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प्रभबीर सिंह बरार की अपील: जनगणना-2027 में पंजाबी को मातृभाषा दर्ज करें, डिजिटल प्रक्रिया अपनाएं

अमृतसर / सत्ता संदेश

संवाददाता- विक्रमजीत सिंह कैमरामैन- तरजिंदर सिंह

पनसप के चेयरमैन प्रभबीर सिंह बराड़ ने आम जनता से जनगणना-2027 में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि पंजाब के सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय जनगणना के सटीक आंकड़ों पर निर्भर करते हैं।

बराड़ ने कहा कि राज्य के विकास से संबंधित कई अहम फैसले जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लिए जाते हैं। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे बड़ी संख्या में आगे आएं और पंजाबी को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराएं, ताकि उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।

उन्होंने बताया कि जनगणना-2027 का पहला चरण “मकानों की सूचीकरण एवं आवास गणना” है। उन्होंने कहा कि आधिकारिक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से स्व-गणना प्रक्रिया सरल, सुलभ और नागरिक-केंद्रित है, जो लोगों को डिजिटल जनगणना प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करती है।

चेयरमैन बराड़ ने लोगों से इस तकनीक-आधारित प्रक्रिया को अपनाने और सक्रिय योगदान देने की अपील की। उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल से 14 मई तक उपलब्ध स्व-गणना सुविधा का अधिक से अधिक लाभ उठाएं और एक व्यापक एवं विश्वसनीय राष्ट्रीय डाटाबेस के निर्माण में योगदान दें। उन्होंने कहा कि प्रभावी योजना निर्माण और नीति निर्धारण के लिए मजबूत डाटाबेस अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने आगे कहा कि जनगणना के प्रमाणिक आंकड़े सुशासन की रीढ़ होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि कल्याणकारी योजनाएं, बुनियादी ढांचे का विकास और संसाधनों का समान वितरण समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।

उन्होंने बताया कि जनगणना-2027 के पहले चरण के तहत 15 मई से 13 जून, 2026 तक घर-घर सर्वेक्षण भी किया जाएगा। इस दौरान आवासीय स्थिति, सुविधाओं और परिसंपत्तियों से संबंधित 33 प्रश्न पूछे जाएंगे तथा प्रत्येक घर की गणना की जाएगी, ताकि कोई भी परिवार इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियान से वंचित न रह जाए।

नारंगी अर्थव्यवस्था: जनजातीय कला, हस्तशिल्प और आजीविका

रंजना चोपड़ा

वर्शांग खैयर मणिपुर के उखरूल जिले के लॉन्गपी गाँव के निवासी हैं, जो अपने और अपने परिवार की रोजी-रोटी गाँव में उपलब्ध गारे और सर्पेंटीनाइट पत्थर से बर्तन बनाकर कमाते हैं। स्थानीय तांगखुल नागा जनजातियों के अनुसार, यह पारंपरिक शिल्प, देवी पंथोइबी की कृपा है और आज यह उनकी आय का मुख्य स्रोत है और इसने छोटे से गाँव को वैश्विक मानचित्र पर ला दिया है। इसी तरह, नॉर्थी कुट्टन, जो तमिलनाडु के उद्हगमंडलम जिले के पागलकोड मंड गाँव में रहते हैं, पारंपरिक कढ़ाई कला से अपनी आजीविका कमा रहे हैं। इस कढ़ाई कला का उपयोग नीलगिरी के हरे-भरे जंगलों में बसे टोडा जनजाति समूह द्वारा किया जाता है। जीआई टैग से युक्त यह शिल्प प्रकृति और सामुदायिक बंधन का जश्न मनाता है और इसे बहुत ही सुंदरता के साथ टेबल मैट, रनर, जैकेट आदि पर अंकित किया जाता है और समकालीन उपयोग में इसे लोकप्रियता भी मिली है। खैयर और कुट्टन दोनों अपने पारंपरिक जनजातीय कला रूपों के एक उन्नत रूप का अभ्यास करके सालाना लगभग 6-8 लाख रुपये कमाते हैं।

