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यमन में फिर भड़की जंग: हूतियों की ताइज की ओर बढ़त, सऊदी समर्थित सरकार ने छेड़ा बड़ा सैन्य अभियान

वर्ल्ड डेस्क / यमन / सत्ता संदेश

यमन में लंबे समय से जारी गृहयुद्ध एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने दक्षिण-पश्चिमी यमन के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तुर्बाह शहर पर कब्जे का दावा किया है। इसके बाद हूती लड़ाके प्रांतीय राजधानी ताइज की ओर बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन सरकार ने हूतियों के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान का ऐलान किया है।

तुर्बाह पर कब्जा यमन सरकार के लिए रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है, क्योंकि यह शहर उस अहम मार्ग पर स्थित है जो ताइज को बंदरगाह शहर अदन से जोड़ता है। अदन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन सरकार का अंतरिम केंद्र माना जाता है।

ताइज की घेराबंदी का बढ़ा खतरा

तुर्बाह में पिछले कई वर्षों से यमन सरकार के समर्थन वाले सैनिकों की महत्वपूर्ण तैनाती रही है। यहां से ताइज शहर की रक्षा के साथ हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाए जाते रहे हैं। ऐसे में तुर्बाह पर नियंत्रण बदलने से सरकारी बलों की सप्लाई और आवाजाही प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

इससे पहले भी हूतियों ने ताइज के बाहरी इलाकों में कई क्षेत्रों पर कब्जा किया था। तुर्बाह पर नियंत्रण मिलने के बाद ताइज को घेरने की उनकी स्थिति मजबूत होने का दावा किया जा रहा है। ताइज यमन का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और इसका सैन्य एवं रणनीतिक महत्व काफी अधिक है।

लाल सागर के तट पर भी हूतियों की बढ़त

सितंबर की शुरुआत में हूतियों ने लाल सागर के पश्चिमी तट की ओर अपना अभियान तेज किया था। इस दौरान मोखा शहर और लाल सागर के कुछ द्वीपों पर नियंत्रण हासिल करने का दावा किया गया। इन इलाकों की रणनीतिक स्थिति के कारण यमन के पश्चिमी तट पर हूतियों की सैन्य मौजूदगी को लेकर क्षेत्रीय चिंता बढ़ी है।

बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य इस पूरे घटनाक्रम में बेहद महत्वपूर्ण है। यह संकरा समुद्री मार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अहम रास्तों में शामिल है। ऐसे में इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और व्यापार पर भी असर पड़ सकता है।

यमन सरकार ने किया सैन्य अभियान का ऐलान

सऊदी अरब समर्थित यमन सरकार ने रविवार को हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने की घोषणा की। प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल के प्रमुख राशद अल-अलीमी ने कहा कि अभियान का उद्देश्य हूतियों के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लेना है।

उन्होंने सरकार के नियंत्रण वाले इलाकों में सैनिकों की तैनाती और लामबंदी की जानकारी देते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यमन सरकार को समर्थन देने की अपील की।

सऊदी अरब ने दिया सैन्य समर्थन का भरोसा

यमन सरकार के ऐलान के कुछ घंटे बाद सऊदी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी ने सरकार समर्थित बलों को सैन्य सहयोग जारी रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब यमन सरकार की सेनाओं को हूतियों के खिलाफ अभियान में पूरी ऑपरेशनल मदद देता रहेगा।

हूतियों की ओर से पिछले कुछ समय में सऊदी अरब के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन हमलों के दावे भी किए गए हैं। इन घटनाओं ने सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव को और बढ़ाया है।

जुलाई से बढ़ता गया तनाव

मौजूदा संघर्ष की नई कड़ी जुलाई के मध्य में शुरू हुई थी। उस समय हूतियों ने आरोप लगाया था कि सऊदी अरब ने यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर बमबारी की। हूतियों के अनुसार, यह कार्रवाई एक अनधिकृत ईरानी विमान को उतरने से रोकने के लिए की गई थी।

इसके बाद हूतियों ने सऊदी अरब और यमन सरकार समर्थित बलों के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन हमले तेज करने का दावा किया। लाल सागर में सऊदी शिपिंग को निशाना बनाने की धमकियों के बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया।

तुर्बाह पर कब्जे से सप्लाई लाइन प्रभावित होने की आशंका

वॉशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के विश्लेषण के अनुसार, तुर्बाह पर हूतियों का नियंत्रण ताइज प्रांत और ताइज शहर में मौजूद सरकार समर्थित बलों तक सैनिकों, हथियारों और अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति को मुश्किल बना सकता है।

तुर्बाह के उत्तर में आने-जाने वाली सड़कों पर नियंत्रण से सरकारी बलों की आवाजाही और पीछे हटने के विकल्प भी सीमित हो सकते हैं। ऐसे में तुर्बाह का नियंत्रण ताइज के आसपास चल रहे संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

