ब्रेकिंग न्यूज़
भारत का फार्मा सेक्टर : नवाचार और  युवाओं के लिए नया आकाश

भारत आज दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप अब हम केवल जेनेरिक दवा बनाने वाले देश से आगे बढ़कर एक ‘नवाचार-आधारित’ वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हैं। हमारी सरकार का उद्देश्य ऐसी नीतियां बनाना है जिससे देश के हर नागरिक कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं से मिल सकें। साथ ही सरकार निरंतर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दे रही है और भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काम कर रही है।

भारत की अब तक की सफलता उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और गुणवत्ता मानकों पर आधारित रही है। विश्व की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और 60 प्रतिशत वैक्सीन आपूर्ति के साथ देश ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने 8 से 10 वर्षों में देश को उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित बायोफार्मा और उन्नत चिकित्सीय उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

इसकी आधारशिला के रूप में हालिया केंद्रीय बजट में घोषित 10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल महत्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम देश में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार आधारित उद्योगों और अगली पीढ़ी की दवाओं के विकास को गति प्रदान करेगा।

आर्थिक आंकड़े भी इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्तमान में 50 अरब डॉलर का है। जिस रफ्तार से हम आगे बढ़ रहे हैं, 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इसे केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य के रोडमैप के तौर पर भी देखने की जरूरत है। 

वर्तमान में फार्मास्युटिकल उद्योग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 30 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। 2030 तक हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र में 20 से 25 लाख नए रोजगार सृजित होंने की उम्मीद है। बायोफार्मा, मेडटेक और क्लीनिकल रिसर्च जैसे उभरते क्षेत्रों ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं।

हमारी सरकार का मानना है कि युवाओं की सफलता की नींव एक मजबूत शैक्षणिक ढांचे पर टिकी होती है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बजट में फार्मा सेक्टर के लिए और भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने देश में तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, वर्तमान में कार्यरत सात नाईपर संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इन सात संस्थानों में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना की गई है, जो अनुसंधान और विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, नाईपर मोहाली में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल दवाओं की खोज एवं विकास, नाईपर अहमदाबाद में मेडिकल डिवाइसेज, नाईपर हैदराबाद में बल्क ड्रग्स, नाईपर कोलकाता में फ्लो केमिस्ट्री और सतत विनिर्माण, नाईपर रायबरेली में नोबेल ड्रग डिलीवरी सिस्टम, नाईपर गुवाहाटी में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा नाईपर हाजीपुर में बायोलॉजिकल थेरैप्यूटिक्स पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों का सीधा लाभ हमारे विद्यार्थियों को मिलेगा। नाईपर केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे ऐसे केंद्र बनेंगे जहां छात्र उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर काम करेंगे। इससे हमारे छात्र केवल ‘जॉब सीकर’ नहीं बल्कि ‘जॉब क्रिएटर’ और नवाचारी बनेंगे।

बदलते दौर में काम करने के तरीके बदल रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक फार्मा सेक्टर के लगभग 30-35 प्रतिशत कार्यबल को री-स्किलिंग यानी नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। केयर डिलीवरी, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषाएं बदल रही हैं। डेटा विश्लेषण, डिजिटल हेल्थ और नियामक मामलों में उच्च कौशल वाले युवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। हमारी सरकार का ध्यान इसी ‘स्किल गैप’ को भरने पर है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र क्लीनिकल रिसर्च और अनुसंधान और विकास में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करें।

शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करना हमारी प्राथमिकता है। जब तक हमारे कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतें एक समान नहीं होंगी, तब तक हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे।

इसीलिए, हम ‘उद्योग-अकादमिक साझेदारी’ को मजबूत कर रहे हैं। इसी दिशा में, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल बिठाने के लिए नाईपर और उद्योग के बीच 356 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही स्किल डेवलपमेंट मिशनों के माध्यम से छात्रों को सीधे कंपनियों के साथ जुड़ने के मौके दिए जा रहे हैं। इससे न केवल युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बनेगा।

औषधि क्षेत्र का विकास जीडीपी बढ़ाने के साथ-साथ देश के युवाओं को सशक्त बनाने का भी एक मिशन है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की नींव हमारे युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के कंधों पर है। नाईपर का विस्तार और बजट में किए गए प्रावधान इस बात का प्रमाण हैं। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बना रहे हैं जहां एक छात्र अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सके। भारत के औषधि क्षेत्र का यह स्वर्णिम युग हमारे युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

  • लेखक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।
नए भारत की एमएसएमई क्रांति के केंद्र में है नारी शक्ति
  • शोभा करंदलाजे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम का सितंबर 2023 में संसद में समर्थन करते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि भारत तभी आगे बढ़ सकता जब देश की नारियां भी इसके साथ ही उन्नति करें। उनका यह विश्वास एमएसएमई क्षेत्र (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) में सरकार के काम में हर रोज दिखाई देता है।

एमएसएमई  क्षेत्र को अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। लेकिन अगर गहराई से देखें तो इसके दिल में महिला उद्यमियों का मूक बल बसता है। आखिरकार आज इस मूक बल को वह राष्ट्रीय मान्यता, संस्थागत समर्थन और नीतिगत गति मिल रही है जिसका वह हमेशा से हकदार है।

आँकड़े बयां करते हैं कहानी

भारत के एमएसएमई  इकोसिस्टम में महिलाओं की भागीदारी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। 2026 की शुरुआत तक, ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ और ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ पर 3.11 करोड़ से अधिक महिला-नेतृत्व वाले उद्यम पंजीकृत हुए हैं। वास्तव में, ‘उद्यम’ और ‘उद्यम असिस्ट’ पंजीकरण के अनुसार, देश के कुल पंजीकृत एमएसएमई में महिला-स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है और ये रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। महिला उद्यमियों के लिए सबसे प्रभावशाली सुधारों में से एक ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ के माध्यम से पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाना है। पूरी तरह से ऑनलाइन, कागज रहित और स्व-घोषणा पर आधारित इस व्यवस्था ने उस नौकरशाही बाधा को समाप्त कर दिया, जो महिलाओं के लिए एक बड़ी रुकावट बनी हुई थी। जनवरी 2023 में शुरू किए गए ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ ने अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत उन महिलाओं तक पहुँच बनाकर इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया, जिनके पास ‘पैन’ नंबर या ‘जीएसटीएन’  नहीं था। इसने उन्हें प्राथमिकता क्षेत्र में दिए जाने वाले ऋण और सरकारी योजनाओं के लाभों के दायरे में लाने का काम किया।

सरकार ने महिलाओं को विकास वाहक के रूप में अपने आर्थिक एजेंडे के केंद्र में रखने का निर्णय लिया है।

आर्थिक शक्ति के रूप में नारी शक्ति

प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया है कि महिलाओं को सशक्त बनाना केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय रणनीति है। उन्होंने ही कहा था कि  जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो परिवार सशक्त होते हैं और जब परिवार सशक्त होते हैं, तो राष्ट्र निरंतर मज़बूत होता जाता है।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ राजनीतिक क्षेत्र में इस दर्शन की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति है। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में, विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र में महिलाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता एक व्यापक और बहुआयामी नीतिगत ढांचे के रूप में सामने आई है, जो ऋण, कौशल, बाज़ार तक पहुंच, पहचान और गरिमा जैसे पहलुओं को समाहित करती है।

महिलाओं के लिए तैयार की गई एक नीतिगत संरचना

एमएसएमई मंत्रालय ने अपने हर बड़े कार्यक्रम और योजना में महिलाओं के सशक्तिकरण को व्यवस्थित रूप से शामिल किया है।

ये सभी मिलकर, आपूर्ति पक्ष पर आठ मुख्य श्रेणियों के माध्यम से उद्यमियों को सहायता प्रदान करते हैं: तकनीक तक पहुँच, ऋण और वित्त तक पहुँच, डिजिटलीकरण को बढ़ावा, अवसरंचना सहायता, औपचारिकीकरण और समावेशन, बाज़ार तक पहुँच, और उद्योग-स्तरीय कौशल विकास।

पिछले पाँच वर्षों में, प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत 3.2 लाख से ज़्यादा महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों को सहायता दी गई है। हाल के आँकड़ों के अनुसार, पीएमईजीपी के कुल लाभार्थियों में से 39% महिलाएँ हैं जो इस योजना की रूपरेखा और महिलाओं की कुछ कर दिखाने की ललक, दोनों को दर्शाता है।

सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट महिला ऋणदाताओं को 90 प्रतिशत तक का बढ़ा हुआ गारंटी कवर प्रदान करता है। इससे बैंक बिना कुछ गिरवी रखे महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हैं।

इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक खरीद नीति  में संशोधन कर यह अनिवार्य किया गया कि केंद्रीय मंत्रालय, विभाग और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम अपनी वार्षिक खरीद का कम से कम 3 प्रतिशत हिस्सा महिला-स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों से ही खरीदें। इससे महिला उद्यमियों के लिए एक सुनिश्चित और अनुमानित बाज़ार तैयार होता है, जिससे सरकारी खर्च को महिलाओं के व्यवसाय की वृद्धि में बदला जा रहा है। यह देखकर खुशी होती है कि वित्त वर्ष 2025-26 में, केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों/केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा की गई कुल खरीद का 3.5 प्रतिशत हिस्सा महिला एमएसएमई  से ही खरीदा गया था।

