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पाठकों में फिर से रूचि जगाना: किताबों को फिर से  बैठक कक्ष में जगह देना

‘बच्चे की दुनिया को समृद्ध बनाने के कई छोटे-छोटे तरीके हैं। उनमें से सबसे अच्छा तरीका है, पढ़ने का आनंद।’    

अर्चना शर्मा अवस्थी  और  युवराज मलिक

भारत में शिक्षा पर चर्चा लंबे समय से ‘पहुँच’ पर केंद्रित रही है – यानि स्कूलों तक, किताबों तक, डिजिटल संसाधनों तक पहुँच। ये चीजें बहुत जरूरी हैं, लेकिन जब हम भारतीय शिक्षा के एक नए चरण की दहलीज पर खड़े हैं, तो हमारे सामने एक और इतना ही जरूरी सवाल है:  

क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जो पढ़ती है?

यह ऐसा सवाल है – जो सुनने में तो आसान लगता है, लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं – जिसने राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय (आरईपी) या राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय की शुरुआत की। इस प्लेटफ़ॉर्म की परिकल्पना केवल एक डिजिटल संग्रहालय के रूप में नहीं, बल्कि घर, स्कूल और समुदाय के स्तर पर भारत की पढ़ने की संस्कृति को समृद्ध करने के जीवंत प्रयास के रूप में की गयी थी।

आज, आरईपी में 23 भाषाओं में 7,000 से ज्यादा चयनित किताबें मौजूद हैं, जो सैकड़ों प्रकाशकों के साथ साझेदारी में विकसित की गई हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के विज़न के अनुरूप हैं। लेकिन इसका उद्देश्य कभी भी एक ऐसा संग्रह बनाना नहीं था, जो लगातार बढ़ता ही जाए। इसके पीछे एक सोच-समझकर अपनाया गया तरीका है: एक ऐसा संग्रह बनाए रखना, जो चयनित, प्रासंगिक और जीवंत हो – जिसे लगातार अद्यतन किया जाता है, जिसमें महत्वपूर्ण किताबें जोड़ी जाती हैं और अप्रासंगिक किताबों को हटाया जाता है। पैमाना मायने रखता है, लेकिन प्रासंगिकता, गुणवत्ता और लगातार जुड़ाव अधिक महत्वपूर्ण हैं।

बाधाओं को दूर करना, आदतों का प्रतिस्थापन नहीं

भारत के कई बच्चों के लिए – खासकर ग्रामीण, अर्ध-शहरी और पिछड़े क्षेत्रों में – पाठ्यपुस्तकों के अलावा अन्य किताबों तक पहुंच एक बड़ी चुनौती है। सबसे नज़दीकी किताब की दुकान कई किलोमीटर दूर हो सकती है। स्कूल के पुस्तकालय में या तो किताबें पुरानी होती हैं या स्कूल अवधि के बाद उपलब्ध नहीं होती हैं। इन बच्चों के पास कल्पना तो है, लेकिन पठन-सामग्री मौजूद नहीं है।

राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय इस कमी को पूरा करता है: एक बच्चा, चाहे वह कहीं भी रहता हो या उसके परिवार का आय स्तर कुछ भी हो, अब अपने घर में पहले से मौजूद उपकरण के जरिए हजारों किताबों के पुस्तकालय तक पहुँच सकता है। बच्चे कभी भी और कहीं भी इन किताबों को पढ़ सकते हैं। यह हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भाषाओं में किताबों पढ़ने का भी अवसर देता है।

लेकिन यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि यह पहल असल में क्या नहीं है।

यह छोटे बच्चों को ज्यादा समय तक स्क्रीन के सामने बिठाने का प्रयास नहीं है। यह परिवारों के लिए एक आमंत्रण है कि वे अपने पास मौजूद उपकरणों का अधिक सार्थक उपयोग करें – उस समय को साझा और समृद्ध अनुभव में बदलें, जो अन्यथा निष्क्रिय होकर, अकेले बैठकर या हानिकारक स्क्रॉलिंग या चीजें देखने में बीत जाता है।

           माता-पिता का छोटे बच्चे को ज़ोर से पढ़कर सुनाना।

             बड़े भाई/बहन का कहानी सुनाना। 

         परिवार का साथ बैठकर पढ़ने के लिए समय निकालना।

ऐसे समय में जब स्क्रीन अक्सर लोगों को एक-दूसरे से दूर करके अपने में ही उलझाए रखती है, किताबें – जिन्हें इन्हीं उपकरणों के ज़रिए पढ़ा जा सकता है – लोगों को फिर से एक साथ लाने की ताकत रखती हैं।

