ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद – इसके मुख्य स्तंभों पर एक नज़र
नियंत्रित युद्ध की रणनीति
पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने बीती 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में बड़ी संख्या में निर्दोष पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इसके जवाब में भारत ने सावधानीपूर्वक चुने गए नौ लक्ष्यों के खिलाफ एक अभूतपूर्व और सटीक सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान में भारत की धरती पर हमलों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे प्रमुख आतंकवादी ढांचों को नष्ट कर दिया गया। भारत ने आम नागरिकों को नुकसान से बचाने का प्रयास किया, जबकि इसके उलट पाकिस्तान ने नागरिकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर स्थिति को और भड़काया। उसके ये प्रयास असफल रहे और भारत ने पाकिस्तान में आतंकवादी नेटवर्क का समर्थन करने वाले महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों पर प्रभावी जवाबी कार्रवाई की।
भारत ने केवल चार दिनों के भीतर ही अपने उद्देश्यों को हासिल कर लिया। स्थापित सैन्य चैनलों के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा किए गए युद्धविराम के अनुरोध को भारत ने स्वीकार कर लिया। किसी भी प्रकार की गलत जानकारी या बाद में किए गए फेरबदल के प्रयास इस तथ्य को नहीं बदल सकते कि भारत ने नियंत्रित युद्ध का प्रदर्शन करते हुए सैन्य जीत हासिल की, जो कि बहुत कम देखने को मिलती है।
इतिहास में ऐसे लंबे युद्धों के कई उदाहरण हैं, जिनसे बाहर निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी। इनमें पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका रूस-यूक्रेन संघर्ष, और वियतनाम व अफगानिस्तान जैसे लंबे समय तक चले युद्ध शामिल हैं, जिन्होंने दशकों तक नुकसान, क्षेत्रीय अस्थिरता और आर्थिक अव्यवस्था पैदा की। यहां तक कि दक्षिण एशिया में जारी संघर्ष की भी भारी कीमत केवल लड़ने वाले पक्ष ही नहीं, बल्कि वैश्विक समुदाय को भी चुकानी पड़ती है। इसके विपरीत, भारतीय नेतृत्व के दृढ़ संकल्प और सैन्य पेशेवर दक्षता के कारण ऑपरेशन सिंदूर एक अंतहीन युद्ध बनने से बच गया।
पाकिस्तान की नींव पर प्रहार
पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत की जवाबी कार्रवाई अत्यंत प्रभावशाली रही। भारत ने एक समन्वित अभियान के तहत पाकिस्तान के भीतर गहराई तक हमला किया और पाकिस्तान व पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में मौजूद महत्वपूर्ण आतंकवादी लॉन्च पैड्स को निशाना बनाकर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। पीओजेके से लेकर पंजाब के सियालकोट और बहावलपुर जैसे स्थानों तक किए गए हमलों ने भारत की पहुंच और सटीकता को प्रदर्शित किया। नूर खान और सरगोधा एयरबेस जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले कर यह संदेश दिया गया कि पाकिस्तान में कोई भी आतंकवादी सुरक्षित ठिकाना भारत की पहुंच से बाहर नहीं है।
इन हमलों का पैमाना और सटीकता अभूतपूर्व थी। इनमें यूसुफ अज़हर, अब्दुल मलिक रऊफ और मुदासिर अहमद सहित 100 से अधिक आतंकवादियों को समाप्त कर दिया गया।
कम लागत में अधिक प्रभाव
ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान की परमाणु धमकी के दावों को गलत साबित कर दिया। यूक्रेन या गाज़ा जैसे संघर्षों के विपरीत, जहां व्यापक विनाश हुआ है, इस अभियान में पाकिस्तान के आतंकवादी और सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा, जबकि भारत में इसका प्रभाव लगभग नगण्य रहा। दुनिया की नजरों में भारत की एकीकृत वायु कमान एवं नियंत्रण प्रणाली (IACCS), विशेष रूप से स्वदेशी ‘आकाशतीर’ सिस्टम ने पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमलों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर महत्वपूर्ण ठिकानों की रक्षा की।