जनजातीय आजीविका लंबे समय से ज्ञान और पारंपरिक प्रथाओं पर आधारित रही है, जहां रचनात्मकता शिल्प, परंपरा, वस्त्र, संगीत, नृत्य, कथा-वाचन और भाषाओं में निहित है। ये केवल उत्पाद या सेवाएं नहीं हैं, बल्कि ज्ञान की जीवित विरासत हैं, जो पीढ़ियों के माध्यम से आगे बढ़ती हैं। जनजातीय समुदायों के पास मौजूद रचनात्मक संपत्तियों का महत्वपूर्ण आर्थिक मूल्य है, जिसे यदि परंपरा के प्रति संवेदनशील रहते हुए सतत तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह नारंगी अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकोनॉमी) को गति दे सकता है और इस इकोसिस्टम के तहत आय उत्पन्न करने वाली गतिविधियों का सृजन कर सकता है।

रचनात्मक अर्थव्यवस्था को दर्शाने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली नारंगी अर्थव्यवस्था, यूएनसीटीएडी (संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन) के अनुमान के अनुसार 2 ट्रिलियन डॉलर से 2.25 ट्रिलियन डॉलर के बीच है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 3.1% है। भारत में, जहाँ हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र के लिए ठोस डेटा मौजूद है, वहीं जनजातीय शिल्प और आजीविका के लिए डेटा की कमी है। हालांकि, रणनीतिक निहितार्थ स्पष्ट है: जनजातीय कला और शिल्प कुछ ऐसी ग्रामीण आजीविकाएं हैं, जो वैश्विक रचनात्मक वस्तुएँ की मांग से सीधे जुड़ सकती हैं यदि प्रामाणिकता, लॉजिस्टिक्स और गुणवत्ता प्रणाली मौजूद हों।

अनुमान है कि भारत की अनुसूचित जनजाति की आबादी 104 मिलियन है और कुल आबादी में इसकी हिस्सेदारी लगभग 8.6% है। लगभग 700 अलग-अलग जनजातीय समुदाय विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों में निवास करते हैं: जंगल, पहाड़, मैदान और सीमा क्षेत्र। इस विविधता का प्रत्यक्ष आर्थिक संबंध है। यह पारिस्थितिकी के अनुसार शिल्प विशेषज्ञता को प्रतिबिंबित करता है, जैसे जंगल वाले क्षेत्रों में बांस और छड़ी, खनिज क्षेत्रों में धातु और मिट्टी, और बुनाई गलियारों में वस्त्र परंपराएँ। इसके परिणामस्वरूप, भारत के जनजातीय क्षेत्र; एकल जनजातीय शिल्प क्षेत्र के बजाय “विविध अर्थव्यवस्थाओं” से युक्त हैं। इसलिए, नीति निर्माण क्षेत्रीय रूप से भिन्न होना चाहिए और “सभी के लिए उपयुक्त एक ही शिल्प योजना” नहीं होनी चाहिए। नीतियों को कच्चे माल की सीमाओं, डिज़ाइन और गुणवत्ता संबंधी मुद्दों और बाजार संबंधों को ध्यान में रखना चाहिए।

वर्तमान में, जनजातीय कला/हस्तशिल्प आजीविका इकोसिस्टम, कई मंत्रालयों और संस्थानों के कार्यादेशों से बना है, जो विभिन्न स्तरों पर एक-जैसे हैं। जनजातीय कार्य मंत्रालय इस इकोसिस्टम का मुख्य स्तंभ है और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक अवसंरचना में सुधार करता है और ट्राइफेड (भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ लिमिटेड) के माध्यम से बाजार-जुड़ाव की सुविधा देता है। ट्राइफेड एक प्रमुख बाजार संचालक के रूप में कार्य करता है। ट्राइफेड वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) का समर्थन करता है, जो खरीद और मूल्य संवर्धन के लिए जमीनी स्तर की इकाइयाँ हैं। ट्राइफेड, ट्राइब्स इंडिया आउटलेट और आदि महोत्सव/हाट्स के माध्यम से खुदरा विपणन करता है ताकि उत्पादकों को खरीदारों और संस्थागत भागीदारों से जोड़ा जा सके। वस्त्र मंत्रालय राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (एनएचडीपी) के माध्यम से हस्तशिल्प को बढ़ावा देता है और समग्र हथकरघा/हस्तशिल्प क्लस्टर विकास योजनाओं (सीएचसीडीएस) के माध्यम से क्लस्टर अवसंरचना को प्रोत्साहन देता है और कारीगरों के डेटाबेस को अद्यतन करता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) पारंपरिक उद्योग पुनरुत्थान निधि योजना (स्फूर्ति) के माध्यम से क्लस्टर पुनरुत्थान और बिक्री-योग्यता का समर्थन करता है, स्पष्ट रूप से आपूर्ति-संचालित मॉडल के बदले बाज़ार-संचालित मॉडल का उपयोग करता है और ई-कॉमर्स को एक माध्यम के रूप में महत्व देता है।

