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नया भारत संदेह से विश्वास की ओर, भय से स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

दशकों से, भारत का रेगुलेटरी सिस्टम नागरिकों के साथ बहुत अविश्वास के साथ पेश आता था, और उन्हें मामूली, प्रोसेस से जुड़े उल्लंघन, या किसी अधिकारी के शक के आधार पर अपराधी मानता था। एक नए बदलाव में, मोदी सरकार ने आम आदमी के लिए भरोसे और दया पर आधारित नीतियां बनाई हैं।

PM मोदी ने नागरिकों और बिज़नेस को सपोर्ट करने, कम्प्लायंस को आसान बनाने, और बिज़नेस के सामने आने वाली प्रैक्टिकल मुश्किलों को समझने के लिए भारत के कानूनी माहौल को बेहतर बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। चाहे कम्प्लायंस का बोझ कम करना हो, डिजिटाइज़ेशन हो, या सिंगल-विंडो क्लियरेंस हो, बड़ा बदलाव गवर्नेंस को ज़्यादा सही और कुशल बनाने की ओर रहा है। PM का भरोसे और दया पर आधारित शासन का मंत्र जन विश्वास एक्ट, 2026 और 2023 में इसी तरह के एक कानून में साफ दिखता है।
नागरिकों के लिए अनुकूल – नागरिकों के अनुकूल रेगुलेटरी माहौल बनाने और नियमों का पालन करने को बढ़ावा देने के लिए, नया कानून छोटे अपराधों से निपटने के लिए साफ सिद्धांतों के साथ काम करता है: सज़ा से पहले चेतावनी, अपराध की गंभीरता के हिसाब से सज़ा देना, तेज़ी से और पारदर्शी समाधान, और समय-समय पर बदलाव के साथ एक डायनामिक पेनल्टी फ्रेमवर्क ताकि यह पक्का हो सके कि लागू करना समय के साथ असरदार, काम का और जवाबदेह बना रहे।

यह PM के इस विचार के मुताबिक रेगुलेटरी तरीके, नियमों का पालन और लागू करने में एक बड़ा बदलाव दिखाता है कि भारत की 21वीं सदी की उम्मीदें बीते हुए औपनिवेशिक युग के शासन के तरीकों से पूरी नहीं हो सकतीं।
इस सुधार का पैमाना पहले कभी नहीं देखा गया है। जन विश्वास एक्ट 23 मंत्रालयों द्वारा चलाए जा रहे 79 सेंट्रल एक्ट्स के 784 नियमों में बदलाव करता है। यह 717 नियमों को अपराध की श्रेणी से हटाता है और जीवन को आसान बनाने के लिए 67 और नियमों को सही बनाता है। यह आज़ाद भारत के कानूनी इतिहास में अपराध की श्रेणी से हटाने की सबसे बड़ी कवायद है। यह 1,000 से ज़्यादा अपराधों को सही ठहराता है, पुराने और बेकार हो चुके नियमों को हटाता है, पुराने हो चुके पुराने औपनिवेशिक दौर के अपराधों को हटाता है, और क्रिमिनल कोर्ट के बाहर फैसले और अपील के तरीकों को मज़बूत करता है।

अच्छे बदलाव – पहले, किसी को भी सूरज डूबने और सूरज उगने के बीच सिर्फ़ घर, बिल्डिंग या गाड़ी में बिना किसी “सटीक वजह” के मौजूद रहने पर तीन महीने की जेल हो सकती थी। यह औपनिवेशिक दौर के शक पर आधारित नज़रिए को दिखाता था, जिसमें आम आवाजाही को भी संभावित रूप से क्रिमिनल माना जाता था। यह सुधार इस अपराध को पूरी तरह खत्म कर देता है, और कानून को नए सिद्धांतों के साथ जोड़ता है।

पिछले फ्रेमवर्क के तहत, अगर किसी व्यक्ति का ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर हो जाता था, तो अगले दिन ड्राइवर पर सड़क पर होने के लिए क्रिमिनल चार्ज लगते थे। नया कानून 30 दिन का ग्रेस पीरियड देता है।

एक छोटे मैन्युफैक्चरर के बारे में भी सोचें जो अप्रेंटिस एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन डिटेल्स अपडेट नहीं करता है। पहले, यह एक क्रिमिनल गलती थी लेकिन अब सिर्फ़ बार-बार पालन न करने पर ही कड़ी कार्रवाई की इजाज़त है।
इसी तरह, किसी माइनिंग कंपनी द्वारा डॉक्यूमेंटेशन में प्रोसेस से जुड़ी गलती के लिए पहले जेल हो सकती थी। आज, ऐसे मामलों में सिविल पेनल्टी लगती है। गैर-कानूनी माइनिंग, धोखाधड़ी, जानबूझकर नुकसान पहुंचाने और पब्लिक इंटरेस्ट के गंभीर उल्लंघन के लिए क्रिमिनल लायबिलिटी बनी रहेगी; पेपरवर्क के लिए नहीं।

12 साल में सभी को फायदा – जन विश्वास कानून PM मोदी की हमारे सभी नागरिकों की ज़िंदगी आसान बनाने की कोशिश का प्रतीक है। प्रधानमंत्री के तौर पर और उससे पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर देश की सेवा के 12 सालों में PM मोदी का यही मुख्य मिशन रहा है।
जन विश्वास 2026 एक ज़रूरी बुनियाद पर बना है। 2023 में, भारत ने पहले जन विश्वास एक्ट के ज़रिए 42 एक्ट्स के 183 प्रोविज़न्स को डीक्रिमिनलाइज़ कर दिया था। उस कोशिश ने दिखाया कि डीक्रिमिनलाइज़ेशन से एनफोर्समेंट को कमज़ोर किए बिना गवर्नेंस में सुधार हो सकता है। 2026 का कानून इस काम को लगभग चार गुना बढ़ाता है, यह दिखाता है कि यह एक बार की पहल नहीं है बल्कि सुधार की एक लगातार चलने वाली दिशा है।

बड़ा मिशन – नया कानून असल में भारतीयों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के PM मोदी के बड़े मिशन का एक हिस्सा है। इस मिशन में, PM ने हर नागरिक को रोटी, कपड़ा और मकान देने की कोशिश की है और यह पक्का किया है कि वेलफेयर का खर्च सीधे बेनिफिशियरी तक पहुंचे, कांग्रेस राज के दिनों के उलट, जब उस समय के PM राजीव गांधी ने कहा था कि वेलफेयर पर खर्च होने वाले पैसे का सिर्फ़ 15% ही असल में गरीबों तक पहुंचता है।

कम कीमत वाले क्रिमिनल प्रोविज़न को एडमिनिस्ट्रेटिव और मॉनेटरी फ्रेमवर्क से बदलना न सिर्फ़ आम नागरिक के लिए एक अच्छा कदम है, बल्कि इससे छोटे बिज़नेस को भी मदद मिलती है। इससे एनफोर्समेंट एजेंसियां ​​रूटीन टेक्निकल ब्रीच के बजाय गंभीर वायलेशन पर फोकस कर सकती हैं। कोर्ट उन मामलों पर अपना ध्यान दे सकते हैं जिनमें सच में ज्यूडिशियल दखल की ज़रूरत है।


इकॉनमी और इन्वेस्टमेंट – इसके फायदे गवर्नेंस से कहीं ज़्यादा हैं। तेज़ी से कॉम्पिटिटिव होती ग्लोबल इकॉनमी में, रेगुलेटरी क्रेडिबिलिटी मायने रखती है। सालों से, टेक्निकल गलतियों के लिए क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन की चिंताएं इन्वेस्टमेंट में सबसे ज़्यादा रुकावट डालने वाली वजहों में से एक थीं। भारत में 2014 और 2025 के बीच FDI में 143 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है, और FDI बढ़ने का ट्रेंड जारी है। रेगुलेटरी रिफॉर्म इस ग्रोथ का एक अहम हिस्सा रहा है। जन विश्वास 2026 को भारत को एक ऐसा देश बनाकर उस गति को मजबूत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

रिफॉर्म एक्‍सप्रेस के अंतर्गत बढ़ रही न्‍यायिक सुगमता : अर्जुन राम मेघवाल

न्याय सदा से ही मानव सभ्यता का एक अत्‍यधिक महत्वपूर्ण और अभिन्न स्तंभ रहा है। हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की समृद्ध परंपरा तथा उसके स्थायी प्रतीक सामूहिक रूप से उन संस्थागत व्‍यवस्‍थाओं को दर्शाते हैं जिन्होंने मानव सभ्‍यता की विकास यात्रा को सही मार्ग पर आगे बढ़ाया, मार्गदर्शन किया और निरंतर आगे बढ़ने में सहायता की। मानव सभ्‍यता के अनवरत विकास के फलस्‍वरूप ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से समृद्ध आधुनिक समाज में एक-दूसरे से जुड़े व्‍यक्तियों और समुदायों के आपसी संबंधों में भी विभिन्‍न विचारों और मतों के कारण परिवर्तन आया है, तथापि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी उन्‍नति ने देश की सीमाओं से आगे जाकर विचारों के निर्बाध आदान-प्रदान को और अधिक सुगम बनाया है। अनादि काल से, एक विचार की दूसरे विचार पर श्रेष्ठता स्‍थापित करने की होड़ न्यायशास्त्र के विकास की एक मजबूत नींव रही है। युगों से विचारों और मूल्यों के इस अंतर्संघर्ष के बीच न्यायिक संस्थानों ने सत्य, निष्पक्षता और विधि के शासन में लोगों के विश्वास को पुन: स्‍थापित करने की जिम्‍मेदारी निभाई है। इन्होंने एक सेतु का काम किया है जो प्रत्येक संबंधित पक्ष को, यहाँ तक कि उन लोगों को भी जो स्वयं को अलग-थलग महसूस करते हैं, न्याय और सामूहिक कल्‍याण की एक व्यापक प्रक्रिया से जुड़ाव, विश्‍वास और सहभागिता का अनुभव कराता है। 

इसी स्‍थायी संस्‍थागत प्रतिबद्धता  के कारण एक ऐसी सशक्त व्यवस्था निर्मित होती है जो न केवल न्‍याय तक पहुंच सुनिश्चित करती है बल्कि प्रत्‍येक नागरिक के जीवन को सरल और सुगम बनाने के लिए अनिवार्य है। वर्तमान संदर्भ में विकसित भारतीय न्‍यायशास्‍त्र ने स्‍वयं को आधुनिक चुनौतियों और उपलब्‍ध अवसरों के अनुरूप ढाल लिया है। हमारी संवैधानिक विरासत हमें स्‍वतंत्रता सेनानियों और राष्‍ट्र निर्माताओं का स्‍वप्‍न साकार करते हुए एक समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में सतत मार्गदर्शन प्रदान करती है। संविधान की प्रस्‍तावना में निहित न्‍याय की त्रिवेणी अर्थात राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्‍याय तथा स्‍वतंत्रता, समानता और बंधुत्‍व के आदर्श संस्‍थाओं और व्‍यक्तियों दोनों के लिए एक नैतिक दिशासूचक के रूप में कार्य करते हैं। 

स्वतंत्र भारत को संविधान के रूप में एक आदर्श मार्गदर्शक प्राप्त हुआ जिसने हमारे राष्‍ट्र की प्र‍गति की दिशा निर्धारित की। देश की आजादी के बाद यद्यपि हमने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, फिर भी गहरी जड़ें जमा चुकी औपनिवेशिक मानसिकता भारतीय चिंतन और मूल्‍यों के लिए एक बौद्धिक अवरोध बनी रही। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति, उसके बाद भारत के नागरिकों के लिए बनाए गए दंडात्मक कानून तथा विभिन्‍न नीतियों ने नियमों का एक जटिल जाल बुन दिया, जिसने देश की जनता की स्वतंत्रता को सीमित किया। 19वीं सदी की मानसिकता और 20वीं सदी के कानून 21वीं सदी की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते।

हमें अपनी राष्ट्रीय उपलब्धियों पर अपार गर्व है। फिर भी, जब हम मोदी सरकार की बारह वर्षों की विकास यात्रा पर नजर डालते हैं तो शासन व्‍यवस्‍था में एक स्पष्ट और सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है जिसने नागरिकों के जीवन को अनेक स्‍तरों पर प्रभावित किया है। वर्ष 2014 को हमारे देश की लोकतांत्रिक यात्रा के एक महत्‍वपूर्ण पड़ाव के रूप में याद किया जाएगा। यह वह वर्ष था जबकि देश में युवाओं की विशाल आबादी (Demographic Dividend) को देश के विकास में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण (Development Dividend)  मानने वाले तीव्र गति से विकसित हो रहे भारत की पूर्ण क्षमता को साकार करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेपों को और अधिक प्रभावी और सक्षम बनाया गया। 

देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व में संपूर्ण शासन व्‍यवस्‍था ने रिफॉर्म एक्‍सप्रेस से प्रेरित विकास की प्रक्रिया को तेजी से अपनाते हुए सशक्तिकरण की शक्ति का परिचय दिया है।  इसकी यात्रा को संक्षेप में इस प्रकार बताया जा सकता है कि यह जमीनी स्तर से ‘ईज ऑफ लिविंग’ को बढ़ावा देने का प्रयास है। साथ ही, ‘राष्ट्र प्रथम’ के दृष्टिकोण को शीर्ष स्तर से लागू करना भी इसका उद्देश्य है।

इसी प्रकार, भारत की न्यायिक सुधारों की यात्रा भी व्यापकता, नवाचार और गहन सामाजिक एवं सभ्यतागत प्रतिबद्धता की एक प्रेरक गाथा रही है। यह एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसमें विधायी आधुनिकीकरण, संस्थागत सुदृढ़ीकरण और डिजिटल नवाचार शामिल हैं।

‘ईज ऑफ जस्टिस’ हमारे लिए मात्र एक कथन नहीं है बल्कि यह एक सुधार का मंत्र है जिसमें न्‍याय के लिए अदालत की शरण में जाने वालों के लिए ‘ईज ऑफ इंगेजमेंट’, अधिवक्‍ताओं और न्‍यायाधिशों के लिए ‘ईज ऑफ वर्किंग’ तथा नागरिकों के लिए ‘ईज ऑफ अंडरस्‍टैंडिंग’ शाामिल है। 

न्‍याय हेतु अदालतों की शरण में जाने वाले नागरिकों की सुविधा के लिए DISHA योजना के तहत टेली-लॉ, न्‍याय बंधु और प्रो बोनो सेवाओं के विस्‍तार ने न्‍याय प्राप्ति को अत्‍यंत सुलभ और किफायती बना दिया है। कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के व्यापक नेटवर्क के माध्यम से संचालित टेली-लॉ कार्यक्रम के तहत ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के 112 लाख से अधिक लाभार्थियों को अदालतों में मुकदमे दायर करने  से पहले मुफ्त कानूनी सलाह प्राप्‍त करने का लाभ मिला है। ई-फाइलिंग और ई-सेवा केंद्र की सेवाओं ने अदालत में मुकदमा दायर करने वाले व्‍यक्तियों और न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के बीच नियमित संवाद एवं संपर्क को और अधिक सरल बनाया है। आधुनिक प्रौद्यो‍गिकी और सामुदायिक सहभागिता के समन्‍वय का भारत का यह अनूठा मॉडल वैश्विक स्‍तर पर एक मानक के रूप में उभरा है।

अधिवक्‍ताओं और न्‍यायाधीशों के लिए ‘ईज ऑफ वर्किंग’ को डिजिटल और भौतिक अवसंरचना दोनों में व्‍यापक विस्‍तार द्वारा उल्‍लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया गया है। चूंकि जिला एवं अधीनस्‍थ न्‍यायपालिका देश के अधिकांश नागरिकों के लिए न्‍यायिक व्‍यवस्‍था का पहला संपर्क बिंदु है, अत: इसे सुदृढ़ करना एक अनिवार्य और व्‍यावहारिक प्राथमिकता बनी हुई है। इसी दृष्टि से, केंद्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत न्‍यायालय भवन, अधिवक्‍ता कक्षों, आवासीय इकाइयों तथा डिजिटल अवसंरचना के निर्माण पर विशेष बल दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, देश में न्यायालय भवनों की संख्या वर्ष 2014 के 15,818 से बढ़कर 22,712 हो गई है तथा अत्‍याधुनिक एकीकृत न्‍यायालय परिसरों के विकास हेतु वर्ष 2014 के बाद से अब तक 9,400.40 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इसके अतिरिक्‍त, 7200 करोड़ रुपए के बजटीय परिव्‍यय से शुरू की गई ई-कोर्ट चरण-III परियोजना का उद्देश्‍य न्‍यायालयों को पूर्णत: डिजिटल, पेपरलेस और एआई-सक्षम न्‍याय वितरण संस्‍थानों में परिवर्तित करना है। विडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग सुविधाएं, वर्चुअल कोर्ट और अदालती कार्यवाही की लाईव स्‍ट्रीमिंग जैसी पहलों ने न्‍यायपालिका को लोगों के और करीब ला दिया है तथा न्‍याय वितरण को अधिक सुलभ, पारदर्शी और कुशल बनाया है। 

भारत जैसे  भाषाई विविधता वाले देश में नागरिकों के लिए ‘ईज ऑफ अंडरस्‍टैंडिंग’ का होना ‘ईज ऑफ जस्टिस’ के व्‍यापक ढांचे का एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण स्‍तंभ है। इस उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर (SUVAS) और भाषिणी (Bhashini) जैसे एआई- संचालित ने‍चुरल लैंग्‍वेज प्रोसेसिंग उपकरण उच्‍चतम न्‍यायालय के निर्णयों एवं आदेशों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं, जिससे आम जनता के लिए कानूनी जानकारी अधिक सुलभ हो रही है। इस प्रयास को और अधिक सशक्‍त बनाने के लिए राष्‍ट्रीय न्‍यायिक डेटा ग्रि‍ड (NJDG) जो एक सांख्किीय एवं विश्‍लेषणात्‍मक मंच है, 340 मिलियन से अधिक अदालती आदेशों एवं उनसे सं‍बंधित जानकारियों के विशलेषण तक एक क्लिक में पहुंच प्रदान करता है। साथ ही, सरकार शिक्षाविदों के सहयोग से सरल और सहज विधायी प्रारूपण (ड्राफ्टिंग) को बढ़ावा दे रही है ताकि कानूनों को अधिक सरल और आम नागरिकों के अनुकूल बनाया जा सके। 

भारत में औपनिवेशिक दंड संहिता के स्‍थान पर नई आपराधिक न्याय प्रणाली को लागू करने से दाण्डिक व्‍यवस्‍था के स्‍थान पर न्‍यायिक व्‍यवस्‍था स्‍थापित हुई है। ई-कोर्ट, ई-प्रोसीक्‍यूशन, ई-प्रिजन और ई-फोरेंसिक को अपराध तथा आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम (CCTNS) के साथ जोड़ना भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी कदम है। ‘न्याय श्रुति’ प्लेटफॉर्म ने वर्चुअल उपस्थिति और गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया को इतनी कुशलता से सुगम बनाया है कि जब कोई अदालत किसी नागरिक को जमानत देती है, तो डिजिटल जमानत आदेश तुरंत जेल पोर्टल पर पहुंच जाता है जिससे कागजी कार्रवाई और प्रशासनिक देरी समाप्त हो जाती है, जो पारंपरिक रूप से समय पर रिहाई में बाधा डालती थी। यह वास्तविक समय में केस डेटा के आदान-प्रदान को सक्षम बनाता है और एक अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) का मार्ग प्रशस्त करता है। 

उच्च न्यायपालिका की आवश्यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए भी सार्थक उपाय किए गए हैं। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या वर्ष 2014 के 906 से बढ़कर 1122 हो गई है। उच्‍चतम न्यायालय में न्‍यायाधीशों की संख्‍या भी 31 थी जिसे वर्ष 2019 में बढ़ाकर 34 कर दिया गया है तथा उच्‍चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 के माध्यम से इसे बढ़ाकर 38 कर दिया गया है। पिछले 12 वर्षों में देश के उच्च न्यायालयों में सामाजिक रूप से विविध पृष्ठभूमि वाले 1175 न्यायाधीशों की तथा  उच्‍चतम न्यायालय में 77 न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कार्यपालिका और न्‍यायपालिका के समन्वित प्रयासों को दर्शाती है। 

यह स्पष्ट है कि अनावश्यक कानूनों की जटिलता संबंधित पक्षों पर अनावश्‍यक बोझ डालती है। 40,000 से अधिक अनावश्‍यक अनुपालनों (Compliances) को समाप्‍त करने तथा औपनिवेशिक युग के 1725 निरर्थक और अप्रचलित कानूनों को निरस्त करने से विभिन्न क्षेत्रों में ईज ऑफ डुइंग बिजनेस में उल्‍लेखनीय सुधार हुआ है। साथ ही, आर्बिट्रेशन संबंधी कानूनों को सुदृढ़ करना, इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर जैसी संस्‍थाओं की स्‍थापना तथा मेडिएशन एक्‍ट 2023 के माध्‍यम से वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को बढ़ावा देना तथा इस क्षेत्र में भारत के वैश्विक नेतृत्व को दर्शाता है।

वर्तमान में जबकि विश्‍व जटिल भू-राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक अनिश्चितताओं से गुजर रहा है, भारत के विधिक और राजनयिक नेतृत्‍व ने BRICS देशों के न्‍यायमंत्रियों की बैठक, 2026 के दौरान मेडिएशन और आर्बिट्रेशन को विवाद समाधान के लिए अधिक प्रभावी और सुलभ माध्‍यम के रूप में स्‍थापित करने हेतु एक सामूहिक प्रतिबद्धता के रूप में गांधीनगर घोषणा पत्र को अपनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे वैश्विक सहयोगों का उद्देश्‍य न्‍यायालयों में लंबित मामलों की संख्‍या को कम करना, व्‍यापार और निवेश के लिए स्थिर एवं सुविचारित परिवेश को सृजित करने पर अत्‍यधिक बल देना तथा अनावश्‍यक मुकदमेबाजी से बचना है। 

ये सभी पहलें एक साझा दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि न्याय प्राप्‍त करने की इच्‍छा रखने वाले प्रत्‍येक व्‍यक्ति को एक जवाबदेह, सुलभ और सहयोगी शासन व्‍यवस्‍था प्राप्‍त हो। जैसे-जैसे हमारा देश माननीय प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित विकसित भारत @2047 की यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, हम एक ऐसे भावी न्‍याय प्रणाली के निर्माण के प्रति दृढ़ संकल्पित हैं जो लचीली, नवोन्‍मेषी, समावेशी और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक आकांक्षाओं से प्रेरित हो।

(लेखक भारत सरकार में केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), और संसदीय मामलों के राज्य मंत्री हैं)

जल शक्ति: विकसित भारत की यात्रा को दे रही है गति : सीआर पाटिल

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

क्या आप जानते हैं कि जल जीवन मिशन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम है? या फिर स्वच्छ भारत मिशन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण स्वच्छता अभियान है, जिसने लोगों की सोच और व्यवहार में अभूतपूर्व बदलाव लाया है? और क्या आपको पता है कि नमामि गंगे आज दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी नदी पुनर्जीवन योजनाओं में शामिल है?