पढ़ने को स्क्रीन टाइम नहीं, बल्कि पारिवारिक समय बनाना।

राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय का उद्देश्य प्लेटफॉर्म के आयामों से कहीं अधिक गहरा है: इसका मकसद पढ़ने की आदत को फिर से घर के बैठक कक्ष में लाना है। 

पढ़ना सिर्फ एक शैक्षणिक गतिविधि नहीं है। यह एक सामाजिक और भावनात्मक गतिविधि भी है। जब परिवार के सदस्य या दोस्त साथ में पढ़ते हैं, तो वे बातचीत, सहानुभूति और सोचने-समझने के लिए जगह बनाते हैं – यह साथ मिलकर ध्यान देने का एक ऐसा गुण है, जो ऐप-सूचना और रोज़मर्रा की ज़रूरतों में बंटी ज़िंदगी में अब कम ही देखने को मिलता है। इस बारे में हुए अध्ययन लगातार बताते हैं कि जिन बच्चों को पढ़कर सुनाया जाता है और जो अपने आस-पास बड़ों को पढ़ते हुए देखते हैं, उनमें न सिर्फ़ पढ़ने-लिखने की बेहतर समझ विकसित होती है, बल्कि उनकी अंदरूनी दुनिया भी ज़्यादा समृद्ध होती है।

आरईपी अंतरपीढ़ी सहयोग की संभावनाएं भी खोलता है। युवा पाठक अपने दादा-दादी या नाना-नानी को पढ़कर सुना सकते हैं। किशोर अपने बड़ों की पसंदीदा कहानियों को पढ़ सकते हैं। ऐसा करने पर, पढ़ना सिर्फ़ अकेले में किया जाने वाला या मजबूरी का काम नहीं रह जाता, बल्कि कुछ और ही बन जाता है – इसे ‘मेरा समय’ के साथ-साथ ‘हमारा समय’ भी कहा जा सकता है।

ऐसा करने पर, पढ़ना सिर्फ़ अकेले में किया जाने वाला या मजबूरी का काम नहीं रह जाता, बल्कि कुछ और ही बन जाता है – इसे ‘मेरा समय’ के साथ-साथ ‘हमारा समय’ भी कहा जा सकता है।

एक समाज के रूप में, हमें अपने आप से एक आसान, लेकिन गहन सवाल पूछना चाहिए: क्या हम स्क्रीन के निष्क्रिय उपयोग का एक हिस्सा वापस ले सकते हैं और उसे उपयोगी पढ़ाई में बदल सकते हैं? हमारा मानना है कि जवाब हाँ है – यदि हम किताबें उपलब्ध कराएं, उन्हें आकर्षक बनाएं और पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि अपनी पसंद का काम बनाएं। 

शिक्षकों के साथ काम करना: अगला चरण  

‘राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय’ अपने अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, लेकिन शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। शिक्षक, पुस्तकालयाध्यक्ष और स्कूल के अग्रणी सिर्फ़ सीखने-सिखाने में मदद करने वाले नहीं होते, बल्कि वे संस्कृति को आकार देने वाले भी होते हैं। पढ़ने की जो आदतें बच्चे स्कूल में विकसित करते हैं, वे अक्सर जीवन भर उनके साथ रहती हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारा सुझाई गई किताबें एक युवा व्यक्ति की सोच का दिशा बदल सकती हैं।

स्कूल जीवन में आरईपी के अर्थपूर्ण समावेश के लिए कई स्तरों पर सोच-समझकर कोशिशें करनी होंगी:

• पुस्तकालय-कक्षाओं को केवल निगरानी वाले अध्ययन कक्ष के बजाय, सक्रिय ज्ञान-प्राप्ति स्थान के रूप में पुनर्जीवित करना,  

• निर्देश के अनुसार पढ़ने और कहानी सुनाने वाले सत्रों को प्रोत्साहित करना, जहां शिक्षक अपनी पसंदीदा किताबें साझा करें 

• सहपाठियों के नेतृत्व में किताब पर चर्चा और पठन-समूह बनाना, जिससे पढ़ने की आदत पर छात्रों को अपना अधिकार महसूस हो

• पढ़ाई को स्कूल जीवन की दैनिक दिनचर्या में शामिल करना, ताकि यह सुबह की सभा जितना ही स्वाभाविक लगे

• विभिन्न लेखन विधियों को समझकर लेखन कौशल में सुधार करना।

एक जीवंत और विकसित होता पुस्तकालय 

पारंपरिक पुस्तकालय अपने अलमारियों में स्थिर और भौतिक आयामों से बंधे होते हैं – इसके विपरीत राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय को गतिशील बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह आपके हाथ में किताबों का खजाना है। यह पाठकों को यह व्यक्त करने भी मौका देता है कि कौन सी अन्य किताबें जोड़ी जानी चाहिए। उपलब्ध किताबें भारत की समृद्ध विरासत और संस्कृति के बारे में भी हैं, जिसे युवा पीढ़ी को जानना चाहिए।

