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Punjab Stubble Burning: पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में करीब 90% कमी, जानिए भगवंत मान सरकार की रणनीति

पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं 2022 के 49,922 से घटकर 2025 में 5,114 रह गईं। जानिए भगवंत मान सरकार की पराली प्रबंधन नीति, कृषि मशीनों पर सब्सिडी और मध्य प्रदेश के आंकड़े।

नई दिल्ली / चंडीगढ़ /सत्ता संदेश

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को लेकर पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को लेकर चर्चा तेज हो जाती है और पराली जलाने के मुद्दे पर पंजाब का नाम प्रमुखता से सामने आता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े राज्य में पराली प्रबंधन के प्रयासों और घटनाओं में आई कमी की ओर संकेत करते हैं।

पंजाब कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022 में राज्य में पराली जलाने की 49,922 घटनाएं दर्ज की गई थीं। वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई। इस तरह 2022 के मुकाबले 2025 में पराली जलाने की घटनाओं में करीब 90 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। वहीं, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक 474 घटनाएं सामने आई हैं। हालांकि, 2026 का आंकड़ा अभी तक की अवधि का है, इसलिए इसकी तुलना पूरे वर्ष के आंकड़ों से सीधे नहीं की जानी चाहिए।

मध्य प्रदेश में पंजाब से अधिक मामले

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के CREAMS कार्यक्रम की ओर से 6 अक्टूबर 2026 को जारी बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में पराली जलाने की कुल 287 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें मध्य प्रदेश 118 घटनाओं के साथ पहले स्थान पर रहा। पंजाब में 88 और उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं दर्ज की गईं।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि मेंकेंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने हिमाचल प्रदेश को 6 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 320 नई स्नातकोत्तर (पीजी) मेडिकल सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी दिए जाने की घोषणा की है. इसके लिए भारत सरकार लगभग ₹415 करोड़ का अनुदान देगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चिकित्सा शिक्षा के विस्तार की दिशा में इसे अहम कदम बताते हुए जेपी नड्डा ने कहा कि इससे हिमाचल के युवाओं को अपने ही राज्य में मेडिकल की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अधिक अवसर मिलेंगे. साथ ही, विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ने से प्रदेश के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी.

प्रस्ताव पर केंद्र सरकार द्वारा तेजी से लिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए जेपी नड्डा ने बताया कि हिमाचल सरकार से 23 जून 2026 को प्रस्ताव मिला था. इसके बाद 6 अक्टूबर को एम्स बिलासपुर के दीक्षांत समारोह के दौरान मुख्यमंत्री से भी इस विषय पर चर्चा हुई और अब केंद्र सरकार ने प्रस्तावित सभी 320 सीटों को मंजूरी दे दी है.

कहां पर कितनी सीटों को मिली है मंजूरी?

जेपी नड्डा ने कहा, “केंद्र सरकार ने हिमाचल के प्रस्ताव पर तेजी से काम करते हुए सभी 320 सीटों को मंजूरी दी है. अब हम राज्य सरकार से भी उम्मीद करते हैं कि वह इसी तेजी से जरूरी कदम उठाए, ताकि प्रदेश के युवाओं और आम लोगों को इसका लाभ जल्द से जल्द मिल सके.” इन 320 नई सीटों में शिमला के लिए 91, टांडा और हमीरपुर के लिए 57-57, मंडी के लिए 55, नाहन के लिए 32 और चंबा के लिए 28 सीटें शामिल हैं. इनसे सर्जरी, हड्डी रोग, स्त्री एवं प्रसूति रोग, बाल रोग, कैंसर सहित कई अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी.

जेपी नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों में देश में मेडिकल शिक्षा के विस्तार के लिए कई बड़े कदम उठाए गए हैं. इसी कड़ी में केंद्र सरकार ने ₹15,000 करोड़ की लागत से अगले पांच वर्षों में देशभर में 10,000 नई यूजी और पीजी मेडिकल सीटें बढ़ाने की योजना को मंजूरी दी है. हिमाचल प्रदेश में 320 नई पीजी सीटों की स्वीकृति भी इसी योजना का हिस्सा है.

‘समय से शुरू करने पूरे किए जाएं जरूरी काम’

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने हिमाचल सरकार से आग्रह किया कि वह इन सभी 320 सीटों को समय पर शुरू करने के लिए जरूरी कदम उठाए, ताकि विद्यार्थियों को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके. उन्होंने राज्य में केंद्र सरकार की मदद से चल रही अन्य महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं के काम में भी तेजी लाने की जरूरत बताई.

जेपी नड्डा ने कहा कि चंडीगढ़बद्दी और भानुपल्लीबिलासपुर जैसी महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं में राज्य सरकार की हिस्सेदारी और जमीन से जुड़े लंबित मामलों का जल्द समाधान किया जाना चाहिए. इसी तरह, केंद्र सरकार के सहयोग से बनाए जा रहे क्रिटिकल केयर ब्लॉक्स और जन स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं के काम में भी तेजी लाने की जरूरत है.

उन्होंने कहा, “हिमाचल के लोगों के हित से जुड़े विकास कार्यों में देरी नहीं होनी चाहिए. केंद्र सरकार प्रदेश के विकास के लिए हर संभव सहयोग दे रही है. हमारी अपेक्षा है कि राज्य सरकार भी इन परियोजनाओं को प्राथमिकता दे और इन्हें समय पर पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठाए.”

नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार हिमाचल प्रदेश में मेडिकल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा, “हमारी प्राथमिकता स्पष्ट है—हिमाचल का विकास और हिमाचल के हर परिवार का कल्याण.”

पंजाब में किसी भी दिन पराली जलाने की घटनाओं की संख्या दहाई तक नहीं पहुंची, जबकि मध्य प्रदेश में पांच दिन ऐसे रहे, जब घटनाओं का आंकड़ा दहाई में दर्ज किया गया।

वर्ष 2025 के आंकड़े भी इस अंतर को स्पष्ट करते हैं। छह राज्यों में पराली जलाने की कुल 33,028 घटनाओं में से मध्य प्रदेश में 17,067, उत्तर प्रदेश में 7,290 और पंजाब में 5,114 मामले दर्ज हुए। इन आंकड़ों के आधार पर पराली जलाने की समस्या को केवल पंजाब तक सीमित मानने के बजाय दूसरे कृषि प्रधान राज्यों की स्थिति पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

भगवंत मान सरकार की पराली प्रबंधन नीति

मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने और किसानों को सब्सिडी देने पर जोर दिया है। सरकार की रणनीति का उद्देश्य किसानों को पराली जलाने के विकल्प उपलब्ध कराना है, ताकि पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके और अगली फसल की बुवाई भी समय पर हो सके।

पंजाब के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, वर्ष 2026 के सीजन में किसानों ने 21,155 फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें खरीदी हैं। इनमें 14,384 सुपर सीडर, 1,721 मल्चर, 1,346 हाइड्रोलिक रिवर्सिबल एमबी प्लाऊ, 1,123 जीरो टिल ड्रिल, 927 बेलिंग मशीनें और 874 स्ट्रॉ रेक शामिल हैं।

इन मशीनों की मदद से खेतों में पराली को मिट्टी में मिलाने, अवशेषों को इकट्ठा करने और पराली का वैकल्पिक उपयोग करने में मदद मिलती है। इससे किसानों को धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के लिए खेत तैयार करने में भी सुविधा मिल सकती है।

किसानों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी

पराली प्रबंधन के लिए व्यक्तिगत किसानों को कृषि मशीनों पर 50 प्रतिशत से अधिक सब्सिडी और कस्टम हायरिंग सेंटरों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों तथा पंचायतों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

इसका उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों तक भी आधुनिक मशीनों की सुविधा पहुंचाना है। महंगी कृषि मशीनें खरीदना हर किसान के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में सामूहिक मशीन केंद्रों के माध्यम से किसान जरूरत के अनुसार मशीनों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

सरकार की ओर से वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पराली प्रबंधन की 600 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार किए जाने की जानकारी भी दी गई है। इसके तहत मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, तकनीकी सहायता देने और फसल अवशेषों के वैकल्पिक इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने पर जोर है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2025 में भी क्रॉप रेजिड्यू मैनेजमेंट (CRM) मशीनरी के लिए करीब 395 करोड़ रुपये की सहायता वितरित की गई थी।

पराली से कमाई के रास्ते तलाश रहे किसान

पराली को केवल कृषि अपशिष्ट मानने के बजाय उससे आमदनी के अवसर तलाशने पर भी काम हो रहा है। पंजाब में कुछ किसान पराली को इकट्ठा करके बायोगैस और बायो-CNG परियोजनाओं के लिए बेच रहे हैं।

संगरूर के एक किसान द्वारा लगभग 12 हजार क्विंटल पराली बेचकर करीब 16 लाख रुपये की आय अर्जित करने का उदाहरण सामने आया है। हालांकि, इस तरह की कमाई पराली की मात्रा, बाजार में मांग, परिवहन लागत और खरीदारों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। फिर भी, यह मॉडल किसानों के लिए फसल अवशेषों के आर्थिक इस्तेमाल की संभावनाएं दिखाता है।

पराली जलाने पर रोक के लिए किसानों का सहयोग जरूरी

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सीमित समय, मजदूरी का खर्च, मशीनों की उपलब्धता और पराली हटाने की लागत किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इसलिए पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल जुर्माने या कानूनी कार्रवाई से संभव नहीं है। किसानों को किफायती मशीनें, तकनीकी सहायता और पराली के उपयोग के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में आई कमी सरकार की नीतियों, आधुनिक मशीनों की उपलब्धता और किसानों के सहयोग के महत्व को रेखांकित करती है। हालांकि, इस बदलाव को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए हर सीजन में प्रभावी निगरानी, किसानों तक सुविधाओं की पहुंच और फसल अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी होगा।

दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण पर होने वाली बहस के बीच पंजाब के आंकड़े यह भी बताते हैं कि पराली प्रबंधन की चुनौती बहुआयामी है और इसका समाधान राज्यों के साझा प्रयासों, किसानों के सहयोग तथा व्यावहारिक कृषि नीतियों से ही संभव है।

Himachal Pradesh Medical Colleges: हिमाचल में 320 नई PG मेडिकल सीटों को मंजूरी, ₹415 करोड़ देगा केंद्र

हिमाचल प्रदेश के छह सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 320 नई PG मेडिकल सीटों को केंद्र की मंजूरी मिली है। इसके लिए करीब ₹415 करोड़ का अनुदान दिया जाएगा।

