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आंकड़ों से आपूर्ति तक: आईसीएमआर बेहतर भविष्य के लिए भारत के स्वास्थ्य अनुसंधान को नए सिरे से आकार दे रहा है

“प्रभाव अकेले किसी व्यक्ति से नहीं – बल्कि प्रणालियों के तालमेल से संभव होता है। साथ मिलकर, हम आंकड़ों से… निर्णय … और फिर प्रभाव छोड़ने तक की यात्रा पूरी करेंगे।”


अब जबकि देश ‘विकसित भारत 2047’ के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमारे सामने सवाल सिर्फ बीमारियों का इलाज करने के तरीकों का नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों का अनुमान लगा लेने वाली एक ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण का भी है जो सबके लिए न्यायसंगत और नई सोच पर आधारित हो। इस बदलाव के केन्द्र में स्वास्थ्य अनुसंधान का एक ऐसा नया दृष्टिकोण है, जो आंकड़ों (डेटा) को निर्णयों से और फिर निर्णयों को प्रभाव से जोड़ता है।


कोविड-19 महामारी से मिले कठोर अनुभवों से सीख लेते हुए, जैव-चिकित्सा अनुसंधान (बायोमेडिकल रिसर्च) की देश की शीर्ष संस्था, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए हैं। इन सुधारों में संस्थागत ढांचे को नए सिरे से तैयार करने से लेकर अनुसंधान के लिए फंड देने और उसे असरदार नतीजों में बदलने के तरीकों को ठोस बनाना शामिल है। जो प्रणाली कभी बिखरी हुई और जांचकर्ताओं की पूछताछ पर टिकी थी, वह अब तकनीक द्वारा संचालित और लक्ष्यों पर केन्द्रित एक इकोसिस्टम में बदल रही है। यह बदलाव महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है। यह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप, संस्थान-आधारित समन्वित अनुसंधान की दिशा में एक ऐसी सोची-समझी पहल को दर्शाता है, जहां विज्ञान का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान का सृजन करना नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों का समाधान करना भी है।


इस बदलाव का एक मुख्य आधार आईसीएमआर के संस्थागत ढांचे का पुनर्गठन है। हालिया सुधारों ने कई संस्थानों के दायित्वों को बढ़ाया है और उन्हें सीमित दायरे वाली इकाइयों के बजाय अंतर-विषयक केन्द्रों के रूप में नई पहचान दी है। डिजिटल हेल्थ एवं डेटा साइंस, बच्चों की सेहत, महिलाओं की सेहत, और खून व प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी बीमारियों जैसे क्षेत्रों की ओर संस्थानों का झुकाव, भारत में बीमारियों के बदलते स्वरूप और तकनीकी क्षमताओं को दर्शाता है। देश भर में – पूर्वोत्तर के डिब्रूगढ़ से लेकर पश्चिम के जोधपुर तक – क्षेत्रीय ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च’ के नेटवर्क का निर्माण एक और अहम कदम है। ये संस्थान राज्य और जिला स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ मिलकर संक्रियात्मक अनुसंधान (ऑपरेशनल रिसर्च) करेंगे, ताकि जरूरी अनुसंधान और उसके नतीजों का जमीनी स्तर पर सदुपयोग सुनिश्चित किया जा सके। ये कोई मामूली बदलाव नहीं हैं, बल्कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार विज्ञान की दिशा में एक ऐसे रणनीतिक बदलाव का संकेत हैं जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोमिक्स और रियल-टाइम डेटा सिस्टम सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े निर्णयों में अहम भूमिका निभाते हैं।


