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न्याय विभाग ने स्वच्छता पखवाड़ा 2026 के दौरान विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया

न्याय विभाग ने 1 अप्रैल से 15 अप्रैल, 2026 तक स्वच्छता पखवाड़ा 2026 का आयोजन किया, जिसमें सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वच्छता और मानसिक कल्याण के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई गतिविधियों का आयोजन किया गया।

विभाग द्वारा 2 अप्रैल, 2026 को सभी कर्मचारियों के लिए आधे घंटे का योग सत्र आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों को योग को अपने जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाने के लिए प्रोत्साहित करना था। यह सत्र पखवाड़ा अवधि के दौरान आयोजित किया गया था ताकि कर्मचारियों को व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों क्षेत्रों में स्वच्छता, स्वास्थ्य और कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुन:सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित किया जा सके।

स्वच्छता और साफ-सफाई पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए विभाग में 09 अप्रैल, 2026 को अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी में एक निबंध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था।

10 अप्रैल, 2026 को जैसलमेर हाउस परिसर में श्रमदान कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसके बाद सचिव (न्याय) श्री नीरज वर्मा के मार्गदर्शन में वृक्षारोपण अभियान चलाया गया। इस अभियान का उद्देश्य अधिकारियों को अपने निवास स्थान के आस-पास या किसी उपयुक्त स्थान पर वृक्षारोपण में भाग लेने के लिए प्रेरित करना है ताकि पर्यावरण को हरा-भरा बनाया जा सके। सचिव (न्याय) ने स्वच्छ, हरित और सतत पर्यावरण को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया।

स्वच्छता दिवस के अवसर पर न्याय विभाग के अधिकारियों/कर्मचारियों के बच्चों के लिए 10 अप्रैल, 2026 को एक चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और यह उनके लिए एक मजबूत प्रेरणा का स्रोत बना।

पखवाड़े के दौरान, विभाग ने 13 अप्रैल, 2026 को आईजीओटी मिशन एलआईएफई (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) पर एक सत्र/मॉड्यूल का आयोजन किया, ताकि सभी लोग पर्यावरण संरक्षण के लिए सतत दैनिक कार्यों को सीख सकें और अपना सकें, साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ‘पर्यावरण समर्थक लोगों’ का एक नेटवर्क विकसित कर सकें। सत्र का उद्देश्य ‘उपयोग करो और फेंक दो’ अर्थव्यवस्था को ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ से बदलने के लिए जागरूकता पैदा करना था, जिसमें पर्यावरण स्थिरता के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर जोर दिया गया था।

स्वच्छता पखवाड़ा समारोह के दौरान, न्याय विभाग ने भारत रत्न डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती पर, मंगलवार 14 अप्रैल 2026 को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा का ‘माल्यर्पण’ समारोह भी आयोजित किया। यह कार्यक्रम भारतीय संविधान के निर्माता को श्रद्धांजलि अर्पित करने और समानता, न्याय, सामाजिक सशक्तिकरण और महिलाओं, श्रमिकों और हाशिए पर पड़े समुदायों के सामाजिक सुधारों के उनके आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराने के लिए आयोजित किया गया था। विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अर्जुन राम मेघवाल ने जैसलमेर हाउस परिसर के सामने स्थित डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।

डॉ. अंबेडकर के समाज में किए गए अभूतपूर्व योगदान को याद करते हुए, न्याय विभाग के सचिव श्री नीरज वर्मा, विभाग के पूर्व सचिवों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस अवसर पर डॉ. अंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की।

इन गतिविधियों में अधिकारियों और कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे कार्यस्थलों और अन्य स्थानों पर स्वच्छता और साफ-सफाई बनाए रखने के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत हुई। पखवाड़े के दौरान आयोजित स्वच्छता गतिविधियों/प्रतियोगिताओं की विभिन्न श्रेणियों में अधिकारियों को कई पुरस्कार दिए गए। विभाग स्वच्छ भारत मिशन के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध है और नियमित पहलों, अभियानों और गतिविधियों के माध्यम से स्वच्छता और स्थिरता को बढ़ावा देना जारी रखेगा।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर ओवरलोड वाहनों के लिए शुल्क को सरल बनाने हेतू संशोधन अधिसूचित किया

दिल्ली / सत्ता संदेश

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दरों का निर्धारण और संग्रह) चौथे संशोधन नियम, 2026 को अधिसूचित किया है। इनका उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों पर ओवरलोड वाहनों के लिए प्रवर्तन को मजबूत करना और तर्कसंगत शुल्क संग्रह सुनिश्चित करना है।

संशोधित नियम 15 अप्रैल, 2026 से लागू होंगे।

अधिसूचना के अनुसार, नियम 10 के अंतर्गत अनुमेय सकल वाहन भार (जीवीडब्ल्यू) से अधिक भार ले जाने वाले वाहनों पर शुल्क लगाने के लिए एक संशोधित प्रारूप प्रस्तुत किया गया है।

इस संशोधन का उद्देश्य निर्धारित भार सीमा के अनुपालन को बढ़ावा देना और राजमार्ग अवसंरचना की देखभाल करते हुए सड़क सुरक्षा को बढ़ाना है।

मुख्य विशेषताएं:

ओवरलोडिंग के लिए संशोधित शुल्क संरचना:

