाजारों का संयुक्त योगदान लगभग 9% का है। निर्यात मिश्रण में मुख्य रूप से फ्रोज़न श्रिंप का प्रभुत्व है, जो भारत का एक प्रमुख सीफूड उत्पाद है, इसके बाद फ्रोज़न मछली, स्क्विड, सुखाए हुए उत्पाद, फ्रोज़न कटलफ़िश, सुरिमी आधारित उत्पाद और ताजा एवं ठंडा सीफूड शामिल हैं, जो वैश्विक मांग की मजबूती और उत्पाद विविधीकरण में विस्तार को दर्शाते हैं। सीफूड निर्यात में मूल्य संवर्धित उत्पादों का हिस्सा 2.5% से बढ़कर 11% हो गया है, जिसका निर्यात मूल्य 74.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर है।

कुछ चुनिंदा वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने और वैश्विक सीफूड बाजारों में भारत की उपस्थिति को बढ़ाने के लिए, सरकार निर्यात उत्पाद श्रृंखला के विविधीकरण को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत, मत्स्य विभाग मूल्य श्रृंखला में कई प्रकार के हस्तक्षेपों का समर्थन करता है, जिसमें गुणवत्तापूर्ण मछली बीज उत्पादन, खारे पानी की जलीय कृषि का विस्तार और विविधीकरण, निर्यात उन्मुख प्रजातियों को बढ़ावा, प्रौद्योगिकी अपनाना, रोग प्रबंधन, ट्रेसबिलिटी सिस्टम और क्षमता विकास शामिल हैं। साथ ही, निवेश पोस्ट-हार्वेस्ट अवसंरचना, निर्बाध शीत श्रृंखला नेटवर्क, मछली पकड़ने के आधुनिक बंदरगाहों और मछली उतारने के केंद्रों को मजबूत करने में किया जा रहा है। इसके साथ ही, सरकार उच्च मूल्य वाली प्रजातियों जैसे टूनासीबासकोबियापॉम्पानोमड क्रैबजीआईएफटी तिलापियाग्रुपरटाइगर श्रिंप (पीमोनोडॉन), स्कैम्पी और सीवीड पर केंद्रित विविधीकृत जलीय कृषि को बढ़ावा दे रही है, जिसका उद्देश्य भारत के उत्पाद पोर्टफोलियो का विस्तार करना और अंतरराष्ट्रीय प्रीमियम बाजारों तक पहुंच में सुधार करना है।

प्रमुख निर्यात बाजारों तक पहुँच सुरक्षित करने के लिए, भारत लगातार अपने मत्स्य पालन क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय नियमों और स्थिरता मानकों के अनुरूप बना रहा है। इसका मुख्य ध्यान अमेरिकी अनुपालन आवश्यकताओं को पूरा करने पर रहा है, विशेषकर मरीन मैमल प्रोटेक्शन एक्ट (एमएमपीए) के तहत, जो समुद्री स्तनधारी अप्रत्यक्ष पकड़ (बाय-कैच) को कम करने के उपायों की मांग करता है। निरंतर प्रयासों, जिसमें वैज्ञानिक स्टॉक आकलन और हितधारक परामर्श शामिल थे, के परिणामस्वरूप भारत ने साल 2025 में अमेरिकी अधिकारियों से तुल्यता की पुष्टि प्राप्त की, जिससे दिसंबर 2025 की समय सीमा के बाद भी अमेरिकी बाजार में सीफूड का निरंतर निर्यात सुनिश्चित हुआ। साथ ही, जंगली पकड़ वाली श्रिंप के निर्यात पर प्रतिबंधों को दूर करने के लिए श्रिंप ट्रॉलर पर टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (टीईडी) स्थापित करने के कदम उठाए जा रहे हैं, और तटीय राज्यों में इसका बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन प्रगति पर है। सरकार ने ट्रेसबिलिटी और प्रमाणन प्रणालियों को भी मजबूत किया है, और एक राष्ट्रीय डिजिटल ढांचा लॉन्च किया है जिससे पूरे प्रसंस्करण चक्र की निगरानी, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सके। भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईज़ेड) में स्थायी मत्स्य पालन को नियंत्रित करने वाले नए नियमों के साथ मिलकर, ये उपाय भारत को एक जिम्मेदार और वैश्विक रूप से अनुपालन करने वाले सीफूड निर्यातक के रूप में स्थापित करने की संगठित पहल को दर्शाते हैं।

