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राज्यसभा में खरगे ने कार्यस्थलों पर जाति आधारित भेदभाव को लेकर जताई चिंता
नयी दिल्ली, 12 फरवरी (भाषा) कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने बृहस्पतिवार को कार्यस्थलों पर जाति आधारित भेदभाव को लेकर उच्च सदन में चिंता जताई और सरकार से ऐसे मामलों की समयबद्ध जांच का आग्रह किया। 
 शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए खरगे ने कहा कि ओडिशा में एक समुदाय के लोग अपने बच्चों को दलित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा बनाए गये भोजन का सेवन नहीं करने दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों के शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास की नींव हैं। उन्होंने कहा, “ऐसा भेदभाव बच्चों के विकास को प्रभावित करेगा और यह संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत दिए गए शिक्षा के अधिकार को भी प्रभावित करता है।”
खरगे ने कहा कि कार्यस्थलों पर जातिगत भेदभाव देश के कई हिस्सों में लगातार सामने आ रहा है। उन्होंने कहा, “यदि समय पर जांच की जाती, तो  ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था।” 
उन्होंने मध्यप्रदेश के एक मामले का भी जिक्र किया, जहां कुछ साल पहले एक व्यक्ति ने एक आदिवासी व्यक्ति पर कथित तौर पर पेशाब किया था। उन्होंने दावा किया कि गुजरात में पिछले साल एक दलित सरकारी अधिकारी ने जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी।
खरगे ने कहा कि ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जाति आधारित भेदभाव केवल सामाजिक और राजनीतिक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यस्थलों में भी मौजूद है। ‘‘इसका प्रभाव लोगों की गरिमा, करियर में प्रगति और व्यक्तिगत सुरक्षा पर पड़ता है।’’
खरगे ने कहा कि किसी के भी खिलाफ जातिगत भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 का उल्लंघन है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाए और समयबद्ध जांच की जाए।
अनिल कपूर की फिल्म ‘सूबेदार’ पांच मार्च को प्राइम वीडियो पर होगी रिलीज

मुंबई, 11 फरवरी (भाषा) प्राइम वीडियो ने बुधवार को घोषणा की कि अनिल कपूर अभिनीत उसकी एक्शन-ड्रामा फिल्म ‘सूबेदार’ पांच मार्च को दुनियाभर में रिलीज होगी।
इस फिल्म को सुरेश त्रिवेणी द्वारा निर्देशित किया गया है। त्रिवेणी ने ‘तुम्हारी सुलु’, ‘जलसा’ और ‘दलदल’ जैसी दमदार फिल्में दी है। इस फिल्म का निर्माण विक्रम मल्होत्रा, कपूर और त्रिवेणी ने किया है।
इस फिल्म की कहानी सूबेदार अर्जुन मौर्य पर आधारित है। मौर्य एक सेवानिवृत्त सैनिक है जो बदलती दुनिया में शांति पाने के लिए संघर्ष कर रहा है जहां उन मूल्यों को लगातार चुनौती दी जा रही है जिनके साथ वह कभी जिया करता था।
प्राइम वीडियो, इंडिया के ओरिजनल्स के निदेशक और प्रमुख निखिल मधोक ने कहा, ” ‘सूबेदार’ एक्शन से भरपूर एक रोमांचक फिल्म होने के साथ-साथ यह पिता-पुत्री की एक बेहद भावुक कहानी भी है। इसमें अनिल कपूर ने जबरदस्त अभिनय किया है। वह एक ऐसे एक्शन हीरो की भूमिका में हैं, जिसे दर्शक फिल्म की शुरुआत से ही पसंद करने लगेंगे।”
उन्होंने कहा, “हमें ‘सूबेदार’ के लिए सुरेश त्रिवेणी, अनिल कपूर, विक्रम मल्होत्रा और पूरी टीम के साथ काम करने पर गर्व है। हम पांच मार्च को प्राइम वीडियो पर इसके विश्वव्यापी प्रीमियर के जरिए इसे भारत और दुनियाभर के दर्शकों के सामने लाने के लिए बेहद उत्साहित हैं।”
ओपनिंग इमेज फिल्म्स के पार्टनर और ‘सूबेदार’ के निर्माता विक्रम मल्होत्रा ने कहा कि इस फिल्म में एक ऐसा मुख्य किरदार है, जिसे पहले कभी नहीं देखा गया और जो सेवा, अनुशासन और त्याग से गढ़ा गया है।
