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Ludhiana : जालंधर से आए स्वास्थ्य विभाग टीम ने सरकारी अस्पताल OPD और मैटरनिटी विभाग का किया निरिक्षण

लुधियाना के सरकारी अस्पताल में जालंधर से आई हेल्थ विभाग की टीम ने OPD और मैटरनिटी एंड चाइल्ड हॉस्पिटल का निरीक्षण कर स्वास्थ्य सुविधाओं और साफ-सफाई की जांच की।

लुधियाना/सत्ता संदेश

रिपोर्ट : बसंत सिंह रोड़ियां

तारीख : 27 अक्टूबर 2026

पंजाब सरकार की गाइडलाइंस के तहत जालंधर से आई हेल्थ विभाग की दो सदस्यीय टीम ने आज लुधियाना के डिस्ट्रिक्ट गवर्नमेंट हॉस्पिटल के OPD विभाग और मैटरनिटी एंड चाइल्ड हॉस्पिटल का निरीक्षण किया। इस दौरान अस्पताल में मरीजों को दी जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं और साफ-सफाई के इंतजामों की जांच की गई।

डॉ. जगियासा और डॉ. वरिंदर रियार के नेतृत्व में पहुंची टीम ने अस्पताल के विभिन्न विभागों का जायजा लिया। अधिकारियों ने बताया कि पंजाब सरकार की गाइडलाइंस के अनुसार सरकारी अस्पतालों में समय-समय पर निरीक्षण किया जाता है। इसका उद्देश्य जरूरतमंद मरीजों को उपलब्ध करवाई जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं और अस्पताल में साफ-सफाई की व्यवस्था की जांच करना है।

इस मौके पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नमेंट हॉस्पिटल के मैटरनिटी एंड चाइल्ड विभाग के सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ. रोहित रामपाल भी टीम के साथ मौजूद रहे। उन्होंने बताया कि सरकारी गाइडलाइंस के तहत टीमें नियमित रूप से अस्पतालों में जांच के लिए पहुंचती हैं। इस तरह के निरीक्षण के दौरान मरीजों को दी जा रही स्वास्थ्य सेवाओं और संबंधित व्यवस्थाओं का जायजा लिया जाता है।

पंजाब के कैंसर अस्पताल में बड़ा खुलासा: 1,000 परिवारों की जांच में करीब 30% में वंशानुगत कैंसर से जुड़े जेनेटिक बदलाव

स्तन और ओवेरियन कैंसर से संबंधित थे लगभग 95% पहचाने गए आनुवंशिक बदलाव; होमी भाभा कैंसर अस्पताल ने शुरू की थी जनवरी 2025 में कैंसर जेनेटिक्स क्लिनिक

न्यू चंडीगढ़ / सत्ता संदेश,

दिनांक : 14 अक्टूबर 2026

कैंसर के बढ़ते जोखिम की समय रहते पहचान और रोकथाम की दिशा में होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र (HBCH&RC), न्यू चंडीगढ़ से महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। अस्पताल की कैंसर जेनेटिक्स क्लिनिक में मूल्यांकन किए गए उत्तर भारत के 1,000 परिवारों में से लगभग 30 प्रतिशत परिवारों में ऐसे आनुवंशिक बदलाव पाए गए हैं, जो वंशानुगत कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़े हो सकते हैं। अस्पताल के अनुसार, पहचाने गए आनुवंशिक बदलावों में लगभग 95 प्रतिशत स्तन और डिम्बग्रंथि (ओवेरियन) कैंसर से संबंधित थे।

अस्पताल की समर्पित कैंसर जेनेटिक्स क्लिनिक जनवरी 2025 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य उन लोगों की पहचान करना है, जिनमें कैंसर होने का आनुवंशिक जोखिम मौजूद हो सकता है, ताकि जरूरत के अनुसार समय रहते जांच, निगरानी और रोकथाम की योजना बनाई जा सके।

912 मरीजों की जेनेटिक जांच, 132 परिजनों का भी मूल्यांकन

अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक, क्लिनिक में परामर्श के लिए आए 1,000 परिवारों में से 912 कैंसर-प्रभावित प्राथमिक मरीजों की आनुवंशिक जांच की गई। इन मरीजों को ‘इंडेक्स पेशेंट’ कहा जाता है, जिनकी जांच से परिवार में संभावित वंशानुगत कैंसर जोखिम का पता लगाने में मदद मिलती है।

जांच में लगभग 30 प्रतिशत की दर से कैंसर जोखिम से जुड़े आनुवंशिक बदलाव सामने आए। इसके अलावा, जोखिम की आशंका वाले 132 रक्त-संबंधियों—जैसे माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों—की भी जांच की गई। इससे परिवार के अन्य सदस्यों में संभावित जोखिम की पहचान करने और जरूरत के अनुसार स्क्रीनिंग तथा नियमित फॉलो-अप की योजना बनाने में मदद मिली।

क्या होते हैं वंशानुगत कैंसर से जुड़े जेनेटिक बदलाव?

