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Garden Valley School के विद्यार्थियों की नशे के खिलाफ अनोखी पहल, घर-घर पहुंचा रहे जागरूकता का संदेश

गार्डन वैली इंटरनेशनल स्कूल भट्टियां के विद्यार्थियों ने नशे के खिलाफ अनोखी मुहिम शुरू की है। 10-10 सदस्यों की टीमें घर-घर जाकर जागरूकता फैला रही हैं। विद्यार्थियों को खेल किटें भी वितरित की गईं।

माछीवाड़ा / सत्ता संदेश

Report : जसबीर सिंह अलबेला

नशे के खिलाफ जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से गार्डन वैली इंटरनेशनल स्कूल, भट्टियां के विद्यार्थियों ने अनोखी पहल शुरू की है। स्कूल के विद्यार्थियों की 10-10 सदस्यों वाली टीमें बनाकर उन्हें घर-घर जाकर लोगों को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

विद्यार्थियों की इस मुहिम की हौसला अफजाई करने के लिए एनआईएसडी सदस्य, एनसीसीडीआर के स्पेशल सदस्य तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार से जुड़े सुखविंदर सिंह बिंद्रा विशेष रूप से स्कूल पहुंचे। इस दौरान विद्यार्थियों को विभिन्न खेलों से संबंधित किटें भी वितरित की गईं।

बच्चों को नशे से दूर रखने में खेलों की अहम भूमिका

सुखविंदर सिंह बिंद्रा ने विद्यार्थियों की पहल की सराहना करते हुए कहा कि स्कूल द्वारा बच्चों को प्रेरित कर 10-10 सदस्यों की टीमें तैयार की गई हैं, जो घर-घर जाकर नशे के खिलाफ लोगों को जागरूक कर रही हैं। उन्होंने इसे समाज के लिए एक सराहनीय प्रयास बताया।

उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए उन्हें खेलों से जोड़ना, बेहतर शिक्षा उपलब्ध करवाना और रोजगार के अवसर प्रदान करना बेहद जरूरी है। इन प्रयासों के माध्यम से ही स्वस्थ और बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है।

विद्यार्थियों को वितरित की गईं खेल किटें

सुखविंदर सिंह बिंद्रा ने बताया कि बच्चों को खेलों से जोड़ने के उद्देश्य से खेल किटें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। इसी कड़ी में विद्यार्थियों को विभिन्न खेलों से संबंधित किटें सौंपी गईं।

उन्होंने कहा कि खेल बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास और टीम भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विद्यार्थियों को खेलों के प्रति प्रोत्साहित करने से उन्हें सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने में मदद मिलती है।

‘नशा रोको मुहिम’ के तहत स्वस्थ जीवनशैली का संदेश

इस दौरान सुखविंदर सिंह बिंद्रा ने विद्यार्थियों को नशे से दूर रहने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पंजाब को नशामुक्त बनाने के लिए केवल सरकार या प्रशासन के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों, अभिभावकों और समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी जरूरी है।

विद्यार्थियों ने पेश की जागरूकता कोरियोग्राफी

स्कूल की प्रिंसिपल डॉ. हरप्रीत कौर ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि स्कूल विद्यार्थियों में खेल भावना विकसित करने और उन्हें सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

कार्यक्रम के दौरान गार्डन वैली स्कूल के विद्यार्थियों ने नशे के खिलाफ जागरूकता फैलाने वाली विशेष कोरियोग्राफी भी प्रस्तुत की। विद्यार्थियों की इस प्रस्तुति की उपस्थित लोगों ने खूब सराहना की।

इस पहल के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि युवा पीढ़ी को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता, खेल, शिक्षा और सकारात्मक वातावरण को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।

Ludhiana News: ताजपुर एन्क्लेव में घर के अंदर चल रही थी नमकीन फैक्ट्री, गंदगी और बाल श्रम के आरोप

लुधियाना के ताजपुर एन्क्लेव में घर के अंदर नमकीन बनाने का काम होता मिला। गंदगी, स्वच्छता नियमों की अनदेखी, बच्चों से पैकिंग और बिजली व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।