फिल्म में राधिका मदान, सौरभ शुक्ला, आदित्य रावल, फैसल मलिक और मोना सिंह भी मुख्य भूमिकाओं में हैं।
भाषा प्रचेता नरेश

न्यायालय उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की मौत मामले में सेंगर की अपील पर 17 फरवरी को करेगा सुनवाई
नयी दिल्ली, 11 फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से निष्कासित नेता कुलदीप सेंगर और अन्य द्वारा अपनी सजा के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई 17 फरवरी के लिए सूचीबद्ध की।
 न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने उच्च न्यायालय को तीन महीने के भीतर अपीलों पर फैसला करने का निर्देश देने वाले उच्चतम न्यायालय के आदेश का संज्ञान लिया और कहा कि ‘‘अब इस मामले पर समयबद्ध तरीके से सुनवाई होगी।’’
 बहरहाल, न्यायाधीश ने बुधवार को सुनवाई स्थगित कर दी क्योंकि उन्हें सूचित किया गया था कि पीड़िता की वह याचिका उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ के समक्ष लंबित है जिसमें 10 साल की सजा को बढ़ाने का अनुरोध किया गया है। खंडपीठ इस पर मार्च में सुनवाई करेगी।
 सेंगर के वकील ने कहा कि शीर्ष न्यायालय के आदेश को देखते हुए पीड़िता को सजा बढ़ाने की याचिका पर शीघ्र सुनवाई के लिए याचिका दायर करनी चाहिए और अपील पर भी खंडपीठ द्वारा विचार किया जा सकता है।
 न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई 17 फरवरी को करने का निर्देश दिया ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके और कुलदीप सेंगर के भाई को दी गई अंतरिम जमानत तब तक के लिए बढ़ा दी गई।
 जयदीप सेंगर ने मुंह के कैंसर से पीड़ित होने के कारण अपनी अंतरिम जमानत को तीन महीने के लिए बढ़ाने का अनुरोध किया था।
 उच्च न्यायालय ने तीन जुलाई 2024 को जयदीप सेंगर को अंतरिम जमानत दी थी, जिसकी अवधि समय-समय पर बढ़ायी गयी।
 कुलदीप सेंगर को नाबालिग पीड़िता से बलात्कार का दोषी पाया गया और 20 दिसंबर, 2019 को उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
 सेंगर ने 2017 में पीड़िता का कथित तौर पर अपहरण किया और उससे दुष्कर्म किया था। उस वक्त वह नाबालिग थी।
 पीड़िता के पिता की 13 मार्च, 2020 को हिरासत में मौत के मामले में कुलदीप सेंगर और उसके भाई जयदीप सेंगर उर्फ ​​अतुल सिंह को निचली अदालत ने 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई और उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
 ऐसा आरोप है कि सेंगर और उसके भाई के इशारे पर लड़की के पिता को शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था और पुलिस की बर्बरता के कारण 9 अप्रैल, 2018 को हिरासत में उनकी मौत हो गयी थी।
 निचली अदालत ने कहा था कि परिवार के ‘‘इकलौते कमाने वाले सदस्य’’ की हत्या के लिए किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती।
 उच्चतम न्यायालय ने नौ फरवरी को दिल्ली उच्च न्यायालय से उन्नाव बलात्कार पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में कुलदीप सेंगर की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली याचिका पर समयबद्ध तरीके से सुनवाई करने को कहा था और यह भी कहा कि इस पर तीन महीने के भीतर फैसला किया जाए।
देहरादून में दिनदहाड़े एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या
देहरादून, 11 फरवरी (भाषा) देहरादून शहर के बीचोंबीच बुधवार को दिनदहाड़े एक व्यक्ति की स्कूटी सवार दो बदमाशों ने कथित तौर पर गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
दस दिन के भीतर हत्या की यह दूसरी वारादात है।