‘जेडइडी’ (जीरो डिफेक्ट जीरो इफेक्ट) प्रमाणन योजना के तहत, महिला-स्वामित्व वाले एमएसएमई को प्रमाणन शुल्क पर सौ प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। ये विस्तृत विवरण काफी महत्वपूर्ण हैं और ये मंत्रालय के प्रयासों को दर्शाते हैं। मंत्रालय ने इस बारे में गहराई से विचार किया है कि महिलाओं को कहाँ कहाँ बाधाओं का सामना करना पड़ता है और ठीक उन्हीं बाधाओं को दूर करने के लक्ष्य के साथ सहायता दी गई।

‘महिला कॉयर योजना’, के तहत कॉयर क्षेत्र में काम करने वाली महिला कारीगरों को विशेष कौशल विकास और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। ‘एमएसएमई- व्यापार सशक्तिकरण और विपणन’ के तहत महिलाओं को मार्केटिंग के लिए मदद करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 5 लाख लाभार्थियों में से 50 प्रतिशत महिलाओं को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। ‘यशस्विनी अभियान’ में, एमएसएमई  योजनाओं और पंजीकरण से मिलने वाले लाभों के बारे में महिलाओं को जानकारी देने के लिए पूरे देश में विशेष जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। विशेष रूप से महिला उद्यमियों के लिए आयोजित ‘एमएसएमई आइडिया हैकाथॉन’ 3.0 के तहत 18,888 से अधिक आइडिया प्राप्त हुए, जो स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि महिलाओं में रचनात्मक और उद्यमशीलता की ऊर्जा का भंडार मौजूद है, जो बस बाहर आने का इंतज़ार कर रहा है।

इसके अलावा, मंत्रालय के पास एक समर्पित महिला उद्यमिता प्रकोष्ठ है, जो विभिन्न योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित करके, महिलाओं के लिए प्राप्त परिणामों की निगरानी और मूल्यांकन करके, तथा इकोसिस्टम के हितधारकों के साथ जुड़कर महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए एक नोडल केंद्र के रूप में कार्य करता है।

इन सभी पहलों ने जेंडर टारगेटिंग (लैंगिक लक्ष्यीकरण) और अभिसरण पर ध्यान केंद्रित किया है। ये कदम योजनाओं के भीतर केवल एक सब्सिडी प्रावधान के रूप में ‘महिलाओं के समावेश’ से आगे बढ़कर, महिला-अनुकूल उद्यमिता सहायता के लिए एक अधिक सुविचारित और व्यापक ढांचे की ओर बढ़ने के सफर को दर्शाते हैं।

कौशल, आत्मविश्वास, समुदाय

क्रेडिट और बाज़ारों से परे, सरकार ने यह माना है कि उद्यमिता कौशल और आत्मविश्वास का भी विषय है। विशेष रूप से पूर्वोत्तर में, जहाँ महिलाएँ पारंपरिक रूप से अपने समाज की आर्थिक रीढ़ रही हैं, लक्षित उद्यमिता विकास कार्यक्रमों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रशिक्षित प्रतिभागियों में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक हो।

स्वयं सहायता समूहों को एमएसएमई सहायता तंत्रों के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे महिला उद्यमियों के ऐसे समुदाय बने हैं जो एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। वे न केवल अपना व्यवसाय खड़ा करते हैं, बल्कि आपस में जुड़कर एक मजबूत नेटवर्क भी तैयार करते हैं।

यह एक ऐसी सरकार है जो निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है। प्रत्येक बजट, प्रत्येक योजना और प्रत्येक पोर्टल का सरलीकरण उस विशाल इमारत की एक ईंट के समान है, जिसकी नींव प्रधानमंत्री मोदी ने एक सरल, किंतु क्रांतिकारी विचार के साथ रखी थी—कि भारत की महिलाएं एक ऐसी शक्ति हैं जिन्हें अब स्वतंत्र और सशक्त होने का अवसर मिलना चाहिए।

हर उद्यम में नारी शक्तिकी भावना

नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने दुनिया को बताया कि भारत की महिलाएँ यहाँ की संसद का हिस्सा हैं। इस सरकार की एमएसएमई नीतियां दुनिया को यह बता रही हैं कि भारत की महिलाएँ देश के बाजारों, कारखानों, उसकी निर्यात श्रृंखलाओं, उसके नवाचार केंद्रों और उसके बोर्डरूम्स की भी हकदार हैं।

ये उसी एक सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ के अपने विज़न का आधार बनाया है। एक विकसित भारत वह भारत है, जहाँ 3 करोड़ से भी ज़्यादा महिला उद्यमी (और यह संख्या लगातार बढ़ रही है) विकास की असली ताकत हैं।

अभी हम उस लक्ष्य तक पूरी तरह नहीं पहुँचे हैं, लेकिन इस सरकार की देखरेख में और प्रधानमंत्री के पक्के इरादों के साथ, हम यकीनन उस राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

(लेखिका केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।)

भारत का फार्मा सेक्टर: नवाचार और युवाओं के लिए नया आकाश

श्री मती अनुप्रिया पटेल

भारत आज दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप अब हम केवल जेनेरिक दवा बनाने वाले देश से आगे बढ़कर एक नवाचारआधारित वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हैं। हमारी सरकार का उद्देश्य ऐसी नीतियां बनाना है जिससे देश के हर नागरिक कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं से मिल सकें। साथ ही सरकार निरंतर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दे रही है और भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काम कर रही है।

भारत की अब तक की सफलता उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और गुणवत्ता मानकों पर आधारित रही है। विश्व की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और 60 प्रतिशत वैक्सीन आपूर्ति के साथ देश ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने 8 से 10 वर्षों में देश को उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित बायोफार्मा और उन्नत चिकित्सीय उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

इसकी आधारशिला के रूप में हालिया केंद्रीय बजट में घोषित ₹10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल महत्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम देश में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार आधारित उद्योगों और अगली पीढ़ी की दवाओं के विकास को गति प्रदान करेगा।

आर्थिक आंकड़े भी इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्तमान में 50 अरब डॉलर का है। जिस रफ्तार से हम आगे बढ़ रहे हैं, 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इसे केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य के रोडमैप के तौर पर भी देखने की जरूरत है।

वर्तमान में फार्मास्युटिकल उद्योग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 30 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। 2030 तक हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र में 20 से 25 लाख नए रोजगार सृजित होंने की उम्मीद है। बायोफार्मा, मेडटेक और क्लीनिकल रिसर्च जैसे उभरते क्षेत्रों ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं।

हमारी सरकार का मानना है कि युवाओं की सफलता की नींव एक मजबूत शैक्षणिक ढांचे पर टिकी होती है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बजट में फार्मा सेक्टर के लिए और भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने देश में तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, वर्तमान में कार्यरत सात नाईपर संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इन सात संस्थानों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंसकी स्थापना की गई है, जो अनुसंधान और विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, नाईपर मोहाली में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल दवाओं की खोज एवं विकास, नाईपर अहमदाबाद में मेडिकल डिवाइसेज, नाईपर हैदराबाद में बल्क ड्रग्स, नाईपर कोलकाता में फ्लो केमिस्ट्री और सतत विनिर्माण, नाईपर रायबरेली में नोबेल ड्रग डिलीवरी सिस्टम, नाईपर गुवाहाटी में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा नाईपर हाजीपुर में बायोलॉजिकल थेरैप्यूटिक्स पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों का सीधा लाभ हमारे विद्यार्थियों को मिलेगा। नाईपर केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे ऐसे केंद्र बनेंगे जहां छात्र उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर काम करेंगे। इससे हमारे छात्र केवल ‘जॉब सीकर’ नहीं बल्कि ‘जॉब क्रिएटर’ और नवाचारी बनेंगे।

बदलते दौर में काम करने के तरीके बदल रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक फार्मा सेक्टर के लगभग 30-35 प्रतिशत कार्यबल को रीस्किलिंग यानी नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। केयर डिलीवरी, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषाएं बदल रही हैं। डेटा विश्लेषण, डिजिटल हेल्थ और नियामक मामलों में उच्च कौशल वाले युवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। हमारी सरकार का ध्यान इसी ‘स्किल गैप’ को भरने पर है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र क्लीनिकल रिसर्च और अनुसंधान और विकास में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करें।

शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करना हमारी प्राथमिकता है। जब तक हमारे कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतें एक समान नहीं होंगी, तब तक हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे।

इसीलिए, हम उद्योगअकादमिक साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं। इसी दिशा में, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल बिठाने के लिए नाईपर और उद्योग के बीच 356 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही स्किल डेवलपमेंट मिशनों के माध्यम से छात्रों को सीधे कंपनियों के साथ जुड़ने के मौके दिए जा रहे हैं। इससे न केवल युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बनेगा।

औषधि क्षेत्र का विकास जीडीपी बढ़ाने के साथ-साथ देश के युवाओं को सशक्त बनाने का भी एक मिशन है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की नींव हमारे युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के कंधों पर है। नाईपर का विस्तार और बजट में किए गए प्रावधान इस बात का प्रमाण हैं। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बना रहे हैं जहां एक छात्र अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सके। भारत के औषधि क्षेत्र का यह स्वर्णिम युग हमारे युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