इसका बहुभाषी आधार भी उतना ही अहम है। एक बच्चा उस भाषा में सबसे बेहतर और स्वाभाविक रूप से पढ़ता है, जिसमें वह सोचता है। 23 भाषाओं में किताबें पेश करके – आगे और विस्तार करने की महत्वाकांक्षा के साथ – आरईपी भारत की भाषाई विविधता का सम्मान करता है, इसे केवल एक प्रबंधनीय चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि एक रचनात्मक ताकत के रूप में देखता है, जिसका जश्न मनाया जाना चाहिए। इस प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद हर भाषा एक दरवाज़े की तरह है, जिससे गुज़रकर बच्चा एक नई दुनिया में कदम रख सकता है। 8 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए, यह प्लेटफ़ॉर्म माता-पिता और शिक्षकों को कहानियाँ ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

एक सामूहिक ज़िम्मेदारी

अंततः, राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय की सफलता केवल डाउनलोड और पंजीकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या से तय नहीं होगी, भले ही ये संकेत महत्वपूर्ण हैं। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि क्या पढ़ना फिर से एक आदत बन जाता है – घरों में, स्कूलों में, भारत के विविध और अद्वितीय समुदायों के एकांत कोनों में। किसी दूर-दराज़ इलाके के बच्चे की आँखें तब चमक उठती हैं, जब वह ऐसी किताब पढ़ता है, जिसके बारे में उसने सिर्फ़ सुना होता है।

पढ़ने के लिए राष्ट्रीय आह्वान

यह प्लेटफ़ॉर्म ‘राष्ट्रीय काव्य उत्सव’ जैसी गतिविधियाँ भी आयोजित करता रहता है और नागरिकों से कहानी सुनाने में योगदान देने का आह्वान भी करता है। राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय में और भी कई मज़ेदार और दिलचस्प गतिविधियाँ लगातार शामिल होती रहेंगी।

भारत हमेशा से कहानियों की सभ्यता रहा है। लिखित रूप से पहले की मौखिक परंपराओं से लेकर हिंदी, संस्कृत, तमिल, बंगाली, मराठी और अन्य कई भाषाओं के महान साहित्य तक, इस देश में कहानियों की कभी कमी नहीं रही। आज संकट कहानियों पर नहीं, बल्कि उन्हें खोजने की आदत पर है – यानि शांति से बैठकर किसी वाक्य को समझने और किसी किताब को वह समय देने की इच्छाशक्ति, जिसकी वह मांग करती है।

“जब नागरिक पढ़ते हैं, तो देश आगे बढ़ता है।”

                                 – माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी

(सुश्री अर्चना शर्मा अवस्थी, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग में अपर सचिव हैं। श्री युवराज मलिक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के निदेशक हैं।)

राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय https://ndl.education.gov.in/home पर और एंड्राइड व आईओएस पर निःशुल्क उपलब्ध है।

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पीआईबी चंडीगढ़ द्वारा झज्जर में सरकारी योजनाओं पर ‘वार्तालाप’ का आयोजन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

झज्जर में सरकारी योजनाओं पर PIB चंडीगढ़ का ‘वार्तालाप’, मीडिया से जन-जन तक योजनाओं की जानकारी पहुंचाने की अपील

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (PIB), चंडीगढ़ की ओर से बुधवार को झज्जर में केंद्र और राज्य सरकार की प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं पर मीडिया कार्यशाला ‘वार्तालाप’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य सरकारी योजनाओं और जनकल्याणकारी पहलों की जानकारी मीडिया के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासन तथा मीडिया के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ झज्जर की उपायुक्त वर्षा खांगवाल ने किया। इस अवसर पर अतिरिक्त उपायुक्त जग निवास, एसडीएम रवि मीणा, डीआईपीआरओ दिनेश कुमार, जिला कार्यक्रम अधिकारी नेहा दहिया सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी और मीडिया प्रतिनिधि मौजूद रहे।

सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने में मीडिया की अहम भूमिका

उपायुक्त वर्षा खांगवाल ने कहा कि ‘वार्तालाप’ भारत सरकार, राज्य सरकार, जिला प्रशासन और मीडिया के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे कार्यक्रमों के जरिए जमीनी स्तर पर लोगों तक जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने में मदद मिलती है।

उन्होंने मीडिया प्रतिनिधियों से पात्र लाभार्थियों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया, ताकि योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंच सके।