मत्स्य पालन क्षेत्र में व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने के लिए, मत्स्य विभाग ने कई नियामक और आयात प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया है। सैनिटरी इम्पोर्ट परमिट (एसआईपी) प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल किया गया है और राष्ट्रीय सिंगल विंडो सिस्टम के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे अनुमोदन का समय 30 दिन से घटकर केवल 72 घंटे हो गया है। एसआईपी आवश्यकताओं को एसपीएफ श्रिंप ब्रूडस्टॉक, मछली के तेल, सीमित अनुसंधान एवं विकास नमूनों और केवल मूल्य संवर्धन और पुनः निर्यात के लिए लायी गई जंगली मछली आयात पर छूट दी गई है, जिससे व्यापार संचालन में आसानी हुई है। हाल के कानूनी सुधारों ने जलीय कृषि इकाइयों के लिए अनुपालन बोझ को और कम किया है, जो इस क्षेत्र को अधिक व्यापार अनुकूल और निवेश के लिए तैयार बनाने के व्यापक प्रयास को दर्शाता है।

आगामी पांच वर्षों में, सरकार उच्च मूल्य वाले निर्यात, व्यापक बाजार पहुँच और मजबूत गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करके भारत की वैश्विक सीफूड रणनीति को प्रभावपूर्ण बनाने की योजना बना रही है। मूल्य वर्धित उत्पादों का हिस्सा बढ़ाने का लक्ष्य है, जिसे प्रसंस्करण सुविधाओं के विस्तार, कुशल कार्यबल विकास और प्रमाणन प्रणालियों में सुधार द्वारा प्राप्त किया जाएगा। प्रयासों को यूकेईयूआसियान और पश्चिम एशिया जैसे बाजारों में निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ अंतर्देशीय निर्यात केंद्र और मीठे पानी की आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण की दिशा में भी लगाया जाएगा। उन्नत शीत श्रृंखला नेटवर्क, डिजिटल ट्रेसबिलिटी और अनुपालन ढांचे भारत की महत्वाकांक्षा को समर्थन देंगे, जिससे आने वाले वर्षों में भारत एक भरोसेमंद और प्रीमियम सीफूड निर्यातक के रूप में उभर सके।

रुपया शुरुआती कारोबार में एक पैसे की बढ़त के साथ 90.73 प्रति डॉलर पर

मुंबई, 17 फरवरी (भाषा) रुपया मंगलवार को शुरुआती कारोबार में एक पैसे की बढ़त के साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.73 पर पहुंच गया। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से घरेलू मुद्रा को बल मिला।

विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि मजबूत डॉलर और विदेशी पूंजी की निकासी ने हालांकि स्थानीय मुद्रा की बढ़त को सीमित कर दिया।

अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.72 पर खुला। हालांकि बाद में फिसलकर 90.73 प्रति डॉलर पर आ गया जो पिछले बंद भाव से एक पैसा की बढ़त दर्शाता है।

रुपया सोमवार को आठ पैसे टूटकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.74 पर बंद हुआ था।

इस बीच, छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को दर्शाने वाला डॉलर सूचकांक 0.23 प्रतिशत की बढ़त के साथ 97.14 पर रहा।

घरेलू शेयर बाजारों में सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 245.87 अंक टूटकर 83,031.28 अंक पर जबकि निफ्टी 106.45 अंक फिसलकर 25,576.30 अंक पर पहुंच गया।

अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 0.47 प्रतिशत की गिरावट के साथ 68.33 डॉलर प्रति बैरल रहा।

शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) सोमवार को बिकवाल रहे थे और उन्होंने 972.13 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।