लुधियाना में ‘रावी मेरे आर पार’ किताब का विमोचन, लेखक धर्म सिंह गोराया ने रावी की विरासत को दी आवाज
लुधियाना में अमेरिकी लेखक एस. धर्म सिंह गोराया की किताब ‘रावी मेरे आर पार’ का विमोचन हुआ। पुस्तक में रावी नदी, लोककथाओं, इतिहास और इससे जुड़े लोक नायकों का वर्णन है।
लुधियाना / सत्ता संदेश
अमेरिका के मैरीलैंड में रहने वाले लेखक एस. धर्म सिंह गोराया की नई गद्य पुस्तक ‘रावी मेरे आर पार’ का लुधियाना में पंजाबी लोक विरासत अकादमी में विमोचन किया गया। अकादमी के चेयरमैन प्रो. गुरभजन सिंह गिल और साहित्य एवं कला क्षेत्र से जुड़े अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से पुस्तक का लोकार्पण किया।
इस अवसर पर प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने कहा कि रावी नदी के किनारे स्थित रणसिंह के मीरा गांव में जन्मे एस. धर्म सिंह गोराया ने गुरदासपुर से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। अपने बड़े भाई और जनहित के मुद्दों पर काम करने वाले अर्थशास्त्री डॉ. निर्मल सिंह आज़ाद से प्रेरणा लेकर उन्होंने पंजाबी यूनिवर्सिटी से पोस्ट-ग्रेजुएशन किया और शोधपरक गद्य लेखन को अपना रास्ता बनाया।
प्रो. गिल ने कहा कि यह शुभ संकेत है कि रावी नदी, पंजाबी लोककथाएं और इससे जुड़े लोक नायक लेखक के अध्ययन और विश्लेषण के प्रमुख विषय बने हैं। ‘रावी मेरे आर पार’ पहली नजर में रावी नदी और उसके आसपास बसे इलाकों की कहानी लगती है, लेकिन पुस्तक का दायरा इससे कहीं व्यापक है।
किताब में रावी नदी के उद्गम से लेकर झन नदी और आगे सिंधु नदी के रास्ते समुद्र तक पहुंचने की यात्रा को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया गया है। रावी नदी के दोनों किनारों से जुड़े वीरों, लेखकों, खिलाड़ियों और देशभक्तों के जीवन एवं योगदान को भी पुस्तक में स्थान दिया गया है।
प्रो. गिल ने कहा कि रावी के किनारे स्थित करतारपुर साहिब की धरती को समझते हुए इस पुस्तक के माध्यम से मेहनत, नाम जपने और मिल-बैठकर बांटकर खाने जैसी मानवीय एवं आध्यात्मिक परंपराओं को महसूस किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रावी वह नदी है जिसने गुरु नानक पातशाह की वाणी और संदेश की गूंज को अपने किनारों से महसूस किया है।
पंजाबी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष त्रिलोचन लोची ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा कि एस. धर्म सिंह गोराया इससे पहले ‘बुलंद हवेली’, ‘गुरिल्ला युद्ध कला दे मोधी चे ग्वेरा’, ‘अंखिला धरती पुत्र दुल्ला भट्टी’, ‘रावी दा रथ राय अहमद खान खरल’, ‘जग्गा सूरमा’, ‘लोह पुरख मर्जीवाड़ा तेजा सिंह स्वतंत्र’ और आत्मकथात्मक पुस्तक ‘कर्मा’ जैसी रचनाएं लिख चुके हैं।
पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के उपाध्यक्ष सहजप्रीत सिंह मांगट ने कहा कि धर्म सिंह गोराया ने ऐतिहासिक संदर्भों के साथ रचनात्मक गद्य लिखने में अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी जीवन में पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े रहने के कारण लेखक के पास समाज को समझने की एक सजग दृष्टि है, जो उन्हें घटनाओं और तथ्यों को परखने में मदद करती है।
पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रविंदर भट्ठल ने कहा कि धर्म सिंह गोराया ने पांच नदियों की धरती के लोगों की कहानियां लिखते हुए अब रावी नदी को केंद्र में रखकर एक महत्वपूर्ण रचना प्रस्तुत की है। उन्होंने कहा कि ‘रावी मेरे आर पार’ दर्द का दस्तावेज भी है और प्यार का करार भी।
अमेरिका से आए पुस्तक के लेखक एस. धर्म सिंह गोराया ने इस अवसर पर सभी का आभार जताया। उन्होंने कहा कि ‘रावी मेरे आर पार’ लिखकर उन्होंने रावी नदी और इसके आसपास के इलाकों से अपने जुड़ाव का ऋण चुकाने की कोशिश की है। अमेरिका में रहते हुए भी वह पंजाब के रावी क्षेत्र के चप्पे-चप्पे से जुड़े रहे हैं।
लेखक ने कहा कि देश के विभाजन ने रावी नदी को एक सीमा में बदल दिया, लेकिन उनके लिए रावी केवल एक सरहद नहीं है। उनके शब्दों में, “रावी मेरे आर पार बसता है।”

