बलिदान दिवस 2026: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को देश कर रहा नमन; जानें उनकी वैचारिक क्रांति की कहानी
ऑनलाइन डेस्क : आज 23 मार्च है, वह ऐतिहासिक तारीख जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस ज्वाला की याद दिलाती है जिसे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने अपने बलिदान से सींचा था। 23 मार्च 1931 को इन तीन युवा क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमकर देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने के संकल्प को और मजबूत किया था।क्रांति का वैचारिक संदेश शहीद भगत सिंह का मानना था कि “क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है”। उनके लिए आजादी का अर्थ केवल ब्रिटिश सत्ता की विदाई नहीं था, बल्कि वे एक ऐसे समृद्ध और समतावादी भारत का सपना देखते थे जहाँ हर नागरिक खुशहाल हो और शोषण का कोई स्थान न हो। उनके समाजवादी विचार और ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसे लेखन उनकी अद्भुत वैचारिक और बौद्धिक गहराई को दर्शाते हैं।सांडर्स का वध: लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को इन क्रांतिकारियों ने पुलिस ऑफिसर जे.पी. सांडर्स को मारकर ब्रिटिश सत्ता को कड़ा संदेश दिया था।सेंट्रल असेंबली धमाका: 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका था। उनका मकसद किसी को मारना नहीं, बल्कि “बहरों को सुनाना” था, ताकि दुनिया को उनकी विचारधारा और संघर्ष की जानकारी मिल सके।शहादत जो बन गई प्रेरणा फांसी से कुछ दिन पहले भगत सिंह ने कहा था कि यदि वे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाते हैं, तो भारत की माताएं अपने बच्चों को उनका उदाहरण देकर देश की आजादी के लिए प्रेरित करेंगी। महज 24 साल की उम्र में दिया गया उनका यह बलिदान आज भी देश के युवाओं के लिए राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा प्रेरक स्रोत है।

