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रूस ने यूक्रेन में मिसाइल-ड्रोन से किए हमले, 8 लोगों की हुई मौत

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

रूस ने गुरुवार की सुबह यूक्रेन की राजधानी पर मिसाइलों और ड्रोन से बड़े पैमाने पर हमला किया। इसके कारण भीषण विस्फोट हुए और कीव कई घंटों तक हिलता रहा। कीव शहर के सैन्य प्रशासन प्रमुख तैमूर टकाचेंको ने बताया कि हमलों में आवासीय इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं, जिनमें आठ लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। मेयर विटाली क्लिट्स्को ने कहा कि कम से कम 11 लोग घायल हुए हैं।

कितने जिलें प्रभावित हुए?

बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों तथा ड्रोन से हुए हमले ने नीप्रो नदी के दोनों किनारों पर स्थित शहर के सभी 10 जिलों को प्रभावित किया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और अन्य अधिकारियों द्वारा हमले की पहली चेतावनी जारी किए जाने के बाद कई निवासियों ने मेट्रो स्टेशनों पर शरण ली।

क्लिट्स्को ने निवासियों ने क्या आग्रह किया?

रूस ने हाल के हफ्तों में कीव पर अपने हमले तेज कर दिए हैं। वहीं, यूक्रेन द्वारा रूसी सैन्य स्थलों और ऊर्जा सुविधाओं के खिलाफ किए गए लंबी दूरी के ड्रोन हमलों के कारण रूस के अंदर ईंधन की कमी हो गई है। इसके साथ ही आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो गई हैं। क्लिट्स्को ने निवासियों से आश्रय स्थलों में रहने का आग्रह किया। 

उन्होंने कहा कि शेवचेनकिस्की जिले में पांच लोग घायल हुए हैं और घायलों में से एक, जो एक पैरामेडिक है, उसकी हालत बेहद गंभीर है। क्लित्स्को ने बताया कि देसनियांस्की जिले में एक क्षतिग्रस्त नौ मंजिला आवासीय इमारत में लोग फंसे हुए थे और बचाव दल घटनास्थल की ओर रवाना हो गए। वहीं, होलोसिवस्की जिले में एक बहुमंजिला इमारत की छत पर आग लग गई। स्विआतोशिन्स्की और डार्नीत्स्की जिलों में घरों में आग लग गई। 

अधिकारी नुकसान का आकलन कर रहे

कीव शहर के सैन्य प्रशासन के प्रमुख तिमुर टकाचेंको ने बताया कि हमले में देसनियांस्की जिले में एक आवासीय इमारत आंशिक रूप से नष्ट हो गई, पेचेर्स्की जिले में दो स्थानों पर आवासीय इमारतों के पास आग लग गई और सोलोमियांस्की जिले में एक प्रशासनिक भवन के पास आग लग गई। उन्होंने कहा कि अधिकारी ओबोलोंस्की और पोडिल्स्की जिलों में भी नुकसान का आकलन कर रहे हैं।

Operation Amistad: वेनेजुएला में भारत का राहत अभियान तेज, भारतीय सेना का फील्ड अस्पताल 24 घंटे दे रहा मुफ्त इलाज

वेनेजुएला / वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत भूकंप से प्रभावित वेनेजुएला में तैनात भारतीय सेना का फील्ड अस्पताल पूरी तरह से काम करने लगा है और चौबीसों घंटे मुफ्त मेडिकल सेवाएं दे रहा है। वेनेजुएला में भारतीय दूतावास ने बताया कि बहुत अनुभवी डॉक्टरों वाली एक भारतीय मेडिकल टीम ने काराकस के अंतरराष्ट्रीय ला रिंकोनाडा रेसट्रैक पर शिविर लगाया है।

सोमवार को बताया गया कि यह शिविर अब पूरी तरह से काम कर रहा है और सभी सेवाएं निशुल्क दे रहा है। बुधवार शाम को आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के भूकंप वेनेजुएला में एक सदी से भी अधिक समय में आए सबसे तेज भूकंपों में से है। रविवार को भूकंप से मरने वालों की संख्या भी बढ़कर 1,700 हो गई, जबकि हजारों लोग घायल हुए और कई लोग लापता हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, सेना का फील्ड अस्पताल भूकंप से प्रभावित लोगों की पूरी क्षमता के साथ मदद कर रहा है।

भारतीय वायु सेना के मुताबिक, ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत दो सी-17 ग्लोबमास्टर विमानों ने 66 टन राहत सामग्री वेनेजुएला पहुंचाई है। इसमें भारतीय सेना का फील्ड अस्पताल, 35 टन से अधिक राहत सामान, दवाइयां, मेडिकल उपकरण और दो भीष्म क्यूब्स शामिल हैं। सहयोग, हित और मैत्री’ (भीष्म) क्यूब्स के तहत भारत स्वास्थ्य पहल असल में मोबाइल अस्पताल हैं, जिनका मकसद आपातकालीन मेडिकल सुविधाएं देना है।