आनुवंशिक बदलाव DNA या आनुवंशिक कोड में होने वाले परिवर्तन हैं। इनमें से कुछ बदलाव व्यक्ति में विशेष प्रकार के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। हालांकि, किसी जोखिम-संबंधी आनुवंशिक बदलाव का मिलना यह निश्चित नहीं करता कि व्यक्ति को भविष्य में कैंसर होगा ही।

अस्पताल के निदेशक डॉ. आशीष गुलिया के अनुसार, आनुवंशिक जांच आमतौर पर रक्त के नमूने से की जाती है। चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर 26 से 84 जीनों की जांच की जा सकती है। इसके परिणामों से डॉक्टरों को मरीज के लिए उपचार, अधिक निगरानी और जोखिम कम करने के संभावित उपायों के संबंध में निर्णय लेने में सहायता मिलती है।

उन्होंने बताया कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर कुछ मरीजों के लिए व्यक्तिगत उपचार योजना, नियमित स्क्रीनिंग और विशेष परिस्थितियों में जोखिम कम करने वाली सर्जरी पर विचार किया जा सकता है। इससे ऐसे परिजनों की पहचान करने में भी मदद मिलती है, जिन्हें आनुवंशिक जांच या अतिरिक्त निगरानी की जरूरत हो सकती है।

किन लोगों को आनुवंशिक परामर्श पर विचार करना चाहिए?

डॉ. गुलिया के अनुसार, यदि परिवार में कई लोगों को कैंसर हुआ हो, खासकर एक जैसे या आपस में संबंधित प्रकार के कैंसर, तो आनुवंशिक परामर्श उपयोगी हो सकता है। कम उम्र में कैंसर होना, दोनों स्तनों में कैंसर विकसित होना, अलग-अलग अंगों में एक से अधिक प्राथमिक कैंसर होना या कुछ वंशानुगत कैंसर सिंड्रोम के संकेत मिलना भी चिकित्सकीय मूल्यांकन का आधार हो सकता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार में कैंसर का इतिहास न होने पर भी किसी व्यक्ति में आनुवंशिक जोखिम मौजूद हो सकता है। स्तन, डिम्बग्रंथि, जठरांत्र संबंधी और प्रोस्टेट कैंसर सहित कुछ कैंसरों के मामलों में मरीज के चिकित्सकीय इतिहास और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर आनुवंशिक परामर्श की सलाह दी जा सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, आनुवंशिक जोखिम का पता चलने पर उचित चिकित्सकीय मार्गदर्शन के साथ निगरानी और रोकथाम की योजना बनाई जा सकती है। हालांकि, जांच कराने या किसी निवारक प्रक्रिया का निर्णय विशेषज्ञ की सलाह और व्यक्तिगत जोखिम के आकलन के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

संगरूर केंद्र में भी शुरू हुई कैंसर जेनेटिक्स क्लिनिक

HBCH&RC पंजाब ने अपने संगरूर केंद्र में भी कैंसर जेनेटिक्स क्लिनिक शुरू की है। अस्पताल में ही आनुवंशिक जांच की सुविधा स्थापित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। फिलहाल जांच के लिए नमूने टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई भेजे जाते हैं।

क्लिनिक का संचालन जेनेटिक काउंसलर हाशिमे इस्माइल, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. प्रग्यात ठाकुर और मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. सीमा गुलिया की देखरेख में किया जा रहा है।

होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, पंजाब, परमाणु ऊर्जा विभाग, भारत सरकार के अंतर्गत संचालित टाटा मेमोरियल सेंटर की एक इकाई है। अस्पताल की यह पहल कैंसर के संभावित वंशानुगत जोखिम की पहचान, परिवारों को परामर्श और समय रहते चिकित्सकीय योजना बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

BRICS Traditional Sports Showcase 2026: 12 अक्टूबर को अहमदाबाद में आयोजन

अहमदाबाद में 12 अक्टूबर 2026 को BRICS पारंपरिक और स्वदेशी खेल प्रदर्शन होगा। मनसुख मांडविया उद्घाटन करेंगे, भारत समेत कई देशों के खेल होंगे प्रदर्शित।

अहमदाबाद / गुजरात / सत्ता संदेश

भारत की BRICS अध्यक्षता के तहत 12 अक्टूबर 2026 को गुजरात के अहमदाबाद स्थित वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में BRICS पारंपरिक और स्वदेशी खेल प्रदर्शन 2026 का आयोजन किया जाएगा। भारत सरकार के युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय द्वारा गुजरात सरकार के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना और सदस्य देशों के बीच आपसी सहयोग मजबूत करना है।

कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया करेंगे। इस अवसर पर गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी, केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेल राज्य मंत्री रक्षा निखिल खडसे तथा गुजरात के खेल राज्य मंत्री डॉ. जयराम गामित भी उपस्थित रहेंगे।

कई देशों के पारंपरिक खेलों का होगा प्रदर्शन

इस आयोजन में BRICS सदस्य और भागीदार देशों के प्रतिनिधिमंडल अपनी पारंपरिक एवं स्वदेशी खेल विधाओं और सांस्कृतिक प्रथाओं का प्रदर्शन करेंगे। यह आयोजन प्रतिस्पर्धा के बजाय सांस्कृतिक आदान-प्रदान, खेल परंपराओं के दस्तावेजीकरण और ज्ञान साझा करने पर केंद्रित रहेगा।

प्रस्तावित खेल प्रदर्शनों में भारत की ओर से मल्लखांब, योगासन और कलरिपयट्टू शामिल हैं। चीन की ओर से वुशु, शेर नृत्य और स्वास्थ्य किगोंग, जबकि रूस की ओर से गोरोडकी और साम्बो का प्रदर्शन किया जाएगा।

इसके अलावा बेलारूस का गोरोडकी, ब्राजील का कैपोएरा और पैरा-जिउ-जित्सु, बोलीविया की पारंपरिक खेल विधाएं, इथियोपिया की कुश्ती और पारंपरिक हॉकी, ईरान की जूरखानेह परंपरा, कजाखस्तान का कजाक कुरेसी, दक्षिण अफ्रीका के कगाती और इंटोंगा तथा संयुक्त अरब अमीरात का अल तब्बा भी प्रस्तावित प्रदर्शनों में शामिल हैं।

