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कोडीन के सेवन से कोई मौत नहीं हुई: नड्डा
नयी दिल्ली, 13 फरवरी (भाषा) केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने शुक्रवार को कहा कि किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से कोडीन आधारित कफ सिरप के सेवन से जुड़ी मौत का कोई मामला सामने नहीं आया है।
नड्डा ने लोकसभा में प्रश्नकाल में कांग्रेस सांसद उज्ज्वल रमण सिंह के पूरक प्रश्न का उत्तर देते हुए यह बात कही।
कांग्रेस सदस्य ने पूछा था, ‘‘उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में (कोडीन आधारित कफ सीरप के सेवन से) बड़े पैमाने पर मौतें हुईं हैं, क्या सरकार सीबीआई जांच कराएगी और मौत के मामलों में परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा?’’
नड्डा ने जवाब में कहा, ‘‘मैंने अपने (लिखित) उत्तर में बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कोडीन आधारित कफ सिरप के सेवन से जुड़ी मौत का कोई मामला किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश से नहीं आया है। जब कोडीन टॉक्सिन से कोई मौत नहीं हुई है तो फिर मुआवजे का प्रश्न ही नहीं उठता।’’
इस मामले में सीबीआई जांच कराने के सवाल पर नड्डा ने कहा कि जब इससे कोई मृत्यु ही नहीं हुई है तो सीबीआई जांच की मांग कैसे की जा सकती है।
तेलुगु देशम पार्टी के कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी ने सरकार से पूछा कि क्या बाजार से खराब और संदूषित दवाओं को वापस बुलाने के लिए सरकार की कोई नीति लाने की योजना है?
जवाब में नड्डा ने कहा कि दवाओं का निरीक्षण किया जाता है और कोई दवा यदि घटिया या मानव सेवन के लिए उपयुक्त नहीं पायी जाती है तो एक प्रक्रिया के तहत उसे वापस लिया जाता है।
सरकारी स्कूल के 19 छात्र अधिक मात्रा में आयरन की गोलियों लेने के बाद अस्पताल में भर्ती
चंद्रपुर, 13 फरवरी (भाषा) महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के एक जिला परिषद स्कूल के 19 छात्रों ने बिना किसी की निगरानी में अत्यधिक मात्रा में एनीमिया रोधी गोलियों का सेवन कर लिया जिससे वे बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
 अधिकारियों ने बताया कि भद्रावती तहसील के भामदेली गांव से घटना की सूचना मिलने के बाद जांच के आदेश दिए गए हैं।
 अधिकारियों के अनुसार, छात्रों को हर सोमवार को आयरन की गोलियां दी जाती हैं। हालांकि, जिला परिषद (जिप) स्कूल के कुछ छात्रों ने कथित तौर पर मंगलवार को शिक्षकों की अनुपस्थिति में अधिक गोलियां खा लीं।
 जिला परिषद के जिला स्वास्थ्य अधिकारी अशोक कटारे ने बताया कि बुधवार रात को कुल 19 छात्रों ने चक्कर आने और अत्यधिक अस्वस्थ महसूस करने की शिकायत की। उन्होंने बताया कि स्कूल प्रशासन ने एंबुलेंस बुलाई और उन्हें चंद्रपुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
 चिकित्सकों के अनुसार, 16 छात्रों की हालत स्थिर है। उन्होंने बताया कि तीन छात्र निगरानी में हैं। अधिकारियों ने बताया कि जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पुलकित सिंह ने मामले में उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
दिन में दो-तीन कप कॉफी पीने से वृद्धावस्था में कम हो सकता है डिमेंशिया का खतरा
(ईफ़ होजेनवोर्स्ट, लफबरो यूनिवर्सिटी)  