पांच दिन बाद जिंदा निकला युवक

वेनेजुएला में भूकंप आने के पांच दिन बाद ला गुआइरा राज्य में 21 साल के एक युवक को मलबे से जिंदा निकाला गया है। शख्स को  वेनेजुएला, मेक्सिको और अल साल्वाडोर की बचाव टीमों ने जिंदा बाहर निकाला है। यह जानकारी एल साल्वाडोर के राष्ट्रपति नायिब बुकेले ने दी। बचाए गए युवक का नाम आरोन लेवी कैंटिलो वर्गास है, जो काराबायेदा शहर में मलबे के नीचे जिंदा पाया गया। आरोन अब विशेष मेडिकल देखभाल में है।

भारतीय नौसेना का विशाल पोत आईएनएस सुदर्शनी अमेरिका के बाल्टीमोर पहुंचा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारतीय नौसेना का नौकायन प्रशिक्षण पोत आईएनएस सुदर्शनी 26 जून को ऐतिहासिक समुद्री अभियान लोकायन 26 के हिस्से के रूप में अमेरिका के मैरीलैंड स्थित बाल्टीमोर बंदरगाह पर पहुंचा। नॉरफ़ॉक से इस यात्रा में प्रमुख मध्य-अटलांटिक पुलों के नीचे स्थित ऐतिहासिक चेसापीक और डेलावेयर नहर से होकर गुजरना शामिल था।

आईएनएस सुदर्शनी की बाल्टीमोर यात्रा भारत की समृद्ध समुद्री विरासत और भारतीय नौसेना तथा अमेरिकी नौसेना के बीच अटूट मित्रता एवं सहयोग के बंधन को दर्शाती है। अपनी यात्रा के दौरान, यह जहाज अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले सेल250 मैरीलैंड समारोह से पहले समुद्री गतिविधियों और सामुदायिक संपर्क गतिविधियों में भाग लेगा।

बाल्टीमोर पहुंचने से पहले, सुदर्शनी ने 19-23 जून तक नॉरफ़ॉक में आयोजित सेल 250 वर्जीनिया समारोह में भाग लिया जहां इस पोत ने दुनिया भर के बड़े जहाजों के साथ मिलकर परेड ऑफ सेल और सिटी क्रू परेड में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

कोच्चि से नॉरफ़ॉक तक पांच महीनों में 13,000 समुद्री मील से अधिक की दूरी तय करने वाली यह समुद्री यात्रा भारत की समुद्री परंपराओं और वसुधैव कुटुंबकम की भावना का प्रमाण है , जो महासागरों के पार मित्रता, सहयोग और आपसी विश्वास को बढ़ावा देती है।

फ्रांस में G-7 सम्मेलन की शुरुआत, इस बार इन खास मुद्दों पर होगी विशेष चर्चा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

फ्रांस में सोमवार (15 जून) से शुरू हो रही ग्रुप ऑफ सेवेन (जी-7) की बैठक इस बार काफी दिलचस्प होने वाली है। दरअसल, यह सम्मेलन उस समय हो रहा है, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने पर हाल ही में समझौता करने पर सहमति बनी है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस पूरे सम्मेलन में छाए रहने की उम्मीद है। दूसरी तरफ जी-7 देश अब रूस-यूक्रेन संघर्ष और इस समूह के ही एक सदस्य अमेरिका की टैरिफ और कूटनीति को लेकर भी चर्चाएं कर सकते हैं। 

इस बार जी-7 की अध्यक्षता फ्रांस के पास है। बीते साल जब यह सम्मेलन हुआ था, तब इसकी अध्यक्षता कनाडा के पास थी। इसी तरह फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका भी रोटेशन प्रणाली के तहत जी-7 की अध्यक्षता और इसकी मेजबानी कर चुके हैं। दूसरी तरफ भारत बीते कुछ वर्षों में जी-7 का सदस्य न होने के बावजूद इसके लिए मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया जाता रहा है। 


क्या है जी-7 सम्मेलन, इसका क्या इतिहास?

जी7 के गठन की कहानी भी काफी दिलचस्प है। दरअसल, 1970 का दौर, वह समय था, जब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था तेल के बढ़ते दामों की वजह से मुश्किल में थी। खासकर तेल पैदा करने वाले देशों के संगठन- ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) यानी पेट्रोल निर्यातक देशों के संगठन की मनमानी की वजह से। 

1975
ओपेक की तरफ से तेल के निर्यात पर लगी पाबंदियों का असर ऐसा हुआ कि तब अमेरिका के वित्त मंत्री जॉर्ज शुल्ज ने एक बैठक बुला ली। पहली बैठक में छह देश इकट्ठा हुए और आर्थिक संकटों से निपटने पर चर्चा की। फैसला हुआ कि एक साल बाद यह देश फिर मिलेंगे और उठाए गए कदमों की समीक्षा करेंगे। 

1976
एक साल बाद जब यह बैठक फिर हुई तो कनाडा को भी इसका हिस्सा बना लिया गया। इस तरह जी7 अस्तित्व में आया।  

1977
यूरोपीय आयोग (ईसी) के अध्यक्ष को भी जी7 की बैठकों के लिए आमंत्रित कर दिया गया। सामूहिक तौर पर यूरोप जी7 का हिस्सा नहीं बना।

1997
रूस को इस समूह में शामिल किया गया था। इसके बाद यह जी-8 बन गया। हालांकि, 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद रूस को समूह से निलंबित कर दिया गया और यह वापस जी-7 बन गया

इस बार क्या है जी-7 का एजेंडा?