ये सभी पहल केवल सरकारी योजनाएं नहीं हैं, बल्कि इस बात का उदाहरण हैं कि 145 करोड़ आबादी वाला भारत किस तरह पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

जब इतिहासकार भारत की विकास यात्रा को देखेंगे, तो संभव है कि वे पिछले 12 वर्षों को वह दौर बताएं, जब ‘जल’ देश के विकास का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन गया। मानव सम्मान, आर्थिक विकास, जनस्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण संरक्षण पर पानी जितना प्रभाव डालता है, उतना शायद ही कोई दूसरा क्षेत्र डालता हो। लेकिन कई दशकों तक भारत में जल संबंधी समस्याओं का समाधान अलग-अलग और बिखरे हुए तरीकों से किया जाता रहा। पिछले कुछ वर्षों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए एकीकृत, गंभीर और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाया गया, जिसका नेतृत्व स्वयं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किया।

पिछले 12 वर्षों में जल क्षेत्र में जितने बड़े पैमाने पर निवेश और काम हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। लेकिन इस बदलाव की अहमियत केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। आज पानी को पूरे देश की साझा प्राथमिकता माना जा रहा है, जिसमें सभी विभाग, राज्य, समुदाय और आने वाली पीढ़ियाँ भागीदार हैं। पहले जल क्षेत्र को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती थी, लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने जल क्षेत्र की योजना, प्रबंधन और सेवाओं से जुड़ी वर्षों पुरानी कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी उठाई।

इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण जल जीवन मिशन है। जब यह मिशन शुरू हुआ था, तब केवल लगभग 3.23 करोड़ ग्रामीण परिवारों, यानी करीब 17 प्रतिशत ग्रामीण घरों में ही नल से जल की सुविधा थी। आज 15.8 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों, यानी 81 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुँच चुका है। सरकार का लक्ष्य 2028 तक 100 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को यह सुविधा उपलब्ध कराना है। लाखों परिवारों, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए यह केवल पानी की सुविधा नहीं है, बल्कि उनके जीवन में आया एक बड़ा बदलाव है।

अध्ययनों के अनुसार, पहले भारत की ग्रामीण महिलाओं को हर साल पानी लाने में अरबों घंटे खर्च करने पड़ते थे। अब घर-घर नल से पानी पहुंचने के कारण हर दिन 5.5 करोड़ से अधिक व्यक्ति-घंटों की बचत हो रही है। जो समय पहले पानी लाने में लगता था, अब उसका उपयोग पढ़ाई, रोजगार, बच्चों की देखभाल और आय बढ़ाने वाले कामों में हो रहा है। साथ ही, सुरक्षित पेयजल मिलने से पानी से फैलने वाली बीमारियाँ कम हुई हैं, जिससे लोगों का इलाज पर होने वाला खर्च भी घटा है। इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन ने भी देश में बड़ा बदलाव लाया है। इस अभियान ने दिखाया कि लोगों की सोच में बदलाव, जनभागीदारी और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति मिलकर बड़े स्तर पर परिवर्तन ला सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की वजह से 2014 से अक्टूबर 2019 के बीच दस्त से होने वाली 3 लाख से अधिक मौतों को रोका जा सका। घर-घर शौचालय बनने से करोड़ों ग्रामीण महिलाओं को सम्मान, निजता और सुरक्षा मिली। इस तरह स्वच्छता केवल एक सुविधा नहीं रही, बल्कि जनस्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान का एक बड़ा जनआंदोलन बन गई। गांवों को खुले में शौच से मुक्त बनाने के बाद अब देश स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) 2.0 के तहत ठोस और तरल कचरे के वैज्ञानिक एवं टिकाऊ प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत ने जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज के क्षेत्र में भी दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक चलाया है। 6 सितंबर 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सूरत से “जल संचय जन भागीदारी” अभियान की शुरुआत की थी। इसके तहत 31 मई 2026 तक देशभर में 1.55 करोड़
से अधिक वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण किया जा चुका है। यह अभियान दिखाता है कि जल संरक्षण में लोगों की भागीदारी और सामूहिक प्रयास कितने प्रभावी हो सकते हैं।

इन प्रयासों का सकारात्मक असर अब भूजल की स्थिति में भी दिखाई देने लगा है। हाल के आकलनों के अनुसार, देश के कई हिस्सों में भूजल का स्तर बेहतर हुआ है और जिन क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा था, उनकी संख्या में भी कमी आई है। यह इस बात का
प्रमाण है कि लगातार किए गए जल संरक्षण के प्रयास और जनभागीदारी मिलकर पर्यावरण पर बढ़ते दबाव को भी कम कर सकते हैं।

साथ ही, भारत ने लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय जल परियोजनाओं को भी तेज़ी से आगे बढ़ाया है। देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना, केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना, तेजी से आगे बढ़ रही है। इसका उद्देश्य बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक पानी पहुंचाना है। इसके अलावा, राज्यों के भीतर नदियों को जोड़ने की कई परियोजनाओं में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में नमामि गंगे कार्यक्रम ने यह साबित किया है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।

पिछले एक दशक में 4,260 मिलियन लीटर प्रतिदिन(एमएलडी) सीवेज शोधन क्षमता विकसित की गई है। अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से निकलने वाला जैविक प्रदूषण (बीओडी) 2017 में 26 टन प्रतिदिन से घटकर 2024 में 10.75 टन प्रतिदिन रह गया है। वहीं, उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी (एफ्लुएंट) का उत्सर्जन भी 349 एमएलडी से घटकर 265.56 एमएलडी हो गया है।

आज निगरानी के आंकड़े बताते हैं कि गंगा नदी में सभी निगरानी केंद्रों पर पानी का पीएच स्तर और घुली हुई ऑक्सीजन (डीओ) स्नान योग्य मानकों के अनुरूप है। इसके अलावा, देशव्यापी आकलन के अनुसार गंगा में लगभग 6,324 गंगा डॉल्फ़िन पाई गई हैं, जो नदी के बेहतर होते पर्यावरणीय स्वास्थ्य का संकेत है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत की जल यात्रा दुनिया के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख बनकर सामने आई है। 21वीं सदी की जल संबंधी चुनौतियों का समाधान अलग-अलग प्रयासों से नहीं हो सकता। पेयजल, स्वच्छता, नदियों का संरक्षण, सिंचाई की बेहतर व्यवस्था, भूजल रिचार्ज, इस्तेमाल किए गए पानी का दोबारा उपयोग और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी—इन सभी को एक-दूसरे से जुड़ी व्यवस्था के रूप में देखना होगा।

जलवायु परिवर्तन के दौर में यह समग्र दृष्टिकोण और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि दुनिया भर में जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत के सामने यह चुनौती और भी बड़ी है। दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, लेकिन देश के पास दुनिया के कुल मीठे पानी के संसाधनों का केवल लगभग 4 प्रतिशत ही है।

तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिक विकास और बदलते मौसम के पैटर्न आने वाले वर्षों में इन जल संसाधनों पर और अधिक दबाव डालेंगे। इसलिए आज जल क्षेत्र में किया जा रहा निवेश केवल विकास पर होने वाला खर्च नहीं है, बल्कि देश को भविष्य की चुनौतियों के लिए मजबूत बनाने में किया जा रहा दीर्घकालिक निवेश है। पिछले एक दशक में मिली सफलता यह दिखाती है कि जब निस्वार्थ नेतृत्व, जवाबदेह शासन और जनता की सक्रिय भागीदारी एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए साथ आते हैं, तो बड़े और सकारात्मक बदलाव संभव हो जाते हैं।

जैसे-जैसे भारत विकसित भारत की ओर आगे बढ़ रहा है, जल उसकी विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। जल सुरक्षित भारत का मतलब केवल सभी को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना नहीं है। इसका अर्थ है महिलाओं का सम्मान, परिवारों का बेहतर स्वास्थ्य, किसानों की अधिक उत्पादकता, शहरों का टिकाऊ विकास और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना।

पिछले 12 वर्षों में भारत के जल क्षेत्र में जो बड़ा बदलाव आया है, वह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण है। उनके संकल्प ने पानी को केवल एक विकास संबंधी चुनौती नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण और विकसित भारत का एक मजबूत माध्यम बना दिया।

आगे की राह में लगातार प्रयास करना आवश्यक होगा। इसमें तकनीक, आंकड़ों और नवाचार की बड़ी भूमिका रहेगी। हमारा लक्ष्य सभी क्षेत्रों में पानी के बेहतर और कुशल उपयोग को बढ़ावा देना, इस्तेमाल किए गए पानी का पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण बढ़ाना, स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को मजबूत करना और जल संरक्षण में आम नागरिकों की भागीदारी बढ़ाना है।

(लेखक भारत सरकार में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री हैं।)

मोदी के कार्यकाल के बारह वर्षों ने समूची दुनिया को भारत को अलग नज़रिए से देखने के लिए प्रेरित किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

उन्होंने स्वयं को एक अत्यंत बेहतरीन संकट-प्रबंधक के रूप में प्रमाणित किया है। केवल उनके दृढ़ संकल्प, साहस और सावधानीपूर्वक की गई कार्रवाई के बल पर ही 1.4 बिलियन भारतीयों का महामारी जैसी सदी की भीषणतम आपदा से सुरक्षित निकालना तथा उस आपदा को अवसर में बदलना संभव हुआ। वह अब भारत का नेतृत्व ऐसे समय में कर रहे हैं, जब वैश्विक भूराजनीतिक और भू-आर्थिक व्यवस्था खतरनाक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है।


पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए। यह उपलब्धि उनकी भी है और भारत की भी: उनसे पहले किसी ने भी इस लोकतंत्र में लगातार इतने लंबे समय तक शासन नहीं किया और न ही इतनी प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच किसी ने लगातार तीन बार चुनावी जीत हासिल की है। हालाँकि, रिकॉर्ड से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने क्‍या कार्य किया है : अपने कार्यकाल के “प्रत्‍येक मिनट” के पूरे “साठ सेकेंड का भारत के लिए पूरी ऊर्जा के साथ उपयोग करते हुए उसे सार्थक बनाया”, उनके इन बारह वर्षों का प्रत्‍येक वर्ष 365 दिनों की उपलब्धियों से चिह्नित रहा, और इसी दौरान उस नए, गतिशील भारत का निर्माण हुआ, जिसे आज दुनिया एक अलग नजरिए से देख और समझ रही है।


मैंने अपनी कामकाजी ज़िंदगी फील्ड में, राजधानियों में, बोर्ड और कॉन्फ्रेंस रूम में तथा संयुक्त राष्ट्र में बितायी है—जहाँ देशों के बारे में दुनिया अपनी राय कायम करती है। बीते एक दशक जो परिवर्तन आया है, वह मेरे द्वारा देखे गए परिवर्तनों में सबसे अधिक उल्लेखनीय है: भारत के प्रति पहले जो उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण हुआ करता था, उसकी जगह अब प्रतिस्पर्धी रुचि, सीखने की इच्छा ने ले ली है, दुनिया भारत के उस परिवर्तन को विस्मय से देख रही है, जिसमें वह एक ‘सिद्धांतों के आधार पर आपत्ति दर्ज करने वाले’ और ‘व्यवस्था को स्वीकार करने वाले’ देश की जगह अब ‘व्यवस्था को आकार देने वाले’ देश के रूप में उभरा है, आज भारत बहुआयामी कूटनीतिक सहभागिता और रणनीतिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ रहा है। वह न केवल अपने प्रभाव का उपयोग अपने विचारों के समर्थन में कर रहा है, बल्कि अपने विचारों के समर्थन को भी शक्ति में परिवर्तित कर रहा है।

दुनिया इस शख्सियत का सही आकलन करती है: उन्हें सत्ता विरासत में नहीं मिली; उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वोच्च पद तक का सफर बिना किसी पारिवारिक नाम के सहारे, रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर बीते बचपन से तय किया; उन्होंने भारत के कोने-कोने की यात्रा की, लोगों को समझा, उनके साथ बैठकर भोजन किया, उनके सुख-दुःख में भागीदार बने और जमीनी स्तर से अपना राजनीतिक जीवन निर्मित किया वंशानुगत सत्ता और विशेषाधिकार प्राप्त उत्तराधिकार से ऊब चुकी दुनिया में, ऐसे नेता की छवि अधिक भरोसेमंद होती है, जिन्‍होंने अपनी पहचान स्वयं गढ़ी हो। वह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने देश की सभ्यतागत पहचान को अपनी पहचान के रूप में धारण किया है, न कि उसके प्रति क्षमायाचना का भाव रखा है अथवा विदेशी वेशभूषा और दृष्टिकोण अपनाकर स्वयं को किसी अन्‍य रूप में प्रस्तुत किया है। वैश्विक जनमत का आकलन करने वाले सर्वेक्षण इस बात से सहमत है: वर्षों से श्री मोदी लोकतांत्रिक नेताओंकी मॉर्निंग कंसल्ट रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर बने हुए हैं, उनकी स्वीकृति दो-तिहाई से अधिक रही है, जो पश्चिमी नेताओं से काफी आगे है। प्यू के सर्वेक्षणों के अनुसार, दस में से आठ भारतीय उनके प्रति अनुकूल दृष्टिकोण रखते हैं, और वे अपने देश की दिशा से अधिकांश परिपक्व लोकतंत्रों की तुलना में अधिक संतुष्ट हैं। सरकारें इस बात से सहमत हैं : उन्‍होंने 19 विदेशी संसदों को संबोधित किया है और लगभग 30 देशों के राजकीय सम्मान प्राप्त किए हैं, जिनमें से कई उन देशों के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हैं।