देहरादून के नगर पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार ने बताया कि यह घटना तिब्बती मार्केट के पास सुबह करीब साढ़े 10 बजे उस वक्त की है जब बसंत विहार क्षेत्र के इंदिरा नगर निवासी अर्जुन शर्मा (42) अपनी कार के पास खड़े थे।
उन्होंने बताया कि तभी स्कूटी पर सवार होकर आए दो बदमाशों ने उन पर गोली चला दी।
कुमार ने बताया कि शर्मा को दून अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया।
पुलिस ने बताया कि घटना की सूचना मिलते ही वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल का निरीक्षण करने पहुंचे और वहां मौजूद अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए।
अधिकारी के अनुसार, प्रारंभिक जांच में पता चला है कि अमरदीप गैस एजेंसी के मालिक शर्मा के परिवार में पारिवारिक व्यवसाय को लेकर विवाद था। 
उन्होंने बताया कि इसी विवाद के कारण शर्मा की मां ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय से यह हवाला देते हुए सुरक्षा हासिल की थी कि उन्हें अपने बेटे से जान का खतरा है।
 नगर पुलिस अधीक्षक ने बताया कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अजय सिंह ने तत्काल अलग-अलग टीम का गठन किया है और पूरे जिले में लगातार सघन जांच अभियान के निर्देश दिए हैं।
सिर्फ दस दिन के अंतराल में देहरादून शहर में यह दूसरी हत्या है। इससे पहले, दो फरवरी को मच्छी बाजार में एक युवक ने कथित तौर पर धारदार हथियार से गला रेतकर 22 वर्षीय युवती की हत्या कर दी थी।
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में सरकार ने ‘भारत माता’ को बेच दिया : राहुल गांधी
नयी दिल्ली, 11 फरवरी (भाषा) लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यह बराबरी की शर्त पर नहीं किया गया और ‘‘सरकार को शर्म आनी चाहिए कि उसने भारत माता को बेच दिया है’’।
 उन्होंने केंद्रीय बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए दावा किया कि भारत-अमेरिका समझौते में देश के किसानों के हितों को कुचल दिया गया, जैसा आज से पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया और आगे भी कोई नहीं करेगा।
  कांग्रेस नेता ने कहा कि बजट के समांतर अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हुआ है।
 राहुल गांधी ने कहा, ‘‘अमेरिका और चीन के बीच मुकाबले में सबसे महत्वपूर्ण बात भारत का डेटा है। अगर अमेरिका महाशक्ति बने रहना चाहता है और डॉलर की रक्षा करना चाहता है तो अमेरिकियों के लिए भारत का डेटा बहुत महत्वपूर्ण है।’’
 कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘कुछ लोग कहते हैं कि जनसंख्या त्रासदी है, लेकिन मैं कहता हूं कि यह ताकत है।’’
 राहुल गांधी ने कहा कि अगर विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन की सरकार होती और व्यापार समझौते की बात करती तो ‘‘हम अमेरिका के राष्ट्रपति से कहते कि आप के डॉलर की सुरक्षा करने की सबसे बड़ी पूंजी (डेटा) भारतीय लोगों के पास है।’’
 उन्होंने कहा, ‘‘हम बराबरी पर बात करते। हम कहते कि आप ऐसे बात नहीं कर सकते कि हम आपके नौकर हैं। हम अमेरिकी राष्ट्रपति से यह भी कहते कि हम अपने ईंधन की रक्षा करने जा रहे हैं। हम यह भी कहते हैं कि आप अपने किसानों की रक्षा करेंगे, लेकिन हम भी अपने किसानों की रक्षा करेंगे।’’
 कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत को पाकिस्तान के बराबर नहीं खड़ा किया जा सकता।
 उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पादों पर अमेरिका में शुल्क पहले तीन प्रतिशत के आसपास था, जो अब 18 प्रतिशत हो गया है यानी छह गुना बढ़ोतरी हो गई है।