उपायुक्त ने सोशल मीडिया की भूमिका पर भी जोर देते हुए कहा कि सोशल मीडिया दूरदराज के क्षेत्रों की समस्याओं और मुद्दों को सामने लाने तथा सूचनाओं को तेजी से साझा करने का प्रभावी माध्यम है। हालांकि, उन्होंने फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं से बचने के लिए खबर प्रसारित करने से पहले विश्वसनीय स्रोत से तथ्य सत्यापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

स्वतंत्रता दिवस अभियानों की भी दी जानकारी

वर्षा खांगवाल ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिले में चलाए जा रहे ‘हर घर तिरंगा’, ‘देश के नाम संदेश’ और ‘वंदे मातरम् अभियान’ का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जिले के विभिन्न क्षेत्रों को कवर करने के लिए ‘हर घर तिरंगा’ वैन भी चलाई जा रही है।

उन्होंने ‘वार्तालाप’ के आयोजन के लिए PIB चंडीगढ़ के प्रयासों की सराहना की और कहा कि इस तरह के कार्यक्रम केंद्र एवं राज्य के सूचना तंत्र तथा मीडिया के बीच बेहतर समन्वय बनाने में मददगार हैं।

योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी

अतिरिक्त उपायुक्त जग निवास ने कहा कि सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एकजुटता और सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने मीडिया से जनहितकारी योजनाओं की सही और सकारात्मक जानकारी जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ लोगों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने में सहयोग करने की अपील की।

एसडीएम रवि मीणा ने स्वयं सहायता समूहों (SHG) के उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि SHG उत्पादों को व्यापक पहचान मिलने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिलेगा।

2017 से करीब 35 हजार लाभार्थियों को PMMVY का लाभ

महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला कार्यक्रम अधिकारी नेहा दहिया ने महिलाओं और बच्चों के कल्याण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने आपकी बेटी हमारी बेटी योजना, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) और मुख्यमंत्री मातृत्व सहायता योजना सहित कई योजनाओं के बारे में बताया।

उन्होंने जानकारी दी कि 2017 से अब तक झज्जर जिले में करीब 35 हजार लाभार्थी प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का लाभ उठा चुके हैं। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं ने महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार लाने में मदद की है।

किसानों और पर्यावरण से जुड़ी योजनाओं पर भी चर्चा

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के एसडीओ जगजीत सिंह सांगवान ने किसानों के लिए संचालित योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’, ड्रिप सिंचाई, पीएम-किसान सम्मान निधि और जैविक खेती जैसी पहलों पर प्रकाश डाला।

वन विभाग के आशीष कादियान ने पर्यावरण संरक्षण से संबंधित पहलों की जानकारी देते हुए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि झज्जर जिले में इस वर्ष तीन लाख से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है।

उन्होंने बताया कि झज्जर स्थित भिंडावास वन्यजीव अभयारण्य अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में रामसर साइट के तौर पर मान्यता प्राप्त है।

PIB की विभिन्न इकाइयों की भूमिका की जानकारी

PIB चंडीगढ़ के मीडिया एवं संचार अधिकारी अहमद खान ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत कार्यरत विभिन्न संगठनों की भूमिका की जानकारी दी। इनमें PIB, केंद्रीय संचार ब्यूरो (CBC), प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI), प्रसार भारती, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC), प्रकाशन विभाग और फैक्ट चेक इकाई शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि ‘वार्तालाप’ सरकारी योजनाओं और पहलों की प्रमाणिक जानकारी के प्रभावी प्रसार तथा बेहतर संवाद का महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने पत्रकारों को PIB की रिसर्च यूनिट और वेबसाइट पर उपलब्ध विश्लेषण एवं आंकड़ों के उपयोग की जानकारी भी दी।

कार्यक्रम के दौरान डीआईपीआरओ दिनेश कुमार ने मीडिया से सूचनाओं को सकारात्मक, संतुलित और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करने की अपील की।

कार्यक्रम के अंत में PIB चंडीगढ़ के मीडिया एवं संचार अधिकारी अहमद खान ने उपायुक्त, जिला प्रशासन, विभिन्न विभागों के अधिकारियों और मीडिया प्रतिनिधियों का सहभागिता एवं सुझावों के लिए आभार व्यक्त किया।

पंजाब में प्राथमिकता क्षेत्र को ₹2.56 लाख करोड़ के नए कर्ज का लक्ष्य, 177वीं SLBC बैठक में बैंकिंग प्रगति की समीक्षा

जून 2026 तक ₹1.24 लाख करोड़ के प्राथमिकता क्षेत्र ऋण का वितरण; पंजाब का क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात 64.88% पहुंचा

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

पंजाब में प्राथमिकता क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में ₹2.56 लाख करोड़ के नए ऋण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह जानकारी बुधवार, 12 अगस्त 2026 को चंडीगढ़ में आयोजित पंजाब की 177वीं स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी (SLBC) बैठक में दी गई।