अनुभव से पता चलता है कि ग्रामीण आजीविका मूल्य-श्रृंखला चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ये कमजोर हैं, कारीगर सीधे बाजार से जुड़े नहीं होते हैं और मध्यस्थों पर अधिक निर्भर रहते हैं। ये कारक लाभ कम कर देते हैं तथा खराब भंडारण और एकत्रीकरण की वजह से अर्थव्यवस्था के विस्तार को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि हम विश्लेषण को कारीगर परिवारों के स्तर तक और गहराई से देखें, तो जो पैटर्न दिखाई देता है वह मिश्रित अर्थव्यवस्था का है। कारीगर शिल्प कार्य को सहायक या अंशकालिक रोजगार के रूप में देखते हैं, विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में, जहां कृषि मौसम-आधारित है या परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। इस परिस्थिति में, खराब ऋण पात्रता और उद्यम विकास, बाजार से जुड़ाव की कमी और व्यापारियों पर निर्भरता से आय प्रवाह अनियमित हो जाता है।

हालांकि, शिल्प कम पूंजी में घर पर उत्पादित किए जा सकते हैं, जिनमें उच्च लाभ की संभावना भी हो सकती है। शिल्प हस्तक्षेप अक्सर महिलाओं के रोजगार, आय और सौदेबाजी की शक्ति से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। मोटे अनुमान बताते हैं कि 7 मिलियन से अधिक कारीगरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 56% से 70% से अधिक हैं और हथकरघा क्षेत्र के बुनकरों में 72.29% महिलाएं हैं। कौशल हस्तांतरण अनौपचारिक होता है और आमतौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता है। जनजातीय कला रूपों के लिए, जहां तकनीक और आख्यान में सांस्कृतिक अर्थ निहित होता है, वहाँ हस्तांतरण दोनों तरह का होता है—आर्थिक (कौशल) और सांस्कृतिक (प्रामाणिकता)।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के अंतर्गत तीन मौजूदा मॉडल मजबूत जुड़ाव के उपाय प्रदान करते हैं: वीडीवीके जैसी उत्पादनकर्ता समितियाँ, जो साझा अवसंरचना और संग्रहण प्रदान करती हैं; ट्राइब्स इंडिया स्टोर जो खरीदार से जोड़ने में मदद करते हैं और राज्य स्तर पर क्लस्टर विकास और कौशल उन्नयन के लिए सहकारी संस्थाएँ। उदाहरण के लिए, ओडिशा में 150 वीडीवीके कार्यरत हैं जिनकी कुल बिक्री ₹2,459.91 लाख है और जिसमें लगभग 40,000 जनजातीय उत्पादकों को एकीकृत किया गया है। जनजातीय विकास सहकारी निगम एक उच्च स्तरीय सहकारी संस्था है, जो जनजातीय उत्पादकों द्वारा तैयार किये गये वन और गैर-वन आधारित वस्तुओं के विपणन और ब्रांडिंग का कार्य करती है।