अपने लोगों से वह सीधे संवाद करते हैं, हर महीने ‘मन की बात’ के माध्यम से अपने मन और हृदय की बात खुलकर रखते हैं; जबकि अन्य देशों के नेताओं के साथ उनका व्यवहार ऐसा है, जिसने वाशिंगटन और मॉस्को, खाड़ी देशों और यूरोप—सबको एक साथ किसी अद्भुत ‘जादुई प्रभाव’ के साथ जोड़कर रखा है।

भारत अब मॉडल आयात करने के बजाय उन्हें निर्यात कर रहा है। उसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम भुगतान को संचालित करती है और लाखों खातों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाती है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, एक दशक में 25 करोड़ लोग गरीबी के चंगुल से बाहर आए हैं: ‘अंत्योदय’, जो राज्य के संचालन का आधारभूत सिद्धांत है, केवल एक नारा भर
नहीं, बल्कि ऐसा सिद्धांत है, जो सुनिश्चित करता है कि कोई भी पीछे न छूटे और सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक पहले सहायता पहुँचे, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के ‘एजेंडा 2030’ ने भी आह्वान किया है। यदि किसी नेता ने इस सिद्धांत के अनुरूप वास्तव में शासन किया है, तो वह प्रधानमंत्री मोदी हैं। महामारी के दौरान भारत ने 2 बिलियन से अधिक टीके लगाए, 800 मिलियन लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया, लगभग 100 देशों को वैक्सीन और 150 देशों को दवाएँ उपलब्ध कराईं। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ के रूप में नामित किया, जबकि गेट्स फाउंडेशन ने गरीबी, भूख, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, ऊर्जा और जलवायु में मापनीय प्रगति के लिए उन्हें सतत विकास लक्ष्यों के ‘ग्लोबल गोलकीपर’ के रूप में नामित किया; यूनिसेफ और यूएन विमेन ने भी महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण से संबंधित उनके प्रयासों
की सराहना की है, जिनमें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण जैसी पहलें शामिल हैं।

उनके लक्षित और बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम महिलाओं और लड़कियों के जीवन में —घर से कॉलेज तक, छोटे कियोस्क से कॉर्पोरेट जगत तक, स्थानीय शासन से संसद तक संरचनात्मक बदलाव लाए हैं। उन्होंने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को नैतिक और सामाजिक न्याय की अनिवार्यता के रूप में आगे बढ़ाया है, जो देश की आधी आबादी की क्षमता को सक्रिय करने के लिए अपरिहार्य है। कोई भी राष्ट्र सशक्त महिलाओं के बिना आगे नहीं बढ़ सकता; भारत अब इस सत्य को एक महाद्वीप-स्तरीय व्यापकता के साथ लागू कर रहा है।

उन्होंने भारतीयों के भीतर ‘भारतीय होने’ का गर्व पुनः स्थापित किया है—देश के भीतर भी और दुनिया भर में फैले 3.5 करोड़ प्रवासी भारतीयों में भी – जो विश्व का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। राष्ट्र एकजुट होकर आगे बढ़ा है: महामारी के दौरान सामूहिक संकल्प में, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद सशस्त्र बलों के समर्थन में, और महाकुंभ में, जहाँ 60 करोड़ से अधिक श्रद्धालु मानव इतिहास के सबसे बड़े समागम का हिस्सा बने। ये सभी प्रतीक समाज को एक सूत्र में बाँधने वाली बातों को दर्शाते हैं: राष्ट्रपति भवन में जनजातीय महिला; क्षेत्र-दर-क्षेत्र उनका पगड़ी, टोपी या जनजातीय लोगों के पारंपरिक सिरोभूषण को सम्मान और स्नेह के साथ धारण करना; ‘मन की बात’ और पद्म पुरस्कारों के माध्यम से गाँवों के लोगों को नायक बनाना; आज़ादी के अमृत महोत्सव के तहत 200 मिलियन घरों में तिरंगे का फहराना; ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष का उत्सव; स्वच्छ भारत अभियान के तहत 110 मिलियन शौचालयों का निर्माण,जो एक जन-आंदोलन बना; और एक भारत, विविधता को एक सूत्र में पिरोते हुए हर क्षेत्र का सम्मान किया गया है।

मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने भारत की अग्रणी शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया और उसे व्यवहार में भी उतारा है: सैन्य और आर्थिक शक्ति, परमाणु और अंतरिक्ष क्षमताएँ, वैश्विक व्यवस्थाओं में निर्णायक भूमिका तथा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं में नियमों, मानकों और नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता, उद्देश्यपूर्ण ढंग से निर्मित और सफलतापूर्वक विकसित किया गया कूटनीतिक, अनुसंधान एवं विकास और तकनीकी संसाधनों का मजबूत आधार, साथ ही भारत की सॉफ्ट पावर को पहले से कहीं अधिक प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि वैश्विक स्तर पर वह संवाद के माध्यम से शांति और सुरक्षा के पक्षधर है, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर —उरी से लेकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ तक—उनकी ‘कतई बर्दाश्‍त न करने की नीति’ है।

सबसे बढ़कर, उन्होंने स्वयं को एक अत्यंत बेहतरीन संकट-प्रबंधक के रूप में प्रमाणित किया है। केवल उनके दृढ़ संकल्प, साहस और सावधानीपूर्वक की गई कार्रवाई के बल पर ही 1.4 बिलियन भारतीयों का महामारी जैसी सदी की भीषणतम आपदा से सुरक्षित निकालना तथा उस आपदा को अवसर में बदलना संभव हुआ; मैं यह सोचकर सिहर उठती हूँ कि यदि वह नेतृत्वकारी भूमिका में न होते, तो क्या स्थिति होती। वह अब भारत का नेतृत्‍व ऐसे समय में कर रहे हैं, जब वैश्विक भूराजनीतिक और भू-आर्थिक व्यवस्था खतरनाक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है, दो बड़े युद्ध चल रहे हैं और प्रमुख शक्तियाँ आत्मकेंद्रित रुख अपना रही हैं। इसके बावजूद वे भारत को शांत और स्थिर बनाए रख रहे हैं, उसकी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा कर रहे हैं, और उसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।

चमत्कार यह है कि वह दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले, युवा-प्रधान, जटिल, संघीय और आंतरिक रूप से प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र को बदलने का साहस रखते हैं—ऐसा लोकतंत्र जो कई तरह के वीटो-शक्ति रखने वालों, निहित स्वार्थों और संकीर्ण दृष्टिकोण वालों, राष्ट्र-विरोधी विपक्षी नेताओं से भरा हुआ है, जो अराजकता की साजिश रचते हैं, विदेशी सूचना हेरफेर और हस्तक्षेप को न्‍यौता देते हैं और महत्वपूर्ण सुधारों को बाधित करते हैं।

वैश्विक स्तर पर यह परिवर्तन केवल स्थिति में ही नहीं, बल्कि व्यवहार और दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। भारत अब सम्मेलन आयोजित करता है, जबकि पहले वह केवल प्रतिभागी होता था, और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’—‘पूरा विश्व एक परिवार है’—अब केवल एक नारा भर नहीं, बल्कि उपलब्धियों के रूप में साकार हुआ सिद्धांत बन गया है। भारत विश्व का लघु-प्रतिरूप भी है और व्यापक रूप भी: वह अपने भीतर जो समस्याएँ हल करता है, वही समाधान पूरी दुनिया के लिए प्रमाणित करता है और वैश्विक सार्वजनिक कल्याण के रूप में प्रस्तुत करता है। इसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को ग्‍लोबल साउथ और ग्‍लोबल नॉर्थ दोनों में साझा किया जा रहा है; इसके जी-20 नेतृत्व के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता मिली; यह अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का नेतृत्व करता है; इसके ‘पंचामृत’ जलवायु संकल्प ‘मिशन लाइफ़’ के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विरासत की भावना से जुड़े हुए हैं। भारत ने विकासशील देशों का पहला ग्‍लोबल एआई समिट आयोजित किया; चौथी औद्योगिक क्रांति में, जैसे चंद्रमा पर मिशन के संदर्भ में, अब भारत केवल अनुगामी नहीं रहा, बल्कि अग्रणी भूमिका निभा रहा है और अपने समाधान पूरी दुनिया के लिए प्रस्तुत कर रहा है।

वैश्विक स्तर पर यह परिवर्तन केवल स्थिति में ही नहीं, बल्कि व्यवहार और दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। भारत अब सम्मेलन आयोजित करता है, जबकि पहले वह केवल प्रतिभागी होता था, और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’—‘पूरा विश्व एक परिवार है’—अब केवल एक नारा भर नहीं, बल्कि उपलब्धियों के रूप में साकार हुआ सिद्धांत बन गया है। भारत विश्व का लघु-प्रतिरूप भी है और व्यापक रूप भी: वह अपने भीतर जो समस्याएँ हल करता है, वही समाधान पूरी दुनिया के लिए प्रमाणित करता है और वैश्विक सार्वजनिक कल्याण के रूप में प्रस्तुत करता है। इसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को ग्‍लोबल साउथ और ग्‍लोबल नॉर्थ दोनों में साझा किया जा रहा है; इसके जी-20 नेतृत्व के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता मिली; यह अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का नेतृत्व करता है; इसके ‘पंचामृत’ जलवायु संकल्प ‘मिशन लाइफ़’ के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विरासत की भावना से जुड़े हुए हैं। भारत ने विकासशील देशों का पहला ग्‍लोबल एआई समिट आयोजित किया; चौथी औद्योगिक क्रांति में, जैसे चंद्रमा पर मिशन के संदर्भ में, अब भारत केवल अनुगामी नहीं रहा, बल्कि अग्रणी भूमिका निभा रहा है और अपने समाधान पूरी दुनिया के लिए प्रस्तुत कर रहा है।

जिस दुनिया को मैंने अपने करियर के दौरान देखा, वह भारत को उसकी अपनी अधूरी संभावनाओं के आधार पर आंकती थी। लेकिन इस दशक में भारत ने स्वयं को अब ‘गंतव्य भारत’ के आधार पर आंकना शुरू कर दिया है। इस नेतृत्व के लिए सबसे मजबूत तर्क अभी आगे है: भारत पृथ्वी पर मानव विकास, प्रयास और पूर्णता की सबसे विशाल प्रयोगशाला है, जिसका कार्य अत्यंत व्यापक है और अभी अधूरा है—इसी कारण इतने बड़े देश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है। उन्होंने सबसे लंबे समय तक पद संभाला है; वह सबसे अलग दिखाई देते हैं; उनका रिकॉर्ड असाधारण है। अब जो बाकी है, वह भारत शताब्दी का जनादेश है।

(लेखिका संयुक्त राष्ट्र की पूर्व सहायक महासचिव और यूएन विमेन की पूर्व उप कार्यकारी निदेशक हैं)

हेल्दी एजिंग के लिए योग: ज़िंदगी के हर साल को बेहतर कैसे बनाएं

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत की सदियों से एक खास पहचान रही है। यह पहचान ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के महान विचार में छिपी है – यानी पूरी दुनिया को एक यूनिट और सभी जीवों को एक मानना। भारत के इसी आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित, योग एक पुराना विज्ञान है जो शरीर, मन और आत्मा के बीच बैलेंस बनाता है। योग के बेसिक एलिमेंट्स में आसन (फिजिकल पोस्चर), प्राणायाम (सांस लेने की तकनीक) और मेडिटेशन शामिल हैं। इन एलिमेंट्स के कॉम्बिनेशन से फिजिकल फिटनेस, मेंटल क्लैरिटी और इमोशनल बैलेंस बेहतर होता है।

27 सितंबर, 2014 को यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली को संबोधित करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दुनिया को रहने लायक और सस्टेनेबल बनाने के मकसद से लोगों की लाइफस्टाइल में बदलाव लाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। उन्होंने कहा था कि योग मन और शरीर, सोच और काम, संयम और संतोष, इंसान और प्रकृति के बीच तालमेल और हेल्थ और वेल-बीइंग से जुड़े एक होलिस्टिक विज़न का संगम है। माननीय प्रधानमंत्री के अनुरोध पर, 11 दिसंबर 2014 को, यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली ने 174 से ज़्यादा देशों के एक जॉइंट प्रस्ताव को मंज़ूरी दी, जिसमें 21 जून को ‘इंटरनेशनल योग दिवस’ घोषित किया गया। 2015 से, दुनिया भर में लाखों लोग योग करने के लिए पब्लिक जगहों पर एक साथ आ रहे हैं, इस तरह हमारे पुराने ज्ञान को एक ग्लोबल मूवमेंट में बदल रहे हैं।