BRICS देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग पर जोर

आयोजन के दौरान प्रतिनिधिमंडलों के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी प्रस्तावित हैं। इन बैठकों में BRICS ढांचे के भीतर खेल सहयोग मजबूत करने और पारंपरिक एवं स्वदेशी खेलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के अवसरों पर चर्चा की जाएगी।

इस आयोजन के माध्यम से विभिन्न देशों की समृद्ध खेल विरासत को सामने लाने के साथ-साथ सांस्कृतिक समझ, आपसी संवाद और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा। यह मंच पारंपरिक खेलों के संरक्षण और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

वाराणसी में 11 अक्टूबर को फिट इंडिया साइकिल रैली, मनसुख मांडविया होंगे शामिल

फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल का 94वां आयोजन 11 अक्टूबर को वाराणसी में होगा। नमो घाट से साइकिल यात्रा निकलेगी, मनसुख मांडविया और पदक विजेता खिलाड़ी होंगे शामिल।

नई दिल्ली / वाराणसी / सत्ता संदेश

युवाओं को फिटनेस के प्रति जागरूक करने और नशामुक्त भारत का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल’ के 94वें आयोजन का आयोजन 11 अक्टूबर 2026 को वाराणसी में किया जाएगा। ‘विकसित भारत के लिए नशामुक्त युवा’ थीम पर आधारित यह साइकिल यात्रा सुबह 6 बजे नमो घाट से शुरू होकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के दीक्षा मंडप तक पहुंचेगी।

इस आयोजन में केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। कार्यक्रम में युवा, फिटनेस प्रेमी, आम नागरिक और खेल जगत की हस्तियां भी हिस्सा लेंगी। इसका उद्देश्य साइकिलिंग को स्वस्थ, सक्रिय और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली के रूप में बढ़ावा देना है।

एशियाई खेलों के पदक विजेता भी होंगे शामिल

इस आयोजन में 2026 के आइची-नागोया एशियाई खेलों में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की भागीदारी भी प्रस्तावित है। इनमें प्राची चौधरी, पारुल चौधरी, जय कुमार और भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ी राज कुमार पाल शामिल हैं।

प्राची चौधरी ने महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता। पारुल चौधरी ने महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपलचेज और 5000 मीटर दौड़ में दो कांस्य पदक हासिल किए। जय कुमार ने मिश्रित 4×400 मीटर रिले में रजत और पुरुषों की 4×400 मीटर रिले में कांस्य पदक जीता, जबकि राज कुमार पाल भारतीय हॉकी टीम के सदस्य के रूप में स्वर्ण पदक विजेता बने।

खिलाड़ियों की भागीदारी से युवाओं को खेल जगत की उपलब्धियों से प्रेरणा लेने का अवसर मिलेगा। उनके अनुभव अनुशासन, नियमित अभ्यास, दृढ़ संकल्प और मेहनत के महत्व को समझने में मदद करेंगे।

योग, जुम्बा और मनोरंजक गतिविधियों का भी आयोजन

साइकिल यात्रा के साथ नमो घाट पर योग सत्र, जुम्बा, मनोरंजक खेल और विभिन्न संवादात्मक गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। इन गतिविधियों के जरिए लोगों को शारीरिक सक्रियता बढ़ाने और स्वस्थ दिनचर्या अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

आयोजन का मुख्य संदेश है कि फिटनेस को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया जाए और युवाओं को नशीले पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इसके लिए परिवारों, शिक्षण संस्थानों, स्थानीय समुदायों और खेल जगत की हस्तियों की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना गया है।

देशभर में चलाया जा रहा है फिटनेस अभियान

फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल का आयोजन युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय द्वारा साइक्लिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया, राहगिरी फाउंडेशन और माय भारत के सहयोग से किया जाता है। यह अभियान देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आयोजित किया जाता है।

इसके तहत भारतीय खेल प्राधिकरण के क्षेत्रीय केंद्रों, राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्रों, SAI प्रशिक्षण केंद्रों, खेलो इंडिया राज्य उत्कृष्टता केंद्रों और खेलो इंडिया केंद्रों में भी गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा देशभर में 6,000 से अधिक नमो फिट इंडिया क्लब हर सप्ताह इस साइकिलिंग पहल में भाग लेते हैं।

वाराणसी में होने वाला 94वां आयोजन फिटनेस, युवा सहभागिता और नशामुक्त समाज के संदेश को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सामूहिक पहल होगा।

कैंसर की महंगी दवाओं पर सरकार का बड़ा फैसला, ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित; MRP में 70% तक कमी की उम्मीद

दिल्ली / सत्ता संदेश

कैंसर मरीजों को महंगी दवाओं से राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने सभी गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला किया है। इस फैसले का उद्देश्य कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को कम करना और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को घटाना है।

सरकार के मुताबिक, नए नियम के तहत ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित तथा पेटेंट और गैर-पेटेंट वाली कैंसर रोधी दवाएं शामिल होंगी। ट्रेड मार्जिन की सीमा तय होने से दवाओं की कीमत और मरीज द्वारा भुगतान की जाने वाली वास्तविक राशि के बीच का अंतर कम होने की उम्मीद है।

कुछ दवाओं की MRP में 70 फीसदी तक कमी की उम्मीद

सरकार का अनुमान है कि इस फैसले के बाद कुछ कैंसर रोधी दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में 70 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इससे कैंसर के इलाज पर मरीजों का अपनी जेब से होने वाला खर्च यानी आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर कम होने की उम्मीद है।