निर्धारित भार ले जाने वाले वाहनों पर ओवरलोडिंग के प्रतिशत के आधार पर शुल्क लगाया जाएगा:

10 प्रतिशत तक अतिरिक्त भार: ओवरलोड शुल्क नहीं।

10 प्रतिशत से अधिक और 40 प्रतिशत तक: मूल दर से दोगुनी दर पर शुल्क लिया जाएगा।

40 प्रतिशत से अधिक: मूल दर से चार गुना शुल्क लिया जाएगा

वैज्ञानिक तरीके से वजन मापन:

ओवरलोडिंग का निर्धारण शुल्क प्लाजा पर स्थापित प्रमाणित वजन मापन उपकरणों का उपयोग करके किया जाएगा।

वजन की सुविधा के बिना कोई शुल्क नहीं:

यदि शुल्क प्लाजा पर वजन करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो ओवरलोड शुल्क नहीं लगाया जाएगा।

डिजिटल भुगतान अनिवार्य:

ओवरलोडिंग शुल्क केवल फास्‍टैग के माध्यम से ही वसूला जाएगा।

अनिवार्य रिपोर्टिंग:

अधिक भार वाले वाहनों का विवरण दर्ज किया जाएगा और राष्ट्रीय वाहन रजिस्टर (वाहन) को सूचित किया जाएगा।

फास्‍टैग अनुपालन:

वैध फास्‍टैग के बिना राष्ट्रीय राजमार्गों में प्रवेश करने वाले वाहनों पर वर्तमान नियमों के अंतर्गत लागू प्रावधान लागू होंगे।

प्रयोज्यता खंड:

ये प्रावधान प्रारंभ होने से पहले निष्पादित कुछ निजी निवेश परियोजनाओं पर लागू नहीं होंगे, जब तक कि रियायतग्राही संशोधित नियमों को अपनाने के लिए सहमति न दें।

नियमों में उदाहरण दिया गया है:

इस अधिसूचना में अनुमेय वजन सीमा के आधार पर वाहनों की विभिन्न श्रेणियों के लिए ओवरलोड शुल्क की गणना को स्पष्ट करने वाला एक विस्तृत विवरण शामिल है, जिससे कार्यान्वयन में स्पष्टता और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

इस संशोधन से अनुपालन में सुधार होने, ओवरलोड वाहनों के कारण होने वाले सड़क नुकसान में कमी आने और राष्ट्रीय राजमार्गों पर माल की सुरक्षित और अधिक कुशल आवाजाही को बढ़ावा मिलने की आशा है और यह डब्ल्यूआईएम के साथ निर्बाध रूप से संचालित होगी।

खान मंत्रालय ने खनिज रियायत नियमावली में महत्वपूर्ण संशोधन अधिसूचित किए, जिनमें बीएचक्‍यू और बीएचजे सहित निर्धारित सीमा से नीचे के हेमेटाइट लौह अयस्क के एएसपी की प्रकाशन पद्धति का प्रावधान है

दिल्ली / सत्ता संदेश

खान मंत्रालय ने 10 अप्रैल, 2026 को खनिज (परमाणु और हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों के अलावा) रियायत (तीसरा संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसमें सीमा मूल्य से नीचे हेमेटाइट लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य (एएसपी) के प्रकाशन के लिए कार्यप्रणाली प्रदान की गई है। इसमें बैंडेड हेमेटाइट क्वार्टजाइट (बीएचक्यू) और बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर (बीएचजे) भी शामिल हैं।

किसी खनिज का सीमा मान वह अधिकतम सीमा है जिसके नीचे खनन के बाद प्राप्त सामग्री को अपशिष्ट मानकर हटाया जा सकता है। हीमैटाइटिक लौह अयस्क के लिए अधिसूचित सीमा मान 45 प्रतिशत एफइ (न्यूनतम) है। देश में इस सीमा मान से नीचे लौह अयस्क की विशाल मात्रा विद्यमान है, जिसमें से कुछ बीएचक्‍यू या बीएचजे के रूप में है, जो लौह अयस्क की प्रमुख आधार चट्टानें हैं। प्रसंस्करण और संवर्धन की प्रौद्योगिकी में सुधार के साथ, बीएचक्‍यू और बीएचजे सहित सीमा मान से नीचे के लौह अयस्क संसाधनों का संवर्धन करके उच्च श्रेणी का लौह अयस्क प्राप्त किया जा सकता है, जिसका उपयोग इस्पात निर्माण के लिए कच्चे अयस्क के रूप में किया जा सकता है। इस प्रकार के निम्न श्रेणी के लौह अयस्क के संवर्धन को सुगम बनाने के लिए एक उपयुक्त नीति की आवश्यकता थी।

नियमों में वर्तमान संशोधन से पहले, 45 प्रतिशत से कम एफइ सामग्री वाले हेमेटाइट लौह अयस्क (जिसमें बीएचक्‍यू और बीएचजे भी शामिल हैं) के लिए एएसपी प्रकाशित करने की कोई कार्यप्रणाली नहीं थी। इस प्रकार, 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत एफइ से कम एफइ ग्रेड वाले हेमेटाइट लौह अयस्क के निम्नतम ग्रेड के लिए प्रकाशित एएसपी को ही इन ग्रेडों के लिए एएसपी माना जाता था। थ्रेशोल्ड से कम ग्रेड पर रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम आदि लगाने के लिए उच्च ग्रेड के एएसपी का उपयोग करने से ऐसे खनिजों का लाभकारीकरण अलाभकारी हो जाता था। नियमों में वर्तमान संशोधन इस समस्या का समाधान करता है। इस प्रकार, संशोधित नियम में यह प्रावधान है कि थ्रेशोल्ड से कम एफइ सामग्री वाले हेमेटाइट लौह अयस्क के एएसपी की निम्नलिखित तरीके से गणना की जाएगी:

(क) 35 प्रतिशत से 45 प्रतिशत से कम लौह अयस्क श्रेणी के लिए, औसत विक्रय मूल्य 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत से कम लौह अयस्क श्रेणी के औसत विक्रय मूल्य के पचहत्तर प्रतिशत के बराबर होगा;

(ख) 35 प्रतिशत से कम लौह अयस्क के लिए, औसत विक्रय मूल्य 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत से कम लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य के पचास प्रतिशत के बराबर होगा।

निम्न श्रेणी के संसाधनों को उपयोग योग्य श्रेणी में लाने से उच्च श्रेणी के लौह अयस्क संसाधनों के क्षय की चिंता का समाधान होगा और इससे इस्पात उद्योग को खनिज की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी। निम्न श्रेणी के लौह अयस्क संसाधनों का उपयोग खनिज संरक्षण के हित में होगा और साथ ही लौह अयस्क संसाधनों के वैज्ञानिक और इष्टतम खनन को बढ़ावा देगा। परिणामस्वरूप, देश लौह अयस्क में आत्मनिर्भर बना रहेगा।

नियमावली में संशोधन से यह भी स्पष्ट हुआ है कि यदि खदान से निकले कच्चे माल के प्रसंस्करण से उसके आर्थिक मूल्य में कमी आती है, तो प्रारंभिक जांच के बाद बचे हुए कच्चे माल और महीन कणों पर रॉयल्टी लागू होगी। खदान से निकला कच्चा माल, पट्टे वाले क्षेत्र के खनिज क्षेत्र से विस्फोट या खुदाई के बाद प्राप्त प्राकृतिक अवस्था में बिना संसाधित या बिना कुचले कच्चे पदार्थ को संदर्भित करता है। कच्चे बिना संसाधित खनिजों को संसाधित करना आवश्यक है ताकि लक्षित खनिज की सांद्रता बढ़ाई जा सके, अशुद्धियों को दूर किया जा सके और पदार्थ को ऐसे रूप में परिवर्तित किया जा सके जिसका उद्योग वास्तव में उपयोग कर सकें। नियमावली में वर्तमान संशोधन यह स्पष्ट करता है कि खदान से निकले अप्रसाधित अयस्‍क के प्रसंस्करण के नाम पर खनिज के आर्थिक मूल्य को कम नहीं किया जा सकता है।

केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु जैव रसायन एवं रुधिरविज्ञान में आईएसओ 15189:2022 मान्यता प्राप्त करने वाला पहला केन्‍द्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद् संस्थान बना


केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान ने प्रतिवर्ष 1.5 लाख से अधिक परीक्षण के साथ 50 मापदंडों के लिए राष्‍ट्रीय परीक्षण और अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्‍यायन बोर्ड (एनएबीएल) से मान्यता प्राप्त की   

वैश्विक मान्यता सटीक निदान सुनिश्चित करती है और आयुष को गुणवत्तापूर्ण देखभाल के लिए एक मानदण्‍ड के रूप में स्थापित करती है: श्री प्रतापराव जाधव

महत्‍वपूर्ण आईएसओ 15189:2022 मान्यता आयुष में प्रमाण-आधारित अभ्यास और अनुसंधान को सुदृढ़ करती है: वैद्य राजेश कोटे

आयुष मंत्रालय के अंतर्गत गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु की क्लिनिकल प्रयोगशाला को जैव रसायन और रुधिरविज्ञान दोनों के लिए आईएसओ 15189:2022 मान्यता प्राप्त हुई है। इस प्रकार यह संस्थान केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद् संस्थान के अंतर्गत यह उपलब्धि प्राप्‍त करने वाला पहला संस्थान बन गया है।

यह मान्यता रोगियों को आश्वस्त करती है कि प्रयोगशाला वैश्विक स्तर पर स्वीकृत गुणवत्ता मानकों के अनुरूप सटीक, विश्वसनीय और सुरक्षित नैदानिक ​​परिणाम प्रदान करती है। यह उपलब्धि प्रयोगशाला के एक प्रारंभिक स्तर की एनएबीएल-प्रमाणित सुविधा से पूर्णतः स्थापित, मान्यता प्राप्त उत्कृष्टता केंद्र में परिवर्तन का प्रतीक है।

श्री प्रतापराव जाधव, माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), आयुष मंत्रालय ने कहा, “आईएसओ 15189:2022 जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मान्यता प्राप्त होने से यह सुनिश्चित होता है कि रोगियों को विश्वसनीय और सटीक निदान सेवाएं मिलें। ये सेवाएं प्रभावी उपचार और बेहतर स्वास्थ्य परिणामों के लिए आवश्यक हैं। सीएआरआई बेंगलुरु की यह उपलब्धि दर्शाती है कि मंत्रालय किस प्रकार आयुष के बुनियादी ढांचे को गुणवत्ता और विश्वसनीयता के मानक में परिवर्तित कर रहा है।”

वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय ने कहा, “सीएआरआई बेंगलुरु का जैव रसायन और रुधिरविज्ञान दोनों में आईएसओ 15189:2022 मान्यता प्राप्त करने वाला पहला सीसीआरएएस संस्थान बनना, उच्च गुणवत्ता वाले निदान को पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ एक करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह प्रमाण-आधारित अभ्यास, अनुसंधान और रोगी-केंद्रित देखभाल पर हमारे ध्यान को और मजबूत करता है।”

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर रबीनारायण आचार्य ने कहा, “सीएआरआई बेंगलुरु को हाल ही में प्राप्त एनएबीएल मान्यता, इसके पूर्व एनएबीएच और एनएबीएल के प्रांरभिक प्रमाणन और चल रही बीआईएस आईएस/आईएसओ 9001:2015 प्रगति के आधार पर, साथ ही आयुष मंत्रालय के तहत एक आयुर्वेद विज्ञान इनक्यूबेशन सेंटर के रूप में इसकी भूमिका, गुणवत्ता मानकों को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है। इससे आयुर्वेद अनुसंधान और नवाचार को वैज्ञानिक श्रेष्‍ठता और उत्कृष्टता के उच्चतम स्तर पर स्थापित किया जा सकता है।”

बेंगलुरु स्थित सीएआरआई की प्रमुख डॉ. सुलोचना भट ने कहा, “आईएसओ 15189:2022 मान्यता प्राप्त करना हमारे संस्थान के लिए एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है। यह उच्च गुणवत्तापूर्ण, विश्वसनीय और रोगी-केंद्रित नैदानिक ​​सेवाएं प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह उपलब्धि न केवल हमारी नैदानिक ​​क्षमताओं को मजबूत करती है, बल्कि सीसीआरएएस के अंतर्गत एक अग्रणी संस्थान के रूप में हमारी भूमिका को भी सुदृढ़ करती है। यह उपलब्धि डॉ. विद्याश्री आंचन (रोग विज्ञान अनुसंधान अधिकारी) और सीएआरआई टीम के अथक प्रयासों के कारण संभव हो पाई है।”

वर्तमान में इस प्रयोगशाला को जैव रसायन और रुधिरविज्ञान के अंतर्गत 50 परीक्षण मापदंडों के लिए एनएबीएल से मान्यता प्राप्त है। यह रक्त शर्करा, एचबीए1सी, यकृत और गुर्दे की कार्यक्षमता के परीक्षण, लिपिड और थायरॉइड प्रोफाइल, इलेक्ट्रोलाइट्स और संपूर्ण रक्त गणना सहित कई प्रकार की नैदानिक ​​सेवाएं प्रदान करती है। इससे चयापचय, हार्मोन और रक्त संबंधी स्थितियों का सटीक मूल्यांकन संभव हो पाता है।

2025-26 के दौरान, प्रयोगशाला ने 1.52 लाख से अधिक जांचें कीं और 9,300 से अधिक रोगियों को सेवाएं प्रदान की। यह गुणवत्तापूर्ण निदान के प्रति इसकी बढ़ती क्षमता और प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्नत प्रणालियों और डिजिटल रिपोर्टिंग उपकरणों से सुसज्जित होने के कारण, रोगियों को त्वरित परिणाम, बेहतर सटीकता के साथ एसएमएस, ईमेल और व्हाट्सएप के माध्यम से रिपोर्ट मिलती है।

नैदानिक, अनुसंधान और निदान सेवाओं में संस्थान की निरंतर प्रगति इस उपलब्धि को और भी पुष्ट करती है। ओपीडी में आने वाले रोगियों की संख्या 2021 में 18,918 से बढ़कर 2026 में 51,300 से अधिक हो गई है। यह वृद्धि जनता के विश्वास और पहुंच को दर्शाती है। प्रयोगशाला परीक्षणों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है—2021 में मात्र 2,770 परीक्षणों से बढ़कर 2026 में 1.55 लाख से अधिक हो गई है जो इसकी बढ़ी  हुई निदान क्षमता को दर्शाती है। इसी प्रकार, इस अवधि के दौरान पंचकर्म और पैरा- सर्जिकल प्रक्रियाओं में लगभग बीस गुना वृद्धि हुई है, जबकि अनुसंधान कार्य प्रतिवर्ष लगभग 20-25 परियोजनाओं के साथ लगातार मजबूत बनी हुई हैं। जुलाई 2024 में इनपेशेंट सेवाओं की शुरुआत के बाद से, बेड की उपलब्धता लगभग पूरी हो चुकी है, जो एकीकृत देखभाल की बढ़ती मांग को दर्शाती है। संस्थान ने औषधीय पौधों के प्रमाणीकरण में भी अपनी भूमिका को मजबूत किया है और पिछले कुछ वर्षों में प्रमाणीकरण प्रयासों को काफी हद तक बढ़ाया है।

यह उपलब्धि निरंतर प्रयासों और संस्थागत प्रतिबद्धता का परिणाम है। एक अर्ध-स्वचालित जैव रसायन विश्लेषक से शुरू होकर, आयुष मंत्रालय की उत्कृष्टता केंद्र योजना के तहत प्रयोगशाला को धीरे-धीरे पूर्णतः स्वचालित प्रणालियों से सुसज्जित किया गया। नवंबर 2022 में एनएबीएल प्रारंभिक प्रमाणन के बाद, प्रयोगशाला ने उच्‍च गुणवत्ता कार्यान्वयन, प्रलेखन और मूल्यांकन प्रक्रियाओं के माध्यम से अधिक सख्त आईएसओ 15189:2022 मानकों को पूरा करने की दिशा में प्रगति की।