इस बार फ्रांस के इवियन-लेस-बैंस में हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा कई गंभीर वैश्विक राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक चुनौतियों पर केंद्रित है। इनमें सबसे प्रमुख यूक्रेन युद्ध और दुनियाभर में अमेरिका की वजह से फैला व्यापारिक असंतुलन है। 

1. यूक्रेन का युद्ध
जी-7 देश यूक्रेन के प्रति अपनी एकजुटता और समर्थन दिखाना चाहते हैं, क्योंकि रूस और यूक्रेन का युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की इस चर्चा के लिए सम्मेलन में मौजूद रहेंगे, जिन्होंने युद्ध खत्म करने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ आमने-सामने की बातचीत का प्रस्ताव रखा है। यूरोपीय नेता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह समझाने का प्रयास करेंगे कि वे पुतिन के साथ सार्थक बातचीत के लिए एक साझा और मजबूत दृष्टिकोण अपनाएं।

2. ईरान के साथ शांति समझौता
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के लिए जिस समझौते की रूपरेखा तैयार हुई है, उस पर इस सम्मेलन में प्रमुखता से चर्चा होगी। जी-7 नेता इस समझौते का विस्तृत विवरण जानना चाहते हैं, खासकर यह कि वैश्विक व्यापार के लिए अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को शिपिंग ट्रैफिक के लिए कितनी जल्दी खोला जा सकता है। 

3. वैश्विक आर्थिक असंतुलन और व्यापार
चर्चा का एक और बड़ा विषय चीन के साथ-साथ अमेरिका की व्यापार नीतियां और वैश्विक आर्थिक असंतुलन है। फ्रांस ने इस असंतुलन को स्पष्ट करते हुए कहा है कि चीन बहुत अधिक उत्पादन करता है, अमेरिका बहुत अधिक उपभोग करता है और यूरोप बहुत कम निवेश करता है। इसके अलावा, सम्मेलन में चीन के रिकॉर्ड व्यापार मुनाफे और रोजमर्रा के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) के बाजार पर चीन के दबदबे को लेकर चिंताएं उठाई जाएंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ से जुड़े व्यापारिक तनावों पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। 

4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
तेजी से बढ़ती एआई तकनीक से जुड़े अवसरों और संभावित खतरों पर चर्चा करने के लिए फ्रांस ने ओपनएआई, गूगल, एंथ्रोपिक और मिस्ट्रल एआई जैसी प्रमुख कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी आमंत्रित किया है। इसके अंतर्गत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे अहम विषयों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

5. विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ
जी-7 नेता कई उभरते बाजारों और विकासशील देशों पर बढ़ रहे भारी कर्ज के बोझ से निपटने के लिए अपना संकल्प जाहिर करेंगे, हालांकि इसके ठोस कदम क्या होंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

फ्रांस में होने वाले जी-7 सम्मेलन में कौन-कौन ले रहा हिस्सा?

फ्रांस के इवियन-लेस-बैंस में आयोजित हो रहे जी-7 शिखर सम्मेलन में मुख्य सदस्य देशों के अलावा कई अतिथि देशों के नेताओं और तकनीकी दिग्गजों को भी आमंत्रित किया गया है।

जी-7 का हिस्सा देश
सम्मेलन में जी-7 के सातों मुख्य सदस्य देश और इनके प्रमुख शामिल होंगे। इनमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मेजबान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी और जापान की प्रधानमंत्री सनाई तकाइची हिस्सा लेंगी। इनके साथ ही, यूरोपीय संघ (ईयू) भी हमेशा की तरह इस सम्मेलन में अपना प्रतिनिधित्व करेगा।

आमंत्रित देश
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कई गैर-जी7 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अतिथि के रूप में विशेष निमंत्रण दिया है। जिन प्रमुख नेताओं ने सम्मेलन में हिस्सा लेने की पुष्टि की है, उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल-सीसी, कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी।

इनके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, केन्या और दक्षिण कोरिया के नेता भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को भी निमंत्रण दिया गया है, लेकिन उनके शामिल होने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

एआई और टेक कंपनियों के अधिकारी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीकों, उसके खतरों और अवसरों पर चर्चा करने के लिए दुनिया की प्रमुख टेक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। इनमें ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो एमोडाई के साथ-साथ गूगल और मिस्ट्रल एआई के प्रतिनिधि शामिल हैं।

जी-7 के किस नेता से डोनाल्ड ट्रंप का कब और क्या विवाद हुआ है? 

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर: ईरान पर अमेरिकी सैन्य हमलों में ब्रिटिश बेस के इस्तेमाल की अनुमति न देने और युद्ध में मदद न करने पर ट्रंप ने स्टार्मर की कड़ी आलोचना की। उन्होंने स्टार्मर की तुलना विंस्टन चर्चिल से करते हुए कहा, “हम विंस्टन चर्चिल से नहीं निपट रहे हैं।” ट्रंप ने सोशल मीडिया पर यह भी ताना मारा कि “हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हमारे युद्ध जीतने के बाद उसमें शामिल होते हैं।”

