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CBC चंडीगढ़ ने साइबर जागरुकता और सोशल मीडिया के प्रभाव पर किया कार्यशाला का आयोजन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

केंद्रीय संचार ब्यूरो (CBC), क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ़ द्वारा “साइबर जागरूकता एवं सोशल मीडिया का प्रभाव” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) और केंद्रीय संचार ब्यूरो (CBC) के क्षेत्रीय कार्यालय तथा विभिन्न फील्ड कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने भाग लिया।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए श्री प्रीतम सिंह, निदेशक, क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ़ ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में प्रभावी जनसंचार के लिए साइबर जागरूकता और सोशल मीडिया का जिम्मेदार उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकारी कार्यालयों में महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील सूचनाओं के साथ कार्य किया जाता है, इसलिए प्रत्येक अधिकारी एवं कर्मचारी को साइबर खतरों, फिशिंग, संदिग्ध लिंक, ऑनलाइन धोखाधड़ी तथा भ्रामक सूचनाओं के प्रति सतर्क रहना चाहिए।

श्री प्रीतम सिंह ने कहा कि सोशल मीडिया जनसंचार और नागरिकों तक सरकारी सूचनाएं पहुंचाने का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। हालांकि, इसकी प्रभावशीलता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। उन्होंने अधिकारियों एवं कर्मचारियों से आग्रह किया कि किसी भी सूचना को सोशल मीडिया पर साझा करने से पहले उसकी सत्यता और स्रोत की पुष्टि अवश्य करें। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते समय आधिकारिक जानकारी, व्यक्तिगत डेटा एवं संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर बल दिया।

सुश्री सपना, उप निदेशक, केंद्रीय संचार ब्यूरो, चंडीगढ़ ने अपने संबोधन में कहा कि डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के दौर में प्रत्येक सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी के लिए डिजिटल और साइबर जागरूकता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से सरकारी योजनाओं, नीतियों और जनहितकारी सूचनाओं को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सकता है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना और भ्रामक सामग्री के प्रसार की चुनौती भी मौजूद है। उन्होंने प्रतिभागियों को सुरक्षित डिजिटल व्यवहार अपनाने, संदिग्ध लिंक एवं अटैचमेंट से सावधान रहने तथा किसी भी असामान्य ऑनलाइन गतिविधि के प्रति सतर्क रहने का आह्वान किया।

कार्यशाला में डॉ. सुमेधा सिंह, प्रोफेसर, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ ने “सोशल मीडिया का प्रभाव” विषय पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया के बदलते स्वरूप और समाज, संचार तथा जनमत पर इसके प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने सूचनाओं के आदान-प्रदान और लोगों से जुड़ने की प्रक्रिया को तेज एवं आसान बनाया है। इसके माध्यम से जागरूकता, जनभागीदारी और सूचना के व्यापक प्रसार को बढ़ावा दिया जा सकता है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना, अपुष्ट सामग्री तथा सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से सोशल मीडिया का संतुलित, विवेकपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग करने का आग्रह किया।

श्री गुरचरण सिंह, फैकल्टी सदस्य, केंद्रीय अन्वेषण प्रशिक्षण संस्थान (CDTI), चंडीगढ़ ने “साइबर जागरूकता” विषय पर प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने विभिन्न प्रकार के साइबर खतरों और उनसे बचाव के लिए आवश्यक सावधानियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने संदिग्ध ई-मेल, संदेश, लिंक और ऑनलाइन अनुरोधों पर सावधानी बरतने तथा महत्वपूर्ण डिजिटल जानकारी को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने मजबूत पासवर्ड, सुरक्षित डिजिटल व्यवहार और साइबर घटनाओं की समय पर रिपोर्टिंग को साइबर सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया।

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को साइबर सुरक्षा से संबंधित व्यवहारिक सावधानियों, डिजिटल माध्यमों के सुरक्षित उपयोग तथा सोशल मीडिया पर जिम्मेदार आचरण के संबंध में जागरूक किया गया। कार्यक्रम में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के प्रभाव से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की तथा अपने अनुभव भी साझा किए।

कार्यशाला का उद्देश्य कार्यालयीन कार्यों में डिजिटल माध्यमों के सुरक्षित एवं प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देना तथा अधिकारियों एवं कर्मचारियों को साइबर खतरों एवं सोशल मीडिया से संबंधित चुनौतियों के प्रति अधिक जागरूक बनाना था।

प्राकृतिक खेती – सतत कृषि और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

