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रूस : प्लेग की आशंका के बीच भारत की महामारी तैयारी कितनी मजबूत? ₹64,180 करोड़ का PM-ABHIM और 163 लैब का नेटवर्क

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

रूस के साइबेरिया में एक लैब टेक्नीशियन की मौत के बाद प्लेग को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान महामारी की तैयारी की ओर खींच दिया है। इरकुत्स्क स्थित एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम करने वाली एक महिला की गंभीर निमोनिया के बाद मौत की खबर सामने आई। इसके बाद संपर्क में आए लोगों की निगरानी और सुरक्षा उपायों को लेकर भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इस मौत को प्लेग संक्रमण के तौर पर कंफर्म नहीं किया गया है।

ऐसे में इस घटना से जुड़े दावों और आशंकाओं को तथ्यों से अलग रखना जरूरी है। हालांकि, इस मामले ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा किया है—अगर कोरोना जैसी कोई नई संक्रामक बीमारी अचानक फैलने लगे तो भारत उसे कितनी जल्दी पहचानकर नियंत्रित कर सकता है?

कोरोना महामारी ने भारत समेत पूरी दुनिया को यह दिखाया कि महामारी से निपटने की तैयारी केवल अस्पतालों और डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकती। बीमारी की शुरुआती पहचान, लैब टेस्टिंग, संक्रमण की निगरानी, जीनोम सीक्वेंसिंग, गंभीर मरीजों के इलाज और केंद्र-राज्य के बीच तेज समन्वय की भी जरूरत होती है।

₹64,180 करोड़ का PM-ABHIM

कोरोना के अनुभव के बाद भारत ने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और महामारी से निपटने की क्षमता मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम किया है। इनमें प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन (PM-ABHIM) प्रमुख है, जिसके लिए 2021-22 से 2025-26 तक ₹64,180 करोड़ का प्रावधान किया गया था।

इसके अलावा देश में संक्रामक बीमारियों की जांच के लिए ICMR के VRDL नेटवर्क में 163 लैब, जीनोम जांच के लिए 4 प्रमुख हब, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक और वन हेल्थ मिशन जैसी पहलें शामिल हैं।

हालांकि, किसी योजना का बजट या घोषणा और उसका जमीन पर पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल होना दो अलग-अलग बातें हैं। महामारी की वास्तविक तैयारी का आकलन इस बात से होता है कि जरूरत पड़ने पर ये सुविधाएं कितनी तेजी से सक्रिय हो सकती हैं।

भारत की महामारी तैयारी के 5 बड़े आंकड़े

  • ₹64,180 करोड़: PM-ABHIM के लिए 2021-22 से 2025-26 तक प्रावधान।
  • 163 लैब: ICMR के वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैबोरेटरीज (VRDL) नेटवर्क में संक्रामक रोगों की जांच के लिए।
  • 4 जीनोम हब: रोगजनकों और उनके जेनेटिक बदलावों की निगरानी के लिए।
  • 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक: गंभीर मरीजों के इलाज की क्षमता बढ़ाने की योजना।
  • 22 BSL-3/4 लैब: वन हेल्थ मिशन के तहत उच्च जोखिम वाले रोगजनकों की जांच के नेटवर्क में शामिल करने की योजना।

बीमारी की पहचान के लिए 163 लैब का नेटवर्क

महामारी के शुरुआती दौर में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि बीमारी आखिर है क्या। कोरोना के शुरुआती समय में टेस्टिंग क्षमता बढ़ाना दुनिया के सामने बड़ी चुनौती थी। इसी अनुभव के बाद भारत में ICMR के वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैबोरेटरीज यानी VRDL नेटवर्क का विस्तार किया गया।

इस नेटवर्क में 11 रीजनल, 27 स्टेट और 125 मेडिकल कॉलेज लैब शामिल हैं। इसका उद्देश्य देश के अलग-अलग हिस्सों में संक्रामक बीमारियों की जांच की क्षमता बढ़ाना है।

किसी क्षेत्र में नया संक्रमण सामने आने पर स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर पर सैंपल की जांच की सुविधा बीमारी की पहचान और रिपोर्टिंग को तेज करने में मदद कर सकती है। रूस के मौजूदा मामले में भी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि बीमारी वास्तव में क्या थी। केवल निमोनिया, किसी रिसर्च संस्थान में काम करना या संपर्क में आए लोगों की निगरानी को प्लेग संक्रमण की पुष्टि नहीं माना जा सकता। इसके लिए वैज्ञानिक जांच और पुष्टि जरूरी है।

सिर्फ बीमारी नहीं, उसके जेनेटिक बदलाव पर भी नजर

आधुनिक महामारी तैयारी में केवल किसी वायरस या बैक्टीरिया की मौजूदगी का पता लगाना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिकों को यह भी समझना होता है कि रोगजनक में कोई महत्वपूर्ण जेनेटिक बदलाव तो नहीं आया।

भारत में जीनोम जांच की क्षमता इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जीनोम सीक्वेंसिंग से किसी रोगजनक के जेनेटिक बदलावों को समझने में मदद मिलती है और संक्रमण के संभावित पैटर्न पर नजर रखी जा सकती है।

महामारी में गंभीर मरीजों के लिए 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक

कोरोना ने यह भी दिखाया कि किसी बड़ी महामारी के दौरान अस्पतालों पर सबसे अधिक दबाव गंभीर मरीजों के इलाज को लेकर पड़ सकता है। ऑक्सीजन, ICU और क्रिटिकल केयर बेड की मांग अचानक कई गुना बढ़ सकती है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए PM-ABHIM के तहत 602 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक विकसित करने की योजना है।