हिमाचल प्रदेश / सत्ता संदेश

हिमाचल प्रदेश में मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने राज्य के छह सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 320 नई स्नातकोत्तर (PG) मेडिकल सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने की घोषणा की है। इस योजना के लिए केंद्र सरकार करीब 415 करोड़ रुपये का अनुदान देगी।

जेपी नड्डा के अनुसार, इस फैसले से हिमाचल प्रदेश के युवाओं को अपने राज्य में ही मेडिकल की उच्च शिक्षा हासिल करने के अधिक अवसर मिलेंगे। इसके साथ ही विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञताओं में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ने से प्रदेश के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलने में मदद मिल सकती है।

हिमाचल के 6 मेडिकल कॉलेजों में सीटों का ब्योरा

केंद्र सरकार की मंजूरी के तहत राज्य के छह सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नई पीजी सीटें बढ़ाई जाएंगी। कॉलेजवार विवरण इस प्रकार है:

  • शिमला: 91 नई पीजी सीटें
  • टांडा: 57 नई पीजी सीटें
  • हमीरपुर: 57 नई पीजी सीटें
  • मंडी: 55 नई पीजी सीटें
  • नाहन: 32 नई पीजी सीटें
  • चंबा: 28 नई पीजी सीटें

इन सीटों के शुरू होने से सर्जरी, हड्डी रोग, स्त्री एवं प्रसूति रोग, बाल रोग और कैंसर सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

केंद्र सरकार ने दी ₹415 करोड़ की मंजूरी

जेपी नड्डा ने बताया कि हिमाचल प्रदेश सरकार से इस संबंध में प्रस्ताव 23 जून 2026 को प्राप्त हुआ था। इसके बाद 6 अक्टूबर को एम्स बिलासपुर के दीक्षांत समारोह के दौरान मुख्यमंत्री के साथ इस विषय पर चर्चा हुई। अब केंद्र सरकार ने प्रस्तावित सभी 320 पीजी सीटों को मंजूरी दे दी है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि सीटों को समय पर शुरू करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं और तैयारियां जल्द पूरी की जाएं, ताकि मेडिकल की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों को इसका लाभ मिल सके।

देशभर में बढ़ाई जाएंगी 10,000 मेडिकल सीटें

जेपी नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान देश में चिकित्सा शिक्षा के विस्तार पर जोर दिया गया है। इसी क्रम में केंद्र सरकार ने अगले पांच वर्षों में देशभर में 10,000 नई स्नातक (UG) और स्नातकोत्तर (PG) मेडिकल सीटें बढ़ाने के लिए 15,000 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। हिमाचल प्रदेश की 320 नई पीजी सीटों को इसी पहल का हिस्सा बताया गया है।

रेल और स्वास्थ्य परियोजनाओं में तेजी लाने की अपील

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने हिमाचल प्रदेश सरकार से चंडीगढ़-बद्दी और भानुपल्ली-बिलासपुर रेल परियोजनाओं से जुड़े लंबित मामलों को जल्द सुलझाने की अपील भी की। उन्होंने जमीन और राज्य सरकार की हिस्सेदारी से संबंधित मुद्दों के समाधान पर जोर दिया।

इसके अलावा, केंद्र सरकार के सहयोग से बनाए जा रहे क्रिटिकल केयर ब्लॉक और जन स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं की परियोजनाओं को समय पर पूरा करने की आवश्यकता बताई।

जेपी नड्डा ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में मेडिकल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार सहयोग जारी रखेगी। नई पीजी सीटों की मंजूरी से राज्य में चिकित्सा शिक्षा के अवसर बढ़ने और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता में सुधार की उम्मीद है।

समराला: कोऑपरेटिव सोसायटियों के नए नियमों के खिलाफ BKU कादियां का विरोध, सरकार से फरमान वापस लेने की मांग

समराला में BKU कादियां ने कोऑपरेटिव सोसायटियों के नियमों में कथित बदलावों का विरोध किया। शेयर मनी, ब्याज दर और जमीन गिरवी रखने की शर्तों पर सवाल उठाते हुए सरकार से नियम वापस लेने की मांग की।

समराला / सत्ता संदेश

रिपोर्ट: मनीष सचदेवा

पंजाब सरकार द्वारा कोऑपरेटिव सोसायटियों के नियमों में किए गए कथित बदलावों को लेकर भारतीय किसान यूनियन (BKU) कादियां ने विरोध जताया है। संगठन के जिला प्रधान हरदीप सिंह ग्यासपुरा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नए नियमों पर सवाल उठाए और सरकार से इन्हें तुरंत वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि इन बदलावों से छोटे और गरीब किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है और सहकारी सोसायटियों के माध्यम से मिलने वाली सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं।

हरदीप सिंह ग्यासपुरा के अनुसार, पहले कोऑपरेटिव सोसायटियों में एक लाख रुपये के कर्ज के पीछे 5 प्रतिशत यानी 5,000 रुपये शेयर मनी जमा करवानी पड़ती थी। अब इसे बढ़ाकर 9 प्रतिशत किए जाने का दावा किया जा रहा है, जिसके चलते किसानों को एक लाख रुपये के पीछे 9,000 रुपये शेयर मनी जमा करवानी पड़ सकती है।

