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गर्मियों में तरबूज खाने के 7 बेहतरीन फायदे।

सत्ता सन्देश हेल्थ डेस्क :-तरबूज का सेवन गर्मियों में आपको कूल और हाइड्रेटेड रखने का सबसे आसान तरीका है। इसलिए, इसे अपने आहार में जरूर शामिल करें। गर्मियों में तरबूज खाने के 7 बेहतरीन फायदे जैसे की-

  • डिहाइड्रेशन से बचाव: तरबूज में करीब 92% पानी होता है। गर्मियों में ज्यादा पसीना आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। तरबूज खाने से यह कमी पूरी होती है और हम हाइड्रेटेड रहते हैं। पानी की पर्याप्त मात्रा हमें ठंडक भी देती है और हमें ताजगी का एहसास कराती है।
  • एंटीऑक्सिडेंट और विटामिन: तरबूज में विटामिन ए, विटामिन सी और लाइकोपीन जैसे महत्वपूर्ण एंटीऑक्सिडेंट होते हैं। ये एंटीऑक्सिडेंट फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं। विटामिन ए आंखों के लिए और विटामिन सी स्किन के लिए फायदेमंद होता है।
  • पाचन में सुधार: तरबूज में पानी और फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो हमारे पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है। यह कब्ज की समस्या से भी राहत दिलाता है और पेट को साफ रखता है। इसलिए, तरबूज खाना पाचन के लिए बहुत अच्छा होता है।
  • किडनी स्टोन से बचाव: तरबूज में सिट्रुलिन नामक तत्व होता है, जो किडनी स्टोन बनने से रोकता है। सिट्रुलिन मूत्र के पीएच स्तर को संतुलित रखता है, जिससे पथरी बनने की संभावना कम हो जाती है। इस प्रकार, तरबूज किडनी के लिए भी फायदेमंद है।
  • मसल रिकवरी में सहायक: गर्मियों में व्यायाम करने के बाद तरबूज खाने से हमारी मसल्स की रिकवरी जल्दी होती है। तरबूज में सिट्रुलिन होता है, जो प्रोटीन सिंथेसिस को बढ़ाता है और मसल्स के दर्द को कम करता है। साथ ही, इसमें विटामिन सी और ए भी होते हैं, जो मसल्स की रिकवरी में मदद करते हैं।
  • शरीर को ठंडा रखना: तरबूज का सेवन करने से शरीर को ठंडक मिलती है। इसका 92% पानी हमारे शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है और गर्मी में राहत दिलाता है। तरबूज खाने से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और हम ताजगी महसूस करते हैं।
  • सुरक्षित सेवन: तरबूज का सेवन करते समय ध्यान रखें कि इसे धोकर और छिलका हटाकर खाएं। इससे किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचा जा सकता है। हालांकि, तरबूज का अधिक सेवन पेट की समस्याओं का कारण बन सकता है, इसलिए संतुलित मात्रा में ही खाएं।
जीवन के पहले छह वर्षों में मस्तिष्क के विकास को अधिकतम करने से संबंधित विषय पर केंद्रित आठवें पोषण पखवाड़े-2026 का कल राष्ट्रीय स्तर पर शुभारंभ होगा

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय 9 से 23 अप्रैल 2026 तक पोषण पखवाड़ा मनाएगा; यह देश भर में पोषण संबंधी परिणामों में सुधार के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय 9 से 23 अप्रैल 2026 तक पोषण पखवाड़े के 8वें संस्करण का आयोजन करेगा। यह देश भर में पोषण संबंधी परिणामों में सुधार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।

पोषण के महत्व पर बल देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, एक स्वस्थ बच्चा एक मजबूत राष्ट्र की नींव होता है। पोषण अभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं हैबल्कि प्रत्येक मां और बच्चे के लिए संपूर्ण पोषण सुनिश्चित करने का एक जन आंदोलन है।”