2014 से जारी है यमन का गृहयुद्ध

यमन का मौजूदा गृहयुद्ध 2014 में उस समय तेज हुआ था, जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद संघर्ष में कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय पक्ष शामिल हुए। सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया था।

वर्षों से जारी संघर्ष ने यमन को गंभीर मानवीय संकट में धकेल दिया है। बड़ी संख्या में लोगों की मौत, विस्थापन, खाद्य असुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव ने देश की स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया है।

हालिया हिंसा में भी बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने की रिपोर्ट है। संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों के अनुसार, नए संघर्ष के कारण हजारों लोग मारे और घायल हुए हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। कुछ लोग समुद्र पार कर जिबूती भी पहुंचे हैं।

ऐसे में हूतियों की ताइज की ओर बढ़त और यमन सरकार के जवाबी सैन्य अभियान ने देश में लंबे समय से चले आ रहे गृहयुद्ध को एक बार फिर गंभीर स्थिति में पहुंचा दिया है।

अमेरिकी पैसिफिक कमांडर एडमिरल पापारो भारत दौरे पर, रक्षा सहयोग और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा पर होगी अहम बातचीत

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

यूएस पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो 3 से 8 अक्टूबर 2026 तक भारत के आधिकारिक दौरे पर हैं। इस यात्रा का उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच Major Defense Partnership को आगे बढ़ाना और दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग को और मजबूत करना है।

भारत यात्रा के दौरान एडमिरल पापारो भारतीय रक्षा अधिकारियों और सैन्य नेतृत्व के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं को लेकर उच्चस्तरीय बातचीत करेंगे। चर्चा में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, उभरती तकनीक, रणनीतिक स्थिरता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे।

समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक सहयोग पर फोकस

एडमिरल पापारो की यात्रा में Maritime Security यानी समुद्री सुरक्षा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी।

दोनों पक्ष रक्षा क्षेत्र में Emerging Technologies और तेजी से बदल रहे Technology Landscape के बीच सहयोग के नए अवसरों पर भी विचार करेंगे। इसके अलावा रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच समन्वय को मजबूत करने पर जोर रहेगा।

Defence Energy Resilience भी बातचीत का अहम मुद्दा

यात्रा के दौरान Defence Energy Resilience यानी रक्षा क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति की मजबूती से जुड़े विषयों पर भी चर्चा होने की संभावना है।

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अब पारंपरिक सैन्य साझेदारी से आगे बढ़कर नई तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री डोमेन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग जैसे क्षेत्रों तक विस्तारित हो रहा है।

हिंद महासागर क्षेत्र पर भी नजर

एडमिरल पापारो का भारत दौरा Indian Ocean Region में अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख समुद्री शक्ति है और दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा को लेकर सहयोग पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है।

इस यात्रा के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री गतिविधियों और हिंद-प्रशांत में रणनीतिक स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

कौन हैं एडमिरल सैमुअल पापारो?

एडमिरल सैमुअल जे. पापारो अमेरिकी नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों में शामिल हैं और United States Indo-Pacific Command के कमांडर हैं। यह कमांड दुनिया के सबसे बड़े भौगोलिक सैन्य कमांड क्षेत्रों में से एक की जिम्मेदारी संभालता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस कमांड के दायरे में करीब 4 लाख सैन्य और असैन्य कर्मी, लगभग 5 एयरक्राफ्ट कैरियर, 200 युद्धपोत और 1,000 से अधिक लड़ाकू विमान शामिल हैं। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और समुद्री क्षेत्रों में आता है।

एडमिरल पापारो की भारत यात्रा के दौरान होने वाली बातचीत से दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी, नई सैन्य तकनीक, समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक सहयोग के आगे के रोडमैप को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा होने की उम्मीद है।

सऊदी अरब में पंजाबी युवक को मौत की सजा, परिवार ने भारत सरकार से लगाई मदद की गुहार

नंगल / सत्ता संदेश

सऊदी अरब में नंगल के लोअर पट्टी गांव के रहने वाले पंजाबी युवक गुरप्रीत सिंह को मौत की सजा सुनाए जाने की जानकारी सामने आई है। परिवार ने भारत सरकार, भारतीय दूतावास और संबंधित अधिकारियों से मामले में हस्तक्षेप कर गुरप्रीत को कानूनी एवं कूटनीतिक सहायता उपलब्ध कराने की अपील की है।

परिवार के मुताबिक, गुरप्रीत सिंह करीब चार साल पहले नौकरी की तलाश में मस्कट गया था, जहां वह ट्रक ड्राइवर के तौर पर काम करता था। इसके बाद वह सऊदी अरब गया। परिवार का कहना है कि करीब दो साल पहले उसे सऊदी अरब में ड्रग तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

परिवार को 25 सितंबर को गुरप्रीत को मौत की सजा सुनाए जाने की जानकारी मिली। इस खबर के बाद परिवार में चिंता का माहौल है।