बैठक की अध्यक्षता पंजाब नेशनल बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अमित श्रीवास्तव ने की। बैठक में पंजाब सरकार के वित्त सचिव शौकत परी अहमद, भारतीय रिजर्व बैंक चंडीगढ़ के रीजनल डायरेक्टर विवेक कुमार श्रीवास्तव, NABARD चंडीगढ़ के चीफ जनरल मैनेजर बी. रमेश बाबू, भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के चंद्रदीप कुमार झा और SLBC पंजाब के कन्वीनर रामानुज प्रसाद सहित विभिन्न बैंकों और सरकारी विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

जून तक ₹1.24 लाख करोड़ का प्राथमिकता क्षेत्र ऋण वितरित

बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी जून 2026 तक बैंकिंग क्षेत्र के प्रदर्शन की समीक्षा की गई।

अमित श्रीवास्तव ने बताया कि Annual Credit Plan 2026-27 के तहत 30 जून 2026 तक प्राथमिकता क्षेत्र में ₹1,24,225 करोड़ के ऋण वितरित किए जा चुके हैं। यह निर्धारित तिमाही लक्ष्य ₹64,083 करोड़ का 194 प्रतिशत है।

उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि पंजाब में बैंकों और राज्य सरकार की मशीनरी के बीच बेहतर तालमेल और मजबूत वित्तीय प्रदर्शन को दर्शाती है।

पंजाब का CD Ratio राष्ट्रीय बेंचमार्क से अधिक

बैठक में बताया गया कि पंजाब का Credit-Deposit (CD) Ratio 64.88 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय बेंचमार्क 60 प्रतिशत से अधिक है।

राज्य के वित्त सचिव शौकत परी अहमद ने बैंकों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि पंजाब में MSME और कृषि क्षेत्र में विकास की काफी संभावनाएं हैं। उन्होंने बैंकों से सरकारी योजनाओं के तहत लंबित ऋण आवेदनों का जल्द निपटारा करने और Credit-Deposit Ratio में और सुधार के लिए सामूहिक प्रयास करने का आग्रह किया।

18 RSETI संस्थान दे रहे हैं निशुल्क प्रशिक्षण

SLBC पंजाब के कन्वीनर रामानुज प्रसाद ने बताया कि RBI की ओर से जारी नई Lead Bank Scheme 9 जून 2026 से लागू हो गई है।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पंजाब में 18 Rural Self-Employment Training Institutes (RSETIs) निशुल्क संचालित किए जा रहे हैं, जिनके माध्यम से स्वरोजगार और कौशल विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।

साइबर क्राइम और म्यूल अकाउंट पर सख्त निगरानी की सलाह

RBI चंडीगढ़ के रीजनल डायरेक्टर विवेक कुमार श्रीवास्तव ने वित्तीय स्थिरता, नियामकीय अनुपालन और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था पर जोर दिया। उन्होंने बैंकों को राज्य सरकार के साथ बेहतर तालमेल के जरिए वित्तीय समावेशन और विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की सलाह दी।

उन्होंने साइबर अपराध और म्यूल अकाउंट के दुरुपयोग को रोकने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा व्यवस्था और सख्त निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही KYC और Re-KYC अनुपालन सुनिश्चित करने की बात कही।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल KYC से जुड़े मुद्दों के कारण सरकारी लाभ से संबंधित लेनदेन को अनावश्यक रूप से नहीं रोका जाना चाहिए।

कृषि ऋण बढ़ाने पर NABARD का जोर

NABARD चंडीगढ़ के चीफ जनरल मैनेजर बी. रमेश बाबू ने बैंकों और लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर्स से कृषि क्षेत्र में ऋण की पहुंच और बढ़ाने की अपील की। उन्होंने विभिन्न योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए NABARD की ओर से हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।

RBI के जनरल मैनेजर पंकज सेतिया ने Financial Inclusion Strategy 2025-30 पर विशेष जोर दिया, जबकि वित्त मंत्रालय के चंद्रदीप कुमार झा ने केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता बताई।

बैठक के अंत में पंजाब एंड सिंध बैंक के चीफ जनरल मैनेजर राजेंद्र कुमार ने सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद किया।

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Punjab SLBC Meeting 2026: प्राथमिकता क्षेत्र को ₹2.56 लाख करोड़ के नए कर्ज का लक्ष्य

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पंजाब की 177वीं SLBC बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्राथमिकता क्षेत्र को ₹2.56 लाख करोड़ के नए ऋण का लक्ष्य तय किया गया। जून तक ₹1.24 लाख करोड़ का ऋण वितरित हो चुका है।