यह प्रयोगशाला आयुर्वेद और आयुष-आधारित उपचारों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, नैदानिक ​​निर्णय लेने के लिए विश्वसनीय नैदानिक ​​डेटा प्रदान करती है, रोगी की प्रगति की निगरानी करती है और अनुसंधान परिणामों को मजबूत करती है।

ध्‍यान देने योग्‍य है कि सीएआरआई बेंगलुरु 2021-22 के दौरान एनएबीएच और एनएबीएल दोनों प्रारंभिक प्रमाणपत्र प्राप्त करने वाला पहला सीसीआरएएस संस्थान बना और यह बीआईएस आईएस/आईएसओ 9001:2015 प्रमाणन की दिशा में भी बढ़ रहा है जो गुणवत्ता, सटीकता और उत्कृष्टता के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।

भविष्य की योजनाओं को ध्यान में रखते हुए, संस्थान मान्यता प्राप्त परीक्षणों की संख्‍या बढ़ाने और निदान क्षमताओं को बढ़ाने की योजना बना रहा है ताकि जनता को अधिक व्यापक, सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जा सके।

एनएसटीएफडीसी 10 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में अपना 25वां स्थापना दिवस मनाएगा

केंद्रीय मंत्री श्री जुएल ओराम इस अवसर पर उपस्थित रहेंगे; अनुसूचित जनजाति के उद्यमियों को सम्मानित किया जाएगा
सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति वित्त और विकास निगम (एनएसटीएफडीसी), 10 अप्रैल, 2026 को नई दिल्ली स्थित विश्व युवा केंद्र में अपना 25वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है 

वर्ष 2001 में स्थापित, एनएसटीएफडीसी देशभर में अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक विकास के लिए समर्पित एक सर्वोच्च संगठन के रूप में कार्य करता है। निगम आय सृजन गतिविधियों के लिए राज्य चैनलिंग एजेंसियों के माध्यम से रियायती वित्तीय सहायता प्रदान करके आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

जनजातीय मामलों के माननीय केंद्रीय मंत्री श्री जुएल ओराम इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। इस कार्यक्रम में जनजातीय मामलों के माननीय राज्य मंत्री श्री दुर्गा दास उइके और जनजातीय मामलों के मंत्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा के साथ-साथ पूर्व सीएमडी, वरिष्ठ अधिकारी और विशिष्ट अतिथि भी शामिल होंगे। उपस्थित लोगों का स्वागत एनएसटीएफडीसी के सीएमडी श्री टी. रूमुआन पैते करेंगे ।

समारोह के अंतर्गत, एनएसटीएफडीसी भारत भर के उन सफल अनुसूचित जनजाति उद्यमियों को सम्मानित करेगा जिन्होंने एनएसटीएफडीसी योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करके स्थायी उद्यम स्थापित किए हैं। ये लाभार्थी विभिन्न जनजातीय समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्होंने पारंपरिक व्यंजन, स्वास्थ्य सेवाएँ, मुर्गी पालन, डेयरी, हस्तशिल्प, मत्स्य पालन, खुदरा व्यवसाय, सिलाई आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उद्यम स्थापित किए हैं।

इस कार्यक्रम में आदिवासी नृत्यों और नुक्कड़ नाटक सहित सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शामिल होंगे , जो आदिवासी समुदायों की समृद्ध विरासत और परंपराओं को दर्शाते हैं।

एनएसटीएफडीसी के अधिकारी इस समारोह का आयोजन बड़े उत्साह के साथ कर रहे हैं और आदिवासी सशक्तिकरण और समावेशी विकास की दिशा में समर्पित सेवा के 25 वर्षों के इस महत्वपूर्ण अवसर पर गणमान्य व्यक्तियों, हितधारकों और प्रतिभागियों का स्वागत करने के लिए उत्सुक हैं।

भारतीय शासन व्यवस्था की पटकथा फिर से लिख रहा है मिशन कर्मयोगी
  • डॉ जितेंद्र सिंह

कल्पना करें कि राजस्थान के दूरदराज के किसी कोने में जिला कलेक्टर को एक ऐसी महत्वाकांक्षी कल्याण योजना की जिम्मेदारी सौंपी जाती है जिसके बारे में उसकी जानकारी बहुत कम है। एक दशक पहले उसे जानकारी के लिए कहीं धूल खा रही किसी नियमावली का सहारा लेना होता। या फिर वह अपने किसी वरिष्ठ सहयोगी की तीन बैठकों और लंच के बाद खाली होने का इंतजार करता। उसकी उम्मीद उस प्रशिक्षण कार्यक्रम पर भी टिकी हो सकती थी जो शायद एक या दो साल में कभी आता। लेकिन आज वह अपने फोन के जरिए आईगॉट (इंटिग्रेटेड गर्वनमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म) पर लॉग ऑन करता है। उसे मिनटों में ही अपनी जरूरत के अनुरूप एक सुव्यवस्थित कार्यकुशलता आधारित पाठ्यक्रम मिल जाता है। वह शाम तक सूचनाओं और आत्मविश्वास से लैस होकर योजना के लाभार्थियों की पहली बैठक की अध्यक्षता कर रहा होता है। यह बदलाव देखने में छोटा लग सकता है मगर हकीकत में किसी क्रांति से कम नहीं है।