  • लेखक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।

सही समय: महिला आरक्षण से बदलेगी भारतीय लोकतंत्र की तस्वीर

सुश्री शोभा करंदलाजे

एक राज्यमंत्री के रूप में पहली बार शपथ लेते समय, मैंने उस खचाखच भरे कमरे में चारों ओर नजरें घुमायीं और गिनती की। वहां मौजूद महिलाओं की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी। इस दृश्य ने केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में ही नहीं, बल्कि इस बात के स्पष्ट संकेत के रूप में भी एक छाप छोड़ी कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को अभी भी काफी लंबा सफर तय करना बाकी है।

मैं कर्नाटक के तटीय इलाके के पुत्तूर के पास स्थित एक छोटे से गांव से आती हूं। पारंपरिक रूप से यह एक समृद्ध इलाका है और यहां की महिलाओं ने हमेशा अपनी दृढ़ता एवं शक्ति का परिचय दिया है। मुझे पता है कि उस शक्ति को सार्वजनिक जीवन में लगाने का क्या मतलब होता है। खासकर, उस स्थिति में जब एक ऐसी राह पर चलना हो जिस पर पहले चंद लोग ही चले हों और हर महिला को वैसे ही जोश के साथ वैसा ही मौका नहीं मिला हो।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पहले ही पारित हो चुका है। संसद में सितंबर 2023 में इस पर चर्चा हुई थी और संविधान में संशोधन किया गया था। लेकिन अब उस वादे को निभाने का सबसे मुश्किल काम सामने है।

अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला लोकतंत्र

भारत में कुल 670 मिलियन महिलाएं हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों में महज 15 प्रतिशत महिलाएं ही संसद में पहुंच पायीं हैं। जो लोकतंत्र अपने आधे नागरिकों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से लगातार बाहर रखे, उसे सच्चा लोकतंत्र तो नहीं कहा जा सकता। ऐसे लोकतंत्र को विकास की प्रक्रिया में ही माना जाएगा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन कागज पर लिखे किसी कानून का तभी कोई महत्व होता है, जब उसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। जनगणना कराना बेहद जरूरी है। इसके बाद परिसीमन होना चाहिए और संसद तथा प्रत्येक राज्य की विधानसभा में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होनी चाहिए।

जब कानून बनाने वाली प्रक्रियाओं में महिलाओं को शामिल किया जाता है, तो कानून बनाने का केन्द्रबिंदु ही बदल जाता है। पंचायती राज संस्थाओं में, जहां दशकों पहले महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया था, प्राथमिकताओं में स्पष्ट बदलाव देखने को मिलता है। पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और बच्चों के पोषण के लिए अधिक बजट आवंटित किए गए। भ्रष्टाचार के प्रति कम सहनशीलता और समुदायों के प्रति अधिक जवाबदेही देखी गई। यह महज एक संयोग नहीं है। यह प्रतिनिधित्व का जीता-जागता उदाहरण है।

दुष्चक्र को तोड़ना

मैंने अक्सर यह तर्क सुना है कि महिलाओं को “अपनी योग्यता के बल पर” आगे बढ़ना चाहिए। मैं इस भावना का सम्मान करती हूं। लेकिन इस आधार को खारिज करती हूं। योग्यता शून्य में  नहीं पनपती। यह वहीं पनपती है, जहां अवसर मौजूद होते हैं।

पीढ़ियों से, संरचनात्मक बाधाओं – सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक – ने प्रतिभाशाली महिलाओं को राजनीति से बाहर रखा है। उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया में हमेशा उन्हीं लोगों को प्राथमिकता दी गई है जिनके पास सुस्थापित नेटवर्क एवं संपर्क तथा विरासत में मिली राजनीतिक साख रही है और जो घरेलू जिम्मेदारियों से मुक्त हैं। दूसरी ओर, महिलाओं को इनमें से कोई भी सुविधा हासिल नहीं है।

आरक्षण से स्तर कम नहीं होता, बल्कि यह अड़चन को दूर करता है

जब बड़ी संख्या में महिलाएं पंचायतों में दाखिल हुईं, तो शुरू में उन्हें नजरअंदाज किया गया। आखिरकार, विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया कि उनके अपने समुदायों ने उन्हें उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में अधिक प्रभावी, अधिक सुलभ और अधिक ईमानदार माना। जब महिलाओं को उचित अवसर दिया जाता है, तो वे केवल भाग ही नहीं लेती बल्कि नेतृत्व भी करती हैं।

नीतिगत दृष्टि से इसके मायने

सरकार में रहते हुए अपने व्यापक अनुभवों से मैंने यह जाना है कि निर्णय लेने वाले स्थानों पर आपकी मौजूदगी ही इस बात को निर्धारित करती है कि किस विषय पर चर्चा होगी। महिला जनप्रतिनिधि मातृ स्वास्थ्य निधि में कटौती की आशंका होने पर इसके लिए आवाज उठाती हैं। वे उन नीतियों के लैंगिक प्रभाव को उजागर करती हैं, जिनका व्यवहार में सबसे बुरा असर महिलाओं पर पड़ सकता है। वे अपने निर्वाचन क्षेत्र की उन चिंताओं को सामने लाती हैं, जिनसे  उनके पुरुष सहकर्मियों का सामना नहीं होता।

संसद और राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का मतलब यह है कि पहली बार ये आवाजें अपवाद नहीं रहेंगी। ये आवाजें ढांचागत व्यवस्था का हिस्सा होंगी। स्थायी होंगी। इन्हें नजरअंदाज करना असंभव होगा।

नारी शक्ति: सोच से कानून तक

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह मानना ​​रहा है कि भारत अपनी महिलाओं की पूर्ण और बराबरी की  भागीदारी के बिना अपनी पूरी क्षमताओं का सदुपयोग नहीं कर सकता। यह महज एक बयानबाजी  भर नहीं, बल्कि एक ऐसा दृढ़ विश्वास है जिसने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ से लेकर ‘जन धन’, ‘उज्ज्वला’ और ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ में महिलाओं की रिकॉर्ड भागीदारी वाली नीतियों को दिशा दी है। उन्होंने नारी शक्ति को केवल एक नारा नहीं, बल्कि विकसित भारत का आधार  बताया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी सोच की पूर्ण अभिव्यक्ति है। यह सोच महिला सशक्तिकरण को कल्याणकारी योजनाओं से आगे बढ़ाकर शासन की संरचना में समाहित करती  है।

सभी दलों के अपने साथियों से

यह क्षण हम सभी का है। यह मौका किसी एक दल का नहीं, बल्कि एक संस्था के रूप में संसद का है। सरकार के हर स्तर पर इस राष्ट्र की सेवा करने वाली एक महिला के रूप में, मैं सभी से अपील करती हूं और मेरा मानना ​​है कि हम सभी भारत के लोकतंत्र को मजबूत और अधिक पूर्ण देखना चाहते हैं। भारत की महिलाओं के प्रति हमारा अब यह कर्तव्य है कि हम जनगणना कराने, परिसीमन के कार्य को पूरा करने और यह सुनिश्चित करने में तत्परता बरतें कि इस प्रक्रिया में  एक भी दिन अनावश्यक रूप से बर्बाद न हो।

मैं कार्यान्वयन, आरक्षित सीटों के चक्रण (रोटेशन), परोक्ष (प्रॉक्सी) उम्मीदवारों और सनसेट क्लॉज से जुड़ी चिंताओं से अवगत हूं। ये जायज बहसें हैं, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इन पर तत्काल ध्यान दिया जाए। सिद्धांत सही है। जरूरत तत्परता की है। हमें पूर्णता को परिवर्तनकारी कदमों के आड़े नहीं आने देना चाहिए।

एक न्यायप्रिय राष्ट्र के रूप में

सितंबर 2023 में इतिहास रचा गया था। लेकिन इतिहास सार्थक तभी होता है जब उसके बाद की घटनायें भी मायने रखें। एक न्यायप्रिय देश अपने द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करके चुपचाप एक चिरस्थायी बदलाव को संभव बनाता है। अपने देश की सेवा करने की आकांक्षा रखने वाली हर युवती, मंच से हमेशा वंचित रहने वाली हर नेता और अभिव्यक्त होने से वाचित हर  आवाज के हित में, अब काम करने का समय है।

इस कानून को लागू कीजिए। दायरे का विस्तार कीजिए। सारा देश देख रहा है।  

(लेखिका केन्द्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम और रोजगार राज्यमंत्री हैं)

भारत की औषधि रणनीति पैमाने से नवाचार की ओर बढ़ रही है, ताकि देश को बायोफार्मा और उच्च-मूल्य वाले चिकित्सा विज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके

जगत प्रकाश नड्डा           

वैश्विक स्तर पर, कुल औषधि राजस्व में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो गयी है। लंबे समय से जेनरिक दवाओं में अग्रणी देश होने के कारण ‘विश्व की फ़ार्मेसी’ के रूप में प्रसिद्ध भारत का औषधि उद्योग अब पैमाने से नवाचार की ओर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत सरकार भविष्य के अनुरूप एक नीतिगत रूपरेखा को गति दे रही है, ताकि देश जेनरिक दवाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखते हुए इन उभरते क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त कर सके।

केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के मिशन बायोफार्मा निर्माण शक्ति की घोषणा इस दिशा में एक निर्णायक कदम को रेखांकित करती है। यह अगले 8 से 10 वर्षों में भारत को बायोफार्मा नवाचार और उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सेवाओं के वैश्विक केन्द्र बनाने के देश के संकल्प का संकेत देती है। यह विज़न गहरी वैज्ञानिक क्षमताओं के निर्माण, नवाचार-आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने और भारत को अगली पीढ़ी की दवाओं के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में उभरने में सक्षम बनाने पर आधारित होगा।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर और उन्नत चिकित्सीय क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं को गति देना है। यह कार्यक्रम औषधि विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की मौजूदा पहलों का पूरक है, जैसे फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना (पीआरआईपी), अनुसंधान विकास और नवाचार योजना, बायोनेस्ट आदि, जिनका उद्देश्य जैव- औषधि समेत जीवन विज्ञान क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है। ये पहलें भारत के नवाचार इकोसिस्टम को मजबूत करने, उद्योग-अकादमी सहयोग को बढ़ावा देने तथा जेनेरिक दवाओं से नवाचार संचालित दवा अनुसंधान और विकास की ओर बदलाव को सक्षम करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ किण्वन-आधारित निर्माण क्षमताओं का विकास करना है। एंटिबायोटिक, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के निर्माण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, यह क्षेत्र लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। अवसंरचना में निवेश करके, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाकर तथा लक्षित प्रोत्साहन प्रदान करके, भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में घरेलू क्षमता का निर्माण करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

भारत के नैदानिक ​​अनुसंधान इकोसिस्टम का विस्तार भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। 1,000 मान्यता प्राप्त नैदानिक ​​प्रयोग केंद्र स्थापित किये जायेंगे, जो वैश्विक दवा विकास गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को बेहतर बनायेंगे। अपनी लागत लाभ और कुशल शोधकर्ताओं की बढ़ती संख्या के साथ, भारत कुशल और उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक ​​प्रयोग के लिए असाधारण अवसर प्रदान करता है। साथ ही, नियामक व्यवस्था को मजबूत करने और संस्थागत क्षमताओं को बढ़ाने से भारत की मौजूदा व्यवस्था वैश्विक मानकों के अधिक अनुरूप होगी, जिससे तेज अनुमोदन संभव होंगे और वैश्विक हितधारकों के बीच विश्वास बढ़ेगा।

पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने पीएलआई और थोक दवा (बल्क ड्रग) पार्क योजनाओं के सहारे सक्रिय औषधि सामग्री (एपीआई) और मुख्य आरंभिक सामग्रियों (केएसएम) के स्थानीय उत्पादन में तेज़ी से प्रगति हुई है। इससे देश में दवाओं की कीमतें घटाने में मदद मिली है, जो विश्व स्तर पर सबसे कम कीमतों में से एक है और इसके कारण नागरिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल की लागत किफायती बनी रहती है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना ने सस्ती कीमतों पर गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है, जिसके तहत 19,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं। कैंसर और दुर्लभ रोगों की दवाओं जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाओं पर सीमा-शुल्क को सुव्यवस्थित करने जैसे पूरक उपाय जीवन रक्षक उपचारों तक पहुंच को और सुलभ बना रहे हैं। जैसे-जैसे उन्नत चिकित्सा प्रक्रियाएं अधिक व्यापक होंगी, किफायती दर और समान पहुंच सुनिश्चित करना केंद्रीय नीति की प्राथमिकता बनी रहेगी।

जैसे-जैसे उद्योग विकसित हो रहा है, भारत का उद्देश्य न केवल स्थापित बाजारों में बल्कि उभरते क्षेत्रों में, विशेष रूप से नवाचार-संचालित क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को मजबूत करना है। सुधार, इस बदलाव के केंद्र में हैं। नियामक समन्वय, अनुमोदन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और तेजी से मंजूरी जैसे प्रयास व्यापार करने में आसानी को बढ़ा रहे हैं। गुणवत्ता मानकों और नियामक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाने से भारतीय औषधि उत्पादों पर वैश्विक विश्वास की निरंतरता सुनिश्चित होती है। हालांकि, आरएंडडी निवेश बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसका समाधान करने के लिए, सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूती देना आवश्यक होगा, ताकि दीर्घकालिक नवाचार को बनाए रहा जा सके।

नीतिगत समर्थन, तकनीकी प्रगति और बाजार का आपसी समन्वय; औषधि क्षेत्र के लिए विकास का एक अद्वितीय अवसर प्रस्तुत करता है। भारत का घरेलू बाजार, जिसका मूल्य पहले से ही ₹4 लाख करोड़ से अधिक है, निरंतर विस्तार के लिए तैयार है। अगले दशक में, भारत न केवल जेनेरिक दवाओं में एक अग्रणी देश के रूप में, बल्कि नवोन्मेषी दवाओं, किण्वन-आधारित उत्पादों और अगली पीढ़ी की चिकित्सा-सेवाओं में भी एक शक्तिशाली केंद्र के रूप में उभरने के लिए बेहतर स्थिति में है।

निष्कर्ष के तौर पर, भारत का औषधि क्षेत्र नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जो नवाचार, सुदृढ़ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा द्वारा परिभाषित होता है। बायोफार्मा शक्ति कार्यक्रम जैसी पहलों, नैदानिक अवसंरचना के विस्तार और लक्षित निर्माण प्रोत्साहनों के समर्थन से, भारत धीरे-धीरे मात्रा-संचालित जेनेरिक दवा केंद्र से उच्च-मूल्य वाले बायोफार्मा नवाचार अग्रणी देश की ओर आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल में भारत की भूमिका को मजबूत करने और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न, विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।  

******** 

(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री हैं)

आखिरकार सुनी गई आधी आबादी की आवाज़
  • आर. विमला, आईएएस

नारी शक्ति वंदन अधिनियमऔर भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का न्यायोचित स्थान’

जब महिलाएँ सशक्त होती हैं, तो भारत मजबूत होता है। घर की गरिमा से लेकर संसद में समान आवाज़ तक, यह एक नए और आत्मविश्वास से भरे भारत की परिकल्पना है।” प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

भारत की महिलाएँ सदैव महान कार्यों में सक्षम रही हैं। वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी ने बड़े-बड़े दार्शनिकों को निरुत्तर कर दिया था। पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर ने जिस न्यायपूर्ण तरीके से अपने राज्य का शासन चलाया, उसकी बराबरी उनके समकालीन शासक नहीं कर सके। रानी लक्ष्मीबाई साहस की एक अमर मिसाल बन गईं। फिर भी, स्वतंत्र भारत—जो समानता के सिद्धांत पर आधारित एक संवैधानिक गणराज्य है ने इन महान महिलाओं की उत्तराधिकारियों को अपनी विधायिकाओं में शायद ही कोई जगह दी। पहली लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या मात्र 4.4 प्रतिशत थी। सात दशक बाद, 17वीं लोकसभा में भी यह आंकड़ा बढ़कर केवल 14.4 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया। व्यक्तिगत प्रतिभा ने तो अपनी जगह बना ली थी, लेकिन व्यवस्थागत बदलाव अभी भी नहीं आया था। असल में, महिलाएं अपने ही लोकतंत्र में एक तरह से ‘मेहमान’ बनकर ही रह गईं।

हमारे संविधान ने पहले ही दिन से यह स्वीकार किया था कि जब सदियों से ढांचागत विसंगतियां जड़ जमाए बैठी हों, तो केवल औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं होती। ‘संरक्षणात्मक भेदभाव’ के सिद्धांत के तहत अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और बाद में पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गईं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था सफल रही है: 24 मार्च 2026 तक, निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से लगभग 49.75 प्रतिशत महिलाएँ हैं। जिन जगहों पर महिलाएँ शासन करती हैं, वहाँ पानी की आपूर्ति सुचारू होती है, साफ़-सफ़ाई की स्थिति बेहतर होती है और लड़कियाँ स्कूल जाना जारी रखती हैं। इसके बावजूद, संसद में भी इसी सिद्धांत को लागू करने के उद्देश्य से जो विधेयक पेश किए गए थे, वे राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में दशकों तक बार-बार निष्प्रभावी होते रहे।

वह क्षण जिसने सब कुछ बदल दिया –

वह अधूरी कड़ी 19 सितंबर 2023 को पूरी हुई। भारत के नए संसद भवन में आयोजित कामकाज के पहले ही सत्र में, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को संसद के दोनों सदनों में, प्रत्येक राजनीतिक दल के सर्वसम्मत समर्थन से पारित किया गया। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विधेयक पेश करते हुए दोनों सदनों को बताया: “यह कानून केवल एक कानून नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक भारतीय महिला की शक्ति, त्याग और सामर्थ्य के प्रति एक श्रद्धांजलि है।”

यह अधिनियम लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उप-कोटा भी शामिल है। नए संसद भवन का यह पहला अधिनियम होना अपने आप में एक घोषणा थी: अमृत काल के लोकतंत्र की संरचना पूरे भारत के लिए और सभी की भागीदारी के साथ निर्मित की जाएगी।

इस अधिनियम में बदलाव लाने की अपार क्षमता है, क्योंकि इसके लागू होने से संसद में महिला सदस्यों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। महिला विधायक निरंतर स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं—ये वही क्षेत्र हैं, जहाँ भारत में लैंगिक असमानता सबसे अधिक है। एक ऐसी संसद, जिसमें एक-तिहाई सदस्य महिलाएँ होंगी, वह अलग तरह के प्रश्न पूछेगी और अलग तरह के विचार सुनेगी। इससे भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार होगा, न कि केवल उसकी बाहरी छवि में।