परिवार के अनुसार, गुरप्रीत अपने परिवार का इकलौता बेटा है और उसके पिता का पहले ही निधन हो चुका है। उसकी बुजुर्ग मां सतवंत कौर और अन्य परिजनों ने सरकार से मामले में तत्काल मदद की मांग की है।

परिवार ने स्थानीय विधायक के साथ-साथ सरबत दा भला चैरिटेबल ट्रस्ट के एसपी ओबेरॉय से भी सहायता की अपील की है। परिवार की मांग है कि गुरप्रीत को कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के साथ-साथ मामले में जरूरी कूटनीतिक प्रयास किए जाएं।

अब परिवार की नजर भारत सरकार और संबंधित अधिकारियों की अगली कार्रवाई पर है।

भारत-अमेरिका के बीच ‘युद्ध अभ्यास-2026’ शुरू, पहाड़ी युद्ध क्षमता और ड्रोन तकनीक पर रहेगा फोकस

नई दिल्ली / देहरादून / सत्ता संदेश

भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास-2026’ का 22वां संस्करण मंगलवार से शुरू हो गया। अभ्यास का उद्घाटन उत्तराखंड के औली स्थित फॉरेन ट्रेनिंग नोड में किया गया। इस संयुक्त सैन्य अभ्यास में भारत और अमेरिका की ओर से करीब 600-600 सैन्यकर्मी हिस्सा ले रहे हैं।

अभ्यास के उद्घाटन अवसर पर भारतीय सेना की ओर से मेजर जनरल अमरेश गुंजन, जीओसी 14 इन्फैंट्री डिवीजन, जबकि अमेरिकी सेना की ओर से कर्नल बेंजामिन जैकमैन, कमांडर, 1st इन्फैंट्री ब्रिगेड कॉम्बैट टीम, 11th एयरबोर्न डिवीजन ने सैनिकों को संबोधित किया।

यह सैन्य अभ्यास उत्तराखंड के औली और राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में एक साथ आयोजित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य क्षमता, समन्वय और इंटरऑपरेबिलिटी को मजबूत करना है।

पहाड़ी इलाकों में युद्ध क्षमता बढ़ाने पर जोर

‘युद्ध अभ्यास-2026’ के दौरान खासतौर पर पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी इलाकों में सैन्य अभियानों की तैयारी पर जोर दिया जाएगा। सैनिकों को इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (IBG) के इस्तेमाल और इन्फैंट्री आधारित ऑपरेशंस से जुड़ी परिस्थितियों में प्रशिक्षण दिया जाएगा।

अभ्यास के दौरान भारतीय और अमेरिकी सैनिक एक-दूसरे की रणनीति, तकनीक और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं को समझेंगे। इसके साथ ही संयुक्त योजना तैयार करने और मिलकर सैन्य अभियानों को अंजाम देने की क्षमता को भी मजबूत किया जाएगा।

ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम पर खास फोकस

इस बार संयुक्त सैन्य अभ्यास में आधुनिक तकनीक की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी। सैनिकों को ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम के जरिए निगरानी और टोही अभियानों को संचालित करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

वहीं, राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में आधुनिक हथियार प्रणालियों का प्रदर्शन किया जाएगा। दोनों देशों के सैन्य विशेषज्ञ नई सैन्य तकनीक और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने अनुभव साझा करेंगे।

संयुक्त सैन्य कार्रवाई की क्षमता होगी मजबूत

‘युद्ध अभ्यास-2026’ के जरिए दोनों सेनाएं अलग-अलग भौगोलिक और ऑपरेशनल परिस्थितियों में एक-दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करते हुए सैन्य कार्रवाई करने की क्षमता को और मजबूत करेंगी। यह अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत और अमेरिका के बीच ‘युद्ध अभ्यास’ एक वार्षिक द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है, जिसका उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी, संयुक्त संचालन क्षमता और सैन्य सहयोग को बढ़ाना है। इस अभ्यास के दौरान दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे की रणनीति, हथियार प्रणालियों और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं से परिचित होते हैं।

चीन में बड़ा हादसा! किंगदाओ शिपयार्ड में मालवाहक जहाज में भीषण आग, 30 मौतों की आशंका

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

चीन के किंगदाओ शिपयार्ड में एक विदेशी मालवाहक जहाज में भीषण आग लगने से हड़कंप मच गया। हादसे में करीब 30 लोगों के मारे जाने की आशंका जताई जा रही है, हालांकि चीन की ओर से अभी तक मृतकों की संख्या को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया है। राहत और बचाव कार्य लगातार जारी है और लापता लोगों की तलाश की जा रही है।

