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आर्कटिक सर्कल असेंबली 2026 में भारत का बढ़ेगा दखल, कीर्ति वर्धन सिंह करेंगे भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व

वर्ल्ड डेस्क / रेक्याविक / सत्ता संदेश

भारत आर्कटिक क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विदेश राज्य मंत्री और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह 8 से 10 अक्टूबर 2026 तक आइसलैंड के रेक्याविक में आयोजित होने वाली आर्कटिक सर्कल असेंबली (ACA) 2026 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे।

आर्कटिक सर्कल असेंबली में कीर्ति वर्धन सिंह “Melting Poles: Perspectives from India and Singapore” विषय पर आयोजित पूर्ण सत्र में हिस्सा लेंगे। इसके अलावा, भारत की ओर से आयोजित “Arctic and Climate Change: Perspectives from Observer States” सत्र में वह शुरुआती संबोधन भी देंगे।

भारत आर्कटिक क्षेत्र को जलवायु, पर्यावरण, वैज्ञानिक अनुसंधान और वैश्विक सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता है। आर्कटिक में होने वाले जलवायु परिवर्तन का असर वैश्विक मौसम प्रणालियों के साथ-साथ भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है। भारत की वर्ष 2022 की आर्कटिक नीति में वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु एवं पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक एवं मानव विकास, परिवहन एवं कनेक्टिविटी, शासन एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा राष्ट्रीय क्षमता निर्माण को प्रमुख आधार बनाया गया है।

आइसलैंड के विदेश मंत्री से द्विपक्षीय वार्ता

रेक्याविक यात्रा के दौरान कीर्ति वर्धन सिंह आइसलैंड के विदेश मंत्री के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी करेंगे। इस दौरान आर्कटिक सहयोग, ध्रुवीय अनुसंधान, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की संभावना है।

भारत और आइसलैंड के संबंधों में हाल के वर्षों में आर्थिक और ऊर्जा सहयोग के साथ-साथ उच्च-स्तरीय राजनयिक संपर्क भी बढ़ा है। जियोथर्मल एनर्जी, मत्स्य पालन और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आर्कटिक सर्कल असेंबली में दुनिया भर की भागीदारी

आर्कटिक सर्कल असेंबली आर्कटिक क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए दुनिया के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मंचों में से एक है। 2026 की असेंबली 8 से 10 अक्टूबर तक रेक्याविक के Harpa Concert Hall and Conference Centre में आयोजित हो रही है। इसमें 70 से अधिक देशों से 2,000 से अधिक प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है।

तीन दिवसीय आयोजन में जलवायु परिवर्तन, समुद्री बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने, भू-राजनीति, सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, आर्थिक सहयोग और आर्कटिक के सतत विकास जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

भारत की बढ़ती भागीदारी ऐसे समय में हो रही है जब आर्कटिक क्षेत्र का महत्व जलवायु परिवर्तन, वैज्ञानिक अनुसंधान, वैश्विक समुद्री मार्गों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में लगातार बढ़ रहा है।

अंडर-19 एशिया कप 2026 का शेड्यूल जारी, 8 नवंबर को भारत-पाकिस्तान में महामुकाबला

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

अंडर-19 एशिया कप 2026 के शेड्यूल का ऐलान कर दिया गया है। इस बार टूर्नामेंट का आयोजन ओमान में होगा, जिसमें कुल 8 टीमें हिस्सा लेंगी। क्रिकेट फैंस के लिए सबसे खास मुकाबला भारत और पाकिस्तान के बीच होगा। दोनों टीमें लीग स्टेज में 8 नवंबर को आमने-सामने होंगी।

टूर्नामेंट की शुरुआत 5 नवंबर से होगी। पहले दिन श्रीलंका का सामना मलेशिया से, जबकि बांग्लादेश की भिड़ंत अफगानिस्तान से होगी। भारत अपने अभियान की शुरुआत 6 नवंबर को नेपाल के खिलाफ करेगा।

टूर्नामेंट में भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, यूएई और मलेशिया की टीमें हिस्सा लेंगी।

अंडर-19 एशिया कप 2026 का पूरा शेड्यूल

  • 5 नवंबर: श्रीलंका बनाम मलेशिया, बांग्लादेश बनाम अफगानिस्तान
  • 6 नवंबर: पाकिस्तान बनाम यूएई, भारत बनाम नेपाल
  • 7 नवंबर: अफगानिस्तान बनाम मलेशिया, श्रीलंका बनाम बांग्लादेश
  • 8 नवंबर: यूएई बनाम नेपाल, भारत बनाम पाकिस्तान
  • 9 नवंबर: बांग्लादेश बनाम मलेशिया, श्रीलंका बनाम अफगानिस्तान
  • 10 नवंबर: भारत बनाम यूएई, पाकिस्तान बनाम नेपाल
  • 12 नवंबर: सेमीफाइनल- A1 बनाम B2 और B1 बनाम A2
  • 14 नवंबर: फाइनल

लगातार दो फाइनल हार चुका है भारत

भारतीय अंडर-19 टीम के लिए पिछले कुछ संस्करणों का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। 2025 में खेले गए अंडर-19 एशिया कप के फाइनल में पाकिस्तान ने भारत को 191 रनों से हराया था। पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में 347 रन बनाए थे, जिसके जवाब में भारतीय टीम 156 रन पर ऑलआउट हो गई थी।

भारत लगातार दो बार अंडर-19 एशिया कप के फाइनल में हार चुका है। टीम इंडिया ने आखिरी बार 2021 में यह खिताब जीता था। इससे पहले भारत ने 2018 और 2019 में भी लगातार खिताब अपने नाम किए थे। भारत इस टूर्नामेंट को अब तक सबसे ज्यादा 7 बार जीत चुका है।

अंडर-19 एशिया कप में पाकिस्तानी बल्लेबाजों का दबदबा

अंडर-19 एशिया कप में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाजों की सूची में पाकिस्तान के खिलाड़ियों का दबदबा देखने को मिलता है। पाकिस्तान के समी असलम ने 10 मैचों में 840 रन बनाए हैं और वह टूर्नामेंट के सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज हैं।

पाकिस्तान के शाहजेब खान ने 8 मैचों में 504 रन, जबकि समीर मिन्हास ने 5 मैचों में 471 रन बनाए हैं। भारत की ओर से हिमांशु राणा ने 8 मैचों में 451 रन और वैभव सूर्यवंशी ने 10 मैचों में 437 रन बनाए हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच 8 नवंबर को होने वाला मुकाबला टूर्नामेंट के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहेगा। दोनों टीमों के बीच मुकाबले को लेकर क्रिकेट प्रशंसकों की नजरें इस मैच पर रहेंगी।