 राहुल गांधी ने कहा, ‘‘वहीं, अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क 16 प्रतिशत से शून्य कर दिया गया।’’
 उन्होंने दावा किया, ‘‘अब यह होगा कि अमेरिका तय करेगा कि हम तेल किससे खरीदेंगे और भारत के प्रधानमंत्री मोदी फैसला नहीं करेंगे।’’
 उन्होंने दावा किया, ‘‘हमारे किसान तूफान का सामना कर रहे हैं...आपने हमारे किसानों को कुचले जाने का रास्ता खोला है। आपसे पहले किसी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया और आगे भी कोई प्रधानमंत्री नहीं करेगा।’’
 उन्होंने आरोप लगाया कि इस समझौते में ‘‘भारत को बेच दिया गया, मां (मदर) को बेच दिया गया, भारत माता को बेच दिया गया, जिस पर सरकार को शर्म आनी चाहिए।’’
 नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि ‘‘हमें अपने लोगों, डेटा, खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा तंत्र की सुरक्षा करनी होगी।’’
 उन्होंने कहा कि बजट में इस बात को माना गया है कि ऊर्जा और वित्त को दुनियाभर में हथियार बनाया जा रहा है, लेकिन इस बारे में बजट में किसी कदम का उल्लेख नहीं है।
AI कैसे बदल सकता है भारत के किसानों की तकदीर

लेखिका: सुश्री रुबल चिब, सह-संस्थापक, क्यूज़ेंस लैब्स

भारत में अब एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर चर्चा सिर्फ नई तकनीक के रूप में नहीं हो रही है। ध्यान इस बात पर जा रहा है कि एआई आम लोगों की असली समस्याएँ कैसे हल कर सकता है। खेती और खाद्य क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, क्योंकि यहाँ समस्याएँ छोटी नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था से जुड़ी हैं। यहाँ कोई भी तकनीक तभी सफल होगी जब वह मौसम, ढुलाई और बाज़ार जैसी स्थानीय परिस्थितियों को समझे।

भारत इतना भोजन पैदा करता है कि पूरी आबादी का पेट भर सके, फिर भी हर साल करीब 6.8 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। कटाई के बाद 35 से 40 प्रतिशत फल और सब्जियाँ खराब हो जाती हैं। यह समस्या उत्पादन की कमी की नहीं, बल्कि सही समय पर सही जानकारी और बेहतर व्यवस्था न होने की है। यानी खेत से बाज़ार तक तालमेल की कमी है और फैसले समय पर नहीं हो पाते। ऐसे में भारतीय परिस्थितियों के अनुसार बनाया गया एआई इस नुकसान को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

क्यूज़ेंस लैब्स में हमने इस बात पर गौर किया कि भारत की डिजिटल व्यवस्था ने भुगतान, पहचान और सेवाओं को बदल दिया है, लेकिन खाने के क्षेत्र में गुणवत्ता की जाँच अब भी पुराने तरीकों से होती है। इसी सोच के साथ हमने QScan नाम की एआई तकनीक विकसित की, जो इन्फ्रारेड तकनीक और कृत्रिम सूंघने की मदद से फल-सब्जियों की अंदर की गुणवत्ता पहचानकर तुरंत काम आने वाली जानकारी देती है। उदाहरण के तौर पर कोई फल या सब्जी कितने दिन तक चल सकती है कितने दिन स्टोर कर सकते हैं इत्यादि। इसका मकसद कम मुनाफे पर काम करने वाले किसानों, दुकानदारों और ग्राहकों की उलझन कम करना है।

अनुभव बताते हैं कि एआई तभी सफल होगा जब वह भारत की वास्तविक परिस्थितियों को समझे। विदेशों के डेटा पर बने मॉडल भारत जैसे विविध देश में अक्सर सही काम नहीं करते, क्योंकि हर क्षेत्र में फसल, मौसम, भंडारण और बाज़ार अलग हैं। अगर एआई भारतीय हालात को नहीं समझेगा, तो वह बेकार साबित हो सकता है या गलत नतीजे भी दे सकता है। इसी कारण स्वदेशी एआई पर जोर देना समय की जरूरत है। सरकार की IndiaAI Mission पहल दिखाती है कि अब एआई को सिर्फ उन्नत तकनीक नहीं, बल्कि देश के विकास का जरूरी साधन माना जा रहा है। भारतीय डेटा, देश में बने समाधान और अलग-अलग क्षेत्रों के लिए खास तकनीक को बढ़ावा देकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ नवाचार सीधे लोगों की जरूरतों से जुड़ा हो।