चीनी सरकारी मीडिया सीसीटीवी के मुताबिक, जिस मालवाहक जहाज में आग लगी, वह मरम्मत के लिए किंगदाओ शिपयार्ड में खड़ा था। इसी दौरान अचानक जहाज में आग भड़क उठी और देखते ही देखते उसका ऊपरी हिस्सा आग की चपेट में आ गया। आग पर काबू पाने के लिए फायर ब्रिगेड की कई टीमों को मौके पर भेजा गया है।

समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, आग लगने वाला जहाज लाइबेरिया के झंडे वाला मालवाहक पोत ‘ओशन मेलोडी’ है। जहाज का इस्तेमाल किस कंपनी या ऑपरेटर द्वारा किया जा रहा था, इस संबंध में फिलहाल विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। बताया जा रहा है कि जहाज को कुछ दिन पहले ही चीन के किंगदाओ लाया गया था और यहां इसकी मरम्मत का काम चल रहा था।

हादसे के बाद चीन के राष्ट्रपति भी सक्रिय हो गए हैं और राहत एवं बचाव अभियान को लेकर निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री ली कियांग ने अधिकारियों को लापता लोगों की तलाश तेज करने और बचाव अभियान को पूरी गंभीरता से चलाने के निर्देश दिए हैं। आशंका है कि हादसे में प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या शिपयार्ड में काम करने वाले कर्मचारियों की हो सकती है।

घटना के बाद शिपयार्ड के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई है। सामने आई तस्वीरों में मालवाहक जहाज का ऊपरी हिस्सा बुरी तरह जला हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की गाड़ियां शिपयार्ड के बाहर तैनात नजर आ रही हैं। चीनी शिपयार्ड के अधिकारियों ने स्थानीय मीडिया के सवालों का फिलहाल कोई जवाब नहीं दिया है।

किंगदाओ में चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉर्पोरेशन का प्रमुख जहाज निर्माण और मरम्मत परिसर मौजूद है। यहां व्यावसायिक जहाजों के निर्माण, पुनर्निर्माण और मरम्मत का काम किया जाता है। यह विशाल शिपयार्ड करीब 815 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता आग पर पूरी तरह काबू पाने के साथ-साथ लापता लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना और हादसे में प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या का पता लगाना है।

नेपाल में बाढ़ के बाद फिर कांपी धरती, 5.6 तीव्रता के भूकंप से दहशत

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी के बीच अब एक बार फिर धरती कांपने से लोगों में दहशत फैल गई है। मंगलवार रात नेपाल में भूकंप के झटके महसूस किए गए। भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के अनुसार, नेपाल में रात 9:38 बजे के करीब भूकंप दर्ज किया गया। NCS के रिकॉर्ड में इसकी तीव्रता 5.6 बताई गई है, जबकि शुरुआती रिपोर्टों में इसकी तीव्रता 5.0 बताई गई थी। भूकंप का केंद्र नेपाल में काठमांडू से करीब 200 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में था और इसकी गहराई लगभग 167.6 किलोमीटर दर्ज की गई।

नेपाल में यह भूकंप ऐसे समय आया है, जब देश अभी कुछ दिन पहले आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब से उबरने की कोशिश कर रहा है। 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में हुई इस प्राकृतिक आपदा में भारी तबाही हुई थी। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल और तिब्बत में इस आपदा से 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं। राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी है।

भूकंप के झटकों का असर काठमांडू और आसपास के इलाकों में महसूस किए जाने की खबर है। हालांकि, मंगलवार रात आए भूकंप से किसी नई बड़ी तबाही या बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की तत्काल पुष्टि नहीं हुई है। नेपाल के लिए यह नया झटका इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाला है क्योंकि देश के कई हिस्से अभी भी बाढ़ से प्रभावित हैं और बड़ी संख्या में लोग राहत एवं पुनर्वास पर निर्भर हैं।

बाढ़ के पीछे भूकंप नहीं, ग्लेशियर का मलबा और मलबे का बहाव

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर शुरुआत में यह आशंका जताई गई थी कि इसके पीछे भूकंप की भूमिका हो सकती है। लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) की जांच में स्पष्ट किया गया कि उस समय दर्ज की गई भूकंपीय ऊर्जा वास्तव में ग्लेशियर के ढहने और उसके साथ हुए मलबे के बहाव से उत्पन्न हुई थी। यानी उस आपदा का मुख्य कारण पारंपरिक अर्थों में आया भूकंप नहीं था।

USGS के मुताबिक ग्लेशियर से जुड़े ढलान के अचानक टूटने के बाद बर्फ, चट्टान और मलबा तेजी से नीचे की ओर आया। इस मलबे ने पानी और नदी के बहाव को अपने साथ मिलाकर एक बेहद शक्तिशाली फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया। यह मलबा और बाढ़ करीब 100 किलोमीटर तक नीचे की ओर फैली और रास्ते में मौजूद बस्तियों तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा।