अलग-थलग रहकर काम करने के तरीके से हटकर एक आपस में जुड़े हुए राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम की दिशा में बढ़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब संस्थानों को ऐसे रिसोर्स सेंटरों के तौर पर देखा जा रहा है जो एक साझा राष्ट्रीय मिशन में योगदान दें और किसी एक स्थान पर मिले साक्ष्यों का उपयोग पूरे देश में कार्रवाई के लिए किया जाना सुनिश्चित करें। प्रणालीगत-स्तर की यह सोच एक ऐसे दौर में बेहद जरूरी है जब स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां – चाहे वे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) या महामारी या फिर गैर-संचारी रोगों से जुड़ी हों – जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। संस्थागत सुधारों के साथ-साथ, अनुसंधान से संबंधित फंडिंग इकोसिस्टम को बुनियादी तौर पर फिर से तैयार करना भी जरूरी है। फंडिंग के तरीके की दृष्टि से, आंतरिक (इंट्रा-म्यूरल) और बाह्य (एक्स्ट्रा-म्यूरल) अनुसंधान के बीच का विभाजन बिल्कुल साफ है। लेकिन साथ ही, उन्हें एक अपेक्षाकृत अधिक एकजुट और नतीजे पर केन्द्रित ढांचे के जरिए जोड़ा जाता है। आंतरिक अनुसंधान (इंट्राम्यूरल रिसर्च) अब मुख्य रूप से संस्थान की पहल पर की जाती है। यह स्पष्ट रूप से तय लक्ष्यों के अनुरूप होती है और अनुसंधान के नतीजों को असल इस्तेमाल में लाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे एक तय समय-सीमा के भीतर व्यवस्थित किया जाता है। दूसरी ओर, बाह्य अनुसंधान (एक्स्ट्रा- म्यूरल रिसर्च) को चार चरणों वाले नवाचार चक्र – विवरण, खोज, विकास और आपूर्ति – में फिर से व्यवस्थित किया गया है। इससे अच्छे विचारों को व्यवस्थित तरीके से ऐसे समाधानों में बदला जाना सुनिश्चित होता है, जिन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।


प्रयोगशाला में की गई खोज से लेकर आम लोगों तक सेवा पहुंचाने तक की यह समन्वित प्रक्रिया, परियोजनाओं को फंड देने के बजाय समाधान तैयार करने की दिशा में एक अहम बदलाव है। इसे ‘नेशनल हेल्थ रिसर्च प्रोग्राम’ (एनएचआरपी) से और मजबूती मिलती है। इस कार्यक्रम ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) एवं क्षय रोग से लेकर मानसिक स्वास्थ्य, पोषण और आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) जैसे तेरह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की है। मिशन-मोड वाले ये कार्यक्रम वैसे विविध संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए हैं, जिन्हें बड़े निवेश और असल नतीजों पर साफ फोकस का समर्थन हासिल है।


तकनीक भी परिवर्तनकारी भूमिका निभा रही है। डायग्नोस्टिक्स, निगरानी और कार्यक्रम को लागू करने की प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करने से शहरी और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के बीच लंबे समय से चली आ रही खाई को पाटने में मदद मिल रही है। जहां क्षय रोग (टीबी) और डायबिटिक रेटिनोपैथी की जांच में एआई-आधारित उपकरण पहले से ही अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मदद कर रहे हैं, वहीं एआई-संचालित पोषण संबंधी निगरानी (न्यूट्रिशनल मॉनिटरिंग) जैसे रचनात्मक कदम बड़े पैमाने पर कार्यक्रम के कार्यान्वयन को बेहतर बना रहे हैं। टीके (वैक्सीन) पहुंचाने से शुरू हुई और अब कॉर्निया जैसी जरूरी चिकित्सीय आपूर्ति सुनिश्चित करने की विस्तारित भूमिका निभाने वाली ‘आई-ड्रोन’ पहल, इस बात को दर्शाती है कि कैसे आधुनिक तकनीक भौगोलिक बाधाओं को पार करके समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा सकती है। विज्ञान के मोर्चे पर, चिकित्सा तकनीक (मेडटेक) के दायरे में हो रही प्रगति – जिसमें चिकित्सीय उपकरणों एवं डायग्नोस्टिक्स से लेकर अगली पीढ़ी के टीके और इलाज के तरीके शामिल हैं – मरीजों पर केन्द्रित और अधिक सटीक इलाज को संभव बना रही है। इसके साथ ही, नए एवं साक्ष्यों पर आधारित मॉडलों के जरिए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने की प्रक्रिया को दुनिया भर में पहचान मिल रही है। स्थानीय स्तर पर रचनात्मकता को बढ़ावा देने के कदमों से इन प्रयासों को और मजबूती मिल रही है। फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज जैसी योजनाओं के साथ-साथ मेडटेक-मित्र; और;मेडिकल इनोवेशन-पेटेंट मित्र; जैसे प्लेटफॉर्म, अनुसंधान से लेकर व्यावसायीकरण तक की यात्रा को गति दे रहे हैं। इससे सरकारी फंडिंग से होने वाली वैज्ञानिक प्रगति का लोगों के लिए सस्ती एवं आसानी से उपलब्ध होने वाली तकनीक में बदल जाना सुनिश्चित हो रहा है।