भारत में आर्थिक व्यवधान बहुत कम रहा। विरोधी पर भारी कीमत थोपते हुए अपने क्षेत्र पर प्रभाव को सीमित रखने का यह अंतर भारत की सावधानीपूर्ण योजना, तकनीकी क्षमता और सटीक क्रियान्वयन को दर्शाता है। भारतीय वायुसेना ने राफेल विमान, SCALP मिसाइल और हैमर बम का उपयोग करते हुए पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली को निष्क्रिय कर मिशन को मात्र 23 मिनट में पूरा कर लिया।
10 मई को भारत ने कार्रवाई का दायरा बढ़ाते हुए 11 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और उनकी क्षमताओं को कमजोर कर दिया। भारत एक ही अभियान में किसी परमाणु हथियार संपन्न देश के 11 एयरबेस को निशाना बनाने वाला पहला देश बन गया। इस अभियान में पाकिस्तान वायुसेना की लगभग 20% संपत्तियां नष्ट हो गईं। भोलारी एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचा।
साझेदारी, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण (JAI)
ऑपरेशन सिंदूर ने साझेदारी, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण का स्पष्ट प्रदर्शन किया। वायुसेना ने समुद्री दबाव बनाए रखा, जबकि थलसेना और वायुसेना ने मिलकर आतंकवादी और सैन्य ठिकानों पर समन्वित हमले किए। इस अभियान ने 2019 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के गठन और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने जैसे सुधारों को भी प्रमाणित किया। रक्षा उत्पादन 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1,54,000 करोड़ रुपये हो गया।
ड्रोन आयात पर प्रतिबंध और PLI योजना जैसी नीतियों ने घरेलू अनुसंधान को बढ़ावा दिया। आज 75% रक्षा खरीद घरेलू स्रोतों से हो रही है और 25% रक्षा अनुसंधान निजी क्षेत्र के लिए आरक्षित है। लगभग 90% गोला-बारूद का स्वदेशीकरण हो चुका है और 2027-28 तक पूर्ण स्वदेशीकरण की उम्मीद है। ब्रह्मोस, आकाश, तेजस और एंटी-ड्रोन प्लेटफॉर्म जैसी प्रणालियों ने भारत की क्षमता को और मजबूत किया।
राजनीतिक इच्छाशक्ति: सफलता की कुंजी
सैन्य सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। पिछले एक दशक में भारत ने आतंकवाद के जवाब में संतुलित सैन्य विकल्प अपनाने की नीति को मजबूत किया है। नेतृत्व ने सोच-समझकर जोखिम उठाने और आतंकवादियों को जहां भी हों, वहीं निशाना बनाने की प्रतिबद्धता दिखाई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लिए गए निर्णय—चाहे सिंधु जल संधि को स्थगित करना हो या संतुलित सैन्य कार्रवाई—सभी योजनाबद्ध और रणनीतिक रहे हैं। इसका उद्देश्य स्पष्ट रहा है: आतंकवादियों और उनके समर्थक ढांचे को कहीं भी निशाना बनाना।
समग्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण
ऑपरेशन सिंदूर ने “संपूर्ण राष्ट्र” दृष्टिकोण को प्रदर्शित किया, जिसमें सशस्त्र बलों, सरकार और निजी क्षेत्र के बीच समन्वय स्थापित किया गया। स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों ने ड्रोन और काउंटर-यूएएस सिस्टम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसरो ने सैटेलाइट आधारित निगरानी प्रदान की, जबकि गलत सूचना से निपटने और जनसंचार प्रबंधन के लिए विशेष प्रयास किए गए।
सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने के लिए विपक्षी दलों को साथ लेकर विभिन्न देशों में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीतिक एकता कितनी आवश्यक है।
( इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के महानिदेशक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

