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न्यूयॉर्क के MSKCC में प्रशिक्षण पूरा कर DMCH के डॉ. अनुभव शर्मा ने हासिल की बड़ी उपलब्धि

लुधियाना / सत्ता संदेश

उत्तर भारत में हड्डियों के कैंसर के उपचार को नई मजबूती मिलने जा रही है, क्योंकि दयानंद मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (DMCH), लुधियाना के ऑर्थोपेडिक ऑन्कोसर्जन डॉ. अनुभव शर्मा ने अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर (MSKCC) में प्रतिष्ठित क्लिनिकल ऑब्जर्वरशिप सफलतापूर्वक पूरी की है। MSKCC को दुनिया के अग्रणी कैंसर अस्पतालों में गिना जाता है।

इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान डॉ. शर्मा ने MSKCC की ऑर्थोपेडिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. कैरल मॉरिस के मार्गदर्शन में कार्य किया। प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र जटिल हड्डी एवं सॉफ्ट-टिश्यू ट्यूमर के लिए उन्नत सर्जिकल योजना और आधुनिक उपचार तकनीकों पर रहा। इस दौरान उन्होंने मल्टीडिसिप्लिनरी ट्यूमर बोर्ड चर्चाओं, साक्ष्य-आधारित चिकित्सा निर्णयों, अत्याधुनिक इमेजिंग तकनीकों तथा रोगी-केंद्रित उपचार प्रणालियों का गहन अनुभव प्राप्त किया।

डॉ. शर्मा के प्रदर्शन की MSKCC के विशेषज्ञों ने भी सराहना की। अपने मूल्यांकन में डॉ. कैरल मॉरिस ने जटिल ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजी मामलों की उनकी गहरी समझ तथा उन्नत सर्जिकल अवधारणाओं को शीघ्रता से आत्मसात करने की क्षमता की प्रशंसा की।

अपने अनुभव साझा करते हुए डॉ. अनुभव शर्मा ने कहा कि MSKCC में प्रशिक्षण उनके लिए अत्यंत परिवर्तनकारी अनुभव रहा। उन्होंने कहा कि इस अवसर ने उन्हें आधुनिक सर्जिकल तकनीकों, प्रिसीजन ऑन्कोलॉजी और बहु-विषयक सहयोग की महत्ता को नजदीक से समझने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान और अनुभव DMCH में मरीजों को विश्वस्तरीय उपचार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

इस ऑब्जर्वरशिप के माध्यम से MSKCC और DMCH के बीच भविष्य में शैक्षणिक और क्लिनिकल सहयोग की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। इस साझेदारी के जरिए DMCH को अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा नवाचारों और शोध से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा, जिससे क्षेत्र के मरीजों को लाभ पहुंचेगा।

इस उपलब्धि पर डीएमसी एंड एच मैनेजिंग सोसाइटी के सचिव बिपिन गुप्ता ने कहा कि यह केवल DMCH ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत में ऑर्थोपेडिक कैंसर उपचार के क्षेत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। उन्होंने कहा कि संस्थान हमेशा उन्नत चिकित्सा शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है।

वहीं, DMCH के प्रिंसिपल डॉ. गुरप्रीत वांडर ने कहा कि MSKCC जैसे विश्वस्तरीय संस्थान से प्राप्त ज्ञान और अनुभव अस्पताल में मरीजों की देखभाल, शिक्षा और शोध के स्तर को और ऊंचा उठाने में सहायक सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा की यह उपलब्धि DMCH की वैश्विक शैक्षणिक सहभागिता और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम चिकित्सा मानकों को अपनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

यह उपलब्धि DMCH को उन्नत कैंसर और ऑर्थोपेडिक उपचार के क्षेत्र में एक अग्रणी संस्थान के रूप में और अधिक मजबूत बनाती है तथा क्षेत्र के मरीजों के लिए विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं का मार्ग प्रशस्त करती है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस से पहले डॉ. मनसुख मांडविया मुंबई में फिट इंडिया साइक्लोथॉन का नेतृत्व करेंगे

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

देश 21 जून को 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के समारोहों की तैयारी में जुटा है, ऐसे में केंद्रीय युवा मामले एवं खेल तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया बुधवार की सुबह मुंबई के प्रतिष्ठित वर्ली साइकिल ट्रैक पर एक विशेष फिट इंडिया साइक्लोथॉन – साइक्लिंग बाय द सी का नेतृत्व करेंगे।

देशव्यापी फिट इंडिया अभियान के अंतर्गत भारतीय खेल प्राधिकरण का क्षेत्रीय केंद्र मुंबई, 17 जून को मुंबई के वर्ली कोस्टल साइकिल ट्रैक पर फिट इंडिया साइक्लोथॉन के इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है।