इस साल 21 जून को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कोलकाता में योग दिवस समारोह की अगुवाई करेंगे, जबकि मैं इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए लद्दाख में रहूँगा। पिछले कई सालों में, मैंने भी योग और पंचकर्म के नियमित अभ्यास के लाभों का अनुभव किया है। इन दोनों को अक्सर सिस्टर साइंस कहा जाता है। इन बहुत समृद्ध करने वाले व्यक्तिगत अनुभवों ने मुझे योग और मानव कल्याण पर इसके गहरे प्रभाव पर अपने विचार साझा करने के लिए प्रेरित किया है।

योग: भारत की एक शाश्वत विरासत
‘योग’ का शाश्वत अभ्यास, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण से जुड़ा है, माना जाता है कि हमारी सभ्यता की शुरुआत के साथ ही शुरू हो गया था। योग की परंपरा में, जहाँ भगवान शिव को पहला योगी या ‘आदि योगी’ और पहला गुरु या ‘आदि गुरु’ माना जाता है, वहीं महर्षि पतंजलि को ‘शास्त्री योग का जनक’ माना जाता है क्योंकि उन्होंने ‘योग सूत्रों’ में योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से शामिल किया था। महर्षि पतंजलि का तमिलनाडु के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध है। ऐसा माना जाता है कि उनकी शारीरिक जीव समाधि भी तिरुपत्तूर में है।

हमारे पूजनीय ऋषियों और मुनियों ने दुनिया को योग का अनमोल खजाना दिया। सालों के ध्यान, तपस्या और आध्यात्मिक अभ्यास के बाद, इन ऋषियों और मुनियों ने एक पूरा सिस्टम बनाया जो शरीर, मन और आत्मा को जोड़ता है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने योग के तीन महान रास्ते बताए हैं – ज्ञान योग, जो ज्ञान और समझ का रास्ता है; कर्म योग, जो निस्वार्थ सेवा और सही काम का रास्ता है; और भक्ति योग, जो शुद्ध प्रेम और भक्ति का रास्ता है। उन्होंने सिखाया कि तीनों रास्ते आखिरकार परम सत्य की प्राप्ति में मिल जाते हैं।

आज, योग भूगोल, संस्कृति और धर्म की सीमाओं को पार कर चुका है। यह भारत के ऋषियों के शाश्वत ज्ञान और मानवता की भलाई में उनके शाश्वत योगदान का जीता-जागता सबूत है।

स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग
हर साल, हमारे देश में पूरे जोश और एक सार्थक थीम के साथ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम ‘स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग’ का खास महत्व है। हेल्थकेयर और पब्लिक हेल्थ सिस्टम में अच्छी तरक्की और मौत की दर में कमी की वजह से, दुनिया भर में लोगों की औसत उम्र बढ़ी है। भारत भी इस बड़े डेमोग्राफिक बदलाव को देख रहा है। यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023’ के मुताबिक, 2050 तक भारत में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति 60 साल से ज़्यादा उम्र का होगा।

लंबी उम्र के इस अनमोल तोहफे का जश्न मनाते हुए, समाज की यह भी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह यह पक्का करे कि ज़िंदगी के इन ज़्यादा सालों का मतलब सिर्फ़ उम्र बढ़ना ही नहीं है, बल्कि उन सालों में ज़िंदगी की क्वालिटी भी बेहतर हो। इस संदर्भ में, इंटरनेशनल योगा डे (IDY) 2026 की थीम – “स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग” – एक बहुत ही सही संदेश के तौर पर सामने आई है।

इस डेमोग्राफिक बदलाव की वजह से भारत में ‘सिल्वर इकॉनमी’ बढ़ी है, जो मुख्य रूप से हेल्थकेयर से जुड़े सामान और सर्विस और सीनियर सिटिज़न्स की ज़रूरतों पर फोकस करती है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इसकी कीमत अब लगभग 73,000 करोड़ रुपये है। आने वाले सालों में इस सेक्टर के काफी बढ़ने की उम्मीद है।

आज के दौर में बढ़ती उम्र की असलियत ने दिखाया है कि कैसे बुज़ुर्ग लोग अलग-अलग तरह की चुनौतियों और कमज़ोरियों के एक मुश्किल जाल से जूझ रहे हैं। इस बारे में, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन ने भी दुनिया भर में बुज़ुर्गों में नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों, मेंटल हेल्थ की चिंताओं और सोशल आइसोलेशन के बढ़ते बोझ पर बार-बार ज़ोर दिया है।
मेरा यह भी मानना ​​है कि लोगों को कम उम्र से ही योग से जोड़ना आज की ज़रूरत है। योग की प्रैक्टिस जितनी जल्दी शुरू की जाएगी, ज़िंदगी भर उतने ही ज़्यादा फ़ायदे मिलेंगे। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में योग को हेल्थ, वेल-बीइंग और वैल्यूज़-बेस्ड एजुकेशन के एक ज़रूरी हिस्से के तौर पर खास जगह दी गई है। यह युवाओं को योग से जोड़ने की दिशा में एक पॉज़िटिव कदम है। इससे स्टूडेंट्स में डिसिप्लिन, कॉन्संट्रेशन, इमोशनल बैलेंस और एक हेल्दी लाइफस्टाइल को ज़रूर बढ़ावा मिलेगा।

इस तरह, हम पाते हैं कि दुनिया भर में बदलते डेमोग्राफिक हालात के बीच, भारत दुनिया को सफल तरक्की का एक अनोखा मॉडल दे रहा है – एक ऐसा मॉडल जो पुरानी सभ्यताओं के ज्ञान और मॉडर्न साइंटिफिक सबूतों के बीच एक अच्छा तालमेल बनाता है – और वह है योग।

योग – आज के ज़माने में बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्याओं का समाधान
आज, मॉडर्न साइंस हमारे ऋषियों और योगियों की हमेशा रहने वाली बातों को सही साबित कर रहा है, जिन्होंने अनुशासित जीवन, योग और आध्यात्मिक अभ्यास से बहुत लंबी उम्र, स्फूर्ति और मानसिक स्पष्टता हासिल की। ​​हाल के सालों में योग के इलाज वाले पहलुओं में एकेडमिक और क्लिनिकल दिलचस्पी तेज़ी से बढ़ी है।

नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ (NIH) और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसे बड़े संस्थानों और लैंसेट जैसे कई जाने-माने रिसर्च जर्नल्स ने अपनी रिसर्च में दिखाया है कि रेगुलर योग करने से बुज़ुर्गों में बैलेंस, फ्लेक्सिबिलिटी और मोबिलिटी बेहतर होती है। इससे उनके गिरने का डर और खतरा बहुत कम हो जाता है। रिसर्च से यह भी पता चला है कि योग हड्डियों की डेंसिटी बढ़ाता है, आर्थराइटिस का दर्द कम करता है, सांस लेने की क्षमता में सुधार करता है, ब्लड प्रेशर को स्थिर करता है और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ को बेहतर बनाता है।

फसल से आगे : किसान की नई आर्थिक आज़ादीभारत की नई कृषि यात्रा : फसल से आगे, समृद्धि की ओर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। पहले हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि देश में अनाज की कमी न हो, किसी तरह भूख से बचाव हो जाए। आज मोदी जी की दूरदर्शिता और किसान‑हितैषी नीतियों ने कृषि को सिर्फ “उत्पादन का क्षेत्र” नहीं रहने दिया, बल्कि किसान की समृद्धि, जोखिम‑सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का समन्वित आधार बना दिया है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियों का फोकस केवल “कितना उत्पादन” पर नहीं, बल्कि “किसान की वास्तविक आय कितनी, खेती कितनी टिकाऊ, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत” पर आ गया है। इसी सोच से दलहन–तिलहन मिशन, कॉटन मिशन, प्राकृतिक खेती मिशन, प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना, खेत बचाओ अभियान, डिजिटल कृषि और शोध–नवाचार; सबको एक ही व्यापक दृष्टि से जोड़ा जा रहा है।

उत्पादन से आगे : आय, सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में 3765.63 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर है, जो देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है। धान, गेहूँ, मक्का, दालें और तिलहन- सभी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। यह केवल ज्यादा पैदावार नहीं, बल्कि कुल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए विस्तार और मजबूती का प्रमाण है। साथ‑साथ, मोदी सरकार ने किसान की जोखिम‑सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM‑KISAN) के तहत अब तक 22 किस्तों के माध्यम से किसानों के खातों में सीधे 4.27 लाख करोड़ रुपए से अधिक की सहायता पहुँच चुकी है, जिससे 9 करोड़ से ज़्यादा किसान परिवारों को हर साल नियमित आय‑समर्थन मिलता है। वहीं, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) ने देशभर में करोड़ों किसान‑आवेदनों को कवर करते हुए फसल के नुकसान की स्थिति में एक मज़बूत बीमा कवच दिया है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि‑अवसंरचना, वेयरहाउस और कोल्ड‑चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाज़ार तक पहुँच- तीनों को मजबूत किया है। कृषि अब सिर्फ खेत की मेड़ तक सीमित नहीं है। डेयरी, मत्स्य, कुक्कुट, बागवानी, मधुमक्खी‑पालन, खाद्य‑प्रसंस्करण, भंडारण, ग्रामीण उद्योग, सौर ऊर्जा और सेवा‑क्षेत्र; सब मिलकर नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं।

दलहन, तिलहन और कॉटन मिशन : आत्मनिर्भरता और मूल्य–सुरक्षा

लंबे समय तक दालें, खाद्य तेल और कपास– तीनों क्षेत्र हमारी पूरी क्षमता से पीछे रहे। हम दालों और तेलों के लिए आयात पर निर्भर रहे और कपास में भी किसानों को वैश्विक उतार‑चढ़ाव का सामना करना पड़ा। मोदी सरकार ने इन तीनों को रणनीतिक प्राथमिकता देते हुए अलग‑अलग मिशन के रूप में आगे बढ़ाया है। राष्ट्रीय दलहन मिशन के माध्यम से तुअर, उड़द, मसूर, चना और अन्य दालों का क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज से लेकर बाज़ार तक पूरी वैल्यू चेन पर काम हो रहा है– उच्च‑उपज किस्में, क्लस्टर आधारित खेती, प्रसंस्करण इकाइयाँ, MSP का सुदृढ़ ढाँचा, सरकारी खरीद, भंडारण और निर्यात तक। लक्ष्य यह है कि भारत दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने, आयात बिल घटे और किसानों को उच्च मूल्य वाली इन फसलों से स्थायी आय मिले। इसी तरह तिलहन मिशन के ज़रिए सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और पाम ऑयल जैसी फसलों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह केवल पैदावार बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता, किसानों को बेहतर दाम और देश की तेल सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में व्यापक रणनीति है। इसके साथ‑साथ कॉटन मिशन के तहत कपास की उच्च‑उपज और कीट‑रोधी किस्में, उन्नत कृषि‑प्रणालियाँ, कीट‑प्रबंधन, फसल विविधीकरण, टेक्सटाइल वैल्यू–चेन से बेहतर जुड़ाव और गुणवत्ता सुधार पर काम हो रहा है। कपास भारत के लाखों किसानों के लिए नकदी फसल है; मिशन का उद्देश्य है कि किसान को उत्पादन के साथ‑साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता, बेहतर मूल्य और स्थिर आय भी मिल सके।

प्राकृतिक खेती मिशन : 1 करोड़ किसान, 75 लाख हेक्टेयर की नई राह

तेज़ी से बढ़ती रासायनिक निर्भरता, मिट्टी की थकान और भूजल पर दबाव– ये सब हमें आगाह कर रहे हैं कि खेती के तरीके बदलने होंगे। इसी समझ के साथ हमारे विजनरी प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में प्राकृतिक खेती को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारा संकल्प है कि 1 करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए सेंसिटाइज़ किया जाए, उनमें से लगभग 18 लाख किसानों को सक्रिय रूप से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए तैयार किया जाए और चरणबद्ध रूप से करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जाए।

यह परिवर्तन धीरे‑धीरे, वैज्ञानिक प्रमाणों और किसानों के अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ रहा है। छोटे किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपनी कुछ भूमि पर प्राकृतिक खेती का मॉडल बनाकर देखें; उन्हें प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों पर आधारित पैकेज, प्रमाणन, ब्रांडिंग और बाज़ार‑जुड़ाव में मदद दी जा रही है। उद्देश्य यह है कि मिट्टी की उर्वरता बढ़े, रासायनिक लागत घटे, जलवायु झटकों के सामने फसलें अधिक टिकाऊ हों और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यप्रद, पोषक भोजन मिल सके।