सरकार के अनुसार, इस कदम से मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। हालांकि, वास्तविक कीमत में कमी दवा और उसके मौजूदा मूल्य ढांचे के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों दवाएं होंगी शामिल

इस फैसले की खास बात यह है कि गैर-अनुसूचित श्रेणी की कैंसर रोधी दवाओं को व्यापक दायरे में रखा गया है। इसमें देश में निर्मित और आयातित दोनों तरह की दवाओं के साथ-साथ पेटेंट और गैर-पेटेंट दवाएं भी शामिल होंगी।

सरकार का कहना है कि ट्रेड मार्जिन को सीमित करने से मरीजों को जीवनरक्षक दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

2019 में भी सरकार ने उठाया था कदम

सरकार ने बताया कि यह पहल वर्ष 2019 में किए गए हस्तक्षेप की अगली कड़ी है। उस समय 526 ब्रांड की कैंसर दवाओं को लेकर किए गए कदम से सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की बचत होने की बात सामने आई थी।

अब गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने के फैसले के जरिए सरकार ने कैंसर के इलाज को अधिक किफायती बनाने पर जोर दिया है।

दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने पर भी जोर

सरकार ने कीमतों में कमी के साथ-साथ बाजार में जरूरी कैंसर दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने पर भी जोर दिया है। सरकार के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य मरीजों को आर्थिक राहत देने के साथ यह सुनिश्चित करना है कि जीवनरक्षक दवाओं की बाजार में उपलब्धता प्रभावित न हो।

सरकार ने इस कदम को किफायती, सुलभ और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया है।

लुधियाना : हेल्थ डिपार्टमेंट की बड़ी कार्रवाई, चाप और फ्रोजन फूड में मिली फफूंद; वेज-नॉनवेज सामान एक ही फ्रीजर में

लुधियाना / सत्ता संदेश

लुधियाना में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और साफ-सफाई को लेकर लुधियाना हेल्थ डिपार्टमेंट ने बड़ी कार्रवाई की है। डिवीजन नंबर-3 इलाके में शिकायत के आधार पर हेल्थ डिपार्टमेंट की टीम ने फ्रोजन फूड और चाप बेचने वाली एक दुकान पर छापा मारा। जांच के दौरान बड़ी मात्रा में खराब और फफूंद लगा हुआ सामान बरामद किया गया। विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, कई फ्रोजन प्रोडक्ट्स पर न तो एक्सपायरी डेट दर्ज थी और न ही उनके कंटेंट की जानकारी दी गई थी।

जांच के दौरान टीम को डीप फ्रीजर में रखी चाप और अन्य फ्रोजन खाद्य सामग्री बेहद खराब हालत में मिली। कुछ सामान पर फफूंद लगी हुई थी। इतना ही नहीं, जिस डीप फ्रीजर में खाद्य सामग्री रखी गई थी, उसमें भी गंदगी और फफूंद पाई गई। अधिकारियों के मुताबिक, फ्रीजर की लंबे समय से सफाई नहीं किए जाने जैसी स्थिति दिखाई दे रही थी।

हेल्थ डिपार्टमेंट के अनुसार, दुकान में रखे कई फ्रोजन प्रोडक्ट्स पर मैन्युफैक्चरिंग, एक्सपायरी और कंटेंट संबंधी जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इससे यह पता लगाना भी मुश्किल था कि खाद्य सामग्री कितने समय से स्टोर करके रखी गई थी। अधिकारियों ने बताया कि ऐसी स्थिति में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और लोगों की सेहत को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

एक ही फ्रीजर में वेज और नॉन-वेज सामान

कार्रवाई के दौरान टीम ने पाया कि दुकान के एक ही फ्रीजर में वेजिटेरियन और नॉन-वेजिटेरियन खाद्य सामग्री रखी गई थी। खाद्य सुरक्षा के नियमों के तहत खाद्य पदार्थों के भंडारण और हैंडलिंग में स्वच्छता और उचित पृथक्करण का ध्यान रखना जरूरी है। इस तरह की लापरवाही से क्रॉस-कंटैमिनेशन का खतरा बढ़ सकता है।

विशेष रूप से शाकाहारी खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाले लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था चिंता का विषय बन सकती है। अधिकारियों ने खाद्य कारोबारियों को साफ-सफाई और खाद्य पदार्थों के सुरक्षित भंडारण के नियमों का पालन करने की हिदायत दी है।

फूड सेफ्टी सर्टिफिकेट भी एक्सपायर

हेल्थ डिपार्टमेंट की जांच में दुकान के फूड सेफ्टी सर्टिफिकेट को लेकर भी सवाल सामने आए। विभाग के मुताबिक, दुकानदार के पास मौजूद फूड सेफ्टी प्रमाणपत्र की वैधता समाप्त हो चुकी थी। अधिकारियों ने बताया कि इसकी तारीख 2025 में ही खत्म हो गई थी।

कार्रवाई के दौरान खाद्य पदार्थों के सैंपल भी लिए गए हैं, जिन्हें जांच के लिए भेजा जाएगा। वहीं, संबंधित विभाग की ओर से दुकानदार का चालान भी किया गया और आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

हेल्थ डिपार्टमेंट ने जब्त किया सामान

डिस्ट्रिक्ट हेल्थ ऑफिसर ने कहा कि जांच के दौरान सामने आए खाद्य सामान को जब्त करने की प्रक्रिया की जाएगी और नियमों के मुताबिक आगे की कार्रवाई की जाएगी। विभाग ने लोगों से भी अपील की है कि फ्रोजन फूड, चाप या किसी भी पैक्ड खाद्य पदार्थ को खरीदने से पहले उसकी एक्सपायरी डेट, पैकिंग, कंटेंट और साफ-सफाई जरूर जांचें।

खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक गलत तापमान पर रखना या गंदे फ्रीजर में स्टोर करना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे में खाद्य कारोबारियों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों को सुरक्षित और निर्धारित मानकों के अनुरूप खाद्य सामग्री उपलब्ध कराएं।

बिहार : मेडिकल वेस्ट डस्टबीन खरीद पर बड़ा विवाद, ₹307 करोड़ के टेंडर पर पटना हाईकोर्ट ने मांगा सरकार से जवाब

बिहार में सरकारी अस्पतालों के लिए माइक्रोवेव डस्टबीन और बायोडिग्रेडेबल बैग की खरीद पर सवाल उठे हैं। ₹307 करोड़ के टेंडर मामले में पटना हाईकोर्ट ने सरकार से 19 नवंबर तक जवाब मांगा है।

  • बिहार में ₹307 करोड़ की मेडिकल वेस्ट खरीद पर सवाल, पटना हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
  • 15 हजार का डस्टबीन ₹1,550 में? बिहार की सरकारी खरीद पर हाईकोर्ट में पहुंचा मामला
  • मेडिकल वेस्ट डस्टबीन-बैग खरीद में कथित अनियमितता, 19 नवंबर को होगी पटना हाईकोर्ट में सुनवाई

पटना / सत्ता संदेश

बिहार के सरकारी अस्पतालों में बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए खरीदे गए माइक्रोवेव डस्टबीन और बायोडिग्रेडेबल बैग की कीमतों को लेकर विवाद अब पटना हाईकोर्ट पहुंच गया है। बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड (BMSICL) की ओर से की गई इस खरीद प्रक्रिया में कथित अनियमितता और भ्रष्टाचार के आरोपों पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने सरकार को 19 नवंबर 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता कौशलेश कुमार की ओर से दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने अदालत के सामने डस्टबीन और बायोडिग्रेडेबल बैग की खरीद कीमतों और कथित बाजार कीमतों के बीच बड़े अंतर का मुद्दा उठाया।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि BMSICL ने सरकारी अस्पतालों के लिए 75 लीटर और 45 लीटर क्षमता वाले माइक्रोवेव डस्टबीन तथा बायोडिग्रेडेबल बैग की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि कुछ वस्तुओं के लिए बाजार कीमत की तुलना में कई गुना अधिक भुगतान तय किया गया।

याचिका में दिए गए दावों के मुताबिक, 75 लीटर के माइक्रोवेव डस्टबीन की खरीद कीमत ₹15,490, जबकि कथित बाजार कीमत करीब ₹1,550 बताई गई है। इसी तरह 45 लीटर डस्टबीन की खरीद कीमत ₹11,474, जबकि बाजार कीमत करीब ₹1,162 होने का दावा किया गया है।

बायोडिग्रेडेबल बैग को लेकर भी याचिका में कीमतों में बड़े अंतर का आरोप लगाया गया है। 75 लीटर बैग की कीमत ₹98 प्रति बैग, जबकि कथित बाजार कीमत ₹8.50 बताई गई है। वहीं 45 लीटर बैग की खरीद कीमत ₹69, जबकि बाजार कीमत करीब ₹5.75 होने का दावा किया गया है।

57 सप्लाई ऑर्डर और ₹307 करोड़ के टेंडर का दावा

याचिका के अनुसार, जून 2024 से 18 अप्रैल 2026 के बीच इन वस्तुओं की आपूर्ति के लिए कुल 57 सप्लाई ऑर्डर जारी किए गए। याचिका में दावा किया गया है कि 18 प्रतिशत GST सहित इन वस्तुओं की कुल खरीद कीमत करीब ₹307 करोड़ तय की गई, जबकि चार अन्य आपूर्तिकर्ता फर्मों के कथित कोटेशन के आधार पर इन वस्तुओं की कुल कीमत करीब ₹29 करोड़ बताई गई है।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि निविदा प्रक्रिया के बाद लखनऊ स्थित ‘एसएस मेडिकल सिस्टम’ को इन वस्तुओं की आपूर्ति का ठेका मिला।

19 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

इस मामले में इससे पहले 8 सितंबर को भी सुनवाई हुई थी। उस दौरान अदालत ने राज्य सरकार से मामले की स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। अब हाईकोर्ट ने सरकार को 19 नवंबर 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी।

हालांकि, डस्टबीन और बायोडिग्रेडेबल बैग की खरीद में कीमतों को लेकर लगाए गए ये आरोप फिलहाल जनहित याचिका में किए गए दावे हैं। खरीद प्रक्रिया, टेंडर की शर्तों, वस्तुओं की गुणवत्ता, बाजार मूल्य और वास्तविक भुगतान को लेकर राज्य सरकार का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

रूस : प्लेग की आशंका के बीच भारत की महामारी तैयारी कितनी मजबूत? ₹64,180 करोड़ का PM-ABHIM और 163 लैब का नेटवर्क

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

रूस के साइबेरिया में एक लैब टेक्नीशियन की मौत के बाद प्लेग को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान महामारी की तैयारी की ओर खींच दिया है। इरकुत्स्क स्थित एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम करने वाली एक महिला की गंभीर निमोनिया के बाद मौत की खबर सामने आई। इसके बाद संपर्क में आए लोगों की निगरानी और सुरक्षा उपायों को लेकर भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इस मौत को प्लेग संक्रमण के तौर पर कंफर्म नहीं किया गया है।

ऐसे में इस घटना से जुड़े दावों और आशंकाओं को तथ्यों से अलग रखना जरूरी है। हालांकि, इस मामले ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा किया है—अगर कोरोना जैसी कोई नई संक्रामक बीमारी अचानक फैलने लगे तो भारत उसे कितनी जल्दी पहचानकर नियंत्रित कर सकता है?