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी: ट्रंप कनाडा के साथ व्यापार असंतुलन से नाराज रहते हैं और अक्सर कार्नी को गवर्नर कहकर बुलाते हैं। दावोस विश्व आर्थिक मंच में कार्नी की एक परोक्ष टिप्पणी के जवाब में ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “कनाडा अमेरिका की वजह से ही जिंदा है। अगली बार बयान देते समय इसे याद रखना, मार्क।” इतना ही नहीं, पिछले साल जब कनाडा ने जी-7 का आयोजन किया था, तब भी ट्रंप कुछ कारणों से जी-7 की बैठक को बीच में ही छोड़कर अमेरिका लौट गए थे।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों: अप्रैल में व्हाइट हाउस में ईस्टर लंच के दौरान, ट्रंप ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की मदद न करने पर फ्रांस की आलोचना की और मैक्रों के वैवाहिक जीवन का मजाक उड़ाया। उन्होंने वियतनाम के एक वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि मैक्रों की पत्नी ब्रिजिट उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव करती हैं। इसे लेकर बाद में मैक्रों ने पलटवार किया था और ट्रंप के बयान को अनुचित करार दिया। इसके अलावा, ट्रंप अक्सर व्यापार वार्ता को लेकर मैक्रों के लहजे की मजाकिया नकल भी उतारते हैं।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी: बीते साल अक्तूबर में ट्रंप ने मेलोनी की खूब तारीफ की थी, लेकिन ईरान के खिलाफ युद्ध में इटली के मदद करने से इनकार करने और पोप लियो XIV के साथ ट्रंप के विवाद पर मेलोनी ने ट्रंप को फटकार लगाई थी। इसके बाद से ही दोनों नेताओं के बीच विवाद पैदा हो गया। ट्रंप ने इटली के एक अखबार से कहा था, “क्या लोग उसे (मेलोनी को) पसंद करते हैं? मुझे विश्वास नहीं होता… मुझे लगा था कि उसमें साहस है, लेकिन मैं गलत था।”

जापान की प्रधानमंत्री सनाई ताकाइची: ताकाइची की पहली व्हाइट हाउस यात्रा के दौरान (अक्तूबर के बाद), जब एक जापानी पत्रकार ने ईरान पर अचानक हमले को लेकर सवाल पूछा, तो ट्रंप ने जापान को असहज करते हुए पर्ल हार्बर का अप्रत्याशित हवाला दिया। ट्रंप ने कहा, “जापान से बेहतर सरप्राइज के बारे में कौन जानता है? आपने मुझे पर्ल हार्बर के बारे में क्यों नहीं बताया?।” बता दें कि पर्ल हार्बर द्वितीय विश्व युद्ध के समय की घटना थी, जिसमें जापान ने अमेरिका पर हमला किया था। इसके बाद अमेरिका ने पलटवार करते हुए जापान पर दो परमाणु बम गिरा दिए थे। 

जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज: अप्रैल में मर्ज ने ईरान युद्ध में अमेरिका की रणनीति की आलोचना करते हुए कहा था कि अमेरिका अपमानित हो रहा है। इस पर ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पलटवार करते हुए कहा कि मर्ज को अपने देश की आव्रजन  और ऊर्जा समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। इस विवाद के कुछ दिनों बाद ही अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5,000 सैनिकों को वापस बुलाने का ऐलान कर दिया। डी-डे (द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना की विजयी का दिन) की सालगिरह से पहले भी दोनों के बीच एक असहज स्थिति तब बन गई थी, जब ट्रंप ने मर्ज से कहा था कि वह ऐतिहासिक दिन जर्मनी के लिए सुखद नहीं था।

‘ब्रिक्स वैश्विक इकोनॉमी का नया पावरहाउस, हाई-टेक निर्यात में एक-तिहाई हिस्सेदारी’, पुतिन

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

दुनिया में आर्थिक मोर्चे पर एक नया बदलाव दिख रहा है और ब्रिक्स देश इसके विकास का मुख्य इंजन बन चुके हैं। 29वें सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम (एसपीआईईएफ) के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में वैश्विक जीडीपी वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा (49 प्रतिशत) ब्रिक्स देशों से आया है। यह आंकड़े बताते हैं कि उभरते बाजार अब वैश्विक पटल पर एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहे हैं। 

व्यापार और अर्थव्यवस्था पर ब्रिक्स का दबदबा

वर्तमान में, क्रय शक्ति समता के आधार पर वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स का योगदान लगभग 40 प्रतिशत हो गया है। इसके अलावा, व्यापारिक मोर्चे पर भी इन देशों ने तेजी से प्रगति की है। पुतिन ने कहा है कि ब्रिक्स के अस्तित्व में आने के बाद से वैश्विक माल व्यापार में इसकी हिस्सेदारी दोगुनी से अधिक हो गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है।

प्रमुख आंकड़े और क्षेत्रीय प्रभाव

  • जीडीपी में योगदान: वैश्विक जीडीपी वृद्धि (पिछले 5 वर्षों में) का 49 प्रतिशत हिस्सा ब्रिक्स से आया।
  • क्रय शक्ति: पीपीपी के संदर्भ में वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत हिस्सा ब्रिक्स के पास।
  • आपसी व्यापार: ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार एक ट्रिलियन डॉलर के पार।
  • तकनीकी निर्यात: वैश्विक हाई-टेक निर्यात में ब्रिक्स की हिस्सेदारी एक-तिहाई से अधिक। 