किसान नेता ने यह भी कहा कि छोटे किसानों की श्रेणी में शामिल होने के लिए जमीन की सीमा सात एकड़ से घटाकर पांच एकड़ कर दी गई है। उनके मुताबिक, इस बदलाव से कई किसानों की पात्रता और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं पर असर पड़ सकता है।

नए नियमों के तहत कर्ज लेने के लिए स्टांप पेपर पर हलफनामा देने और जमीन गिरवी रखने जैसी शर्तों पर भी BKU कादियां ने आपत्ति जताई है। हरदीप सिंह ग्यासपुरा ने आरोप लगाया कि सहकारी सोसायटियों से कर्ज लेने की प्रक्रिया अब व्यावसायिक बैंकों जैसी बनाई जा रही है, जिससे किसानों को अतिरिक्त औपचारिकताओं और परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने दावा किया कि कर्ज की ब्याज दर भी 4 प्रतिशत से बढ़ाकर 11 प्रतिशत कर दी गई है। किसान नेता के मुताबिक, यदि कोई किसान अपनी स्वीकृत कर्ज सीमा से कम राशि लेता है, तो भी उस पर पूरी स्वीकृत सीमा के आधार पर ब्याज लगने की आशंका है। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था किसानों के लिए आर्थिक रूप से मुश्किलें बढ़ा सकती है।

ग्यासपुरा ने कहा कि वर्ष 1961 से कोऑपरेटिव सोसायटियां ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को कर्ज और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं। उनके अनुसार, इन संस्थाओं का उद्देश्य किसानों को जरूरत के समय आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाना है, लेकिन प्रस्तावित बदलावों से इस व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका है।

किसान नेता ने सोसायटियों के सचिवों पर किसानों की कर्ज सीमा जल्द तैयार करके बैंकों में जमा करवाने के लिए दबाव बनाए जाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने जिले के DR और अन्य संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से अपील की कि सचिवों पर डाला जा रहा कथित अनावश्यक दबाव बंद किया जाए।

BKU कादियां ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने किसानों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो संबंधित सरकारी कार्यालयों के बाहर धरने और विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। संगठन ने मांग की कि सरकार नए नियमों की समीक्षा करे और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए विवादित बदलाव वापस ले।

फिलहाल, शेयर मनी, ब्याज दरों और जमीन गिरवी रखने की शर्तों में बताए गए बदलावों को लेकर सरकार या संबंधित सहकारी विभाग का आधिकारिक पक्ष इस जानकारी में उपलब्ध नहीं है। इन नियमों की वास्तविक स्थिति और लागू होने की शर्तों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।

नाभा में ड्रग्स के खिलाफ स्टिंग करने वाले BJP नेता वरिंदर बिट्टू पर केस दर्ज, भादसों थाने के बाहर BJP का धरना

नाभा में ड्रग्स के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करने वाले BJP नेता वरिंदर बिट्टू पर केस दर्ज होने के बाद बीबा जय इंदर कौर की अगुवाई में भादसों थाने के बाहर प्रदर्शन हुआ। BJP ने निष्पक्ष जांच की मांग की।मुख्य हेडिंग (H1)

नाभा / सत्ता संदेश

रिपोर्ट : चेतन मेहता, नाभा

पंजाब में नशे के खिलाफ कार्रवाई और इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव एक बार फिर चर्चा में है। नाभा में ड्रग्स के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करने वाले BJP नेता वरिंदर बिट्टू और उनके कुछ साथियों के खिलाफ पुलिस की ओर से नया मामला दर्ज किए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने थाना भादसों के बाहर धरना देकर विरोध जताया।

मिली जानकारी के अनुसार, दो दिन पहले BJP नेता वरिंदर बिट्टू ने नाभा क्षेत्र में कथित ड्रग तस्करी के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन किया था। इस दौरान तीन लोगों को नशीले पदार्थों और नशीले कैप्सूलों के साथ पकड़े जाने का दावा किया गया था। इसके बाद उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया। इस मामले में आम आदमी पार्टी से जुड़े एक नेता का नाम भी सामने आया था, जिसके खिलाफ पुलिस ने FIR दर्ज की थी।

अब वरिंदर बिट्टू और उनके कुछ साथियों के खिलाफ एक अन्य मामला दर्ज होने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। BJP नेताओं का आरोप है कि नशे के खिलाफ आवाज उठाने और कथित तस्करों के मामले को सामने लाने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है। नेताओं के मुताबिक, वरिंदर बिट्टू के विरोध प्रदर्शन के दौरान पानी की टंकी पर चढ़ने और BJP कार्यकर्ताओं की ओर से सड़क जाम किए जाने को लेकर पुलिस ने नया केस दर्ज किया है।

इस कार्रवाई के विरोध में BJP नेता बीबा जय इंदर कौर की अगुवाई में पार्टी कार्यकर्ता थाना भादसों के बाहर एकत्र हुए और पुलिस प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में वरिंदर बिट्टू सहित अन्य BJP नेता और कार्यकर्ता भी शामिल हुए।

प्रदर्शन के बाद थाना भादसों के प्रभारी ने विरोध कर रहे BJP नेताओं के साथ बैठक की। BJP नेताओं के अनुसार, थाना प्रभारी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि मामले की दोबारा जांच SSP पटियाला के समक्ष करवाई जाएगी।