इस आपदा का सबसे ज्यादा असर नेपाल के रसुवा और आसपास के इलाकों के साथ-साथ चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी हुआ। चीन-नेपाल सीमा पर स्थित ग्यिरोंग बॉर्डर पोर्ट भी भारी मलबे और पानी की चपेट में आ गया। सड़कें, पुल, इमारतें और पनबिजली परियोजनाओं से जुड़ा बुनियादी ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ।

हजारों लोग अब भी लापता, बचाव अभियान जारी

नेपाल में राहत और बचाव एजेंसियां अब भी लापता लोगों की तलाश में जुटी हैं। बाढ़ के बाद कई इलाकों में सड़क और पुल टूटने से राहत टीमों को प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पनबिजली परियोजनाओं से जुड़े कई कर्मचारी भी लापता हुए हैं।

हाल ही में एक सुरंग में नौ दिन तक फंसे दो नेपाली हाइड्रोपावर कर्मचारियों को जिंदा बचाया गया, जिससे बचाव अभियान में उम्मीद भी जगी है। हालांकि, हजारों लोगों के अब भी लापता होने के कारण परिजनों की चिंता बनी हुई है।

नेपाल इस समय एक साथ कई प्राकृतिक और मानवीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक तरफ बाढ़ और मलबे से तबाह हुए इलाकों में राहत एवं पुनर्निर्माण का काम चल रहा है, तो दूसरी तरफ भूकंप के ताजा झटकों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए आने वाले दिनों में भी प्रशासन और राहत एजेंसियों की सतर्कता बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

BRICS में मोदी-पुतिन की मुलाकात, Su-57 पर रूस का बड़ा ऑफर; भारत में बनेगा फिफ्थ जेनरेशन फाइटर?

BRICS सम्मेलन में PM मोदी और पुतिन की मुलाकात के दौरान Su-57 फिफ्थ जेनरेशन फाइटर पर चर्चा की संभावना है। जानिए रूस का भारत में Su-57 उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रस्ताव कितना अहम है।

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली मुलाकात पर भारत-रूस रक्षा सहयोग को लेकर खास नजर रहेगी। दोनों नेताओं की बातचीत में रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट Su-57 को लेकर चर्चा अहम मुद्दा बन सकती है। सूत्रों के मुताबिक, रूस भारत के साथ Su-57 की तकनीक, स्थानीय उत्पादन और मेंटेनेंस क्षमता विकसित करने के विकल्प पर आगे बढ़ना चाहता है।

रूस की ओर से पहले भी भारत में Su-57 के निर्माण का प्रस्ताव दिए जाने की बात सामने आती रही है। संभावित प्रस्ताव में भारत में स्थानीय उत्पादन के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और विमान के रखरखाव से जुड़ा स्वदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर जोर हो सकता है। अगर यह बातचीत किसी ठोस समझौते की दिशा में बढ़ती है, तो इसे भारत-रूस रक्षा साझेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

Su-57 क्यों है खास?

Su-57 रूस का प्रमुख पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ मल्टीरोल फाइटर है। इसे कम रडार दृश्यता, सुपरमैन्युवरेबिलिटी, एडवांस सेंसर और आंतरिक हथियार ले जाने जैसी क्षमताओं के लिए जाना जाता है।

रूस इसके एक्सपोर्ट वेरिएंट Su-57E को भी आगे बढ़ा रहा है। इसके लिए अलग-अलग एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड हथियारों के विकल्प पेश किए जा रहे हैं। इनमें RVV-MD2, RVV-SDM और RVV-BD जैसे एयर-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के अलावा Kh-69 स्टील्थ क्रूज मिसाइल और Kh-38MLE जैसे हथियार शामिल बताए जाते हैं।

यानी भारत के लिए Su-57 केवल एक फाइटर जेट की खरीद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके साथ ट्रेनिंग, हथियार, मेंटेनेंस और उत्पादन क्षमता वाला एक व्यापक फिफ्थ जेनरेशन कॉम्बैट इकोसिस्टम विकसित करने का विकल्प भी हो सकता है।

भारत में बन सकता है Su-57

रूस के प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा भारत में Su-57 का उत्पादन हो सकता है। इसके लिए भारत में मौजूद Su-30MKI से जुड़ी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल की संभावना पर भी चर्चा होती रही है।

हालांकि, किसी भी संभावित डील में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा Technology Transfer होगा। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में अगर रूस महत्वपूर्ण तकनीकों के साथ भारत में उत्पादन की पर्याप्त क्षमता विकसित करने में मदद करता है, तो इससे भारतीय एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिल सकता है।

Su-75 भी रूस का दूसरा विकल्प

रूस के पास Su-57 के अलावा Su-75 Checkmate का विकल्प भी है। Su-75 को Su-57 की तुलना में छोटा, सिंगल-इंजन और अपेक्षाकृत कम लागत वाला पांचवीं पीढ़ी का फाइटर बनाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है।

रूस के मुताबिक, Su-75 को करीब Mach 1.8 की अधिकतम गति और लगभग 7,400 किलोग्राम तक के कॉम्बैट लोड के लिए डिजाइन किया जा रहा है। हालांकि, Su-75 अभी विकास के चरण में है। इसके मुकाबले Su-57 एक operational platform है और इसका export version Su-57E भी रूस की पेशकश का हिस्सा है।

भारत के लिए क्यों अहम है Su-57?