खाद्य और खेती का क्षेत्र बताता है कि यह क्यों जरूरी है। अगर कटाई के बाद होने वाला नुकसान कम हो जाए, तो किसानों की आय बढ़ेगी, खाने की कीमतें स्थिर रहेंगी और पानी, जमीन और ऊर्जा की बचत होगी। इससे पर्यावरण को भी फायदा मिलेगा और पूरी व्यवस्था ज्यादा मजबूत बनेगी। एक और जरूरी पहलू है सबकी भागीदारी। एआई ऐसा होना चाहिए जो छोटे किसानों, स्थानीय भाषाओं और छोटे बाज़ारों में भी आसानी से काम कर सके। जो तकनीक लोगों पर फैसले थोपेगी, उस पर भरोसा नहीं बनेगा। लेकिन जो तकनीक छिपी जानकारी को आसान तरीके से सामने लाकर बेहतर फैसले लेने में मदद करेगी, वही लंबे समय तक टिकेगी और फैल सकेगी।

16 से 20 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में होने वाला India AI Impact Summit ऐसे समय पर हो रहा है जब दुनिया एआई के असर पर गंभीर चर्चा कर रही है। भारत के पास मौका है कि वह ऐसा रास्ता दिखाए जहाँ एआई आम लोगों के काम आए, स्थानीय जरूरतों को समझे और असली आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा हो। खेती, खाद्य आपूर्ति और जलवायु से जुड़ी चुनौतियाँ इस दिशा के केंद्र में हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि एआई अपने-आप बदलाव नहीं लाता। इसके लिए सही समझ, सही नीति और मिलकर काम करना पड़ता है। लेकिन जब इसे सही तरीके से अपनाया जाता है, तो यह बिना शोर किए बड़े बदलाव ला सकता है।

इम्पैक्ट समिट के मद्देनजर असली चुनौती एआई को तेजी से अपनाने की नहीं, बल्कि सोच-समझकर सही जगह इस्तेमाल करने की है। आख़िर में सफलता का असली पैमाना यही होना चाहिए कि क्या एआई से भोजन की बर्बादी कम होती है, क्या किसानों की आय बढ़ती है और क्या देश की व्यवस्था मजबूत होती है।

नरवणे ने अपनी किताब का लिंक 2023 में साझा किया था, वह झूठ नहीं बोलेंगे: राहुल
नयी दिल्ली, 10 फरवरी (भाषा) लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की पुस्तक को लेकर एक प्रकाशक ने इसके प्रकाशित नहीं होने की बात की है, लेकिन खुद नरवणे ने 2023 में एक टवीट् करके अपनी पुस्तक को खरीदने की अपील करते हुए एक लिंक साझा किया था।
 राहुल ने संसद परिसर में संवाददाताओं से कहा कि उन्हें नरवणे की बात पर भरोसा है तथा उनकी किताब में कुछ ऐसी बाते हैं जो सरकार तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को असहज कर सकती हैं।
   दिल्ली पुलिस ने नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के मामले में प्राथमिकी दर्ज की है।
  उसने सोमवार को एक बयान में कहा था, ‘‘दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया मंच और ऑनलाइन समाचार मंचों पर प्रसारित हो रही उन सूचनाओं का संज्ञान लिया है जिनमें दावा किया गया है कि 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' नामक पुस्तक की एक प्रति सक्षम अधिकारियों से अनिवार्य मंजूरी के बिना प्रसारित की जा रही है।’’
राहुल गांधी ने इसी संदर्भ में कहा, ‘‘नरवणे का एक ट्वीट है जिसमें उन्होंने कहा है, “मेरी किताब का लिंक फ़ॉलो कीजिए। अब या तो नरवणे झूठ बोल रहे हैं, या ‘पेंगुइन’ (प्रकाशक) झूठ बोल रहा है। मुझे नहीं लगता कि पूर्व थलसेना प्रमुख झूठ बोलेंगे। पेंगुइन कहता है कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन किताब अमेजन पर उपलब्ध है। जनरल नरवणे ने 2023 में ट्वीट किया है कि कृपया मेरी किताब ख़रीदिए। मैं पेंगुइन के बजाय नरवणे जी पर भरोसा करता हूं।’’
 उन्होंने सवाल किया कि क्या पेंगुइन पर नरवणे से ज़्यादा भरोसा किया जा सकता है?