लफबरो (ब्रिटेन), 10 फरवरी (द कन्वरसेशन) वैज्ञानिकों ने पाया है कि दिन में दो से तीन कप कॉफी पीने से डिमेंशिया होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है, लेकिन इससे अधिक मात्रा में कॉफी पीने से मस्तिष्क को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता।
एक व्यापक अध्ययन में 1,31,821 अमेरिकी नर्सों और स्वास्थ्य पेशेवरों को शामिल किया गया, जिनके स्वास्थ्य पर शुरुआती 40 साल की उम्र से लेकर 43 वर्षों तक नजर रखी गई। इस अवधि में 11,033 लोगों यानी करीब आठ प्रतिशत में डिमेंशिया हुआ। हालांकि, सीमित मात्रा में कैफीनयुक्त कॉफी या चाय पीने वालों में डिमेंशिया होने की संभावना कम पाई गई।
अध्ययन के अनुसार, 75 वर्ष या उससे कम आयु के लोगों में इसका प्रभाव सबसे अधिक देखा गया। रोजाना करीब 250-300 मिलीग्राम कैफीन (लगभग दो से तीन कप कॉफी) लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम 35 प्रतिशत तक कम पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे अधिक कैफीन लेने से कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिला।
अध्ययन में शामिल महिलाओं ने बताया कि शुरुआत में वे प्रतिदिन औसतन साढ़े चार कप कॉफी या चाय पीती थीं, जबकि पुरुषों के लिए कॉफी की औसत खपत ढाई कप थी। अधिक कैफीन लेने वाले प्रतिभागी अपेक्षाकृत कम उम्र के थे, लेकिन वे शराब का अधिक सेवन करते थे, धूम्रपान करते थे और अधिक कैलोरी लेते थे, जो डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं।
शोध में यह भी पाया गया कि कैफीन रहित कॉफी पीने वालों में स्मृति क्षय तेज़ी से हुआ। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लोग नींद की समस्या, उच्च रक्तचाप या हृदय संबंधी उन समस्याओं के बाद कैफीन रहित कॉफी की ओर रुख करते हैं, जो स्वयं संज्ञानात्मक गिरावट से जुड़ी हैं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि कैफीन मस्तिष्क में उस एडेनोसिन नामक रसायन को अवरुद्ध करता है, जो डोपामिन और एसिटाइलकोलाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर की गतिविधि को दबाता है। उम्र बढ़ने और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों में ये न्यूरोट्रांसमीटर कम सक्रिय हो जाते हैं और कैफीन इस गिरावट को कुछ हद तक रोक सकता है।
अध्ययन में यह भी कहा गया कि अधिक मात्रा में कैफीन लेने से नींद प्रभावित हो सकती है और चिंता बढ़ सकती है, जिससे मस्तिष्क को होने वाले लाभ कम हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 1908 में प्रतिपादित यर्क्स-डॉडसन नियम का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक उत्तेजना मस्तिष्क को कमजोर कर सकती है।
अन्य 38 अध्ययनों के विश्लेषण में भी समान परिणाम सामने आए, जिनके अनुसार कैफीन लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम, कैफीन न लेने वालों की तुलना में छह से 16 प्रतिशत तक कम पाया गया। इस व्यापक विश्लेषण में एक से तीन कप कॉफी को सबसे उपयुक्त मात्रा बताया गया।
शोधकर्ताओं ने हालांकि कहा कि ‘कप’ की मात्रा अलग-अलग हो सकती है और कॉफी में कैफीन की मात्रा उसके प्रकार और बनाने के तरीके पर निर्भर करती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बहुत कम मात्रा में कैफीन सतर्कता और मनोदशा में सुधार कर सकती है और अधिक मात्रा हमेशा बेहतर नहीं होती।
पने स्वास्थ्य का ख्याल रखें