BJP नेता बीबा जय इंदर कौर और वरिंदर बिट्टू ने आरोप लगाया कि पंजाब में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर ही कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि वरिंदर बिट्टू ने कथित ड्रग तस्करी का मामला सामने लाकर पुलिस को कार्रवाई के लिए सौंपा था, लेकिन अब उनके और उनके साथियों के खिलाफ ही केस दर्ज कर दिया गया है। BJP नेताओं ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की।

इस पूरे घटनाक्रम ने पंजाब में नशे के खिलाफ कार्रवाई, पुलिस की भूमिका और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, BJP नेताओं की ओर से लगाए गए आरोपों और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े सभी तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि तथा पुलिस का विस्तृत पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

अब देखना होगा कि SSP पटियाला के स्तर पर प्रस्तावित दोबारा जांच में क्या सामने आता है और इस मामले में पुलिस प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है।

Punjab Assembly Passes Resolution Against SIR: पंजाब विधानसभा में SIR के खिलाफ प्रस्ताव पारित

पंजाब विधानसभा में SIR के खिलाफ प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित। CM भगवंत मान ने मतदाता सूची, वोट कटने और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

पंजाब विधानसभा में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर सरकार की ओर से पेश किया गया प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। प्रस्ताव में मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। प्रस्ताव पारित होने के बाद सदन की कार्यवाही मंगलवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।

मतदान के अधिकारों की सुरक्षा की मांग

पंजाब सरकार की ओर से सदन में पेश प्रस्ताव में कहा गया कि योग्य नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने की कथित घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं। सदन ने मांग की कि प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि कोई भी योग्य मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न रहे।

प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों से संबंधित कथित अनियमितताओं की जांच के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय तंत्र स्थापित करने की मांग भी की गई। इसमें कहा गया कि जांच के दौरान यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक उल्लंघन के ठोस सबूत मिलते हैं, तो लागू कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजा जाएगा प्रस्ताव

प्रस्ताव में केंद्र सरकार और संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही बनाए रखने की अपील की गई है। इसके साथ ही प्रस्ताव की प्रति भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजने की मांग की गई, ताकि मामले में उचित कार्रवाई की जा सके।

प्रस्ताव में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा नागरिकों को दिए गए समान मतदान अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा गया कि किसी भी योग्य नागरिक को अवैध रूप से वोट डालने के अधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

CM भगवंत मान ने SIR प्रक्रिया पर उठाए सवाल

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि SIR के माध्यम से 13 करोड़ से अधिक लोगों के वोट काटे गए हैं। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि भाजपा चुनाव आयोग के माध्यम से विपक्षी मतदाताओं के वोट कटवाती है और अपने समर्थकों के वोट जुड़वाती है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि SIR लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक है और लोकतंत्र की रक्षा के लिए इस प्रक्रिया को रद्द किया जाना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए।

हालांकि, मुख्यमंत्री द्वारा मतदाताओं के वोट काटे जाने और राजनीतिक पक्षपात को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। प्रस्ताव पारित होना अपने आप में इन आरोपों को प्रमाणित नहीं करता।

SIR को लेकर राजनीतिक बहस तेज

पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने के बाद विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मतदाता सूची की शुद्धता और चुनाव आयोग की जवाबदेही को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। राज्य सरकार ने प्रस्ताव के माध्यम से मताधिकार की सुरक्षा और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग उठाई है। अब इस मामले में संबंधित संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिक्रिया और आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।

Chandigarh Postal Adalat 2026: 4 नवंबर को लगेगी डाक अदालत, लंबित शिकायतों का होगा निपटारा

चंडीगढ़ डाक मंडल की तीसरी डाक अदालत 4 नवंबर 2026 को सुबह 11 बजे होगी। लंबित डाक शिकायतें 2 नवंबर तक भेजें। जानें ई-मेल, पता और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक।

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

डाक सेवाओं से संबंधित लंबित शिकायतों के निपटारे के लिए चंडीगढ़ डाक मंडल की तीसरी डाक अदालत 4 नवंबर 2026 को आयोजित की जाएगी। यह अदालत सुबह 11 बजे से दोपहर 12 बजे तक सी-डॉट वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित होगी। डाक विभाग ने संबंधित शिकायतकर्ताओं से निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी शिकायतें भेजने और सुनवाई में शामिल होने की अपील की है।

डाक अदालत का आयोजन वरिष्ठ अधीक्षक डाकघर, चंडीगढ़ मंडल के कार्यालय, तीसरी मंजिल, जी.पी.ओ. भवन, चंडीगढ़ में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार किया जा रहा है। इसमें चंडीगढ़ डाक मंडल से संबंधित लंबित शिकायतों का निपटारा किया जाएगा।

2 नवंबर तक भेजनी होगी शिकायत

डाक अदालत में अपनी शिकायत रखने के इच्छुक लोगों को शिकायत में पूरा विवरण देना होगा। इसमें शिकायत की संदर्भ संख्या, डाक विभाग के विभिन्न अधिकारियों से पहले प्राप्त पत्रों की तारीख और शिकायतकर्ता का मोबाइल नंबर शामिल होना चाहिए।

शिकायत को स्पीड पोस्ट, व्यक्तिगत रूप से या ई-मेल के माध्यम से भेजा जा सकता है। शिकायत वरिष्ठ अधीक्षक डाकघर, चंडीगढ़ मंडल, चंडीगढ़-160017 के नाम संबोधित की जानी चाहिए। लिफाफे पर स्पष्ट रूप से ‘डाक अदालत’ लिखा होना चाहिए।

