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सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की पहल ने आयुर्वेद ज्ञान विरासत के संरक्षण को दी नई मजबूती

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

उडुपी: भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आयुष मंत्रालय के तहत कार्यरत CCRAS और शिक्षा मंत्रालय के तहत संचालित CSU ने तिगलारी और प्राचीन कन्नड़ लिपियों में लिखी आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण हेतु 15 दिवसीय क्षमता-निर्माण कार्यशाला का शुभारंभ किया है। यह कार्यशाला उडुपी स्थित श्री पुथिगे नरसिम्हा सभा भवन, गीता मंदिर में आयोजित की जा रही है।


कार्यक्रम का आयोजन CCRAS और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा श्री वदिराजा अनुसंधान फाउंडेशन के सहयोग से संयुक्त रूप से किया जा रहा है। यह पहल श्री पुथिगे मठ के पीठाधिपति श्री श्री सुगुनेन्द्र तीर्थ श्रीपाद तथा कनिष्ठ पीठाधिपति श्री श्री सुश्रीन्द्र तीर्थ श्रीपाद के आशीर्वाद से संचालित हो रही है।
कार्यशाला का उद्देश्य क

र्नाटक के तटीय क्षेत्रों में प्रचलित तिगलारी और प्राचीन कन्नड़ लिपियों में संरक्षित दुर्लभ आयुर्वेद पांडुलिपियों को पढ़ने, समझने, लिप्यंतरित करने और संरक्षित करने के लिए विद्वानों को प्रशिक्षित करना है।


कार्यक्रम का उद्घाटन सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य ने किया। इस अवसर पर श्री पुथिगे मठ के प्रशासक एवं दीवान नागराज आचार्य, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (एनआईआईएमएच) हैदराबाद के सहायक निदेशक डॉ. जी.पी. प्रसाद, केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) बेंगलुरु के सहायक निदेशक डॉ. टी. महेश्वर तथा निट्टे विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र के निदेशक डॉ. सुधीर राज के. सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समन्वय श्री वदिराजा अनुसंधान फाउंडेशन के निदेशक विद्वान गोपालचार्य ने किया।


अपने संबोधन में प्रो. वैद्य रबीनारायण आचार्य ने आयुर्वेदिक ज्ञान के संरक्षण, प्रलेखन और प्रसार के लिए सीसीआरएएस द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने भारत सरकार के “ज्ञान भारतम मिशन” के तहत देश की समृद्ध ज्ञान परंपराओं को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए चलाए जा रहे अभियानों पर भी प्रकाश डाला।


वहीं, डॉ. सुधीर राज के. ने भारत की हस्तलिखित विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणालियां अनुसंधान और ज्ञान के प्रसार को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।


15 दिवसीय इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान आयुर्वेद और संस्कृत विषयों से जुड़े युवा शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में अप्रकाशित आयुर्वेद पांडुलिपियों के अध्ययन, लिप्यंतरण, संपादन और प्रकाशन की प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
गौरतलब है कि सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह तीसरी कार्यशाला है। इससे पहले ओडिशा के पुरी में करणी एवं देवनागरी लिपियों तथा केरल के गुरुवायूर में वट्टेझुथु एवं मलयालम लिपियों पर आधारित कार्यशालाओं का सफल आयोजन किया जा चुका है।


इस कार्यशाला में श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर आयुर्वेद महाविद्यालय उडुपी और हसन के संकाय सदस्य एवं छात्र, साथ ही श्री पुथिगे मठ के गुरुकुल के संस्कृत विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान तैयार की गई लिप्यंतरित पांडुलिपियों को बाद में सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाएगा, जिससे भारत की अमूल्य पारंपरिक ज्ञान संपदा के संरक्षण और व्यापक प्रसार को नई गति मिलेगी।

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