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उत्तराखंड में हाथियों की गणना अभियान शुरू, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से हुई विशेष कवायद की शुरुआत


देहरादून / सत्ता संदेश

उत्तराखंड में जंगली हाथियों की संख्या का सटीक आकलन करने के लिए राज्य वन विभाग ने विशेष गणना अभियान शुरू कर दिया है। इस महत्वपूर्ण कवायद की शुरुआत मंगलवार को प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से की गई। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य राज्य में हाथियों की वास्तविक संख्या, उनके आवागमन के मार्ग और मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति का अध्ययन करना है।

वन विभाग की टीमों के साथ वन्यजीव विशेषज्ञ, शोधकर्ता और प्रशिक्षित कर्मचारी इस अभियान में भाग ले रहे हैं। हाथियों की गिनती के लिए आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रोन कैमरे, जीपीएस ट्रैकिंग, कैमरा ट्रैप और प्रत्यक्ष निगरानी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह सर्वेक्षण कई चरणों में पूरा किया जाएगा और इसके आंकड़े भविष्य की वन्यजीव संरक्षण योजनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, राजाजी टाइगर रिजर्व और तराई क्षेत्र हाथियों के प्रमुख आवास माने जाते हैं। बीते कुछ वर्षों में जंगलों के सिकुड़ने और मानव गतिविधियों के बढ़ने से हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में यह गणना अभियान संरक्षण रणनीति तैयार करने में मदद करेगा।

वन विभाग ने बताया कि हाथियों की आवाजाही वाले संवेदनशील इलाकों की भी पहचान की जाएगी, ताकि गांवों और जंगलों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों की सही संख्या और उनके व्यवहार संबंधी आंकड़े मिलने से वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।

जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत नियामक सुधारों के कारण बौद्धिक संपदा अधिकार संबंधी दस्तावेजों की फाइलिंग में भारी वृद्धि

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण-एनबीए ने भारत के जैविक संसाधनों से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) आवेदनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जो जैव विविधता, अनुसंधान, नवोन्‍मेषण और औद्योगिक विकास के बढ़ते समन्वय को दर्शाती है। यह वृद्धि जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 का प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसने जैविक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे को सुदृढ़ और स्पष्ट किया है।

संशोधित प्रावधानों के तहत, अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत आने वाले आवेदकों को भारत में उत्पन्न जैविक संसाधनों पर आधारित बौद्धिक संपदा अधिकारों (पेटेंट सहित) के लिए आवेदन करने से पहले एनबीए से पंजीकरण प्रमाणपत्र (सीओआर) प्राप्त करना अनिवार्य है। इस अनिवार्यता से बौद्धिक संपदा अधिकार प्रणाली में अनुपालन, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है, साथ ही यह सुनिश्चित हुआ है कि जैविक संसाधनों का उपयोग राष्ट्रीय कानून और संरक्षण तथा निष्पक्ष एवं समान लाभ बंटवारे के सिद्धांतों के अनुरूप हो।

संशोधित ढांचे ने प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया है और स्पष्ट रूप से परिभाषित अनुमोदन प्रक्रियाओं को लागू किया है, जिसके परिणामस्वरूप पंजीकरण-आधारित प्रणाली की ओर निर्णायक बदलाव आया है। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की अवधि के दौरान, लगभग 857 बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) आवेदन प्राप्त हुए और 792 आवेदनों के लिए सीओआर जारी किए गए जो सही पाए गए। इसके बाद की अवधि, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक, कार्यालय को 1,077 आईपीआर आवेदन प्राप्त हुए और 885 पंजीकरण प्रमाणपत्र (सीओआर) जारी किए गए, जो आवेदनों में वृद्धि और आईपीआर से संबंधित एनबीए आवेदनों के समय पर निपटान की दिशा में निरंतर प्रयासों को दर्शाता है।

ये आवेदन जैव प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, खाद्य विज्ञान, जैव रसायन, कृषि रसायन, पॉलिमर प्रौद्योगिकी, सूक्ष्म जीव विज्ञान, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, वस्त्र और अन्य विज्ञान-आधारित उद्योगों सहित विभिन्न सेक्‍टरों से प्राप्त हुए। यह ज्ञान-आधारित सेक्‍टरों में सुव्यवस्थित नियामक तंत्र के व्यापक रूप से अपनाए जाने और बढ़ते महत्व को दर्शाता है।

जैविक संसाधनों से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए पूर्व पंजीकरण अनिवार्य करके और अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल बनाकर, जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 एक जिम्मेदार नवोन्‍मेषण इकोसिस्‍टम को बढ़ावा दे रहा है– एक ऐसा इकोसिस्‍टम जो वैज्ञानिक प्रगति और संरक्षण प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाए रखता है और हितधारकों के साथ निष्पक्ष और समान लाभ साझाकरण सुनिश्चित करता है। इसने अनुसंधान और व्यापार करने में सुगमता प्रदान की है, साथ ही यह सुनिश्चित किया है कि जैविक संसाधनों का उपयोग करने वाले व्यक्ति और संस्थाएं एक मजबूत और पारदर्शी नियामक दायरे में आएं।