डाक विभाग के अनुसार, शिकायत 2 नवंबर 2026 तक संबंधित कार्यालय में स्पीड पोस्ट के माध्यम से पहुंच जानी चाहिए।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ सकेंगे शिकायतकर्ता

शिकायतकर्ताओं से अनुरोध किया गया है कि वे 4 नवंबर को सुबह 11 बजे निर्धारित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक के माध्यम से डाक अदालत में शामिल हों।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक: https://cdotmeet.cdot.in/vmeet/rooms/a-k-asc-aik

शिकायत भेजने या डाक अदालत से संबंधित किसी भी जानकारी के लिए विभाग के दूरभाष नंबर 0172-2722359 पर संपर्क किया जा सकता है। शिकायतें ई-मेल dochandigarh.pb@indiapost.gov.in पर भी भेजी जा सकती हैं।

डाक विभाग की इस पहल से चंडीगढ़ डाक मंडल से संबंधित लंबित शिकायतों को संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखने और उनके समाधान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

भारत की कृषि गाथा का नया रूप: परिवर्तन का एक दशक
  • शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री

जब प्रधानमंत्री ने वर्ष 2014 में पदभार संभाला, तब कृषि और किसान कल्याण को भारत के विकास एजेंडे के केंद्र में रखा गया। वर्ष 2015 से यह प्रतिबद्धता उत्पादन और कृषि आय में सुधार से आगे बढ़कर कृषि क्षेत्र को अधिक उत्पादक, सुदृढ़, प्रौद्योगिकी-आधारित और टिकाऊ बनाने के व्यापक परिवर्तन में परिलक्षित हुई है। प्रधानमंत्री ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि “विकसित भारत के लिए भारतीय कृषि का भी विकास होना चाहिए।” उन्होंने यह भी आह्वान किया है कि भारत केवल अपनी खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित न रहे, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरे। लाल बहादुर शास्त्री के “जय जवान, जय किसान” और अटल बिहारी वाजपेयी के “जय विज्ञान” के आह्वान को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने देश को “जय अनुसंधान” का मंत्र दिया। इस मंत्र के माध्यम से उन्होंने अनुसंधान और नवाचार को भारत की कृषि के भविष्य के केंद्र में स्थापित किया। ये शब्द केवल नीतिगत दिशा का वक्तव्य नहीं थे, बल्कि एक व्यावहारिक दृष्टि के परिचायक थे, जिसकी दूरदर्शिता और विवेक की पुष्टि एक दशक बाद सामने आए साक्ष्यों से स्पष्ट रूप से हुई।

खाद्य सुरक्षा से कृषि के नए प्रतिमान तक

यह विजन भारतीय कृषि को देखने के हमारे दृष्टिकोण में निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान की। आज हमारी जिम्मेदारी पोषण सुरक्षा, किसानों की समृद्धि, संसाधन सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की मजबूत नींव तैयार करना है। भारत की कृषि यात्रा उल्लेखनीय उपलब्धियों से भरी रही है। कभी खाद्य आयात पर निर्भर रहने वाला भारत कुछ ही दशकों में प्रमुख अनाजों के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। हरित क्रांति को विज्ञान, उन्नत बीजों, सिंचाई, बुनियादी ढांचे, संस्थागत ऋण, कृषि विस्तार सेवाओं और नीतिगत सहायता से गति मिली। इससे यह सिद्ध हुआ कि जब वैज्ञानिक क्षमता और राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए एक साथ आती हैं, तो क्या कुछ अर्जित किया जा सकता है। लेकिन कृषि को अतीत की प्राथमिकताओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। किसानों की आकांक्षाएं बदल गई हैं, नागरिकों के उपभोग के तौर-तरीके बदल गए हैं, बाजार बदल गए हैं और जलवायु भी बदल रही है।

व्यापक आधार पर कृषि विकास का एक दशक

इसलिए वर्ष 2015 से जारी परिवर्तन महत्वपूर्ण है। वर्ष 1995-96 और 2014-15 को संरचनात्मक बदलाव के महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया है, क्योंकि ये भारतीय कृषि के विकास के अलग-अलग चरणों को दर्शाते हैं। पहला चरण आर्थिक उदारीकरण के क्रमिक प्रभाव, बाजारों के साथ बढ़ते एकीकरण, बदलते उपभोग पैटर्न और अनाज उत्पादकता वृद्धि की धीमी गति को दर्शाता है। दूसरा चरण सिंचाई के विस्तार, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बाजार सुधारों तथा स्थिरता और जलवायु अनुकूलन पर बढ़ते ध्यान से प्रेरित अधिक विविधीकृत, प्रौद्योगिकी-सक्षम और सुदृढ़ कृषि प्रणाली के उभार का संकेत देता है। कृषि विकास की औसत दर 1967-1995 के दौरान लगभग 2.7 प्रतिशत और 1996-2014 के दौरान लगभग 3.0 प्रतिशत थी। यह 2015-2025 के दौरान बढ़कर लगभग 4.5 प्रतिशत हो गई (खाद्यान्न उत्पादन में 8.4 मिलियन टन प्रतिवर्ष, फल एवं सब्जियों में 7.6 मिलियन टन प्रतिवर्ष तथा दूध में भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई। पिछले दो वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन में असाधारण वृद्धि दर्ज की गई, जो प्रति वर्ष 22.1 मिलियन टन रही और पिछले वर्षों की तुलना में बहुत अधिक है। यह उपलब्धि केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, कार्यक्रमों के प्रभावी संयोजन, जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों के अंगीकरण, लक्षित निवेश और किसानों को बढ़े हुए समर्थन के संयुक्त प्रभाव को दर्शाती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वृद्धि अब व्यापक आधार पर हो रही है और इसे केवल अनाज ही नहीं, बल्कि बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन तथा अन्य उच्च-मूल्य वाले कार्यकलापों से भी बल मिल रहा है। यही कृषि भारत के विकास के अगले चरण को गति देगी।