कोरोना महामारी ने भारत समेत पूरी दुनिया को यह दिखाया कि महामारी से निपटने की तैयारी केवल अस्पतालों और डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकती। बीमारी की शुरुआती पहचान, लैब टेस्टिंग, संक्रमण की निगरानी, जीनोम सीक्वेंसिंग, गंभीर मरीजों के इलाज और केंद्र-राज्य के बीच तेज समन्वय की भी जरूरत होती है।

₹64,180 करोड़ का PM-ABHIM

कोरोना के अनुभव के बाद भारत ने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और महामारी से निपटने की क्षमता मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम किया है। इनमें प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन (PM-ABHIM) प्रमुख है, जिसके लिए 2021-22 से 2025-26 तक ₹64,180 करोड़ का प्रावधान किया गया था।

इसके अलावा देश में संक्रामक बीमारियों की जांच के लिए ICMR के VRDL नेटवर्क में 163 लैब, जीनोम जांच के लिए 4 प्रमुख हब, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक और वन हेल्थ मिशन जैसी पहलें शामिल हैं।

हालांकि, किसी योजना का बजट या घोषणा और उसका जमीन पर पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल होना दो अलग-अलग बातें हैं। महामारी की वास्तविक तैयारी का आकलन इस बात से होता है कि जरूरत पड़ने पर ये सुविधाएं कितनी तेजी से सक्रिय हो सकती हैं।

भारत की महामारी तैयारी के 5 बड़े आंकड़े

  • ₹64,180 करोड़: PM-ABHIM के लिए 2021-22 से 2025-26 तक प्रावधान।
  • 163 लैब: ICMR के वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैबोरेटरीज (VRDL) नेटवर्क में संक्रामक रोगों की जांच के लिए।
  • 4 जीनोम हब: रोगजनकों और उनके जेनेटिक बदलावों की निगरानी के लिए।
  • 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक: गंभीर मरीजों के इलाज की क्षमता बढ़ाने की योजना।
  • 22 BSL-3/4 लैब: वन हेल्थ मिशन के तहत उच्च जोखिम वाले रोगजनकों की जांच के नेटवर्क में शामिल करने की योजना।

बीमारी की पहचान के लिए 163 लैब का नेटवर्क

महामारी के शुरुआती दौर में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि बीमारी आखिर है क्या। कोरोना के शुरुआती समय में टेस्टिंग क्षमता बढ़ाना दुनिया के सामने बड़ी चुनौती थी। इसी अनुभव के बाद भारत में ICMR के वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैबोरेटरीज यानी VRDL नेटवर्क का विस्तार किया गया।

इस नेटवर्क में 11 रीजनल, 27 स्टेट और 125 मेडिकल कॉलेज लैब शामिल हैं। इसका उद्देश्य देश के अलग-अलग हिस्सों में संक्रामक बीमारियों की जांच की क्षमता बढ़ाना है।

किसी क्षेत्र में नया संक्रमण सामने आने पर स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर पर सैंपल की जांच की सुविधा बीमारी की पहचान और रिपोर्टिंग को तेज करने में मदद कर सकती है। रूस के मौजूदा मामले में भी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि बीमारी वास्तव में क्या थी। केवल निमोनिया, किसी रिसर्च संस्थान में काम करना या संपर्क में आए लोगों की निगरानी को प्लेग संक्रमण की पुष्टि नहीं माना जा सकता। इसके लिए वैज्ञानिक जांच और पुष्टि जरूरी है।

सिर्फ बीमारी नहीं, उसके जेनेटिक बदलाव पर भी नजर

आधुनिक महामारी तैयारी में केवल किसी वायरस या बैक्टीरिया की मौजूदगी का पता लगाना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिकों को यह भी समझना होता है कि रोगजनक में कोई महत्वपूर्ण जेनेटिक बदलाव तो नहीं आया।

भारत में जीनोम जांच की क्षमता इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जीनोम सीक्वेंसिंग से किसी रोगजनक के जेनेटिक बदलावों को समझने में मदद मिलती है और संक्रमण के संभावित पैटर्न पर नजर रखी जा सकती है।

महामारी में गंभीर मरीजों के लिए 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक

कोरोना ने यह भी दिखाया कि किसी बड़ी महामारी के दौरान अस्पतालों पर सबसे अधिक दबाव गंभीर मरीजों के इलाज को लेकर पड़ सकता है। ऑक्सीजन, ICU और क्रिटिकल केयर बेड की मांग अचानक कई गुना बढ़ सकती है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए PM-ABHIM के तहत 602 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक विकसित करने की योजना है।

इसके अलावा 3,382 ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट और 730 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। 17,788 सब-हेल्थ सेंटरों को आयुष्मान आरोग्य मंदिर में अपग्रेड करने की मंजूरी दी गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 11,024 अर्बन आयुष्मान आरोग्य मंदिर विकसित किए जा रहे हैं।

इसका उद्देश्य बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और उपचार की सुविधाओं को स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है।

रियल टाइम सर्विलांस से बीमारी पर नजर

महामारी से निपटने के लिए केवल अस्पताल और लैब पर्याप्त नहीं हैं। यह जानना भी जरूरी है कि बीमारी कहां बढ़ रही है, कितने मामले सामने आ रहे हैं और संक्रमण किस दिशा में फैल रहा है।