पोषण पखवाड़ा 2026 का राष्ट्रीय शुभारंभ 9 अप्रैल 2026 को दोपहर 3 बजे से 4 बजे नई दिल्ली के विज्ञान भवन में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी के दूरदर्शी नेतृत्व में और महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर तथा महिला एवं बाल विकास सचिव श्री अनिल मलिक की गरिमामयी उपस्थिति में किया जाएगा।

पोषण पखवाड़ा 2026 का विषय जीवन के पहले छह वर्षों में मस्तिष्क के विकास को अधिकतम करना इस तथ्य को मान्यता देता है कि प्रारंभिक बचपन—विशेष रूप से पहले 1,000 दिन—मस्तिष्क के विकास, शारीरिक विकास और समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि मस्तिष्क का 85 प्रतिशत से अधिक विकास छह वर्ष की आयु तक हो जाता है, जो इष्टतम पोषण, संवेदनशील देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।

इस वर्ष के विषय के अंतर्गत प्रमुख ध्यान देने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

  1. मातृ एवं शिशु पोषण – गर्भावस्था के दौरान इष्टतम पोषण को बढ़ावा देना, केवल स्तनपान कराना और आयु के अनुसार पूरक आहार प्रदान करना।
  2. मस्तिष्क के विकास के लिए प्रारंभिक प्रोत्साहन (0-3 वर्ष) – प्रतिक्रियाशील देखभाल और प्रारंभिक शिक्षण की बातचीत को प्रोत्साहित करना।
  3. प्रारंभिक वर्षों में खेल-आधारित शिक्षा (3-6 वर्ष) – समग्र विकास और विद्यालय जाने की तैयारी में सहयोग।
  4. स्क्रीन टाइम को कम करने में माता-पिता और समुदाय की भूमिका – स्वस्थ आदतों और सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देना।
  5. सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से आंगनवाड़ी केंद्रों को मजबूत बनाना– जन भागीदारी और सीएसआर के माध्यम से बुनियादी ढांचे और सेवा वितरण को बढ़ाना।

उद्घाटन कार्यक्रम में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रदर्शन किया जाएगा, प्रमुख पहलों की शुरुआत की जाएगी और प्रारंभिक बचपन की देखभाल और पोषण सेवाओं को मजबूत करने में अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं, विशेष रूप से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के योगदान की जानकारी दी जाएगी।

उद्घाटन दिवस पर, कार्यक्रम का सीधा प्रसारण एनआईसी वेबकास्ट प्लेटफॉर्म https://webcast.gov.in/mwcd और मंत्रालय के यूट्यूब चैनल के माध्यम से किया जाएगा।

पखवाड़े के दौरान, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से गतिविधियां आयोजित की जाएंगी, जिनमें माताएं, देखभालकर्ता, परिवार, सामुदायिक संस्थाएं और स्थानीय निकाय भाग लेंगे। इनमें पोषण पंचायतें, जागरूकता सत्र, प्रारंभिक प्रोत्साहन गतिविधियां, खेल आधारित शिक्षण पहल और छोटे बच्चों में स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने और स्क्रीन टाइम को कम करने के अभियान शामिल होंगे।

पोषण पखवाड़ा 2026 के माध्यम से, मंत्रालय का उद्देश्य इस बात पर बल देकर जन आंदोलन को और मजबूत करना है कि पोषण, देखभाल, प्रारंभिक शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी मिलकर एक स्वस्थ, शिक्षित और सशक्त भारत की आधारशिला रखते हैं।

भारत सरकार के पोषण संबंधी परिणामों में सुधार लाने के प्रमुख मिशन के रूप में पोषण अभियान अब एक राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन में परिवर्तित हो चुका है, यह कुपोषण मुक्त भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में सामुदायिक भागीदारी और जनभागीदारी को बढ़ावा देता है। पोषण पखवाड़ा जमीनी स्तर पर जागरूकता, व्यवहार परिवर्तन और सामुदायिक एकता को बढ़ावा देने से जुड़ा इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

AMRIT मरीज देखभाल को बड़ी मजबूती देने वाला कदम है: आयुष्मान भारत 4×4 व्हील ड्राइव की तरह मरीज सेवाओं को गति देता है, जबकि AMRIT इसकी किफायती व्यवस्था की रीढ़ है”