हमारा उद्देश्य अब केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमें कम संसाधनों—कम पानी, कम भूमि, कम ऊर्जा और अनावश्यक कृषि आदानों के कम उपयोग—के साथ अधिक उत्पादन करना होगा, साथ ही बेहतर गुणवत्ता वाला, सुरक्षित और अधिक पौष्टिक खाद्य तैयार करना होगा। भारत में उपभोग के बदलते स्वरूप से भी इसका स्पष्ट संकेत मिलता है। ग्रामीण भारत में 1972-73 में खाद्य व्यय का लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा अनाज पर खर्च होता था; 2022-23 तक यह घटकर लगभग 11 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में दूध और दुग्ध उत्पादों, फलों, सब्जियों, अंडों, मांस और मछली का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर करीब 48 प्रतिशत हो गया। शहरी क्षेत्रों में भी उपभोग का रुझान इसी तरह बदला है। हमारी कृषि को इस नए भारत की आवश्यकताओ के अनुरूप ढलना होगा। इसका अर्थ है दलहनों तिलहनों, फलों, सब्जियों, डेयरी, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन और अन्य उच्च-मूल्य वाली कृषि उपज पर अधिक ध्यान देना। इसका अर्थ खाद्य सुरक्षा की सीमित अवधारणा से आगे बढ़कर पोषण सुरक्षा की दिशा में बढ़ना भी है। किसानों को उन मूल्य शृंखलाओं से जोड़ना आवश्यक है, जहां वास्तविक आर्थिक अवसर तेजी से ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात में केंद्रित हो रहे हैं।

किसान-केंद्रित विकास की व्यवस्था तैयार करना

भारत सरकार ने इस बदलाव के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा दे रही है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड पहल ने मिट्टी की जांच और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को कृषि संबंधी निर्णयों के केंद्र में रखा है। पीएम-कुसुम कृषि को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ रही है। किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) सामूहिक उपज-संग्रह और सौदेबाजी की क्षमता को सुदृढ़ कर रहे हैं। ई-नाम कृषि बाजारों को डिजिटल रूप से जोड़ रहा है, जबकि कृषि अवसंरचना कोष, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना और पीएमएफएमई फसल कटाई के बाद की अवसंरचना और प्रसंस्करण को मजबूत कर रहे हैं। अब इन पहलों को बीज से मिट्टी तक, खेत से बाजार तक और प्रयोगशाला से आजीविका तक एकीकृत किसान-केंद्रित मूल्य शृंखला में समाहित करना होगा। इस परिवर्तन में प्रौद्योगिकी की भूमिका केंद्रीय होगी। भारतीय कृषि अनुसंधान अब केवल उपज बढ़ाने के पारंपरिक उद्देश्य तक सीमित नहीं है। वर्ष 2014 से 2025 के बीच फसलों की 3,236 किस्में जारी की गईं, जबकि 2003 से 2014 के दौरान यह संख्या 1,540 थी। हाल के वर्षों में जारी की गई किस्मों के बड़े हिस्से को जलवायु के प्रति अधिक सहिष्णु बनाने पर ध्यान दिया गया है और जैव-सुदृढ़ीकरण पर भी अधिक जोर दिया जा रहा है। इसलिए अगली कृषि क्रांति उत्कृष्टता, लचीलेपन और ज्ञान की क्रांति होनी चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन, जीनोमिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, डिजिटल परामर्श प्रणालियां और भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियां किसानों को बुवाई, सिंचाई, पोषक तत्वों, कीटों, मौसम और बाजारों के बारे में बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं। डिजिटल कृषि पहल, एग्रीस्टैक और एआई-सक्षम परामर्श मंच कृषि सेवाओं को अधिक लक्षित और सुलभ बना सकते हैं। हालांकि, प्रौद्योगिकी तभी परिणाम देगी, जब वह किसान तक सरल, किफायती और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पहुंचेगी। 