गरिमा से लोकतंत्र तक की यात्रा

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा यह समझा है कि ज़मीनी स्तर पर सशक्तिकरण के बिना राजनीतिक सशक्तिकरण खोखला होता है। उनके द्वारा शुरू की गई यह यात्रा अत्यंत बुनियादी गरिमा से लेकर सर्वोच्च लोकतांत्रिक भागीदारी तक एक सुविचारित पथ पर आगे बढ़ती है। इसकी शुरुआत एक शौचालय से हुई। स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाए गए 10 करोड़ घरेलू शौचालयों ने उन महिलाओं को सुरक्षा और आत्म-सम्मान लौटाया, जिन्हें लंबे समय से इन दोनों से वंचित रखा गया था। जल जीवन मिशन ने 15 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुँचाया। महिलाओं को मीलों पैदल चलकर पानी ढो कर लाने से मुक्ति मिली जिससे उनका सुबह का कीमती समय जाया हो जाता था।

‘पीएम उज्ज्वला योजना’ के 10.56 करोड़ एलपीजी कनेक्शनों ने महिलाओं को धुएं से भरी रसोई से मुक्ति दिलाई। पीएम आवास योजना के तहत महिलाओं के नाम पर घर बनाए गए। 55 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के स्वामित्व वाले जन धन खातों ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की। ‘मुद्रा’  योजना के ऋण, स्वयं सहायता समूह, लखपति दीदी, सखी, वन स्टॉप सेंटर और तीन तलाक का उन्मूलन: प्रत्येक योजना उसी सीढ़ी का अगला पायदान थी, जो उन्हें केवल गुज़ारा करने की स्थिति से गरिमा की ओर, गरिमा से सामर्थ्य की ओर, और सामर्थ्य से नेतृत्व की ओर निरंतर बढ़ाती गई।

आधुनिक भारत के लिए एक दृष्टिकोण –

भारत को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को तुरंत लागू करने की आवश्यकता है। यह हमारे दौर के सबसे अधिक परिवर्तनकारी संभावित सुधारों में से एक है। महिलाओं के विधायी प्रतिनिधित्व को बढ़ाकर, यह हर स्तर पर नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी को बढ़ाएगा: चाहे वे बजट हों जो मातृ स्वास्थ्य के लिए धन उपलब्ध कराते हैं, वे कानून हों जो पीड़ितों की रक्षा करते हैं, या वे नीतियां हों जो लड़कियों को स्कूल में बनाए रखती हैं और उनकी शिक्षा को बढ़ावा देती हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत’ (2047 तक एक विकसित भारत) का दृष्टिकोण इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि कोई भी राष्ट्र अपनी पूरी क्षमता तक तब तक नहीं पहुँच सकता, जब तक उसके आधे नागरिक उन जगहों से बाहर रहें जहाँ सत्ता का संचालन होता है। जैसा कि उन्होंने हमेशा कहा है: “भारत तभी एक विकसित राष्ट्र बनेगा जब इसकी महिलाएँ न केवल अपने घरों में, बल्कि अपनी संसद में भी पूरी तरह सशक्त होंगी।” नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय महिलाओं के लिए कुछ नया सृजन नहीं करता है। इसने उस विद्वत्ता, साहस और नेतृत्व करने की इच्छाशक्ति के लिए एक संस्थागत स्थान सुनिश्चित कर दिया है, जो महिलाओं में पहले से ही मौजूद है।

शौचालय की गरिमा से लेकर संसद में समान आवाज़ तक, यह मात्र एक विधायी यात्रा नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की कहानी है जिसने अंततः पूर्णता की ओर बढ़ने का निर्णय लिया है।

“आधी आबादी को आखिरकार सुना गया। नज़रिया साफ़ है। ये मुहीम जारी रहेगी।”

(लेखिका महाराष्ट्र सरकार में रेजिडेंट कमिश्नर एवं सचिव पद पर कार्यरत हैं और आईआईटी बॉम्बे से पीएचडी कर रही हैं)

नए साल में नई आशा: एक भारत की भावना
  •  श्री सी. पी. राधाकृष्णन

मुझे अत्यंत हर्ष है कि मैं भारत और विश्वभर के सभी लोगों को बैसाखी, रोंगाली बिहू, महा बिषुबा पना संक्रांति, पोइला बोइशाख, विषु और तमिल पुथांडु के अवसर पर अपनी पारंपरिक नववर्ष की शुभकामनाएँ देता हूं, जो ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाते हैं। ये सभी शुभ अवसर सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली लेकर आएं।

चिथिरई का महीना कृषि की तैयारियों का समय होता है। किसान अपनी ज़मीन को उपजाऊ बनाने के लिए उस पर काम करना शुरू कर देते हैं। चूंकि हमारे लोग मानते हैं कि मेहनत से ही प्रगति होती है, इसलिए वे श्रम की शुरुआत का जश्न मनाते हैं। पूरे देश में, हमें इसी तरह के उत्सव देखने को मिलते हैं, जो भारत में एकता और साझा संस्कृति के उदाहरण हैं।

उत्तर भारत में, विशेषकर पंजाब में, लोग बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में मनाते हैं। दक्षिण में, केरल में विशु मनाया जाता है, जहां शुभ वस्तुओं (कानी) को देखना एक महत्वपूर्ण रिवाज है। असम में लोग बिहू मनाते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में पोइला बोइशाख को उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।

इसी प्रकार मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी लोग इस अवधि को विभिन्न पारंपरिक रूपों में नववर्ष के रूप में मनाते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार में देशभर से श्रद्धालु गंगा में पवित्र स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं, जो इस अवसर की पवित्रता को दर्शाता है।

तेलुगु भाषी लोगों ने हाल ही में अपना नववर्ष उगादी के रूप में मनाया, जबकि मराठी और कोंकणी समुदाय अपना नववर्ष गुड़ी पड़वा के रूप में मनाते हैं। हम एक प्राचीन सभ्यता से संबंधित हैं, जिसका प्रमाण हमारे पूर्वजों के वैज्ञानिक ज्ञान से मिलता है। ब्रह्मांड के प्रति उनकी सटीक समझ इन नववर्ष उत्सवों में झलकती  है।

इसी प्रकार, तमिल नववर्ष एक अत्यंत विशेष अवसर है, जो हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव मनाता है। यह एक ऐसा पर्व है जो परंपरा, परिवार, आध्यात्मिकता और अनुशासित जीवन शैली को एक साथ जोड़ता है। यह एक नई शुरुआत का संकेत देता है और हमें पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए नई आशा के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

आज हम वैश्विक कैलेंडर का पालन करते हैं, लेकिन हमें अपने तमिल कैलेंडर को भी याद रखना चाहिए, जो अपनी विशेषता के कारण केवल दिनों और महीनों को ही नहीं, बल्कि वर्षों को भी नाम देता है। ऐसे कुल 60 वर्ष-नाम होते हैं, और इस वर्ष का नाम “पराभव” है, जो इस चक्र का 40वां वर्ष है।

‘खगोल विज्ञान’शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका अर्थ है तारों के नियमों का अध्ययन। तमिल में इसे “वाणियल” कहा जाता है। हजारों वर्ष पहले ही तमिल विद्वानों ने यह समझ लिया था कि पृथ्वी गोल है और उन्होंने खगोलीय पिंडों की गति तथा उनके प्रभाव का अध्ययन किया था।

प्राचीन तमिल साहित्य, जैसे कि पतिरुप्पट्टू, ब्रह्मांड की प्रकृति और गति का वर्णन करता है। श्लोकों में बताया गया है कि संसार पाँच तत्वों से बना है और आकाशीय शक्तियों से शासित है। सिरुपनरुप्पदई जैसी अन्य रचनाएं ग्रहों की गति का उल्लेख करती हैं।

संगम साहित्य में ग्रहों और तारों के संदर्भ मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराणनुरु में शनि को काला (मैम्मीन) बताया गया है। आकाशीय प्रभावों के अध्ययन की परंपरा “कनियान” कहलाने वाले विद्वानों से जुड़ी थी। माना जाता है कि कवि कनियान पूंगुंद्रनार ने अपना नाम इसी परंपरा से लिया है। यहां तक ​​कि तोलकाप्पियम जैसे प्राचीन ग्रंथ भी ऐसे विद्वानों को “अरीवर” कहते हैं। ‘अकनानुरु’ जैसे साहित्य से पता चलता है कि विवाह जैसे शुभ आयोजन उचित तिथियों और समय का चुनाव करके संपन्न किए जाते थे।यह परंपरा आज भी तमिलनाडु में जारी है। चिथिरई के पहले दिन मंदिरों में पंचांग पढ़ा जाता है और लोग इसे सुनने के लिए एकत्रित होते हैं।

पंचांग में पाँच तत्व होते हैं: वार (दिन), तिथि, करण, नक्षत्र और योग। इनके आधार पर वर्षा, कृषि और वर्ष से जुड़े अन्य पहलुओं के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। हमारे पूर्वज समय को मापने के लिए सौर और चंद्र दोनों प्रणालियों का उपयोग करते थे। आज आधुनिक विज्ञान उन्नत उपकरणों से ग्रहण की गणना करता है, लेकिन पहले भी इन घटनाओं का अध्ययन कर उन्हें सटीक रूप से बताया जाता था।