AMRIT मरीज देखभाल को बड़ी मजबूती देने वाला कदम है: आयुष्मान भारत 4×4 व्हील ड्राइव की तरह मरीज सेवाओं को गति देता है, जबकि AMRIT इसकी किफायती व्यवस्था की रीढ़ है” — प्रो. विवेक लाल, निदेशक, पीजीआईएमईआरपीजीआईएमईआर ने 14वीं AMRIT फार्मेसी के साथ बनाया राष्ट्रीय कीर्तिमान — देश के किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल में सर्वाधिक संख्या

चंडीगढ़, 30 मार्च 2026: AMRIT फार्मेसी को “मरीज देखभाल को बड़ी मजबूती देने वाला कदम” बताते हुए, प्रो. विवेक लाल, निदेशक, पीजीआईएमईआर ने आज कहा, “आयुष्मान भारत 4×4 व्हील ड्राइव की तरह कार्य करते हुए पीजीआईएमईआर में भारी मरीज भार को संभालने और बनाए रखने में सक्षम बना रहा है, जबकि AMRIT उपचार को किफायती बनाकर इसकी रीढ़ का कार्य करता है।” यह बात उन्होंने संस्थान की 14वीं AMRIT (Affordable Medicines and Reliable Implants for Treatment) फार्मेसी के उद्घाटन अवसर पर कही, जो देश के किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल में इस प्रकार की सर्वाधिक संख्या है।

नेहरू एक्सटेंशन ब्लॉक स्थित इस सुविधा का उद्घाटन प्रो. विवेक लाल द्वारा प्रो. आर.के. राठो, डीन (एकेडमिक्स); प्रो. संजय जैन, डीन (रिसर्च); श्री पंकज राय, उप-निदेशक (प्रशासन); प्रो. संदीप बंसल, अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक; विभागाध्यक्षों, वरिष्ठ संकाय सदस्यों, रेजिडेंट्स, नर्सिंग अधिकारियों एवं पीजीआईएमईआर के अन्य कर्मचारियों की उपस्थिति में किया गया।

श्री राजेश नायर, उपाध्यक्ष, AMRIT फार्मेसी, भी अपनी टीम के साथ इस अवसर पर उपस्थित रहे, जो AMRIT पहल के निरंतर सहयोग और समन्वय को दर्शाता है।

सभा को संबोधित करते हुए प्रो. विवेक लाल ने AMRIT पहल को मरीज-केंद्रित देखभाल का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बताया और आयुष्मान भारत के लाभार्थियों के समर्थन में इसकी अहम भूमिका को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा, “हर मरीज गुणवत्तापूर्ण और किफायती उपचार का हकदार है। AMRIT के माध्यम से हम प्रतिष्ठित और मानक कंपनियों की दवाइयों को काफी रियायती दरों पर उपलब्ध करा रहे हैं। यह पहल मरीज देखभाल की रीढ़ बन चुकी है।”

सेवाओं के व्यापक दायरे और दबाव पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, “आयुष्मान भारत मरीजों तक पहुंच सुनिश्चित कर रहा है, बड़ी संख्या में मरीजों का समर्थन कर रहा है और यह सुनिश्चित कर रहा है कि आर्थिक बाधाएं उपचार में बाधा न बनें। AMRIT इस व्यवस्था को किफायती और सुलभ बनाकर इसे और मजबूत करता है।”

विस्तार योजनाओं का उल्लेख करते हुए निदेशक पीजीआईएमईआर ने बताया कि वर्तमान में 14 AMRIT आउटलेट्स कार्यरत हैं और संस्थान निकट भविष्य में 2 से 3 और आउटलेट्स स्थापित करने की योजना बना रहा है, ताकि किफायती दवाओं की अंतिम स्तर तक पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

उन्होंने कहा, “कार्डियोलॉजी और आपातकालीन सेवाओं जैसे उच्च भार वाले क्षेत्रों में AMRIT आउटलेट्स को 24×7 उपलब्धता के साथ स्थापित किया जा रहा है, जहां आयुष्मान भारत लाभार्थियों के लिए विशेष सुविधा सुनिश्चित की जा रही है। यह कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक मरीज कल्याण आंदोलन है।”