लुधियाना / सत्ता संदेश

Report : गुरमीत सिंह

लुधियाना शहर के ताजपुर एन्क्लेव से हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आई हैं। यहां एक घर के अंदर नमकीन बनाने का काम होता हुआ दिखाई दिया, जहां खाद्य पदार्थ तैयार करने के दौरान साफ-सफाई और स्वच्छता के मानकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सामने आई तस्वीरों में नमकीन तैयार करने वाली जगह पर गंदगी नजर आ रही है। खाद्य पदार्थ तैयार करने के स्थान पर साफ-सफाई की उचित व्यवस्था नहीं दिखाई दी। वहीं, काम करने वाले लोगों द्वारा खाद्य पदार्थ तैयार करते समय जरूरी स्वच्छता संबंधी सावधानियां नहीं बरतने की बात सामने आई है।

बिना दस्ताने और सिर ढके तैयार हो रही थी नमकीन

बताया जा रहा है कि नमकीन तैयार करने के काम में लगे लोगों ने कथित तौर पर हाथों में दस्ताने नहीं पहने थे और सिर भी नहीं ढका हुआ था। खाद्य पदार्थों को तैयार करने के दौरान स्वच्छता के नियमों का पालन नहीं होने से तैयार उत्पाद की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ गई है।

छोटे बच्चों से पैकिंग करवाने के आरोप

मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। आरोप है कि नमकीन की पैकिंग के लिए छोटे बच्चों से काम करवाया जा रहा था। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो बाल श्रम से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई का मामला बन सकता है।

हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

बिजली व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल

नमकीन फैक्ट्री में बिजली व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बिजली से चलने वाली भट्टियों को कथित तौर पर सीधी कुंडी डालकर चलाया जा रहा था। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो बिजली चोरी के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर मामला सामने आ सकता है।

इस तरह की व्यवस्था से शॉर्ट सर्किट या आग लगने जैसी दुर्घटना का खतरा भी पैदा हो सकता है।

रिहायशी इलाके में फैक्ट्री संचालन पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिहायशी इलाके में घर के अंदर इस तरह खाद्य पदार्थ तैयार करने का काम कैसे चल रहा था और संबंधित विभागों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी?

मामले में खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता, बाल श्रम, बिजली व्यवस्था और रिहायशी क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधि से जुड़े कई पहलुओं की जांच की जरूरत है।

अब देखना होगा कि प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं। यदि जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

माछीवाड़ा में 1 किलो अफीम के साथ आरोपी गिरफ्तार, नाकाबंदी के दौरान पुलिस की कार्रवाई

माछीवाड़ा / सत्ता संदेश

Report : जसबीर सिंह अलबेला

माछीवाड़ा पुलिस ने नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत नाकाबंदी के दौरान एक व्यक्ति को कथित तौर पर एक किलो अफीम के साथ गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है।

गिरफ्तार आरोपी की पहचान बलविंदर सिंह उर्फ गोरा के रूप में हुई है।

इस संबंध में डीएसपी समराला प्रितपाल सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जानकारी देते हुए बताया कि माछीवाड़ा पुलिस की ओर से क्षेत्र में नाकाबंदी की गई थी। इसी दौरान पुलिस टीम ने शक के आधार पर एक व्यक्ति को रोककर उसकी तलाशी ली।

तलाशी के दौरान आरोपी के कब्जे से एक किलो अफीम बरामद हुई। इसके बाद पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर उसके खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया।

अफीम कहां से लाई और कहां होनी थी सप्लाई?

पुलिस अब इस मामले की जांच में जुटी है कि आरोपी बलविंदर सिंह उर्फ गोरा अफीम कहां से लेकर आया था और इसे आगे कहां सप्लाई करने की तैयारी में था। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर नशे की सप्लाई से जुड़े अन्य लोगों और नेटवर्क के बारे में भी जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही है।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक मामले की जांच जारी है और जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

माछीवाड़ा पुलिस ने नाकाबंदी के दौरान बलविंदर सिंह उर्फ गोरा को कथित तौर पर 1 किलो अफीम के साथ गिरफ्तार किया। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर अफीम की सप्लाई और नेटवर्क के बारे में जांच कर रही है।

न्यायाधिकरण सुधार विधेयक 2026: स्वतंत्र और आत्मनिर्भर न्यायाधिकरणों की दिशा में बड़ा कदम

एक न्यायाधिकरण, जो अपने आप में पूर्ण है : एन. वेंकटरमण

भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (उच्चतम न्यायालय)