यह भारत के लिए एक मुख्य रणनीतिक सिफारिश को रेखांकित करता है: नारंगी अर्थव्यवस्था में जनजातीय कला/हस्तशिल्प को बेहतर क्षेत्रीय लेखांकन, लागू करने योग्य प्रामाणिकता/नैतिक व्यापार संरचना, और उत्पादक-संचालित वितरण की आवश्यकता है, जो मध्यस्थों के प्रभाव को कम करता हो। लघु-अवधि के लिए भारत ट्राइब्स फेस्ट जैसे त्योहारों को खरीद संभावना तथा उत्पाद कैटलॉग के मानकीकरण और डिजिटलीकरण के रूप में देखा जाना चाहिए एवं राष्ट्रीय एसटी वित्त विकास निगम और पीएम विश्वकर्मा जैसी योजनाओं के माध्यम से ऋण समर्थन को खरीदार आदेशों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। हालांकि, दीर्घ-अवधि के लिए सरकार को एक जनजातीय रचनात्मक अर्थव्यवस्था उपग्रह विवरण बनाने, निर्यात स्तर की अनुपालन और ब्रांड संरचना स्थापित करने और जनजातीय कला के लिए भारत-उपयुक्त नैतिक व्यापार संहिता तैयार करने पर विचार करना होगा। इन उपायों के माध्यम से, जनजातीय नारंगी अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों से उभरकर विकसित भारत @2047 की यात्रा में शामिल हो जाएगी।

अकाली दल पुनर सुरजीत और अकाली दल “वारिस पंजाब दे” के एकजुट होने से पंजाब फिर खुशहाल होगा: लवली

लुधियाना/ सत्ता संदेश

पंथक सरकार ही पंजाब को दे सकती है महाराजा रणजीत सिंह का खालसा राज

लुधियाना, 19 अप्रैल: अकाली दल पुनर सुरजीत और अकाली दल “वारिस पंजाब दे” के बीच बीते दिन हुई बैठक से पंजाब के लोगों में एक खुशहाल और प्रगतिशील सरकार के 2027 के विधानसभा चुनावों में सत्ता में आने की उम्मीद और मजबूत हुई है। ये शब्द अकाली दल “वारिस पंजाब दे” के वरिष्ठ नेता और पंजाब, पंजाबी तथा पंजाबियत की मजबूती के लिए आवाज उठाने वाले राजीव कुमार लवली ने यहां जारी एक बयान में कहे।

इस मौके पर लवली ने कहा कि मौजूदा शासन में पंजाब नशे, बेरोजगारी, गैंगस्टरवाद और कानून-व्यवस्था की खराब हालत का सामना कर रहा है। इन हालातों से समाज का हर वर्ग, फिर चाहे व्यापारी, किसान, नौकरीपेशा या युवा हो, परेशान है। उन्होंने कहा कि पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की आवाज बुलंद करने में अकाली दल पुनर सुरजीत और अकाली दल “वारिस पंजाब दे” से लोगों को काफी उम्मीदें हैं।

उन्होंने जोर देते हुए, कहा कि प्रदेश के खराब हालातों से तंग लोगों को महाराजा रणजीत सिंह के समय जैसा खालसा राज केवल इन दोनों पार्टियों की 2027 विधानसभा चुनावों में बनने वाली पंथक सरकार ही दे सकती है, जहां हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलेगा और पंजाब फिर से विकास की राह पर आगे बढ़ेगा।

मंत्रिमंडल मंत्री हरदीप सिंह मुंडियन और तरुणप्रीत सिंह सोंड ने श्री भैनी साहिब में बीडीपीओ कार्यालय का उद्घाटन किया।

नए कूम कलां ब्लॉक की स्थापना से पंचायत कार्य सुगम होगा: हरदीप सिंह मुंडियन

कूम कलां ब्लॉक से गांवों के विकास में तेजी आएगी: तरुणप्रीत सिंह सोंड कैबिनेट मंत्री हरदीप सिंह मुंडियन और कैबिनेट मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंड ने शुक्रवार को श्री भैनी साहिब के नवगठित कूम कलां ब्लॉक में ब्लॉक विकास एवं पंचायत अधिकारी के कार्यालय का उद्घाटन किया।

सहनेवाल के विधायक मुंडियन ने पंचायतों और स्थानीय निवासियों को बधाई दी और कहा कि पहले उन्हें अपने नियमित प्रशासनिक कार्यों के लिए लुधियाना जाना पड़ता था, लेकिन अब नए कूम कलां ब्लॉक के गठन से उनके लिए काम करना बहुत आसान और सुविधाजनक हो जाएगा। उन्होंने कूम कलां के ब्लॉक विकास एवं पंचायत अधिकारी राजविंदर सिंह को ब्लॉक से संबंधित सभी लंबित विकास कार्यों को जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश दिया ताकि विकास परियोजनाएं पूरी हो सकें। उन्होंने बताया कि कूम कलां ब्लॉक की सभी पंचायतों को विकास कार्यों के लिए वित्तीय अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है।