बदलते मौसम में सर्दी-खांसी, बुखार और गले में खराश जैसी बीमारियां आम हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस दौरान शरीर को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं: 

खान-पान और पोषण:

  • हल्का और पौष्टिक भोजन: बदलते मौसम में पाचन कमजोर हो सकता है, इसलिए सुपाच्य खाना खाएं।
  • हाइड्रेशन (पानी की कमी न होने दें): पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। पानी, छाछ, नींबू पानी और नारियल पानी का सेवन बढ़ाएं।
  • विटामिन सी युक्त आहार: संतरा, नींबू, आंवला जैसे विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बनी रहे।
  • अदरक-तुलसी की चाय: गले को आराम देने के लिए अदरक, तुलसी और शहद वाली चाय या काढ़ा पी सकते हैं।
  • बाहर के खाने से बचें: फूड पॉइजनिंग और इंफेक्शन से बचने के लिए बाहर का खाना कम करें। 

स्वच्छता और व्यक्तिगत देखभाल:

  • हाथ धोना: खाने से पहले और बाहर से आने के बाद हाथ साबुन से जरूर धोएं।
  • दिन में दो बार स्नान: गर्मी और उमस वाले मौसम में दो बार स्नान करने से त्वचा के संक्रमण से बचाव होता है।
  • मॉइस्चराइज़र: त्वचा को रूखापन और रैशेज से बचाने के लिए मॉइस्चराइज़र का प्रयोग करें। 

जीवनशैली (Lifestyle):

  • नियमित व्यायाम: इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए योग, सुबह-शाम की सैर या हल्की एक्सरसाइज करें।
  • पर्याप्त नींद: शरीर को रिकवर करने के लिए 7-8 घंटे की अच्छी नींद लें।
  • गर्म कपड़े: सुबह-शाम के तापमान में उतार-चढ़ाव के अनुसार सही कपड़े पहनें। 

देसी खुशबू और चटाकेदार स्वाद! घर पर फटाफट बना लें हरे लहसुन की चटनी


हरे लहसुन की चटनी

लोग हर रोज एक जैसा बोरिंग खाना खा कर थक जाते हैं और कुछ अलग की तलाश में रहते हैं. बहुत से लोग बाजार के केमिकल वाले अचार खरीद लाते हैं जो हेल्थ के लिए अच्छा नहीं माना जाता है. आज हम आपको बताएंगे कैसे आप घर पर आसानी से हरे लहसुन की चटनी बना सकते हैं. हरे लहसुन की चटनी तीखी चटपटी और खुशबू से भरपूर होती है. इसमें हरे लहसुन के साथ हरी मिर्च और मसालों का इस्तेमाल किया जाता ह जो इसे स्वादिष्ट बना देती है. अगर आप खाने में देसी स्वाद पसंद करते हैं तो ये हरे लहसुन की चटनी रेसिपी जरूर ट्राई करें. रोटी, पराठा, दाल, चावल या खिचड़ी के साथ अगर हरे लहसुन की चटनी मिल जाए तो खाने का मजा दोगुना हो जाता है. सबसे अच्छी बात यह है कि ये चटनी बहुत जल्दी बन जाती है और इसमें ज्यादा मसालों की जरूरत भी नहीं पड़ती है.
सामग्री

हरा लहसुन बारीक कटा हुआ हरी मिर्च धनिया पत्ती अदरक नमक स्वाद अनुसार नींबू का रस सरसों का तेल जीरा

कैसे बनाएं

हरे लहसुन को अच्छे से साफ करें और बारीक काट लें. इसके बाद हरी मिर्च और अदरक को भी काट लें. अब मिक्सर जार में हरा लहसुन, हरी मिर्च, अदरक और धनिया पत्ती डालें. इसमें स्वाद अनुसार नमक डालें और थोड़ा सा पानी मिलाकर दरदरा पीस लें.

मिक्स

अब एक छोटे पैन में थोड़ा सा सरसों का तेल गर्म करें और इसमें जीरा डालें और हल्का चटकने दें. इस तड़के को तैयार चटनी में डालकर अच्छी तरह मिला लें. आखिर में नींबू का रस डालें जिससे चटनी का स्वाद और भी बढ़ जाए.

अगर आप चाहें तो ऊपर से थोड़ा सा कच्चा सरसों का तेल भी डाल सकते हैं, इससे खुशबू और स्वाद दोनों बढ़ जाते हैं.इसे फ्रिज में रखकर एक से दो दिन तक इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर आपको चटाकेदार खाने का मन हो तो हरे लहसुन की ये चटनी झटपट तैयार की जा सकती है.