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उपहार वही, जिसका प्रभाव लगातार बना रहे : सुहेल सेठ

सुहेल सेठ, मैनेजिंग पार्टनर , काउंसिलेज इंडिया

बीता सप्ताहांत एक तीखे घटनाक्रम के साथ शुरू हुआ और यहां ‘तीखा’ शब्द शाब्दिक अर्थ में भी लिया जा सकता है। मेरे सोशल मीडिया फीड पर एक वीडियो सामने आया, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि प्रधानमंत्री ने नीरज चोपड़ा द्वारा भेंट किए गए भाले की नीलामी कर एक तरह से उसका अपमान किया है। यह विषय मेरे लिए इसलिए भी दिलचस्प था, क्योंकि इसमें मेरी रुचि के कई पहलू एक साथ जुड़े हुए थे—प्रधानमंत्री, नीलामी, राजनीतिक प्रतिआक्रमण और, निश्चित रूप से, खेल। इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल करने पर इससे जुड़े कई बेहद दिलचस्प पहलू सामने आए।

लेकिन उससे पहले मूल तर्क पर बात करना जरूरी है—भाले को लेकर किया गया यह हमला अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर सका।

दशकों से मैंने अपने हिस्से से कहीं अधिक ऐसे प्रभावशाली पुरुषों और महिलाओं को देखा है, जिन्हें विभिन्न प्रकार के उपहार प्राप्त होते रहे हैं। घड़ियां, जिन्हें वे कभी-कभार पहनते हैं, भले ही उन्हें अधिक बार पहनने की इच्छा रखते हों। ऐसी मूर्तियां, जिन पर शायद ही कभी धूल साफ की जाती है। कभी-कभार कोई महंगा शॉल भी पहन लिया जाता है। सामान्यतः सत्ता के साथ एक प्रवृत्ति जुड़ी होती है—संचय की प्रवृत्ति। वस्तुएं एकत्रित की जाती हैं, उन्हें अपने पास रखा जाता है और फिर प्रदर्शन के लिए सजा दिया जाता है। भारत में हमने ऐसे प्रधानमंत्री भी देखे हैं, जिन्हें उपहार के रूप में मर्सिडीज कारें मिलीं और उन्होंने उन्हें राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर गर्व के साथ चलाया।

नरेन्द्र मोदी ने इस परंपरा को हममें से अधिकांश लोगों के ध्यान देने से बहुत पहले ही बदलना शुरू कर दिया था। पिछले लगभग 25 वर्षों से उन्होंने इस परंपरा को लगातार एक नई दिशा दी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अपने आप में एक प्रकार का रिकॉर्ड है।

गुजरात के दिनों में, जब ‘ब्रांड मोदी’ उन बिजनेस स्कूलों में अध्ययन का विषय नहीं बना था, जहां मैं कभी-कभार व्याख्यान देता हूं, उससे बहुत पहले ही एक विशिष्ट अनुशासन स्थापित हो चुका था। किसी भी मुख्यमंत्री को मिलने वाले स्मृति-चिह्नों की तरह उनके पास भी उपहारों का संग्रह होता गया। लेकिन ये उपहार किसी सरकारी गोदाम में पड़े रहने के बजाय नीलामी के लिए भेजे गए। यह केवल एक रूपक नहीं था, बल्कि वास्तव में ऐसा किया गया। उपहारों की नीलामी की गई, उनसे धनराशि प्राप्त की गई और इस राशि को एक ऐसे उद्देश्य के लिए समर्पित किया गया, जिसे उन्होंने अपने निजी संग्रह से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना—बालिका शिक्षा। हजारों उपहारों की नीलामी की गई और उससे प्राप्त राशि गुजरात में ‘कन्या केलवणी निधि’ में जमा की गई। इसी पहल के तहत जून की भीषण गर्मी में वे और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी दूर-दराज के गांवों का दौरा करते थे और माता-पिता से अपनी बेटियों को शिक्षित करने का आग्रह करते थे।

खबरों से जुड़े रहने वाले एक व्यक्ति के रूप में मैं इसे ‘सरोकार के साथ किया गया सार्वजनिक प्रदर्शन’ कहूंगा और यहां ‘प्रदर्शन’ शब्द का उपयोग मैं सर्वोच्च प्रशंसा के अर्थ में कर रहा हूं। वहीं, मेरे व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष इसे ‘सेवा’ का सर्वोच्च रूप मानेगा।