भारत ने पिछले दशक में कृषि क्षेत्र में तेज प्रगति की है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, पिछले 5 सालों में विकास दर 4% से अधिक रही है। खाद्यान्न, बागवानी और तेलहन फसलों का बंपर उत्पादन हुआ है। यह किसानों द्वारा नई तकनीकों को अपनाने और सिंचाई वाले क्षेत्र का विस्तार, बेहतर जल उपयोग दक्षता और समय पर व पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्धता जैसी सरकार की ठोस नीतियों के समर्थन का परिणाम है। बागवानी फसलों की हिस्सेदारी भी काफ़ी बढ़ रही है और इसकी विकास दर अपेक्षाकृत अधिक है।      

हालांकि, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं, जिसके कारण मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और प्रमुख फसलों की उत्पादकता में स्थिरता आ रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (एनयूई) में धीरे-धीरे आई कमी के कारण एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है, जिसमें किसान रासायनिक खादों की मात्रा तो लगातार बढ़ा रहे हैं, लेकिन उत्पादकता में बहुत मामूली बढ़ोतरी ही हो रही है।    

सरकार की मृदा स्वाथ्य और उर्वरक योजना के तहत 26 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्डों का वितरण किया गया है। इससे प्राप्त डेटा के अखिल-इंडिया विश्लेषण से चिंताजनक बात सामने आई है कि मिट्टी में जैविक कार्बन (एसओसी)  और अन्य जरूरी सूक्ष्म-पोषक तत्वों की भारी कमी है। स्वस्थ मिट्टी में एसओसी 1% से अधिक होना चाहिए, लेकिन यह औसतन 0.5% के आसपास है और कुछ क्षेत्रों में यह 0.3% तक के यह खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

कम मात्रा में एसओसी से मिट्टी की सरंध्रता कम हो जाती है, जिसका दोहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है: पानी का जमीन में रिसाव और जल धारण क्षमता, दोनों में कमी आती है। परिणामस्वरूप, वर्षा और सिंचाई का पानी बह जाता है, जो ऊपरी मिट्टी को बहा ले जाता है और न तो यह जमीन के नीचे जाकर भूजल स्तर बढ़ा पाता है और न ही पौधों की वृद्धि के लिए आसानी से उपलब्ध रहता है।

कम एसओसी का एक और नकारात्मक प्रभाव यह है कि ऐसे मिट्टी पर उगाए जाने वाले पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता कम हो जाती है। समान उत्पादकता स्तर तक पहुँचने के लिए अधिक से अधिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ी हुई खुराक उर्वरक उपयोग दक्षता को और कम कर देती है, जिससे मृदा-स्वास्थ्य का नुकसान होता है और देश रासायनिक उर्वरकों या उनके घरेलू उत्पादन के कच्चे माल को आयात करने में अपनी कीमती विदेशी मुद्रा खर्च करता है।  

अत्यधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग ने उन लाभकारी सूक्ष्मजीवों और कीड़ों को भी कम कर दिया है, जो मिट्टी की सरंध्रता को बेहतर बनाने और गहरी मिट्टी से पोषक तत्वों को ऊपरी मिट्टी तक स्थानांतरित करने में मदद करते हैं, ताकि पौधे उन्हें अवशोषित कर सकें।

एक अन्य चिंताजनक प्रभाव उपज की गुणवत्ता और सुरक्षा पर पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि रसायन खाने-पीने और पशु चारे की श्रृंखला में पहुँच जायेंगे और आखिरकार मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करेंगे। ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें फलों, सब्जियों, अनाज और अन्य वाणिज्यिक फसलों में कीटनाशकों का न्यूनतम अवशेष स्तर तय सीमा को पार कर गया है, जिसके चलते निर्यात की खेपें रद्द होती हैं और वैश्विक बाजार में ब्रांड इंडिया की छवि पर बुरा पड़ता है।

हालांकि ये चिंताएँ कुछ समय से व्यक्त की जा रही हैं, लेकिन सरकार ने वर्ष 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की शुरुआत की, जिसका मुख्य उद्देश्य सतत कृषि के लिए पशुधन या गाय आधारित रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना है, ताकि मिट्टी की सेहत खासकर एसओसी में सुधार हो सके, पौष्टिक तत्वों के अवशोषण की क्षमता बढ़ सके और रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर देश की निर्भरता कम हो सके। 