हालांकि, इन सुधारों की असली परख जन-स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव से होती है। ‘इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव’ जैसी पहलों ने यह दिखाया है कि साक्ष्यों पर आधारित रणनीतियां कैसे बड़े पैमाने पर पुरानी बीमारियों के प्रबंधन में बदलाव ला सकती हैं। आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) के क्षेत्र में मिशन-मोड प्रोग्राम, जिनमें मोबाइल स्ट्रोक यूनिट और तेजी से काम करने वाले कार्डियक रिस्पॉन्स सिस्टम शामिल हैं, जानलेवा स्थितियों में इलाज के नतीजों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। डायग्नोस्टिक नेटवर्क का विस्तार और स्वदेशी तकनीकें, कैंसर से लेकर संक्रामक बीमारियों के प्रकोप तक की विभिन्न बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और उनके इलाज की प्रक्रिया को बेहतर बना रही हैं। ये कोशिशें ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ के अनुरूप हैं, जो बीमारी से बचाव और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने और अच्छी गुणवत्ता वाली देखभाल पर जोर देती हैं। ये समानता के प्रति एक व्यापक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती हैं ताकि वैज्ञानिक प्रगति का लाभ इलाके या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बंधनों से परे हर नागरिक तक पहुंचे। भविष्य की ओर देखते हुए, हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। आईसीएमआर एक उत्प्रेरक के तौर पर काम करना जारी रखेगा और एक मजबूत व तेजी से सक्रिय होना वाला स्वास्थ्य इकोसिस्टम बनाने हेतु अनुसंधानकर्ताओं, डॉक्टरों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत को एक मंच पर लाएगा। वर्ष 2047 का रोडमैप डिजिटल हेल्थ, बायो-मैन्यूफैक्चरिंग और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के क्षेत्र में हुई प्रगति से तय होगा, जिसमें क्षमता विकास और वैश्विक सहयोग पर खास जोर दिया जाएगा।


यह समझना जरूरी है कि स्वास्थ्य अनुसंधान कोई अलग-थलग रहकर किया जाने वाला काम नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास है। आईसीएमआर में हो रहा बदलाव सभी हितधारकों को इस यात्रा में शामिल होने, मिलकर समाधान तैयार करने और यह सुनिश्चित करने का एक न्योता है कि विज्ञान सबसे सार्थक तरीके से समाज की सेवा करे। स्वास्थ्य अनुसंधान प्रणाली में सुधार अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह वह नींव है जिस पर एक स्वस्थ, अधिक न्यायसंगत और अधिक सुदृढ़ भारत का निर्माण होगा – एक ऐसा भारत जहां हर खोज का लाभ लोगों तक पहुंचेगा और हर नए कदम का प्रभाव वास्तव में दिखाई देगा।


(लेखक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक हैं)

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