प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना और फोकस में 100 कम उत्पादन वाले ज़िले

भारत जैसे विशाल देश में कुछ क्षेत्र बहुत तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ ज़िले अलग‑अलग वजहों से पीछे रह जाते हैं। इस असमानता को कम करने के लिए प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना की संकल्पना की गई है। इस योजना के तहत लगभग 100 कम उत्पादन वाले ज़िलों की पहचान की गई है, जहाँ प्रति हेक्टेयर पैदावार राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और किसान अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन ज़िलों में 11 विभागों की 36 योजनाओं का कन्वर्जेन्स कर एक समग्र पैकेज दिया जा रहा है– सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि–उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाज़ार‑जुड़ाव; सबको एक साथ जोड़कर। सोच यह है कि योजनाएँ अलग‑अलग “साइलो” में न चलें, बल्कि किसान के खेत और गाँव को केंद्र में रखकर सब मिलकर काम करें। इससे नीति का फोकस केवल “कितना उत्पादन” से आगे बढ़कर इस पर आया है कि कहाँ उत्पादन कम है, वहाँ लक्षित निवेश और प्रयास से कैसे बढ़ाया जाए, और उससे किसान की आय कैसे ऊपर उठे।

“खेत बचाओ अभियान” : मिट्टी, पानी और किसान का संतुलन

उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में कई जगहों पर मिट्टी और पानी पर दबाव बढ़ा है। असंतुलित उर्वरक उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और सीमित फसल चक्र ने खेत की सेहत को प्रभावित किया है। यदि समय रहते दिशा न बदली जाए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कमजोर खेत और थकी हुई मिट्टी छोड़ेंगे। इस चुनौती को देखते हुए “खेत बचाओ अभियान” शुरू किया गया है। यह अभियान केवल मिट्टी बचाने का नहीं, बल्कि किसान की आय, भोजन की गुणवत्ता और भविष्य की खाद्य सुरक्षा की रक्षा का अभियान है। इसके पाँच मुख्य संदेश हैं- हर किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करे, डीएपी और यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करे और संतुलित NPK, सूक्ष्म पोषक तत्व, जैव एवं नैनो उर्वरकों को अपनाए, हरी खाद, जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दे, नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के विरुद्ध सतर्क रहे और प्रशासन को तुरंत सूचना दे तथा प्राकृतिक खेती और जलवायु–अनुकूल पद्धतियों की ओर संगठित रूप से बढ़े। लक्ष्य यह नहीं कि उर्वरक अचानक कम कर दिए जाएँ, बल्कि यह है कि हर किसान सही मात्रा, सही समय और सही मिश्रण का उपयोग करे, ताकि मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहे, लागत घटे और उत्पादन भी सुरक्षित रहे।

विज्ञान, डिजिटल कृषि और ICAR की भूमिका

इन सभी प्रयासों की रीढ़ विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ने 2014–25 के बीच लगभग 3,000 जलवायु‑सहनशील फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें सूखा, बाढ़, लू, लवणीयता और अन्य तनावों को झेलने की क्षमता है। कुल मिलाकर 3,800 से ज़्यादा उच्च‑उपज किस्में और 200 से अधिक बायोफोर्टिफाइड किस्में जारी की गई हैं, जो उत्पादकता के साथ‑साथ पोषण सुरक्षा भी मजबूत करती हैं। डिजिटल कृषि मिशन और “एग्रीस्टैक” के तहत किसान पहचान (Farmer IDs), फसल प्लॉटों का डिजिटलीकरण, ड्रोन‑आधारित सेवाएँ, कीट‑रोग निगरानी, मौसम–आधारित और लोकेशन–स्पेसिफिक सलाह जैसी व्यवस्थाएँ बन रही हैं। इससे लैब से लैंड और डेटा से निर्णय तक की दूरी तेजी से कम हो रही है। ई‑नाम, किसान सारथी, KVK नेटवर्क, मोबाइल संदेश, व्हाट्सऐप समूह, सामुदायिक रेडियो और सोशल मीडिया– इन सबके माध्यम से वैज्ञानिक, विस्तारकर्मी और किसान–नेता सीधे किसान से संवाद कर पा रहे हैं। कृषि और ग्रामीण विकास को भी एक साथ, समग्र दृष्टि से देखा जा रहा है। सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्व‑सहायता समूह, FPO, ग्रामीण उद्योग और कौशल विकास– ये सभी कार्यक्रम जब कृषि के साथ कदम–ताल करके चलते हैं, तभी गाँवों में रोज़गार, उद्यमिता और सामाजिक परिवर्तन की गति बढ़ती है।

फसल की मात्रा से आगे, किसान के विश्वास की ओर बढ़ते ठोस कदम

आने वाले वर्षों में भारत को दुनिया की खाद्य, पोषण और जलवायु चुनौतियों के बीच अपने कृषि‑तंत्र को और मजबूत बनाना है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का विज़न स्पष्ट है-किसान की आय बढ़े, उसकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्य मिले, दालों, तिलहनों और कपास में आत्मनिर्भरता से पोषण, तेल और वस्त्र सुरक्षा मजबूत हो। PM‑KISAN, PMFBY, प्राकृतिक खेती, खेत बचाओ अभियान और जलवायु‑अनुकूल तकनीकों से खेत की मिट्टी, पानी और किसान की सुरक्षा सुनिश्चित हो।प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना के माध्यम से कम उत्पादन वाले ज़िलों में लक्षित निवेश से क्षेत्रीय असमानता घटे और हर किसान आगे बढ़े। विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक से खेती कुशल, लचीली, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बने।

जब खेत बचेगा, तब किसान बचेगा। जब किसान बचेगा, तब कृषि बचेगी और जब कृषि बचेगी, तब भारत का भविष्य सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में यही हमारी नई कृषि यात्रा का सार है– फसल से आगे, किसान के विश्वास और ग्रामीण भारत की समृद्धि की ओर।

(लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री हैं।)

भारत से शिकागो और फिर हुगली तक: स्वामी विवेकानंद के योग संदेश की वैश्विक यात्रा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

समूचे इतिहास में, कुछ विचार सरहदों के पार जाकर समाजों को बदलते रहे हैं। योग भारत की प्राचीनतम परंपराओं में से एक है, जिसकी यात्रा प्राचीन शास्त्रों से शुरू होकर वैश्विक मान्‍यता तक जा पहुँची है।

योग शब्द — जो संस्कृत के मूल शब्द युज से लिया गया है, जिसका अर्थ है “जोड़ना” या “एकत्व स्थापित करना”-  अपने भीतर दार्शनिक चिंतन और व्यावहारिक अनुशासन की एक समग्र प्रणाली समाहित किए हुए है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति (जीवात्मा) का सार्वभौमिक चेतना (परमात्मा) के साथ मिलन कराना है।

योग के प्रारंभिक बीज ऋग्वेद (लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व) में मिलते हैं, जहाँ तप और ध्यान जैसी अवधारणाओं का उल्लेख किया गया है। आगे चलकर इन विचारों का विकास उपनिषदों में हुआ, जिन्होंने योग के अनेक दार्शनिक सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया। हालाँकि योग को उसका सर्वाधिक व्यवस्थित स्वरूप महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र (लगभग 200 ईसा पूर्व–400 ईस्वी) ने प्रदान किया- इसमें अष्टांग योग अथवा आठ अंगों वाले मार्ग का वर्णन किया गया है, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि शामिल हैं। 

पतंजलि के अलावा, भगवद गीता योग को जीवन जीने के गतिशील दर्शन के रूप में प्रस्तुत करती है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद मानव कर्तव्य, उद्देश्य और आध्यात्मिक उन्नति के विषय में गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। भगवद्गीता में वर्णित विभिन्न मार्गों में कर्म योग (निःस्वार्थ कर्म का मार्ग), ज्ञान योग (ज्ञान का मार्ग) और भक्ति योग (भक्ति का मार्ग) मुक्ति प्राप्ति के तीन प्रमुख पथ माने गए हैं। अतः भारत केवल योग की जन्मभूमि ही नहीं है—यह एक जीवंत सभ्यता है, जहाँ योग सहस्राब्दियों से स्वाभाविक रूप से विकसित हुआ है, और जो इसकी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक संरचना का अभिन्न अंग रहा है।

हालाँकि, औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय समाज के शिक्षित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी बौद्धिक विचारधाराओं से प्रभावित होने और योग सहित भारत की अनेक पारंपरिक ज्ञान-परंपराओं को बदलती आधुनिक दुनिया में अपेक्षाकृत कम प्रासंगिक माना जाने लगा। ऐसे महत्वपूर्ण समय में, स्‍वामी विवेकानंद एक सशक्त स्‍वर बनकर उभरे, जिन्होंने लोगों को योग के वास्तविक महत्व को फिर से जानने में मदद की। 

स्वामी विवेकानंद ने अपने उपदेशों और विश्व धर्म संसद में दिए ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से दुनिया का ध्‍यान भारत की आध्यात्मिक विरासत की ओर आकृष्‍ट किया और योग की शाश्वत ज्ञान-परंपरा के प्रति लोगों में नया विश्वास जगाया। उन्होंने विश्व के विभिन्न भागों के  लोगों के साथ वेदांत और योग के सिद्धांत साझा किए  तथा यह स्पष्ट किया कि योग केवल एक धार्मिक साधना नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत विकास, आंतरिक शांति और आत्म-विकास का मार्ग भी है। विदेशों में स्वामी विवेकानंद को मिले व्यापक सम्मान और प्रशंसा ने भारतीयों के मन में अपनी प्राचीन परंपराओं और संस्कृति के प्रति नया विश्वास और गौरव उत्पन्न किया। 

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो – और उसके बाद अमेरिका भर में तथा यूरोप  के विभिन्न देशों में अपने व्‍याख्‍यानों  के माध्यम से पश्चिमी जगत को राजयोग (मन के नियंत्रण का योग), ज्ञानयोग (विवेक और ज्ञान का मार्ग), कर्मयोग (निःस्वार्थ सेवा का मार्ग) तथा भक्तियोग (ईश्वर-प्रेम और समर्पण का मार्ग) से परिचित कराया। पतंजलि के योग सूत्रों पर आधारित उनकी पुस्तक राजयोग (1896), पश्चिमी समाज के लिए योग-दर्शन का परिचय कराने वाली प्रारंभिक और सर्वाधिक प्रभावशाली कृतियों में से एक बन गई। 

 राजयोग  पर दिए अपने व्याख्यानों में स्वामी विवेकानंद ने योग को मानव चेतना के आंतरिक आयामों की खोज करने वाली एक व्यवस्थित और अनुभव-आधारित साधना के रूप में प्रस्तुत किया। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि मानवता के लिए भारत का सबसे बड़ा योगदान उसकी आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा है, और योग उस परंपरा की सबसे गहन तथा स्थायी अभिव्यक्तियों में से एक है। उनके विचारों ने उस समय के जाने-माने बुद्धिजीवियों और विचारकों का ध्यान खींचा, जिससे भारतीय दर्शन के साथ पश्चिमी देशों का जुड़ाव और बढ़ा। 

जो बात शायद कम चर्चित है— किंतु उतनी ही महत्वपूर्ण है, — वह यह है कि पश्चिमी देशों में स्वामी विवेकानंद के कार्यों ने भारत के भीतर ही योग के पुनर्जागरण को प्रेरित किया।  जब स्वामी विवेकानंद 1897 में भारत लौटे, तो वे खाली हाथ नहीं लौटे थे। वह अपने साथ एक नया आत्मविश्वास – भारत की आध्यात्मिक विरासत पर गर्व की एक नई भावना लाए थे – जो पश्चिम में उनके स्वागत से और बढ़ गई थी।  

1897 में भारत लौटने के बाद, स्वामी विवेकानंद ने देशभर में व्याख्यान दिए और लोगों को भारत की आध्यात्मिक परंपराओं को पुनः खोजने के लिए प्रेरित किया। 1 मई 1897 को, स्वामी विवेकानंद ने हावड़ा के बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की — जो हुगली नदी के पश्चिमी किनारे पर है, उस जगह से थोड़ी ही दूरी पर जहाँ रामकृष्ण ने दक्षिणेश्वर में अपने आखिरी साल बिताए थे। बंगाल में हुगली नदी के तट पर स्थापित यह संस्थान एक आंदोलन का वैश्विक मुख्‍यालय बन गया, जिसने वेदांत के आदर्शों, सेवा को पूजा मानना (शिव ज्ञाने जीव सेवा) तथा योग-दर्शन के व्यावहारिक अनुप्रयोग का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।  