     राहुल गांधी ने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि नरवणे जी ने अपनी किताब में कुछ ऐसे बयान दिए हैं जो भारत सरकार और प्रधानमंत्री के लिए असुविधाजनक हैं। स्पष्ट है कि आपको यह तय करना होगा कि पेंगुइन सच बोल रहा है या पूर्व थलसेना प्रमुख।’’
      कांग्रेस नेता ने एक पोस्टर भी दिखाया, जिसमें भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का उल्लेख करते हुए यह दर्शाया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने झुक गए।
सीगल इंडिया को 1,700 करोड़ रुपये की 220 मेगावाट सौर परियोजना का मिला ठेका
 नयी दिल्ली, 10 फरवरी (भाषा) सीगल इंडिया को रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड से बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (बीईएसएस) से जुड़ी 220 मेगावाट की सौर परियोजना का ठेका मिला है। इसकी अनुमानित लागत 1,700 करोड़ रुपये है।
 कंपनी ने मंगलवार को बयान में कहा कि यह परियोजना शुल्क आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिये हासिल की गई।
 सीगल इंडिया लिमिटेड को मध्य प्रदेश के मुरैना सोलर पार्क में यूनिट-1 (220 मेगावाट) के विकास के लिए रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड (आरयूएमएसएल) से नौ फरवरी 2026 का आशय पत्र (एलओए) मिला।
 परियोजना के लिए उद्धृत शूल्क 2.70 रुपये प्रति यूनिट है जबकि अनुमानित परियोजना मूल्य (जीएसटी सहित) करीब 1,700 करोड़ रुपये है।
 इस परियोजना की निर्माण अवधि 24 महीने और इसके बाद परिचालन अवधि 25 वर्ष की होगी।
 कंपनी ने कहा कि इस परियोजना से मध्य प्रदेश की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है और यह भारत के व्यापक स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन लक्ष्यों को समर्थन देगी।
 सीगल इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रमनीक सहगल ने कहा, ‘‘ यह परियोजना स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में हमारी मौजूदगी को मजबूत करती है। हम भारत के ऊर्जा बदलाव तथा कार्बन मुक्त उद्देश्यों के अनुरूप इसे कुशलता से पूरा करने को प्रतिबद्ध हैं।’’
दिन में दो-तीन कप कॉफी पीने से वृद्धावस्था में कम हो सकता है डिमेंशिया का खतरा
(ईफ़ होजेनवोर्स्ट, लफबरो यूनिवर्सिटी)  
लफबरो (ब्रिटेन), 10 फरवरी (द कन्वरसेशन) वैज्ञानिकों ने पाया है कि दिन में दो से तीन कप कॉफी पीने से डिमेंशिया होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है, लेकिन इससे अधिक मात्रा में कॉफी पीने से मस्तिष्क को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता।
एक व्यापक अध्ययन में 1,31,821 अमेरिकी नर्सों और स्वास्थ्य पेशेवरों को शामिल किया गया, जिनके स्वास्थ्य पर शुरुआती 40 साल की उम्र से लेकर 43 वर्षों तक नजर रखी गई। इस अवधि में 11,033 लोगों यानी करीब आठ प्रतिशत में डिमेंशिया हुआ। हालांकि, सीमित मात्रा में कैफीनयुक्त कॉफी या चाय पीने वालों में डिमेंशिया होने की संभावना कम पाई गई।
अध्ययन के अनुसार, 75 वर्ष या उससे कम आयु के लोगों में इसका प्रभाव सबसे अधिक देखा गया। रोजाना करीब 250-300 मिलीग्राम कैफीन (लगभग दो से तीन कप कॉफी) लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम 35 प्रतिशत तक कम पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे अधिक कैफीन लेने से कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिला।