AMRIT को एक परिवर्तनकारी पहल बताते हुए उन्होंने कहा, “यह मरीजों के लिए सबसे प्रभावी हस्तक्षेपों में से एक है। हम भारत सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने इस तरह की जनहितकारी और प्रेरणादायक पहल को बढ़ावा दिया है।”

संचालन संबंधी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए प्रो. लाल ने निरंतर सुधार पर बल दिया। उन्होंने कहा, “कोई भी प्रणाली 100 प्रतिशत परिपूर्ण नहीं होती, लेकिन हम अधिकतम दक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उपलब्धता और रिफंड जैसी चुनौतियों को सक्रिय रूप से संबोधित किया जा रहा है तथा प्रक्रियाओं को और सुगम बनाने के लिए मंत्रालय से संवाद जारी है।”

उन्होंने बढ़ते मरीज भार को संभालने के लिए मजबूत प्रणालियों की आवश्यकता पर भी जोर दिया। “मरीजों की संख्या को देखते हुए हम AMRIT आउटलेट्स की निर्बाध कार्यप्रणाली और पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित कर रहे हैं, ताकि विशेष रूप से आयुष्मान भारत के तहत मरीज सेवाएं प्रभावित न हों,” उन्होंने कहा।

पीजीआईएमईआर की विरासत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, “1963 से पीजीआईएमईआर मरीज देखभाल का एक सशक्त स्तंभ रहा है। हमारी सेवाओं का स्तर विश्व के श्रेष्ठ संस्थानों के समकक्ष है और हम निरंतर बुनियादी ढांचे और प्रणालियों को सुदृढ़ कर रहे हैं।”

संस्थागत सुधारों पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “परिवर्तन के मार्ग में अदृश्य बाधाएं होती हैं, लेकिन हम दृढ़ता से आगे बढ़ रहे हैं। जो पहलें पहले कठिन लगती थीं—जैसे AMRIT को क्रिटिकल केयर क्षेत्रों तक विस्तार देना—आज वे वास्तविकता बन चुकी हैं। ये बदलाव शांत लेकिन प्रभावशाली हैं।”

भविष्य की योजनाओं की जानकारी देते हुए प्रो. लाल ने बताया कि माननीय केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री 27 अप्रैल 2026 को पीजीआईएमईआर के दीक्षांत समारोह में भाग लेंगे। इस अवसर पर न्यूरोसाइंसेज सेंटर, एडवांस्ड मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केंद्र, क्रिटिकल केयर सेंटर सहित कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उद्घाटन अपेक्षित है।

निदेशक पीजीआईएमईआर ने प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रियाओं में सुधार की भी सराहना की। उन्होंने कहा, “हाल के महीनों में वित्तीय प्रक्रियाएं अधिक सुगम हुई हैं, जिससे खरीद प्रक्रिया तेज हुई है और सेवा वितरण में सुधार आया है। इससे AMRIT आउटलेट्स के विस्तार और कुशल संचालन में भी मदद मिली है।”

14वीं AMRIT फार्मेसी का उद्घाटन पीजीआईएमईआर की किफायती स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है, जहां AMRIT और आयुष्मान भारत मिलकर बढ़ते मरीज भार को संभालने और जेब से होने वाले खर्च को कम करने में एक सशक्त पूरक व्यवस्था के रूप में कार्य कर रहे हैं।

सावधान! कहीं आप भी तो नहीं इग्नोर कर रहे विटामिन डी की कमी के ये 6 संकेत? हड्डियों के दर्द से डिप्रेशन तक हो सकती है समस्या

हेल्थ डेस्क: विटामिन डी हमारे शरीर के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण पोषक तत्व है, जिसे ‘सनशाइन विटामिन’ के नाम से भी जाना जाता है। यह न केवल हड्डियों की मजबूती के लिए, बल्कि हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अनिवार्य है। हालांकि, हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक बड़ी आबादी इसकी कमी से जूझ रही है।अगर आपके शरीर में विटामिन डी का स्तर कम हो रहा है, तो आपका शरीर ये प्रमुख संकेत दे सकता है:

लगातार थकान और कमजोरी: यदि आप पर्याप्त नींद लेने के बाद भी हर समय सुस्ती और थकान महसूस करते हैं, तो यह विटामिन डी की कमी का एक बड़ा संकेत हो सकता है, क्योंकि यह सीधे शरीर के एनर्जी लेवल को प्रभावित करता है।

हड्डियों और पीठ में दर्द: विटामिन डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है। इसकी कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और पीठ के निचले हिस्से में लगातार दर्द बना रह सकता है।

बार-बार बीमार पड़ना: यदि आप अक्सर सर्दी, जुकाम या अन्य इन्फेक्शन की चपेट में आ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी इम्यूनिटी कमजोर हो गई है, जिसके पीछे विटामिन डी की कमी एक कारण हो सकती है।

मांसपेशियों में ऐंठन: बिना किसी कसरत या वर्कआउट के भी मांसपेशियों में खिंचाव या दर्द महसूस होना इस विटामिन की कमी को दर्शाता है।

घाव भरने में देरी: विटामिन डी शरीर में नए ऊतकों (tissues) के निर्माण में सहायक होता है। इसकी कमी होने पर किसी भी चोट या घाव को ठीक होने में सामान्य से अधिक समय लगता है।

मानसिक स्वास्थ्य और डिप्रेशन: शोधों के अनुसार, विटामिन डी की कमी का सीधा संबंध खराब मूड और डिप्रेशन से भी है। अक्सर धूप न मिलने पर लोग अधिक उदास और अकेलापन महसूस करते हैं।नोट: किसी भी तरह के आहार में बदलाव करने या सप्लीमेंट शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

बिना दवा ठीक होगा ग्रेड-2 फैटी लिवर: डॉक्टर ने बताए लाइफस्टाइल के 2 जादुई बदलाव, 6 महीने में दिखेगा असर

हेल्थ डेस्क : आज के समय में फैटी लिवर (Fatty Liver Disease) एक आम समस्या बनती जा रही है, जिसे अगर समय रहते न सुधारा जाए तो यह लिवर सिरोसिस या फाइब्रोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकता है। अक्सर लोग सोचते हैं कि इसके लिए उम्र भर दवाएं खानी पड़ेंगी, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट डॉ. हर्ष व्यास ने एक मरीज का उदाहरण देते हुए बताया है कि बिना किसी दवा या महंगे सप्लीमेंट के, केवल लाइफस्टाइल में दो बदलाव करके इसे 6 महीने में लगभग नॉर्मल किया जा सकता है।

1. साप्ताहिक उपवास (24-36 घंटे का वॉटर फास्ट) डॉक्टर के अनुसार, पहला बड़ा बदलाव डाइट में संतुलन और उपवास है। मरीज को उसकी कैलोरी बेसल मेटाबॉलिक रेट (BMR) के अनुसार लेने को कहा गया। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हफ्ते में एक बार 24 से 36 घंटों का ‘वॉटर फास्ट’ रखना था। उपवास के दौरान लिवर में जमा ग्लाइकोजन और ट्राइग्लाइसेराइड (जमा हुआ फैट) टूटना शुरू हो जाता है, जिससे लिवर का फैट कम होता है।

2. हफ्ते में 4-5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग दूसरा प्रमुख बदलाव शारीरिक व्यायाम है। फैटी लिवर के मरीज को हफ्ते में 4 से 5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने की सलाह दी गई। इससे मांसपेशियों में इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है और शरीर में मौजूद अतिरिक्त ग्लूकोज लिवर में नए फैट में बदलने के बजाय ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल होने लगता है। शोध बताते हैं कि एक्सरसाइज और फास्टिंग के मेल से मात्र 8-12 हफ्तों में ही लिवर स्कोर और बीएमआई (BMI) में सुधार दिखने लगता है।