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक गुरुओं की धरती होने के बावजूद, बदलते समय के साथ बंगाल में योग की सार्वजनिक दृश्यता धीरे-धीरे कम होती गई। जीवनशैली में परिवर्तन, आधुनिक प्राथमिकताओं के उभरने और सामाजिक संरचना में बदलाव के कारण योग धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन के केंद्र से दूर होता गया। फिर भी, इसकी जड़ें आध्यात्मिक संस्थाओं और समर्पित साधकों के माध्यम से जीवित रहीं। 

11 सितंबर 1893 को, “अमेरिका के बहनों और भाइयों” के अमर अभिवादन के साथ शुरुआत करते हुए, स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से दुनिया को भारत के आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित कराया। अब यह पंक्तियाँ “पश्चिम बंगाल के बहनों और भाइयों, अपने ही घर में योग की घर वापसी के साक्षी बनिए- शिकागो के वैश्विक मंच से लेकर हुगली के तट तक” – गहरे भावनात्मक संबंध को व्यक्त करती हैं, जो हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती हैं, जब स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को भारत के आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित कराया था। उनका संदेश भारत से विश्व तक पहुँचा और योग, सामंजस्य तथा आंतरिक शांति के मूल्यों का प्रसार करता गया। 

आज हुगली के तटों पर जो लौटा है, वह स्वयं योग नहीं है—क्योंकि भारत में योग कभी समाप्त ही नहीं हुआ—बल्कि योग के प्रति वह नवीनीकृत वैश्विक मान्यता और सराहना है, जिसकी शुरुआत भारत के प्राचीन ऋषियों से हुई और जिसे स्वामी विवेकानंद के संदेश ने विश्व मंच पर नए रूप में अभिव्यक्त किया।

यह आज लौट आया है — पुनर्जीवित, पुनःमान्य और पुनःस्थापित होकर — बंगाल में हुगली नदी के तट पर, जहाँ बेलूर मठ आज भी उस यात्रा की जीती-जागती यादगार के तौर पर खड़ा है। आज जब विश्वभर में योग का अभ्यास किया जा रहा है और जब दुनिया इसे एक अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता देती है, — ऐसे में यह याद रखना आवश्यक है कि योग की यह वैश्विक यात्रा अपने केंद्र में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक मिशन को समाहित किए हुए है। 

आज, कोलकाता में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उत्सव के साथ, ऐसा लग रहा है मानो योग की खूबसूरत घर वापसी उसी सरजमीं पर हो रही है, जहाँ से इसके संदेश ने विश्व मंच तक की अपनी यात्रा प्रारंभ की थी। हुगली नदी के तट एक बार फिर इस बात के साक्षी बन रहे हैं कि लोग एक ऐसी परंपरा का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हो रहे हैं, जिसने महासागरों  पार किया था और अब ज़्यादा पहचान और सम्मान के साथ लौटी है।

“शिकागो से हुगली” तक की यात्रा केवल एक अभ्यास की यात्रा नहीं है; यह एक विचार — और वास्तव में एक भावना — की यात्रा है, जो संतुलन, करुणा और आत्म-चेतना के माध्यम से तथा आंतरिक सामंजस्य की खोज के द्वारा मानवता को निरंतर जोड़ती रहती है।

( लेखक  केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री हैं)

नारी शक्ति का दशक, विकसित भारत का उत्कर्ष

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

देश के किसी भी गाँव, बस्ती या सुदूर इलाके में जाइए- हर घर की रसोई में एक जैसी बदली हुई हवा महसूस होगी l चूल्हे के जिस काले धुएँ ने कभी नई दुल्हन की आँखों में आँसू भरे थे, उज्ज्वला की नीली लौ ने उसे विदा कह दिया है। जो माँ कभी कोसों दूर से पानी ढोती थी, आज उसकी बेटी के पास ‘हर घर जल’ का अपना नल है। खेत के पीछे की वह शर्मनाक मजबूरी अब इतिहास है- आँगन में स्वच्छ भारत का शौचालय गरिमा के साथ खड़ा है। सिर पर पक्की छत है, और उसके मालिकाना हक पर पहली बार- घर की महिला का नाम लिखा है। पर्स में जन-धन की पासबुक है और फोन में यूपीआई का ऐप है।


यह किसी पोस्टर पर छपी कोई काल्पनिक तस्वीर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के बारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण का एक ऐसा सच है, जिसे देश की करोड़ों महिलाएँ हर रोज़ जी रही हैं। यह उस दौर की दास्तान है जिसमें Women Led Development के विजन के साथ भारतीय नारी विकसित भारत की शिल्पकार बन रही है। इस बदलाव की विशालता को समझने के लिए एक दशक पीछे लौटिए। एक समय मातृ मृत्यु दर 212 थी। निर्भया जैसी घटना पर देश का आक्रोश सड़कों पर था, लेकिन व्यवस्था में नीतिगत इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती थी। महिला आरक्षण विधेयक 1996 से चार बार अधर में लटका रहा और ट्रिपल तलाक पर दशकों तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। चूल्हा साँसों में कालिख घोलता था। दूरस्थ हैंडपंप रोज़मर्रा की बेबसी का प्रतीक था l भारतीय नारी एक नई सुबह की प्रतीक्षा में अपने हिस्से की उम्मीद बचाए हुए थी l


शुरुआत करते हैं सबसे पवित्र आँकड़े—जीवन का अधिकार से। देश में मातृ मृत्यु दर तेजी से घटकर 212 से 88 पर आ गई है। UN-MMEIG के अनुसार जहाँ वैश्विक स्तर पर मातृ मृत्यु दर में महज़ 48% की कमी आई, वहीं भारत ने 86% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की है। संस्थागत प्रसव 38.7% से बढ़कर 90.6% हो चुका है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ने चार करोड़ से अधिक माताओं के बैंक खातों में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक सीधे हस्तांतरित कर सुरक्षित मातृत्व और स्वस्थ बचपन की नींव मजबूत की है।


देश में बने 12 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालयों ने महिलाओं को गरिमा दी l10.5 करोड़ से अधिक उज्ज्वला कनेक्शनों ने धुएँ से मुक्ति दी। आज 16 करोड़ से अधिक घरों तक नल का पानी पहुँच चुका है—जबकि 2014 में महज 17% परिवारों के पास यह सुविधा थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के लगभग 4 करोड़ घरों में से 73% घर महिलाओं के नाम पर हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार सरकारी रिकॉर्ड्स पर माँ-बहनों का नाम गर्व से दर्ज है।


गरिमा से स्वामित्व आया, और स्वामित्व ने निर्णय लेने का आत्मविश्वास दिया। आर्थिक भागीदारी का यह विस्तार बैंक खाते से शुरू होकर उद्यमिता तक पहुँचा है l लगभग 56 करोड़ जन-धन खातों में 56% खाते महिलाओं के नाम पर हैं।


विश्व बैंक मानता है- भारत ने एक दशक में खाता-स्वामित्व के जेंडर गैप को शून्य पर ला दिया है, जो वैश्विक वित्तीय समावेशन के इतिहास में अभूतपूर्व है। मुद्रा योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक जमानत-मुक्त ऋणों में से 68% ऋण महिलाओं को मिले हैं। स्टैंड-अप इंडिया ने महिला उद्यमियों को 43,000 करोड़ रुपये से अधिक दिए हैं और दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत 91 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है।” निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें ‘लखपति दीदियाँ’ बन चुकी हैं।


यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट है l देश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुँच चुकी है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है । उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1 के पार है और STEM शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है। यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, SRS, NFHS, PLFS, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र—हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुँच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है।


इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थी l इसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ। आजजमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएँ राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं।


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही है l Women Helpline-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है । मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आँगनवाड़ी—ये नारी-नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं। बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है।


हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय ‘सह-निर्माता’ है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।
(SHGs) ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है।” निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें ‘लखपति दीदियाँ’ बन चुकी हैं।


यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट है l देश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुँच चुकी है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है । उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1 के पार है और STEM शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है। यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, SRS, NFHS, PLFS, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र—हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुँच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है।


इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थी l इसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ। आजजमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएँ राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं।


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही है l Women Helpline-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है । मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आँगनवाड़ी—ये नारी-नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं।


बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है। हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय ‘सह-निर्माता’ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।


(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।)

वेतन से आगे: विकसित भारत के लिए कुशल कार्यबल की तैयारी

कोयंबटूर में काम करने वाले युवा रवि को, जो एक छोटी विनिर्माण इकाई में अपनी पहली औपचारिक नौकरी के छह महीने पूरे कर चुके हैं और हाल ही में अपनी मासिक तनख्वाह के अलावा उन्हें बैंक खाते में 7,500 रुपये मिले। लगातार छह महीने की नौकरी पूरी होने के बाद यह रकम अपने आप जारी कर दी गई। इससे पहले उनका परिवार सिर्फ़ अनौपचारिक काम करता था, जिसमें कोई अनुबंध, भविष्य निधि में योगदान या नौकरी का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं होता था। यह पहला मौका था, जब उनकी नौकरी को आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया और उन्हें इस तरह का लाभ मिला।

रवि को मिली यह धनराशि प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना (पीएम-वीबीआरवाई) के ‘भाग A’ के तहत मिली पहली किस्त है। इस योजना को केंद्रीय बजट 2024-25 में प्रधानमंत्री के रोज़गार और कौशल पैकेज के हिस्से के तौर पर शुरू किया गया था। इस प्रावधान के तहत, ईपीएफओ में पंजीकृत कंपनियों में पहली बार नौकरी पाने वाले ऐसे कर्मचारी, जिनकी मासिक कमाई 1 लाख रुपये से कम है, उन्हें 15,000 रुपये तक का नकद प्रोत्साहन मिलता है। यह रकम दो किस्तों में दी जाती है: पहली किस्त लगातार छह महीने की नौकरी के बाद और दूसरी किस्त बारह महीने के बाद। इसके लिए शर्त यह है कि कर्मचारी को ईपीएफओ ​​पोर्टल के ज़रिए वित्तीय साक्षरता का कोर्स पूरा करना होगा और यह राशि बचत के एक साधन में जमा की जाएगी, ताकि कर्मचारी को एक आर्थिक सुरक्षा मिल सके। रवि के लिए, ये छह महीने सिर्फ़ योग्यता हासिल करने का समय नहीं थे। ये वो वक्त था, जिसमें उन्होंने अपने काम की जगह को समझा, अपने काम से जुड़ी बुनियादी कौशल और योग्यता सीखी और अपने लिए रोज़गार का एक रिकॉर्ड बनाना शुरू किया, जो पहले कभी नहीं था।

यह समय उनके नियोक्ता के लिए भी अहम था, जो एक छोटी विनिर्माण इकाई थी और उसने अपने विस्तार के तहत रवि को काम पर रखा था। पीएम-वीबीआरवाई के भाग B में प्रावधान है कि जो नियोक्ता अपनी मौजूदा बेसलाइन से ज़्यादा रोज़गार पैदा करते हैं, उन्हें हर अतिरिक्त कर्मचारी के लिए हर महीने 3,000 रुपये तक का सरकारी योगदान मिलता है। यह योगदान अलग-अलग क्षेत्रों में दो साल तक और विनिर्माण क्षेत्र में चार साल तक मिलता है। यह योगदान उस शुरुआती लागत का कुछ हिस्सा कवर करता है, जो किसी कंपनी को नए कर्मचारी को रखने पर उठानी पड़ती है, खासकर तब जब ऑनबोर्डिंग और प्रशिक्षण चल रहा होता है और बिना किसी पिछले औपचारिक अनुभव वाला कर्मचारी, धीरे-धीरे कंपनी के लिए लाभप्रद हो रहा होता है। इस शुरुआती लागत को कम करके यह प्रावधान, योजना का दायरा रवि जैसे लोगों को काम पर रखने वाले छोटे व्यवसायों तक बढ़ाता है। उसकी जैसी विनिर्माण इकाईयों के लिए, चार साल की अवधि, जो सामान्य अवधि से दोगुनी है, कंपनियों को ऑटोमेशन में निवेश के साथ-साथ अपने कार्यबल का विस्तार करने के लिए भी प्रोत्साहित करती है।