साइकिल यात्रा में मुंबई के सुरम्य समुद्र तट के मनोरम दृश्यों के बीच विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लगभग 250 साइकिल चालक डॉ. मनसुख मांडविया के साथ साइकिल चलाएंगे। यह आयोजन व्यापक ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ का हिस्सा है, जो सामुदायिक भागीदारी, साइकिलिंग, योग और अन्य शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से फिटनेस को जीवनशैली के रूप में बढ़ावा देता है।

डॉ. मनसुख मांडविया द्वारा दिसंबर 2024 में शुरू की गई इस साइकिलिंग पहल ने देश के 3 लाख से अधिक स्थानों पर 30 लाख से अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। फिट इंडिया संडेज़ ऑन साइकिल का आयोजन युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया, योगासन भारत, राहगिरी फाउंडेशन और माय भारत के सहयोग से किया जाता है।

मुंबई में आयोजित होने वाला साइक्लोथॉन 21 जून को मनाए जाने वाले 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के वैश्विक समारोहों की शुरुआत के रूप में भी काम करता है, जिसमें 180 से अधिक देशों के लाखों लोग भाग लेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पिछले एक दशक में विश्व के सबसे बड़े स्वास्थ्य आंदोलनों में से एक बन गया है, जिसमें भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा है। विभिन्न महाद्वीपों के देश समग्र स्वास्थ्य और निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने के लिए एकजुट हो रहे हैं, ऐसे में फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल और योग दिवस जैसी पहलें वैश्विक समुदाय के लिए एक स्वस्थ, सक्रिय और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देने में भारत के नेतृत्व को और मजबूत कर रही हैं।

WHO की विशेषज्ञ बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व, हर्बल दवाओं के वैश्विक मानकों पर हुई चर्चा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया के विकास पर आयोजित 5वीं विशेषज्ञ बैठक में भारत ने सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई है। यह बैठक 16 से 18 जून तक हांगकांग एसएआर, चीन में आयोजित की जा रही है।

आयुष मंत्रालय के तहत कार्यरत भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी फार्माकोपिया आयोग इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा है। बैठक में विभिन्न देशों के विशेषज्ञ हर्बल औषधियों की गुणवत्ता, सुरक्षा और मानकों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

PCIM एंड एच के निदेशक डॉ. रमन मोहन सिंह विशेषज्ञ सदस्य के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। आयोग की तकनीकी टीम भी वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल होकर अपने सुझाव और विशेषज्ञता साझा कर रही है।

बैठक के दौरान PCIM एंड एच द्वारा WHO के सहयोग से तैयार किए गए हर्बल मोनोग्राफ और अन्य तकनीकी दस्तावेजों को समीक्षा और चर्चा के लिए प्रस्तुत किया गया। इन दस्तावेजों का उद्देश्य पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से जुड़ी औषधियों के मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है।

आयुष मंत्रालय के अनुसार यह पहल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को गुणवत्ता, सुरक्षा और शुद्धता के वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही इससे भारतीय आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को भी मजबूती मिलेगी।

अंतर्राष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया के निर्माण में भारत की भागीदारी यह दर्शाती है कि देश पारंपरिक और हर्बल चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। यह पहल साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने और वैश्विक स्वास्थ्य मानकों के विकास में भारत के योगदान को भी मजबूत करती है।


गांवों में बिना लाइसेंस खांसी की सिरप की बिक्री पर रोक, स्वास्थ्य मंत्रालय ने वापस ली छूट

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्र सरकार ने खांसी की दवाइयों की बिक्री को लेकर बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन करते हुए छोटे गांवों में खांसी की सिरप की बिक्री पर दी गई विशेष छूट को वापस ले लिया है। इस संबंध में मंत्रालय ने 29 दिसंबर 2025 को अधिसूचना जारी की थी, जिसे 30 दिसंबर 2025 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया।

पहले औषधि नियम, 1945 की अनुसूची ‘के’ के तहत 1,000 से कम आबादी वाले गांवों में खांसी की दवाइयों की बिक्री के लिए कुछ लाइसेंस संबंधी प्रावधानों से छूट दी गई थी। अब संशोधन के तहत “सीरप” शब्द को हटाए जाने के बाद यह छूट समाप्त हो गई है।

इस फैसले के बाद छोटे गांवों में खांसी की सिरप की बिक्री और वितरण केवल विधिवत लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर या फार्मेसी के माध्यम से ही किया जा सकेगा। बिना लाइसेंस के खांसी की सिरप बेचने की अनुमति नहीं होगी।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार यह कदम दवाइयों के निर्माण, वितरण और बिक्री पर नियामक निगरानी को मजबूत करने तथा जन स्वास्थ्य सुरक्षा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। सरकार का मानना है कि इससे खांसी की दवाइयों के दुरुपयोग पर रोक लगाने और पूरे देश में दवा बिक्री संबंधी नियमों का बेहतर अनुपालन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

मंत्रालय ने खांसी की दवाइयों के निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं को निर्देश दिया है कि वे औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 तथा औषधि नियम, 1945 के सभी लाइसेंसिंग और नियामक प्रावधानों का सख्ती से पालन करें।