पंजाब के 50 नगर निगम वार्डों के चुनाव रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने 6 हफ्ते में दोबारा चुनाव कराने के दिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के पटियाला और मोगा के 50 नगर निगम वार्डों के चुनाव रद्द कर दिए हैं। कोर्ट ने छह सप्ताह में नए सिरे से चुनाव कराने और निगरानी समिति गठित करने के निर्देश दिए।

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के पटियाला और मोगा जिलों के 50 नगर निगम वार्डों में हुए चुनावों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इन वार्डों में नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दिया है और पूरी चुनाव प्रक्रिया छह सप्ताह के भीतर पूरी करने को कहा है। इनमें पटियाला जिले के 28 और मोगा जिले के 22 वार्ड शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त फैक्ट-फाइंडिंग कमीशन ने अपनी जांच में पाया कि इन वार्डों में नामांकन प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर रुकावटें डाली गई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोकने, उनके साथ मारपीट और धमकी देने तथा नामांकन पत्र छीनने, फाड़ने या नष्ट करने जैसी घटनाएं सामने आईं।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने पूर्व पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट जज जस्टिस निर्मलजीत कौर की अध्यक्षता वाले एक सदस्यीय फैक्ट-फाइंडिंग कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने प्रभावित 50 वार्डों में दोबारा चुनाव कराने के निर्देश दिए।

सुप्रीम कोर्ट के 28 सितंबर के आदेश में कहा गया कि कमीशन ने इन 50 वार्डों के चुनावों को प्रभावित पाया और इन्हें रद्द किए जाने की सिफारिश की। कोर्ट ने सिफारिशों को स्वीकार करते हुए संबंधित वार्डों में नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश दिया है।

नामांकन प्रक्रिया में रुकावटों के आरोप

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों, पुलिस अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों ने उम्मीदवारों को नामांकन पत्र दाखिल करने से रोका। आरोपों में मारपीट, कपड़े फाड़ने, धमकाने और नामांकन पत्र छीनने जैसी घटनाएं शामिल थीं।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया था कि हाई कोर्ट के निर्देशों के बावजूद नामांकन प्रक्रिया की ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग नहीं कराई गई।

कमीशन ने वीडियो और CCTV फुटेज समेत कई रिकॉर्ड खंगाले

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की जांच के लिए पूर्व पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट जज जस्टिस निर्मलजीत कौर की अध्यक्षता में फैक्ट-फाइंडिंग कमीशन गठित किया था। कमीशन ने हलफनामों, आधिकारिक जवाबों, वीडियो और CCTV फुटेज, तस्वीरों, मतदाता रजिस्टर और वोटर लिस्ट समेत विभिन्न रिकॉर्ड की जांच की।

इसके अलावा चुनाव अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों, सिविल अधिकारियों, चुनाव पर्यवेक्षकों और शिकायतकर्ताओं के बयान भी दर्ज किए गए। जांच के आधार पर कमीशन ने 50 वार्डों के चुनावों को रद्द करने और नए सिरे से चुनाव कराने की सिफारिश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

दोबारा चुनाव प्रक्रिया की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को एक सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता वाली मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने को भी कहा है।

57वीं GST काउंसिल बैठक: कारोबारियों को बड़ी राहत, गिरफ्तारी शक्तियों पर अंकुश; अभियोजन की सीमा 5 करोड़

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 57वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक हुई। बैठक में जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने, टैक्स अनुपालन का बोझ घटाने, छोटे कारोबारियों और एमएसएमई को राहत देने तथा कर प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाने से जुड़े कई अहम फैसले लिए गए।

बैठक में जीएसटी अधिकारियों की गिरफ्तारी शक्तियों पर अंकुश लगाने और जीएसटी से जुड़े आपराधिक अभियोजन की सीमा बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण सुधारों पर निर्णय लिया गया। आपराधिक अभियोजन शुरू करने की न्यूनतम कर राशि की सीमा 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई है। इससे छोटे और अपेक्षाकृत कम गंभीर कर मामलों में आपराधिक कार्रवाई का दायरा कम होगा।

छोटे टैक्स मामलों में नोटिस का बोझ घटेगा

काउंसिल ने करदाताओं पर छोटे-मोटे मामलों में कार्रवाई का बोझ कम करने के लिए सामान्य मानक तय करने की दिशा में भी कदम उठाया है। आपके उपलब्ध विवरण के अनुसार 10,000 रुपये से कम की कर राशि वाले मामलों में नए डिमांड नोटिस जारी नहीं करने और ऐसे लंबित नोटिस वापस लेने की सिफारिश की गई है।

इसके साथ ही सामान्य पेनल्टी की सीमा को भी कम करने का फैसला सामने आया है। रिपोर्टों के मुताबिक सामान्य पेनल्टी को 25,000 रुपये से घटाकर 10,000 रुपये किया गया है।

रिफंड प्रक्रिया होगी तेज

जीएसटी रिफंड से जुड़ी प्रक्रिया को भी आसान और तेज बनाने पर जोर दिया गया है। काउंसिल ने रिफंड दावों के निपटारे की समयसीमा कम करने की दिशा में फैसला लिया है। इसका उद्देश्य कारोबारियों की कार्यशील पूंजी को लंबे समय तक टैक्स विभाग में फंसे रहने से बचाना है।

साथ ही इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC को लेकर भी खरीदारों को राहत देने के उपाय किए गए हैं, ताकि सप्लायर की गलती या डिफॉल्ट का असर वास्तविक और अनुपालन करने वाले खरीदारों पर न पड़े।

छोटे ई-कॉमर्स कारोबारियों को राहत

ई-कॉमर्स के जरिए सामान और सेवाएं बेचने वाले छोटे कारोबारियों के लिए जीएसटी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को सरल बनाने की सिफारिश की गई है। इसका उद्देश्य छोटे विक्रेताओं के लिए अलग-अलग राज्यों में कारोबार करने की प्रक्रियात्मक बाधाओं को कम करना है।

जीएसटी व्यवस्था में मल्टी-स्टेट रजिस्ट्रेशन और अनुपालन को आसान बनाने से ई-कॉमर्स कारोबारियों के लिए देशभर में कारोबार का विस्तार करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। सरकार की ओर से जीएसटी अनुपालन में ऑटोमेशन और कम कागजी कार्रवाई पर भी जोर दिया जा रहा है।