2014 के बाद इस प्रवृत्ति को एक नई दिशा मिली। वस्तुतः यह प्रवृत्ति गंगा की धारा से जुड़ गई। गंगा को उसके पुराने, निर्मल स्वरूप के निकट वापस लाने के देश के सबसे महत्वाकांक्षी प्रयासों में से एक ‘नमामि गंगे’ के शुभारंभ के साथ प्रधानमंत्री को मिलने वाले उपहारों को आखिरकार एक विशिष्ट और पवित्र उद्देश्य मिल गया। शॉल, तलवारें, मूर्तियां, महान खिलाड़ियों के हस्ताक्षर वाले क्रिकेट बैट, ओलंपिक खिलाड़ियों द्वारा भेंट किए गए भाले और दूर-दराज से केवल इस उद्देश्य से आए प्रशंसकों द्वारा प्रधानमंत्री को सौंपे गए चित्र—ये सभी अब राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय तक पहुंचते हैं। इनकी आधार कीमत महज 200 रुपये जैसी मामूली राशि से तय की जाती है और आम भारतीय इनकी बोली लगाते हैं। ऐसे लोग, जो सोने के एक टुकड़े के बजाय इतिहास से जुड़ी किसी स्मृति का एक अंश अपने पास रखना अधिक पसंद करते हैं।

मुझे यह केवल छवि निर्माण से जुड़े पहलू से परे कई कारणों से असाधारण लगता है। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक छवि के महत्व को शायद नेहरू या इंदिरा गांधी से भी बेहतर समझते हैं। मैं यह बात उन दोनों का समान रुचि के साथ अध्ययन करने वाले व्यक्ति के रूप में कह रहा हूं।

पहला कारण है—अनुशासन। पच्चीस वर्ष किसी फोटो अवसर का हिस्सा नहीं हो सकते। यह किसी समाचार चक्र के अनुरूप किया गया एकमात्र बड़ा कदम नहीं है। यह एक ऐसी आदत है, जिसे दो अलग-अलग प्रकार की जिम्मेदारियों के दौरान, चुनावी चक्रों के बीच और शासन के रोजमर्रा के कामकाज के दौरान भी लगातार बनाए रखा गया। ऐसे समय में किसी एक-दो स्मृति-चिह्न को चुपचाप अपने पास रख लेना बेहद आसान होता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और आज तक ऐसा नहीं हुआ है।

दूसरा कारण यह है कि इससे प्रतीकों के साथ उनके संबंध की झलक मिलती है। श्रद्धा के साथ भेंट किया गया कोई शॉल जब सीवेज उपचार संयंत्र के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से नीलाम किया जाता है, तो यह महज एक प्रतीकात्मक कदम नहीं है। यह एक प्रकार का रूपांतरण है—भावनाओं को ठोस व्यवस्था में और स्नेह को बुनियादी ढांचे में बदलने का प्रयास। इसे किसी संचार कार्यशाला में नहीं सिखाया जा सकता। यह दशकों के अनुभव से विकसित हुई उस सहज समझ का परिणाम है कि भारतीय केवल सुशासन नहीं चाहते, बल्कि ऐसा शासन भी चाहते हैं, जिसमें सेवा और समर्पण का भाव दिखाई दे।

तीसरा कारण, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में मेरी अपनी रुचियों के सबसे निकट है, जिसने जीवन का एक बड़ा हिस्सा ब्रांडों का अध्ययन करने में बिताया है। वह कारण यह है कि इस प्रक्रिया ने ‘नमामि गंगे’ को केवल एक सरकारी योजना न रहकर एक साझा जनभागीदारी का प्रयास बना दिया है। किसी टियर-2 या टियर-3 शहर का कोई चिकित्सक भगवान विष्णु की प्रतिमा की बोली इसलिए लगाता है कि उसे विश्वास है कि इससे उस नदी की स्वच्छता में योगदान मिलेगा, जिसमें उसके पूर्वज स्नान किया करते थे। अब सरकार ने ऐसा कुछ किया है, जो किसी विज्ञापन बजट के दायरे में नहीं आ सकता—उसने नागरिकता को व्यक्तिगत जुड़ाव का अनुभव बना दिया है।

अब इस चर्चित भाले की बात करें। दुनिया भर में खेलों से जुड़ी वस्तुओं की नीलामी होना एक सामान्य बात है। यदि ऐसी नीलामी से अधिक से अधिक युवा खेलों की ओर आकर्षित होते हैं, तो इसमें हानि ही क्या है?

अपने करियर में मैंने कई विषयों पर आलोचनात्मक विचार व्यक्त किए हैं और निश्चित रूप से भविष्य में भी करता रहूंगा। लेकिन निरंतरता का अपना महत्व है, विशेषकर ऐसे देश में जहां सार्वजनिक जीवन में निरंतरता उतनी ही दुर्लभ है, जितनी दिल्ली में बिना धुंध वाली सर्दी। पच्चीस वर्षों तक उपहारों को बिना किसी शोर-शराबे और प्रचार के, एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत जनहित के कार्यों में परिवर्तित करना महज छवि निर्माण नहीं है। इसे मैं, अगर कहने की अनुमति हो, तो चरित्र का परिचायक कहूंगा। गंगा के अनेक संरक्षक हैं, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने बहुमूल्य उपहारों को उसके संरक्षण के लिए समर्पित करने का इतना प्रत्यक्ष और ठोस उदाहरण प्रस्तुत किया है।

यह वास्तव में सेवा और त्याग के क्षेत्र में मोदी की पच्चीस वर्षों की एक उल्लेखनीय मिसाल है।

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