इस निर्णय को ग्रामीण क्षेत्रों में दवा वितरण व्यवस्था को अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

केंद्र सरकार ने खांसी की दवाइयों की बिक्री को लेकर बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन करते हुए छोटे गांवों में खांसी की सिरप की बिक्री पर दी गई विशेष छूट को वापस ले लिया है। इस संबंध में मंत्रालय ने 29 दिसंबर 2025 को अधिसूचना जारी की थी, जिसे 30 दिसंबर 2025 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया।

पहले औषधि नियम, 1945 की अनुसूची ‘के’ के तहत 1,000 से कम आबादी वाले गांवों में खांसी की दवाइयों की बिक्री के लिए कुछ लाइसेंस संबंधी प्रावधानों से छूट दी गई थी। अब संशोधन के तहत “सीरप” शब्द को हटाए जाने के बाद यह छूट समाप्त हो गई है।

इस फैसले के बाद छोटे गांवों में खांसी की सिरप की बिक्री और वितरण केवल विधिवत लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर या फार्मेसी के माध्यम से ही किया जा सकेगा। बिना लाइसेंस के खांसी की सिरप बेचने की अनुमति नहीं होगी।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार यह कदम दवाइयों के निर्माण, वितरण और बिक्री पर नियामक निगरानी को मजबूत करने तथा जन स्वास्थ्य सुरक्षा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। सरकार का मानना है कि इससे खांसी की दवाइयों के दुरुपयोग पर रोक लगाने और पूरे देश में दवा बिक्री संबंधी नियमों का बेहतर अनुपालन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

मंत्रालय ने खांसी की दवाइयों के निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं को निर्देश दिया है कि वे औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 तथा औषधि नियम, 1945 के सभी लाइसेंसिंग और नियामक प्रावधानों का सख्ती से पालन करें।

इस निर्णय को ग्रामीण क्षेत्रों में दवा वितरण व्यवस्था को अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

HBCH & RC पंजाब ने लाभार्थियों को कैशलेस उपचार प्रदान करने के लिए ESIC हरियाणा के साथ समझौता किया

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

होमी भाभा कैंसर अस्पताल, HBCH & RC, राज्य बीमा निगम, MoU, इनपेशेंट विभाग,

किफायती कैंसर देखभाल तक पहुंच का विस्तार करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, होमी भाभा कैंसर अस्पताल और अनुसंधान केंद्र, पंजाब ने पहली बार कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC), हरियाणा के साथ  समझौता किया है। इस आबद्धताके साथ, ESIC हरियाणा के लाभार्थी और स्टाफ सदस्य अब संस्थान के न्यू चंडीगढ़ और संगरूर दोनों परिसरों (कैंपस) में कैशलेस उपचार सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

इस समझौता ज्ञापन (MoU) को HBCH & RC पंजाब के निदेशक डॉ. आशीष गुलिया और ESIC हरियाणा के क्षेत्रीय निदेशक श्री हरि ओम प्रकाश द्वारा, हरियाणा के राज्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अभिषेक राय और दोनों संगठनों के अधिकारियों की उपस्थिति में औपचारिक रूप दिया गया।

HBCH&RC पंजाब पहले से ही ESIC पंजाब, ESIC चंडीगढ़, ESIC लुधियाना और ESIC हिमाचल प्रदेश के हजारों लाभार्थियों को व्यापक कैंसर देखभाल सेवाएं प्रदान कर रहा है। यह संस्थान पहले से ही उत्तर भारत के मरीजों को उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना, सभी को किफायती और गुणवत्तापूर्ण कैंसर देखभाल प्रदान करने के दृष्टिकोण के साथ अपनी सेवाएं दे रहा है।

ESIC योजना के तहत, लाभार्थी संस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला का लाभ उठा सकते हैं, जिसमें बाहरी रोगी विभाग (OPD) सेवाएं, इनपेशेंट विभाग (IPD) देखभाल, नैदानिक (डायग्नोस्टिक) और प्रयोगशाला सेवाएं, आपातकालीन, डेकेयर और रेडियोथेरेपी सेवाएं शामिल हैं।

1 अप्रैल, 2025 से 31 मार्च, 2026 तक, लगभग 3,000 ESIC कार्ड धारकों ने HBCH&RC पंजाब में कैशलेस उपचार प्राप्त किया, जो संस्थान की विशिष्ट कैंसर देखभाल सेवाओं में लाभार्थियों के बढ़ते विशवास को दर्शाता है।

इस अवसर पर बोलते हुए, HBCH&RC पंजाब के निदेशक डॉ. आशीष गुलिया ने कहा, “ESIC हरियाणा के साथ पैनल में शामिल होना समाज के सभी वर्गों के लिए गुणवत्तापूर्ण कैंसर देखभाल को सुलभ और किफायती बनाने के हमारे मिशन में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। हम मरीज-केंद्रित देखभाल प्रदान करने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि कोई भी मरीज आर्थिक सीमाओं के कारण इलाज से वंचित न रहे।’’

विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ कैंसर का इलाज

आपको बता दें कि पंजाब और आसपास के राज्यों को बेहतरीन कैंसर इलाज देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अगस्त 2022 में इस अस्पताल को राष्ट्र को समर्पित किया था। भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आने वाले टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई द्वारा करीब 660 करोड़ की लागत से बना यह 300 बेड वाला अस्पताल हर आधुनिक सुविधा (जैसे सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट) से लैस है। यह अस्पताल एक मुख्य केंद्र (Hub) की तरह काम करता है, जबकि संगरूर वाला 150 बेड का अस्पताल इसकी एक शाखा (Spoke) के रूप में मरीजों की सेवा कर रहा है।

PMSMA का एक दशक: मैटरनल हेल्थ में बदलाव और सुरक्षित मदरहुड की ओर भारत की यात्रा को तेज़ करना

हर सुरक्षित प्रेग्नेंसी देश की महिलाओं के प्रति कमिटमेंट को दिखाती है। हमारे देश में हर साल लगभग 29 मिलियन प्रेग्नेंसी होती हैं। इतने बड़े पैमाने पर सुरक्षित मदरहुड पक्का करने के लिए मज़बूत हेल्थ सिस्टम, लगातार पॉलिटिकल कमिटमेंट, समय पर दखल और अच्छी हेल्थ सर्विस तक सबके लिए बराबर पहुँच की ज़रूरत होती है।

देश में पिछले दशक में मैटरनल डेथ में काफ़ी कमी आई है। यह सबसे बड़ी पब्लिक हेल्थ अचीवमेंट्स में से एक है। इस प्रोग्रेस की नींव मैटरनल हेल्थ में लगातार इन्वेस्टमेंट, सर्विस डिलीवरी सिस्टम को मज़बूत करना और कम्युनिटी पार्टिसिपेशन है। हम यह पक्का करने के लिए कमिटेड हैं कि हर महिला को उसकी प्रेग्नेंसी के दौरान अच्छी केयर मिले। इस बदलाव के सेंटर में प्रधानमंत्री सुरक्षित मैटरनल अभियान (PMSMA) है। यह कैंपेन पिछले 10 सालों से पूरे देश में सुरक्षित मदरहुड को बढ़ावा दे रहा है।

PMSMA माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एक विज़न है जिसे 9 जून 2016 को लॉन्च किया गया था। यह प्रेग्नेंसी के दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर के दौरान हर महीने की नौवीं तारीख को सभी प्रेग्नेंट महिलाओं को मुफ़्त, पूरी और अच्छी एंटीनेटल केयर सर्विस देने के लिए एक देशव्यापी कैंपेन है। हर महीने के नौवें दिन को चुनने का एक गहरा महत्व है। प्रेग्नेंसी नौ कीमती महीनों का सफ़र है। इनमें से हर महीना नई उम्मीदें, अपेक्षाएं और ज़िम्मेदारियां लेकर आता है। हर महीने के नौवें दिन को मां की सेहत को समर्पित करके, PMSMA हमें याद दिलाता है कि हर प्रेग्नेंसी को एक स्वस्थ बच्चे के सुरक्षित आने तक पूरे नौ महीनों तक लगातार देखभाल, निगरानी और सपोर्ट की ज़रूरत होती है।

मैटरनल हेल्थ का सबसे ज़रूरी सबक यह है कि कोई भी प्रेग्नेंसी पूरी तरह से रिस्क-फ्री नहीं होती। आज जो प्रेग्नेंसी नॉर्मल लगती है, कल उसमें गंभीर कॉम्प्लिकेशन हो सकती हैं। PMSMA मानता है कि कोई भी प्रेग्नेंसी बिना किसी वॉर्निंग के हाई-रिस्क हो सकती है। इसलिए, यह कैंपेन रिस्क की जल्दी पहचान, करीबी मॉनिटरिंग और समय पर गाइडेंस और मैनेजमेंट पक्का करने का एक आसान लेकिन बदलाव लाने वाला तरीका अपनाता है। हर पहचानी गई हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी माँ की जान बचाने और प्रीमैच्योर बर्थ, बच्चे में कॉम्प्लिकेशन या ज़िंदगी भर की डिसेबिलिटी को रोकने का एक मौका है। यह कैंपेन कॉम्प्लिकेशन का इलाज करने के बजाय उन्हें रोकने पर फोकस करता है। इस तरह, इसने भारत के मैटरनल हेल्थ केयर सिस्टम को मज़बूत किया है और करोड़ों महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी को सुरक्षित बनाया है।