GST दरों में बदलाव नहीं

57वीं जीएसटी काउंसिल बैठक का फोकस मुख्य रूप से प्रोसेस रिफॉर्म, अनुपालन, रजिस्ट्रेशन, रिफंड, ITC और टैक्स प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस बैठक में जीएसटी दरों में कोई नया बदलाव नहीं किया गया।

एमएसएमई और छोटे कारोबारियों पर असर

इन सुधारों का सबसे सीधा असर छोटे कारोबारियों और एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ सकता है। अभियोजन की सीमा बढ़ने, गिरफ्तारी शक्तियों पर नियंत्रण, छोटे टैक्स मामलों में नोटिस का बोझ कम होने और रिफंड प्रक्रिया तेज होने से कारोबारियों के लिए अनुपालन लागत कम करने तथा कार्यशील पूंजी को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।

सरकार का व्यापक उद्देश्य जीएसटी व्यवस्था को अधिक ट्रस्ट-बेस्ड, पारदर्शी और कारोबार-अनुकूल बनाना है। 57वीं बैठक में सामने आए सुधारों को इसी दिशा में GST 2.0 के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है।

कैंसर की महंगी दवाओं पर सरकार का बड़ा फैसला, ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित; MRP में 70% तक कमी की उम्मीद

दिल्ली / सत्ता संदेश

कैंसर मरीजों को महंगी दवाओं से राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने सभी गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला किया है। इस फैसले का उद्देश्य कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को कम करना और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को घटाना है।

सरकार के मुताबिक, नए नियम के तहत ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित तथा पेटेंट और गैर-पेटेंट वाली कैंसर रोधी दवाएं शामिल होंगी। ट्रेड मार्जिन की सीमा तय होने से दवाओं की कीमत और मरीज द्वारा भुगतान की जाने वाली वास्तविक राशि के बीच का अंतर कम होने की उम्मीद है।

कुछ दवाओं की MRP में 70 फीसदी तक कमी की उम्मीद

सरकार का अनुमान है कि इस फैसले के बाद कुछ कैंसर रोधी दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में 70 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इससे कैंसर के इलाज पर मरीजों का अपनी जेब से होने वाला खर्च यानी आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर कम होने की उम्मीद है।

सरकार के अनुसार, इस कदम से मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। हालांकि, वास्तविक कीमत में कमी दवा और उसके मौजूदा मूल्य ढांचे के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों दवाएं होंगी शामिल

इस फैसले की खास बात यह है कि गैर-अनुसूचित श्रेणी की कैंसर रोधी दवाओं को व्यापक दायरे में रखा गया है। इसमें देश में निर्मित और आयातित दोनों तरह की दवाओं के साथ-साथ पेटेंट और गैर-पेटेंट दवाएं भी शामिल होंगी।

सरकार का कहना है कि ट्रेड मार्जिन को सीमित करने से मरीजों को जीवनरक्षक दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

2019 में भी सरकार ने उठाया था कदम

सरकार ने बताया कि यह पहल वर्ष 2019 में किए गए हस्तक्षेप की अगली कड़ी है। उस समय 526 ब्रांड की कैंसर दवाओं को लेकर किए गए कदम से सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की बचत होने की बात सामने आई थी।

अब गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने के फैसले के जरिए सरकार ने कैंसर के इलाज को अधिक किफायती बनाने पर जोर दिया है।

दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने पर भी जोर

सरकार ने कीमतों में कमी के साथ-साथ बाजार में जरूरी कैंसर दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने पर भी जोर दिया है। सरकार के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य मरीजों को आर्थिक राहत देने के साथ यह सुनिश्चित करना है कि जीवनरक्षक दवाओं की बाजार में उपलब्धता प्रभावित न हो।

सरकार ने इस कदम को किफायती, सुलभ और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया है।

NCLT का रिकॉर्ड प्रदर्शन, चंडीगढ़ बेंच ने 1,079 करोड़ की 9 समाधान योजनाओं को दी मंजूरी

NCLT ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में रिकॉर्ड 107 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी। चंडीगढ़ बेंच ने 1,079.07 करोड़ रुपये की 9 योजनाओं को मंजूरी दी।

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में अब तक का अपना सबसे बेहतर तिमाही प्रदर्शन दर्ज किया है। जुलाई से सितंबर 2026 के बीच एनसीएलटी की विभिन्न बेंचों ने कुल 107 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी। यह किसी एक तिमाही में मंजूर की गई समाधान योजनाओं की अब तक की सबसे अधिक संख्या है।

इस रिकॉर्ड प्रदर्शन में चंडीगढ़ बेंच का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। चंडीगढ़ बेंच ने तिमाही के दौरान 9 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी, जिनका कुल मूल्य 1,079.07 करोड़ रुपये रहा। चंडीगढ़ बेंच द्वारा मंजूर योजनाओं की कुल राशि 10,79,06,84,000 रुपये है।

एनसीएलटी की सभी बेंचों द्वारा मंजूर 107 समाधान योजनाओं का कुल मूल्य 11,000 करोड़ रुपये से अधिक है। इस दौरान मुंबई बेंच ने सबसे अधिक 35 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी। इसके बाद प्रिंसिपल बेंच और नई दिल्ली बेंच ने 29-29 योजनाओं को मंजूरी दी। चंडीगढ़ बेंच भी उल्लेखनीय योगदान देने वाली बेंचों में शामिल रही।

पिछले वर्षों के मुकाबले बड़ी उपलब्धि

एनसीएलटी का मौजूदा प्रदर्शन पिछले वर्षों की दूसरी तिमाही के मुकाबले काफी अधिक रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में 60, वित्त वर्ष 2024-25 में 57, वित्त वर्ष 2023-24 में 82, वित्त वर्ष 2022-23 में 47 और वित्त वर्ष 2021-22 में 20 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी गई थी। ऐसे में वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में 107 योजनाओं की मंजूरी एनसीएलटी का अब तक का सबसे बड़ा तिमाही आंकड़ा है।

पहली छमाही में 185 समाधान योजनाएं मंजूर

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 78 समाधान योजनाओं को मंजूरी मिली थी। दूसरी तिमाही में 107 योजनाओं की मंजूरी के बाद चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में कुल 185 समाधान योजनाएं मंजूर हो चुकी हैं।