तकनीक और इनोवेशन में भारत-चीन का नेतृत्व

ब्रिक्स देश अब केवल पारंपरिक व्यापार या कमोडिटी निर्यात तक सीमित नहीं हैं। वैश्विक हाई-टेक निर्यात में इनकी हिस्सेदारी एक-तिहाई से अधिक हो गई है। राष्ट्रपति पुतिन ने तकनीकी क्षेत्र में विशिष्ट देशों की ताकत का उल्लेख करते हुए बताया कि वैश्विक सॉफ्टवेयर उद्योग में भारत की स्थिति बेहद मजबूत है। वहीं, चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पेटेंट के मामले में वैश्विक नेतृत्व कर रहा है। रूस भी डिजिटल प्लेटफॉर्म, वित्तीय तकनीक और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। 

बहुध्रुवीय विश्व और समान विकास की वकालत

आर्थिक विकास के साथ-साथ इस मंच पर वैश्विक समानता का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। पुतिन ने कहा, “दुनिया तब अधिक न्यायसंगत बनती है जब आर्थिक विकास उन अरबों लोगों तक पहुंचता है जो पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था के हाशिये पर थे”। इसी कड़ी में चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग ने वैश्विक प्रशासन की एक निष्पक्ष प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन और रूस संप्रभु समानता, अंतर्राष्ट्रीय कानून और वास्तविक बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उभरते बाजारों का भविष्य: अफ्रीका और मध्य एशिया

इस आर्थिक महाकुंभ में अफ्रीका और मध्य एशिया जैसे क्षेत्रों की विकास क्षमता को भी रेखांकित किया गया। उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव ने बताया कि रूस और उज्बेकिस्तान के बीच सहयोग अब केवल व्यापारिक नहीं रहा, बल्कि यह तकनीकी गठबंधन और संयुक्त उत्पादन परियोजनाओं में बदल गया है, जिसका कुल पोर्टफोलियो 50 अरब डॉलर से अधिक है। 

तंजानिया की राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन ने भविष्य के अफ्रीका का खाका खींचते हुए कहा कि 2050 तक दुनिया का हर चौथा व्यक्ति अफ्रीकी होगा। उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में दुनिया की 20 सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से नौ अफ्रीका में होंगी।

यह आर्थिक सत्र इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पश्चिमी देशों के एकाधिकार से परे, ब्रिक्स देश और उभरते बाजार अब केवल वैश्विक विकास के भागीदार नहीं, बल्कि उसके मुख्य संचालक बन गए हैं। तकनीक, आपसी व्यापार और नई रणनीतिक साझेदारियों के बलबूते यह समूह भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा तय करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

ईरान में युद्द के बीच भारतीय दूतावास ने जारी की नई एडवाइजरी, भारतीयों से देश छोड़ने की अपील की

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

ईरान और इस्राइल के बीच फिर तेज हुए सैन्य संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया को तनाव के मुहाने पर ला खड़ा किया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि भारत सरकार को भी अपने नागरिकों के लिए हाई अलर्ट जारी करना पड़ा। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने साफ शब्दों में कहा है कि भारतीय नागरिक ईरान की यात्रा बिल्कुल न करें और जो लोग अभी वहां मौजूद हैं, वे उपलब्ध साधनों से तुरंत देश छोड़ दें। दूतावास की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब क्षेत्र में मिसाइल हमले, एयरस्ट्राइक और जवाबी कार्रवाई लगातार बढ़ रही है।

क्या पश्चिम एशिया फिर बड़े युद्ध की तरफ बढ़ रहा है?

इस्राइल और ईरान के बीच सोमवार को फिर भारी तनाव देखने को मिला। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमले किए, जिससे युद्धविराम लगभग टूटता नजर आया। पिछले 24 घंटों में कई शहरों में हमले हुए। रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया और मिसाइलों की बौछार देखी गई। हालात को देखते हुए भारतीय दूतावास ने नई एडवाइजरी जारी कर भारतीयों से सतर्क रहने को कहा। भारतीय दूतावास ने अपने बयान में कहा कि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति बेहद संवेदनशील और खतरनाक हो चुकी है। ऐसे में भारतीय नागरिक किसी भी हालत में ईरान की यात्रा न करें। वहीं जो लोग ईरान में मौजूद हैं, उन्हें जल्द से जल्द वहां से निकलने की सलाह दी गई है।

आखिर अचानक हालात इतने खराब कैसे हुए?

  • तनाव तब और बढ़ गया जब इस्राइल ने रविवार को बेरूत के दक्षिणी इलाकों में एयरस्ट्राइक की।
  • इसके बाद ईरान ने जवाबी हमला करते हुए इस्राइल की तरफ मिसाइलें दागीं।
  • सोमवार को दोनों तरफ से फिर हमले और जवाबी कार्रवाई हुई।
  • ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में इस्राइली जहाजों पर रोक लगाने का एलान किया।
  • लाल सागर दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है।

क्या ट्रंप युद्ध रोकने की कोशिश कर रहे हैं?

मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप लगातार इस संघर्ष को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की और ईरान पर जवाबी हमले से बचने की सलाह दी। ट्रंप का मानना है कि अगर इस्राइल फिर हमला करता है तो पूरा क्षेत्र लंबे युद्ध में फंस सकता है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ईरान के साथ परमाणु समझौते के बेहद करीब पहुंच चुका था, लेकिन अचानक हुए हमलों ने हालात बिगाड़ दिए। उन्होंने ईरान से भी बातचीत की मेज पर लौटने की अपील की। ट्रंप ने कहा कि तुमने मिसाइलें दाग दीं, अब काफी है। वापस बातचीत करो और समझौता करो।

फिलीपींस में 7.8 तीव्रता के भूकंप, 4 लोगों की मौत, 200 से ज्यादा घायल

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

फिलीपींस के दक्षिणी हिस्से मिंडानाओ में सोमवार सुबह तेज भूकंप के झटकों ने लोगों को दहशत में डाल दिया। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 दर्ज की गई है, जिसके बाद कई तटीय इलाकों में सुनामी की चेतावनी जारी कर दी गई है। भूकंप के बाद बिजली आपूर्ति बाधित होने और लोगों के घरों से बाहर निकलकर सुरक्षित स्थानों की ओर भागने की खबरें सामने आई हैं। हालांकि अब तक किसी बड़े नुकसान या जनहानि की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

जनरल सैंटोस के पास था भूकंप का केंद्र

फिलीपींस इंस्टीट्यूट ऑफ वोल्केनोलॉजी एंड सीस्मोलॉजी के अनुसार, भूकंप का केंद्र मिंडानाओ द्वीप पर जनरल सैंटोस शहर से लगभग 13 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित था। इसकी गहराई लगभग 10 किलोमीटर थी। भूकंप स्थानीय समयानुसार सुबह 7:37 बजे आया, जिससे पूरे क्षेत्र में तेज झटके महसूस किए गए।

सुनामी का खतरा, ऊंची लहरों की चेतावनी

भूकंप के तुरंत बाद अमेरिकी सुनामी चेतावनी प्रणाली ने संभावित सुनामी का अलर्ट जारी किया। इसके बाद इंडोनेशिया की भूभौतिकी एजेंसी ने भी अपने उत्तर-पूर्वी तटीय इलाकों के लिए चेतावनी जारी कर दी। फिलीपींस के ज्वालामुखी एवं भूकंप विज्ञान संस्थान (PHIVOLCS) ने चेतावनी दी है कि प्रभावित तटीय क्षेत्रों में सामान्य ज्वार स्तर से एक मीटर से अधिक ऊंची लहरें उठ सकती हैं। इन लहरों का असर कई घंटों तक बना रह सकता है।विज्ञापन

लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह

फिलीपींस भूकंप संस्थान के प्रमुख टेरेसिटो बाकोलकोल ने तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थानों या ऊंचे इलाकों में जाने की सलाह दी है। अधिकारियों ने कहा है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और राहत एवं बचाव दल को अलर्ट कर दिया गया है।

कई देशों में महसूस हुए झटके

भूकंप के झटके सिर्फ फिलीपींस तक सीमित नहीं रहे। इंडोनेशिया के उत्तरी सुलावेसी और नॉर्थ मालुकू प्रांतों में भी कंपन महसूस किया गया। इसके अलावा ताइवान, जापान, गुआम, पापुआ न्यू गिनी और पश्चिमी प्रशांत के कई द्वीप देशों में भी हल्के झटकों की संभावना जताई गई है।

क्यों बार-बार आता है भूकंप?

गौरतलब है कि फिलीपींस और इंडोनेशिया दोनों दुनिया के सबसे अधिक भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में गिने जाते हैं। ये देश “पैसिफिक रिंग ऑफ फायर” नामक भूगर्भीय क्षेत्र में स्थित हैं, जहां कई टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं। इसी कारण यहां अक्सर बड़े भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिलती हैं। साथ ही यह देश हर साल करीब 20 तूफानों और टाइफून का भी सामना करता है।

क्या इजराइल कर रहा है अमेरिका की जासूसी? रिपोर्ट में बढ़ा दावा

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

अमेरिका और इजराइल दुनिया के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं, लेकिन एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका को अपने ही सहयोगी इजराइल से जासूसी का खतरा महसूस हो रहा है. इसी वजह से अमेरिकी अधिकारी इजराइल दौरे के दौरान विशेष सुरक्षा उपाय अपनाते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन और उसकी खुफिया एजेंसी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े खुफिया खतरे का नया आकलन तैयार किया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि DIA ने इजराइल के लिए खतरे का स्तर बढ़ाकर क्रिटिकल यानी अत्यंत गंभीर कर दिया है. अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इजराइल, ईरान युद्ध और अमेरिका की रणनीति से जुड़ी आंतरिक चर्चाओं की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर सकता है. DIA ने इस संबंध में सात पन्नों का एक दस्तावेज भी तैयार किया है, जिसमें उन घटनाओं का जिक्र है, जिनसे यह चिंता बढ़ी.

इजराइल-अमेरिका ने रिपोर्ट खारिज की

हालांकि, व्हाइट हाउस और इजराइल दोनों ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. इजराइल के दूतावास ने कहा कि वह अमेरिकी संस्थाओं या सरकारी अधिकारियों की जासूसी नहीं करता. वहीं व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने रिपोर्ट को पूरी तरह गलत बताया. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ हफ्ते पहले अमेरिकी प्रशासन और ईरान के बीच युद्धविराम और बातचीत को लेकर चर्चा चल रही थी. उस दौरान इजराइल को बातचीत की पूरी जानकारी नहीं मिल रही थी. ऐसे में इजराइल ने क्षेत्रीय नेताओं और राजनयिकों के जरिए जानकारी जुटाने की कोशिश की.