PMSMA की एक खास बात यह है कि यह एक तय दिन पर एक्सपर्ट की देखरेख में एंटीनेटल केयर पक्का करता है। इससे पूरे देश में मैटरनल हेल्थ सर्विसेज़ में प्रेडिक्टेबिलिटी, अकाउंटेबिलिटी और कंटिन्यूटी आई है। इस कैंपेन के तहत, प्रेग्नेंट महिलाओं की लगभग 25 हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी कंडीशन के लिए स्क्रीनिंग की जाती है। इनमें गंभीर एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, जेस्टेशनल डायबिटीज, इन्फेक्शन और दूसरी कॉम्प्लिकेशन की स्क्रीनिंग शामिल है, जिनका अगर पता न चले, तो वे माँ और बच्चे के लिए जानलेवा हो सकती हैं।

क्योंकि इस बात के सबूत हैं कि PMSMA के तहत रेगुलर एंटीनेटल केयर के बाद भी हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में किसी स्पेशलिस्ट/डॉक्टर द्वारा लगातार मॉनिटरिंग की ज़रूरत होती है, इसलिए भारत सरकार ने 2022 में ‘एक्सटेंडेड PMSMA’ (e-PMSMA) लॉन्च करके इस प्रोग्राम को और बेहतर बनाया है।

e-PMSMA के तहत, हाई-रिस्क प्रेग्नेंट महिलाओं को रेगुलर PMSMA स्क्रीनिंग के अलावा एक्स्ट्रा फॉलो-अप विज़िट भी दी जाती हैं ताकि सुरक्षित डिलीवरी तक समय पर देखभाल पक्की हो सके। इस पहल के तहत, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की नाम-आधारित ट्रैकिंग शुरू की गई है और डिलीवरी के 45 दिन बाद तक फॉलो-अप काउंसलिंग के लिए इसे बेहतर बनाया गया है, ताकि यह पक्का हो सके कि कमज़ोर महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलीवरी के तुरंत बाद लगातार देखभाल मिले। एक्स्ट्रा स्क्रीनिंग के लिए हाई-रिस्क प्रेग्नेंट महिलाओं के साथ जाने वाले एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ वर्कर्स (ASHA वर्कर्स) के लिए इंसेंटिव के प्रोविज़न ने रेफरल और देखभाल की कंटिन्यूटी के नियमों को और मज़बूत किया है।

इम्प्लीमेंटेशन, मॉनिटरिंग और अकाउंटेबिलिटी को और बेहतर बनाने के लिए, भारत सरकार ने एक सेंट्रलाइज़्ड PMSMA डिजिटल पोर्टल बनाया है, जो पूरे देश में प्रोग्राम मैनेजमेंट का मुख्य आधार है।

यह पोर्टल सर्विस डिलीवरी की रियल-टाइम रिपोर्टिंग, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की नाम-बेस्ड ट्रैकिंग, प्रोग्राम के परफॉर्मेंस की मॉनिटरिंग और नेशनल और स्टेट लेवल पर सबूतों के आधार पर फैसले लेने में मदद करता है। खास बात यह है कि यह प्लेटफॉर्म प्राइवेट सेक्टर के एक्सपर्ट्स और कम्युनिटी वॉलंटियर्स को भी प्रोग्राम में योगदान देने में मदद करता है, जिससे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘जन भागीदारी’ के विजन को और मजबूती मिलती है, जो PMSMA की मूल भावना है।

PMSMA की सफलता भारत के मैटरनल हेल्थ सिस्टम में अलग-अलग स्कीमों के बीच तालमेल के महत्व को भी दिखाती है। जननी सुरक्षा योजना (JSY), जननी शिशु सुरक्षा प्रोग्राम (JSSK), सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (SUMAN), नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड्स (NQAS) पोषण अभियान, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY), आयुष्मान भारत और मिडवाइफ सर्विसेज़, ऑप्टिमाइजेशन ऑफ पोस्टनेटल केयर (OPNC) जैसी पहलों के साथ मिलकर काम करते हुए, PMSMA ने प्रेग्नेंसी, डिलीवरी और पोस्टनेटल पीरियड के दौरान महिलाओं की देखभाल का एक मजबूत कंटिन्यूअम बनाने में अहम योगदान दिया है। इस बदलाव के केंद्र में भारत के फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर हैं, जैसे एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ वर्कर (ASHA वर्कर), आंगनवाड़ी वर्कर, असिस्टेंट नर्स मिडवाइफ (ANM), कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर, नर्स, मिडवाइफ और मेडिकल ऑफिसर। कम्युनिटी में हिस्सा लेने, काउंसलिंग, टेस्टिंग, रेफरल और फॉलो-अप कंसल्टेशन में उनकी लगातार कोशिशों से यह पक्का हुआ कि मैटरनल हेल्थ सर्विस देश के सबसे दूर-दराज और पिछड़े इलाकों की महिलाओं तक भी पहुंचे।