30 सितंबर 2026 तक एनसीएलटी की विभिन्न बेंचों द्वारा मंजूर समाधान योजनाओं की संचयी संख्या 1,735 हो गई है। इन योजनाओं के तहत स्वीकृत कुल राशि लगभग 4.89 लाख करोड़ रुपये है।

एनसीएलटी के अनुसार, समाधान योजनाओं की मंजूरी के लिए मामलों का प्रवाह लगातार बना हुआ है। 30 सितंबर तक 294 समाधान योजनाएं मंजूरी के लिए लंबित थीं, जबकि 41 मामलों में आदेश सुरक्षित रखे गए थे। इस तरह कुल 335 मामले इन दोनों चरणों में थे। यह संख्या अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोट किए गए 363 लंबित आवेदनों से कम है।

केस मैनेजमेंट और लंबित मामलों पर फोकस

एनसीएलटी ने मामलों के तेजी से निपटारे और केस-फ्लो मैनेजमेंट को बेहतर बनाने के लिए कई प्रशासनिक और संस्थागत कदम उठाए हैं। अधिकरण की 16 बेंचों में लंबित मामलों और निपटान से जुड़े आंकड़ों की निगरानी के लिए एक मजबूत व्यवस्था विकसित की गई है।

इस व्यवस्था से विभिन्न बेंचों और अदालतों में कार्यभार की बेहतर निगरानी संभव हो रही है। साथ ही मामलों के पुनर्वितरण और उपलब्ध न्यायिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से जुड़े फैसले लेने में भी मदद मिल रही है।

एनसीएलटी ने मामलों के पंजीकरण और लिस्टिंग के लिए एक संरचित व्यवस्था भी लागू की है। इसका उद्देश्य रजिस्ट्री प्रक्रिया में एकरूपता लाना और कॉज लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है। पुराने लंबित मामलों के साथ-साथ IBC प्रवेश मामलों और समाधान योजनाओं की मंजूरी से संबंधित आवेदनों को भी उचित प्राथमिकता देने पर जोर दिया जा रहा है।

आवश्यकता के अनुसार विशेष बेंचों का गठन, कार्यभार का पुनर्वितरण और उपलब्ध न्यायिक समय के अधिकतम इस्तेमाल के लिए भी कदम उठाए गए हैं।

डिजिटल सुविधाओं से न्याय तक आसान पहुंच

एनसीएलटी ने अपने डिजिटल परिवर्तन के तहत ई-निरीक्षण और ई-प्रमाणित प्रति (e-Certified Copy) जैसी सुविधाएं शुरू की हैं। इनके माध्यम से अधिवक्ताओं, वादियों और अन्य हितधारकों को न्यायिक रिकॉर्ड और प्रमाणित दस्तावेजों तक अधिक आसानी से पहुंच मिल रही है।

ये सुविधाएं एनसीएलटी के व्यापक डिजिटल परिवर्तन का हिस्सा हैं, जिसमें नया एनसीएलटी पोर्टल और ई-कोर्ट्स 2.0 का निरंतर कार्यान्वयन शामिल है।

सदस्यों की कमी के बावजूद रिकॉर्ड प्रदर्शन

एनसीएलटी का यह प्रदर्शन संस्थागत क्षमता और बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियों के बीच सामने आया है। अध्यक्ष के अलावा 62 सदस्यों की स्वीकृत क्षमता के मुकाबले वर्तमान में अधिकरण में 48 सदस्य कार्यरत हैं, जबकि 14 पद रिक्त हैं।

वर्तमान में 13 अदालतें पूरे दिन और 18 अदालतें आधे दिन के आधार पर काम कर रही हैं। इसके अलावा, मौजूदा कैलेंडर वर्ष के अंत तक चार और सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है।

एनसीएलटी से जुड़े न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति तथा बुनियादी ढांचे की कमियों से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लिया है।

इन चुनौतियों के बावजूद एनसीएलटी ने मामलों के प्रभावी प्रबंधन, अनावश्यक देरी कम करने और उपलब्ध न्यायिक एवं प्रशासनिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर अपना ध्यान बनाए रखा है।

जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में चंडीगढ़ बेंच द्वारा 1,079 करोड़ रुपये से अधिक की 9 समाधान योजनाओं को मंजूरी दिया जाना एनसीएलटी के रिकॉर्ड राष्ट्रीय प्रदर्शन में चंडीगढ़ के महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है। अधिकरण का फोकस संस्थागत सुधार, मामलों के समयबद्ध निपटारे, बेहतर केस मैनेजमेंट और उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर बना हुआ है।

एक सफ़र ने मुझे सेवा और मोदी के बारे में क्या सिखाया : उदय माहुरकर

उदय माहुरकर, पत्रकार


यह एक उभरते हुए पत्रकार और एक युवा पॉलिटिकल ऑर्गनाइज़र की कहानी है, जिन्होंने अभी-अभी एक नई पॉलिटिकल ज़िम्मेदारी संभाली थी…

साल था 1987। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस का नेशनल पॉलिटिक्स पर दबदबा था, जबकि BJP सिर्फ़ दो लोकसभा सीटों और अनिश्चित संभावनाओं के साथ एक नई उभरती हुई ताकत थी।

ऐसे समय में, 1987 की शुरुआत में, अहमदाबाद में द इंडियन एक्सप्रेस में मेरे चीफ़ रिपोर्टर, सीनियर पत्रकार किरीटभाई भट्ट ने नए नियुक्त गुजरात स्टेट ऑर्गनाइज़ेशन सेक्रेटरी नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा जताई। इसके बाद, हम नरेंद्रभाई से मिलने अहमदाबाद में BJP के खानपुर ऑफ़िस गए। नरेंद्रभाई के साथ पॉलिटिकल और सोशल मुद्दों पर 30 मिनट की बातचीत ने हमें बहुत इम्प्रेस किया।

उनसे मिलने के बाद बाहर आते हुए, किरीटभाई – जो अपने लेफ़्टिस्ट झुकाव के बावजूद वैल्यूज़-बेस्ड जर्नलिज़्म के लिए मेरे आइडल रहे हैं – ने मुझसे कहा, “मोदी बहुत आगे जाएंगे। वह बहुत फ़ोकस्ड, मैच्योर और दयालु इंसान हैं, जिनकी सोशल और पॉलिटिकल मुद्दों पर अच्छी पकड़ है।” 1987 के आखिर तक, पॉलिटिकल माहौल बदल गया था। बोफोर्स स्कैंडल से राजीव गांधी को नुकसान हुआ था, जबकि गुजरात में अमर सिंह चौधरी की सरकार गुटबाजी, जाति की राजनीति और बढ़ती निराशा से जूझ रही थी।