इसके लिए NCDC का Integrated Disease Surveillance Programme (IDSP) काम करता है। वहीं Integrated Health Information Platform (IHIP) के जरिए बीमारी से संबंधित रिपोर्टिंग और निगरानी को मजबूत करने की कोशिश की गई है।

संभावित प्रकोप की स्थिति में विशेषज्ञों की टीमें जांच और जोखिम का आकलन कर सकती हैं। मॉक ड्रिल और सिमुलेशन एक्सरसाइज के जरिए स्वास्थ्य एजेंसियों की आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को भी परखा जाता है। कुछ रोगजनकों के शुरुआती संकेतों की पहचान के लिए वेस्टवॉटर सर्विलांस भी महामारी निगरानी का हिस्सा है।

इंसानों के साथ जानवरों पर भी नजर

नई संक्रामक बीमारियों का खतरा केवल इंसानों से नहीं आता। कई रोगजनक जानवरों से इंसानों तक पहुंच सकते हैं। इसी वजह से भारत ने नेशनल वन हेल्थ मिशन पर जोर दिया है।

इस पहल में 13 से अधिक मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय का उद्देश्य इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत को एक साथ समझना है। मिशन के तहत 22 BSL-3/4 लैब के नेटवर्क पर भी काम किया जा रहा है।

नागपुर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वन हेल्थ को विकसित किया जा रहा है। इसमें बीमारी की निगरानी, संभावित प्रकोप की जांच, रिसर्च और डेटा शेयरिंग जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया गया है।

यूपी के आंकड़े बताते हैं जमीन पर अभी चुनौती बाकी

देश की महामारी तैयारी का आकलन केवल केंद्रीय योजनाओं से नहीं किया जा सकता। राज्यों में इन योजनाओं के लिए जारी धन का इस्तेमाल और तैयार की गई सुविधाओं का संचालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

उत्तर प्रदेश के 2025-26 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक NHM के तहत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹1,500.93 करोड़ मंजूर किए गए थे, जबकि उपलब्ध प्रोविजनल आंकड़ों में ₹83.66 करोड़ खर्च दिखाया गया है।

PM-ABHIM के तहत उत्तर प्रदेश के लिए केंद्र से ₹211.88 करोड़ जारी किए गए, जबकि रिपोर्ट में कुल खर्च ₹511.46 करोड़ बताया गया है। इसमें राज्य की हिस्सेदारी और पिछली बची राशि भी शामिल हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में PM-ABHIM के तहत 74 क्रिटिकल केयर ब्लॉक को मंजूरी मिली है। ये आंकड़े बताते हैं कि महामारी की तैयारी में केवल बजट आवंटित करना पर्याप्त नहीं है। पैसा समय पर खर्च हो, इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो और जरूरत पड़ने पर वह पूरी क्षमता के साथ काम करे—यह भी उतना ही जरूरी है।

2026-27 के हेल्थ बजट में भी महामारी तैयारी पर जोर

केंद्रीय बजट 2026-27 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ₹1,06,530.42 करोड़ का प्रावधान किया गया है। PM-ABHIM के लिए ₹4,770 करोड़ रखे गए हैं, जो पिछले संशोधित अनुमान के ₹2,845 करोड़ से 67.66 प्रतिशत अधिक है।

इसके अलावा NHM के लिए ₹39,390 करोड़, PM-JAY के लिए ₹9,500 करोड़ और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के लिए ₹4,821.21 करोड़ का प्रावधान है। ICMR के लिए ₹4,000 करोड़ रखे गए हैं।

क्या भारत कोरोना जैसी अगली महामारी के लिए तैयार है?

भारत ने कोरोना महामारी के बाद अपनी स्वास्थ्य तैयारियों को केवल अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय एक व्यापक ढांचा तैयार करने की कोशिश की है। 163 लैब, जीनोम सर्विलांस, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक, बीमारी की निगरानी के सिस्टम और वन हेल्थ मिशन इस तैयारी के अलग-अलग हिस्से हैं।

लेकिन किसी भी महामारी की तैयारी की असली परीक्षा संकट आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले होती है। लैब कितनी तेजी से टेस्ट कर सकती हैं, डेटा कितनी जल्दी साझा होता है, राज्यों की प्रतिक्रिया कितनी तेज है और अस्पताल अचानक बढ़ने वाले मरीजों के दबाव को कितना संभाल सकते हैं—इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि भारत अगली बड़ी संक्रामक बीमारी का सामना कितनी मजबूती से कर पाएगा।

नाभा में दूध और डेयरी उत्पादों की दुकानों पर हेल्थ विभाग की रेड, दूध-पनीर के लिए सैंपल

नाभा / सत्ता संदेश

रिपोर्ट : चेतन मेहता

त्योहारों के सीजन से पहले दूध और दूध से बने उत्पादों में मिलावट की शिकायतों को देखते हुए हेल्थ विभाग की टीम ने नाभा शहर में डेयरियों और दूध से जुड़े कारोबारियों के खिलाफ चेकिंग अभियान चलाया। फूड सेफ्टी ऑफिसर डॉ. गुरप्रीत कौर के नेतृत्व में टीम ने विभिन्न डेयरियों पर छापेमारी कर दूध, पनीर और अन्य डेयरी उत्पादों के सैंपल लिए।

फूड सेफ्टी ऑफिसर डॉ. गुरप्रीत कौर ने आशु डेयरी और महेश गेट स्थित नए फोकल प्वाइंट की डेयरी समेत अन्य स्थानों पर जांच की। बताया गया कि कुछ दिन पहले हेल्थ विभाग की टीम ने कुछ ऐसी दुकानों पर भी रेड की थी, जो उस समय बंद मिली थीं। इसके बाद विभाग की टीम ने दोबारा इन इलाकों में निगरानी और चेकिंग शुरू की।