हमारे पूर्वजों से मिला ज्ञान हमारी धरोहर है। हमें इसे सुरक्षित रखना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए। मंदिरों में पंचांग का पाठ सुनना इस परंपरा का सम्मान करने का एक तरीका है। नववर्ष का एक और पहलू यह दिखाता है कि हमारे लोग प्रकृति की समृद्धि का कितना सम्मान करते थे। घरों में फल और फूल जैसी शुभ वस्तुओं को सजाया जाता है और सुबह सबसे पहले उन्हें देखा जाता है।

वसंत ऋतु वह समय है, जब प्रकृति खुद को नया रूप देती है। पेड़-पौधे फिर से हरे-भरे हो जाते हैं और फूल-फल खिलते हैं। प्रकृति के साथ तालमेल में रहने वाले तमिल लोग “कणी कणल” की परंपरा के जरिए इस समृद्धि को देखकर वर्ष की शुरुआत करते हैं।

इसी तरह, इस दिन बनने वाले पारंपरिक भोजन में सभी स्वाद शामिल होते हैं, यहाँ तक कि कड़वा भी। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सुख और दुख दोनों तरह के अनुभव होते हैं, और हमें उन्हें संतुलन के साथ स्वीकार करना चाहिए।

इन त्योहारों में पूरे देश में और दुनिया के उन हिस्सों में भी, जहां भारतीय समुदाय रहते हैं, एक समानता दिखाई देती है। ये उत्सव हमारी सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता की याद दिलाते हैं, साथ ही देश की एकता को भी दिखाते हैं। ये हमें मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा देते हैं।

मैं युवाओं से आग्रह करता हूँ कि वे नए साल को सकारात्मक सोच, विश्वास और समर्पण के साथ मनाएं  और अपने पूर्वजों के दिखाए रास्ते पर चलें। आइए हम देश की प्रगति में योगदान देने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ें।

हमारा भारत हमेशा से अपनी सभ्यता के मूल्यों में एक रहा है और आगे भी एक बना रहेगा। बड़ों के आशीर्वाद से युवा पीढ़ी ‘एक भारत’ की भावना के साथ आगे बढ़े और 2047 तक ‘श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत’ के निर्माण में सफल हो।

(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)

पहुंच से प्राधिकार तक: नारीशक्ति को अगले दशक का भारत का निर्णायक सुधार बनाना
  • डॉ. संगीता रेड्डी

पिछले एक दशक में, भारत ने कुछ वैसा किया है जिसे कुछ ही देश बड़े पैमाने पर हासिल कर पाए हैं। भारत ने महिला सशक्तिकरण को इरादों से आगे जाकर बुनियादी ढांचे में बदल दिया है।

यह बदलाव कोई अनायास नहीं हुआ। यह सुनियोजित था। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, नीतिगत रूप से महिलाओं को विकास के केन्द्र में अधिक से अधिक रखा गया। ऐसा यह मानते हुए किया गया कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो पूरी अर्थव्यवस्था में तेजी आती है।

इसके नतीजे सामने हैं। और इन नतीजों को मापा जा सकता है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 57 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए हैं। इन खातों  में से 55 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के हैं। इस कदम से लाखों लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में पहली बार कदम रखने का मौका मिला है। लगभग 10 करोड़ महिलाएं, 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों में संगठित होकर, जमीनी स्तर पर उद्यमिता और स्थानीय आर्थिक मजबूती का वाहक बन रही हैं।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 10.5 करोड़ से अधिक परिवारों तक पहुंच चुकी है। इससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कम हुए हैं और महिलाओं को अधिक समय लेने वाले श्रम से मुक्ति मिली है। ऋण तक पहुंच बढ़ी है और मुद्रा योजना के तहत दिए गए लगभग 70 प्रतिशत ऋण महिला उद्यमियों को मिले हैं। महिला श्रमशक्ति की भागीदारी बढ़कर लगभग 37 प्रतिशत हो गई है। इससे महिलाओं की भागीदारी में लंबे समय से चला आ रहा गिरावट का रुझान अब उलट गया है।

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसे कार्यक्रमों ने जीवन के महत्वपूर्ण चरणों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को बढ़ाया है और नाजुक स्थितियों में कमी लाई है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों ने समाज में गहराई से पैठी सोच को बदलना शुरू कर दिया है।

अलग-अलग, ये सभी कार्यक्रम बेहद ठोस हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो, ये कार्यक्रम भारत में महिलाओं को देखने के नजरिए में आए एक संरचनात्मक बदलाव को दर्शाते हैं। महिलाओं को अब मात्र समर्थन पाने वाली के बजाय विकास के वाहक के रूप में देखा जा रहा है।

नीति निर्माताओं और प्रशासकों के लिए, इसके सबक बिल्कुल साफ हैं: जब डिजाइन, कार्यान्वयन और जवाबदेही व्यवस्थित हों, तो व्यापक स्तर पर काम करना संभव होता है।

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपने काम के दौरान, मैंने देखा है कि जब प्रणालियां सैद्धांतिक मॉडलों के बजाय वास्तविक जरूरतों पर आधारित होती हैं, तो नतीजे बेहतर होते हैं। यही सिद्धांत यहां भी लागू होता है। जहां पहुंच सरल होती है, जहां वितरण में निरंतरता होती है और जहां नतीजों पर नजर रखी जाती है, वहां असर बिल्कुल साफ नजर आता है।

फिर भी, अगले चरण में और भी अधिक ध्यान देने की जरूरत होगी। क्योंकि हमारे सामने चुनौती अब नीति निर्माण की नहीं, बल्कि नीति के कार्यान्वयन की है।

कार्यक्रमों की व्यापकता के बावजूद, जागरूकता संबंधी कमजोरियां बनी हुई हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल होने के आंकड़े एकसमान नहीं है। अंतिम छोर तक आपूर्ति अभी भी स्थानीय क्षमता पर ही निर्भर हैं। अवसर पाने वाली प्रत्येक महिला की दृष्टि से, ऐसी कई और महिलाएं हैं जो नीतिगत कमियों की वजह से नहीं, बल्कि पहुंच की कमी के कारण हाशिए पर बनी हुई हैं।

यहीं पर प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका निर्णायक हो जाती है।

हमें योजनाओं की घोषणाओं से आगे बढ़कर, उनकी व्यापकता सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना होगा। आउटपुट को मापने से आगे बढ़कर नतीजों पर नजर रखने की दिशा में बढ़ना होगा। पात्रता को कागज़ पर दर्ज करने से आगे जाकर व्यवहार में उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। जिला स्तर पर स्वामित्व, डेटा-आधारित निगरानी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होंगे। प्रौद्योगिकी इस प्रक्रिया को गति दे सकती है, लेकिन यह जमीनी जवाबदेही का स्थान नहीं ले सकती।

आज हर नीति निर्माता के सामने बिल्कुल सीधा सा सवाल है: हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि कोई भी योग्य महिला पीछे न छूटे?

यहीं पर नारी शक्ति वंदन अधिनियम हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक बन सकता है।

विधायी निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाकर, नीति निर्माण को वास्तविक जीवन के अनुभवों के अनुरूप बनाने की संभावना पैदा होती है। महिला नेता समुदाय की वास्तविकताओं से जुड़ी अंतर्दृष्टि लेकर आती हैं – ऐसी अंतर्दृष्टि जो कार्यक्रमों को मजबूत कर सकती है, उनके कार्यान्वयन को बेहतर बना सकती है, लक्ष्यीकरण में सुधार कर सकती है और उन्हें तेजी से अपनाने में सहायक साबित हो सकती है।

उद्देश्यपूर्ण तरीके से कार्यान्वित किए जाने पर, नारी शक्ति वंदन अधिनियम का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है: नेतृत्व में अधिक महिलाएं आ सकती हैं, अधिक उत्तरदायी नीतियां बन सकती हैं, उच्च भागीदारी और मजबूत नेतृत्व क्षमता का निर्माण संभव हो सकता है। इसी तरह सुधार अपने-आप सुदृढ़ होता जाएगा। इसी तरह आत्मनिर्भर और विकसित भारत के लक्ष्य भी हासिल किए जा सकेंगे।

हम ज्ञान, नवाचार और प्रौद्योगिकी द्वारा परिभाषित दशक में कदम रख रहे हैं। भारत के पास पहले से ही एक मजबूत आधार मौजूद है। यहां वैश्विक स्तर पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) की शिक्षा में महिलाओं का अनुपात सबसे अधिक है। इस उपलब्धि को बिना कोई समय गवांए स्वास्थ्य सेवा, विज्ञान, उद्यम और शासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व में बदल देने का यही सही क्षण है।

पिछले दशक ने यह दर्शाया है कि नीति निर्माण और कार्यान्वयन के साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति का समन्वय होने पर क्या कुछ संभव हो सकता है। आज की ठोस बुनियाद पर, नारी शक्ति वंदन अधिनियम का कार्यान्वयन सशक्तिकरण को पहुंच से परे प्राधिकार तक ले जा सकता है।

लेकिन प्रतिनिधित्व को क्षमता में बदलना चाहिए और क्षमता का विकास संस्थागत समर्थन के जरिए होना चाहिए, ताकि कार्यान्वयन से सही नतीजे हासिल हो सकें।