इन सबके बीच, गुजरात में सालों में सबसे बुरा सूखा पड़ा, जिससे लोग पलायन कर रहे थे, पीने के पानी के लिए रेल ट्रांसपोर्ट बंद हो गया और चारे की भारी कमी हो गई जिससे जानवर मर रहे थे।

सूखे का लेवल बहुत ज़्यादा था:

राज्य के 19 में से 17 ज़िले प्रभावित हुए, जिनमें कच्छ, बनासकांठा, मेहसाणा और जामनगर सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में से थे। लगभग दो करोड़ जानवरों को सूखे का सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ। चारा पंजाब और दूसरी जगहों से मंगाना पड़ा, और लगभग 7 लाख जानवरों को कैटल कैंप में रखा गया। राहत ऑपरेशन का मकसद लगभग 12 लाख मज़दूरों को रोज़गार देना था। लेकिन उनका पेमेंट कभी भी समय पर नहीं किया गया, कभी-कभी तो पूरा भी नहीं।

कई मज़दूरों को तो अपने अधिकारों के बारे में भी पता नहीं था! मुश्किलों में घिरी राजीव गांधी सरकार ने राहत के लिए करीब 65 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, लेकिन सवाल उठ रहे थे कि क्या यह मदद दूर-दराज के गांवों तक पहुंच रही है। यह असल में और असल में, दोनों तरह से एक कागज़-सी पतली सरकार थी।

इस बीच, नरेंद्र मोदी को ‘न्याय यात्रा’ का आइडिया आया, जिसने असल में दिखाया कि सेवा के लिए कमिटमेंट क्या होता है। न्याय यात्रा ने इंसानियत-पहले और सेवा-पहले के सिद्धांतों के साथ बहुत ही बेसिक सवालों को हल किया।

पहला था वेरिफिकेशन: ग्राउंड लेवल पर चेक करना कि राहत साइटों पर काम करने वालों को सरकारी गाइडलाइंस के हिसाब से सैलरी और फायदे मिल रहे हैं या नहीं और कहाँ नहीं, यह रिकॉर्ड करना।

दूसरा था अवेयरनेस: काम करने वालों, किसानों और आदिवासी समुदायों को उनके अधिकारों और उनके प्रति सरकार की ज़िम्मेदारियों के बारे में बताना, ताकि वे खुद अपना हक ले सकें।

तीसरा था न्याय: करप्शन और कमियों के सबूत इकट्ठा करना और उन्हें ठीक करने के लिए राज्य अधिकारियों के सामने फॉर्मली पेश करना।
मोदी ने राहत के हकों का डिटेल्ड ब्यौरा तैयार किया और काम करने वालों को गाँव-गाँव जाकर उनके डिस्ट्रीब्यूशन को वेरिफाई करने और लोगों को असलियत समझाने के लिए ट्रेन किया।

यात्रा में चार रथ शामिल थे, जिनमें से हर एक पुराने ज़माने की हुड वाली जीप पर बना था। उन्हें पर्दों से सजाया गया था ताकि वे चलते-फिरते स्टेज का काम कर सकें। यह भी मोदी की एक नई पहल थी। उस समय, रिसोर्स की कमी की वजह से, BJP की गुजरात यूनिट मिनी ट्रक नहीं खरीद सकती थी, इसलिए मोदी और उनकी टीम ने जीपों को रथ में बदल दिया।

40 दिन की यह यात्रा गुजरात के चारों कोनों—गोधरा, पालनपुर, जामनगर और भुज—से शुरू हुई और इसे चार बड़े नेताओं—केशुभाई पटेल, शंकरसिंह वाघेला, सुरेशभाई मेहता, काशीराम राणा/मकरंद देसाई ने लीड किया। यह यात्रा 6 दिसंबर, अंबेडकर की पुण्यतिथि (पुण्य तिथि) को शुरू हुई और 12 जनवरी 1988, स्वामी विवेकानंद की जयंती पर खत्म हुई।

‘यात्रा’ शब्द—जो पहली बार देश की पॉलिटिकल डिक्शनरी में आ रहा था और पॉलिटिकल और सोशल मैसेजिंग का एक ज़रूरी ज़रिया बनने वाला था, जैसा कि 1990 में श्री लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ/अयोध्या यात्रा के मामले में हुआ था—मोदी ने ही सोचा था। यात्रा का मतलब है बड़े पैमाने पर तीर्थयात्रा। इसलिए, भारतीय संदर्भ में इस शब्द का एक पवित्र मतलब था। यहीं पर नई सोच और सेवा के प्रति समर्पण काम आता है। ये ‘रथ’ उन राहत सेंटरों पर गए जहाँ एक जगह 500 से 1,000 लोग मौजूद थे। वहाँ, नेताओं ने अकाल के हालात को देखते हुए लोगों के हक के बारे में बताया, जैसे मुफ़्त पानी, बच्चों के साथ रहने की जगह और दूसरी ज़रूरी सुविधाएँ। इससे मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बना और लोगों की हमदर्दी मिली।

यात्रा सीधे तौर पर राहत लेकर आई। कार्यकर्ताओं ने राहत सेंटरों पर ‘सुखरी’ (गुड़, गेहूं के आटे और घी से बनी एक लंबे समय तक चलने वाली मिठाई), मूंगफली, चना और गुड़ बाँटा, ताकि गर्मी में कड़ी मेहनत कर रहे मज़दूर भूखे न रहें। सेवा के इस छोटे से काम ने प्रभावित लोगों में भरोसा जगाने में बड़ी भूमिका निभाई।

यात्रा के दौरान, नरेंद्र मोदी मवेशियों की हालत को लेकर परेशान थे। उन्होंने BJP कार्यकर्ताओं को ‘बेलबार’ (मवेशियों के लिए शेड) का इंतज़ाम करने के लिए मोटिवेट किया। सूखे के दौरान, किसान अपने बैलों को वहीं छोड़ देते थे और संकट खत्म होने के बाद, वे उन्हें वापस ले जाते और खेती फिर से शुरू कर देते थे। यह ‘सेवा’ की भावना का एक और प्रैक्टिकल एक्सप्रेशन था। जानवरों की यह देखभाल मोदी की ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा रही है। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो वे रेगुलर तौर पर जानवरों के हेल्थ कैंप लगाते थे, जहाँ गायों और भैंसों की आँखों के मोतियाबिंद का भी इलाज किया जाता था।

