2029 तक 21 NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य, लेकिन राह में कई सियासी सवाल
नई दिल्ली / सत्ता संदेश
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और NDA शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) लागू करने का लक्ष्य सामने रखा है। शाह के इस ऐलान के बाद UCC एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। हालांकि, लक्ष्य जितना बड़ा है, उसे हासिल करने की राजनीतिक और संवैधानिक राह उतनी ही चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है।
UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। भाजपा लंबे समय से इसे अपने प्रमुख वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है। उत्तराखंड में जनवरी 2025 से UCC लागू है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाएं भी UCC से जुड़े कानून पारित कर चुकी हैं। हालांकि अलग-अलग राज्यों के कानून पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 2029 तक 21 राज्यों के लिए UCC का पूरा रोडमैप तैयार है? क्योंकि इस लक्ष्य के बीच कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और कुछ राज्यों में भाजपा के बजाय उसके सहयोगी दल सत्ता में हैं।
चुनावी राज्यों में UCC की राह कितनी आसान?
UCC को लेकर सबसे ज्यादा राजनीतिक नजरें उन राज्यों पर होंगी जहां आने वाले वर्षों में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर किसी राज्य में सत्ता परिवर्तन होता है और वहां भाजपा या NDA की सरकार नहीं रहती, तो उस राज्य में UCC लागू करने की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ेगी, यह बड़ा सवाल है।
उत्तर प्रदेश भी इस पूरे समीकरण में अहम है। राज्य में अभी UCC को लेकर विधायी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है और आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सवाल यही है कि क्या चुनाव से पहले इस दिशा में बड़ा कदम उठाया जाएगा या फिर चुनाव के बाद बनने वाली सरकार पर इसकी जिम्मेदारी होगी।
मणिपुर की स्थिति भी जटिल है। पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थानीय और आदिवासी समुदायों की अलग-अलग परंपराएं और प्रथाएं UCC को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। मौजूदा UCC कानूनों में अनुसूचित जनजातियों को कई मामलों में दायरे से बाहर रखा गया है।
2028 के चुनाव भी होंगे निर्णायक
2028 में भी कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम जैसे राज्य शामिल हैं। इनमें कुछ राज्यों में भाजपा की सरकार है, जबकि कुछ में विपक्षी दल या सहयोगी सत्ता में हैं।
यही वजह है कि 2029 की समयसीमा सिर्फ भाजपा के लिए ही नहीं, बल्कि उसके NDA सहयोगियों के लिए भी बड़ी परीक्षा बन सकती है।
TDP ने समर्थन दिया, लेकिन अभी चर्चा बाकी
आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी यानी TDP का रुख भी महत्वपूर्ण है। पार्टी के संसदीय दल के नेता लावु श्रीकृष्ण देवरायलु ने कहा है कि फिलहाल पार्टी के भीतर UCC को लेकर चर्चा नहीं हुई है और जरूरत पड़ने पर विभिन्न हितधारकों से विचार-विमर्श किया जाएगा। यानी समर्थन की संभावना दिखाई देती है, लेकिन अंतिम रोडमैप अभी स्पष्ट नहीं है।
JDU का रुख भाजपा के लिए चुनौती
NDA की प्रमुख सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) का रुख इस मुद्दे को और पेचीदा बनाता है। JDU ने UCC को लेकर चर्चा और सहमति की जरूरत पर जोर दिया है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने अमित शाह से मुलाकात कर इस मुद्दे पर चर्चा की बात कही है। वहीं बिहार में UCC लागू करने को लेकर पार्टी के भीतर स्पष्ट आपत्तियां भी सामने आई हैं।
इससे साफ है कि NDA के भीतर UCC पर एक जैसी राय नहीं है। कुछ सहयोगी दल खुलकर समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ दल मसौदा सामने आने, व्यापक चर्चा और सभी हितधारकों से राय लेने की मांग कर रहे हैं।
LJP और अन्य सहयोगी भी मांग रहे हैं चर्चा
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान भी UCC पर व्यापक चर्चा और सभी हितधारकों की राय लेने की बात कह चुके हैं। वहीं शिवसेना के श्रीकांत शिंदे और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा जैसे NDA सहयोगियों ने UCC के प्रति समर्थन जताया है। दूसरी ओर, कुछ विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं और इसे देश की धार्मिक एवं सामाजिक विविधता से जोड़कर देख रहे हैं।
2029 का लक्ष्य या ठोस रोडमैप?
अमित शाह ने 2029 से पहले 21 NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य स्पष्ट कर दिया है। लेकिन अब राजनीतिक बहस इस बात पर होगी कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए राज्यों के स्तर पर कितना काम हो चुका है।
UCC चूंकि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों को प्रभावित करता है और विवाह, तलाक, उत्तराधिकार तथा अन्य पारिवारिक मामलों तक इसका असर पहुंच सकता है, इसलिए राज्यों में स्थानीय परिस्थितियां, आदिवासी परंपराएं और राजनीतिक सहमति महत्वपूर्ण होंगी। संविधान के तहत इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, जिसके कारण भाजपा ने राज्य-दर-राज्य मॉडल को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 2029 तक UCC 21 राज्यों में लागू होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भाजपा और उसके सहयोगी दल चुनावी बदलावों, क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों और गठबंधन की अलग-अलग राय के बावजूद इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक साझा रोडमैप तैयार कर पाएंगे?
2029 की डेडलाइन सामने है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने का रास्ता अभी भी राजनीतिक सहमति, चुनावी परिणामों और NDA के अंदरूनी समीकरणों पर काफी हद तक निर्भर करता दिखाई दे रहा है।