अगले पांच वर्षों में, हमें महिलाओं को न केवल चुनावी रूप से, बल्कि संस्थागत रूप से भी नेतृत्व करने के लिए तैयार करने की दिशा में निवेश करना होगा। इसका सीधा मतलब है व्यवस्थित  मार्गदर्शन, नेतृत्व संबंधी प्रशिक्षण, नीतिगत अनुभव और प्रभावी शासन को संभव बनाने वाली प्रशासनिक सहायता प्रणाली।

इसका मतलब यह भी है कि हमें नीति निर्माण के तरीकों पर नए सिरे से विचार करना होगा। कार्यक्रम सुलभ, समझने में आसान और तेज गति से कार्यान्वित किए जा सकने वाले होने चाहिए। नीतियों को जरूरत के हिसाब से विकसित करने के लिए फीडबैक प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए। और सफलताओं को केवल कवरेज से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आय, शिक्षा और सशक्तिकरण जैसे नतीजों में हुए बदलाव के आधार पर मापा जाना चाहिए। अब जबकि भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है, ऐसे में यह कोई गौण मुद्दा नहीं है – यह हमारी सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। महिलाओं की भागीदारी आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और संस्थागत प्रभावशीलता से सीधे जुड़ी हुई है।

इसलिए सफलता का असली पैमाना यह नहीं होगा कि हम कितनी योजनाएं बनाते हैं, बल्कि यह होगा कि हम कितने लोगों के जीवन को बदल पाते हैं।

अगर भारत पहुंच के मामले में संतृप्ति हासिल कर लेता है, भागीदारी को मजबूत करता है और नेतृत्व को सक्षम बनाता है, तो वह न केवल अपनी महिलाओं को सशक्त बनाएगा बल्कि अपने विकास की राह को भी नए सिरे से निर्धारित करेगा।

नीति निर्माताओं और प्रशासकों के लिए जिम्मेदारियां बिल्कुल साफ हैं। इन्हें पूरा करने का समय अब ​​आ गया है।

(लेखिका अपोलो हॉस्पिटल्स में संयुक्त प्रबंध निदेशक हैं)

भारत के अंतिम छोर पर स्थित स्वास्थ्य एवं कल्याण इकोसिस्टम को मजबूत बनाना
  • श्री प्रतापराव जाधव

अब जबकि भारत सभी के लिए न्यायसंगत, समावेशी और समग्र स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमें एक मौलिक प्रश्न पूछना होगा: हम अंतिम गांव के अंतिम व्यक्ति तक सही समय पर गुणवत्तापूर्ण देखभाल पहुंचना कैसे सुनिश्चित करें?

इसका जवाब केवल बुनियादी ढांचे के विस्तार या उन्नत प्रौद्योगिकियों के उपयोग में ही नहीं, बल्कि उन प्रणालियों को मजबूत करने में भी निहित है जो स्वाभाविक रूप से सुलभ, सस्ती और समुदायों के भरोसे पर खरे उतरते हों। इस संदर्भ में, होम्योपैथी भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ-साथ एक मौन लेकिन शक्तिशाली ताकत के रूप में उभर रही है और जमीनी स्तर पर समग्र स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी ढांचे को बदल रही है।

हम यह दिखाई दे रहा है कि होम्योपैथी कैसे जनजातीय क्षेत्रों, ग्रामीण इलाकों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी वाले शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति से जुड़ी महत्वपूर्ण कमियों को दूर कर रही है। इसके प्रभाव का पता केवल व्यापकता से ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक जरूरत वाले स्थानों – यानी अंतिम छोर – तक पहुंचने की क्षमता से भी चल रहा है।

अब जबकि हर वर्ष 10 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘विश्व होम्योपैथी दिवस’ करीब है, यह इस बात पर विचार करने का एक सही मौका है कि यह प्रणाली केवल व्यक्तिगत कल्याण ही नहीं बल्कि समग्र कल्याण का एक ऐसा मॉडल बनाने में भी योगदान दे रही है जो किफायती, पर्यावरण के अनुकूल और सामाजिक रूप से समावेशी हो। इस वर्ष विश्व होम्योपैथी दिवस की थीम “सतत स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी” है।

18वीं शताब्दी में सैमुअल हैनिमैन द्वारा विकसित और 19वीं शताब्दी में भारत लाई गई, होम्योपैथी “सिमिलिया सिमिलिबस क्यूरेंचर” यानी “समान से समान का उपचार” के सिद्धांत पर आधारित है। दशकों से एक समग्र और रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए, यह भारत की बहुआयामी स्वास्थ्य एवं कल्याण प्रणाली का एक अभिन्न अंग बन गई है।

जमीनी स्तर पर होम्योपैथी की सबसे बड़ी खूबी इसकी निरंतर देखभाल सुनिश्चित करने की क्षमता है। कई पिछड़े इलाकों में स्वास्थ्य सेवा टुकड़ों में बिखरी हुई नहीं होती, बल्कि निरंतर  और रिश्तों से सचालित होती है। होम्योपैथी का व्यक्ति-केन्द्रित उपचार का दृष्टिकोण, खासतौर पर पुरानी बीमारियों, बार-बार होने वाले संक्रमणों और जीवनशैली संबंधी विकारों के प्रबंधन के क्रम में चिकित्सक और रोगी के बीच दीर्घकालिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। यह निरंतरता उपचार के प्रति रोगी के समर्पण और समग्र स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों में उल्लेखनीय सुधार करती है।

आज भारत में 290 से अधिक होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल हैं। साथ ही, देशभर में चिकित्सकों का एक विशाल नेटवर्क भी उपलब्ध है। फिर भी, होम्योपैथी के असली प्रभावों को संस्थानों में नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर – झारखंड के जनजातीय जिलों, छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में और हिमाचल प्रदेश की दूरदराज की बस्तियों में – बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। वहां एक अकेला चिकित्सक भी सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों में बदलाव ला सकता है।

होम्योपैथी की प्रमुख खूबियों में से एक इसकी सरलता भी है। दवाइयां किफायती होती हैं, इन्हें लाना-ले जाना आसान होता है और इनके भंडारण के लिए किसी जटिल भंडारण संरचना की जरूरत ही नहीं होती है। कमजोर आपूर्ति श्रृंखलाओं और सीमित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों वाले इलाकों में, होम्योपैथी की ये विशेषताएं अनमोल हो जाती हैं।

जनजातीय समुदायों, जो हमारी आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अक्सर बीमारियों का बेमेल बोझ झेलते हैं, के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सांस्कृतिक रूप से भी अनुकूल होना चाहिए। होम्योपैथी का सौम्य और गैर-आक्रामक रवैया पारंपरिक उपचार पद्धतियों के अनुरूप है, जिससे यह अपेक्षाकृत अधिक स्वीकार्य और सुलभ हो जाता है।

इसी क्षमता को पहचानते हुए, भारत सरकार ने होम्योपैथी को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं साथ जोड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत, 12,500 से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (आयुष) स्थापित किए गए हैं, जो सामुदायिक स्तर पर होम्योपैथी सहित व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि होम्योपैथी भारत में गैर-संक्रामक रोगों से निपटने में भी योगदान दे रही है। केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) ने मधुमेह, हृदय रोग और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से निपटने से संबंधित राष्ट्रीय कार्यक्रमों में होम्योपैथी को जोड़ा है। यह प्राथमिक देखभाल से परे इसकी प्रासंगिकता को दर्शाता है।

आपूर्ति के नए-नए मॉडल भी उतने ही उत्साहजनक हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के अंतर्गत सेवाओं के एक ही स्थान पर उपलब्ध होने की सुविधा ने पहुंच और विश्वास दोनों को बेहतर बनाया है। चलंत चिकित्सा इकाइयां जहां दूरदराज के इलाकों तक पहुंच रही हैं, वहीं सामुदायिक सहायता से जुड़ी पहलों और महामारी से निपटने से संबंधित कार्यक्रमों ने विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य परिदृश्यों में होम्योपैथी की अनुकूलता को प्रदर्शित किया है।

शायद सबसे कारगर मॉडल बुनियादी होम्योपैथी में प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का है। सही ज्ञान और रेफरल सिस्टम के सहयोग से, ये कार्यकर्ता न्यूनतम लागत पर स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार कर सकते हैं। स्वास्थ्य रक्षा जैसे कार्यक्रम और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीसीआरएच) द्वारा संचालित संपर्क संबंधी पहलों ने पहले ही दिखा दिया है कि समुदाय-आधारित दृष्टिकोण सार्थक नतीजे दे सकते हैं।

भविष्य को देखते हुए, सतत स्वास्थ्य एवं कल्याण के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत, पुरानी बीमारियों का बढ़ता बोझ और रोगाणुरोधी प्रतिरोध जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने हेतु ऐसे समाधानों की जरूरत है जो न केवल कारगर हों बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से व्यवहारिक भी हों।

होम्योपैथी इस दृष्टिकोण के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाती है। इसके कम लागत वाले उपचार परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर वित्तीय बोझ को कम करते हैं। जबकि इसका न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार स्वास्थ्य और कल्याण संबंधी कार्यप्रणालियों का समर्थन करता है।

अब हमारा ध्यान इन प्रयासों को व्यापक स्तर पर कार्यान्वित करने पर होना चाहिए।  इन प्रयासों में कम सुविधा वाले क्षेत्रों में प्रशिक्षण को मजबूत करना, दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना, गहन अनुसंधान एवं दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देना और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना शामिल है।

विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भौगोलिक स्थिति या सामाजिक-आर्थिक हैसियत की परवाह किए बिना गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रत्येक नागरिक तक पहुंचेगी। होम्योपैथी, अपने गहरे सामुदायिक जुड़ाव और टिकाऊ दृष्टिकोण के साथ, इस लक्ष्य को हासिल  करने का मार्ग प्रशस्त करती है।

हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की असली पहचान उसकी अत्याधुनिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि हाशिए  पर रहने वाले लोगों की सेवा करने की उसकी क्षमता में निहित है। जब एक सरल और किफायती उपाय किसी दूरदराज के गांव में एक परिवार को राहत पहुंचाता है, तो यह इस    सशक्त विचार को पुष्ट करता है – कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं अधिक समावेशी, अधिक मानवीय और वास्तव में सार्वभौमिक होती जा रही हैं।

[लेखक आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं]

भारत की विकास गाथा के केंद्र में महिलाएँ
  • श्रीमती विजया रहाटकर

भारत की विकास गाथा को अक्सर संख्याओं, विकास दरों, अवसंरचना विस्तार और आर्थिक उपलब्धियों के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन, पिछले दशक का सबसे बड़ा बदलाव आँकड़ों से परे है। यह एक गहरे सामाजिक बदलाव में परिलक्षित होता है—महिलाओं का केवल भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को आकार देने वाले अग्रिम व्यक्तियों के रूप में उभरना।

महिलाओं के नेतृत्व में विकास की ओर यह बदलाव न तो आकस्मिक है और न ही अलग-थलग है। यह एक सोच-समझकर किये गये सतत प्रयास का परिणाम है, जो जीवन के हर चरण में महिलाओं को समर्थन देने के लिए एक सक्षम इकोसिस्टम का निर्माण करता है। लड़की के जन्म से लेकर उद्यमी, पेशेवर, या सार्वजनिक प्रतिनिधि के रूप में उसकी यात्रा तक, यह दृष्टिकोण समग्र, सतत और परिवर्तनकारी रहा है।               

राजनीतिक भागीदारी में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा गया है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 12,14,885 है, जिनकी कुल 24,41,781 निर्वाचित प्रतिनिधियों में हिस्सेदारी 49.75% है—इस प्रकार, महिलाएँ जमीनी स्तर पर शासन में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। इस क्रम में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी उपलब्धि है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। यह उच्च विधायी क्षेत्रों में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने में राष्ट्र की अडिग प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। इस ऐतिहासिक सुधार की वास्तविक क्षमता केवल इसके प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से ही हासिल की जा सकती है। अधिनियम की प्रावधानों को जल्द से जल्द लागू करने की आवश्यकता है, ताकि महिलाओं की आवाज़ को सिर्फ मान्यता ही न मिले, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संरचना में इसे संस्थागत रूप से समाहित किया जा सके। इसके जल्द लागू होने से न केवल समावेशी शासन को गति मिलेगी, बल्कि यह बेहतर प्रतिनिधित्व और न्यायसंगत राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक के रूप में भी कार्य करेगा।  

दशकों तक, लैंगिक पक्षपात ने भारत के जनसांख्यिकीय और सामाजिक संकेतकों को प्रभावित किया। आज, वह कहानी धीरे-धीरे फिर से लिखी जा रही है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों ने गहरी  जड़ें जमा चुकी मानसिकताओं को चुनौती देने और लड़की के मूल्य को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। इसका प्रभाव राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) में दिखाई देता है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का लैंगिक अनुपात दर्ज किया गया है, जो सिर्फ संख्यात्मक सुधार ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का भी संकेत देता है। ‘मिशन इंद्रधनुष’ जैसे कार्यक्रम जीवन के प्रारंभिक चरण में पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करते हैं। ‘मिशन सक्षम आंगनवाड़ी’, ‘पोषण 2.0’, तथा ‘पोषण अभियान’ के प्रयास कुपोषण का समाधान करते हैं—यह मानते हुए कि स्वस्थ बचपन, सशक्त वयस्कता की ओर पहला कदम होता है।  

माताओं के लिए, संस्थागत समर्थन में काफी विस्तार हुआ है। पीएमएमवीवाई के तहत, 4.28 करोड़ से अधिक महिलाओं को 20,149 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि वितरित की गयी है, जो गर्भावस्था के दौरान वित्तीय सहायता प्रदान करती है। 

महिलाएं केवल भाग ही नहीं ले रही हैं—वे नेतृत्व भी कर रही हैं। भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में संस्थापक और निर्णयकर्ताओं के रूप में महिलाओं की भूमिका में लगातार वृद्धि हो रही है और वे नवाचार और उद्यम में भी योगदान दे रही हैं। इस परिवर्तन में वित्तीय समावेश ने अहम भूमिका निभाई है। पीएमएमवाई के तहत, 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 57.79 करोड़ ऋण प्रदान किए गए हैं, जिनमें लगभग 66% लाभार्थी महिलाएं हैं। प्रत्येक ऋण केवल वित्तीय सहायता का ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आकांक्षाओं में विश्वास का भी प्रतीक है। इसके पूरक रूप में, जन धन योजना के तहत वित्तीय समावेश और गहरा हुआ है, जिसके अंतर्गत 57.93 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें से 32.29 करोड़ (55.7%) महिलाओं के हैं।

जमीनी स्तर पर, परिवर्तन का पैमाना और भी अधिक प्रभावशाली है। लगभग 10 करोड़ महिलाओं को 90 लाख से अधिक स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिससे सामूहिक सहनशीलता, वित्तीय स्वतंत्रता और सामाजिक आत्मविश्वास को बढ़ावा मिला है। इस इकोसिस्टम ने 3 करोड़ से अधिक महिलाओं को लखपति दीदी के रूप में उभरने में सक्षम बनाया है और स्वयं सहायता समूहों को 12.50 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बैंक ऋण प्राप्त हुआ है। इसके अलावा, 84 लाख ग्रामीण महिलाएं उद्यमी बन चुकी हैं, जबकि 5 करोड़ महिला किसानों ने उन्नत और सतत कृषि प्रथाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किये हैं।

स्वाभाविक रूप से अगला सवाल उठता है—क्या सशक्तिकरण, आजीविका से समृद्धि की ओर बढ़ सकता है? लखपति दीदी जैसी पहलों का लक्ष्य आय सृजन को मजबूत करना है, जबकि ड्रोन दीदी पहल, जिसका लक्ष्य 15,000 महिलाओं को ड्रोन पायलट के रूप में प्रशिक्षित करना है, एक दूरदर्शी दृष्टिकोण को परिलक्षित करती है—ग्रामीण महिलाओं को प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि इकोसिस्टम में एकीकृत करना।

सशक्तिकरण का मतलब रोजमर्रा के बोझ को आसान बनाना भी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10.56 करोड़ से अधिक धुँआ-रहित रसोई घरों ने स्वास्थ्य में सुधार किया है और कठिनाइयों को कम किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 11.8 करोड़ से अधिक शौचालयों के निर्माण ने गरिमा और सुरक्षा में वृद्धि की है। प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसकी 73% लाभार्थी महिलाएं हैं, के तहत निर्मित घरों ने स्वामित्व और सुरक्षा को मजबूत किया है। साथ मिलकर ये सभी पहलें दैनिक जीवन में गरिमा की परिभाषा को नए सिरे से स्थापित करती हैं।

इसके साथ ही, महिलाएं उन स्थानों में भी प्रवेश कर रही हैं, जिन्हें कभी उनकी पहुँच से बाहर माना जाता था। सशस्त्र बल इस बदलती हुई वास्तविकता को दर्शाते हैं, जहाँ महिलाएँ नेतृत्व और जिम्मेदारी की भूमिकाएँ निभा रही हैं, जिसमें युद्ध क्षेत्र भी शामिल हैं। सवाल अब यह नहीं है कि महिलाएँ सेवा कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि वे कितनी दूर तक नेतृत्व कर सकती हैं।

कार्यस्थल सुधारों ने भी इस बदलाव में योगदान दिया है। नयी श्रम संहिताएँ महिला कर्मचारियों को उचित सुरक्षा उपायों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में, जिसमें रात की शिफ्ट भी शामिल है, काम करने में सक्षम बनाकर समावेश को बढ़ावा देती हैं। ये संहिताएँ समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान पर जोर देती हैं—सुरक्षा से सशक्तिकरण की ओर बदलाव को रेखांकित करती हैं।

संस्थागत समर्थन एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने शिकायत निवारण से आगे बढ़कर सक्रिय जुड़ाव और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भी अपना विस्तार किया है। ‘शी सर्व्स’ जैसी पहल महिला अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन करती हैं, जबकि ‘यशोदा एआई’ उन्हें उभरते तकनीकी कौशल प्रदान करती है। ‘कैंपस कॉलिंग’ युवाओं में जागरूकता बढ़ाता है, ‘शी इज अ चेंज मेकर’ कार्यक्रम जमीनी स्तर पर नेतृत्व क्षमता को मजबूत करता है और ‘महिला जनसुनवाई’ सुलभ शिकायत निवारण सुनिश्चित करता है।

जो उभरकर सामने आता है, वह प्रयासों का एक शक्तिशाली समन्वय है, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास के नए युग को आकार दे रहा है।   

(लेखिका राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष हैं)