इस ट्रिप ने ज़मीनी लेवल पर तुरंत एक कनेक्शन बनाया। मैंने ऐसी कई मीटिंग्स कवर कीं। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के लोग इस ट्रिप से गहराई से जुड़े।

इन सेशन में बार-बार यही पैटर्न देखा गया: मज़दूरों तक पहुँचने से पहले ही उनकी मज़दूरी रोक ली गई या कम कर दी गई। BJP कार्यकर्ताओं ने सिस्टमैटिक तरीके से इन शिकायतों को रिकॉर्ड किया। मज़दूरों को मिली मज़दूरी का रिकॉर्ड रखने और उस पर साइन या अंगूठा लगाने के लिए बढ़ावा दिया गया। जहाँ मज़दूरों को उनकी तय मज़दूरी से कम दिया जा रहा था, वहाँ गाँव के सरपंचों ने लिखकर बयान दिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस और माँग पत्रों के ज़रिए सरकार की नाकामी के बारे में सच बताया गया, जिससे सरकार और उसकी एडमिनिस्ट्रेटिव मशीनरी पर दबाव पड़ा।

इस यात्रा से मज़दूरों ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई। अपने हक़ के बारे में पता चलने पर, मज़दूरों ने कॉन्ट्रैक्टर और अधिकारियों से अपनी मज़दूरी के बारे में सवाल पूछना शुरू कर दिया। इससे कॉन्ट्रैक्टर और एडमिनिस्ट्रेशन पर उन्हें उनका बकाया देने का दबाव पड़ा। अमर सिंह सरकार को एक्शन लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। गरीबों के हक़ में लगातार वकालत ने उस समय की सरकार को राहत कामों का दायरा बढ़ाने पर मजबूर कर दिया।

इस यात्रा ने BJP को ग्रामीण इलाकों में अपना बेस मज़बूत करने में मदद की। पहले, पार्टी को मुख्य रूप से शहरी मिडिल क्लास की पार्टी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसने मज़दूरों, किसानों और आदिवासी समुदायों के बीच अपना सपोर्ट बढ़ाया। इससे बड़ी संख्या में नए कार्यकर्ता भी पार्टी में शामिल हुए। लेकिन सबसे ज़रूरी बात यह है कि मोदी के ‘सेवा’ मॉडल ने BJP और लोगों के बीच एक इमोशनल कनेक्शन बनाया। इसीलिए 1989 से, जब नरेंद्र मोदी ने राज्य में ऑर्गेनाइज़ेशनल और एडमिनिस्ट्रेटिव ज़िम्मेदारियाँ संभालीं और बाद में प्रधानमंत्री बने, BJP कभी भी लोकसभा या असेंबली चुनाव नहीं हारी।

इस तरह, न्याय यात्रा असल में मोदी की पॉलिटिकल-कम-सोशल सोच का एक ब्लूप्रिंट थी जो पॉलिटिकल मीडियम/पब्लिक लाइफ़ के ज़रिए लोगों की सेवा पर आधारित थी। इसने यह पक्का किया कि सरकारी फ़ायदे सही लाभार्थियों तक पहुँचें, उन बिचौलियों को हटाया जो पब्लिक का पैसा दूसरी जगह ले जाते थे और नागरिकों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया। यह उनकी 25 साल की सरकारों का एक ज़रूरी हिस्सा रहा है। और यह यह भी दिखाता है कि मोदी क्यों सफल हुए हैं…क्योंकि सेवा से बढ़कर कुछ नहीं जुड़ता!

(लेखक एक अनुभवी पत्रकार और जाने-माने लेखक हैं)

‘ब्लू इकॉनमी’ से बदलेगी भारत की विकास की दिशा, विकसित भारत 2047 का नया विज़न!

डॉ. जितेंद्र सिंह, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री

सदियों से, समुद्र ने भारत के व्यापार को आगे बढ़ाया है, इसके तटीय इलाकों की संस्कृतियों को आकार दिया है और इसके स्ट्रेटेजिक असर को मज़बूत किया है। आज, 11,098 km की कुल तटरेखा, विशाल समुद्री संसाधनों और हिंद महासागर में एक अहम जगह के साथ, यह भारत के विकास को एक नया आयाम देता है।

अब जब देश ‘विकसित भारत 2047’ की ओर बढ़ रहा है, तो ‘ब्लू इकॉनमी’ खुशहाली, स्थिरता और देश की ताकत के एक मज़बूत रास्ते के तौर पर उभर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके को भारत के विकास के विज़न के सेंटर में रखा है। 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण में, उन्होंने ‘ब्लू इकॉनमी’ को उन सात धाराओं या ‘स्पत-धारा’ में से एक बताया जो देश को आगे ले जाएंगी।

‘ब्लू इकॉनमी’ सिर्फ़ समुद्र से जुड़ी इकॉनमी नहीं है, बल्कि यह लोगों, विचारों और संभावनाओं से जुड़ी इकॉनमी है। यह मछुआरों और तटीय समुदायों के लिए बेहतर रोज़ी-रोटी पक्का करने, एंटरप्रेन्योर और इन्वेस्टर के लिए मौके बनाने, खाने और एनर्जी सिक्योरिटी को मज़बूत करने और साइंस के सही इस्तेमाल से क्लाइमेट-रेज़िलिएंट तट बनाने के बारे में है। सबसे बढ़कर, यह इकोनॉमिक ग्रोथ को एनवायरनमेंटल ज़िम्मेदारी के साथ बैलेंस करने के बारे में है।

इस मौके के साथ कुछ तुरंत आने वाली चुनौतियाँ भी आती हैं। मरीन पॉल्यूशन और क्लाइमेट चेंज मरीन रिसोर्स पर बहुत ज़्यादा दबाव डाल रहे हैं। ये चुनौतियाँ इनोवेशन, सस्टेनेबल दखल और इन्वेस्टमेंट के लिए कैटलिस्ट बन सकती हैं। टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट, वेंचर क्रिएशन और कैपिटल जुटाने में तेज़ी लाकर, भारत मरीन रिन्यूएबल एनर्जी, मरीन बायोटेक्नोलॉजी, एडवांस्ड फिशरीज़, ओशन डेटा सर्विसेज़, सस्टेनेबल टूरिज्म और डीप-सी टेक्नोलॉजी जैसे उभरते सेक्टर को ‘ब्लू इकॉनमी’ ग्रोथ के पावरफुल ड्राइवर में बदल सकता है।

