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सोमनाथ से सिंदूर तक: पुनरुत्थानशील भारत की भावना

75 वर्ष पहले किया गया भव्य सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा भारत के
सभ्यतागत गौरव की पुनर्स्थापना का निर्णायक क्षण था। इसने भारत की उस दृढ़ता और
संकल्प को पुनः स्थापित किया, जो प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’
मिशन का मूल आधार है।
इस पवित्र उपलब्धि की 75वीं वर्षगांठ राष्ट्र को भारतीय सभ्यता की मजबूत नींव और शक्ति
पर सर्वोच्च विश्वास प्रदान करती है, जो 1,000 वर्षों तक कट्टरपंथियों द्वारा मंदिर पर किए
गए भीषण हमलों को झेलने के बाद भी और अधिक सशक्त होकर उभरी।
गुजरात के शांत समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर हर आक्रमण के बाद खंडहरों से अपनी पूरी
भव्यता के साथ फिर उठ खड़ा हुआ। कई मायनों में इसका इतिहास भारत के अतीत का
प्रतिबिंब है, जहाँ हमारे शांतिप्रिय लोगों ने अपनी आस्था, संस्कृति और विरासत पर हुए क्रूर
हमलों के बाद फिर से मजबूती से वापसी की।
जैसा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा, जिस प्रकार सोमनाथ को नष्ट करने के लिए बार-बार
षड्यंत्र और प्रयास हुए, उसी प्रकार विदेशी आक्रमणकारियों ने सदियों तक भारत को समाप्त
करने की कोशिश की। फिर भी न तो यह पूजनीय तीर्थ नष्ट हुआ और न ही भारत।
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि सोमनाथ पर हमलों का उद्देश्य लूटपाट से ज़्यादा खतरनाक
था। उन्होंने कहा, “यदि हमले केवल लूट के लिए होते, तो एक हजार वर्ष पहले हुई पहली
बड़ी लूट के बाद ही रुक गए होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोमनाथ की पवित्र मूर्ति को
अपवित्र किया गया, मंदिर के स्वरूप को बार-बार बदला गया। और हमें यह सिखाया गया
कि सोमनाथ को केवल लूट के लिए नष्ट किया गया था। घृणा, उत्पीड़न और आतंक का यह
क्रूर इतिहास हमसे छिपाया गया।”
नेहरू का विरोध- स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण के मिशन का
नेतृत्व किया। यह नवस्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय आत्मविश्वास की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में से
एक था। लेकिन इस प्रयास की राह में भी मुश्किलें आईं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री