भारत की जनसांख्यिकीय व्यवस्था को देखते हुए, युवा और बढ़ता कार्यबल 2047 तक ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ने के लिए रोज़गार-आधारित विकास के ज़रिए आर्थिक विकास को रफ्तार देने का एक मौका देता है। कार्यबल में शामिल होने वाले नए लोग किस सीमा तक औपचारिक रोज़गार में आते हैं, जहाँ उन्हें सामाजिक सुरक्षा और संस्थागत सुरक्षा मिलती है, यह इस बात पर भी असर डालेगा कि परिवारों और समुदायों में विकास का लाभ कैसे मिलता है। पीएम-वीबीआरवाई का मकसद ‘स्वतंत्र भारत’ से ‘समृद्ध भारत’ तक के सफ़र को मज़बूत करना है और दो साल में 3.5 करोड़ से ज़्यादा औपचारिक नौकरियाँ पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देना है।

इस योजना की शुरूआत से, 60 लाख नए कर्मचारी औपचारिक कार्यबल का हिस्सा बन चुके हैं। इनमें से 43.26 लाख (लगभग 71%) 18 से 30 साल की उम्र के हैं और 18.04 लाख (लगभग 30%) महिलाएं हैं, जो पहली बार औपचारिक रोज़गार से जुड़ी हैं। ये कर्मचारी विशेष सेवाओं, इंजीनियरिंग, व्यापार, विनिर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, वस्त्र और आतिथ्य जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं, जो दिखाता है कि कई तरह के औपचारिक संस्थानों में इसे अपनाया गया है।

सिर्फ़ प्रोत्साहन राशि के अलावा, पीएम-वीबीआरवाई से रवि को एक ईपीएफओ खाता और एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर मिला है। इससे वह एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, जो भविष्य निधि योगदान, बीमा सुरक्षा और कानूनी रोज़गार लाभ भी देता है। उनके जैसे पहली बार औपचारिक रोज़गार पाने वाले कई लोगों के लिए, यह सामाजिक सुरक्षा कवरेज और एक व्यवस्थित रोज़गार से जुड़ने का एक बेहतर मौका है। लगातार छह महीने तक नौकरी करने की शर्त का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इस योजना के तहत बनी नौकरियां असल करियर की नींव बनें। लंबे समय तक औपचारिक रोज़गार से कई क्षेत्रों में नौकरियों में काम आने वाला कौशल विकसित होता हैं, पेशेवर तौर-तरीके सीखने को मिलते हैं और भविष्य में नौकरी पाने की क्षमता भी मज़बूत होती है। इससे मिलने वाले फ़ायदे योजना के तहत मिलने वाली मदद की अवधि के बाद भी बने रहते हैं।

रोज़गार के मौके पैदा करना एक अहम नीतिगत लक्ष्य है। उतना ही ज़रूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि रवि जैसे कर्मचारी औपचारिक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाए रख सकें, जहाँ रोज़गार के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा कवरेज और संस्थागत सुरक्षा भी मिलती है। जैसे-जैसे ज़्यादा युवा कर्मचारी औपचारिक नौकरियों में छह महीने, एक साल और उससे ज़्यादा समय बिताते हैं, कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आता है और छोटे संस्थान भी औपचारिक तरीके से लोगों को काम पर रखने की प्रक्रिया अपनाते हैं। इस योजना के तहत 3.5 करोड़ से ज़्यादा नौकरियां मिलने का अनुमान है और औपचारिक अर्थव्यवस्था का यह धीरे-धीरे बढ़ता दायरा ही वह बदलाव है, जिसे तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए पीएम-वीबीआरवाई को लाया गया है।

(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं)

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आकांक्षाओं का गणित: भारत में रोजगार का सवाल अब स्थिरता पर क्यों निर्भर है

जब 1954 में सर आर्थर लुईस ने गरीब अर्थव्यवस्थाओं के अमीर बनने की परिघटना को समझाने का काम शुरू किया, तो उन्होंने विकास की मुख्य प्रक्रिया को पूंजी के संचय के रूप में नहीं बल्कि कामगारों के जीवन-निर्वाह वाली खेती से हटकर अधिक कमाई वाले उद्योगों एवं
सेवा क्षेत्रों की ओर मुड़ने के तौर पर पहचाना। उनका यह अनुमान बिल्कुल ही सही था कि यही बदलाव देर से औद्योगीकरण करने वाले हर देश का भविष्य तय करेगा। आज भारत ठीक इसी मोड़ पर खड़ा है और नीति-निर्माताओं के सामने सवाल पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध कराने भर का नहीं है। बल्कि, उनके सामने इससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसी नौकरियां पैदा करने की स्थिति में है या नहीं जो पर्याप्त तादाद में हों, औपचारिक हों और एक युवा कामगार को जीवन भर बढ़ती उत्पादकता एवं सुरक्षा दे सकने लायक टिकाऊ हों।

इस जिम्मेदारी के भार को काफी सटीकता से बताया जा सकता है। ‘आर्थिक समीक्षा 2023-24’ ने ‘आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे)’ और आबादी से जुड़े अनुमानों के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि इस दशक की बाकी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को हर वर्ष लगभग 78.5 लाख गैर-कृषि नौकरियां सृजित करनी होंगी। यह आंकड़ा दो बढ़ते दबावों का नतीजा है: पहला, कामकाज के क्षेत्र में लोगों की भागीदारी बढ़ने के साथ श्रमशक्ति में हो रही लगातार बढ़ोतरी; और दूसरा, संरचनात्मक बदलाव के कारण खेती से बाहर आने वाले
कामगार। रोजगार में खेती की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 46 प्रतिशत है। वर्ष 2047 तक इस हिस्सेदारी के घटकर एक-चौथाई तक आ जाने की संभावना है।

जुलाई 2025 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई और उसके अगले महीने से शुरू हुई ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना’ उस अंतर को पाटने की अब तक की सबसे सोची- समझी कोशिश है। इस योजना के तहत, जुलाई 2027 तक की दो वर्षों की अवधि में 3.5 करोड़ से अधिक औपचारिक नौकरियां सृजित करने हेतु ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ)’ के जरिए 99,446 करोड़ रुपये लगाए जा रहे हैं। ईपीएफओ में पंजीकृत किसी कंपनी में पहली बार शामिल होने वाला और महीने में एक लाख रुपये से कम कमाने वाला कामगार, दो किस्तों
में कुल 15,000 रुपये तक पाने का हकदार बन जाता है। दूसरी किस्त वित्तीय साक्षरता पाठ्यक्रम (फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स) करने पर और बचत (सेविंग्स) के तौर पर मिलती है। वहीं, निर्धारित आधार-रेखा (बेसलाइन) से अधिक लोगों को नौकरी पर रखने वाले नियोक्ताओं को हर नए कामगार के लिए महीने में 3,000 रुपये तक मिलते हैं। ये शर्तें कुछ इस तरह तय की गई हैं कि छोटी कंपनियां भी इसके दायरे से बाहर हो जाने के बजाय इसमें शामिल हो सकें।

यह योजना भर्ती संबंधी सब्सिडी वाले आम व निराशाजनक तरीकों से इसलिए अलग और बेहतर है क्योंकि इसमें पहला लाभ मिलने से पहले छह महीने तक लगातार नौकरी करना आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहली बार काम करने वाले को नौकरी पर रखने का लाभ तभी मिलता है जब वह कर्मचारी काम में कुशल बन जाए और टिका रहे। यह शर्त शुरुआती भर्ती को एक पक्की प्रतिबद्धता में बदल देती है, जिससे नियोक्ता को प्रशिक्षण की लागत वसूलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और कर्मचारी को भी उतने महीने मिल जाते हैं जिनमें वह असली हुनर सीख सके ​​और भरोसेमंद रिकॉर्ड बना सके। इस तरह, यह योजना केवल नौकरी देने के लिए नहीं बल्कि कर्मचारी को बनाए रखने की अपेक्षाकृत अधिक कठिन प्रक्रिया के लिए पुरस्कृत करती है और इसके बाद कर्मचारी के पास रोजगार क्षमता एक ऐसा ट्रैक रिकॉर्ड होता है जिसका वह कहीं भी सदुपयोग कर सकता है।

इस योजना का सबसे अधिक झुकाव मैन्यूफैक्चरिंग की ओर है, जहां नियोक्ता को मिलने वाला प्रोत्साहन दो वर्ष के बजाय चार वर्ष तक मिलता है। समय-सीमा को दोगुनी करने का यह निर्णय औद्योगिक क्षमता तैयार होने में लगने वाले अधिक समय को ध्यान में रखकर लिया गया है। साथ ही, इससे निर्माता (मैन्यूफैक्चरर) समय से पहले स्वचालित व्यवस्था (ऑटोमेशन) लाकर कामगारों को हटाने के बजाय श्रमशक्ति बढ़ाने की ओर प्रेरित होते हैं। अहम बात यह है कि सरकार ने इसे देश को वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग केन्द्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करने की दृष्टि से जरूरी माना है। ईपीएफओ ​​के जरिए, हर नए कामगार को एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर मिलता है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा का पहली बार अहसास होता है। अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले बहुत कम कामगारों को यह सुरक्षा मिल पाती है। इस योजना के शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं। इसके शुरू होने के बाद से लगभग 60 लाख नए कर्मचारी नामांकित हुए हैं। इनमें से अधिकतर 30 वर्ष से कम आयु के हैं और 18 लाख से अधिक महिलाएं हैं। वहीं, लगभग 1.77 लाख प्रतिष्ठानों ने 66 लाख से अधिक रोजगार के अवसर सृजित किए हैं। इन प्रतिष्ठानों में कई ऐसी छोटी कंपनियां शामिल हैं, जहां लंबे समय से अनौपचारिक काम का बोलबाला रहा है।

हालांकि, एक अच्छी शुरुआत को पूरी तरह से सफल बदलाव मान लेना नासमझी होगी। इस योजना में धोखाधड़ी में शामिल कंपनियों को बाहर रखने, हर छह महीने में इलेक्ट्रॉनिक रिटर्न के जरिए यह सुनिश्चित करना कि नौकरी सिर्फ कागजों के बजाय असल में बनी हुई है और भुगतान की स्वचालित प्रणाली जैसी कई अच्छी बातें हैं। ये सभी खूबियां इस बात को दर्शाती हैं कि योजनाकारों को इस बात का अहसास है कि ऐसी योजना में उन भर्तियों को लाभ नहीं मिलना चाहिए जो अन्यथा भी हो जातीं। इसकी असली सफलता पहले वर्ष में नामांकित लोगों के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से पता चलेगी कि वे नौकरियां उस प्रोत्साहन के समाप्त होने के बाद भी बनी रहती हैं या नहीं और इससे पैदा होने वाली मांग को पूरा करने के लिए काम के लायक युवा मौजूद हैं या नहीं। इसीलिए, इस योजना की सफलता कौशल को सिखाने में किए जा रहे निवेश से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।

यह याद रखना ज़रूरी है कि बेरोजगारी सिर्फ आमदनी से ही वंचित नहीं करती, बल्कि यह लोगों के हुनर, आत्म-सम्मान और समाज में उनकी हैसियत को भी कमजोर करती है। वोल्टेयर ने भी यही बात कही थी जब उन्होंने कैंडिड के जरिए यह निष्कर्ष दिया था कि काम करने से तीन बड़ी समस्याएं – बोरियत, बुराई और अभाव – दूर रहती हैं। इस तरह की योजना की अहमियत इसलिए है क्योंकि यह रोजगार के सही और संपूर्ण मतलब को समझती है। यह औपचारिक नौकरी को सिर्फ गिनती के आंकड़े के तौर पर नहीं, बल्कि कामकाजी जीवन की पहली सुरक्षित
सीढ़ी के तौर पर देखती है। अब जबकि भारत 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है, तो चुनौती इस बात की है कि इस योजना में दिखाई गई धैर्य की भावना को बनाए रखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि युवाओं को सार्थक रोजगार, जिसे प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय परियोजना के केन्द्र में रखा है, कुछ समय के प्रोत्साहन तक सीमित रहने के बजाय एक पूरी पीढ़ी के लिए टिकाऊ, उत्पादक और सम्मानजनक काम के रूप में मिले।

(लेखक भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)