एक मज़बूत ‘ब्लू इकॉनमी’ इनकम और न्यूट्रिशनल सिक्योरिटी को बेहतर बनाने के लिए सस्टेनेबल फिशरीज़ और एक्वाकल्चर को बदल सकती है। मॉडर्न पोर्ट, शिपिंग और लॉजिस्टिक्स ट्रेड में कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ा सकते हैं। मरीन रिन्यूएबल एनर्जी भारत को क्लीन एनर्जी में बदलने में मदद कर सकता है। जहाँ मरीन टूरिज्म से लोकल बिज़नेस और नौकरियाँ बन सकती हैं, वहीं ओशन साइंस, फोरकास्टिंग और डिजिटल सर्विसेज़ जान, प्रॉपर्टी और रोजी-रोटी की रक्षा कर सकती हैं। ये सभी एरिया मिलकर मैरीटाइम सिक्योरिटी, टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की लीड करने की क्षमता को मज़बूत कर सकते हैं।

इसलिए, भारत ‘ब्लू इकॉनमी’ को अलग-अलग स्कीम के सेट के तौर पर नहीं, बल्कि नेशनल डेवलपमेंट के लिए एक इंटीग्रेटेड स्ट्रैटेजी के तौर पर देखता है। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि साइंस को ऐसी पॉलिसी बनानी चाहिए जो ऐसे एंटरप्राइज और इंस्टीट्यूशन को बढ़ावा दें जो लोगों और धरती के लिए असल वैल्यू बना सकें। मिनिस्ट्री ऑफ़ अर्थ साइंसेज़ इस बदलाव के लिए साइंटिफिक, टेक्नोलॉजिकल और इंस्टीट्यूशनल नींव रख रहा है।

‘डीप ओशन मिशन’ के ज़रिए, जो मरीन स्पेशल प्लानिंग, ओशन मॉनिटरिंग नेटवर्क, डिजिटल प्लेटफॉर्म, फोरकास्टिंग सिस्टम और एडवांस्ड मरीन सर्विसेज़ से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट हैं, मिनिस्ट्री समुद्र से जुड़ी जानकारी को आम लोगों के फायदे में बदल रही है। डीप-सी रिसर्च, मरीन बायोटेक्नोलॉजी, ओशन एनर्जी और डिसेलिनेशन से जुड़े एरिया में स्वदेशी क्षमताएँ रिसोर्स कंजर्वेशन, इनोवेशन और आत्मनिर्भरता का रास्ता बना रही हैं। मछली पालन से जुड़ी सलाह, शुरुआती चेतावनी देने वाली सर्विस और कोस्टल मैनेजमेंट के तरीके, तटीय इलाकों में लोगों की रोज़ी-रोटी को सपोर्ट कर रहे हैं और साथ ही आपदा की तैयारी को भी मज़बूत कर रहे हैं।

अगले फेज़ में स्केल, स्पीड और असर होना चाहिए। भारत को इंटीग्रेटेड ओशन गवर्नेंस, बेहतर कोऑर्डिनेशन, एक भरोसेमंद प्रोजेक्ट पाइपलाइन और सबूतों के आधार पर फैसले लेने के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी के ज़्यादा इस्तेमाल की ज़रूरत है। ‘ब्लू इकॉनमी’ में इन्वेस्टमेंट 2015–2025 के दौरान लगभग Rs 3.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2026–2035 के दौरान लगभग Rs 25.8 लाख करोड़ होने का अनुमान है, जो एक ऐतिहासिक मौका है।

इस पोटेंशियल को सस्टेनेबल नतीजों में बदलने के लिए, फाइनेंसिंग के नए तरीके, ज़िम्मेदार प्राइवेट कैपिटल, स्टार्टअप में हिस्सा लेना और ट्रांसपेरेंट इम्प्लीमेंटेशन ज़रूरी होगा। कोस्टल कम्युनिटी को इस पूरी यात्रा में एक्टिव पार्टिसिपेंट और मुख्य बेनिफिशियरी बने रहना होगा।

सबसे रोमांचक चैप्टर भारत के युवाओं से जुड़ा है। ओशन इकॉनमी में हर युवा एंटरप्रेन्योर, इन्वेस्टर, साइंटिस्ट, टेक्नोलॉजिस्ट, प्रोफेशनल और स्किल्ड वर्कर के लिए बहुत ज़्यादा पोटेंशियल है। पोर्ट, शिपिंग, लॉजिस्टिक्स, फिशरीज़ और टूरिज्म जैसे ट्रेडिशनल सेक्टर को ऑटोमेशन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लीन फ्यूल, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और भरोसेमंद ऑपरेशन के ज़रिए नया रूप दिया जा रहा है। मरीन रिन्यूएबल एनर्जी, मरीन बायोटेक्नोलॉजी, डीप-सी टेक्नोलॉजी, एक्वाकल्चर, मरीन रोबोटिक्स, मरीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आइलैंड टूरिज्म, इलेक्ट्रिक बोट्स और ग्रीन मैरीटाइम सिस्टम जैसे उभरते सेक्टर नए करियर, बिज़नेस और इन्वेस्टमेंट के मौके बना रहे हैं।

यह भविष्य की जरूरतों के लिए कौशल विकसित करने, स्टार्टअप शुरू करने, स्वदेशी तकनीक विकसित करने, जिम्मेदारी से निवेश करने और खोजों को ऐसे समाधानों में बदलने का समय है जिन्हें बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है। हमारे विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, उद्योगों और तटीय समुदायों को एक साथ प्रयोग और उद्यम के केंद्र के रूप में उभरना चाहिए। भारतीय युवा उन्नत मछली पकड़ने की प्रणाली, स्वच्छ जहाज, मजबूत बंदरगाह, समुद्र से जुड़े डेटा प्लेटफॉर्म, जैव-आधारित उत्पाद और प्रौद्योगिकियां डिजाइन कर सकते हैं जो गहरे समुद्र का पता लगाने के साथ-साथ इसके नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी कर सकते हैं।