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि सहयोगी देशों के बीच भी खुफिया जानकारी जुटाना आम बात है, लेकिन इजराइल की गतिविधियों को लेकर इस बार ज्यादा चिंता जताई गई है. इसी कारण इजराइल जाने वाले अमेरिकी अधिकारियों और राजनयिकों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.

बर्नर फोन, क्लीन लैपटॉप और सख्त नियम

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई अमेरिकी अधिकारी इजराइल में बर्नर फोन (अस्थायी मोबाइल फोन) और क्लीन लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उनकी संवेदनशील जानकारी सुरक्षित रहे. वे होटल के कमरों में महत्वपूर्ण या गोपनीय बातचीत करने से भी बचते हैं. एक सीनियर अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि इजराइल खुफिया जानकारी जुटाने में काफी आक्रामक माना जाता है, इसलिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं.

रिपोर्ट में पुराने मामलों का भी जिक्र किया गया है. 1980 के दशक में अमेरिकी खुफिया एनालिस्ट जोनाथन पोलार्ड को इजराइल को सीक्रेट दस्तावेज देने के मामले में 30 साल की जेल हुई थी. वहीं 2013 में एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों से यह भी सामने आया था कि अमेरिका खुद अपने सहयोगी देशों की जासूसी करता है और उनसे जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाता है.

मनीला में भारत-फिलीपींस व्यापार एवं निवेश संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक, आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत-फिलीपींस व्यापार एवं निवेश संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक आज 5 जून, 2026 को फिलीपींस के मनीला में आयोजित की गई। बैठक की सह-अध्यक्षता वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव श्री अमित वर्मा और फिलीपींस के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समूह के व्यापार एवं उद्योग विभाग के अवर सचिव एलन बी. गेप्टी ने की। संबंधित मंत्रालयों, विभागों और संगठनों के प्रतिनिधि भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इसमें शामिल हुए।

दोनों पक्षों ने भारत और फिलीपींस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में बढोतरी को सराहा जो 2025-26 में 3.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और अच्‍छी प्रगति का संकेतक है। बातचीत में द्विपक्षीय व्यापार और निवेश रुझान, प्राथमिकता वाले उत्पादों और सेवाओं की पहचान तथा विभिन्न क्षेत्रों में संवर्धन गतिविधियों और सहयोग पर चर्चा हुई। बैठक में फिल्म, ऊर्जा, निर्माण और अवसंरचना, सूचना प्रौद्योगिकी/ सूचना और संचार प्रौद्योगिकी/व्यावसायिक प्रक्रिया प्रबंधन/आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और औषधि जैसे विविध क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर बातचीत हुई। दोनों पक्ष इन क्षेत्रों में गहन सहयोग से दीर्घकालिक लाभ प्राप्‍त करने पर सहमत हुए। उन्‍होंने माना कि इससे दोनों देश अधिक प्रभावी तरीके से अपने विकास लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे और पारस्परिक सहयोग ढांचा मजबूत होगा।

बातचीत में व्यापार सुगमता के लिए कारोबारी माहौल में सुधार भी अन्‍य प्रमुख मुद्दा रहा। सीमा शुल्क सहयोग और इस सुगम बनाने, कृषि क्षेत्र में सहयोग और विशिष्ट उत्पादों के लिए बाजार पहुंच तथा राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार जैसे विषय शामिल रहे।

बैठक में आसियान-भारत व्यापार समझौते की समीक्षा शीघ्र संपन्‍न करने और उसके बाद भारत-फिलीपींस के बीच द्विपक्षीय प्राथमिकता व्यापार समझौते पर बातचीत पर भी चर्चा हुई।

बैठक में द्विपक्षीय आर्थिक संबंध सुदृढ बनाने के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया गया।  दोनों देशों ने अधिक सक्रिय और परस्‍पर लाभकारी साझेदारी प्रतिबद्धता की पुष्टि की।

14वें संयुक्त कार्य समूह की बैठक से इतर दौरान 4 जून को फिलीपींस में कार्यगत भारतीय व्यवसायियों के साथ एक संवाद सत्र भी आयोजित किया गया। इसमें व्यापार, निवेश, बाजार अवसरों और भारत-फिलीपींस वाणिज्यिक संबंधों को और गहन बनाने के उपायों पर चर्चा हुई।

भारत-फिलीपींस व्यापार एवं निवेश संयुक्त कार्य समूह की अगली बैठक नई दिल्ली में आयोजित होगी। भारत-फिलीपींस व्यापार और निवेश संयुक्त कार्य समूह माल और सेवा क्षेत्र में व्‍यापार संवर्धन तथा निवेश संबंधों को मजबूत करने पर विशेष बल के साथ ही दोनों देशों के लिए वैश्विक, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय घटनाक्रमों पर विचार साझा करने का मंच भी रहा है।

ईरान युद्द और होर्मुज स्ट्रेट बढ़ते खतरे के बाद खाड़ी देश तेल निर्यात के लिए कर रहे है नए रस्ते तैयार