प्राकृतिक खेती, जिसे इसके समर्थकों द्वारा आमतौर पर ‘जीरो बजट खेती’ कहा जाता है, एक ऐसी तकनीक पर आधारित है, जिसे किसानों ने कई सालों तक आज़माया और परखा है तथा इसे मान्यता दी है। इसके परिणाम भी बहुत उत्साहजनक रहे हैं। यह एक समग्र तकनीकी समाधान पर आधारित है, जिसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जाता है, जैसे स्थानीय नस्ल की गाय का गोबर और गोमूत्र, जिनकी लागत किसान के लिए लगभग शून्य होती है। 

बीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाला बीजामृत सूत्र बेहतर अंकुरण और मजबूत पौधों में मदद करता है, जबकि  जीवामृत, घन-जीवामृत और सप्तयांकुर का उपचार मित्र सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी और मृदा-उत्पादकता को काफी बढ़ा देता है। पौधों के स्वास्थ्य की रक्षा सौंठास्त्र और खट्टी लस्सी के इस्तेमाल से की जाती है, जो बैक्टीरिया और फफूंद संक्रमण को रोकते हैं, जबकि विभिन्न प्रकार के कीड़ों और कीट को नियंत्रित करने के लिए ‘नीमास्त्र’, ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘अग्निअस्त्र’ और ‘दशपर्णी अर्क’ का प्रयोग किया जाता है।

उपरोक्त सभी उपचारों की सावधानीपूर्वक तैयारी और उचित मात्रा में उपयोग से मिट्टी की सेहत के बेहतर परिणाम मिले हैं और उत्पादकता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है, जबकि उपज की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। 

मिशन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से प्रगति कर रहा है, जिसका लक्षित क्षेत्र 7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक है और यह 18 लाख से अधिक किसानों को कम से कम 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में कवर करता है। कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की टीम, जिसे किसान प्रशिक्षक और कृषि सखी संसाधन व्यक्ति के रूप में सहायता प्रदान कर रहे हैं, किसानो को जागरूक कर रही है, प्रशिक्षण दे रही है और इस खेती को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

जिन किसानों के पास स्थानीय नस्ल की गायें हैं, उन्हें खेत पर ही इन उपचारों को तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही, बड़ी संख्या में जैव-इनपुट संसाधन केंद्र भी मुख्य रूप से स्थानीय डेयरियों या पशु आश्रय गृहों के निकट स्थापित किए गए हैं, ताकि ये उपचार किसानों को मामूली कीमत पर उपलब्ध कराए जा सकें।

यह मिशन विज्ञान-आधारित रणनीति के माध्यम से लागू किया जा रहा है, ताकि किसान इन प्रथाओं को बिना किसी संदेह या हिचकिचाहट के अपना सकें। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने क्षेत्र और फ़सल-विशिष्ट क्षमता मानचित्र विकसित किए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्राकृतिक खेती कहाँ प्रभावी होगी। आईसीएआर के संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में इस देसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए इसकी प्रभावशीलता को वैज्ञानिक रूप से मान्यता देने के लिए ठोस प्रयास किये जा रहे हैं। आईसीएआर संस्थानों की निगरानी में किए गए कई प्रयोगों ने कई फसलों के लिए बहुत सकारात्मक परिणाम दिए हैं और अब मिशन के ज़रिए इनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।

प्राकृतिक उत्पादों का विपणन एक और महत्वपूर्ण रणनीति है, जो किसानों की आय में वृद्धि करेगी और उन्हें इन प्रथाओं को जारी रखने के लिए प्रेरित करेगी। राष्ट्रीय जैविक और प्राकृतिक कृषि केंद्र (एनसीओएनएफ) ने प्राकृतिक खेती के लिए प्रमाणीकरण नियम बनाये हैं। बड़ी संख्या में किसानों ने पहले ही सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिए हैं, जिससे वे अपने प्रमाणित विशिष्ट उत्पाद को ऊंची कीमतों पर बेच सकते हैं।

एक तरफ जहां इस मिशन के तहत प्रमाणन, विपणन और ब्रांडिंग के साथ शुद्ध प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ एक हाइब्रिड मॉडल को प्रोत्साहन देने की रणनीति में यह दिखाया गया है कि प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने और रासायनिक उर्वरकों की खुराक को कम करने से भी लंबे समय तक उत्पादकता बनी रह सकती है और मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। इस मॉडल को व्यापक स्वीकार्यता मिल सकती है। इसे अपनाने वाले किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हाइब्रिड मॉडल में प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने से रासायनिक उर्वरकों पर धीरे-धीरे निर्भरता कम होती है। यहाँ तक कि कुछ समय बाद, किसान कई फसलों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर सकते हैं और फिर भी उतनी ही पैदावार और आमदनी बनाए रख सकते हैं। 