शुरुआत कैसे करें? डॉक्टर की सलाह है कि सीधे लंबे उपवास के बजाय पहले 8 से 12 घंटे की फास्टिंग से शुरुआत करें और धीरे-धीरे इसे 16 से 24 घंटे तक ले जाएं। इसके साथ ही डाइट से चीनी (Sugar) और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए।

चेतावनी: फैटी लिवर एक ‘साइलेंट’ बीमारी है, जिसके शुरुआती लक्षण जैसे थकान या पेट के दाईं ओर दर्द अक्सर सामान्य लगते हैं। किसी भी बड़े बदलाव से पहले विशेषज्ञ या चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

बिना दवाओं के भी कंट्रोल हो सकता है हाई ब्लड प्रेशर; आयुर्वेद में छिपा है बीपी का जड़ से इलाज

हेल्थ डेस्क : आधुनिक जीवनशैली के कारण भारत में हाई ब्लड प्रेशर (HBP) एक गंभीर समस्या बन चुका है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर 4 में से 3 पुरुष और 5 में से 3 महिलाएं इस समस्या से ग्रसित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एलोपैथी में इसकी दवाएं उम्र भर चल सकती हैं, वहीं आयुर्वेद में इसे बिना किसी साइड इफेक्ट के जड़ से मिटाने की क्षमता है।

क्यों खतरनाक है हाई बीपी? आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. चंचल शर्मा के अनुसार, हाई ब्लड प्रेशर धमनियों की दीवारों पर रक्त के प्रवाह को बहुत बलपूर्वक बढ़ा देता है, जिससे हृदय रोगों, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा काफी बढ़ जाता है। अक्सर इसके लक्षण (जैसे सिरदर्द, सांस लेने में दिक्कत या नाक से खून आना) स्पष्ट नहीं होते, इसलिए इसे ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है।

आयुर्वेद में प्रभावी औषधियां: स्रोतों के अनुसार, कुछ विशेष जड़ी-बूटियां बीपी नियंत्रित करने में रामबाण साबित होती हैं:अश्वगंधा: यह तनाव को कम कर रक्त प्रवाह को सुधारता है। सुबह खाली पेट इसका सेवन बीपी बढ़ने की संभावना को कम करता है।

त्रिफला: यह शरीर की सूजन और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है और धमनियों की ब्लॉकेज को कम करने में मदद करता है।

तुलसी: इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट गुण रक्त संचार को बेहतर बनाए रखते हैं।

पंचकर्म और जीवनशैली का महत्व: सिर्फ दवाएं ही नहीं, आयुर्वेद में पंचकर्म चिकित्सा (विशेषकर विरेचन) की सलाह दी जाती है, जो शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालकर पित्त दोष को संतुलित करती है। इसके अलावा, नियमित व्यायाम, संतुलित खान-पान (कम नमक और तेल-मसाला) और तनाव मुक्त रहना हाई बीपी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य है।