मंत्री मुंडियन ने यह भी कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान से सच्चे सेवक बनकर जनता की सेवा करने के स्पष्ट निर्देश मिले हैं। सहनेवाल निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए जो भी धनराशि मांगी गई, वह तुरंत उपलब्ध कराई गई। उन्होंने बताया कि श्री भैनी साहिब में सीवरेज व्यवस्था के लिए 13 करोड़ रुपये पहले ही स्वीकृत किए जा चुके हैं।

इस बीच, कैबिनेट मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंड ने कहा कि यह कार्यालय कुम कलां ब्लॉक की पंचायतों के लिए सुविधा प्रदान करेगा, क्योंकि लोग अपने घरों के पास ही सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे। उन्होंने आगे कहा कि पहले पंजाब में ब्लॉक बहुत बड़े होते थे। उदाहरण के लिए, एक निर्वाचन क्षेत्र में 60 गाँव होते थे, जिनमें से 40 एक ब्लॉक में और शेष 20 दूसरे ब्लॉक में आते थे। जब उन्होंने ग्रामीण विकास एवं पंचायत विभाग का कार्यभार संभाला, तो उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान से बात की और उन्हें बताया कि अन्य ब्लॉकों में आने वाले गाँवों को न तो उचित निधि मिलती है और न ही जिला प्रशासन के अधिकारी उन पर ध्यान देते हैं। बाद में, इस संबंध में उचित कार्रवाई की गई।

सोंड ने कहा कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार जनहितैषी है और यह पहली सरकार है जिसने वास्तव में आम लोगों की बात सुनी है और उनके कल्याण के लिए योजनाएँ शुरू की हैं। इन योजनाओं में घरों में 24 घंटे मुफ्त बिजली, सरकारी स्कूलों में मुफ्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा शामिल है। इसके अलावा, 10 लाख रुपये का स्वास्थ्य कार्ड परिवारों को चिकित्सा उपचार पर लाखों रुपये की बचत कराएगा, जिससे उन्हें बड़ी राहत मिलेगी। आने वाले दिनों में, बेटियों, बहनों और माताओं के लिए वित्तीय सहायता योजना 13 अप्रैल को वैशाखी के अवसर पर शुरू होगी, जिसके तहत उन्हें क्रमशः 1000 रुपये और 1500 रुपये दिए जाएंगे।

ब्लॉक समिति कूम कलां के अध्यक्ष गुरप्रीत सिंह गोपी ने मंत्रिमंडल मंत्री हरदीप सिंह मुंडियन और तरुणप्रीत सिंह सोंड को आश्वासन दिया कि श्री भैनी साहिब की पवित्र भूमि पर खुले बीडीपीओ कार्यालय में सभी कार्य ऐतिहासिक गति से संपन्न किए जाएंगे।

सरकार ने बालिकाओं के शैक्षिक, सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अपनाया बहुआयामी दृष्टिकोण

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, बाल लिंग अनुपात (सीएसआर) और बालिकाओं व महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों के समाधान में मदद करता है। यह योजना विभिन्न हितधारकों को सूचित, प्रभावित, प्रेरित और सशक्त बनाकर बालिकाओं के प्रति मानसिकता और व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास करती है। 15वें वित्त आयोग की अवधि (यानी 2021-22 से 2025-26) में बीबीबीपी योजना का पुनर्गठन किया गया है और अब यह ‘मिशन शक्ति’ की ‘संभल’ उप-योजना का एक घटक है। बीबीबीपी का विस्तार देश के सभी जिलों में कर दिया गया है, जिसमें बहु-क्षेत्रीय हस्तक्षेपों के माध्यम से उन गतिविधियों पर अधिक खर्च करने को प्रोत्साहित किया जाता है जिनका ज़मीनी स्तर पर प्रभाव पड़ता है।