ट्रिब्यूनल सुधार: संस्थाओं को मज़बूत करना, न्याय को आगे बढ़ाना

न्याय में आसानी, बिज़नेस करने में आसानी और एक विकसित भारत के लिए एक सुधार रोडमैप @2047

एक विकसित भारत की ओर भारत का सफ़र सुधारों की एक कहानी है, जो देश के लोगों की क्षमताओं और उम्मीदों के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। यह सिर्फ़ आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंस्टीट्यूशनल सुधारों का भी सफ़र है। जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ती है, बिज़नेस बढ़ते हैं, निवेश बढ़ता है और देश ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मज़बूत करता है, आर्थिक गतिविधियों को सपोर्ट करने वाले संस्थानों को भी तेज़ी, पारदर्शिता और भरोसे के साथ आगे बढ़ना होगा। हाल ही में पास हुआ ट्रिब्यूनल सुधार बिल, 2026 इस दिशा में एक ज़रूरी कदम है।

ट्रिब्यूनल सुधार बिल, जिसे अब ज़रूरी संसदीय मंज़ूरी मिल गई है और जो कानून बन रहा है, ट्रिब्यूनल के असल अधिकार क्षेत्र को बदले बिना उनके गवर्नेंस स्ट्रक्चर को मज़बूत करने की कोशिश करता है। इसका मुख्य फ़ोकस इंस्टीट्यूशनल है: नियुक्तियों, गवर्नेंस, पारदर्शिता, सेवा की शर्तों, निष्पक्षता और कुशलता में सुधार। इस लिहाज़ से, यह बिल भारत के लीगल और रेगुलेटरी इकोसिस्टम को ज़्यादा मॉडर्न, भरोसेमंद और असरदार बनाने के मकसद से एक बड़े सुधार के सफ़र के अगले फेज़ को दिखाता है। पिछले एक दशक में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में, देश ने अलग-अलग एरिया में बड़े स्ट्रक्चरल सुधार देखे हैं। GST ने इनडायरेक्ट टैक्स सिस्टम को बदल दिया; इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड ने इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन फ्रेमवर्क को मज़बूत किया; GIFT सिटी फाइनेंशियल फ्रेमवर्क और ‘जन विश्वास’ पहल ने डीक्रिमिनलाइज़ेशन को बढ़ावा दिया और लीगल कम्प्लायंस का बोझ कम किया; डिजिटल इंडिया ने गवर्नेंस को टेक्नोलॉजी से जोड़ा है; हज़ारों कम्प्लायंस कम हुए हैं; कॉलोनियल ज़माने के कानून रद्द कर दिए गए और नए क्रिमिनल कानूनों ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को मॉडर्न बनाया। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल “रिफॉर्म, परफॉर्मेंस और ट्रांसफॉर्मेशन” के इस बड़े कॉन्सेप्ट में पूरी तरह से फिट बैठता है।

मॉडर्न इकॉनमी की ज़रूरतों के कॉन्टेक्स्ट में देखने पर ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स की इंपॉर्टेंस साफ़ हो जाती है। ट्रिब्यूनल टैक्सेशन, कंपनी लॉ, सिक्योरिटीज़, एनवायरनमेंट और दूसरे रेगुलेटरी मामलों जैसे खास एरिया से डील करते हैं। इनका मकसद संवैधानिक अदालतों की जगह लेना नहीं है, बल्कि खास न्यायिक फैसले देकर और एक असरदार न्याय व्यवस्था में योगदान देकर न्याय व्यवस्था को पूरा करना है।

बढ़ती अर्थव्यवस्था में, झगड़ा सिर्फ अकाउंटिंग, कैलकुलेशन या कानूनी चूक का सवाल नहीं है। झगड़े के पीछे एक एंटरप्रेन्योर का भरोसा, एक इंडस्ट्री का इन्वेस्टमेंट, एक बिज़नेस का भविष्य, रोज़गार के मौके और आर्थिक गतिविधियों का जारी रहना हो सकता है। जब झगड़े समय पर और सही तरीके से सुलझ जाते हैं, तो कैपिटल फिर से प्रोडक्टिव सर्कुलेशन में आ जाता है और आर्थिक व्यवस्था में भरोसा मज़बूत होता है।

ऐसा होता है। इसलिए, ‘ईज़ ऑफ़ जस्टिस’ और ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ आपस में जुड़े हुए हैं और एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

42वें कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट के ज़रिए 1976 में संविधान में आर्टिकल 323A और 323B जोड़े गए। इनके ज़रिए एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और दूसरे स्पेशल केस के सिस्टम की नींव रखी गई। इसका मकसद ऐसे केस के लिए एक स्पेशलिस्ट ज्यूडिशियल सिस्टम बनाना था, जिनके लिए खास जानकारी और एक्सपर्टीज़ की ज़रूरत होती है।