इसके अलावा 3,382 ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट और 730 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। 17,788 सब-हेल्थ सेंटरों को आयुष्मान आरोग्य मंदिर में अपग्रेड करने की मंजूरी दी गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 11,024 अर्बन आयुष्मान आरोग्य मंदिर विकसित किए जा रहे हैं।

इसका उद्देश्य बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और उपचार की सुविधाओं को स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है।

रियल टाइम सर्विलांस से बीमारी पर नजर

महामारी से निपटने के लिए केवल अस्पताल और लैब पर्याप्त नहीं हैं। यह जानना भी जरूरी है कि बीमारी कहां बढ़ रही है, कितने मामले सामने आ रहे हैं और संक्रमण किस दिशा में फैल रहा है।

इसके लिए NCDC का Integrated Disease Surveillance Programme (IDSP) काम करता है। वहीं Integrated Health Information Platform (IHIP) के जरिए बीमारी से संबंधित रिपोर्टिंग और निगरानी को मजबूत करने की कोशिश की गई है।

संभावित प्रकोप की स्थिति में विशेषज्ञों की टीमें जांच और जोखिम का आकलन कर सकती हैं। मॉक ड्रिल और सिमुलेशन एक्सरसाइज के जरिए स्वास्थ्य एजेंसियों की आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को भी परखा जाता है। कुछ रोगजनकों के शुरुआती संकेतों की पहचान के लिए वेस्टवॉटर सर्विलांस भी महामारी निगरानी का हिस्सा है।

इंसानों के साथ जानवरों पर भी नजर

नई संक्रामक बीमारियों का खतरा केवल इंसानों से नहीं आता। कई रोगजनक जानवरों से इंसानों तक पहुंच सकते हैं। इसी वजह से भारत ने नेशनल वन हेल्थ मिशन पर जोर दिया है।

इस पहल में 13 से अधिक मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय का उद्देश्य इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत को एक साथ समझना है। मिशन के तहत 22 BSL-3/4 लैब के नेटवर्क पर भी काम किया जा रहा है।

नागपुर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वन हेल्थ को विकसित किया जा रहा है। इसमें बीमारी की निगरानी, संभावित प्रकोप की जांच, रिसर्च और डेटा शेयरिंग जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया गया है।

यूपी के आंकड़े बताते हैं जमीन पर अभी चुनौती बाकी

देश की महामारी तैयारी का आकलन केवल केंद्रीय योजनाओं से नहीं किया जा सकता। राज्यों में इन योजनाओं के लिए जारी धन का इस्तेमाल और तैयार की गई सुविधाओं का संचालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

उत्तर प्रदेश के 2025-26 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक NHM के तहत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹1,500.93 करोड़ मंजूर किए गए थे, जबकि उपलब्ध प्रोविजनल आंकड़ों में ₹83.66 करोड़ खर्च दिखाया गया है।

PM-ABHIM के तहत उत्तर प्रदेश के लिए केंद्र से ₹211.88 करोड़ जारी किए गए, जबकि रिपोर्ट में कुल खर्च ₹511.46 करोड़ बताया गया है। इसमें राज्य की हिस्सेदारी और पिछली बची राशि भी शामिल हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में PM-ABHIM के तहत 74 क्रिटिकल केयर ब्लॉक को मंजूरी मिली है। ये आंकड़े बताते हैं कि महामारी की तैयारी में केवल बजट आवंटित करना पर्याप्त नहीं है। पैसा समय पर खर्च हो, इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो और जरूरत पड़ने पर वह पूरी क्षमता के साथ काम करे—यह भी उतना ही जरूरी है।

2026-27 के हेल्थ बजट में भी महामारी तैयारी पर जोर

केंद्रीय बजट 2026-27 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ₹1,06,530.42 करोड़ का प्रावधान किया गया है। PM-ABHIM के लिए ₹4,770 करोड़ रखे गए हैं, जो पिछले संशोधित अनुमान के ₹2,845 करोड़ से 67.66 प्रतिशत अधिक है।

इसके अलावा NHM के लिए ₹39,390 करोड़, PM-JAY के लिए ₹9,500 करोड़ और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के लिए ₹4,821.21 करोड़ का प्रावधान है। ICMR के लिए ₹4,000 करोड़ रखे गए हैं।

क्या भारत कोरोना जैसी अगली महामारी के लिए तैयार है?

भारत ने कोरोना महामारी के बाद अपनी स्वास्थ्य तैयारियों को केवल अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय एक व्यापक ढांचा तैयार करने की कोशिश की है। 163 लैब, जीनोम सर्विलांस, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक, बीमारी की निगरानी के सिस्टम और वन हेल्थ मिशन इस तैयारी के अलग-अलग हिस्से हैं।

लेकिन किसी भी महामारी की तैयारी की असली परीक्षा संकट आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले होती है। लैब कितनी तेजी से टेस्ट कर सकती हैं, डेटा कितनी जल्दी साझा होता है, राज्यों की प्रतिक्रिया कितनी तेज है और अस्पताल अचानक बढ़ने वाले मरीजों के दबाव को कितना संभाल सकते हैं—इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि भारत अगली बड़ी संक्रामक बीमारी का सामना कितनी मजबूती से कर पाएगा।

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