डॉ. गुरप्रीत कौर ने दुकानदारों को स्पष्ट चेतावनी दी कि दूध और दूध से बने उत्पादों में किसी भी तरह की मिलावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि लोगों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाना जरूरी है। मिलावट पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ फूड सेफ्टी एक्ट के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने कहा कि अगर कोई दुकानदार चेकिंग के दौरान दुकान बंद कर देता है तो इससे वह विभाग की कार्रवाई से बच नहीं सकता। विभाग की टीमें लगातार अलग-अलग समय पर चेकिंग करेंगी और अगली कार्रवाई किसी भी दुकान पर हो सकती है।

डॉ. गुरप्रीत कौर ने बताया कि पटियाला की टीम द्वारा पिछले दिनों बड़ी मात्रा में पनीर और दूध जब्त किया गया था। उन्होंने कहा कि लैब रिपोर्ट के बाद खराब पाए गए खाद्य पदार्थों को नष्ट किया गया। विभाग की ओर से आने वाले त्योहारों को देखते हुए मिठाई की दुकानों, डेयरियों, रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के लिए भी आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

सभी फूड वेंडरों को अपना लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन करवाने, कर्मचारियों की मेडिकल जांच करवाने, साफ-सफाई बनाए रखने और नियमित पेस्ट कंट्रोल करवाने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग ने चेतावनी दी है कि बिना एक्सपायरी डेट, खराब गुणवत्ता या नकली खाद्य सामग्री बेचने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

डॉ. गुरप्रीत कौर के मुताबिक यह चेकिंग अभियान केवल नाभा तक सीमित नहीं रहेगा। नाभा, राजपुरा, समाना और पूरे पटियाला जिले में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच लगातार जारी रहेगी।

Punjab News: बकाया बिल पर शव रोकने वाले अस्पतालों पर FIR, मानवाधिकार आयोग का बड़ा फैसला

राजपुरा में मानवाधिकार आयोग के सदस्य जतिंदर सिंह शंटी ने कहा कि बकाया अस्पताल बिल के कारण मृतक का शव रोकने वाले निजी अस्पतालों के खिलाफ FIR दर्ज होगी। अस्पतालों को 20 अक्टूबर तक मॉर्चरी बॉक्स और सूचना बोर्ड लगाने के निर्देश दिए गए हैं।

राजपुरा / सत्ता संदेश

रिपोर्ट : दीपक कुमार

बकाया अस्पताल बिल के कारण मृतक का शव परिजनों को सौंपने से रोकने के मामलों को लेकर पंजाब राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग के सदस्य पद्मश्री जतिंदर सिंह शंटी ने स्पष्ट किया कि किसी भी निजी अस्पताल को बकाया बिल की वजह से मृतक का शव रोकने की अनुमति नहीं होगी। नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पताल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की कार्रवाई की जाएगी।

राजपुरा के बहावलपुर भवन में आयोजित खुली सुनवाई यानी ‘जनता की अदालत’ के दौरान जतिंदर सिंह शंटी ने लोगों की समस्याएं और शिकायतें सुनीं। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे। पत्रकारों से बातचीत में शंटी ने बताया कि मानवाधिकार आयोग की ओर से अलग-अलग जिलों और तहसीलों में जाकर लोगों की शिकायतें सीधे सुनी जा रही हैं, ताकि पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाया जा सके।

शंटी ने बताया कि अस्पतालों से संबंधित इस महत्वपूर्ण निर्देश के तहत निजी अस्पतालों को बकाया राशि के नाम पर मृतक का शव रोकने से रोक दिया गया है। उन्होंने कहा कि किसी परिवार से अस्पताल का बिल वसूलने के लिए शव को रोकना मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है और ऐसे मामलों में नियमों के मुताबिक कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने यह भी बताया कि अस्पतालों को 20 अक्टूबर तक मॉर्चरी बॉक्स की व्यवस्था करने और अस्पताल के अंदर तथा बाहर इस संबंध में सूचना बोर्ड लगाने की समय सीमा दी गई है।

मानवाधिकार आयोग के सदस्य ने लोगों से अपील की कि वे अपनी शिकायतें आधार कार्ड के साथ आयोग के व्हाट्सऐप नंबर 9855475547 पर भेज सकते हैं। इसके अलावा चंडीगढ़ के सेक्टर-34ए स्थित आयोग के कार्यालय में कार्यदिवस के दौरान सीधे शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है।

कांग्रेसी विधायक सुखपाल सिंह खैहरा द्वारा उनके खिलाफ की गई बयानबाजी पर प्रतिक्रिया देते हुए शंटी ने कहा कि वह राजनेता नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि उनके कामकाज को लेकर किसी को कोई संदेह है तो सरकार या प्रशासन उनकी किसी भी प्रकार की जांच करवा सकता है। उन्होंने कहा, “फलदार पेड़ पर ही पत्थर पड़ते हैं।”

शंटी ने कहा कि उन्होंने लंबे समय तक लावारिस शवों को उठाने और उनके अंतिम संस्कार की सेवा की है। उन्होंने कहा कि बयानबाजी की परवाह किए बिना अपने तीन साल के कार्यकाल में लोगों के अधिकारों की रक्षा, नशे के खिलाफ कार्रवाई और ट्रैवल एजेंटों की धोखाधड़ी से लोगों को बचाने के लिए काम जारी रखेंगे।