भारत के सामने एक तरफ फाइटर स्क्वाड्रनों की संख्या को लेकर चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ चीन की तेजी से बढ़ती वायु शक्ति भी रणनीतिक चिंता का विषय है। दूसरी ओर भारत का स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft यानी AMCA अभी विकास और आगे चलकर उत्पादन की लंबी प्रक्रिया से गुजरेगा।

ऐसे में Su-57 भारत को AMCA के पूरी तरह operational होने से पहले पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमता हासिल करने का एक विकल्प दे सकता है।

हालांकि, भारत के लिए यह फैसला केवल किसी विदेशी फाइटर की खरीद का नहीं होगा। नई तकनीक, लागत, स्वदेशी उत्पादन, मेंटेनेंस, हथियार प्रणाली और भविष्य में अपग्रेड की क्षमता जैसे कई पहलुओं पर विचार करना होगा।

सबसे बड़ा सवाल: क्या होगा डील का मॉडल?

अगर BRICS सम्मेलन के दौरान Su-57 को लेकर बातचीत आगे बढ़ती है, तो सबसे बड़ा सवाल केवल विमान की कीमत नहीं बल्कि Technology Transfer, Make in India, Local Production, Engine Technology, Radar, Electronic Warfare और Maintenance Ecosystem को लेकर होगा।

भारत के लिए किसी भी संभावित समझौते में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रूस कितनी महत्वपूर्ण तकनीक साझा करने के लिए तैयार है और भारत में उत्पादन की वास्तविक क्षमता किस स्तर तक विकसित की जा सकती है।

यही वजह है कि BRICS के दौरान मोदी-पुतिन मुलाकात पर नजर सिर्फ इस बात पर नहीं होगी कि दोनों नेताओं के बीच Su-57 को लेकर चर्चा होती है या नहीं, बल्कि इस पर भी होगी कि क्या रूस भारत को फिफ्थ जेनरेशन फाइटर के उत्पादन और तकनीकी क्षमता में बड़ी भूमिका देने के लिए तैयार है।

अगर भारत में Su-57 का उत्पादन और महत्वपूर्ण तकनीकों का हस्तांतरण किसी ठोस मॉडल के तहत संभव होता है, तो यह भारत-रूस रक्षा साझेदारी में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव साबित हो सकता है।

Su-30MKI बनेगा और घातक! 300 KM तक मार करने वाली रूसी मिसाइल पर भारत की नजर

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच लंबे समय से चली आ रही रक्षा साझेदारी के बीच एक बड़ा प्रस्ताव सामने आया है। भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों को रूस की लंबी दूरी की RVV-BD एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस करने के प्रस्ताव पर रक्षा मंत्रालय स्तर पर विचार किया जा रहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात पर दुनिया की नजर है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, RVV-BD को Su-30MKI के साथ इंटीग्रेट करने के लिए विमान में जरूरी तकनीकी बदलाव किए जाने का प्रस्ताव है। मिसाइल की बताई गई मारक क्षमता करीब 300 किलोमीटर तक है। अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और आगे चलकर इसका तकनीकी एकीकरण सफल रहता है, तो भारतीय वायुसेना की Beyond Visual Range यानी BVR एयर कॉम्बैट क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

मोदी-पुतिन मुलाकात पर टिकी नजर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने की पुष्टि क्रेमलिन की ओर से की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच 11 सितंबर को द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। दोनों नेताओं के बीच रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग सहित कई मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

भारत सरकार के अनुसार, मोदी और पुतिन ने 31 अगस्त को बिश्केक में हुई मुलाकात के दौरान राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की समीक्षा की थी। दोनों देशों ने अपनी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को आगे मजबूत करने पर भी सहमति जताई थी।

क्या है RVV-BD की खासियत?