प्रयोगशाला से अंतिम मील तक

अनुसंधान और कृषि विस्तार की भूमिका इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो गई है। कृषि अनुसंधान में निवेश किया गया प्रत्येक रुपया पर्याप्त आर्थिक लाभ उत्पन्न करता है, जबकि कृषि विस्तार वैज्ञानिक ज्ञान को खेतों में व्यावहारिक सुधारों में बदलता है। हमें अपनी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, स्टार्टअप, निजी नवप्रवर्तकों और किसानों के बीच संबंध सुदृढ़ करने होंगे। इसके साथ ही हमें संसाधनों से जुड़ी चुनौती का भी सामना करना होगा। भारत जल, उर्वरक, ऊर्जा और भूमि के उपयोग को लगातार बढ़ाकर कृषि उत्पादन का विस्तार नहीं कर सकता। भूजल का क्षरण, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, जलवायु में अस्थिरता और चरम मौसमी घटनाएं एक नए उत्पादन प्रतिमान की मांग करती हैं। साक्ष्य दर्शाते हैं कि कृषि विकास के हाल के चरण में अधिक उत्पादकता के साथ अधिक स्थिरता भी आई है। इससे विविधीकरण, संसाधनों के कुशल उपयोग, जोखिम प्रबंधन और जलवायु-सहनशीलता का बढ़ता महत्व स्पष्ट होता है। इसीलिए स्थिरता कोई पर्यावरणीय विलासिता नहीं, बल्कि किसान की आर्थिक आवश्यकता है।

हमारी नीतियों को पानी, पोषक तत्वों और ऊर्जा की प्रत्येक इकाई के कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। अनुसंधान में जलवायु-अनुकूल किस्मों, पानी और पोषक तत्वों का कुशल उपयोग करने वाली फसलों, मृदा जीवविज्ञान में सुधार, एकीकृत कीट प्रबंधन, संरक्षण कृषि और सटीक कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। दलहनों और तिलहनों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि उनकी उत्पादकता बढ़ाना भारत की पोषण संबंधी और आर्थिक आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने के लिए अनिवार्य है।

कुशल बाजार और वैश्विक मूल्य शृंखलाएं

कुशलता से उत्पादन करने वाले किसान को अपनी उपज लाभकारी मूल्य पर बेचने का अवसर भी मिलना चाहिए। कृषि उत्पादन के साथ-साथ कृषि बाजारों, भंडारण, कोल्ड चेन, लॉजिस्टिक्स, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी विकास होना चाहिए। कृषि उत्पादन के विस्तार और शीघ्र नष्ट होने वाली उपज के विविधीकरण से कुशल सामूहिक संग्रह और बाजार संपर्क की नई आवश्यकताएं पैदा हुई हैं। किसान समूह, सहकारी संस्थाएं और एफपीओ लेन-देन की लागत घटाकर, सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाकर और किसानों को संगठित मूल्य शृंखलाओं से जोड़कर परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकते हैं। भारत को मंडी से आगे बढ़कर विश्व बाजार की ओर देखना होगा।

हमारा लक्ष्य भारतीय कृषि उत्पादों को ऐसी गुणवत्ता, अनुरेखणीयता, सुरक्षा और ब्रांड पहचान प्रदान करना होना चाहिए, जिन्हें विश्व स्तर पर मान्यता मिले। अगले चरण में किसानों को केवल घरेलू उपभोक्ताओं से ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मूल्य शृंखलाओं से भी जोड़ना होगा। इससे रोजगार सृजित होंगे, ग्रामीण उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा और कृषि से उत्पन्न मूल्य का अधिक हिस्सा ग्रामीण भारत में ही रह सकेगा। हालांकि, यह परिवर्तन केवल केंद्र सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। कृषि एक साझा राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। राज्यों, स्थानीय सरकारों, अनुसंधान संस्थानों, एफपीओ, सहकारी संस्थाओं, निजी उद्यमों, वित्तीय संस्थानों और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा। भविष्य में कृषि, जल, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण, पोषण, जलवायु, व्यापार और ग्रामीण विकास के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

यहीं सहकारी संघवाद की भावना महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत की कृषि-पारिस्थितिक विविधता के लिए ऐसे समाधानों की आवश्यकता है, जिनका क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर हो, लेकिन विजन राष्ट्रीय हो। विकसित कृषि से विकसित भारत तक की यात्रा का आकलन केवल उत्पादित टन के आधार पर नहीं, बल्कि किसानों के जीवन की गुणवत्ता से किया जाएगा। समृद्ध किसान समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव है। गतिशील कृषि सुदृढ़ खाद्य प्रणालियों का आधार है। और प्रतिस्पर्धी कृषि मूल्य शृंखला वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारत की आधारशिला है। इसलिए हमें इस प्रश्न से आगे बढ़ना होगा कि “हम कितना उत्पादन कर सकते हैं?” और यह पूछना होगा कि “हम कितनी दक्षता, टिकाऊपन और लाभप्रदता के साथ उत्पादन कर सकते हैं?”

हरित क्रांति ने भारत के खाद्य भविष्य को सुरक्षित किया। कृषि के अगले परिवर्तन को भारत की समृद्धि, पोषण, प्राकृतिक संसाधनों और वैश्विक नेतृत्व को सुरक्षित करना होगा। माननीय प्रधानमंत्री ने देश को स्पष्ट दिशा दी है कि भारतीय कृषि विकसित भारत का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बने। हमारा दायित्व है कि विज्ञान, नवाचार, अवसंरचना, बाजार, संस्थानों और सबसे बढ़कर प्रत्येक कृषि नीति के केंद्र में भारतीय किसान को रखकर इस विजन को कार्यरूप दें। विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ते हुए किसान केवल विकास का लाभार्थी न रहे, बल्कि भारत के विकसित भविष्य का निर्माता भी बने। भारत को अब कृषि में इसी परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना है और 2047 के भारत की नींव इसी पर टिकेगी।