इन मिलकर की गई कोशिशों का असर नेशनल हेल्थ नतीजों में तेज़ी से देखा जा रहा है। साल 2022-24 के लिए लेटेस्ट सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के अनुमानों के मुताबिक, भारत का मैटरनल मॉर्टेलिटी रेश्यो (MMR) घटकर 1,00,000 जीवित जन्मों पर 87 हो गया है। इससे देश 2030 तक मैटरनल मॉर्टेलिटी रेश्यो को 70 प्रति लाख जीवित जन्मों से कम करने के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल को पाने के बहुत करीब आ गया है।
ये सुधार मैटरनल हेल्थ से जुड़े बड़े इंडिकेटर्स में भी दिख रहे हैं। हाल ही में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6, 2023-24) के अनुसार, इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी (इंस्टीट्यूशन/हॉस्पिटल में होने वाली डिलीवरी) की दर NFHS-5 (2019-21) में 88.6% से बढ़कर 90.6% हो गई है, जबकि एंटीनेटल केयर का कवरेज NFHS-5 में 92.6% से बढ़कर NFHS-6 में 95.9% हो गया है। ये उपलब्धियां बताती हैं कि पहले के मुकाबले अब बहुत ज़्यादा महिलाएं ज़रूरी मैटरनल हेल्थ सर्विसेज़ का फ़ायदा उठा रही हैं, जिससे कॉम्प्लीकेशंस का जल्दी पता लगाने और समय पर सही इलाज के अच्छे मौके मिल रहे हैं। दुनिया में नए जन्मे बच्चों के सबसे बड़े ग्रुप में से एक को मैनेज करते हुए यह तरक्की हासिल की गई है।

कर्ण भारत के मैटरनल हेल्थ प्रोग्राम के स्केल और असर को दिखाते हैं।
पिछले एक दशक में PMSMA का दायरा और पहुंच पहले कभी नहीं देखी गई। 2016 में इसके लॉन्च के बाद से, इस प्रोग्राम के तहत देश भर में 75 मिलियन से ज़्यादा एंटीनेटल केयर विज़िट की गई हैं। खास बात यह है कि PMSMA ने 11.7 करोड़ से ज़्यादा हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान करने में मदद की है।
ये उपलब्धियां सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं। ये उन लाखों मांओं को दिखाती हैं जिनकी हेल्थ से जुड़ी दिक्कतों का जल्दी पता चल गया, जिनकी प्रेग्नेंसी पर करीब से नज़र रखी गई और जिनकी जान और उनके नए जन्मे बच्चों की जान अच्छी क्वालिटी की हेल्थ सर्विस समय पर मिलने से बच गई।
हर मां के लिए, प्रेग्नेंसी उम्मीद का एक नया सफ़र है। हर परिवार के लिए, यह एक नई शुरुआत का वादा है। फिर भी, दुनिया भर में कई महिलाओं के लिए, प्रेग्नेंसी ऐसे रिस्क पैदा करती है जिनसे बचा जा सकता है। PMSMA एक आसान लेकिन दमदार सोच के साथ शुरू हुआ कि बच्चे को जन्म देते समय किसी भी महिला की जान न जाए और किसी भी परिवार को प्रेग्नेंसी से जुड़ी किसी दिक्कत की वजह से मां न खोनी पड़े। देश में PMSMA के दस साल पूरे होने पर, यह सिर्फ़ एक पब्लिक हेल्थ प्रोग्राम की सफलता नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा है। हम लाखों सुरक्षित प्रेग्नेंसी, ज़्यादा सेहतमंद मांओं, नए जन्मे बच्चों के लिए मज़बूत शुरुआत और हेल्थ वर्कर्स, कम्युनिटीज़ और परिवारों की मिली-जुली कोशिशों का जश्न मनाते हैं, जिन्होंने इस बदलाव में योगदान दिया है।

आगे का रास्ता साफ़ है। हमें अच्छी क्वालिटी की एंटीनेटल केयर, ज़्यादा रिस्क वाली प्रेग्नेंसी की ट्रैकिंग, मिडवाइफरी से जुड़ी सर्विस, डिजिटल इनोवेशन और मैटरनल हेल्थ केयर तक सही और बराबर पहुंच को मज़बूत करना जारी रखना होगा। PMSMA के अनुभव ने एक बार फिर एक सीधी सी बात साबित कर दी है: जब हर प्रेग्नेंसी पर नज़र रखी जाती है, हर रिस्क की जल्दी पहचान हो जाती है और हर महिला को समय पर, इज्ज़तदार और अच्छी क्वालिटी की देखभाल मिलती है, तो बच्चे के जन्म के दौरान मां की मौत को रोका जा सकता है, यह ज़रूरी नहीं है।
इसलिए, PMSMA के दस साल पूरे होना सिर्फ़ एक इवेंट का जश्न नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि जब पॉलिटिकल कमिटमेंट, मज़बूत वर्कर्स, डिजिटल इनोवेशन, पब्लिक पार्टिसिपेशन और अच्छी क्वालिटी की हेल्थ सर्विस एक ही लक्ष्य – ‘हर मां को सुरक्षित और हर नए जन्मे बच्चे को स्वस्थ रखना’ के लिए मिलकर काम करते हैं, तो क्या हासिल किया जा सकता है। (लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री और रसायन एवं उर्वरक मंत्री हैं)