अध्ययन में शामिल महिलाओं ने बताया कि शुरुआत में वे प्रतिदिन औसतन साढ़े चार कप कॉफी या चाय पीती थीं, जबकि पुरुषों के लिए कॉफी की औसत खपत ढाई कप थी। अधिक कैफीन लेने वाले प्रतिभागी अपेक्षाकृत कम उम्र के थे, लेकिन वे शराब का अधिक सेवन करते थे, धूम्रपान करते थे और अधिक कैलोरी लेते थे, जो डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं।
शोध में यह भी पाया गया कि कैफीन रहित कॉफी पीने वालों में स्मृति क्षय तेज़ी से हुआ। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लोग नींद की समस्या, उच्च रक्तचाप या हृदय संबंधी उन समस्याओं के बाद कैफीन रहित कॉफी की ओर रुख करते हैं, जो स्वयं संज्ञानात्मक गिरावट से जुड़ी हैं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि कैफीन मस्तिष्क में उस एडेनोसिन नामक रसायन को अवरुद्ध करता है, जो डोपामिन और एसिटाइलकोलाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर की गतिविधि को दबाता है। उम्र बढ़ने और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों में ये न्यूरोट्रांसमीटर कम सक्रिय हो जाते हैं और कैफीन इस गिरावट को कुछ हद तक रोक सकता है।
अध्ययन में यह भी कहा गया कि अधिक मात्रा में कैफीन लेने से नींद प्रभावित हो सकती है और चिंता बढ़ सकती है, जिससे मस्तिष्क को होने वाले लाभ कम हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 1908 में प्रतिपादित यर्क्स-डॉडसन नियम का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक उत्तेजना मस्तिष्क को कमजोर कर सकती है।
अन्य 38 अध्ययनों के विश्लेषण में भी समान परिणाम सामने आए, जिनके अनुसार कैफीन लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम, कैफीन न लेने वालों की तुलना में छह से 16 प्रतिशत तक कम पाया गया। इस व्यापक विश्लेषण में एक से तीन कप कॉफी को सबसे उपयुक्त मात्रा बताया गया।
शोधकर्ताओं ने हालांकि कहा कि ‘कप’ की मात्रा अलग-अलग हो सकती है और कॉफी में कैफीन की मात्रा उसके प्रकार और बनाने के तरीके पर निर्भर करती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बहुत कम मात्रा में कैफीन सतर्कता और मनोदशा में सुधार कर सकती है और अधिक मात्रा हमेशा बेहतर नहीं होती।
आईवीएफ परीक्षण के जरिए बच्चे के लंबे या होशियार होने के पूर्वानुमान जैसे सपने बेचे जा रहे हैं
(एलेक्स पॉलिआकोव, मेलबर्न यूनिवर्सिटी)
मेलबर्न, 10 फरवरी (द कन्वरसेशन) अपनी होने वाली संतान को लेकर संभावित माता-पिता पहले ही रोमांचित रहते हैं। अब उन्हें ऐसी आनुवंशिक जांचों के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है, जिनमें आईवीएफ के जरिए तैयार किये गए भ्रूण की विशेषताएं बताने का दावा किया जाता है जैसे कौन सा बच्चा सबसे लंबा, सबसे बुद्धिमान या सबसे स्वस्थ बनेगा।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ये जांच अपने वादों को पूरा नहीं कर सकतीं। इनके लाभ बेहद सीमित हैं, जबकि मरीजों, बच्चों और समाज के लिए इससे जुड़े जोखिम वास्तविक और गंभीर हैं। विशेषज्ञों की राय है कि माता-पिता को अपने भावी बच्चों से जुड़े अहम फैसले लेते समय भ्रामक प्रचार नहीं, बल्कि सटीक जानकारी मिलनी चाहिए।