समय के साथ, अलग-अलग मिनिस्ट्री और डिपार्टमेंट के तहत कई ट्रिब्यूनल बनाए गए। इससे उनका सिस्टम बिखर गया। एडमिनिस्ट्रेटिव तरीकों में भी अंतर आने लगे और अलग-अलग प्रोसीजर की संख्या बढ़ गई। इस सिस्टम को सही और आसान बनाने की ज़रूरत को देखते हुए, मोदी सरकार ने 2015 में ट्रिब्यूनल को फिर से बनाने का प्रोसेस शुरू किया। 2017 के फाइनेंस एक्ट ने एक जैसे काम करने वाले ट्रिब्यूनल को मिला दिया और उनकी संख्या 26 से घटाकर 19 कर दी। इसके बाद 2017 और 2020 में ट्रिब्यूनल रूल्स आए।

इसके बाद 2021 में ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स ऑर्डर और ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट आया। इसके ज़रिए ट्रिब्यूनल की संख्या 19 से घटाकर 16 कर दी गई। हालाँकि, इन कानूनों के कई नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियरी की आज़ादी और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया था।

रोजर मैथ्यू बनाम मद्रास बार एसोसिएशन और 19 नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले समेत कई न्यायिक फैसलों में लगातार यह माना गया है कि ट्रिब्यूनल के सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा की शर्तें ज्यूडिशियरी की आज़ादी के हिसाब से होनी चाहिए। इन मामलों में यह भी साफ़ किया गया कि ट्रिब्यूनल को एग्जीक्यूटिव के कंट्रोल से आज़ाद रखा जाना चाहिए।

साथ ही, एक नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, जो ट्रिब्यूनल के सिस्टम को ट्रांसपेरेंट और इंडिपेंडेंट तरीके से चला सके। इसी बैकग्राउंड में और संविधान और सुप्रीम कोर्ट के बताए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026 लाया गया है। इसका मकसद देश में एक मॉडर्न, इंडिपेंडेंट और यूनिफॉर्म ट्रिब्यूनल सिस्टम बनाना है, जो असरदार तरीके से काम कर सके।

इस बिल का सबसे ज़रूरी प्रस्तावना नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन है। प्रस्तावित कमीशन के तहत 16 ट्रिब्यूनल को एक कॉमन सिस्टम के तहत लाया जाएगा। इससे उनके एडमिनिस्ट्रेशन और कामकाज के लिए एक यूनिफॉर्म इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क बनेगा। प्रस्तावित कमीशन को सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज या हाई कोर्ट के एक पूर्व चीफ जस्टिस हेड करेंगे। उनके साथ दो ज्यूडिशियल मेंबर और दो टेक्निकल मेंबर होंगे।

इस प्रोविज़न का मकसद ट्रिब्यूनल के एडमिनिस्ट्रेशन में ज्यूडिशियल एक्सपर्टीज़ और टेक्निकल एक्सपर्टीज़ दोनों का बेहतर कोऑर्डिनेशन पक्का करना है। नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन को ट्रिब्यूनल में अपॉइंटमेंट के प्रोसेस में अहम रोल देने का प्रस्ताव है। इसमें मेंबर की खोज और सिलेक्शन, अपॉइंटमेंट, जांच और हटाने से जुड़े प्रोसेस शामिल होंगे। इन सभी कामों के लिए एक इंस्टीट्यूशनल व्यवस्था बनाकर, बिल का मकसद अपॉइंटमेंट प्रोसेस को ज़्यादा ट्रांसपेरेंट, स्ट्रीमलाइन्ड, मेरिट-बेस्ड और इंडिपेंडेंट बनाना है। इसलिए, नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन के तहत एक अलग सेक्रेटेरिएट बनाने का भी प्रस्ताव है। इससे सभी ट्रिब्यूनल के एडमिनिस्ट्रेशन में एक जैसापन लाने में मदद मिलेगी।

एक ऐसे सिस्टम में एक जैसापन बहुत ज़रूरी है जहां ट्रिब्यूनल अलग-अलग खास एरिया में काम करते हैं, लेकिन उनकी इंस्टीट्यूशनल ज़रूरतें काफी हद तक एक जैसी होती हैं। अपॉइंटमेंट, सर्विस की शर्तों और सिलेक्शन प्रोसेस के लिए साफ क्राइटेरिया तय करने के साथ-साथ सभी ट्रिब्यूनल के लिए एक कॉमन नेशनल ट्रिब्यूनल डेटा ग्रिड बनाने से एडमिनिस्ट्रेटिव बिखराव कम होगा और पूरे ट्रिब्यूनल सिस्टम में ज़्यादा एक जैसापन और निरंतरता आएगी।