कोडीन के सेवन से कोई मौत नहीं हुई: नड्डा
नयी दिल्ली, 13 फरवरी (भाषा) केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने शुक्रवार को कहा कि किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से कोडीन आधारित कफ सिरप के सेवन से जुड़ी मौत का कोई मामला सामने नहीं आया है।
नड्डा ने लोकसभा में प्रश्नकाल में कांग्रेस सांसद उज्ज्वल रमण सिंह के पूरक प्रश्न का उत्तर देते हुए यह बात कही।
कांग्रेस सदस्य ने पूछा था, ‘‘उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में (कोडीन आधारित कफ सीरप के सेवन से) बड़े पैमाने पर मौतें हुईं हैं, क्या सरकार सीबीआई जांच कराएगी और मौत के मामलों में परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा?’’
नड्डा ने जवाब में कहा, ‘‘मैंने अपने (लिखित) उत्तर में बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कोडीन आधारित कफ सिरप के सेवन से जुड़ी मौत का कोई मामला किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश से नहीं आया है। जब कोडीन टॉक्सिन से कोई मौत नहीं हुई है तो फिर मुआवजे का प्रश्न ही नहीं उठता।’’
इस मामले में सीबीआई जांच कराने के सवाल पर नड्डा ने कहा कि जब इससे कोई मृत्यु ही नहीं हुई है तो सीबीआई जांच की मांग कैसे की जा सकती है।
तेलुगु देशम पार्टी के कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी ने सरकार से पूछा कि क्या बाजार से खराब और संदूषित दवाओं को वापस बुलाने के लिए सरकार की कोई नीति लाने की योजना है?
जवाब में नड्डा ने कहा कि दवाओं का निरीक्षण किया जाता है और कोई दवा यदि घटिया या मानव सेवन के लिए उपयुक्त नहीं पायी जाती है तो एक प्रक्रिया के तहत उसे वापस लिया जाता है।
सरकारी स्कूल के 19 छात्र अधिक मात्रा में आयरन की गोलियों लेने के बाद अस्पताल में भर्ती
चंद्रपुर, 13 फरवरी (भाषा) महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के एक जिला परिषद स्कूल के 19 छात्रों ने बिना किसी की निगरानी में अत्यधिक मात्रा में एनीमिया रोधी गोलियों का सेवन कर लिया जिससे वे बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
 अधिकारियों ने बताया कि भद्रावती तहसील के भामदेली गांव से घटना की सूचना मिलने के बाद जांच के आदेश दिए गए हैं।
 अधिकारियों के अनुसार, छात्रों को हर सोमवार को आयरन की गोलियां दी जाती हैं। हालांकि, जिला परिषद (जिप) स्कूल के कुछ छात्रों ने कथित तौर पर मंगलवार को शिक्षकों की अनुपस्थिति में अधिक गोलियां खा लीं।
 जिला परिषद के जिला स्वास्थ्य अधिकारी अशोक कटारे ने बताया कि बुधवार रात को कुल 19 छात्रों ने चक्कर आने और अत्यधिक अस्वस्थ महसूस करने की शिकायत की। उन्होंने बताया कि स्कूल प्रशासन ने एंबुलेंस बुलाई और उन्हें चंद्रपुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
 चिकित्सकों के अनुसार, 16 छात्रों की हालत स्थिर है। उन्होंने बताया कि तीन छात्र निगरानी में हैं। अधिकारियों ने बताया कि जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पुलकित सिंह ने मामले में उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
दिन में दो-तीन कप कॉफी पीने से वृद्धावस्था में कम हो सकता है डिमेंशिया का खतरा
(ईफ़ होजेनवोर्स्ट, लफबरो यूनिवर्सिटी)  
लफबरो (ब्रिटेन), 10 फरवरी (द कन्वरसेशन) वैज्ञानिकों ने पाया है कि दिन में दो से तीन कप कॉफी पीने से डिमेंशिया होने का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है, लेकिन इससे अधिक मात्रा में कॉफी पीने से मस्तिष्क को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता।
एक व्यापक अध्ययन में 1,31,821 अमेरिकी नर्सों और स्वास्थ्य पेशेवरों को शामिल किया गया, जिनके स्वास्थ्य पर शुरुआती 40 साल की उम्र से लेकर 43 वर्षों तक नजर रखी गई। इस अवधि में 11,033 लोगों यानी करीब आठ प्रतिशत में डिमेंशिया हुआ। हालांकि, सीमित मात्रा में कैफीनयुक्त कॉफी या चाय पीने वालों में डिमेंशिया होने की संभावना कम पाई गई।
अध्ययन के अनुसार, 75 वर्ष या उससे कम आयु के लोगों में इसका प्रभाव सबसे अधिक देखा गया। रोजाना करीब 250-300 मिलीग्राम कैफीन (लगभग दो से तीन कप कॉफी) लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम 35 प्रतिशत तक कम पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे अधिक कैफीन लेने से कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिला।
अध्ययन में शामिल महिलाओं ने बताया कि शुरुआत में वे प्रतिदिन औसतन साढ़े चार कप कॉफी या चाय पीती थीं, जबकि पुरुषों के लिए कॉफी की औसत खपत ढाई कप थी। अधिक कैफीन लेने वाले प्रतिभागी अपेक्षाकृत कम उम्र के थे, लेकिन वे शराब का अधिक सेवन करते थे, धूम्रपान करते थे और अधिक कैलोरी लेते थे, जो डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं।
शोध में यह भी पाया गया कि कैफीन रहित कॉफी पीने वालों में स्मृति क्षय तेज़ी से हुआ। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लोग नींद की समस्या, उच्च रक्तचाप या हृदय संबंधी उन समस्याओं के बाद कैफीन रहित कॉफी की ओर रुख करते हैं, जो स्वयं संज्ञानात्मक गिरावट से जुड़ी हैं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि कैफीन मस्तिष्क में उस एडेनोसिन नामक रसायन को अवरुद्ध करता है, जो डोपामिन और एसिटाइलकोलाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर की गतिविधि को दबाता है। उम्र बढ़ने और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों में ये न्यूरोट्रांसमीटर कम सक्रिय हो जाते हैं और कैफीन इस गिरावट को कुछ हद तक रोक सकता है।
अध्ययन में यह भी कहा गया कि अधिक मात्रा में कैफीन लेने से नींद प्रभावित हो सकती है और चिंता बढ़ सकती है, जिससे मस्तिष्क को होने वाले लाभ कम हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने 1908 में प्रतिपादित यर्क्स-डॉडसन नियम का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक उत्तेजना मस्तिष्क को कमजोर कर सकती है।
अन्य 38 अध्ययनों के विश्लेषण में भी समान परिणाम सामने आए, जिनके अनुसार कैफीन लेने वालों में डिमेंशिया का जोखिम, कैफीन न लेने वालों की तुलना में छह से 16 प्रतिशत तक कम पाया गया। इस व्यापक विश्लेषण में एक से तीन कप कॉफी को सबसे उपयुक्त मात्रा बताया गया।
शोधकर्ताओं ने हालांकि कहा कि ‘कप’ की मात्रा अलग-अलग हो सकती है और कॉफी में कैफीन की मात्रा उसके प्रकार और बनाने के तरीके पर निर्भर करती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बहुत कम मात्रा में कैफीन सतर्कता और मनोदशा में सुधार कर सकती है और अधिक मात्रा हमेशा बेहतर नहीं होती।
पने स्वास्थ्य का ख्याल रखें