RVV-BD रूस की लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके विभिन्न संस्करण लंबी दूरी के हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए विकसित किए गए हैं। करीब 300 किलोमीटर तक की बताई गई रेंज और बेहद तेज गति के कारण ऐसी मिसाइलें सामान्य लड़ाकू विमानों के साथ-साथ दुश्मन के हाई-वैल्यू एयरबोर्न प्लेटफॉर्म के खिलाफ भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

इनमें Airborne Early Warning and Control यानी AEW&C/AWACS विमान, निगरानी विमान और अन्य महत्वपूर्ण हवाई प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं। हालांकि वास्तविक प्रभाव मिसाइल के अंतिम संस्करण, सेंसर नेटवर्क, फायर-कंट्रोल सिस्टम और विमान के साथ उसके तकनीकी एकीकरण पर निर्भर करेगा।

Su-30MKI की ताकत में होगा इजाफा

Su-30MKI भारतीय वायुसेना के प्रमुख लड़ाकू विमानों में शामिल है और 260 से अधिक विमान भारतीय बेड़े में बताए जाते हैं। भारत इस फ्लीट के आधुनिकीकरण पर भी काम कर रहा है, जिसमें एवियोनिक्स, सेंसर और अन्य प्रणालियों को अपग्रेड किया जा रहा है।

ऐसे में अगर RVV-BD का Su-30MKI के साथ सफल एकीकरण होता है, तो विमान की लंबी दूरी से हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। खास तौर पर आधुनिक BVR युद्ध में लंबी दूरी की मिसाइलें किसी भी वायुसेना के लिए रणनीतिक बढ़त का अहम हिस्सा होती हैं।

रूस के साथ डील के साथ स्वदेशी विकल्प पर भी जोर

भारत रूस से लंबी दूरी की मिसाइल हासिल करने के विकल्प पर विचार कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही स्वदेशी एयर-टू-एयर हथियारों के विकास पर भी जोर जारी है। DRDO की Astra मिसाइल श्रृंखला को लगातार विकसित किया जा रहा है और भविष्य में लंबी दूरी के स्वदेशी एयर-टू-एयर हथियार भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

इसके अलावा भारत ने फ्रांस से Meteor एयर-टू-एयर मिसाइलों की खरीद भी की है। ऐसे में भारतीय वायुसेना की रणनीति में स्वदेशी और विदेशी दोनों तरह के लंबी दूरी के एयर-टू-एयर हथियारों का मिश्रण देखने को मिल रहा है।

क्या BRICS के दौरान आगे बढ़ेगा प्रस्ताव?

फिलहाल RVV-BD को लेकर किसी अंतिम डील या करार की घोषणा नहीं हुई है। इसे एक प्रस्ताव के तौर पर देखा जा रहा है, जिस पर तकनीकी, वित्तीय और रणनीतिक पहलुओं के आधार पर आगे फैसला होना है।

ऐसे में 11 सितंबर को होने वाली मोदी-पुतिन द्विपक्षीय बैठक और उसके बाद BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-रूस रक्षा सहयोग पर होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, मौजूदा रिपोर्टों में पुतिन-मोदी बातचीत के प्रमुख रक्षा मुद्दों में रूस के Su-57 लड़ाकू विमान से जुड़े तकनीकी सहयोग का भी उल्लेख किया गया है।

अगर RVV-BD प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और इसके इंटीग्रेशन तथा सप्लाई से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनती है, तो Su-30MKI की लंबी दूरी की BVR क्षमता को मजबूत करने की दिशा में यह एक अहम कदम साबित हो सकता है।

Russia Avalanche: 11 पर्वतारोहियों की मौत, 6 लापता, रेस्क्यू ऑपरेशन में मौसम बना बाधा

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

रूस के उत्तरी काकेशस क्षेत्र में एक दर्दनाक हिमस्खलन ने बड़ी तबाही मचा दी है। काबारडिनो-बाल्कारिया क्षेत्र के बेजेंगी गॉर्ज में आए भीषण हिमस्खलन की चपेट में आने से 11 पर्वतारोहियों की मौत हो गई, जबकि 6 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। हादसे में छह अन्य पर्वतारोही घायल हुए हैं।

स्थानीय इमरजेंसी सर्विस के अनुसार, खराब मौसम और दुर्गम पहाड़ी इलाका राहत एवं बचाव अभियान में बड़ी चुनौती बन रहा है। लगातार हिमस्खलन के खतरे के बीच बचाव दल लापता पर्वतारोहियों की तलाश में जुटे हुए हैं।

33 पर्वतारोहियों के दल को बनाया निशाना

हादसा रविवार शाम करीब 5 बजे स्थानीय समय के अनुसार बेजेंगी गॉर्ज में हुआ। बताया जा रहा है कि करीब 5,025 मीटर ऊंचे माउंट मिजिरगी से अचानक भारी मात्रा में बर्फ नीचे की ओर खिसकी और 33 पर्वतारोहियों के समूह को अपनी चपेट में ले लिया।

हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय बचाव दल को मौके पर भेजा गया। इसके अलावा एमआई-8 हेलीकॉप्टर की भी मदद ली गई। शुरुआती अभियान में तीन पर्वतारोहियों को सुरक्षित बाहर निकालकर नालचिक पहुंचाया गया।

इमरजेंसी सर्विस के मुताबिक सोमवार सुबह करीब 9 बजे तक 10 पर्वतारोही खुद पहाड़ से नीचे उतरने में सफल रहे थे। हालांकि छह लोगों का अभी तक कोई पता नहीं चल सका है।