चमक-दमक से दूर धैर्य के साथ पांच साल पहले शुरू किया गया मिशन कर्मयोगी एक क्रांति ला रहा है। यह नए भारत के लिए एक नई तरह के प्रशासनिक अधिकारी तैयार करने के उद्देश्य से चुपचाप काम कर रहा है।

इसके महत्व को समझने के लिए हमें पहले संदर्भ को जानना होगा। 2047 तक विकसित भारत के प्रधानमंत्री के निर्धारित लक्ष्य तक यूं ही नहीं पहुंचा जा सकता। इस मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें भारत गणतंत्र को चलाने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के जरिए सावधानी से एक-एक कदम आगे बढ़ना होगा। इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी, प्रौद्योगिकी या नीति नहीं है। सबसे ज्यादा अहमियत उन लगभग 3.5 करोड़ प्रशिक्षित, उत्साही और नागरिक केंद्रित सरकारी कर्मियों की क्षमता की है जो हर सुबह उठ कर भारतीय शासन को संचालित करते हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ज्यादातर समय क्षमता निर्माण का मॉडल सांयोगिक रहा है। किसी नौजवान अधिकारी को सेवा की शुरुआत के समय औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता था। फिर करियर के बीच में यदा-कदा उसे कुछ पाठ्यक्रमों में हिस्सा लेने का अवसर मिल सकता था। बाकी, उसे काम करते हुए और दूसरों को देख कर ही सीखना होता था। एक स्थिर और धीमी गति से आगे बढ़ते विश्व में यह काफी था। लेकिन कृत्रिम मेधा, जलवायु अवरोध, जनसांख्यिकीय दबाव और जबर्दस्त प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के युग में यह सरासर

नाकाफी है। प्रशासन के सामने चुनौतियां जिस रफ्तार से आती हैं उसके सामने प्रशिक्षण की पुरानी प्रणालियों की गति कहीं नहीं टिकती।

‘मिशन कर्मयोगी’ को इसी बेमेल स्थिति के समाधान के रूप में की गई थी। 2021 में शुरू किया गया यह मिशन—जिसे उसी वर्ष अप्रैल में स्थापित ‘क्षमता निर्माण आयोग’ द्वारा संस्थागत रूप से संचालित किया गया, एक सचमुच महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए आगे बढ़ा। भारतीय सिविल सेवाओं की सीखने की संस्कृति को, समय-समय पर होने वाली और केवल नियमों के पालन तक सीमित प्रक्रिया से बदलकर, एक निरंतर चलने वाली, भूमिका-आधारित और स्वयं-निर्देशित विकास यात्रा में रूपांतरित करना इसका मकसद है। जैसा कि आयोग इसका वर्णन करता है, यह बदलाव ‘कर्मचारी’—यानी नियमों का पालन करने वाले एक पदाधिकारी से ‘कर्मयोगी’ बनने की ओर है: एक ऐसा लोक सेवक जो किसी उद्देश्य, सेवा-भाव और उत्कृष्टता से प्रेरित हो।

पाँच वर्षों के बाद, ये आंकड़े अत्यंत शिक्षाप्रद हैं। ‘आईगॉट’ (इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग) प्लेटफॉर्म पर अब 1.5 करोड़ से अधिक सरकारी अधिकारी सक्रिय शिक्षार्थी के रूप में जुड़े हैं — यह एक ऐसी संख्या है जो शुरुआत के समय काल्पनिक लगती थी। 4,600 से अधिक योग्यता-आधारित पाठ्यक्रमों के माध्यम से, इन अधिकारियों ने 8.3 करोड़ से अधिक पाठ्यक्रम पूरे किए हैं। अकेले पिछले ‘राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह’  के दौरान, भागीदारी के परिणामस्वरूप 4.5 मिलियन घंटे के पाठ्यक्रम नामांकन और 3.8 मिलियन घंटे की वास्तविक शिक्षा दर्ज की गई। ये केवल अमूर्त आंकड़े नहीं हैं। दर्ज किया गया प्रत्येक घंटा भारत में कहीं न कहीं एक लोक सेवक का प्रतिनिधित्व करता है — छत्तीसगढ़ में एक राजस्व निरीक्षक, पुणे में एक शहरी स्थानीय निकाय अधिकारी, मणिपुर में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, ये सब अपने साथी नागरिकों की बेहतर सेवा करने के लिए अपनी क्षमता बढ़ा रहें हैं। जो बात आईगॉट प्लेटफॉर्म को वास्तव में परिवर्तनकारी बनाती है, वह केवल इसका पैमाना नहीं है, बल्कि इसकी ‘पहुँच की संरचना’  है। यह किसी भी समय और कहीं भी, स्मार्टफोन या डेस्कटॉप पर, कई भाषाओं में उपलब्ध है, और इसे शिक्षार्थी के पेशेवर प्रोफाइल के अनुसार बनाया गया है। पाठ्यक्रमों को हर तीन से छह महीने में अपडेट किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शासन में एआई टूल का उपयोग कैसे करें या नए वित्तीय नियमों को कैसे समझें, इससे संबंधित सामग्री वर्तमान और प्रासंगिक बनी रहे। दूसरे शब्दों में, यह प्लेटफॉर्म धूल फांकने वाली कोई डिजिटल लाइब्रेरी नहीं है — बल्कि यह सीखने का एक जीवंत और अनुकूलन योग्य तंत्र है। इस पर विचार कीजिए कि एक आदिवासी जिले की जूनियर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए इसका क्या अर्थ है, जिसे उसकी अपनी भाषा में बाल पोषण मूल्यांकन के नवीनतम प्रोटोकॉल समझाने वाला एक मॉड्यूल प्राप्त होता है। उसे अपने ब्लॉक में किसी प्रशिक्षक के आने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। वह सीखती है, और कार्य करती है। यही इस मिशन का ‘लोकतांत्रिक लाभांश’ है।