“विश्व पर्यावरण दिवस पर राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ की हरित पहल, वृक्षारोपण और पौध वितरण कार्यक्रम आयोजित”

दिल्ली / सत्ता संदेश

राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ (आरएवी), नई दिल्ली ने विश्व पर्यावरण दिवस 2026 को वृक्षारोपण अभियान और पौध वितरण कार्यक्रम के माध्यम से मनाया, और इस तरह विद्यापीठ ने पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। यह कार्यक्रम इस वर्ष के विश्व पर्यावरण दिवस के विषय, प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए” के अनुरूप आयोजित किया गया था।

इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के शासी निकाय के अध्यक्ष वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा; राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ की निदेशक डॉ. वंदना सिरोहा; राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग (एनसीआईएसएम) में आचार संहिता और पंजीकरण बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सुश्रुत कनौजिया; और एनसीआईएसएम के चिकित्सा मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड के पूर्व सदस्य डॉ. बीएल मेहरा ने भाग लिया।

इस उत्सव के अंतर्गत, विद्यापीठ परिसर में संकाय सदस्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों और छात्रों ने वृक्षारोपण अभियान में भाग लिया, जिससे पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक स्थिरता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की पुष्टि हुई। इस पहल का उद्देश्य पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना और हरित आवरण बढ़ाने तथा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सामूहिक कार्रवाई को प्रोत्साहित करना था। इस कार्यक्रम में औषधीय पौधों के संरक्षण के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया, जो आयुर्वेदिक स्वास्थ्य सेवा और भारत की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान विरासत का आधार हैं।

गणमान्य हस्तियों ने आयुर्वेद के पारिस्थितिक दर्शन पर प्रकाश डाला, जो मनुष्य और प्रकृति के अंतर्संबंध पर बल देता है। पंचमहाभूत सिद्धांत और लोक-पुरुष साम्य की अवधारणाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय संतुलन मानव स्वास्थ्य और कल्याण के लिए मूलभूत है। उन्होंने आगे कहा कि आयुर्वेदिक सिद्धांत अनवरत जीवनशैली, सजग उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों के उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे समकालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की प्रासंगिकता और भी पुष्ट होती है।

इस कार्यक्रम की एक ख़ास विशेषता विद्यापीठ के अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच पौधों का वितरण था। इस पहल का उद्देश्य प्रतिभागियों को अपने समुदायों में वृक्षारोपण और देखभाल के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करना था।

प्रतिभागियों ने सतत जीवन शैली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की, वहीं इस आयोजन ने पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और प्रकृति के साथ सामंजस्य को बढ़ावा देने में आयुर्वेद की निरंतर प्रासंगिकता पर जोर दिया।

गंदे पानी ने बढ़ाई ग्रामीणों की मुश्किलें: दूध फैक्ट्री के खिलाफ कार्रवाई की मांग

खन्ना / सत्ता संदेश

खन्ना के मलेरकोटला रोड स्थित एक दूध उत्पाद फैक्ट्री के खिलाफ गांव माजरी और रसूलड़ा के लोगों ने मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि फैक्ट्री का गंदा पानी रात के समय छोड़ा जाता है, जिससे इलाके में भारी प्रदूषण और बदबू फैल रही है। लोगों का कहना है कि इस कारण उनका जीना मुश्किल हो गया है।


ग्रामीणों के अनुसार फैक्ट्री का दूषित पानी पहले एकत्र किया जाता है और बाद में रात के अंधेरे में बाहर छोड़ दिया जाता है। इससे आसपास के क्षेत्र में गंदगी और तेज बदबू फैल रही है। लोगों का कहना है कि पिछले करीब एक वर्ष से वे इस समस्या का सामना कर रहे है। गांव के पंच ने आरोप लगाया कि प्रदूषण के कारण इलाके में बीमारियां बढ़ रही हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार में भी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का मामला सामने आ चुका है। ग्रामीणों ने कहा कि छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग हर समय बदबू के बीच रहने को मजबूर हैं।


ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार फैक्ट्री प्रबंधन से शिकायत की, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे धरना-प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे। साथ ही उन्होंने मांग की कि ऐसी फैक्ट्रियों को रिहायशी इलाकों से दूर स्थापित किया जाए। वहीं फैक्ट्री के प्लांट हेड ने कहा कि लोगों की शिकायत उनके संज्ञान में आई है। उन्होंने बताया कि ट्रीटमेंट प्लांट में तकनीकी दिक्कत आने के कारण समस्या बढ़ी है। फैक्ट्री प्रबंधन को इसकी जानकारी दे दी गई है और एक-दो दिनों में समस्या का समाधान कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कल से लकड़ी वाला बॉयलर बंद किया जा रहा है।


नगर कौंसिल के ईओ चरणजीत सिंह ने कहा कि मामला उनके ध्यान में आ गया है। टीम भेजकर जांच करवाई जाएगी और यदि कोई कमी पाई तो गई को संबंधित विभागों के साथ मिलकर उचित कार्रवाई की जाएगी। साथ ही मामले को प्रदूषण नियंत्रण विभाग के संज्ञान में भी लाया जाएगा।

अब देखना यह होगा कि जांच के बाद प्रशासन क्या कार्रवाई करता है और क्या ग्रामीणों को लंबे समय से आ रही परेशानी से राहत मिल पाएगी?