बिल में ट्रिब्यूनल के चेयरपर्सन और मेंबर के लिए पांच साल का टर्म तय किया गया है। यह टर्म एक तय मैक्सिमम एज लिमिट के तहत होगा। हालांकि, कोई अलग से मिनिमम एज लिमिट तय नहीं की गई है। सैलरी, अलाउंस और सर्विस की दूसरी शर्तें नियमों के ज़रिए तय करने का प्रस्ताव है। यह साफ़ प्रोविज़न ज़रूरी है, क्योंकि सर्विस की शर्तों में स्टेबिलिटी और रिलायबिलिटी इंस्टीट्यूशनल स्टेबिलिटी और ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस को मज़बूत करती है। खास बात यह है कि बिल किसी भी ट्रिब्यूनल के ओरिजिनल जूरिस्डिक्शन में कोई बदलाव नहीं करता है। हर ट्रिब्यूनल का जूरिस्डिक्शन उसके अपने ओरिजिनल कानून के हिसाब से तय होता रहेगा। इस रिफॉर्म को समझने के लिए इस अंतर को समझना ज़रूरी है। बिल ट्रिब्यूनल के जूरिस्डिक्शन को एक जगह से दूसरी जगह रीडिस्ट्रिब्यूट करने के बारे में नहीं है। इसका मकसद उस इंस्टीट्यूशनल अरेंजमेंट को मज़बूत करना है जिसके ज़रिए ट्रिब्यूनल अपने जूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए, ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल को संविधान के प्रिंसिपल्स के हिसाब से ज्यूडिशियल एडमिनिस्ट्रेशन को मज़बूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। एक ट्रिब्यूनल सिस्टम जो इंडिपेंडेंट, ट्रांसपेरेंट, प्रोफेशनली चलता है और समय पर जस्टिस देने में सक्षम है, वह रूल ऑफ़ लॉ को मज़बूत करता है और ज्यूडिशियल सिस्टम में लोगों का भरोसा बढ़ाता है।

यह सिर्फ़ भारत की उभरती इकॉनमी के लिए एक एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म नहीं है। यह डेवलपमेंट के लिए एक बड़े फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है। एक डेवलप्ड इकॉनमी को न सिर्फ़ सड़क, रेलवे, पोर्ट, सी लेन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत होती है, बल्कि एक मज़बूत लीगल, ज्यूडिशियल और इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क की भी ज़रूरत होती है। असरदार ट्रिब्यूनल इस इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा हैं।

इस एक्ट से बनी मज़बूत इंस्टीट्यूशनल व्यवस्था समय पर अपॉइंटमेंट, बेहतर गवर्नेंस, ट्रांसपेरेंट प्रोसेस और झगड़ों का असरदार और तेज़ी से हल पक्का करने में मदद करेगी। इससे एक ऐसा ट्रिब्यूनल सिस्टम डेवलप होगा जो ज़्यादा स्ट्रीमलाइन्ड, भरोसेमंद और नागरिकों, बिज़नेस और इकॉनमी की ज़रूरतों के लिए ज़्यादा रिस्पॉन्सिव होगा। यह एक मॉडर्न लीगल सिस्टम बनाने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है जो मॉडर्न इकॉनमी और डेवलप्ड इंडिया की उम्मीदों के हिसाब से हो। बेहतर गवर्नेंस, इंस्टीट्यूशनल इंडिपेंडेंस, ट्रांसपेरेंसी और एफिशिएंसी को मज़बूत करके, यह रिफॉर्म ‘ईज़ ऑफ़ जस्टिस’ को बढ़ावा देगा, ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ को मज़बूत करेगा और इंडिया के लीगल और इंस्टीट्यूशनल सिस्टम को और मज़बूत करेगा।

जैसे-जैसे इंडिया ‘डेवलप्ड इंडिया @2047’ की ओर बढ़ रहा है और रिफॉर्म की रफ़्तार तेज़ कर रहा है, रिफॉर्म की भावना देश के डेवलपमेंट में योगदान देने वाले हर इंस्टीट्यूशन तक पहुँचनी चाहिए। मज़बूत संस्थाएँ भरोसा जगाती हैं, भरोसा इन्वेस्टमेंट बढ़ाता है, इन्वेस्टमेंट से इकोनॉमिक ग्रोथ बढ़ती है और एक असरदार ज्यूडिशियरी यह पक्का करती है कि यह अच्छा चक्र ‘कानून के राज’ से चलता रहे। ‘ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026’ इस चक्र को मज़बूत करने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है।

(लेखक भारत सरकार में कानून और न्याय के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय मामलों के राज्य मंत्री हैं)