50 से ज्यादा बचावकर्मी अभियान में जुटे

लापता पर्वतारोहियों की तलाश के लिए 50 से ज्यादा इमरजेंसी वर्कर्स को अभियान में लगाया गया है। लेकिन क्षेत्र में खराब मौसम, कठिन पहाड़ी परिस्थितियों और दोबारा हिमस्खलन की आशंका के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन बेहद जोखिम भरा बना हुआ है।

बचाव दल बेहद सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा है ताकि राहतकर्मियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।

इस साल पर्वतारोहियों की मौत की दूसरी बड़ी घटना

रूस में हुआ यह हादसा इस साल पर्वतारोहण से जुड़ी बड़ी त्रासदियों में एक है। इससे पहले 30 जुलाई को पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान स्थित ब्रॉड पीक पर भी हिमस्खलन ने कई पर्वतारोहियों की जान ले ली थी।

ब्रॉड पीक पर कैंप 2 और कैंप 3 के बीच हुए हादसे में कुल 10 पर्वतारोहियों की मौत हुई थी। मृतकों में विश्व प्रसिद्ध नेपाली पर्वतारोही निर्मल पुर्जा (निम्सदाई) भी शामिल थे।

इस अभियान में पांच नेपाली पर्वतारोही शामिल थे और दल का नेतृत्व निर्मल पुर्जा कर रहे थे। इसके अलावा पाकिस्तान, ओमान, अमेरिका और चीन के एक-एक पर्वतारोही भी दल का हिस्सा थे।

लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने एक बार फिर दुनिया के ऊंचे पर्वतीय इलाकों में बदलते मौसम और हिमस्खलन के गंभीर खतरे को उजागर किया है।

SCO Summit 2026 से पहले बिश्केक में भारत की गूंज, विशेष समूह से मिले पीएम मोदी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वक्त किर्गिस्तान में हैं। SCO समिट में हिस्सा लेने के लिए वो बिश्केक पहुंचे हैं। समिट के शुरू होने से पहले उन्होंने सोमवार को एक विशेष समूह से मुलाकात की, जो भारत से खास जुड़ाव रखते हैं. इस समूह में प्रवासी भारतीय समुदाय के प्रमुख लोग, पर्यावरण प्रेमी, योग उत्साही, शिक्षाविद, ITEC (भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग) के पूर्व छात्र और शोधकर्ता शामिल थे।

प्रधानमंत्री ने इस मुलाकात की जानकारी एक्स पर साझा करते हुए अपनी खुशी जाहिर की. पीएम मोदी ने लिखा, ऐसे लोगों के समूह से मुलाकात हुई, जिनका भारत से गहरा जुड़ाव है. इनमें प्रवासी भारतीय समुदाय के प्रमुख लोग, पर्यावरण के प्रति उत्साही, योग प्रेमी, शिक्षाविद, ITEC के पूर्व छात्र, शोधकर्ता और अन्य लोग शामिल हैं. भारत के साथ इस तरह का लगातार जुड़ाव देखकर खुशी हुई।

प्रधानमंत्री से मिलने आए योग प्रेमियों में एक ऐसे साधक भी शामिल थे, जिन्होंने गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित ‘वर्ल्ड योगासन चैंपियनशिप’ में हिस्सा लिया था. उन्होंने न सिर्फ इस वैश्विक प्रतियोगिता में भाग लिया, बल्कि शानदार प्रदर्शन करते हुए मेडल भी अपने नाम किया. प्रधानमंत्री ने भारत के प्रति उनके इस समर्पण और उपलब्धि की विशेष रूप से सराहना की. यह मुलाकात दर्शाती है कि दुनिया भर में फैले अलग-अलग क्षेत्रों के लोग आज भी भारत की संस्कृति, योग और शिक्षा व्यवस्था से कितने गहरे स्तर पर जुड़े हुए हैं.

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में SCO समिट

प्रधानमंत्री मोदी SCO के 26वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने किर्गिस्तान के बिश्केक पहुंचे हैं. वो आज रूस, ईरान, आर्मेनिया और किर्गिस्तान के नेताओं के साथ द्विपक्षीय मुलाकात करेंगे. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ मुलाकात होगी. दोनों नेताओं से उनकी मुलाकात कई मायनों में खास होने वाली हैं.

इसके अलावा एससीओ समिट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी इस समिट में हिस्सा ले सकते हैं. वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल होंगे. पीएम मोदी और जिनपिंग के बीच अहम मीटिंग हो सकती है.

यह सम्मेलन SCO के गठन की 25वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक अवसर पर हो रहा है. एससीओ की स्थापना 2001 में हुई थी. बता दें कि भारत और पाकिस्तान 2017 में SCO के पूर्ण सदस्य बने. इसके बाद 2023 में ईरान और 2024 में बेलारूस इसमें शामिल हुए.