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

ईरान-होर्मुज संकट के बीच खाड़ी देशों ने तेल निर्यात के वैकल्पिक रास्तों पर तेज किया काम, अरबों डॉलर के निवेश की तैयारी

ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) पर बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के बीच खाड़ी देशों ने ऊर्जा निर्यात के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित करने की दिशा में बड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), इराक, ओमान और कुवैत तेल एवं गैस आपूर्ति को सुरक्षित बनाए रखने के लिए नई पाइपलाइन परियोजनाओं, रेल कॉरिडोर और विशाल ऊर्जा भंडारण केंद्रों में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य किसी कारणवश बाधित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए खाड़ी देश अपनी निर्यात व्यवस्था को अधिक लचीला और सुरक्षित बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

होर्मुज पर निर्भरता कम करने की कोशिश

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रतिदिन करोड़ों बैरल कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है। दशकों से खाड़ी देशों का अधिकांश तेल निर्यात इसी समुद्री मार्ग के जरिए एशिया, यूरोप और अन्य वैश्विक बाजारों तक पहुंचता रहा है।

हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस मार्ग की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इसके चलते क्षेत्र के देशों ने वैकल्पिक बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है।

यूएई की नई वेस्ट-टू-ईस्ट पाइपलाइन योजना

संयुक्त अरब अमीरात ने अबू धाबी से फुजैरा तक नई वेस्ट-टू-ईस्ट क्रूड ऑयल पाइपलाइन परियोजना को गति दी है। फुजैरा बंदरगाह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित है, जिससे तेल को सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जा सकेगा।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद यूएई की तेल निर्यात क्षमता वर्ष 2027 तक लगभग दोगुनी हो सकती है। इसके अतिरिक्त यूएई ऐसी नई पाइपलाइन पर भी विचार कर रहा है, जिसके माध्यम से केवल कच्चा तेल ही नहीं बल्कि पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन जैसे परिष्कृत उत्पादों का भी परिवहन किया जा सके।

कुवैत-सऊदी-यूएई ऊर्जा कॉरिडोर पर चर्चा

कुवैत, सऊदी अरब और यूएई के बीच एक संभावित पाइपलाइन कॉरिडोर पर भी बातचीत जारी है। इस परियोजना का उद्देश्य कुवैत के तेल को पाइपलाइन के माध्यम से सऊदी अरब या यूएई के बंदरगाहों तक पहुंचाना है, जहां से उसे वैश्विक बाजारों में निर्यात किया जा सके।

हालांकि परियोजना का अंतिम मार्ग अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन इसे क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इराक तैयार कर रहा नए निर्यात मार्ग

इराक भी होर्मुज पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक निर्यात नेटवर्क विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके तहत बसरा से जॉर्डन के अकाबा बंदरगाह तक एक नई पाइपलाइन प्रस्तावित है, जिसकी क्षमता लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जा रही है।

इसके अलावा इराक बसरा से ओमान के दुक्म बंदरगाह तक एक अन्य पाइपलाइन विकल्प पर भी विचार कर रहा है। यह मार्ग इराकी तेल को सीधे समुद्री निर्यात केंद्रों तक पहुंचाने में मदद करेगा। साथ ही, इराक और तुर्किये के बीच मौजूद किर्कुक-जेहान पाइपलाइन को भी पुनर्जीवित और आधुनिक बनाने का कार्य जारी है।

ओमान बन सकता है क्षेत्रीय ऊर्जा हब

ओमान अपने रणनीतिक बंदरगाहों को तेल और गैस भंडारण तथा निर्यात के बड़े केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। कुवैत और ओमान के बीच होर्मुज के बाहर नई स्टोरेज सुविधाएं स्थापित करने को लेकर भी चर्चा चल रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये योजनाएं सफल होती हैं तो संकट की स्थिति में खाड़ी देशों को निर्यात जारी रखने के लिए मजबूत वैकल्पिक आधार मिल सकेगा।

गैस परिवहन के नए विकल्पों की तलाश

प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में अभी किसी नई परियोजना की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन लंबे समय से प्रस्तावित गल्फ रेलवे प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर गंभीर चर्चा चल रही है। यह रेल नेटवर्क पेट्रोलियम उत्पादों और ऊर्जा सामग्री के परिवहन में सहायक हो सकता है।

इसके अलावा कतर से सऊदी अरब, जॉर्डन और तुर्किये तक गैस पाइपलाइन विकसित करने के विचार पर भी चर्चा जारी है। यदि यह परियोजना साकार होती है तो खाड़ी क्षेत्र की गैस सीधे यूरोपीय बाजारों तक पहुंच सकेगी।

ऊर्जा सुरक्षा बना प्रमुख लक्ष्य

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी देशों का मुख्य उद्देश्य ऐसा बहु-आयामी नेटवर्क तैयार करना है, जो किसी भी भू-राजनीतिक संकट के दौरान तेल और गैस की आपूर्ति को बाधित न होने दे। इसके लिए पाइपलाइन, रेल नेटवर्क, भंडारण सुविधाएं और वैकल्पिक बंदरगाहों का विकास तेजी से किया जा रहा है।

आने वाले वर्षों में खाड़ी क्षेत्र में और भी नई पाइपलाइन तथा परिवहन परियोजनाओं की घोषणा होने की संभावना जताई जा रही है। इससे न केवल क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी अधिक स्थिरता मिल सकती है।