बदलते मौसम में सर्दी-खांसी, बुखार और गले में खराश जैसी बीमारियां आम हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस दौरान शरीर को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं: 

खान-पान और पोषण:

  • हल्का और पौष्टिक भोजन: बदलते मौसम में पाचन कमजोर हो सकता है, इसलिए सुपाच्य खाना खाएं।
  • हाइड्रेशन (पानी की कमी न होने दें): पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। पानी, छाछ, नींबू पानी और नारियल पानी का सेवन बढ़ाएं।
  • विटामिन सी युक्त आहार: संतरा, नींबू, आंवला जैसे विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बनी रहे।
  • अदरक-तुलसी की चाय: गले को आराम देने के लिए अदरक, तुलसी और शहद वाली चाय या काढ़ा पी सकते हैं।
  • बाहर के खाने से बचें: फूड पॉइजनिंग और इंफेक्शन से बचने के लिए बाहर का खाना कम करें। 

स्वच्छता और व्यक्तिगत देखभाल:

  • हाथ धोना: खाने से पहले और बाहर से आने के बाद हाथ साबुन से जरूर धोएं।
  • दिन में दो बार स्नान: गर्मी और उमस वाले मौसम में दो बार स्नान करने से त्वचा के संक्रमण से बचाव होता है।
  • मॉइस्चराइज़र: त्वचा को रूखापन और रैशेज से बचाने के लिए मॉइस्चराइज़र का प्रयोग करें। 

जीवनशैली (Lifestyle):

  • नियमित व्यायाम: इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए योग, सुबह-शाम की सैर या हल्की एक्सरसाइज करें।
  • पर्याप्त नींद: शरीर को रिकवर करने के लिए 7-8 घंटे की अच्छी नींद लें।
  • गर्म कपड़े: सुबह-शाम के तापमान में उतार-चढ़ाव के अनुसार सही कपड़े पहनें।