हमारे सार्वजनिक अधिनियमों में न्यायाधिकरणों के गठन से जुड़े कुछ ही प्रश्न ऐसे हैं, जिनकी इतनी बार पुनर्समीक्षा हुई है। 1987 के एस. पी. संपत कुमार मामले से लेकर नवंबर 2025 में मद्रास बार एसोसिएशन से संबंधित निर्णय तक, न्यायालयों ने कानून निरस्त किये, निर्देश जारी किए और फिर उसी आधार पर स्वयं को नए कानूनों की समीक्षा करते हुए पाया। यह विषय इतने चक्र से गुजरा है, जो अपने आप में दर्शाता है कि समस्या कितनी कठिन रही है। न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 इसीलिए ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अंततः वास्तविक समस्या की पहचान कर ली है और उम्मीद है कि समाधान भी खोज लिया है।

दूसरे देशों और स्वयं के अनुभव से मिली सीख

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। दूसरे देशों को भी इसका सामना करना पड़ा है और उनका निदान ध्यान देने योग्य है। ब्रिटेन में जब सर एंड्रयू लेगट ने 2001 में इस क्षेत्र की समीक्षा की, तो पाया कि सत्तर से अधिक न्यायाधिकरणों का प्रशासन उन्हीं विभागों द्वारा किया जा रहा था, जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते थे। उन्होंने इसे मूल दोष माना। उनका उपाय कार्यकाल में बदलाव या योग्यताओं को परिष्कृत करना नहीं था। उनका समाधान था कि न्यायाधिकरणों को उनके प्रायोजक विभागों से अलग कर उनका प्रशासन एकल सेवा के अधीन किया जाए। यही सुधार 2007 के अधिनियम का आधार बना। यह सुधार संरचनात्मक था। उसने निर्भरता के लक्षणों को नहीं, बल्कि निर्भरता की वजह का समाधान किया।

भारत ने न्यायाधिकरणों की व्यवस्था को प्रारंभिक चरण में ही अपनाया और, कुल मिलाकर, यह सफल रही। 1941 में स्थापित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण आज भी विशेषज्ञतापूर्ण न्यायनिर्णयन के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है। इस प्रारूप को अनुच्छेद 323ए और 323बी तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 द्वारा आगे बढ़ाया गया और बाद में विभिन्न नियामक क्षेत्रों में उस उच्च स्तर पर इसका विस्तार हुआ, जिसे उच्च न्यायालय नहीं ले सकते थे। पर हमारी समस्या अलग तरह की थी। जैसा कि न्यायालय की 2020 की टिप्पणी में कहा गया कि स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब न्यायाधिकरणों को अपने कार्य करने के लिए कार्यपालिका के कंधों का सहारा न लेना पड़े।

पहले के प्रयासों से समस्या का समाधान क्यों नहीं हो सका

इस बारे में सुधार एक से अधिक बार किए गए हैं और हर बार सच्ची भावना के साथ किए गए हैं। इसके बाद होने वाली अधिकांश मुकदमेबाजी इस बात को लेकर रही कि कार्यकाल तीन वर्ष का होना चाहिए या चार या पांच वर्ष का, न्यूनतम आयु पचास वर्ष होना स्वीकार्य है या नहीं, और एक नाम या दो नामों की समिति की सिफारिश होनी चाहिए। सम्मानपूर्वक कहना होगा कि इनमें से कोई भी बात मूल समस्या तक नहीं पहुंचती। स्वतंत्र न्यायाधिकरण अंकगणित पर निर्भर नहीं करते। कार्यकाल, आयु और नामों की संख्या वे लक्षण हैं जिनके माध्यम से रोग का निदान किया गया है। वे स्वयं बीमारी नहीं हैं।

मूल बात

मूल बात यह है कि न्यायाधिकरण एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर संस्था होनी चाहिए। उसका अपना प्रतिष्ठान होना चाहिए, अपने सदस्यों के चयन का उसका अपना साधन होना चाहिए, उन पर निगरानी रखने और उन्हें अनुशासित करने की अपनी व्यवस्था होनी चाहिए तथा परिसर, कर्मचारियों और धन की अपनी व्यवस्था होनी चाहिए। जहां ये सभी व्यवस्थाएं मौजूद हों, वहां स्वतंत्रता स्वाभाविक रूप से आ जाती हैं।