क्षमता निर्माण आयोग, इस तंत्र  के रणनीतिक संरक्षक के रूप में, एक साथ ‘वास्तुकार’  और ‘संचालक’ दोनों की भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय नीति बनाने वाले एक सचिव से लेकर ग्राम स्तर पर इसे लागू करने वाले एक पंचायत पदाधिकारी तक, यह पहचान करता है कि सार्वजनिक भूमिकाओं के विशाल स्पेक्ट्रम में किन योग्यताओं की आवश्यकता है। यह सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय मानक 2.0 ढांचे के माध्यम से देश के प्रशिक्षण संस्थानों के लिए गुणवत्ता मानक निर्धारित करता है, जिसके तहत देश भर के 200 से अधिक प्रशिक्षण संस्थान पहले ही मान्यता प्राप्त  कर चुके हैं। यह राज्यों के साथ मिलकर काम करता है। सभी 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अब औपचारिक समझौता ज्ञापनों  के माध्यम से जुड़ चुके हैं  ताकि ऐसी विशिष्ट ‘क्षमता निर्माण योजनाएं’  तैयार की जा सकें जो कार्यबल की दक्षताओं को संगठनात्मक लक्ष्यों के साथ जोड़ती हैं। ‘राष्ट्रीय कर्मयोगी जन सेवा कार्यक्रम’ जैसी ऐतिहासिक पहलों के माध्यम से, इसने एक मिलियन से अधिक प्रमाणित अधिकारियों को बड़े पैमाने पर व्यवहार प्रशिक्षण दिया  है, जो प्रत्येक नागरिक को अंतिम हितधारक के रूप में मानने की सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण कला है।

मिशन के इस अंतिम आयाम पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ के बारे में है जिसे ‘पूर्णता प्रमाण पत्र’ या ‘लॉग किए गए घंटों’ में आसानी से नहीं मापा जा सकता। मिशन कर्मयोगी की सबसे गहरी आकांक्षाओं में से एक है—दृष्टिकोण में बदलाव। यह राज्य और नागरिक के बीच एक ‘लेन-देन’ वाले संबंध से हटकर ‘नागरिक देवो भव’ की भावना से परिभाषित संबंध की ओर एक आंदोलन है: नागरिक ईश्वर के समान है, वह सर्वोच्च अधिकारी है जिसके प्रति राज्य का सेवक जवाबदेह है। जब रेलवे काउंटरों, राजस्व कार्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों पर नागरिक-केंद्रित अधिकारियों को इसके तहत प्रशिक्षित किया गया और बाद में नागरिकों का सर्वेक्षण किया गया  तो प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। उन्होंने बदलाव को महसूस किया। न केवल दक्षता में, बल्कि व्यवहार की आत्मीयता, तत्परता और बातचीत की मानवीय गुणवत्ता में भी। एक ऐसे युग में जब एआई प्रशासनिक कार्यों के विशाल हिस्सों को स्वचालित करने की चुनौती दे रहा है, यह मानवीय परत,  जो सहानुभूतिपूर्ण, सांस्कृतिक रूप से जागरूक और स्थानीय जड़ों से जुड़ी है कोई फालतू चीज़ नहीं, बल्कि भारत के शासन की सर्वोच्च शक्ति है। इस मिशन ने अपनी तकनीकी महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ भारत की बौद्धिक विरासत का सम्मान करने का भी एक सचेत प्रयास किया है। ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रकोष्ठ’  के माध्यम से, पारंपरिक ज्ञान जिसमें सामुदायिक शासन और कृषि से लेकर वित्त और स्वास्थ्य सेवा तक के क्षेत्र शामिल हैं — को प्रशिक्षण सामग्री के ताने-बाने में बुना जा रहा है; इसे केवल अतीत की यादों के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ‘अमृत ज्ञान कोष’  भंडार, जिसमें 70 से अधिक पूर्ण केस स्टडीज़ शामिल हैं, शासन-प्रशासन से जुड़े ऐसे ज्ञान का एक संग्रह तैयार कर रहा है जिसकी जड़ें भारतीय संदर्भों और भारतीय समाधानों में निहित हैं। प्रशासनिक मानसिकता का यह ‘वि-औपनिवेशीकरण’,  जिसके तहत भारतीय लोक सेवकों को आधुनिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी ही सभ्यतागत विरासत के साथ आत्मविश्वासपूर्ण जुड़ाव स्थापित करने की ओर लौटाया जाता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख आकांक्षाओं में से एक है और ‘मिशन कर्मयोगी’ इसी आकांक्षा को साकार रूप दे रहा है।