बीबीबीपी के तहत इन पहलों ने एक रिकॉल वैल्यू स्थापित की है और विभिन्न हितधारकों—जिनमें सरकारी एजेंसियां, मीडिया, नागरिक समाज और आम जनता शामिल है—को लामबंद करके इसे एक नीतिगत पहल से एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल दिया गया है। इस आंदोलन का उद्देश्य न केवल जन्म के समय लिंग अनुपात और लिंग आधारित भेदभाव से संबंधित तत्काल चिंताओं को दूर करना है, बल्कि बालिकाओं को महत्व देने और उनके अधिकारों व अवसरों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक सांस्कृतिक बदलाव लाना भी है।

मिशन शक्ति अम्ब्रेला योजना और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ से संबंधित इसके घटकों सहित मंत्रालय की योजनाओं का दो बार—2020 में और पुनः 2025 में—नीति आयोग के माध्यम से थर्ड पार्टी मूल्यांकन किया गया है। इन अध्ययनों ने योजना की प्रासंगिकता, प्रभावशीलता और निरंतरता को संतोषजनक पाया है।

सरकार देश भर में बालिकाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। इस उद्देश्य के लिए, सरकार ने बालिकाओं के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के समाधान हेतु एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है।

समग्र शिक्षा प्री-स्कूल से कक्षा XII तक की स्कूली शिक्षा के लिए एक एकीकृत योजना है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के कार्यान्वयन में सहायता प्रदान करती है। यह योजना प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता, एक समग्र और समावेशी पाठ्यक्रम, लर्निंग आउटकम में सुधार, सामाजिक और लैंगिक अंतराल को पाटने, और शिक्षा के सभी स्तरों पर समानता और समावेश सुनिश्चित करने पर जोर देती है।

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) योजना कक्षा XII तक की लड़कियों के लिए आवासीय स्कूली सुविधाएँ प्रदान करके स्कूली शिक्षा में लैंगिक और सामाजिक श्रेणी के अंतराल को पाटने का प्रयास करती है। इस योजना के तहत अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अल्पसंख्यक समुदायों और बीपीएल  परिवारों की 10-18 वर्ष की आयु वर्ग की लड़कियों को शामिल किया जाता है।

विज्ञान ज्योति कार्यक्रम लैंगिक संतुलन में सुधार के लिए लड़कियों को स्टेम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) क्षेत्रों में शिक्षा और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह कक्षा IX से कक्षा XII तक की मेधावी छात्राओं को लक्षित करता है और इसमें छात्र-अभिभावक परामर्श, करियर परामर्श, अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता कक्षाएं, टिंकरिंग गतिविधियां, विशेष व्याख्यान, वैज्ञानिक संस्थानों, प्रयोगशालाओं, उद्योगों के भ्रमण और विज्ञान शिविर व कार्यशालाएं शामिल हैं।

बालिकाओं के लिए आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, सरकार ने व्यापक कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया मिशन शुरू किया है। सरकार ने देश भर में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत ‘प्रधानमंत्री कौशल केंद्र’ भी स्थापित किए हैं। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) के अंतर्गत महिलाओं को कौशल और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

सरकार ने देश में रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने के लिए महिलाओं हेतु कई पहल/उपाय किए हैं, जिनमें प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई), स्टैंड-अप इंडिया योजना, स्टार्टअप इंडिया, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी), दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (डीडीयू-जीकेवाई), ग्रामीण स्वरोजगार और प्रशिक्षण संस्थान (आरएसईटीआई), प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव आदि शामिल हैं।

दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के तहत महिला स्वयं सहायता समूह रोजगार और स्वरोजगार के लिए ग्रामीण परिदृश्य को बदल रहे हैं। इसी प्रकार, शहरी क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (एनयूएलएम) संचालित है।

सरकार महिलाओं की रोजगार क्षमता में सुधार के लिए महिला-केंद्रित योजनाएं भी लागू कर रही है, जैसे कि नमो ड्रोन दीदी, लखपति दीदी, वूमेन इन साइंस एंड इंजीनियरिंग- किरण (डब्लूआईएसई-किरण), सर्ब-पावर (खोजपूर्ण अनुसंधान में महिलाओं के लिए अवसरों को बढ़ावा देना) आदि।

यह जानकारी महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर द्वारा लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी गई।