नया विधेयक उन सभी बिंदुओं पर न्यायालय को उत्तर देता है, जिन पर न्यायालय अपनी बात कह चुका है। लेकिन इससे भी बढ़कर एक ऐसी संस्था स्थापित करने का प्रयास है जो उन उत्तरों को स्वयं लागू करने योग्य बना दे। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना कानून द्वारा की जानी है। उसका अस्तित्व, गठन और कार्य किसी कार्यपालिका आदेश से नहीं, बल्कि अधिनियम से संचालित होंगे और उसे चयन, निगरानी, अनुशासन तथा न्यायाधिकरणों की आवश्यकताओं के आकलन का दायित्व है। उसके चारों ओर एक स्थायी पेशेवर सचिवालय स्थापित किया जाएगा।

सर्वोच्चता, समान दूरी और नियंत्रण जो व्यवस्था को प्रभावी बनाते हैं

विधेयक में उन प्रत्येक बिंदुओं पर न्यायिक सर्वोच्चता बनाए रखी गयी है, जहां उसका महत्व है। आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी और उसमें न्यायिक बहुमत का प्रावधान है। समितियों की अध्यक्षता न्यायिक रूप से की जाती है तथा निर्णायक मत न्यायिक अध्यक्ष के पास ही होता है। चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन—सभी का नेतृत्व न्यायिक तौर पर किया जाता है।

यह उस बात के अनुरूप है जो न्यायालय आर. गांधी मामले के बाद से कहता आया है कि कार्यपालिका, जो सबसे बड़ी वादी है, उन लोगों के चयन में प्रमुख भूमिका नहीं निभा सकती जो उसके मामलों का निर्णय करते हैं।

इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण यह है कि सर्वोच्चता का अर्थ नियंत्रण नहीं है। पूरी व्यवस्था न्यायिक पक्ष को सौंप देना भी चुनौतियों के रूप में देखा जाता है। इसलिए यह विधेयक न्यायाधिकरण को तीन स्तरों से कार्यपालिका और न्यायपालिका से समान दूरी पर रखता है। केंद्र सरकार नियमों द्वारा व्यापक सिद्धांत निर्धारित करती है। आयोग उन नियमों को लागू करने के तरीके को नियंत्रित करने वाले विनियम बनाता है। सचिवालय इसी ढांचे के तहत काम करता है। उसे कार्य करने के तरीके के बारे में मार्गदर्शन दिया गया है, लेकिन परिचालन स्तर पर उसे निर्देशित नहीं किया जाता और वह अपने कार्य अधिनियम से प्राप्त करता है, न कि अधिकार या कार्य किसी दूसरे को सौंपे जाने के प्रत्यायोजन से।

इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग, सचिवालय और कार्यपालिका के संयोजन से उत्पन्न नियंत्रण और संतुलन की वास्तविक व्यवस्था है। सचिवालय पात्रता की जांच और उसका अभिलेखन तैयार करेगा, जिसके आधार पर प्रत्येक निर्णय लिया जाना है। वह प्रकाशित विनियमों से बंधा है और अपने कार्यों का रिकॉर्ड रखेगा।

विधेयक द्वारा कायम यही वह नाजुक संतुलन है। इसमें न तो प्रशासन में न्यायिक हस्तक्षेप है और न ही वास्तविक रूप से कार्यपालिका पर निर्भरता, जबकि चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन में न्यायिक सर्वोच्चता बनी रहती है। कनाडा ने 2014 में इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया था, जब उसने अपने संघीय न्यायाधिकरणों की सहायक सेवाओं को एक ही संगठन के अधीन लाते हुए उनके न्यायनिर्णयन संबंधी स्वतंत्रता बरकरार रखी।

इस प्रकार के कानून का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह न्यायिक चुनौती में टिकता है या नहीं। इसका मूल्यांकन इस तथ्य के आधार पर होना चाहिए कि क्या वह उन स्थितियों को समाप्त करता है, जिनसे ये चुनौतियां पैदा हुईं। विधेयक इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। यदि यह अपने निर्धारित स्वरूप में काम करता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायाधिकरण व्यवस्था में काफी सुधार आएगा। इसमें वादी को अंततः ऐसा मंच मिलेगा जो उचित रूप से गठित, पर्याप्त रूप से व्यवस्थित होगा, जहां रिक्तियां समय पर भरी जाएंगी तथा जो अपने कार्य-प्रदर्शन के लिए जवाबदेह होगा। विकसित किया गया यह मॉडल, यदि सफल रहा तो भविष्य में अन्य प्रकार के चयन के लिए भी काफी उपयोगी होगा।