जवाहरलाल नेहरू ने इसके ऐतिहासिक लोकार्पण समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र
प्रसाद के शामिल होने का औपचारिक तौर पर विरोध किया। इसके बावजूद राष्ट्रपति ने 11
मई 1951 को मंदिर का लोकार्पण किया।
सदियों के क्रूर उत्पीड़न के बाद इस पुनर्निर्माण ने भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और
सभ्यता पर गर्व के बीज बोए। काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के
पुनरुद्धार से लेकर अयोध्या में भव्य राम मंदिर तक; केदारनाथ के पुनर्जीवन से लेकर असंख्य
धरोहर स्थलों के संरक्षण तक — भारत अपनी सभ्यता की कहानी को गरिमा और उद्देश्य के
साथ पुनः स्थापित कर रहा है। इन प्रयासों से पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है और स्थानीय
लोगों के लिए रोजगार एवं व्यापार के अनेक अवसरों का सृजन हो रहा है।
वैश्विक पहचान- सोमनाथ की ही भांति भारत भी और अधिक सशक्त होकर उभरा है। यह
विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ अपनी समृद्ध विरासत
और आधुनिकता के अद्वितीय संगम के लिए वैश्विक पहचान बना रहा है। 2014 में जब देश
भारी बहुमत से मोदी सरकार को सत्ता में लाया, तो संयुक्त राष्ट्र महासभा ने रिकॉर्ड 175
देशों के समर्थन से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव पारित किया। योग आज एक
वैश्विक वेलनेस मुहिम बन चुका है, जिसने दुनिया की सभी संस्कृतियों के लोगों को लाभ
पहुंचाया है।
एक दशक बाद, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने पश्चिम एशिया में संयुक्त अरब अमीरात सरकार
द्वारा उपहार में दी गई भूमि पर बने एक भव्य मंदिर का लोकार्पण किया। इससे पहले,
प्रधानमंत्री ने बहरीन में 200 वर्ष पुराने मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य का शुभारंभ किया था।
वह नियमित रूप से प्रवासी भारतीयों से संवाद करते हैं जिससे वे भारतीय सांस्कृतिक
विरासत का गौरवशाली दूत बन जाते हैं।
आयुष और योग का वैश्वीकरण-भारत की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देना और
पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जुड़े पेशेवरों के लिए वैश्विक अवसरों का सृजन करना, हाल के
वर्षों में भारत द्वारा विकसित देशों के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का
महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। हमारे कारीगरों, श्रमिकों, किसानों, मछुआरों, छोटे व्यवसायों और
स्टार्टअप्स के लिए लाभकारी वैश्विक अवसरों का सृजन करने के साथ-साथ ये समझौते
प्रधानमंत्री के “विकास भी, विरासत भी” के विजन को आगे बढ़ाते हैं।
हाल ही में न्यूजीलैंड के साथ संपन्न एफटीए पारंपरिक चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं
में भारत की वैश्विक पहुँच में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें आयुष चिकित्सकों और योग
प्रशिक्षकों के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक एवं ज्ञान-आधारित पेशेवरों को न्यूजीलैंड में
कार्य करने के लिए वीजा कोटा प्रदान किया गया है।
यह एफटीए आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा सेवाओं के व्यापार के लिए
अनुकूल वातावरण तैयार करता है तथा आयुष को समकालीन और वैश्विक रूप से प्रासंगिक
स्वास्थ्य समाधान के रूप में स्थापित करता है।

ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए व्यापार समझौतों में भी इसी प्रकार के
प्रावधान हैं। यूरोपीय संघ के साथ एफटीए आयुष चिकित्सकों को भारत में प्राप्त
व्यावसायिक योग्यता के आधार पर यूरोपीय देशों में सेवाएँ देने की अनुमति देगा। यह
यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में आयुष वेलनेस सेंटर और क्लीनिक बनाने में भी मदद करता
है।
नई चुनौतियों पर विजय-जहाँ एक ओर भारत की सांस्कृतिक विरासत दुनिया का ध्यान
आकृष्‍ट कर रही है, वहीं देश कट्टरपंथियों के निशाने पर बना हुआ है, जो आतंकवाद और
घुसपैठ के माध्यम से भारत की सामंजस्यपूर्ण विरासत को बिगाड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में नया भारत ऐसी चुनौतियों का ज़ोरदार जवाब देता है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से भारत ने आतंकवादियों और सीमा पार मौजूद उनके संरक्षकों
को करारा सबक सिखाया। हाल के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने
उन दलों को नकार दिया, जो घुसपैठियों का समर्थन कर रहे थे, वोट-बैंक की राजनीति कर
रहे थे और भारत की सांस्कृतिक विरासत को कमजोर कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि
ऑपरेशन सिंदूर और सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, दोनों की वर्षगांठ में कुछ ही दिनों का
अंतर है। ये दोनों ही भारत की दृढ़ता और शक्ति को दर्शाती हैं।
सोमनाथ की कहानी अंततः राजनीति से कहीं आगे है। यह एक ऐसी सभ्यता की दास्‍तान है,
जिसने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। अपने पुनर्निर्माण के 75 वर्ष बाद, आज सोमनाथ
केवल मंदिर नहीं, बल्कि भारत की दृढ़ता, निरंतरता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का कालजयी
प्रतीक बनकर खड़ा है।
(लेखक केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री हैं।)

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