मिलावटखोरों पर हेल्थ विभाग का शिकंजा, संदिग्ध देसी घी और पनीर के नमूने जांच के लिए भेजे

अमृतसर / सत्ता संदेश

रिपोर्ट : विक्रमजीत सिंह / कैमरामैन : तरजिंदर सिंह

अमृतसर में खाद्य पदार्थों में मिलावट के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए रामबाग स्थित एक डेयरी पर छापेमारी की। इस दौरान पनीर के सैंपल लिए गए और करीब 7 क्विंटल देसी घी को सील कर जांच के लिए भेजा गया।

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन पंजाब की कमिश्नर कमलप्रीत कौर बराड़ तथा डिप्टी कमिश्नर अमृतसर दलविंदरजीत सिंह के दिशा-निर्देशों के तहत स्वास्थ्य विभाग की टीम ने विभिन्न डेयरियों और दूध से बने उत्पाद बेचने वाली दुकानों की जांच की सहायक कमिश्नर फूड राजिंदरपाल सिंह ने बताया कि पिछले एक महीने से दूध और दुग्ध उत्पादों में मिलावट रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसी अभियान के तहत प्राप्त शिकायत के आधार पर रामबाग क्षेत्र में स्थित एक डेयरी पर तड़के छापेमारी की गई।


छापेमारी के दौरान पनीर के नमूने एकत्र कर जांच के लिए भेजे गए। इसके अलावा डेयरी में मौजूद ‘प्रभु देसी घी’ ब्रांड के 48 टिन, जिनका कुल वजन लगभग 7 क्विंटल था, को सील कर दिया गया। यह घी हरियाणा के सिरसा में निर्मित बताया गया है। घी के सैंपल भी प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजे गए हैं। सिविल सर्जन डॉ. चरणजीत सिंह बजाज ने कहा कि लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि मिलावटखोरी के खिलाफ विभाग की कार्रवाई लगातार जारी रहेगी और लैब रिपोर्ट आने के बाद नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।


स्वास्थ्य विभाग ने आम जनता से भी अपील की है कि यदि उन्हें किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट की आशंका हो तो तुरंत विभाग को सूचित करें, ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके और लोगों की सेहत को सुरक्षित रखा जा सके। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ भविष्य में भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।

सीधी में 53 गर्भवती महिलाओं की मौत पर NHRC सख्त, मध्य प्रदेश सरकार से मांगी रिपोर्ट

नई दिल्ली/ सत्ता संदेश

National Human Rights Commission (एनएचआरसी) ने मध्य प्रदेश के सीधी जिले में एक वर्ष के दौरान 53 गर्भवती महिलाओं की मौत के मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने इस मामले को गंभीर मानते हुए मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर अवधि में 53 महिलाओं की मृत्यु हुई। इन मौतों के पीछे जागरूकता की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और बुनियादी ढांचे की कमजोर स्थिति को प्रमुख कारण बताया गया है।

एनएचआरसी ने कहा कि यदि मीडिया में प्रकाशित जानकारी सही है, तो यह मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला है और इसकी गहन जांच आवश्यक है।

रिपोर्ट के अनुसार, मृत महिलाओं की औसत आयु 26 वर्ष थी और इनमें से अधिकांश पहली या दूसरी बार मां बनने वाली महिलाएं थीं। स्वास्थ्य विभाग की सामुदायिक मातृ स्वास्थ्य रैंकिंग में भी सीधी जिला लगातार सबसे निचले तीन जिलों में शामिल रहा है।

खबरों में यह भी सामने आया है कि जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में डॉक्टरों तथा तकनीकी विशेषज्ञों की भारी कमी है। बेहतर इलाज के लिए मरीजों को अक्सर रीवा भेजना पड़ता है, जिससे रास्ते में जोखिम बढ़ जाता है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई गांवों में सड़क संपर्क नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं को एम्बुलेंस तक पहुंचाने के लिए दो से तीन किलोमीटर तक चारपाई पर ले जाना पड़ता है। मानसून के दौरान यह समस्या और भी बढ़ जाती है।

अब सभी की नजरें मध्य प्रदेश सरकार की रिपोर्ट पर हैं, जिसके आधार पर एनएचआरसी आगे की कार्रवाई तय करेगा।