‘साधना’ सप्ताह  2 से 8 अप्रैल तक मनाया जाने वाला राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह — इस पांच वर्षीय यात्रा का उत्सव और इसके अधूरे कार्यों के प्रति पुनर्संकल्प, दोनों है। ‘साधना’ शब्द यहाँ अत्यंत उपयुक्त है। इसका अर्थ है समर्पित अभ्यास; एक ऐसे व्यक्ति का अनुशासित दैनिक प्रयास जो किसी एक असाधारण कार्य के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने कौशल के प्रति निरंतर समर्पण के माध्यम से निपुणता प्राप्त करना चाहता है। जैसे ही हम सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के एक ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के साथ इस सप्ताह का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसमें लगभग 700 वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से और 3,000 से अधिक वर्चुअल माध्यम से शामिल हो रहे हैं, हम केवल एक वर्षगाँठ नहीं मना रहे हैं। हम अगले पांच वर्षों के लिए अपना लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं — एक ऐसे भविष्य की ओर जिसमें हर स्तर पर प्रत्येक सिविल सेवक निरंतर सीखने वाला, एक ‘नागरिक-चैंपियन’ और भारत की आकांक्षाओं का एक आत्मविश्वासी संरक्षक होगा।

विकसित भारत 2047 के लक्ष्य — सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज से लेकर शून्य शुद्ध उत्सर्जन के संकल्प तक, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना से लेकर वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व तक, केवल नीतिगत  माध्यम से पूरे नहीं होंगे। वे लोगों के माध्यम से पूरे होंगे: उस जिला अधिकारी द्वारा जो योजना को सही ढंग से समझ कर उसे पूरी शुद्धता के साथ लागू कर सके; उस शहरी योजनाकार द्वारा जो स्थानिक डेटा टूल का उपयोग कर सके; उस अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जो सार्वजनिक स्वास्थ्य अलर्ट को इस तरह संप्रेषित करे कि उसका समुदाय उस पर भरोसा करे। मिशन कर्मयोगी न केवल कल के लिए, बल्कि आने वाले दशकों के लिए उसी दल का निर्माण कर रहा है।

भारत की शासन-व्यवस्था की कहानी के लंबे और प्रकाशमान सफर में, यह शायद वह अध्याय है जिसमें शासन ने आखिरकार ‘सीखना’ सीख लिया।

(लेखक केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग और कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्यमंत्री हैं)

कायाकल्प पुरस्कार 2025–26 में पीजीआईएमईआर ने दूसरा स्थान हासिल कर राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया गौरवचंडीगढ़

28 मार्च 2026: पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER),  चंडीगढ़ ने कायाकल्प  योजना के अंतर्गत वर्ष 2025–26 में केंद्रीय सरकारी अस्पतालों/संस्थानों की श्रेणी में दूसरा स्थान प्राप्त कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि अपने नाम की है। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रदान किया जाता है।स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने स्वच्छता, हाइजीन, संक्रमण नियंत्रण, अस्पताल रखरखाव तथा रोगी-अनुकूल वातावरण बनाए रखने में पीजीआईएमईआर के निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन को मान्यता देते हुए संस्थान को रुपये 1,50,00,000/- (एक करोड़ पचास लाख रुपये) की प्रोत्साहन राशि स्वीकृत की है।

 कायाकल्प  पहल का उद्देश्य देशभर के सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, संक्रमण नियंत्रण तथा समग्र रोगी देखभाल वातावरण में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है। पीजीआईएमईआर की यह उपलब्धि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने और राष्ट्रीय मानकों का अनुपालन करने की संस्थान की सतत प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

 अपनी खुशी व्यक्त करते हुए प्रो. विवेक लाल, निदेशक, PGIMER ने कहा, “यह उपलब्धि रोगी देखभाल और अस्पताल स्वच्छता में पीजीआईएमईआर की उत्कृष्टता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है। राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त करना हमारे संपूर्ण कार्यबल की निष्ठा और सामूहिक प्रयासों का परिणाम है, जो हमारे लिए वास्तविक कर्मयोगी हैं। हम अपने सिस्टम को और अधिक सुदृढ़ बनाते रहेंगे ताकि भविष्य में और ऊँचे मानक स्थापित कर सकें।”

उसी भावना को दोहराते हुए श्री पंकज राय, उपनिदेशक (प्रशासन), PGIMER ने कहा,  “कायकल्प केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि सतत गुणवत्ता सुधार की यात्रा है। यह मान्यता हमारे प्रशासनिक प्रक्रियाओं, मॉनिटरिंग तंत्र और स्टाफ की भागीदारी रणनीतियों की प्रभावशीलता को दर्शाती है, जिन्होंने स्वच्छता और अस्पताल प्रबंधन के उच्च मानकों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”

 प्रो. विपिन कौशल, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, PGIMER ने कहा,  “यह उपलब्धि स्वच्छ और सुरक्षित अस्पताल वातावरण सुनिश्चित करने में क्लिनिकल टीमों, नर्सिंग स्टाफ और सफाई कर्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है। संक्रमण नियंत्रण और रोगी सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताएँ हैं, और हम इन मानकों को बनाए रखने तथा और अधिक उन्नत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

 पीजीआईएमईआर स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में उत्कृष्टता की ओर निरंतर अग्रसर है और देशभर के संस्थानों के लिए नए मानक स्थापित कर रहा है।