फिलहाल आईवीएफ के जरिए विकसित भ्रूणों की जांच कुछ आनुवंशिक बीमारियों से बचाव के लिए की जाती है, जो आमतौर पर एकल जीन से जुड़ी होती हैं, जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस। लेकिन हाल के वर्षों में सामने आई यह नई जांच हजारों जीनों के संयुक्त प्रभाव से जुड़े जटिल गुणों का अनुमान लगाने का दावा करती है।
 नई तकनीक में भ्रूणों के लिए तथाकथित ‘पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर’ तैयार किए जाते हैं, जिनके आधार पर हृदय रोग, अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों या बुद्धिमत्ता और कद जैसे गुणों का पूर्वानुमान लगाया जाता है।
ऑस्ट्रेलिया में ऐसी जांच उपलब्ध नहीं है, लेकिन अमेरिका की कई कंपनियां यह सुविधा दे रही हैं। कुछ कंपनियां भ्रूणों की हजारों विशेषताओं की जांच करने का दावा करती हैं और धुआंधार विज्ञापन के जरिए माता-पिता को आकर्षित कर रही हैं।
विशेषज्ञों के एक समूह ने इस तकनीक का मूल्यांकन किया और पाया कि इन जांचों से मिलने वाले पूर्वानुमान बेहद अनिश्चित हैं। गणितीय विश्लेषण के अनुसार, इससे होने वाला संभावित लाभ नगण्य है, जैसे आईक्यू में कुछ अंकों की बढ़ोतरी या कद में एक से तीन सेंटीमीटर का अंतर। इसके अलावा, देर से सामने आने वाली बीमारियों के बारे में वास्तविक लाभ का आकलन करना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि उनके परिणाम दशकों बाद सामने आएंगे।
शोधकर्ताओं ने कहा कि पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर उन लोगों के आंकड़ों पर आधारित हैं, जो आज 50-60 वर्ष की उम्र में हैं और जिन्होंने पूरी तरह अलग सामाजिक, पर्यावरणीय और जीवनशैली स्थितियों में जीवन बिताया है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के गुण और बीमारियां जीन और पर्यावरण के आजीवन पारस्परिक प्रभाव का नतीजा होती हैं, जिसे केवल आनुवंशिक जांच से नहीं समझा जा सकता।
विशेषज्ञों ने उदाहरण देते हुए कहा कि बच्चे की बुद्धिमत्ता पर शुरुआती शिक्षा, पोषण, पारिवारिक सहयोग और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का गहरा असर पड़ता है। केवल आनुवंशिक स्कोर के आधार पर भविष्य की बुद्धिमत्ता तय करना व्यावहारिक नहीं है।
शोध में यह भी चेतावनी दी गई कि एक ही जीन कई गुणों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में किसी एक सकारात्मक गुण के चयन से अनजाने में किसी अन्य बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में मौजूदा दिशा-निर्देश गंभीर आनुवंशिक बीमारियों से बचाव के लिए भ्रूण जांच की अनुमति देते हैं, लेकिन पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर भविष्य के संभावित जोखिमों का अनुमान मात्र हैं, न कि चिकित्सीय निदान। ऐसे में इनका उपयोग नियामकीय अस्पष्टता के दायरे में आता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि इस तकनीक से जुड़े नैतिक सवाल भी गंभीर हैं और यह सामाजिक असमानताओं और भेदभाव को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने चेताया कि केवल इन जांचों के लिए आईवीएफ कराना, बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के, स्वस्थ बच्चे की संभावना को भी कम कर सकता है, क्योंकि आईवीएफ प्रक्रिया स्वयं कुछ जोखिमों से जुड़ी होती है।
उनका कहना है कि ‘‘सबसे अच्छा’’ बच्चा वह नहीं होता जिसका आनुवंशिक स्कोर सबसे ऊंचा हो, बल्कि वह होता है जो प्यार, अच्छे पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं वाले माहौल में जन्म लेता है।