‘नीली अर्थव्यवस्था’ भविष्य का वादा नहीं है। यह एक राष्ट्रीय मिशन है जिसे एक ऐसी पीढ़ी की आवश्यकता है जो इसे आगे बढ़ाने का साहस रखे। मैं भारत के युवाओं को परिवर्तन की इस ‘नीली लहर’ में अपनी कल्पना, साहस और नई सोच का योगदान देने के लिए आमंत्रित करता हूं। आइए अपने महासागरों को नवप्रवर्तन की प्रयोगशाला, आजीविका का स्रोत और स्थायी समृद्धि का साधन बनाएं। आइए हम सब एक ऐसी समुद्री अर्थव्यवस्था बनाने के लिए मिलकर काम करें जो उत्पादक होने के साथ-साथ जिम्मेदार भी हो, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर सशक्त हो और ‘सप्त-धारा’ की भावना के अनुरूप हो। ‘विकसित भारत 2047’ की ओर हमारी यात्रा न केवल जमीन पर बल्कि उस विशाल नीले सागर में भी तय होगी जो इस देश को घेरे हुए है और हमें जोड़ता है।

{लेखक केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं।}

LPU हिंसा मामले में 3 और छात्र गिरफ्तार, कोर्ट ने पुलिस रिमांड पर भेजा

जालंधर / सत्ता संदेश

फगवाड़ा-जालंधर नेशनल हाईवे स्थित Lovely Professional University (LPU) में हुई हिंसा के मामले में फगवाड़ा पुलिस ने तीन और छात्रों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने तीनों आरोपियों को अलग-अलग स्थानों से गिरफ्तार करने के बाद अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया।

पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बिश्या पुत्र अशोक कुमार निवासी महाराष्ट्र, कृष्णा पुत्र राजेश निवासी बिहार और योगेश पुत्र संपत निवासी राजस्थान के रूप में हुई है। तीनों आरोपी लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के छात्र बताए जा रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक पुलिस ने आरोपियों को अलग-अलग स्थानों से काबू किया। इनमें से योगेश को लवली यूनिवर्सिटी के लोअर गेट से गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप है कि हिंसा के दौरान वाहनों में तोड़फोड़ करने, सड़क अवरुद्ध करने और छात्रों को हिंसा के लिए उकसाने की कोशिश की गई थी।

गिरफ्तारी के बाद तीनों आरोपियों को फगवाड़ा की अदालत में पेश किया गया। पुलिस ने मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए रिमांड हासिल किया है। अब पुलिस आरोपियों से पूछताछ कर हिंसा के दौरान उनकी कथित भूमिका और मामले में शामिल अन्य संभावित आरोपियों के बारे में जानकारी जुटा रही है।

पाकिस्तान को IMF से 1.2 अरब डॉलर की नई मदद पर सहमति, महंगाई और आर्थिक चुनौतियां बरकरार

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान को करीब 1.2 अरब डॉलर की नई वित्तीय मदद देने पर शुरुआती सहमति जताई है। इसमें करीब 1 अरब डॉलर मुख्य कर्ज कार्यक्रम के तहत, जबकि करीब 21 करोड़ डॉलर जलवायु परिवर्तन और दीर्घकालिक आर्थिक जोखिमों से निपटने वाले कार्यक्रम के तहत दिए जाएंगे। हालांकि, इस राशि के जारी होने से पहले IMF के कार्यकारी बोर्ड की अंतिम मंजूरी जरूरी होगी।

दो कार्यक्रमों की समीक्षा के बाद बनी सहमति

IMF और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच हुई लंबी बातचीत के बाद यह समझौता हुआ है। IMF की टीम का नेतृत्व इवा पेत्रोवा ने किया। यह सहमति पाकिस्तान के दो अलग-अलग आर्थिक कार्यक्रमों की समीक्षा के बाद बनी है।

कार्यकारी बोर्ड से मंजूरी मिलने के बाद इन दोनों कार्यक्रमों के तहत पाकिस्तान को मिलने वाली कुल वित्तीय सहायता करीब 5.7 अरब डॉलर हो जाएगी। IMF के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के आर्थिक प्रभावों के बावजूद पाकिस्तान ने अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने में कुछ प्रगति की है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में दिखे सुधार के संकेत

IMF के मुताबिक पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सुधार के कुछ संकेत सामने आए हैं। वित्त वर्ष 2025-26 की शुरुआती तीन तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि करीब 4 फीसदी रही। हालांकि, महंगी ऊर्जा और आपूर्ति संबंधी परेशानियों के कारण आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार पर असर पड़ा है।

पूरे वित्त वर्ष के लिए पाकिस्तान की आर्थिक वृद्धि 3.6 फीसदी रहने का अनुमान है। वहीं, मई में ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद सितंबर में महंगाई दर घटकर करीब 10.3 फीसदी रह गई।

विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 21 अरब डॉलर के करीब

IMF के अनुसार, विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों से आने वाले प्रवासी धन (Remittances) की वजह से देश का चालू खाता लगभग संतुलित बना रहा। सितंबर के अंत तक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर करीब 21 अरब डॉलर हो गया।

पाकिस्तान की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग में सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में दोबारा पहुंच को भी IMF ने सकारात्मक संकेत बताया है।

IMF की मदद के बावजूद चुनौतियां कम नहीं

नई वित्तीय मदद पाकिस्तान के लिए राहत लेकर आ सकती है, लेकिन IMF के मुताबिक देश के सामने अभी भी कई बड़े आर्थिक जोखिम मौजूद हैं। इनमें भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक स्तर पर कर्ज और वित्तीय परिस्थितियों का कठिन होना तथा व्यापार में रुकावट शामिल हैं।

यानी IMF से मिलने वाली नई रकम पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को संभालने में मदद कर सकती है, लेकिन इससे देश की सभी आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

महंगाई में मामूली कमी, लेकिन आम लोगों पर बोझ बरकरार

पाकिस्तान में सितंबर के दौरान महंगाई दर घटकर 10.26 फीसदी रही, लेकिन आम लोगों को इसका बड़ा फायदा नहीं मिला। पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में कीमतों में महीने-दर-महीने 1.27 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

इस दौरान बिजली की कीमतों में करीब 15.28 फीसदी और मोटर ईंधन की कीमतों में करीब 11 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। परिवहन खर्च सालाना आधार पर 27.43 फीसदी बढ़ा, जबकि घर, पानी, बिजली, गैस और ईंधन से संबंधित लागत में 12.39 फीसदी की वृद्धि हुई।

इससे साफ है कि महंगाई दर में कुछ कमी आने के बावजूद बिजली, पेट्रोल और परिवहन जैसी जरूरी सेवाओं की बढ़ती लागत पाकिस्तान के आम लोगों की जेब पर दबाव बनाए हुए है।