मध्य पूर्व में चल रहे मौजूदा संकट से पैदा हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए, हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने देश के नागरिकों से सात सूत्रीय अपील की है, जिनमें रासायनिक खाद का समझदारी से इस्तेमाल और प्राकृतिक खेती को अपनाना शामिल हैं।

एक ओर जहाँ प्राकृतिक खेती को अपनाने से खेती में स्थायित्व आ रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने में भी मदद मिल रही है, जिनका आम तौर पर दूध देने की उम्र खत्म होने के बाद परित्याग कर दिया जाता है। इसका एक और फ़ायदा यह है कि घरेलु उपभोग और निर्यात के लिए सुरक्षित भोजन मिलता है, साथ ही देश की कीमती विदेशी मुद्रा की भी बचत होती है।             

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(लेखक भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)

“रीसेंट एडवांसमेंट इन बायोइमेजिंग” पर NIPER मोहाली में कार्यशाला का आयोजन

मोहाली / सत्ता संदेश

राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर), मोहाली के चिकित्सा उपकरण विभाग ने “रीसेंट एडवांसमेंट इन बायोइमेजिंग” विषय पर चार दिवसीय कार्यशाला का 18 अगस्त 2026 को शुभारंभ किया। यह कार्यशाला 18 से 21 अगस्त 2026 तक आयोजित की जा रही है। कार्यशाला में वाइडफील्ड और कॉन्फोकल माइक्रोस्कोपी में हालिया विकास पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जिसमें तकनीकी सत्र, प्रदर्शन और प्रतिभागियों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल हैं।

कार्यशाला का उद्घाटन प्रो. दुलाल पांडा, निदेशक, नाईपर, मोहाली ने किया। इस अवसर पर एसोसिएट डीन, रजिस्ट्रार, संकाय सदस्य, आमंत्रित विशेषज्ञ और प्रतिभागी उपस्थित थे। अपने स्वागत संबोधन में प्रो. दुलाल पांडा ने माइक्रोस्कोपी के विकास, विशेष रूप से कॉन्फोकल माइक्रोस्कोपी के एक शक्तिशाली आधुनिक जैविक और जैव-चिकित्सीय अनुसंधान उपकरण के रूप में विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने फ्लोरोसेंस माइक्रोस्कोपी की परिवर्तनकारी भूमिका और ग्रीन फ्लोरोसेंट प्रोटीन (GFP) की खोज पर भी जोर दिया तथा बताया कि इमेजिंग में प्रगति ने शोधकर्ताओं को सेलुलर और मॉलिक्यूलर प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्टता और सटीकता के साथ देखने में सक्षम बनाया है।

निदेशक के संबोधन के बाद, प्रो. इप्सिता रॉय, एसोसिएट डीन, नाईपर, मोहाली ने तकनीकी प्रगति के महत्व पर जोर दिया और छात्रों को विशेषज्ञों के साथ सक्रिय रूप से संवाद करने तथा व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

कार्यशाला के आयोजक डॉ. अजय कुमार, तथा सह-आयोजक प्रो. तरुण शर्मा और डॉ. दीपांकर दास, चिकित्सा उपकरण विभाग, ने प्रतिभागियों को प्रश्न पूछने, नई संभावनाओं का पता लगाने और पारंपरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर सोचने के लिए प्रोत्साहित किया।

कार्यशाला में वाइडफील्ड और कॉन्फोकल माइक्रोस्कोपी के मूल सिद्धांतों और नवीनतम विकास के साथ-साथ सिस्टम प्रदर्शन और बहुआयामी इमेजिंग में व्यावहारिक प्रशिक्षण से संबंधित सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। अंतिम दो दिन कॉन्फोकल माइक्रोस्कोपी का उपयोग करके व्यक्तिगत प्रयोगशाला नमूनों के अधिग्रहण और विश्लेषण के लिए समर्पित हैं, जिससे प्रतिभागियों को कार्यशाला के दौरान सीखी गई अवधारणाओं और तकनीकों को अपने स्वयं के शोध नमूनों पर लागू करने का अवसर मिलेगा।

कार्यशाला का उद्देश्य एडवांस्ड बायोइमेजिंग तकनीकों के बारे में प्रतिभागियों की समझ को मजबूत करना और उन्हें फार्मास्युटिकल, जैव-चिकित्सीय तथा जीवन-विज्ञान अनुसंधान में इन तकनीकों को लागू करने के लिए व्यावहारिक कौशल प्रदान करना है।